Tuesday, 13 September 2011

डोली नहीं घोड़ी पर बैठ विदा होती है दुल्हन

चमोली के दशोली क्षेत्र में डोली नहीं घोड़ी पर बैठ विदा होती है दुल्हन
गोपेश्र्वर ---शादी-ब्याह की बात करें तो घोड़ी पर सवार दूल्हे की तस्वीर आंखों में तैरने लगती है। लेकिन उत्तराखंड के सीमांत चमोली जिले के दशोली क्षेत्र के दर्जन भर गांवों में इसका अलग ही रंग है। यहां दुल्हन डोली में नहीं, बल्कि घोड़ी पर बैठकर विदा होती है।

बदलाव की बयार और सुविधाओं के विस्तार ने तमाम परंपराएं लील लीं, लेकिन चमोली जिले में दशोली विकासखंड के पाणा ईराणी क्षेत्र के एक दर्जन से ज्यादा गांवों में घोड़ी पर दुल्हन की विदाई की परंपरा कायम है। न डोली और न विदाई के गीत, बस मशकबीन की सुर लहरियों के साथ तालमेल बिठाती ढोल-दमाऊ की थाप।
उल्लास के बीच पगडंडियों पर एक घोड़ी पर दूल्हा और दूसरी पर बैठ विदा होती दुल्हन। क्षेत्र में विवाह समारोह के दौरान यह नजारे आम हैं।
असल में ईराणी क्षेत्र के गांव सड़क से तीस किमी से अधिक दूरी पर हैं। संकरी और सर्पीली पगडंडियां ही वहां आवागमन का जरिया हैं। इन्हीं दिक्कतों को देखते हुए यहां डोली के बजाय घोड़ी से दुल्हन को विदा करने की परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। शुरुआत कब हुई, कहना मुश्किल है, लेकिन अब यह रिवाज है। फिर इस क्षेत्र के गांवों में वैवाहिक रिश्ते भी ज्यादातर सड़क से दूर के गांवों में होते हैं। हालांकि, बदलाव के इस दौर में शादी-ब्याह में डीजे, टेंट आदि आ गए हैं, मगर दुल्हन की घोड़ी पर विदाई की परंपरा कायम है।
अपनी इस अनूठी परंपरा पर क्षेत्रवासियों को गर्व भी है। ग्राम पाणा निवासी 93 वर्षीय बचन सिंह मेहरा के मुताबिक यह परंपरा एक सदी से चली आ रही है। बुजुर्ग यह भी बताते हैं पाणा के थोकदार पदान की अगुवाई में अन्य गांवों के पदान (मुखिया) से विचार-विमर्श के बाद यह परंपरा शुरू हुई थी।

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