Friday, 6 March 2009

असल आंदोलनकारियों का सम्मान

देहरादून, सन् 1979 को राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण का वर्ष घोषित करना उक्रांद के लिए बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि यह उक्रांद की ही मांग रही है। भाजपा द्वारा अपने सहयोगी दल को दी गई इस सौगात के कई राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। उक्रांद इसे असल आंदोलनकारियों का सम्मान मानता है। उत्तराखंड आंदोलनकारी कल्याण परिषद की अध्यक्ष सुशीला बलूनी कहती हैं कि इस निर्णय का बहुत अधिक फायदा नहीं होगा, क्योंकि जंगल काटने पर मुकदमा झेलने वालों को राज्य आंदोलनकारियों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। जन आंदोलन तो 1994 में ही हुआ। यह बात ठीक है कि कुछ लोगों में राज्य के प्रति जुनून था, उन्होंने उसे प्रदर्शित भी किया, लेकिन चिन्हीकरण के लिए प्रमाण भी तो देने होंगे। इसलिए लगता है कि इसका बहुत अधिक लाभ नहीं मिल पाएगा। सरकार की घोषणा के साथ ही कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट ने कहा था कि 1979 से आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण उक्रांद का मुद्दा है। यह उक्रांद के लिए बड़ी जीत है। श्री भट्ट के अनुसार 1994 में अचानक जन आंदोलन खड़ा नहीं हो गया। किसी भी जन आंदोलन के लिए एक बड़ी पृष्ठभूमि की जरूरत होती है, जो उक्रांद ने 1979 से बनानी शुरू की थी। उनके अनुसार कांग्रेस द्वारा किया गया आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण राजनीति से प्रेरित था। श्री भटट कहते हैं कि पेड़ों का कटान व पानी का आंदोलन इसी के हिस्से थे। उक्रांद नेता काशी सिंह ऐरी कहते हैं कि यह उक्रांद के नौ बिंदुओं में से एक है। भाजपा ने उक्रांद की एक मांग मानी है। श्री ऐरी कहते हैं कि पेड़ काटना राज्य आंदोलन का हिस्सा था। सरकार को आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण के लिए मानकों को शिथिल करना चाहिए। इससे असल आंदोलनकारियों का सम्मान हो सकेगा। उत्तराखंड राज्य के गठन की मांग को लेकर 1979 में उत्तराखंड क्रांति दल का गठन किया गया था। उसके बाद राज्य की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुए। राज्य गठन के लिए शुरू हुए इस आंदोलन के कई रूप थे। जैसे विकास कार्यो में अवरोध बने जंगलों का कटान हुआ। पानी के लिए भी आंदोलन हुआ। उक्रांद इस मांग को ठीक चुनाव से पहले मानने के सरकार के निर्णय के पीछे राजनीतिक निहितार्थ भी छिपे हो सकते हैं।

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