Friday, 6 March 2009

फ्योंली के फूल अब राजधानी में भी

देहरादून पर्वतीय लोकजीवन में गहराई तक रचे-बसे फ्योंली के फूल अब पहाड़ी के खेत की मेढ़ों और रास्तों में ही नहीं, राजधानी में भी मुस्कान बिखरेंगे। इसके लिए उद्यान महकमे ने मुहिम शुरू कर दी है। प्रयास सफल हुए तो फ्योंली जल्द ही तराई व भाबर के इलाकों में इठलाती नजर आएगी। इसके पीछे ध्येय है कि लोगों का पहाड़ के प्रति भावनात्मक जुड़ाव बढ़े और वे यहां की लोकसंस्कृति से रूबरू हो सकें। ऋतुराज बसंत के आगमन के साथ ही पहाड़ में घर-आंगन, खेतों की मेढ़ों व रास्तों आदि में इठलाते फ्योंली के फूल बरबस ही हर किसी का ध्यान खींचते हैं। फ्योंली नई उमंग एवं उल्लास का प्रतीक हंै। ये फूल चट्टानों, पहाड़ों पर खिलकर हर स्थिति में मुस्काते रहने का संदेश देते हैं। इसका पहाड़ की लोक संस्कृति से अटूट रिश्ता है। फ्योंली के पहाड़ के लोकजीवन में गहराई तक रचे-बसे होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि जब भी पहाड़ के सौंदर्य की बात होती है, उसमें फ्योंली का जिक्र भी आता है। लोकगीतों में भी इसे पर्याप्त स्थान मिला है। कहना न होगा कि फ्योंली पहाड़ का प्रतिनिधि फूल है। जंगली फूलों की श्रेणी में आने वाली फ्योंली अब पहाड़ों ही नहीं, बल्कि सूबे के मैदानी इलाकों में भी आभा बिखेरेगी। इसके लिए उद्यान विभाग ने कोशिशें आरंभ कर दी हंै। पहल की गई है राजधानी के सर्किट हाउस से। प्रथम चरण में वहां दस गमलों में फ्योंली के पौधे लगाए गए हैं। जल्द ही इसे व्यापक स्वरूप देने की योजना है। यदि प्रयास रंग लाए तो एक से छह हजार फुट तक की ऊंचाई पर पाई जाने वाली फ्योंली भाबर व तराई के इलाकों में भी खिलेगी। उद्यान निदेशक डा.बीपी नौटियाल बताते हैं कि फ्योंली उन फूलों में शामिल है, जो फोक बेस्ड हैं। इसीलिए इसे सूबे के मैदानी इलाकों में उगाने का प्रयास शुरू किया गया है, ताकि अधिकाधिक लोग इसका करीब से दीदार करने के साथ ही इसके बारे में जानकारी हासिल कर सकें। यही वह फूल है जो बसंत से शुरू होकर करीब नौ माह तक जगह-जगह खिला रहता है।

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