Monday, 20 April 2009

क्या होगा दिवाकर के इस्तीफे का हश्र

सरकार से समर्थन वापसी पर जल्द फैसले के नहीं हालात सरकार में रहते हुए भी सरकार से बाहर रहने की उत्तराखंड क्रांति दल की रणनीति! उक्रांद नेता दिवाकर भट्ट ने मंत्री पद से इस्तीफा तो दे दिया है पर इसे मंजूरी नहीं मिली है। उनकी पार्टी सरकार से समर्थन वापसी की बात तो कर रही है पर पार्टी के नेता लोकसभा चुनाव को पहली प्राथमिकता बता रहे हैैं। जाहिर है कि इस मुद्दे पर जल्द फैसले के हालात नहीं हैं। ऐसे में सवाल यह खड़ा हो रहा है कि इस इस्तीफे क्या हश्र होगा और चुनाव तक कोई तस्वीर साफ होगी या नहीं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस समय सूबे की भाजपा सरकार बहुमत के अंतिम पायदान पर खड़ी है। ऐसे में साथ चल रहे लोगों की सियासी चालें भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन रही हैं। काबीना मंत्री दिवाकर भट्ट को गत दिवस अचानक ही नैतिकता याद आ गई और उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे डाला। मजेदार बात यह है कि उक्रांद के एक मात्र मंत्री ने इस्तीफा दे दिया पर पार्टी नेताओं के पास सरकार से समर्थन वापसी के मुद्दे पर निर्णय लेने को समय ही नहीं है। कहा जा रहा है कि उनके लिए लोकसभा चुनाव पहली प्राथमिकता है। इसके पीछे मंशा चाहे जो भी हो पर इतना साफ है कि उक्रांद इस मामले में कोई जल्दबाजी के मूड में नहीं है।पहले बात यूकेडी की। सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या यह भाजपा पर दबाव बनाने की कोशिश है और अगर ऐसा है तो इस इस्तीफे का हश्र क्या होगा। अगर लोकसभा चुनाव होने तक उक्रांद नेताओं को समर्थन वापसी पर निर्णय का वक्त नहीं मिला तो यह क्षेत्रीय दल सरकार से बाहर होकर भी सरकार के साथ रहेगा। ऐसे में चुनाव में प्रचार के वक्त उक्रांद नेताओं के पास भाजपा पर तीखे प्रहार करने का मौका होगा। यानि मंशा 'सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे' वाली कहावत पर काम करने की है। अब यही स्टैंड पर कायम रहता है तो क्या यह माना जाएगा कि उसके रणनीतिकारों की नजर में वोटर के पास सोचने-समझाने की शक्ति नहीं और उक्रांद गठबंधन धर्म के साथ ही प्रतिपक्षी का धर्म भी निभाना चाहता है, लेकिन क्या यह मुमकिन है। इस सबके अलावा इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र बिंदु दिवाकर भट्ट की रणनीति क्या है, इसे लेकर भी कयास ही लगाए जा सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि जब कुछ अर्सा पहले उन पर इस्तीफे का भारी दबाव था तब उन्होंने न केवल इससे किनारा कर लिया था बल्कि परोक्ष रूप से अपनी ही पार्टी को चेतावनी भी दे डाली थी।अब एक नजर भाजपा पर, यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं लगता कि बहुमत की कगार पर खड़ी भाजपा में ऐन चुनाव के वक्त इस राजनैतिक घटनाक्रम से कोई खलबली नजर नहीं आ रही है। जाहिर है कि या तो पार्टी सब कुछ मैनेज करने को इस कदर भरोसेमंद है कि उसे सरकार के भविष्य की कोई चिंता ही नहीं, या फिर उसकी नजर में यह परिणति उक्रांद के अंदरूनी संघर्ष की है, जिसे नियंत्रित करना पार्टी की खुद की ही जिम्मेदारी है।---पहले विभाग से दिया था इस्तीफादेहरादून: लगता है दिवाकर को इस्तीफे से खासा लगाव है। आठ माह पहले ही दिवाकर ने इसी तरह अचानक ही खाद्य विभाग से इस्तीफा दे दिया था। कई रोज तक राजनीतिक नाटक चला और दिवाकर विभाग संभाले रहे। चर्चा है कि इस बार भी कहीं ऐसा ही तो नहीं होने वाला। ---------उक्रांद से चल रही है बातचीत: डा.जैन राज्य सरकार अपने दम पर अभी भी बहुमत में : भाजपा के प्रदेश सह प्रभारी डा.अनिल जैन ने कहा कि प्रदेश सरकार पर कोई संकट नहीं है। संख्या बल के आधार पर भाजपा अपने दम पर बहुमत में है। वैसे उक्रांद के साथ भी बातचीत चल रही है।प्रदेश कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत में डा.जैन ने कहा कि मौजूदा 68 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा के 35 विधायक हैं। दो निर्दलियों का भी समर्थन है। यूकेडी से भी बातचीत चल रही है। ऐसे में कोई दिक्कत वाली बात नहीं है।उन्होंने कहा कि पहले फेज के चुनाव ने भाजपा तथा एनडीए खेमे को खुश होने का मौका दिया है, लालू यादव की तरह कुछ और लोग हैं जिन्हें झाल्लाते हुए देखा जा सकता है। उन्होंने एक बार फिर से भाजपा के मुद्दों को गिनाया। उन्होंने कहा कि स्विस बैंकों में भारतीयों के काले धन को वापस लाने में आखिर किसे दिक्कत हो सकती है। यूपीए का उत्तराखंड के साथ सौतेला व्यवहार और आतंकवादी हमलों को उन्होंने कांग्रेस तथा यूपीए के खिलाफ भाजपा के मुददों के रूप में गिनाया।

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