Sunday, 8 February 2009
गोठिया: जिन्हें रहती है जंगल की हर खबर
, हल्द्वानी उत्तराखण्ड की अकूत वन संपदा पर जिन वन माफियाओं की गिद्ध दृष्टि लगी हुई है। उन पर सदियों से किसी और की नजर भी है। इनमें से ज्यादातर लोग न तो खुलकर सामने आते हैं और ना ही अपनी पहचान बताते हैं। ज्यादातर मामलों में वन अधिकारी भी इनके नाम से वाकिफ नहीं रहते। ये लोग वर्षो से पर्दे के पीछे से वन विभाग को जंगलों में होने वाली एक-एक आपराधिक गतिविधि की जानकारी देते आ रहे हैं। गोठिया के नाम से जाने जाने वाले यह लोग वनों के विभिन्न खत्तों अथवा गोठों में गुमनाम सी हालत में रहते हैं। गुमनाम ही सही पर वन विभाग के बड़े मददगार हैं और वन विभाग के अधिकारी इनकी सूचनाओं पर यकीन भी पूरा करते हैं। ज्यादातर मामलों में ये संबंधित वन रेंजर को सूचनाएं देते हैं। इस समय तराई पूर्वी वन प्रभाग में हल्द्वानी से लेकर टनकपुर तक हुरई खत्ता, तुलीखाल खत्ता, खुमारी खत्ता समेत कुल 22 खत्ते अथवा गोठ हैं। जबकि हल्द्वानी वन प्रभाग में 26 व तराई केंद्रीय वन प्रभाग में 8 गोठ हैं। ब्रिटिश काल में शीतकाल के दौरान पर्वतीय लोग ठंड से बचने के लिए अपने जानवरों समेत तराई-भावरी के जंगलों में डेरा डाल कर रहते थे। ठेकेदारी प्रथा के उस दौर में वन विभाग इनसे कई तरह के काम लेता था मसलन, कटान, फायर लाइन का काम आदि। तब वन विभाग ने इन लोगों के रहने के लिए स्थान भी मुहैया कराया। उनके रहने के स्थान को गोठ अथवा खत्ते का नाम दिया। बाद में इन लोगों की बसाकत बढ़ने लगी तो इन्होंने स्थायी रुप से रहना शुरू कर दिया। कुछ लोग तो खेती का काम भी करने लग गये। चूंकि ये लोग शुरू से जंगलों में रहते हैं ऐसे में इनका वनों से लगाव होना लाजमी है। यही लोग वनों के प्रति वफादारी दिखाते हुए वन माफियाओं की हरकतों की सूचना वन विभाग के अधिकारियों तक पहुंचाते हैं। जिनमें से ज्यादातर बेरोजगार युवा होते हैं। जिन्हें वन विभाग विवेक के आधार पर बरामद लकड़ी की कीमत के अनुसार धनराशि देता है।