, हल्द्वानी गुच्ची खेले बचपन बितै अल्माड़ गौं माल में, बुढ़ापा हल्द्वानी में कटौ जवानी नैनीताल में.. इसी कविता में आगे जब पकडूं हाथ ऊ जब थमूं कमर, आखिर पड़ाव में न्हैगे ओ बटावा, तेरि उमर.. कविता के जरिये कवि अपनी जिन्दगी की पूरी गाथा सुना डालते हैं। संस्कृति विभाग के सहयोग से अंकित प्रकाशन द्वारा प्रकाशित शेरदा समग्र में शेर सिंह बिष्ट अनपढ़ की समस्त कवितायें समाहित हैं। इस संग्रह को वह जिन्दगी की सबसे बड़ी कमाई मानते हैं। पिचके गाल, पके बाल, लड़खड़ता बदन, मुंह में दांत नहीं फिर भी पूरे जोश के साथ काव्य पाठ करते हैं शेरदा। पहाड़ के दर्द से लेकर गरीबी, बिछोह आदि व्यथा को अपनी कविता में दर्शाने का पूरा माद्दा रखते हैं। अल्मोड़ा के ग्राम माल में जन्मे शेरदा का बचपन बड़े अभावों में गुजरा। पिता का साया बचपन से उठ गया। पढ़ने-लिखने का कोई मौका नहीं मिला। जीवन के कठिन संघर्षो के साथ कई घरों में नौकरी की। इसी दौरान एक शिक्षिका के घर पर नौकरी की और उसी ने शेरदा को पढ़ना-लिखना सिखाया। इसके बाद सेना में कार्यरत रहे। 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान घायल जवान पूना अस्पताल में भर्ती थे। साथ ही शेरदा भी इसी अस्पताल में भर्ती थे। घायल जवानों की व्यथा सुनते-सुनते शेरदा का कवि हृदय जाग उठा और कवितायें लिखनी शुरू हो गयीं। पहली पुस्तक नेफा-लद्दाख प्रकाशित हुयी। इसके बाद पूना की कोठियों में पहाड़ की नारियों का दर्द समेटता दीदी बैणी कविता संग्रह प्रकाशित हुआ। इसके अलावा गीत नाटक प्रभाग में कार्यरत होने के साथ ही उनकी मेरि लटि पटि, जॉठिक घुडु़र, गीत लगूनी गाड़-गध्यारा, हास्य व्यंग, फचैक आदि कविता संग्रह प्रकाशित हुए। शेरदा ने अपने प्रसिद्ध गीत ओ परुवा बौज्यू चप्पल क्ये लाछा एस को मस्त अंदाज में प्रस्तुत करते हुए जागरण को बताया कि कुमाऊंनी संस्कृति को आगे ले जाने के लिये गुमानी पंत व गौरा देवी ने जो दीप जलाया, उसे और आगे ले जाने की आवश्यकता है। इसके लिये मेहनत, सोच व समझ के साथ आगे कदम उठाना है। अंकित प्रकाशन की निदेशक भावना पंत का कहना है कि कुमाऊं की परंपरा को सहेजना ही उनके प्रकाशन का मुख्य लक्ष्य है। इसी क्रम में उन्होंने शेरदा समग्र का प्रकाशन किया है।
Monday, 9 February 2009
आखिर पड़ाव में न्हैगे ओ बटावा, तेरि उमर..
, हल्द्वानी गुच्ची खेले बचपन बितै अल्माड़ गौं माल में, बुढ़ापा हल्द्वानी में कटौ जवानी नैनीताल में.. इसी कविता में आगे जब पकडूं हाथ ऊ जब थमूं कमर, आखिर पड़ाव में न्हैगे ओ बटावा, तेरि उमर.. कविता के जरिये कवि अपनी जिन्दगी की पूरी गाथा सुना डालते हैं। संस्कृति विभाग के सहयोग से अंकित प्रकाशन द्वारा प्रकाशित शेरदा समग्र में शेर सिंह बिष्ट अनपढ़ की समस्त कवितायें समाहित हैं। इस संग्रह को वह जिन्दगी की सबसे बड़ी कमाई मानते हैं। पिचके गाल, पके बाल, लड़खड़ता बदन, मुंह में दांत नहीं फिर भी पूरे जोश के साथ काव्य पाठ करते हैं शेरदा। पहाड़ के दर्द से लेकर गरीबी, बिछोह आदि व्यथा को अपनी कविता में दर्शाने का पूरा माद्दा रखते हैं। अल्मोड़ा के ग्राम माल में जन्मे शेरदा का बचपन बड़े अभावों में गुजरा। पिता का साया बचपन से उठ गया। पढ़ने-लिखने का कोई मौका नहीं मिला। जीवन के कठिन संघर्षो के साथ कई घरों में नौकरी की। इसी दौरान एक शिक्षिका के घर पर नौकरी की और उसी ने शेरदा को पढ़ना-लिखना सिखाया। इसके बाद सेना में कार्यरत रहे। 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान घायल जवान पूना अस्पताल में भर्ती थे। साथ ही शेरदा भी इसी अस्पताल में भर्ती थे। घायल जवानों की व्यथा सुनते-सुनते शेरदा का कवि हृदय जाग उठा और कवितायें लिखनी शुरू हो गयीं। पहली पुस्तक नेफा-लद्दाख प्रकाशित हुयी। इसके बाद पूना की कोठियों में पहाड़ की नारियों का दर्द समेटता दीदी बैणी कविता संग्रह प्रकाशित हुआ। इसके अलावा गीत नाटक प्रभाग में कार्यरत होने के साथ ही उनकी मेरि लटि पटि, जॉठिक घुडु़र, गीत लगूनी गाड़-गध्यारा, हास्य व्यंग, फचैक आदि कविता संग्रह प्रकाशित हुए। शेरदा ने अपने प्रसिद्ध गीत ओ परुवा बौज्यू चप्पल क्ये लाछा एस को मस्त अंदाज में प्रस्तुत करते हुए जागरण को बताया कि कुमाऊंनी संस्कृति को आगे ले जाने के लिये गुमानी पंत व गौरा देवी ने जो दीप जलाया, उसे और आगे ले जाने की आवश्यकता है। इसके लिये मेहनत, सोच व समझ के साथ आगे कदम उठाना है। अंकित प्रकाशन की निदेशक भावना पंत का कहना है कि कुमाऊं की परंपरा को सहेजना ही उनके प्रकाशन का मुख्य लक्ष्य है। इसी क्रम में उन्होंने शेरदा समग्र का प्रकाशन किया है।