रुद्रप्रयाग
विश्व में कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी के उपचार के लिए संजीवनी माने जाने वाले थुनेर के पेड़ संरक्षण के अभाव में अब जिले के कुछ ही हिस्सों में बचे हुए हैं। लगभग ७००० फिट की ऊंचाई पर तुंगनाथ, मक्कू और घिमतोली क्षेत्र के जंगलों में पाए जाने वाले थुनेर के पौधे सूख रहे हैं। स्थानीय लोग थुनेर के पेड़ की छाल को पशुओं में मुंहपका रोग के ईलाज के लिए प्रयोग में लाते हैं। आशंका व्यक्त की जा रही है कि यदि इस पेड़ का शीघ्र संरक्षण नहीं होता है तो यह अतीत की वस्तु मात्र रह जाएगा।थुनेर का वानस्पतिक नाम टे1टस बकाटा है। इसका टे1सॉल तेल के रूप में कैंसर रोग का ईलाज किया जाता है। लेकिन धीरे-धीरे इसके पेड़ लुप्त हो रहे हैं। घिमतोली क्षेत्र के जंगलों में जहां एक दशक पूर्व थुनेर के पेड़ होते थे, वहां आज कंटीली झााडिय़ां फैली हुई हैं। कैंसर रोग के उपचार के साथ ही इसकी छाल से चाय प8ाी भी बनाई जाती है। ६८ वर्षीय पूर्व वन पंचायत सरपंच मुर्2ाल्या सिंह बताते हैं कि थुनेर के पेड़ में हर रोग को मिटाने की क्षमता होती है। पहले जंगलों में इसके पेड़ भारी मात्रा में पाए जाते थे। लेकिन अब इसका दोहन और पातन होने से ये पेड़ कम ही मात्रा में दिखाई दे रहे हैं। रुद्रप्रयाग डीएफओ सुरेंद्र मेहरा का कहना है कि थुनेर के पेड़ की मह8ाा अधिक है। इसके संरक्षण के लिए शासन स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। इन पेड़ों को व्यापक स्तर पर उगाने के लिए यदि शासन से कोई योजना तैयार होती है तो इसे जिले की वन पंचायतों में लगाया जाएगा। मोहनखाल में हो रही पौधशाला तैयाररुद्रप्रयाग। केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग गोपेश्वर के तत्वाधान में नागनाथ वन क्षेत्र मोहनखाल वीट में थुनेर के पेड़ को जीवित रखने के लिए इसकी पौधशाला तैयार की जा रही है। १.९ हे1टेयर क्षेत्रफल में फैले इस वीट में थुनेर के लगभग चार हजार पौधों का रोपण किया गया है। वन दारोगा रविंद्र भंडारी का कहना है कि यदि यह प्लांटेशन अभियान सफल होता है तो इनका अलग-अलग वन पंचायतों में रोपण किया जाएगा। इस पौधशाला को एक वर्ष से तैयार किया जा रहा है।
No comments:
Post a Comment