Thursday, 12 February 2009
कमाई बढ़ी, जीवन स्तर गिरा
चार साल में हाई-फाई लिविंग स्टैंडर्ड वाले परिवार घटे
देहरादून।
हम तर1की की बड़ी-बड़ी बात कर रहे हैं। कमाई बढऩे के दावे कर रहे हैं। मगर हकीकत कुछ अलग ही है। उ8ाराखंड में लोगों का जीवन स्तर ऊपर नहीं उठ रहा, बल्कि इसमें तेजी से गिरावट आ रही है। खास तौर पर शहरों में परिवारों को अपना जीवन स्तर उच्च बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के ताजातरीन सर्वे के आधार पर बात करें तो चार साल के भीतर ही हाई-फाई लिविंग स्टैंडर्ट रखने वाले करीब पांच फीसदी परिवार कम हो गए हैं।पहले बात कमाई और तर1की की। प्रदेश की कमाई में तेजी से इजाफा हुआ है। २००४-०५ में ७.७४ की विकास दर २००७-०८ मेंं बढ़कर ११.९३ पर पहुंची। इसी तरह प्रति व्य1ित आय में भी तेजी से बढ़ो8ारी हुई। २००४-०५ में प्रति व्य1ित आय २० हजार रुपये थी, जो २००७-०८ में बढ़कर करीब २७ हजार हो गई। अब बात जीवन स्तर की। करीब १७ हजार परिवारों को स्वास्थ्य विभाग ने दो साल में जाकर टटोला और तैयार किया डिस्ट्रिक लेवल हेल्थ सर्वे-थर्ड। इसके अनुसार २००४ में जहां ३१ फीसदी परिवारों का जीवन स्तर ऊंचा था, जो घटकर २६.५ पर पहुंच चुका है। शहरों में अब ६८ फीसदी परिवार ही उच्च स्तर का जीवन यापन कर रहे हैं। चार साल पहले ये ६९.२ फीसदी थे यानी १.२ फीसदी ज्यादा। मगर अब तेजी से स्थिति बदल गई है। २००४ में नि6न स्तरीय जीवन यापन करने वाले ३८.१ फीसदी लोग निकले थे। अबकी बार ये ४६.५ फीसदी निकले हैं। यह स्थिति इसलिए भी ज्यादा चौंकाती है, कि पिछले कुछ सालों में केंद्र सरकार ने शहरी गरीबी पर सबसे ज्यादा फोकस किया है। इसके लिए नीति भी तैयार की गई है।
-प्रति व्य1ित आय में इजाफा अगर हो रहा है तो यह राज्य की पूरी अर्थ व्यवस्था के लिए फायदेमंद हैं। पर लोगों का जीवन स्तर तो तभी उठेगा जब समाज के गरीब से गरीब व्य1ित को भी नागरिक सुविधाओं का लाभ दिया जा सके। यह किसी से छुपी नहीं है कितने गरीब परिवार गंभीर रोगों का इलाज करा पाते हैं और कितनों के पास सिर छुपाने के लिए छत है। अगर यह अंतर दि2ा रहा है तो साफ है कि कुछ लोगों को विकास का वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है।
डा. आदित्य गौतम, अर्थशास्त्री-यह साफ है कि पिछले कुछ समय में पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव और हमारी मनी ओरिएंटेड सोच ने हम पर अनावश्यक दबाव बढ़ा दिए है। जीवन स्तर मापने के पैमाने बदल गए हैं। फिर ये भी सच्चाई है कि आर्थिक और सामाजिक विकास के जितने कार्यक्रम में है, वे आम आदमी तक ईमानदारी से पहुंच नहीं पा रहे हैं।
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