Tuesday, 13 January 2009
आज भुलि गया किलै ओ नानो याक रिवाज..
13 jan 09-हल्द्वानी : कुमाऊं की लोकसंस्कृति की याद ताजा करती हस्तकलायें, आकर्षक पारंपरिक परिधान में नृत्य करते लोककलाकार और काव्य सम्मेलन में लोकसंस्कृति की उपेक्षा पर व्यंग करती कवितायें। यह नजारा सोमवार को पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच में आयोजित उत्तरायणी कौतिक का। उत्थान में लगे स्टालों में सुबह से ही भीड़ नजर आ रही थी। इनमें ्रकुमाऊंनी हस्तकलाओं का प्रदर्शन देखते ही बन रहा था। मेले में तरह-तरह के हस्तकलाओं में लोगों की रुचि नजर आ रही थी। काव्य संध्या में कुमाऊंनी कवियों ने लोकसंस्कृति की उपेक्षा पर कटाक्ष करते हुये कवितायें प्रस्तुत की। इसकी अध्यक्षता करते हुए शेरसिंह बिष्ट अनपढ़ ने अपने रचना भुरभरू उज्याव गसी जाणि रातै व्याण, मुकुवै षिकौड़ जसी उडि़ गै निसाण.. प्रस्तुत की। कवि नारायण सिंह बिष्ट ने आज भुलि गया किलै ओ नानो याक रिवाज.. कविता सुनाई तो करुणाशंकर काण्डपाल ने कैस हैगो हमार पहाड़, शराब, बेरोजगारी का हाल हैगो हमार पहाड़.. की प्रस्तुत किया। इसके अलावा जगदीश जोशी, देवकी मेहरा, बसंत जोशी, जगदीश जोशी, केसी पंत, केशवदत्त पलडि़या, ताराराम आर्य, संजय पाठक, डा. भगवती पनेरू आदि कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से समसामायिक विषय उठाए और पर्वतीय संस्कृति से रुबरु कराते हुये उनकी उपेक्षा पर चिंता व्यक्त की।
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