Saturday, 7 February 2009

उत्तराखंड में पहला कार्बन फ्लक्स मेजरमेंट टावर

Feb 6, देहरादून। जंगल वातावरण से कितनी कार्बन डाइ ऑक्साइड सोखते हैं, अब जल्द ही यह पता चल सकेगा। उत्तराखंड में स्थापित देश के सबसे पहले कार्बन डाइ ऑक्साइड फ्लक्स मेजरमेंट टावर से यह संभव हो पाएगा। दून स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग ने हल्द्वानी के लामाचौड़ स्थित कार्बन मॉनिटरिंग सेंटर में इटली के टुसिया विश्वविद्यालय के सहयोग से यह टावर स्थापित किया है। टुसिया विवि की लैबोरेटरी ऑफ फॉरेस्ट इकोलॉजी के प्रोफेसर रिकार्डो वेलेंतीन ने टावर स्थापित करने में मदद की। आईआईआरएस के फॉरेस्ट व इकोलॉजी डिविजन के प्रमुख डॉ. एसपीएस कुशवाहा ने बताया कि अब तक दुनिया में ऐसे 600 टावर लगाए गए हैं। इनमें केवल 400 ही ठीक काम कर रहे हैं। लामाचौड़ में लगे टावर में चार सेंसर लगाए गए हैं, जो वातावरण में कार्बनडाइऑक्साइड की मात्रा के बारे में बताएंगे। अब तक वनों के कार्बन अवशोषण व ऑक्सीजन उत्सर्जन पर देश में जो भी आंकड़े उपलब्ध हैं, वे ज्यादातर अनुमान पर आधारित हैं। टावर लगने के बाद उत्सर्जित ऑक्सीजन और अवशोषित कार्बन की मात्रा को पहली बार मापा जा सकेगा। उन्होंने बताया कि कार्बनडाइऑक्साइड कुछ खास आवृत्तियों पर प्रकाश का अवशोषण करती है। अगर प्रकाश कम है तो यह पता चल जाता है कि कार्बन का संकेंद्रण ज्यादा है। मालूम हो कि भारतीय वन अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) और आईआईआरएस भी संयुक्त रूप से उच्च हिमालयी क्षेत्रों की वनभूमि में कार्बन की मात्रा को मापने का काम कर रहे हैं। भारतीय वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई)भी आईआईआरएस की मदद से प्रदेश में दून के एफआरआई परिसर, पौड़ी के खिर्सू और चमोली के मंडल गांव में ऐसे ही टावर लगाने की योजना बना चुका है। हालांकि यह अभी परवान नहीं चढ़ पाई है। बताते चलें कि कार्बन अवशोषण का मु्द्दा क्योटो प्रोटोकॉल के बाद से विश्वभर में चर्चा में है। वैश्विक स्तर पर कार्बन ट्रेडिंग मुद्दा उठता रहा है कि सघन वन क्षेत्र वाले उन देशों को इस बात के लिए वित्तीय मदद मिलनी चाहिए, जो अपने जंगलों के जरिये वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी ला रहे हैं। अगर देश में कार्बन अवशोषण के बारे में सही आंकड़े सामने आ जाते हैं तो भारत कार्बन उत्सर्जन रोकने में अपने योगदान के लिए वित्तीय मदद का दावा कर सकता है। दिसंबर 2006 में लीडरशिप फॉर एन्वायरमेंट ऐंड डेवलपमेंट और सेंट्रल हिमालयन एन्वायरमेंट एसोसिएशन की रिपोर्ट में बताया गया था कि उत्तराखंड के जंगल, कार्बन अवशोषण कर देश को हर साल 10,700 करोड़ रुपये की सेवा देते हैं।