Wednesday, 23 February 2011

अस्तित्व को छटपटातीं उत्तराखंड की बोलियां

, हल्द्वानी जिस तरह से राज्य में पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन बढ़ रहा है और बाजार पर वैश्वीकरण व पाश्चात्यीकरण का प्रभुत्व हो गया है, उससे उत्तराखंड की बोलियां भी अपने अस्तित्व को छटपटाने लगी हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी कहा है कि कुमाऊंनी व गढ़वाली बोलियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। इन्हें लिपिबद्ध करने के लिए राज्य गठन के 10 वर्षो में भी सरकार ने ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं समझी। अंतर्राष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस को लेकर उत्तराखंड से जुड़े चंद लोग अपनी मातृ भाषा कुमाऊंनी, गढ़वाली व जौनसारी को बचाने के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स में माहौल बनाने का प्रयास तो कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में अभी तक इन बोलियों की कोई लिपि तक नहीं बन सकी है। स्थिति यह है कि यह बोलियां अपने अस्तित्व के लिए ही कसमसा रही हैं। चंद कवियों, लेखकों व ब्लागरों के जरिये इन बोलियों को सहेजने के साथ ही युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन इसमें राज्य सरकार कोई विशेष पहल करती हुई नजर नहीं आ रही है। हालांकि उत्तराखंड में दर्जनों बोलियां हैं, जिनमें कुमाऊंनी, गढ़वाली व जौनसारी प्रमुख हैं। इन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किये जाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया जा रहा है। धाद संस्था इन बोलियों के संरक्षण के लिए प्रयासरत है। समन्वयक तन्मय ममगई बताते हैं कि इसके लिए समय-समय पर कवि सम्मेलन व भाषा पर विमर्श किया जा रहा है। वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही का कहना है कि क्षेत्रीयता को ध्यान में रखते हुए सरकार का दायित्व बन जाता है कि क्षेत्रीय भाषाओं को संरक्षित करने में योगदान दे। उत्तराखंड में थारुों, वनरावतों व भोटिया जनजातियों की बोलियां अस्तित्व में नहीं हैं तो इसके लिए भी दोषी राज्य सरकार है। संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने के बजाय कुमाऊंनी व गढ़वाली को द्वितीय राजभाषा का दर्जा मिलना चाहिये। प्रसिद्ध अनुवादक व कवि अशोक पाण्डे का कहना है कि सबसे पहले कुमाऊंनी व गढ़वाली बोलियों को लिपिबद्ध करने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार के अलावा लोग भी उदासीन हैं। साहित्यकार दिनेश कर्नाटक का कहना है कि मातृभाषा को शिक्षा के साथ जोड़ा जाना चाहिये। कुमाऊंनी कवि जगदीश जोशी कहते हैं कि कुमाऊंनी ही नहीं हिन्दी पर ही संकट दिख रहा है। इसे संरक्षित करने के लिए युवाओं को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

Saturday, 19 February 2011

कपिल ऋषि की तपोस्थली गुमनाम

-ऐतिहासिक विरासतें विलुप्त होने के कगार पर -13वीं सदी में कत्यूरी शासकों ने कराया था भव्य मंदिर का निर्माण -मंदिर के पत्थरों में बनीं हैं देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियां नैनीताल: देवभूमि उत्तराखंड में आज भी असंख्य ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल उपेक्षित पड़े हैं। संरक्षण एवं देखरेख के अभाव में कई ऐतिहासिक विरासतें विलुप्त होने के कगार पर जा पहुंची हैं। मंडल मुख्यालय नैनीताल से करीब 60 किमी. की दूरी पर स्थित ऐसा ही बेहद प्राचीन ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल है कपिलेश्वर महोदव। कभी कपिल ऋषि की तपोस्थली रहा यह प्राचीन स्थल आज उपेक्षा का दंश झेल रहा है। कपिलेश्वर महादेव नैनीताल जिले के रामगढ़ विकास खंड के मौना गांव के समीप अल्मोड़ा व नैनीताल जिले की सीमा पर कुमियां व शकुनी नदियों के संगम पर स्थित है। कहा जाता है कि हिमालय की कंदराओं में तपस्या करने वाले कपिल ऋषि ने यहां भी तपस्या की थी। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार 13वीं शताब्दी में कत्यूरी शासकों ने इस स्थल पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जो आज कपिलेश्वर महोदव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। विशालकाय पत्थरों को सुंदर ढंग से तराश कर बनाए गए इस भव्य मंदिर की स्थापत्य कला बेजोड़ है। मंदिर के विशालकाय पत्थरों में देवी-देवताओं की आकर्षक मूर्तियां खुदीं हैं। मंदिर की ऊंचाई लगभग 37 फीट है। हाल ही में इस ऐतिहासिक मंदिर का सर्वेक्षण करने वाले कुमाऊं विवि के पूर्व इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो.अजय रावत के अनुसार प्राचीन मंदिर के चारों ओर भग्न मंदिरों के अवशेष विद्यमान हैं, जिससे स्पष्टï होता है कि यहां प्राचीन काल में और भी कई मंदिर रहे होंगे। प्रो.रावत के मुताबिक कपिलेश्वर मंदिर का वाह्य स्वरूप दोनों ओर अलंकृत रथिका वाला है, जिन पर पाश्र्व देवी-देवताओं की आकर्षक मूर्तियां विद्यमान हैं। इनमें चतुर्भुजा, महिषासुर मर्दिनी, द्विभुज लकुलीश (भगवान शिव) और चतुर्भुज गणेश भगवान की मूर्तियां उत्तर-पूर्व तथा दक्षिण की ओर विराजमान हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपरी हिस्से में लगे पत्थरों में सूरसेन की मूर्ति अलंकृत है और उसके ऊपर त्रिमुखी शिव विराजमान हैं। मंदिर के दरवाजे की चौखट में नाना प्रकार के फूलों की सुंदर आकृतियां भी खुदी हैं। उसके ऊपरी हिस्से में परिचारकों सहित मकर वाहिनी गंगा और कूर्म (कछुवे) पर सवार युमना (देवी) भी चित्रित है। देखरेख के अभाव में प्राचीन स्थापत्य कला की यह बेजोड़ कलाकृतियां धीरे-धीरे नष्टï होते जा रही हैं। मंदिर के उत्तरांग में राहु व केतु को छोड़कर अन्य सभी ग्रहों का उल्लेख मिलता है। मंदिर की शिलाओं में सूर्यमुखी फूल पकड़े सूर्य ग्रह भी विराजमान हैं। कपिलेश्वर मंदिर के पास ही काल भैरव का भी मंदिर है। इनसेट- शिवरात्रि को लगता है मेला नैनीताल: कपिलेश्वर धाम में हर साल शिवरात्रि को मेला लगता है। जिसमें आसपास के करीब दो दर्जन से भी अधिक गांवों से ग्रामीण पहुंचते हैं। कुमियां व शकुनी नदी के संगम पर स्नान करने के बाद श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। शिवरात्रि को यहां भंडारे का आयोजन होता है। इतिहासकार प्रो.अजय रावत के मुताबिक इस स्थल को जागेश्वर की भांति एतिहासिक एवं धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।

तो देववाणी बन जाएगी जनवाणी!

हरिद्वार देववाणी यानी संस्कृत को जनवाणी बनाने के लिए कवायद शुरू हो गई है। विश्व में देववाणी की सबसे बड़ी संस्था संस्कृत भारती ने जनगणना के जरिए संस्कृत का प्रचार-प्रसार करने की अनूठी मुहिम शुरू की है। संस्था के सदस्य मोबाइल संदेश और जनसंपर्क अभियान के जरिए लोगों को इसके लिए जागरूक कर रहे हैं। इनमें देशवासियों से जनगणना में संस्कृत को दूसरी मातृभाषा के रूप में दर्ज कराने की अपील की जा रही है। वर्तमान में संस्कृत सिर्फ वर्ग विशेष की भाषा बनकर सीमित हो गई है। आम लोगों के बीच पहचान बनाने में संस्कृत कामयाब नहीं हो पा रही है। संस्कृत भारती ने देववाणी को घर-घर तक पहुंचाने का बीड़ा उठा रखा है। जनगणना के माध्यम से संस्था ने इसे देशव्यापी मुहिम बना दिया है। संस्था के सदस्य एसएमएस और जनसंपर्क कर देशवासियों से मातृभाषा हिंदी के साथ संस्कृत को दूसरी भाषा के रूप में दर्ज कराने की अपील कर रहे हैं। संस्था का मानना है कि इस कदम से देववाणी संस्कृत को घर-घर में पहचान मिलेगी। इन दिनों संस्था के हजारों कार्यकर्ता इस अभियान में जुटे हैं।

पहाड़ सरीखा पहाड़ पर उद्योग का सपना

देहरादून बिना नौकरी के खाली होते पहाड़ी गांव, बंजर खेत और सूने होते घर-आंगन। इन्हीं को हरा-भरा करने की उम्मीद से हिल पॉलिसी-2008 शुरू की गई थी। उम्मीद थी कि तमाम तरह के रियायती ऑफर उद्यमियों को पहाड़ पर खींच लाएंगे। इंडस्ट्री लगेंगी तो यहां के नौजवानों के खाली हाथों को काम मिलेगा। घर से सैकड़ों मील दूर मैदान का रास्ता नापने से बेहतर घर के पास ही कुछ काम धंधा मिल जाएगा। मगर, न तो यहां उद्यमियों को नीति के अनुसार सपोर्ट मिला और न यहां आशा के अनुरूप उद्योग लगे। हिल पॉलिसी को लागू हुए तीन साल होने जा रहे हैं और इंडस्टि्रयों का पूंजी निवेश 95 फीसदी तक घट गया है। औद्योगिक नीति के अनुरूप सहयोग न मिलने से उद्यमी पहाड़ पर निवेश करने से बच रहे हैं। मेगा प्रोजेक्ट के नाम पर अभी पहाड़ के हिस्से कुछ भी नहीं है। सिर्फ लघु श्रेणी की इंडस्ट्री चल रही हैं। वैसे नीति में उद्योगों को भूखंड लीज पर लेने या खरीदने में स्टांप ड्यूटी से मुक्त रखा है। लैंड यूज चेंज कराने की विधि भी सरल बनाने का वादा पॉलिसी में है। पर हकीकत में जमीन संबंधी तमाम औपचारिकताओं को पूरा करने में इंडस्ट्रलिस्टों के पसीने छूट जाते हैं। यही वजह बड़े घरानों को पहाड़ चढ़ने से रोक रही है। इस तरह के 300 से अधिक प्रस्ताव लंबित चल रहे हैं।

आमची मुंबई में उत्तराखंड एम्पोरियम

: मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने सोमवार को मुंबई के वासी इलाके में 15 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले उत्तराखंड एम्पोरियम और अतिथिगृह का शिलान्यास किया। वहीं, उन्होंने हिंदी भाषियों के सम्मेलन में भी शिरकत की। करीब चार हजार वर्ग फीट क्षेत्र में प्रस्तावित पांच मंजिला एम्पोरियम व गेस्ट हाउस का निर्माण उत्तराखंड अवस्थापना विकास निगम द्वारा किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि देश की आर्थिक राजधानी में ऐसे केंद्र की स्थापना उत्तराखंड लंबे समय से महसूस कर रहा था। इससे राज्य में पर्यटन को मजबूती मिलेगी और औद्योगिक क्षेत्र को राज्य से जोड़ने में सहायक भी बनेगा। वहीं, उत्तराखंड के प्रवासी उद्यमी इस एम्पोरियम के माध्यम से अपनी जन्मभूमि के विकास के लिए योगदान दे सकेंगे। राज्य अवस्थापना विकास निगम के सीजीएम परियोजना कर्नल एचपी थपलियाल ने बताया कि एम्पोरियम में 100 कारों की पार्किग, भूतल पर 100 व्यक्तियों की क्षमता का रेस्टोरेंट, 200 लोगों की क्षमता का एम्पोरियम और 500 लोगों की क्षमता का ऑडिटोरियम होगा। प्रथम तल पर 60 लोगों के रुकने के प्रबंध के अलावा जिम और मनोरंजन कक्ष भी होगा। द्वितीय तल पर जीएमवीएन और केएमवीएन के कार्यालय, तृतीय तल पर चार वीआईपी कक्ष व स्थानिक आयुक्त कार्यालय होंगे। चतुर्थ तल पर राज्यपाल और मुख्यमंत्री के लिए अतिविशिष्ट ब्लॉक होंगे। उधर, सोमवार देर शाम मुख्यमंत्री डॉ. निशंक ने मुंबई के सायन (पूर्व) में स्थित सोमैया कालेज मैदान में हिंदी भाषियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि देश की समृद्धि और खुशहाली में हिंदी भाषियों का बड़ा योगदान है। भारत की संस्कृति वसुधैव कुंटुंबकम की है और इस देश में क्षेत्र, भाषा, वर्ग के भेदभाव से ऊपर उठते हुए हर व्यक्ति पहले भारतीय है। महाराष्ट्र सहित देश के अन्य हिस्सों में हिंदी भाषियों की योग्यता के प्रमाण हैं। अकेले उत्तराखंड के आठ लाख से अधिक प्रवासियों ने महाराष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने प्रवासी उत्तराखंड वासियों की महाराष्ट्र के विकास में दिये जा रहे योगदान की प्रशंसा की। उन्होंने डॉ. निशंक के नेतृत्व में उत्तराखंड के विकास की सराहना करते हुए कहा कि अटल खाद्यान्न योजना के तहत जनता को सस्ता राशन देने की पहल तारीफ के काबिल है। यह राज्य भारत के तेजी से उभरते प्रदेशों में शुमार हो रहा है। कार्यक्रम में भाजपा के वरिष्ठ नेता रवि शंकर प्रसाद, महाराष्ट्र भाजपा के सह प्रभारी डॉ. रमापति राम त्रिपाठी भी मौजूद रहे।

लोक के रंग में झूमेगा पर्यटन

राजस्थानी लोकगीत केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देश के बोल कानों में पड़ते ही मरुभूमि की तस्वीर आंखों में तैरने लगती है। मन करता है दौड़कर वहां चले जाएं। जानते हो इसकी वजह क्या है। वजह है पर्यटन का लोक के रंग में रंग जाना। अब ऐसी ही तस्वीर उत्तराखंड में भी देखने को मिलेगी। हिमालय की कंदराओं से फूटने वाले लोक के सुरों पर सम्मोहित हो सैलानी देवभूमि में खिंचे चले आएंगे। देखा जाए तो देवभूमि के जर्रे-जर्रे में पर्यटन के साथ लोक का रंग भी गहरे तक समाया हुआ है, लेकिन हम इसकी ब्रांडिंग करने में अब तक असफल ही रहे। प्रचार-प्रसार के नाम पर हर साल करोड़ों बहाने के बाद भी पर्यटन के क्षेत्र में ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिस पर रस्क किया जा सके। पर्यटकों को खींचने का लोकगीतों से बेहतर माध्यम और क्या हो सकता है। यह बात हालांकि बहुत देर से संस्कृति महकमे की समझ में आई, लेकिन इस दिशा में हो रहे प्रयास बताते हैं कि देवभूमि के गीत-संगीत में पूरी दुनिया को खींच लेने की क्षमता है। बेडू पाको बारामासा के बोल केसरिया बालम से कहां कमतर हैं। आज सिर्फ हम कहते हैं, हिमालै का ऊंचा डाना, दूर मेरो गांव, रंगीलो गढ़वाल मेरो सजीलो कुमाऊं (हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच सुदूर बसा मेरा गांव, कैसा रंगीला है मेरा गढ़वाल, कैसा सजीला है मेरा कुमाऊं)। कोशिशें परवान चढ़ीं तो कल यही बात देश-दुनिया से आने वाले सैलानियों की जुबां से भी सुनाई देगी।

-टाटा के लिए रेड कार्पेट

राज्य सरकार ने देश के प्रमुख औद्योगिक घराने टाटा समूह के लिए रेड कार्पेट बिछा दिया है। मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने टाटा समूह द्वारा प्रस्तावित विभिन्न योजनाओं के लिए प्रमुख सचिव एवं प्रबंधन निदेशक सिडकुल एस राामस्वामी को नोडल अफसर नामित करते हुए सिंगल विंडो सिस्टम की तर्ज पर एक कोआर्डिनेशन सेल गठित करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई कि टाटा समूह उत्तराखंड में दस हजार करोड़ रुपये का निवेश करेगा जिससे राज्य में करीब पचास हजार रोजगार सृजित होंगे। समूह ने कांट्रेक्ट फार्मिंग, हाइड्रो पावर, हेल्थ टूरिज्म और आईटी के क्षेत्र में रुचि प्रदर्शित की है। टाटा समूह का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल गुरुवार को सचिवालय में मुख्यमंत्री से मिला। गत वर्ष राज्य स्थापना दिवस पर आयोजित व्याख्यान माला में मुख्य अतिथि के तौर पर गु्रप के चेयरमैन रतन टाटा आए थे। उन्होंने उत्तराखंड में निवेश में रुचि दिखाई थी। इसी क्रम में समूह के प्रतिनिधि आज मुख्यमंत्री से मिले। मुख्यमंत्री डा.रमेश पोखरियाल निशंक ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि सिडकुल के प्रबंध निदेशक एस रामास्वामी को नोडल अधिकारी नामित करते हुए सिंगल विंडो की तर्ज पर कोआर्डिनेशन सेल बनाएं। उन्होंने टाटा समूह द्वारा प्रस्तावित परियोजनाओं का परीक्षण करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि वे तात्कालिक एवं दीर्घकालिक योजनाएं बनाकर टाटा समूह के प्रस्तावों पर कार्यवाही करें। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्र के लिए विशेष रूप से योजनाएं बनाने को कहा। टाटा समूह के वाइस प्रेजिडेंट एएस पुरी ने मुख्यमंत्री को बताया कि समूह को उत्तराखंड में काम करने का अच्छा अनुभव रहा है। पंतनगर प्लांट बेहतर उत्पादन दे रहा है। अभी इस प्लांट की क्षमता ढाई लाख गाडिय़ां प्रति वर्ष उत्पादन की हैं, जिसे दोगुना किया जा रहा है। उन्होंने कांट्रेक्ट फार्मिंग में रुचि दिखाई। इससे पूर्व सचिवालय में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में अफसरों का टाटा समूह के प्रतिनिधियों के साथ विचार विमर्श हुआ। बैठक के बाद मुख्य सचिव सुभाष कुमार ने पत्रकारों को बताया कि हास्पिटेलिटी, आईटी, पावर सेक्टर में समूह ने रुचि दिखाई है। होटल तथा लोकॉस्ट हाउसिंग पर भी काम करने में रुचि दिखाई है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में बेहतर औद्योगिक माहौल से भी समूह रुचि ले रहा है। टाटा समूह के वाइस प्रेसिडेंट एएस पुरी ने बताया कि कांट्रेक्ट फार्मिंग, रन आफ दि रिवर हाइड्रो प्रोजेक्ट, हेल्थ टूरिज्म पर समूह काम करना चाहता है। पर्वतीय क्षेत्र में आईटी तथा साफ्टवेयर के क्षेत्र में काम किया जा सकता है। आईटी पार्क में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निवेश को लेकर आइटी विभाग ने तथा पर्यटन, होटल, रिजार्ट, ईको टूरिज्म पर पर्यटन विभाग ने प्रस्तुतीकरण दिया। ऊर्जा विभाग ने 800 मेगावाट क्षमता की परियोजनाओं का प्रस्तुतीकरण दिया।

Tuesday, 1 February 2011

चंदोला रांई: यहां हर घर में है चित्रकार

पौड़ी गढ़वाल-हिमालय के दूर से नजर आते दृश्य भले ही आम आदमी के लिए श्वेत बर्फ से ढकी पहाडिय़ां हों, लेकिन एक चित्रकार के लिए यह प्रकृति की अनुपम देन है। एक चित्रकार हिमालय में रोज 18 रंग देखता है और वह तूलिका से चित्रों में रंग भरकर उसमें खोया रहता है। पौड़ी-श्रीनगर मोटर मार्ग पर पौड़ी से 7 किमी. की दूर पर चंदोला रांई बसा है। यहां कभी 60 परिवार रहते थे, पर रोजी-रोटी की तलाश में 42 परिवार देश के विभिन्न शहरों में बस गए हैं। अब यहां सिर्फ 18 परिवार ही निवास करते हैं। इन परिवारों में 10 चित्रकार हैं। इनमें से 6 हिमालय के विभिन्न दृश्यों को कूची से कागज पर उकेरते हैं। चंदोला रांई को ये हुनर विरासत में मिला है। 60 के दशक में इस गांव में नामी चित्रकार धरणीधर चंदोला के चित्रों की धूम राष्टï्रीय बाजारों में रही। धरणीधर चंदोला के चित्र आज भी बोलते हुए नजर आते हैं। धरणीधर चंदोला ने न सिर्फ चित्रों में कमाल दिखाया, बल्कि 7 तारों के बैंजों में 21 तार जोड़कर विचित्र वीणा को जन्म दिया। वर्तमान में उनकी पुत्री मालश्री खुगशाल विचित्र वीणा की प्रस्तुतियां देती हैं। इसके अलावा उन्हें चित्रकला में काफी रुचि है। यही वजह भी है कि वर्ष 1991 में धरणीधर चंदोला की इस दुनिया से विदाई के बाद भी लोग उन्हें नहीं भूल पाए हैं। पौड़ी में हर साल धरणीधर चंदोला की स्मृति में चित्रकला स्पर्धा विभिन्न वर्गों में आयोजित होती है। सर्किल आफिस लोक निर्माण विभाग पौड़ी में लिपिक पद पर तैनात प्रमोद चंदोला को ही देखें तो आफिस जाने से पहले वे हिमालय के दृश्यों में रंग भरते हैं और आफिस से लौटने के बाद फिर चित्रों में डूब जाते हैं। उनकी बेटी मालविका चंदोला, श्रीनगर विवि से आर्ट में बीए कर रही हैं। मालविका भी चित्र में रंग भरती है। इसी गांव की गुड्ïडी भी कागजों में रंग भरती हैं। पदमादत्त चंदोला अवकाश प्राप्त प्रधानाध्यापक हैं और उनका पूरा दिन रंगों के साथ गुजरता है। पंकज चंदोला, बंसत कुमार चंदोला, पूरण चंद चंदोला, समेत अन्य भी चित्रों में महारत रखते हैं। उधर,चंदोला रांई के चित्रकारों ने तय किया है कि अब वे शरदोत्सव, पंचायत महोत्सव व अन्य अवसरों पर गांव की ओर पेटिंग प्रदर्शनी लगाएंगे। पेटिंग में गांव का सामूहिक योगदान होगा। ''प्रसिद्घ चित्रकार धरणीधर चंदोला की यादों को सजोना निहायत जरूरी है और कोशिश की जा रही है चंदोला रांई के चित्र लोगों के मन को छूए।ÓÓ -प्रमोद चंदोला ''पेटिंग जीवन का लक्ष्य है और यही वजह भी रही है बीए मैंने आर्ट को अपने विषय में शामिल किया है। पौड़ी में आर्ट नहीं है और यही वजह रही श्रीनगर प्रवेश लेना पड़ा।ÓÓ -मालविका चंदोला, बीए तृतीय वर्ष।

Sunday, 30 January 2011

कपिल ऋषि की तपोस्थली गुमनाम

-ऐतिहासिक विरासतें विलुप्त होने के कगार पर -13वीं सदी में कत्यूरी शासकों ने कराया था भव्य मंदिर का निर्माण -मंदिर के पत्थरों में बनीं हैं देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियां नैनीताल: देवभूमि उत्तराखंड में आज भी असंख्य ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल उपेक्षित पड़े हैं। संरक्षण एवं देखरेख के अभाव में कई ऐतिहासिक विरासतें विलुप्त होने के कगार पर जा पहुंची हैं। मंडल मुख्यालय नैनीताल से करीब 60 किमी . की दूरी पर स्थित ऐसा ही बेहद प्राचीन ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल है कपिलेश्वर महोदव। कभी कपिल ऋषि की तपोस्थली रहा यह प्राचीन स्थल आज उपेक्षा का दंश झेल रहा है। कपिलेश्वर महादेव नैनीताल जिले के रामगढ़ विकास खंड के मौना गांव के समीप अल्मोड़ा व नैनीताल जिले की सीमा पर कुमियां व शकुनी नदियों के संगम पर स्थित है। कहा जाता है कि हिमालय की कंदराओं में तपस्या करने वाले कपिल ऋषि ने यहां भी तपस्या की थी। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार 13वीं शताब्दी में कत्यूरी शासकों ने इस स्थल पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जो आज कपिलेश्वर महोदव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। विशालकाय पत्थरों को सुंदर ढंग से तराश कर बनाए गए इस भव्य मंदिर की स्थापत्य कला बेजोड़ है। मंदिर के विशालकाय पत्थरों में देवी-देवताओं की आकर्षक मूर्तियां खुदीं हैं। मंदिर की ऊंचाई लगभग 37 फीट है। हाल ही में इस ऐतिहासिक मंदिर का सर्वेक्षण करने वाले कुमाऊं विवि के पूर्व इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो.अजय रावत के अनुसार प्राचीन मंदिर के चारों ओर भग्न मंदिरों के अवशेष विद्यमान हैं, जिससे स्पष्टï होता है कि यहां प्राचीन काल में और भी कई मंदिर रहे होंगे। प्रो.रावत के मुताबिक कपिलेश्वर मंदिर का वाह्य स्वरूप दोनों ओर अलंकृत रथिका वाला है, जिन पर पाश्र्व देवी-देवताओं की आकर्षक मूर्तियां विद्यमान हैं। इनमें चतुर्भुजा, महिषासुर मर्दिनी, द्विभुज लकुलीश (भगवान शिव) और चतुर्भुज गणेश भगवान की मूर्तियां उत्तर-पूर्व तथा दक्षिण की ओर विराजमान हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपरी हिस्से में लगे पत्थरों में सूरसेन की मूर्ति अलंकृत है और उसके ऊपर त्रिमुखी शिव विराजमान हैं। मंदिर के दरवाजे की चौखट में नाना प्रकार के फूलों की सुंदर आकृतियां भी खुदी हैं। उसके ऊपरी हिस्से में परिचारकों सहित मकर वाहिनी गंगा और कूर्म (कछुवे) पर सवार युमना (देवी) भी चित्रित है। देखरेख के अभाव में प्राचीन स्थापत्य कला की यह बेजोड़ कलाकृतियां धीरे-धीरे नष्टï होते जा रही हैं। मंदिर के उत्तरांग में राहु व केतु को छोड़कर अन्य सभी ग्रहों का उल्लेख मिलता है। मंदिर की शिलाओं में सूर्यमुखी फूल पकड़े सूर्य ग्रह भी विराजमान हैं। कपिलेश्वर मंदिर के पास ही काल भैरव का भी मंदिर है। शिवरात्रि को लगता है मेला नैनीताल: कपिलेश्वर धाम में हर साल शिवरात्रि को मेला लगता है। जिसमें आसपास के करीब दो दर्जन से भी अधिक गांवों से ग्रामीण पहुंचते हैं। कुमियां व शकुनी नदी के संगम पर स्नान करने के बाद श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। शिवरात्रि को यहां भंडारे का आयोजन होता है। इतिहासकार प्रो.अजय रावत के मुताबिक इस स्थल को जागेश्वर की भांति एतिहासिक एवं धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।

फूलों के देश में दमकी देवभूमि की आभा

देवभूमि के फूलों ने देश में ही चमक नहीं बिखेरी, यूरोप का दिल भी जीता है। फूलों के देश हॉलैंड ने उत्तराखंड के ग्लैडियोलस को सिर आंखों पर बैठाया है। सरकारी स्तर पर पहली मर्तबा हुए प्रयासों से फूल न सिर्फ हॉलैंड पहुंचे, बल्कि वहां से हर हफ्ते पांच हजार कट फ्लावर की डिमांड भी उत्तराखंड को मिली है। फूलों की पहली खेप इसी हफ्ते भेजी भी जा चुकी है। उम्मीद जगी है कि हॉलैंड से अब समूचे यूरोप में उत्तराखंडी फूल अपनी आभा बिखेरेंगे और इन्हें मिलेगी अंतरराष्ट्रीय पहचान। साथ ही किसानों के लिए भी इसे एक नई उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है। कारनेशन, जरबेरा, ग्लैडियोलस जैसे कट फ्लावर के मामले में उत्तराखंड ने देशभर में खास जगह बनाई है। बेहतर क्वालिटी का ही नतीजा है कि देश में होने वाले राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फ्लोरा एक्सपो में यहां के फूल खूब चमक बिखेरते आ रहे हैं। इनमें भी सूबे के चार जिले देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंहगर व नैनीताल का बड़ा योगदान है। सबसे अधिक पुष्पोत्पादक इन्हीं जिलों में हैं। फूलों की बढ़ती चमक को देखते हुए उद्यान महकमे ने पहली मर्तबा इन्हें कृषि निर्यात इकाई के जरिए विदेश की सैर कराने की ठानी और इसमें कामयाबी भी मिली है। यह सफलता भी कहीं और नहीं, बल्कि फूलों के देश कहे जाने वाले हॉलैंड में मिली है। अपर सचिव उद्यान जीएस पांडे के मुताबिक एग्री एक्सपोर्ट जोन के जरिए उत्तराखंड से ग्लैडियोलस के सैंपल हॉलैंड भेजे गए। क्वालिटी के मानक पर तो ये खरे उतरे, मगर पैकिंग में कुछ कमियां रह गईं। बाजार की मांग के अनुरूप कमियां दूर की गई और फिर सैंपल हॉलैंड भेजे गए, जहां लोगों ने इन्हें सिर आंखों पर बिठा लिया। इसी का नतीजा रहा कि अब वहां से हर हफ्ते पांच हजार कट फ्लावर की डिमांड मिली है। पहली खेप इसी हफ्ते हॉलैंड भेज भी दी गई। श्री पांडे के अनुसार हॉलैंड में मिली इस कामयाबी को देखते हुए अब फूलों की खेती को और आगे बढ़ाया जाएगा। इससे किसानों के लिए भी नए द्वार खुले हंै। उन्होंने कहा कि हॉलैंड की डिमांड पूरी करने में सूबा सक्षम है और आने वाले दिनों यहां के फूल समूचे यूरोप में फैलेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।

Saturday, 22 January 2011

डीएनए बताएगा कहां से आए जौनसारी व बोक्सा

-भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण विभाग ने लिए जौनसारी व बोक्सा जनजाति के लोगों के ब्लड सैंपल -करीब 45 गांवों से एकत्रित किए गए नमूने -छह माह में पता चलेगा कहां के हैं इनके वंशज देहरादून: इतिहास के पन्नों को पलटें तो उत्तराखंड की जौनसारी व बोक्सा जनजाति के वंशज को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। मगर, वैज्ञानिक रूप में इस जनजाति के बारे में अब तक कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। पहली बार मानव विज्ञान सर्वेक्षण विभाग डीएनए जांच से उनके वंशजों व अन्य जातियों से उनकी भिन्नता आदि का पता लगाने जा रहा है। वैज्ञानिकों ने करीब 35 गांवों से जौनसारी व बोक्सा लोगों के खून के नमूने लिए हैं। मानव विज्ञान सर्वेक्षण विभाग की टीम ने यह सैंपल्स देहरादून के शिमला बाइपास क्षेत्र में रह रहे 100 बोक्सा व चकराता क्षेत्र के 115 जौनसारी जनजाति के परिवारों से एकत्रित किए हैं। विभाग के अधीक्षण मानव विज्ञानी डा. विनोद कौल ने बताया सैंपल्स की डीएनए जांच कराई जा रही है। करीब छह माह में इस बात की वैज्ञानिक पुष्टि हो जाएगी कि दोनों जनजातियों के वंशज कहां के हैं व इनका इतिहास कितना पुराना है। यह भी पता लगेगा कि जौनसारी व बोक्सा अन्य जातियों से किस तरह अलग हैं। इससे किसी रोग के प्रति उनकी शारीरिक क्षमता का आंकलन भी किया जा सकेगा। डा. कौल ने बताया कि दूसरे चरण में गढ़वाली व कुमाउंनी समुदाय सहित गुज्जर व तिब्बती लोगों की भी डीएनए जांच कराई जाएगी। इस तरह हो रही जांच डीएनए जांच के पहले चरण में ब्ल्ड सैंपल्स को डीएनए एक्सट्रेक्ट विधि से गुजारा जाएगा। इसके बाद माइट्रोकॉन्ड्रियल डीएनए व वाई क्रोमोजोमनल जीन्स की प्रक्रिया पूरी कराई जाएगी। प्रयोग के अन्तिम चरण में डीएनए सीक्वेन्सिंग कराकर पता चल जाएगा कि क्या है संबंधित व्यक्ति की पीढ़ी का इतिहास। शोध के कुछ तथ्य इस तरह की जनजातियां एक ही ग्रुप में रहती हैं, इनके विवाह भी आसपास तक सीमति रहते हैं। डीएनए जैसी जांच को इसमें मदद मिलती है। डीएनए में मिलने वाले नतीजों को वर्ष 2003 में विश्वभर में हुए जीनोम प्रोजेक्ट के रिजल्ट से मिलाया जाएगा। जौनसारी-बोक्सा की डीएनए जांच के जो नमूने जीनोम प्रोजेक्ट के नमूने से मैच करेंगे, उसके आधार पर उनके वंशज आदि का पता लग जाएगा।

दिल्ली में होगा सरनौल का पांडव नृत्य

नौगांव(उत्तरकाशी): उत्तरकाशी के सरनौल गांव के कलाकारों को दिल्ली में अपनी लोकविधा पांडव नृत्य की प्रस्तुति देने का मौका मिला है। आगामी 11 से 16 फरवरी तक आईजीएनसीए (इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फार आर्ट) की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों के लोक कलाकार जुटेंगे। इसमें सरनौल के कलाकार भी प्रतिभाग करेंगे। महाभारतकाल की विभिन्न कथाओं का लोकमंच के जरिये प्रस्तुतिकरण पर आधारित इस कार्यक्रम में सरनौल गांव के पांडव नृत्य की भी प्रस्तुति होगी। इसमें कलाकार पांडव नृत्य के विभिन्न पहलुओं की लोकविधा के रूप में प्रस्तुति देंगे। उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में पांडव नृत्य की परंपरा है इसमें अनुष्ठान व रंगमंच के तत्वों का अनूठा मिश्रण है। वहीं सरनौल गांव का पांडव नृत्य अपनी खासियतों के कारण काफी प्रसिद्ध है। सरनौल के कलाकार पांडव नृत्य की प्रस्तुति केरल तथा मध्य प्रदेश में भी दे चुके हैैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली से आये डॉ. सुवर्ण रावत ने बताया कि सरनौल के कलाकार प्रत्येक दिन महाभारत पर आधारित प्रस्तुति देंगे। इनमें पांडव वनवास, जोगटानृत्य, गेडा नृत्य तथा गुप्तवास का मंचन किया जायेगा। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड से प्रसिद्ध रंगकर्मी डॉ.डीआर पुरोहित के निर्देशन में चक्रव्यूह मंचन व श्रीष डोभाल के निर्देशन में गरुड़ व्यूह की भी प्रस्तुति दी जाएगी।

Thursday, 20 January 2011

बागबां ने बचा ली विरासत

चम्बा(टिहरी)-'बागबांÓ के जुनून ने नाउम्मीदी के रेगिस्तान को नखलिस्तान में बदल दिया। बीते चालीस साल से इस गुलिस्तां ने कभी 'पतझड़Ó नहीं देखा। टिहरी जिले के चम्बा ब्लाक के गांव सिलकोटी ने अपने उजड़े चमन को गुलजार कर दिया। आज छह वर्ग किलोमीटर में फैले बांज, बुरांश और काफल के वृक्षों पर सिलकोटी के लोगों को नाज है । इसके लिए उन्होंने न सरकार का मुंह ताका और न ही स्वयं सेवी संस्थाओं का। बस वक्त की नजाकत को समझ पौधे रोपे और बच्चों की तरह उनका पालन किया। ये पौधे अब 'जवानÓ हो चुके हैं। पसीने से सींची 'बगियाÓ की देखरेख के लिए एक वन सेवक भी रखा गया है। जिसे वेतन के रूप में हर परिवार अनाज और पैसे देता है। पर्यावरण पर बौद्धिक चिंतन हो रहा है। सरकार चिंतित है, करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा जा रहे हैं। सेमिनार, गोष्ठी और रैलियों में गूंज रहे नारों के बावजूद फाइलें भले मोटी हो रही हैं, लेकिन जमीन पर जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं। इन हालात में सिलकोटी के 750 लोगों का यह प्रयास आस के दीपक को जलाए रखने की कहानी है। वर्ष 1970 में जब जंगल के अनियोजित दोहन से जिंदगी की गाड़ी पटरी से उतरने लगी तो ग्रामीणों को अहसास हुआ कि वे क्या खो रहे हैं। फिर क्या था शुरू हो गई चमन की बेनूरी को लौटाने की कोशिश। ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि स्वयं अपनी तकदीर लिखेंगे। इसके बाद गांव वालों ने जंगल में न केवल बांज, बुरांश और काफल जैसे वृक्षों के पौधे रोपे, बल्कि उनका पालन-पोषण भी अपने बच्चों की तरह किया। तय किया कि अब जंगल में कटान नहीं होगा। शुरुआत में देखभाल के लिए दो वन सेवक भी रखे गये। जिन्हें मानदेय के रूप में प्रति परिवार कुछ धनराशि और अनाज दिया गया। हालांकि अब एक ही वनसेवक है। नतीजा सामने है। आज छह वर्ग किलोमीटर में शानदार वन लहलहा रहा है। गांव में पानी के स्रोत बढ़ गए हैं। जंगल में कटान की बजाए गांव वाले ईंधन के लिए सूखी या गिरी हुई लकडिय़ां चुनते हैं। घास व चारापत्ती भी इसी तरीके से लिया जाता है। गांव की प्रधान बंसती पुण्डीर का कहना है कि बुजुर्गों की परंपरा और समुदाय की भागीदारी के कारण यह संभव हुआ है। गर्मियों में फायर सीजन में ग्रामीण चौकन्ने हो जाते हैं आग लगने पर खुद आग बुझाने दौड़ पड़ते हैं। ::::

-माटी के मोल बिक रही पहाडिय़ां

(पौड़ी गढ़वाल)-अगर आपको कहा जाए कि उत्तराखंड में पहाडिय़ां बिक रही हैं तो क्या आप विश्वास करेंगे। खासकर तब, जबकि पलायन के कारण खाली होते पहाड़ी इलाके सरकार के लिए चिंता का बड़ा सबब हैं। यह सौ फीसदी सच है और इसका उदाहरण है पौड़ी गढ़वाल जिले में ब्रिटिश हुकूमत की ओर से बसाई गई पर्यटन नगरी लैंसडौन। इसके आसपास सड़क किनारे की जमीनें इन दिनों धनाड्यों के निशाने पर है, जो इन्हें माटी के मोल खरीद रहे हैं। पिछले दो वर्षों के दौरान लैंसडौन तहसील में दर्ज किए गए इस तरह के चार दर्जन मामले इस तथ्य की पुष्टि कर रहे हैं। पौड़ी गढ़वाल जिले में वर्ष 2008 से लेकर अब तक, यानि पिछले दो सालों में लैंसडौन-गुमखाल, लैंसडौन-दुगड्डा और दुगड्डा-रथुवाढाब मोटर मार्गों के इर्द-गिर्द 49 लोगों के जमीन खरीदने के आंकड़े राजस्व महकमे के पास उपलब्ध हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक लैंसडौन में ही 4.67 हेक्टेयर जमीन के दाखिले खारिज किए जा चुके हैं। जमीन खरीदने वाले लोगों में कुछ बड़े नेता शामिल हैं तो कई व्यापारी भी इस फेहरिस्त का हिस्सा हैं। दरअसल, इस क्रम की शुरुआत हुई वर्ष 2005 में, जब लैंसडौन के निकट डेरियाखाल क्षेत्र में सड़क से सटे पहाड़ के एक टुकड़े को खरीदकर एक शानदार रिजार्ट का निर्माण किया गया। इससे अन्य लोगों का ध्यान भी इस क्षेत्र की जमीन की अहमियत की ओर गया। इसके बाद तो लैंसडौन के नजदीकी गांव डेरियाखाल से लेकर कोटद्वार मार्ग पर स्थित दुगड्डा तक सड़क किनारे की जमीनों की खरीद-फरोख्त में खासी तेजी आ गई। अब आलम यह है कि लैंसडौन को जोडऩे वाली सड़कों के किनारे किसी भी कीमत पर जमीन उपलब्ध नहीं है। राजस्व महकमे से प्राप्त जानकारी के मुताबिक डेरियाखाल में रिजार्ट निर्माण के बाद पंद्रह बीघा, समीपवर्ती गांव पालकोट में पच्चीस बीघा, लैंसडौन-गुमखाल मोटर मार्ग पर 45 बीघा और कोटद्वार-रथुवाढाब मार्ग पर लगभग 47 बीघा जमीन विभिन्न लोगों ने खरीदी है। इस चौंकाने वाले ट्रेंड को क्या कहें, अफसरों की मानें तो इसके कारण मामूली है, मगर सच यह है कि धनाड्यों को इन्वेस्टमेंट का यह सबसे सुरक्षित जरिया नजर आ रहा है। इस सब में स्थानीय जनता के हित दरकिनार, क्योंकि जमीनों के असल मालिक ग्रामीणों के हाथ महज मामूली रकम ही आ रही है। पौड़ी के जिलाधिकारी दिलीप जावलकर का कहना है कि कानूनी रूप से तो जमीनों की खरीद-फरोख्त नहीं रोकी जा सकती। अगर कहीं काश्तकार को धोखे में रखकर उसकी जमीन खरीदने का मामला सामने आता है तो जिला प्रशासन जांच के बाद जमीन के दाखिल खारिज को निरस्त कर देता है। रथुवाढाब क्षेत्र में इस तरह के दो-तीन मामलों में भूमि का दाखिल खारिज निरस्त किया भी गया है। लैैंसडौन के उपजिलाधिकारी एके पांडेय का कहना है कि लैंसडौन नगर में कैंट एक्ट की बाध्यता के कारण यहां लोगों को जमीन उपलब्ध नही हो पाती है, जबकि इस बीच पर्यटन नगरी में पर्यटन व्यवसाय तेजी से बढ़़ा है। इसलिए कैंट क्षेत्र से बाहरी इलाकों में जमीनें तेजी से लोगों द्वारा खरीदी जा रही है।

अब 'गोदान और 'कफन देववाणी में

अब 'गोदानÓ, 'कफनÓ और 'नमक का दारोगाÓ जैसी कालजयी कृतियां देववाणी संस्कृत भाषा में भी उपलब्ध हो सकेंगी। उत्तराखंड संंस्कृत अकादमी ने महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की कृतियों को संस्कृत में अनुवाद करने की यह पहल की है। उत्तराखंड संस्कृत अकादमी संस्कृत और उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए यह अनूठी पहल कर रहे हैं। कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद की अनूठी कहानियां अब संस्कृत में भी उपलब्ध हो सकेंगी। अभी तक मुंशी प्रेमचंद की कहानियों को कई भाषाओं में अनुवादित किया गया है, जिसके चलते देश-विदेश में प्रेमचंद की कहानियां लोगों तक पहुंची। आम जनमानस को केंद्र में रखकर लिखी गई कहानियों का ही असर है कि हर भाषा के लोगों ने प्रेमचंद की कहानियों को हाथों हाथ लिया। अब संस्कृत अकादमी भी प्रेमचंद की कहानियों को संस्कृत प्रेमियों तक पहुंचा रही है। अकादमी ने प्रेमचंद की प्रमुख कृतियों को लेकर अध्ययन शुरू कर दिया है। जल्द ही अनुवाद का कार्य शुरू कर दिया जाएगा। इसके लिए अकादमी में संस्कृत विशेषज्ञों की पूरी टीम गठित की है। टीम में शामिल डॉ. हरीश गुरुरानी का कहना है कि यह संस्कृत प्रेमियों के लिए एक अनोखा अनुभव होगा। उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के सचिव डॉ. बु़द्धदेव शर्मा का कहना है कि कालजयी कथाकार मुंशी प्रेमचंद की कहानियां अपने आप में बेमिसाल हैं। अब अकादमी संस्कृत प्रेमियों को यह तोहफा देने जा रही है। इसके लिए टीम गठित की गई है और जल्द ही गोदान, कफन जैसी कालजयी कृतियां संस्कृत भाषा में भी उपलब्ध होंगी।

Wednesday, 19 January 2011

प्रियांशु को मिलेगा वीरता पुरस्कार

बहन की खातिर गुलदार से लोहा लेने वाले प्रियांशु जोशी को 26 जनवरी की गणतंत्र दिवस परेड में प्रधानामंत्री के हाथों राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। शुक्रवार को उत्तराखंड राज्य बाल कल्याण परिषद ने भी प्रियांशु को सम्मानित किया। शुक्रवार को रायपुर अंतर्गत अंबेडकर कॉलोनी स्थित बाल भवन में राज्य बाल कल्याण परिषद ने प्रियांशु का सम्मान किया। इस अवसर पर परिषद की महासचिव पुष्पा मानस ने उसे प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। श्रीमती मानस ने बताया कि परिषद ने नियमानुसार स्थलीय जांच के बाद राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए प्रियांशु का नाम भेजा था और बीते वर्ष एक दिसंबर को प्रियांशु को राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना मिली है। 26 जनवरी को प्रियांशु को प्रधानमंत्री द्वारा पुरस्कृत किया जाएगा। उसे राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति से मिलने का भी मौका मिलेगा। इस अवसर पर प्रियांशु ने कहा कि यदि उसका भविष्य में फिर कभी इस प्रकार की परिस्थितियों से सामना हुआ तो वह निश्चित तौर से मदद के लिए आगे आएगा। बकौल, प्रियांशु वह अपने पिता के नक्शे कदम पर चलकर सेना में भर्ती होना चाहता है। वह सेना में बतौर अफसर सेवाएं देना चाहता है। उसके पिता आरके जोशी ने बताया कि प्रियांशु पढ़ाई में भी होनहार है और आगे चलकर देश सेवा करना चाहता है। जब प्रियांशु ने दिखाई बहादुरी-केन्द्रीय विद्यालय आइएमए में कक्षा सातवीं के छात्र प्रियांशु ने एक जुलाई 2009 को अपनी बड़ी बहन प्रियंका को उस वक्त गुलदार के हमले से बचाया जा था जब दोनों स्कूल से वापस घर लौट रहे थे। प्रियांशु की बहन पर झपटने के बाद गुलदार ने उसे गंभीर रूप से जख्मी कर दिया। गुलदार के खौफ से बेपरवाह प्रियांशु ने गुलदार से टक्कर ली और प्रियंका को उसके कब्जे से मुक्त कराया था।

विश्व मंच पर पहचान दिलाने से गौरवान्वित उत्तराखंड

पहले दक्षिण एशियाई शीतकालीन खेल समाप्त होते ही आयोजकों के साथ ही उत्तराखंड सरकार राहत की सांस ले रही है, यह लाजिमी भी है। पहली बार किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता की मेजबानी से गौरवान्वित उत्तराखंड को यह आयोजन विश्व मंच पर पहचान दिलाने के साथ ही कई सबक भी दे गया। सबक इस मायने में कि धरातल पर ठोस कार्य किए बिना हवाई किले बनाने से कुछ नहीं होता। यह सही है कि इतने बड़े स्तर पर खेलों के आयोजन का प्रदेश के पास पुराना अनुभव नहीं था। जाहिर है कि ऐसे में कुछ न कुछ खामियां रहनी लाजिमी थीं, लेकिन यदि थोड़ी सी सतर्कता बरती जाती तो खेल और भी बेहतर हो सकते थे। तीन-तीन बार टलने के चलते आयोजकों को तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिला था। बावजूद इसके आयोजक समय का सदुपयोग करने से चूक गए। दिसम्बर के पहले सप्ताह तक निर्माण कार्यों को लेकर ही असमंजस की स्थिति बनी रही। बाद में सरकार के हस्तक्षेप से ही हालात में सुधरने शुरू हुए। इतना ही नहीं तैयारियों की कमान स्वयं मुख्यमंत्री को संभालनी पड़ी। उन्होंने खेल मंत्री को निगरानी की कमान सौंपी। बावजूद इसके व्यवस्थाओं को लेकर असंतोष बना ही रहा। कुछ मामलों में आयोजकों की अपरिपक्वता भी सामने आई। मसलन, अंतरराष्ट्रीय नियमों की सही जानकारी के बिना ही एक स्पर्धा आयोजित कर दी गई। नियमानुसार किसी भी स्पर्धा में कम से कम तीन खिलाडिय़ों का होना जरूरी है, लेकिन खिलाडिय़ों की कमी के कारण आनन-फानन में दो को लेकर ही काम चलाया गया। बाद में इसे इवेंट के रूप में मान्यता नहीं मिल पायी। इससे स्पर्धा में प्रतिभाग करने वाले स्कीयर्स भी नाराज दिखे। इनमें से एक श्रीलंका और एक हिमाचल प्रदेश की थी। दोनों को मेडल से वंचित होना पड़ा। मौसम की मेहरबानी भी परेशानी बन गई। भारी बर्फबारी के दौरान औली में फंसे दर्शकों और टीमों को निकालने के समुचित इंतजाम नहीं थे। नेपाल से आये दल भटकते हुए किसी तरह जोशीमठ तक पहुंच पाया। खैर, फिर भी जैसा भी रहा, अच्छा रहा। लेकिन अब सरकार का दायित्व है कि इसे एक सबक के तौर पर ले। जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को कर्तव्य का जिम्मेदारी का बोध कराना भी सरकार को अपना फर्ज समझना होगा, तभी भविष्य में इस तरह के बड़े आयोजनों में फजीहत से बचा जा सकता है।

इस बार राजपथ पर नहीं दिखेगी उत्तराखंड की झांकी

गणतंत्र दिवस परेड में इस बार उत्तराखंड की झांकी देश की जनता को नजर नहीं आएगी। यह पहला अवसर है जब उत्तराखंड राजपथ से आउट हो गया है।उत्तराखंड सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी की गणतंत्र दिवस परेड में शामिल करने के लिए पहले 'चार धामÓ थीम पर आधारित झांकी की पेशकश की थी। बाद में राज्य सरकार ने 'स्पर्श गंगाÓ थीम पर आधारित झांकी का प्रस्ताव भेजा। राज्य की थीम से गणतंत्र दिवस परेड आयोजन समिति संतुष्ट नहीं हुई और झांकियों की दोनों परिकल्पना को अस्वीकार कर दिया गया। महानिदेशक सूचना सुबद्र्धन ने पूछे जाने पर इसकी पुष्टि की। उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस परेड के लिए चुनिंदा झांकियां ही स्वीकृत होती हैं। उत्तराखंड को लगातार इसका अवसर मिला लेकिन इस बार परेड में राज्य की झांकी शामिल नहीं होगी।

Wednesday, 5 January 2011

वापस चाहिए आजादी के परवाने को दी जमीन

पेशावर कांड के नायक स्व.वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के परिजनों को थमाए बेदखली के नोटिस लीज की भूमि को दिया अतिक्रमणकारी करार नजीबाबाद,- गढ़वाल की शान व पेशावर कांड के महानायक 'वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनकी कुर्बानी का ऐसा हश्र होगा। यूपी सरकार ने आजादी के आंदोलन में कुर्बानी को देखते ही जो जमीन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को लीज पर दी आज उसी सरकार के नुमाइंदों ने उनके परिवार को बेदखल करने का फरमान थमा दिया है। वन विभाग ने स्व.गढ़वाली को परिजनों को लीज की भूमि पर 'अतिक्रमणकारी करार दे दिया, जो भूमि स्वयं गढ़वाली को उनकी वीरता पर उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन राज्यपाल की संस्तुति पर लीज पर दी गई थी। 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खां के नेतृत्व में आजादी के लिए सड़कों पर उतरे निहत्थे पठानों के प्रदर्शन पर फिरंगी सेना के कैप्टन रिकेट ने गढ़वाली जवानों पर फायरिंग का आदेश दिया। इसे वीर चंद्र सिंह ने ठुकराकर अपने अदम्य साहस का परिचय दिया था। पठानों पर गोली चलाने से इंकार करते हुए अपने साथियों को 'गढ़वाली सीज फायर का हुक्म दिया, उससे ब्रितानिया साम्राज्य की चूलें हिल गईं। सेना में बगावत करने के जुर्म में वीरचंद्र सिंह गढ़वाली व उनके 61 साथियों को कठोर कारावास की सजा के साथ ही गढ़वाली की गांव दूधातोली पौड़ी में भूमि व मकान को कुर्क कर दिया गया। आजादी के आंदोलन में गढ़वाली कई बार जेल गए। इतना ही नहीं, टिहरी राजशाही के खिलाफ हुई जनक्रांति के साथ ही मजदूर-किसान आंदोलनों का भी उन्होंने नेतृत्व किया व जेल की सजा भुगती। आजादी के आंदोलन में गढ़वाली की अहम भूमिका को देखते हुए 1974 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने भाबर क्षेत्र के ग्राम हल्दूखाता नजीबाबाद क्षेत्र में पडऩे वाली करीब दस एकड़ भूमि 90 वर्ष की लीज पर श्री गढ़वाली को दे दी। शर्त यह है प्रत्येक 30 वर्ष में भूमि लीज को रिन्यूवल करना होगा। एक अक्टूबर 1979 को वीर चंद्र सिंह गढ़वाली इस दुनिया को अलविदा कह गए। इसके बाद स्व.गढ़वाली के पुत्र आनंद सिंह व खुशाल सिंह उक्त भूमि लीज हस्तांतरण अपने नाम कराने के लिए उत्तर प्रदेश वन विभाग के अफसरों की चौखटें नापते रहे। स्व.गढ़वाली के दोनों पुत्र भी दुनिया को अलविदा कर गए पर विभाग भूमि हस्तांतरण करने को आज भी राजी नहीं। भूमि हस्तांतरण नहीं हुआ तो वर्ष 2005 में लीज भी रिन्यूवल नहीं हो पाई। आज स्थिति यह है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए अंग्रेजों से सीधा मोर्चा लिया, वन अधिकारियों ने उसी 'वीर के परिजनों के लिए 'अतिक्रमणकारी जैसे शब्द का प्रयोग करते हुए वन प्रभाग नजीबाबाद ने उन्हें लीज पर दी गई भूमि से 'बेदखली का नोटिस जारी कर दिया है। 15 दिन के भीतर जमीन खाली न करने पर पुलिस बल का प्रयोग कर खाली करने की चेतावनी दी गयी है। जिससे उनके परिजन काफी परेशान है। बेदखली के निर्देश उच्चाधिकारियों की ओर से दिए गए हैं। इसके बाद ही बिजनौर वन प्रभाग ने स्व.गढ़वाली के परिजनों को भूमि से हटने को कहा है। -रमेश चंद्र, डीएफओ, नजीबाबाद वनप्रभाग बिजनौर

Friday, 31 December 2010

पहाड़१ की तरफ से नये साल की बहुत बहुत शुभकामनाए ।।

आप सभी को पहाड़१ की तरफ से नये साल की बहुत बहुत शुभकामनाए

Tuesday, 28 December 2010

पहाड़ की रामलीला राष्ट्रीय धरोहर

पिथौरागढ़। लंबी जद्दोजहद के बाद पहाड़ की रामलीला को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया गया है। केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने संगीत नाटक अकादमी को रामलीला के संरक्षण की जिम्मेदारी सौंपी है। फरवरी 2011 में अल्मोड़ा में होने वाले सेमीनार में राष्ट्रीय स्तर पर पहाड़ की रामलीला के मंचन की रूपरेखा तय की जाएगी। संगीत नाट अकादमी की ओर से पहाड़ी रामलीला को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की जानकारी प्रो.डीआर पुरोहित और संगीतज्ञ डा.पंकज उप्रेती को दी गई है। अकादमी ने प्रो.डीआर पुरोहित को गढ़वाल और हिमालय संगीत शोध समिति के निदेशक डा.पंकज उप्रेती को कुमाऊं में रामलीला के जानकारों से जनसंपर्क का काम सौंपा गया है। हिमालय संगीत शोध समिति के निदेशक डा.पंकज उप्रेती ने पहाड़ की रामलीला पर काफी विस्तार से शोध का काम किया है। डा.उप्रेती पहाड़ी रामलीला की गायनशैली पर एक तथ्यपूर्ण पुस्तक भी लिख चुके हैं। उन्होंने ही संस्कृति मंत्रालय के सामने पहाड़ की रामलीला का खाका रखा था। संगीत नाटक अकादमी को मिला संरक्षण का काम

आरक्षण विरोधियों को मिलेंगी सुविधाएं!

राज्य आंदोलनकारियों की तरह दर्जा देने पर किया जा रहा है विचार देहरादून। स्कूलों और कॉलेजों में ओबीसी आरक्षण के खिलाफ संघर्ष करने वाले आंदोलनकारियों के लिए भी सरकार सुविधाओं का दरवाजा खोलने पर गौर कर रही है। मुख्य सचिव सुभाष कुमार ने इस मुद्दे पर शासन स्तर पर बैठक बुलाई है। शुरुआत में सिर्फ नैनीताल के आंदोलनकारियों पर ही गौर किया जाएगा। नैनीताल के आंदोलनकारियों को भी उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों सरीखी सुविधाएं देने की आवाज वहां के विधायक खड़क सिंह बोरा ने उठाई है। उनका तर्क है कि वर्ष 1994 तक के ओबीसी आंदोलनकारियों को उत्तराखंड आंदोलन के जुझारुओं की तरह सुविधा देने की अनुशंसा कुमाऊं के आयुक्त रहे प्रमुख सचिव राकेश शर्मा ने भी की थी। अपने मुख्यमंत्रित्व काल में नारायणदत्त तिवारी भी इस पर सैद्धांतिक सहमति जता चुके हैं। आरक्षण विरोधियों को उत्तराखंड आंदोलनकारियों सरीखी सुविधा देने के बाबत शासन स्तर पर प्रारंभिक दौर की कार्रवाई शुरू हो गई है। नैनीताल के आंदोलनकारियों को यह सुविधा मिलती है, तो बाकी जिलों के आरक्षण विरोधियों के लिए भी राह खुल सकती है। आंदोलन पूरे राज्य में छिड़ा था। बाद में यही आंदोलन उत्तराखंड आंदोलन की शक्ल में बदल गया था। सरकार ने अभी यह मानक तय नहीं किया है कि किन्हें और किस तरह के लोगों को आंदोलनकारियों का दरजा दिया जाए। यह भी देखा जाएगा कि इसका असर क्या और कितना पड़ सकता है। फिलहाल, नैनीताल को लेकर कसरत हुई शुरू मुख्य सचिव ने बुलाई आला अफसरों की बैठक आरक्षण विरोधियों को भी उत्तराखंड आंदोलनकारियों की तरह दर्जा देने पर बैठक बुलाई है। अभी यह सिर्फ नैनीताल के लोगों पर केंद्रित होगा। साथ ही प्रक्रिया प्रारंभिक स्तर पर है। मांग की व्यावहारिकता और पहलुओं पर शासन विचार करेगा। -सुभाष कुमार, मुख्य सचिव नैनीताल के आंदोलनकारियों ने ओबीसी और उत्तराखंड आंदोलन, दोनों में शिरकत की थी। उनकी सूची भी संयुक्त ही बनाई गई है। वहां के ओबीसी आंदोलनकारियों को उत्तराखंड आंदोलनकारियों के समान दरजा मिलना ही चाहिए। -खड़क सिंह बोरा भाजपा विधायक, नैनीताल

Thursday, 23 December 2010

दो हजार भर्तियों पर फंसा विभाग

नहीं हो पा रही है ग्राम पंचायत अधिकारियों की नियुक्ति को परीक्षा देहरादून। करीब दो हजार ग्राम पंचायत अधिकारियों की भरती पर पंचायत विभाग एक बार फिर से फंस गया है। ढाई साल पहले 1.16 लाख आवेदनों की फीस एकत्रित करने के बाद भी पंचायत विभाग इस मसले को नहीं सुलझा पा रहा है। आवेदनकर्ताओं की ओर से कोर्ट का दरवाजा खटखटाए जाने से पंचायत विभाग अब फिर दबाव में है। जुलाई 2008 में पंचायत विभाग की ओर से 1923 ग्राम पंचायत विकास अधिकारियों की भरती के लिए आवेदन मांगे थे। इसके एवज में विभाग को 1.16 लाख आवेदन मिले। फार्म फीस के सौ रुपये के हिसाब से विभाग को करीब सवा करोड़ रुपये की आय भी हुई। ढाई साल बाद भी पंचायत विभाग यह परीक्षा नहीं करा पाया। हाल यह है कि पंतनगर विश्वविद्यालय को परीक्षा कराने के 40 लाख रुपये दिए जा चुके हैं। इसके बाद भी मामला आगे नहीं बढ़ पाया है। भरती की यह प्रक्रिया वित्त की आपत्ति के कारण अटका था। वित्त का कहना था कि विभागीय ढांचे में केवल 670 पदों की ही व्यवस्था है। कैबिनेट ने 2409 पदों के लिए स्वीकृति दी थी। बाद में जो शासनादेश जारी हुआ उसमें 670 पदों की व्यवस्था ही दर्शाई गई। अब उत्तरकाशी से उत्तम सिंह गुसांई की ओर से इस मसले में अदालत का दरवाजा खटखटाने से पंचायत विभाग दबाव में हैं। पंचायत विभाग इस समय जवाब तैयार करने में जुटा हुआ है। ढाई साल से मामले को लटकाए हुए हैं। बेरोजगारों का साथ कोई नहीं दे रहा है। एक लाख युवाओं से जो पैसा लिया है उसका ब्याज कौन खा रहा है, यह तो बताएं। ऐसे पंचायत कैसे मजबूत होंगी। -सुरेंद्र नौटियाल, आवेदनकर्ता, माजरा देहरादून। परीक्षा कराने के 40 लाख देने के बाद भी स्थिति जस की तस

वन विभाग में खुली भरती की राह

मंत्रिमंडल में सेवा नियमावली मंजूर, ऋषिकेश, हरिद्वार को संस्कृत नगरी का दरजा देहरादून। राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में मंगलवार को वन विभाग में रेंजर, गार्ड और ड्राफ्ट्समैन की सेवा नियमावली को मंजूरी देने के साथ ही भरती का रास्ता खुल गया। ऋषिकेश और हरिद्वार को संस्कृत नगरी का दरजा देने और कुमाऊं व गढ़वाल में एक-एक संस्कृत ग्राम स्थापित करने का फैसला किया गया। उत्तराखंड संस्कृत शिक्षा परिषद के गठन और उसके कार्यों को मंजूरी दी गई। इसका मुख्यालय देहरादून में होगा। सरकारी अफसर दफ्तरों में पद नाम संस्कृत में भी लिखेंगे। पीडीएस को सशक्त बनाने को खाद्य मंत्री की अध्यक्षता में कैबिनेट सब कमेटी बनाई गई। शिक्षकों को सत्रांत लाभ की सुविधा फिर दी गई। गैर बीएड वाले एलटी शिक्षकों को प्रवक्ता पद पर प्रोन्नति के लिए बीएड की बाध्यता खत्म की गई। शासन से जुड़े विभागों, सचिवालय, विधानसभा, राज्य लोक सेवा आयोग, महाधिवक्ता कार्यालय को छोड़ बाकी विभागों में पदनामों की समरूपता पर फैसला करने को आबकारी मंत्री की अध्यक्षता में कैबिनेट सबकमेटी बनाई। उत्तराखंड होमगार्ड सेवा नियमावली का प्रख्यापन किया गया। शव जलाने को वन निगम की लकड़ी लेने पर वैट खत्म किया गया। उत्तराखंड राजस्व सेवा नियमावली में भी संशोधन किया गया। हरिद्वार के लोगों का घरेलू और निजी नलकूपों के लंबित बिल 31 मार्च 2011 तक भरने पर सरचार्ज माफ कर दिया गया। वन विभाग की सेवा नियमावली को कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद वन रेंजर, प्रधान ड्राफ्ट्समैन, ड्राफ्ट्समैन की भरती होगी। रेंजर के 308 पदों में 50 फीसदी डिप्टी रेंजर से भरे जाएंगे। बाकी पद राज्य लोक सेवा आयोग से भरे जाएंगे। ड्राफ्ट्समैन संवर्ग में 14 पद प्रधान ड्राफ्ट्समैन और 41 पद ड्राफ्ट्समैन के होंगे। स्पेशल कॉर्बेट टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स की सेवा नियमावली को हरी झंडी मिलने के बाद 90 में से 63 पदों पर सीधी भरती होगी। इसमें 70 फीसदी पद रेग्युलर होंगे। -----------------------------------

Wednesday, 22 December 2010

एलटी लिखित परिक्षा की संभावित तिथि ३० जनवरी २०१०

त्तराखंड प्राविधिक शिक्षा परिषद के तत्वावधान में होने वाली एलटी की प्रवेश परीक्षा के लिए परीक्षा केंद्रों का निर्धारण कर लिया गया है। परीक्षा के लिए मंडल में नैनीताल, हल्द्वानी, रुद्रपुर, काशीपुर, खटीमा, अल्मोड़ा, द्वाराहाट, बागेश्र्वर, पिथौरागढ़ को केंद्र बनाया गया है। लिखित परिक्षा की संभावित तिथि ३० जनवरी २०१० मे होने की संभावना है।

उत्तराखँड की सँस्कृति को वह पहचान मिलनी चाहिये

उत्तराखँड मेँ उत्तराखँडियोँ की आबादी 80 लाख लेकिन प्रवास मेँ उत्तराखँडियोँ की आबादी. दिल्ली मेँ 50 लाख से ज्यादा यू पी मेँ 60 लाख के करीबन हरियाणा पँजाब और चँडीगढ मेँ 45 लाख के करीबन मध्यप्रदेश गुजरात मेँ 25 से 30 लाख के करीबन मुँबई मेँ 10 लाख के करीबन अन्य महाराष्टर एवँ अन्य दक्षिण भारत मेँ 10 से 15 लाख एवँ विदोशोँ मेँ 2 लाख से भी ज्यादा लेकिन फिर भी हमारी सँस्कृति को वह पहचान नहीँ मिल पाई जितनी कि मिलनी चाहिये

Tuesday, 30 November 2010

पीसीएस (जे) के परीक्षा परिणाम घोषित

: राज्य लोक सेवा आयोग ने पीसीएस (जे) के परिणाम घोषित कर दिए। ऊधमसिंह नगर की रिंकी साहनी ने परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया। मंगलवार को उत्तराखंड न्यायिक सेवा सिविल जज (पीसीएस-जे) की मुख्य परीक्षा -2009 का परिणाम घोषित किया गया। मंगलवार देर शाम घोषित हुए परीक्षा परिणाम में ऊधमसिंह नगर निवासी रिंकी साहनी पुत्री सुभाष साहनी ने सर्वोच्च स्थान हासिल किया। राजपुर रोड, देहरादून निवासी शिवानी पसबोला पुत्री महेश चंद्र ने दूसरा, इलाहाबाद निवासी रविप्रकाश पुत्र हरिशंकर शुक्ला ने तीसरा, सहारनपुर निवासी शहजाद अहमद वाहिद पुत्र इरफानुलहक ने चौथा, इलाहाबाद निवासी एकता मिश्रा पुत्री राजीव नयन मिश्रा ने पांचवा, न्यू रोड देहरादून निवासी राजीव धवन पुत्र रामनाथ धवन ने छठा और हरिद्वार ज्वालापुर निवासी मोहम्मद याकूब पुत्र शौकत अली ने सातवां स्थान हासिल किया। आयोग के सचिव कुंवर सिंह ने बताया कि प्रारंभिक परीक्षा में कुल 150 अभ्यर्थी शामिल हुए थे। इनमें से 13 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था, जिसमें से सात अभ्यर्थियों का चयन किया गया। -

देवभूमि के 'सुर में पोलैंड की 'ताल

देहरादून- 'जब शब्द नहीं थे, तब इन्सान ने पत्थरों और लाठी-डंडों को टकराकर सुर उत्पन्न किए। इन्हीं सुरों पर उछल-कूदकर उसने अपने भावों की अभिव्यक्ति की। यही नृत्य का पहला स्वरूप था, जिसने बताया कि संगीत शब्दों के दायरे में कैद नहीं है। इसका अहसास मुझे अपने पोलैंड प्रवास के दौरान हुआ। देवभूमि के संगीत पर थिरकते पोलैंड के युवा। सचमुच मेरे लिए यह किसी सपने जैसा है। मेरे अपने उत्तराखंडी लोकनृत्य व गीत 'तांदीÓ और 'रासौÓ के बारे में नहीं जानते और परदेसी इनकी धुनों पर थिरक रहे हैं।Ó यह कहना है हाल ही में इंडो-पोलिश कल्चरल कमेटी की ओर से पोलैंड के क्राको शहर में आयोजित वर्कशॉप से भाग लेकर लौटे युवा उत्तराखंडी लोकगायक रजनीकांत सेमवाल का। बकौल रजनीकांत, 'क्राको में सिर्फ दो उत्तराखंडी मिले, लेकिन वहां के युवाओं ने हमारे गीत-संगीत को हाथोंहाथ लिया। 'तांदीÓ, 'रासौÓ, 'झुमैलोÓ, 'चोपतीÓ जैसे पहाड़ी नृत्यों की धुन पर वह जमकर थिरके। वे हिमालय के लोकजीवन को जानना चाहते थे। उसे करीब से महसूस करना चाहते थे। कई युवाओं ने कहा वे उत्तराखंड आएंगे।Ó रजनीकांत ने बताया कि जागीलांस्की यूनिवर्सिटी में यह वर्कशॉप हुई। एक-दूसरे की भाषा न जानने के बावजूद स्टूडेंट्स उनसे इस कदर घुल-मिल गए, मानो बरसों का परिचय हो। यह संभव हो पाया हमारे संगीत की वजह से। इंट्रोडक्शन अंग्रेजी में होता था और बाकी सब संगीत कह देता था। यह इसलिए भी संभव हो पाया, क्योंकि वह लोकगीतों में 'पॉपÓ, 'हिपॉपÓ व 'रीमिक्सÓ का प्रयोग करते हैं। इसकी वजह पूछने पर उन्होंने बताया कि हमारे युवा पब या डिस्को में दूसरी भाषाओं के गानों पर थिरक रहे हैं। यदि हम अपने गानों में मूल को छेड़े बिना ऐसे प्रयोग करें तो इस बहाने वह अपनी जड़ों से तो जुड़ पाएंगे। वह कहते हैं कि जब पोलैंड के युवाओं को उत्तराखंडी लोकधुनें थिरका सकती हैं तो हमें क्यों नहीं।- ::::

एक आंदोलन से नदी में बहने लगा पानी

हल्द्वानी। एक आंदोलन चिपको, जिसने हरियाली को बचा लिया। एक आंदोलन ‘नशा नहीं रोजगार दो’ जिसने बहुतों को पीना भुला दिया। एक आंदोलन उत्तराखंड राज्य आंदोलन, जिसने अपना राज्य दिला दिया। ऐसा ही एक और आंदोलन जिसने सूखी नदियों में पानी ला दिया। यह ऐसी तसवीर है जिसमें अपना उत्तराखंड देश में हो रहे जन आंदोलनों का अगवा दिखाई देता है। राज्य स्थापना के इस दशक में पानी के लिए मारामारी मची, तो उत्तराखंड ‘पानी बचाओ, नदी बचाओ’ की मुहिम में भी सबसे आगे निकल गया। प्रेरणा भले ही मध्यप्रदेश के‘नर्मादा बचाओ’ आंदोलन से मिली हो, लेकिन सबसे अधिक असर अल्मोड़ा की कोसी घाटी में हुआ। वर्ष 2007-2008 में कोसी से कुछ जागरूक लोगों के साथ पदयात्रा के रूप में चला यह आंदोलन आज पूरे उत्तराखंड में पानी की तरह फैल गया है। अल्मोड़ा की कोसी, मनसारी और लोध घाटी, चंपावत की पंचेश्वर, बागेश्वर की सरयू घाटी, पिथौरागढ़ की गोरी और काली के अलावा गढ़वाल के उत्तरकाशी, चमोली और पौड़ी में इस आंदोलन का व्यापक असर है। लाखों लोग गैर हिमालयी नदियों बचाने के लिए आगे आए हैं। प्रदेश की 27.5 प्रतिशत कृषि भूमि को सिंचित करने वाली गैर हिमालयी नदियों को बचाने की यह अनूठी पहल है। ध्यान रहे कि इन छोटी नदियों से ही इस पहाड़ी राज्य का अस्तित्व है, वरन बड़ी नदियां तो हमेशा महानगरों के ही काम आईं हैं। हमेशा की ही तरह इस आंदोलन में भी जान महिलाओं ने ही फूंकी है। सैकड़ों महिला संगठन इस पर काम कर रहे हैं। कौसानी की तीन घाटियों में 200 से अधिक महिला संगठनों में हजारों महिलाएं चाल-खालों को बचाने में जुटी हैं। मेहनत रंग भी लाई है। गत गर्मियों में पानी के लिए भटकने वाले कोसी घाटी के करीब दो लाख लोगों को इस बार मशक्कत नहीं करनी पड़ी। कत्यूर घाटी के गोमती और गरुड़ गंगा ठ्ठके किनारे बसे कई गांवों के 25 हजार लोग इस आंदोलन के बाद अब अपनी गैर हिमालयी नदियों को बचाने निकल पड़े हैं। कभी वन विभाग से खुन्नस खाए लोग, आज विभाग के सहयोग से चाल-खाल बना रहे हैं। आंदोलन से प्रेरणा लेते हुए गगास में 300 से 500 तक चालें विकसित हो चुकी हैं। इस दशक की इससे बड़ी उपलब्धी और क्या हो सकती है कि हम अब तक दो बार देश की प्रमुख 44 नदियों को बचाने के लिए मेजबानी कर चुके हैं। इसी मंथन के निचोड़ से निकला पानी सूख चुकी उत्तराखंड की 28 गैर हिमालयी नदियों में बह रहा है। गत दिनों हुई झमाझम बरसात इंद्रदेव का आशीर्वाद बनकर बरसी। नदियों रीचार्ज हुईं तो, लोगों को समुचित पानी भी उपलब्ध हो पा रहा है। क असर -

Thursday, 25 November 2010

जिन्हें पहाड़ के नैसर्गिक सौंदर्य ने किया अभिभूत

नैनीताल/भीमताल/रानीखेत। रोजगार और सुविधाओं की तलाश में भले ही पहाड़ से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा हो लेकिन इन शांत वादियों में देश के नामचीन लोगों का मन खूब रम रहा है। देश के राजनेताओं से लेकर उद्योगपतियों तक पर पहाड़ के सौंदर्य का जादू चल पड़ा है। कई बड़ी हस्तियों ने भूमि की खरीद-फरोख्त के साथ यहां अपने आशियाने भी बना लिए हैं। नैनीताल और इसके आसपास के पिकनिक स्पॉट हों या फिर रानीखेत और मजखाली, यहां साल भर सैलानियों का जमघट रहता है। इनमें से कई ऐसे लोग भी हैं जिन्हें पहाड़ के नैसर्गिक सौंदर्य ने इतना अभिभूत किया कि उन्होंने साल में कुछ दिन शांति और सुकून से बिताने के लिए यहीं अपना आशियाना बना लिया। दिल्ली और मुंबई में रहने वाले यह लोग अब पहाड़ की धरती से भी जुड़ चुके हैं। देश के पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल, पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. माधव राव सिंधिया और उनके परिजनों के अलावा आजमगढ़ के पूर्व सांसद अकबर अहमद डम्पी ने रामगढ़ में, पूर्व मिस इंडिया नफीसा अली, आईएफएस अधिकारी पीके भुटियानी ने भक्त्यूड़ा गांव में, तीरूबाला एक्सपोर्ट कंपनी के चेयरमैन टी अग्रवाल ने सनीलेक भक्त्यूड़ा में, सेवानिवृत्त एडमिरल सुशील कुमार ने गोलूधार मेहरागांव में, उद्योगपति रेखा खेतान ने श्यामखेत, पदमश्री डा. यशोधर मठपाल ने खुटानी भीमताल में, साहित्यकार प्रो. दयानंद ने श्यामखेत, पूर्व क्रिकेटर मनोज प्रभाकर ने जंगलियागांव (भीमताल) में, नंदा एस्काट की प्रमुख सीता नंदा, दिल्ली के प्रसिद्ध बत्रा हास्पिटल के स्वामी एलएम बत्रा और कपूर लेम्प्स के स्वामी ने श्यामखेत में, दिल्ली की प्रसिद्ध इंटीरियर डेकोरेटर पायल कपूर ने फरसौली में और शास्त्रीय गायिका शुभा मुदगल के परिजनों ने नौकुचियाताल में अचल संपत्ति जुटाई है। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी गर्मियों में एक-दो दिन के लिए रामगढ़ की वादियों में पहुंचती हैं। इनमें से अधिकांश लोग यहां बंगले और कोठियां भी बनवा चुके हैं। इसी तरह महाराजा कर्णसिंह और उनके बहनोई महाराजा ओमकार सिंह मजखाली के दिगोटी गांव में पूर्व राजदूत हर्षवर्धन सिंह मनराल मजखाली, एसएसबी के पूर्व महानिदेशक तिलक काक रानीखेत, भारत सरकार के पूर्व वित्त सचिव एसपी शुक्ला द्वारसौं गांव में कोठी बनवाकर रह रहे हैं। इनमें से कुछ तो अधिकतर समय यहीं रहते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो सिर्फ गर्मियां यहां बिताते हैं। शेष समय उनके बंगलों और भूमि की देखरेख केयरटेकर करते हैं। पूर्व पीएम इंद्र कुमार गुजराल, मिस इंडिया नफीसा अली, पूर्वक्रिकेटर मनोज प्रभाकर, शास्त्रीय गायिका शुभा मुदगल के परिजनों की भी है यहां संपत्ति-

हिमालय की नब्ज है उत्तराखंड

: उत्तराखंड हिमालय की ऐसी नब्ज है, जिसे टटोलकर पूरे हिमालय का हालचाल जाना जा सकता है। यहां न सिर्फ अन्य हिमालयी राज्यों से अधिक हिमनद है, बल्कि संरक्षित वन क्षेत्र का दायरा भी सबसे अधिक है। जमीन की संवेदनशीलता ऐसी कि जरा सा भूस्खलन यहां तबाही ला देता है। हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान के आंकड़े बताते हैं कि यदि राज्य के प्राकृतिक संसाधनों से अत्यधिक छेड़छाड़ किया गया तो इसका असर पूरे देश में दिखेगा। दून में चल रहे 'हिमालय नीतिÓ जन संवाद में हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान ने 11 हिमालयी राज्यों के प्राकृतिक संसाधनों के आंकड़ों को सामने रखा। जिसमें पता चलता है कि उत्तराखंड हर लिहाज से महत्वपूर्ण है और संवेदनशील भी। हिमालय के महत्वर्ण 26 ग्लेशियरों में 11 हिमनद सिर्फ इस राज्य में है। प्रदेश में राष्ट्रीय पार्क, वाइल्ड लाइफ सेंचुरी व संवेदनशील वनक्षेत्र भी अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक हैं। भूस्खलन की बड़ी घटनाएं सबसे अधिक बार उत्तराखंड में घटी हैं। यानि राज्य का पर्यावरण काफी संवेदनशील है। हिमालयी शिक्षा संस्थान के विशेषज्ञ व नदी बचाओ आंदोलन से जुड़े सुरेश भाई का कहना है कि जारी किए गए आकंड़े राज्य के जल, जंगल और जमीन की कहानी बताने के लिए काफी हैं। मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह भी मानते हैं कि राज्य में ऐसी कोई भी परियोजना नहीं चलाई जानी चाहिए, जिससे यहां के पर्यावरण को नुकसान पहुंचे। क्योंकि उत्तराखंड हिमालय के बड़े हिस्से में बसा है। उत्तराखंड के ग्लेशियर नॉर्थ नंदा देवी (19कमी), साउथ नंदा देवी (15किमी), त्रिशूल (15किमी), गंगोत्री (30किमी), डॉकरैनी (05किमी), चोरबारी (07किमी), गंगोत्री (19किमी), चैखंबा (12किमी), सतोपंथ (13किमी), पिंडारी (08किमी), मिलम (19किमी)। :::: दस साल का उत्तराखंड उत्तराखंड अब दस साल का हो गया है। किसी राज्य के लिए एक दशक इतना बड़ा अरसा नहीं है कि कोई फैसला दिया जा सके, हां! उसकी दिशा और दशा का अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में पीछे मुड़कर देखें तो सब कुछ आशानुरूप भले न हुआ हो, लेकिन निराशाजनक भी नहीं कहा जा सकता। श्रीनगर में मेडिकल कॉलेज शुरू हुआ और गरीब बच्चे भी डॉक्टर बनने का सपना देखने लगे। मात्र 15 हजार रुपये फीस रख सरकार ने गरीबों के लिए मेडिकल की पढ़ाई को सुगम बनाया। प्रदेश में 108 एम्बूलेंस सेवा शुरू कर स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में प्रभावी पहल की गई। औद्योगिक विकास को मिली गति भी राज्य के लिए छोटी उपलब्धि नहीं है। इससे भी आगे पर्यावरण संरक्षण में अग्रणीय भूमिका निभा उत्तराखंड ने विश्व मंच पर अपनी अहमियत सिद्ध कर दी है। इस वर्ष आयोजित महाकुंभ के सफल संचालन के बाद अब कोई शुबहा नहीं कि बड़े आयोजनों के प्रबंधन में भी नए राज्य का कोई सानी नहीं है। बावजूद इसके उल्लास के पलों पर उदासी ज्यादा हावी रही। दुनिया की आधुनिक और अस्थिर पर्वत शृंखला हिमालय की गोद में बसे नए राज्य का मिजाज भी उतना ही डांवाडोल रहा, जितनी यहां की भूगर्भीय गतिविधियां। फिर चाहे मिजाज राजनीति का हो या कुदरत का। कुदरत को तो कंट्रोल नहीं किया जा सकता, लेकिन उसके प्रभाव को न्यून करना असंभव नहीं। इसके लिए सर्वाधिक आवश्यकता है आपसी सहयोग की। यह सहयोग चाहिए राजनीति में, कर्मचारियों और आम जनता में। दस साल में पांच मुख्यमंत्री देख चुके शिशु राज्य को राजनीतिक स्थिरता की जरूरत ज्यादा है। तभी जिन सपनों की नींव पर उत्तराखंड की इमारत खड़ी की जा रही है, वह बुलंदी पर पहुंच पाएगी। इसकी जिम्मेदारी न अकेले नेताओं पर है और न ही अफसरों या कर्मचारियों पर। यह दायित्व सबका है। यह ठीक है दस साल की उम्र परिपक्व होने की नहीं है, लेकिन अपने भले बुरे के पहचान की तो है। अब समय आ गया है कि बीती ताहि बिसारने की बजाए उससे सबक ले आगे की सुध ली जाए। आओ हम मुठ्ठी बंद कर देश-दुनिया को अपनी ताकत का अहसास कराएं। -

उत्तराखंड में साहित्यकार की आस

= यह वही उत्तराखंड है, जिसने खड़ी बोली हिंदी का पहला कवि गुमानी पंत, पहला गद्यकार पंडित नैन सिंह रावत, पहला डी. लिट्. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, पहला व्याकरणाचार्य किशोरीदास वाजपेयी, पहाड़ी शैली का पहला चित्रकार मौलाराम तोमर, संस्कृत का अपराजेय शास्त्री विश्वेश्वर पांडे, भारत में सोप ऑपेरा का आविष्कारक मनोहरश्याम जोशी, पहला एकांकीकार गोविंद बल्लभ पंत, प्रकृति के कवि सुमित्रानंदन पंत और चंद्रकुमार बर्त्वाल, मनोविज्ञान का कथा-चितेरा इलाचंद्र जोशी, स्वप्नकथा को हिंदी में जोड़ने वाला रमाप्रसाद घिल्डियाल ‘पहाड़ी’ और फिर आधुनिक कहानी को दिशा देने वाले शैलेश मटियानी, शिवानी, विद्यासागर नौटियाल, शेखर जोशी, हिमांशु जोशी, पानू खोलिया, पंकज बिष्ट, मृणाल पांडे और मोहन थपलियाल जैसे रचानाकार दिए हैं। - हम भारतीयों के जीवन में घटनाएं अब एक सामान्य सूचना भी नहीं रह गई हैं। अखबार में खबर पढ़ते हैं, मगर दूसरे ही पल घटना मन से उसी तरह गायब हो जाती है, जैसे रसोई में आकर बिल्ली दूध चट कर जाए, और हम उसे डंडा मारकर अपने मन का गुबार भी न निकाल पाएं। साहित्यिक पत्रिका ‘वसुधा’ में वरिष्ठ साहित्यकार चंद्रकांत देवताले का पत्र छपा है, जिसमें उन्होंने जयपुर की एक घटना का जिक्र किया है कि कैसे अलवर के जिलाधिकारी कुंजीलाल मीणा ने हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ को अपने सभी अधीनस्थ कार्यालयों को भेजकर भ्रष्टाचार को खत्म करने का बीड़ा उठाया और वे उसमें काफी हद तक सफल रहे। हुआ यह कि अलवर के एक नागरिक की पेंशन का पैसा लाख कोशिशों के बाद भी नहीं मिल पाया, तो उसने अपने आवेदन के साथ हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ जिला कलेक्टर को भेज दिया। मीणा ने जिले के सभी विभागों को इस कहानी की फोटो प्रतियां भिजवाईं और साथ में पत्र भेजा कि हर विभाग के अधिकारियों और बाबुओं को यह कहानी पढ़नी होगी। तसवीर का एक पहलू यह है। दूसरा पहलू उत्तराखंड की नौकरशाही और सरकार की मिलीभगत का है। वर्ष 2003 में सरकार ने प्रदेश के लेखकों, कलाकारों को एकजुट करने के लिए एक पहल की थी, ‘साहित्य, कला और संस्कृति परिषद’ के रूप में। उस वक्त प्रदेश के मुख्य सचिव हमारे सहपाठी थे, रघुनंदन सिंह टोलिया। 1964-65 में नैनीताल के डीएसबी कॉलेज में हमने तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ. डी. डी. पंत के नेतृत्व में ऐसी ही प्रतिभाओं का एक संगठन बनाया, ‘द क्रेंक्स’। डी. डी. पंत ने बाद में ‘उत्तराखंड क्रांति दल’ (यूकेडी) को जन्म दिया और टोलिया ने राज्य बनने के बाद प्रदेश के चुनींदा कला-प्रेमियों को एक मंच पर जोड़कर उत्तराखंड की साहित्य और संस्कृति अकादमियों की आधारशिला रखी। इस अकादमी में एक ही मंच पर थे, वरिष्ठ रचनाकार रस्किन बांड और विद्यासागर नौटियाल, कवि लीलाधर जगूड़ी, लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी और रतन सिंह जौनसारी, इतिहासकार शेखर पाठक, रंगकर्मी जहूर आलम और डी. आर. पुरोहित, पुरावेत्ता यशोधर मठपाल, संस्कृतिकर्मी शेर सिंह पांगती और नंद किशोर हटवाल और दो दर्जन से अधिक अनेक दूसरे लोग। सन् 2007 में प्रदेश की दूसरी लोकप्रिय सरकार ने सत्ता संभालते ही पहला काम यह किया कि लेखकों, संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों के इन दोनों संगठनों को एक फालतू वस्तु की तरह उत्तराखंड की सीमा से इतनी दूर फेंक दिया कि वे हिमाचल-उत्तर प्रदेश की सीमा से इस ओर झांक भी न सकें। यूकेडी को पूरी तरह निचोड़ कर उसके सत्व से अपना पेट भरा और टोलिया के सपनों को ऐसा निचोड़ा कि उसका कतरा भी उत्तराखंड में नहीं बचा रह सके। यह वही उत्तराखंड है, जिसने खड़ी बोली हिंदी का पहला कवि गुमानी पंत, पहला गद्यकार पंडित नैन सिंह रावत, पहला डी. लिट्. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, पहला व्याकरणाचार्य किशोरीदास वाजपेयी, पहाड़ी शैली का पहला चित्रकार मौलाराम तोमर, संस्कृत का अपराजेय शास्त्री विश्वेश्वर पांडे, भारत में सोप ऑपेरा का आविष्कारक मनोहरश्याम जोशी, पहला एकांकीकार गोविंद बल्लभ पंत, प्रकृति के कवि सुमित्रानंदन पंत और चंद्रकुमार बर्त्वाल, मनोविज्ञान का कथा-चितेरा इलाचंद्र जोशी, स्वप्नकथा को हिंदी में जोड़ने वाला रमाप्रसाद घिल्डियाल ‘पहाड़ी’ और फिर आधुनिक कहानी को दिशा देने वाले शैलेश मटियानी, शिवानी, विद्यासागर नौटियाल, शेखर जोशी, हिमांशु जोशी, पानू खोलिया, पंकज बिष्ट, मृणाल पांडे और मोहन थपलियाल जैसे रचानाकार दिए हैं। साहित्य का मंच भी उत्तराखंड में मौजूद है, हिंदी की पहली कवयित्री महादेवी वर्मा के रामगढ़ वाले घर के रूप में। दुर्भाग्य से इसे भी नष्ट करने में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। पहले इसके निदेशक के विरुद्ध जांच कमेटी बिठाई, कुछ हाथ नहीं लगा तो निदेशक की उम्र और योग्यता के लिए ऐसे नियम बनाए कि कोई आवेदन न कर सके। सरकारें तो सभी राज्यों में कमोबेश एक जैसी हैं, मगर नौकरशाही से निवेदन है कि उत्तराखंड के विन्यास में वे अलवर के कलेक्टर कुंजीलाल मीणा से सबक लें। वैसे मीणा तक जाने की भी जरूरत नहीं है। उनके पास तो टोलिया मौजूद हैं और वे शुरूआत कर ही चुके हैं। -

उत्तराखंड की लोक संस्कृति,

उत्तराखंड की लोक संस्कृति, जन मानस, पहाड़, नदी, बुग्याल जन जीवन को गहरे से समझना हो तो नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों से अच्छा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। लोक संगीत के क्षेत्र में नेगी का सफर छत्तीस सालों का है। नेगी लोकगायक हैं। गीतकार हैं। साहित्यकार हैं और संस्कृतिकर्मी हैं। उन्हें उत्तराखंड का प्रतिनिधि कलाकार कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। उत्तराखंड की मिट्टी पर केंद्रित उनके तमाम गीत पर्वतीय जनमानस में भीतर तक बसे हैं। नेगी साहित्य और कला परिषद के सदस्य रह चुके हैं। तमाम अवार्ड उनके नाम हैं। लोक भाषा साहित्य संस्थान के बतौर अध्यक्ष भी वह सक्रियता से काम कर रहे हैं। उत्तराखंड के दस सालों में लोक संस्कृति की क्या दशा-दिशा रही है। उन्हीं की जुबानी। राज्य बनने से पहले यहां की लोक संस्कृति, उससे जुड़े तमाम पहलुओं पर राजनीतिक नेतृत्व की कमजोर इच्छा शक्ति दिखाई पड़ती थी। लोक संस्कृति का विषय उसे सड़क, बिजली पानी के आगे गौण लगता था। मगर अब सोच में बदलाव आ रहा है -नरेंद्र सिंह नेगी, लोक गायक लोक संस्कृति पर संजीदा हो रहा नेतृत्व उत्तराखंड की लोक संस्कृति के संबंध में शुभ संकेत महसूस किए जा रहे हैं। हर नए राज्य में ऐसा होता है। बहुत पुरानी बात नहीं है, हमें याद है कोई हमसे पूछता था कि आप कहां से हैं, तो जवाब होता था देहरादून। अपने गांव कसबे का परिचय देने में हमें हिचक महसूस होती थी। मगर अब हम सीधे अपने गांव कस्बे के नाम पर आते हैं। उत्तराखंडी कहलाने में अब हमें कोई हिचक नहीं है। मैं अपनी बात कहता हूं। जब हमने गाना शुरू किया तो उस वक्त लोग गढ़वाली की जगह तुरंत ही हिंदी गाने के लिए कह देते थे। आज विदेशों से गढ़वाली, कुमाऊंनी गानों के लिए हमें बुलाया जा रहा है। हमारे शो में लोग टिकट लेकर आते हैं। काफी पहले मोहन उप्रेती अपनी टीम के साथ विदेश जाते थे। दिल्ली उनके लिए प्लेटफार्म बनती थी। मगर आज पौड़ी, मसूरी, टिहरी से कलाकार विदेश जा रहे हैं। ये बदली हुई स्थिति राज्य बनने के कारण है। हमने खुद को उत्तराखंडी मानना शुरू किया है, तो मार्केट पर भी इसका असर दिख रहा है। यहां के लोक कलाकारों को काम मिलने लगा है। आडियो-वीडियो के बाजार में तेजी आई है। सबसे बड़ी बात पर मैं आना चाहूंगा। राज्य बनने से पहले यहां की लोक संस्कृति, उससे जुड़े तमाम पहलुओं पर राजनीतिक नेतृत्व की कमजोर इच्छा शक्ति दिखाई पड़ती थी। लोक संस्कृति का विषय उसे सड़क, बिजली पानी के आगे गौण लगता था। मगर अब सोच में बदलाव आ रहा है। राजनीतिक नेतृत्व की बदली मन:स्थिति को दो उदाहरणों के साथ बताना चाहूंगा। एक, निशंक सरकार ने गढ़वाली और कुमाऊंनी को लोकभाषा का दर्जा दिलाने के लिए संकल्प पारित कर केंद्र सरकार को भेजा है। यह बड़ी बात है। दूसरा, संसद में गढ़वाली और कुमाऊंनी को राजभाषा का दर्जा देने के संबंध में गढ़वाल के सांसद सतपाल महाराज की ओर से उठाई गई आवाज। मेरा मानना है कि प्राइमरी स्कूलों के पाठ्यक्रमों में गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषाओं को रखा जाना चाहिए। जिस तरह से यहां भाषा और संस्कृत एकेडमी बनाई गई है, उसी तरह लोकभाषा एकेडमी भी बने। लोक संस्कृति की मजबूती के लिए काम होंगे। साहित्य एकेडमी में जो 24 भाषाएं सूचीबद्ध हैं, उनमें 17वें नंबर पर गढ़वाली और 18वें पर कुमाऊंनी हैं। राजनीतिक नेतृत्व और पब्लिक का पूरा दबाव बना तो दोनों को राजभाषा बनने में देरी नहीं लगेगी। एनडी तिवारी सरकार ने साहित्य और कला परिषद, फिल्म परिषद का गठन कर सराहनीय कार्य किया था। हालांकि खास काम नहीं हो पाया। इन दोनों पर ही काम आगे बढ़ना चाहिए। तभी क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों के लिए संभावनाएं बन पाएंगी। -

Saturday, 23 October 2010

एलटी संवर्ग के रिक्त पदों के लिए आवेदन की मियाद बढ़ाई 27नवंबर

आवेदन की मियाद बढ़ाई नैनीताल: एलटी संवर्ग के रिक्त पदों के लिए आवेदन की मियाद शासन ने 5 से बढ़ाकर 27 नवंबर कर दी है। मंडल में सामान्य के 679 व महिला वर्ग के 60 पदों के लिए आवेदकों में होड़ मची हुई है। प्रवेश परीक्षा केंद्रों का निर्धारण भी कर दिया गया है। उल्लेखनीय है 30 सितंबर को शिक्षा विभाग की ओर से एलटी के रिक्त पदों के लिए नियुक्ति की अधिसूचना जारी की गयी। गढ़वाल मंडल में सामान्य के 515 व महिला संवर्ग के 50 तथा कुमाऊं में सामान्य वर्ग के 679 व महिला वर्ग के 60 पदों के लिए विज्ञप्ति जारी की गई। मंडल में सामान्य वर्ग में हिंदी के 109, अंग्रेजी के 108, संस्कृत के 35,गणित के 53, विज्ञान के 90, सामान्य विषय के 86, कला के 108, शारीरिक शिक्षा के 84 व गृह विज्ञान के 6 पद शामिल हैं। जबकि महिला वर्ग में हिंदी व गणित के 5-5, अंग्रेजी व संस्कृत के 3-3, शारीरिक शिक्षा के 16, कला के 21, गृह विज्ञान के 6 व विज्ञान विषय के एक पद के लिए नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की गई है। पूर्व में शासन ने आवेदन पत्र जमा करने की अंतिम तिथि 5 नवंबर निर्धारित की थी, जिसे अब बढ़ाकर 27नवंबर कर दिया गया है। उत्तराखंड प्राविधिक शिक्षा परिषद के तत्वावधान में होने वाली एलटी की प्रवेश परीक्षा के लिए परीक्षा केंद्रों का निर्धारण कर लिया गया है। परीक्षा के लिए मंडल में नैनीताल, हल्द्वानी, रुद्रपुर, काशीपुर, खटीमा, अल्मोड़ा, द्वाराहाट, बागेश्र्वर, पिथौरागढ़ को केंद्र बनाया गया है। परीक्षा तिथि का ऐलान आवेदन जमा होने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद होने की संभावना है।

Thursday, 14 October 2010

नियुक्तियों का पिटारा

प्रदेश में एक बार फिर शिक्षा महकमे में रिक्त सैकड़ों पदों पर नियुक्तियों का पिटारा खुल गया है। प्रशिक्षित बेरोजगार युवा लंबे अरसे से एलटी शिक्षकों के पदों पर नियुक्तियों की बाट जोह रहे हैं। तकरीबन चार महीने की कड़ी मशक्कत के बाद नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की गई है। हालांकि, इस प्रक्रिया में आवेदन तो मांगे गए, लेकिन रिक्त पदों का ब्योरा नहीं दिया गया। इस संबंध में शिक्षा महकमे को एलटी से प्रवक्ता पदों पर पदोन्नत किए गए शिक्षकों के कार्यभार ग्रहण करने का इंतजार है। इसके बाद रिक्त पदों में इजाफा हो सकता है। एक बार पदों की संख्या विज्ञापित करने के बाद उसमें संशोधन को काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है। सरकार ने नियुक्ति के साथ ही महकमे में पदोन्नति की राह भी साफ कर दी है। निदेशक से लेकर अपर निदेशक, संयुक्त निदेशक, उप निदेशक और प्रधानाचार्यों के पद काफी संख्या में रिक्त हैं। पदोन्नति के लिए तय समय सीमा में पचास फीसदी छूट देने के कैबिनेट के निर्णय से शिक्षा महकमे को लाभ मिलना तय है। अभी महकमे में विभिन्न स्तरों पर चुस्त-दुरुस्त मुआयने की कमी महसूस की जा रही है। इससे प्राइमरी से लेकर माध्यमिक स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता पर असर तो पड़ा ही, शिक्षा से संबंधित राष्ट्रीय परियोजनाओं के क्रियान्वयन की गति मंद हो रही है। इसके मद्देनजर पदोन्नति और नियुक्ति को लेकर सरकार का फैसला अच्छा कदम है लेकिन ऐसे कदमों के बेहतर परिणाम तब ही दिखेंगे, जब उन पर सूझबूझ के साथ ही जल्द अमल किया जाए। पिछले कुछ अरसे से शिक्षा के क्षेत्र को खासी तवज्जो दी गई है। तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा के साथ विद्यालयी शिक्षा को लेकर हाल ही में लिए गए फैसलों ने इन क्षेत्रों में शैक्षिक सुधार की उम्मीदें बढ़ाई हैं। स्कूल गवर्नेंस के लिए शिक्षकों, अभिभावकों के मध्य संवाद को सशक्त करने की जरूरत भी है। विभिन्न योजनाओं में इसका प्रावधान है, लेकिन उन पर अमल को लेकर संजीदगी दिखाई नहीं दे रही। सरकार को चाहिए कि इस मामले में शिक्षा से जुड़े महकमों की कार्यप्रणाली में बुनियादी बदलाव पर भी ध्यान दे, ताकि प्रदेश में मानव संसाधन की कमी जल्द पूरी की जा सके। -

उत्तराखण्ड अधीनस्थ शिक्षा (प्रशिक्षित स्नातक श्रेणी) सेवा में सहायक अध्यापक/अध्यापिका के पदों एवं जमा करने की अन्तिम तिथि 05 नवम्बर 2010

कार्यालय निदेशक, विद्यालयी शिक्षा, उत्तराखण्ड, ननूरखेड़ा, देहरादून विज्ञापन संख्याः/एल0टी0/ 01 /2010-11 दिनांक 30, सितम्बर, 2010 विज्ञप्ति उत्तराखण्ड अधीनस्थ शिक्षा (प्रशिक्षित स्नातक श्रेणी) सेवा में सहायक अध्यापक/अध्यापिका के पदों एवं जमा करने की अन्तिम तिथि 05 नवम्बर 2010 के सायं 5 बजे तक है। आवेदन पत्र मात्र पंजीकृत डाक से सचिव, उत्तराखण्ड प्राविधिक शिक्षा परिषद् रूड़की (हरिद्वार), पिन कोड-247 667 के पते पर ही भेजा जाना है। पूरी जानकारी के लिए देखे-http://gov.ua.nic.in/schooleducation/Announcement/vigyapan%20LT%2070%25.pdf

Friday, 8 October 2010

दुनिया की नामचीन हस्तियों में शुमार आचार्य बालकृष्ण

हरिद्वार योग और आयुर्वेद में प्रसिद्धि की पताका फहराने वाले पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण को दुनिया की नामचीन हस्तियों की सूची में शुमार किया गया है। अमेरिका की बहुचर्चित पत्रिका हू-इज-हू बॉयोग्राफी ने आचार्य बालकृष्ण को योग और आयुर्वेद में बेहतर काम करने के लिए चुना है। हू-इज-हू पत्रिका अपने 29वें संकलन में आचार्य बालकृष्ण की पूरी बॉयोग्राफी प्रकाशित करेगी। पूरी दुनिया के करीब 215 देशों की जानी-मनी हस्तियों की जीवनी से सजी से किताब नवम्बर में प्रकाशित होगी। बेहद शांत स्वभाव और काम के प्रति गंभीर व्यक्तित्व के धनी आचार्य बालकृष्ण की प्रतिभा का लोहा दुनिया मानने लगी है। योग गुरु बाबा रामदेव के सबसे करीबी आचार्य बालकृष्ण को योग और आयुर्वेद पर अनूठा काम करने के लिए अमेरिका की हू-इज-हू मैगजीन ने वर्ष 2010-11 के अंक के लिए चुना है। हू-इज-हू मैगजीन के लिए कला, विज्ञान, बिजनेस, स्वास्थ्य आदि क्षेत्र में असाधारण कार्य करने वाली शख्सियतों का चयन करने वाली निर्णायक मंडली ने आचार्य बालकृष्ण को आयुर्वेद में उनके प्रयासों और मेहनत को आधार बनाया है। पत्रिका नवम्बर में प्रकाशित की जाएगी। 345 डॉलर की इस वार्षिक पत्रिका को अमेरिका के साथ-साथ दुनियाभर में सर्कुलेट किया जाएगा। हू-इज-हू में चयनित होने पर आचार्य बालकृष्ण ने बताया कि इस सफलता का सारा श्रेय उनके मिशन के साथ जुड़े हजारों लोगों को जाता है। उन्होंने बताया कि वे कर्म को ही प्रधान मानते हैं। पूरी दुनिया में योग और आयुर्वेद का प्रचार हो रहा है। एक बार फिर भारत विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर है। ये है हू-इज-हू हरिद्वार: अमेरिका की जानी-मानी वार्षिक पत्रिका हू-इज-हू पूरे विश्व से कला, स्वास्थ्य और विज्ञान में अनूठा कार्य करने वाले लोगों की बॉयोग्राफी प्रकाशित करती है।

संस्कृति से जुड़े हैं परंपरागत जलस्रोत

नौलों में दिखती है आस्था, संस्कृति व परंपरा की जीवंतता नवीन बिष्ट, अल्मोड़ा: जल, वायु, अग्नि में जीवन निहित है। आदिकाल से ही मानव तीनों जीवनदायिनी तत्वों का पूजक रहा है। हमारी संस्कृति से परंपरागत जलस्रोतों के संरक्षण, संवद्र्धन से गहरा रिश्ता है। संस्कृति के साथ ही जलस्रोतों का संरक्षण, संवद्र्धन आज तक अनवरत चल रहा है। जल ही जीवन है की उक्ति को लेकर आदिमानव से ही चिंतन की शुरूआत हुई थी। इस बात को अनेक शोधकर्ताओं ने अपने शोध पत्रों में उल्लिखित किया है। पर्वतीय क्षेत्रों में जब मानव विकास की दिशा में कदम रख रहा था तो सबसे पहले उसने ऐसे स्थानों में अपना आवास या आश्रय बनाया जहां जल था। इस विषय पर पुरातत्ववेत्ता डा.चन्द्र सिंह चौहान ने अपने शोध में परंपरागत जलस्रोत व संस्कृति विषय पर हर पहलू को छुआ है। उनका कहना है कि साधारणतया जल व्यवस्था प्रकृति द्वारा संचालित है। नदी, नाले, जलस्रोतों की स्थिति को देखकर मानव ने अपनी बस्तियां बसाई। जहां-जहां जलस्रोत सूखते गए बस्तियां भी जलस्रोतों के साथ वीरान हो गई। प्राचीनकाल से ही मानव ने प्राकृतिक जल प्रणाली में परिवर्तन के प्रयास किए। डा.चौहान ने गंगा के उद्गम पर भगीरथ का भी उल्लेख किया है। अपने शोध पत्र में देवल शिलालेख में पीलीभीत के छिन्दवंशी राजा लल्ल द्वारा कठ नदी के जल को अपनी राजधानी तक मिट्टी के पाइपों द्वारा पहुंचाने का जिक्र किया है। इसके अतिरिक्त गढ़वाल में चांदपुर गढ़ी, कुमाऊं में चंपावत के लोहाघाट के पास चौमेल, दौनकोट, पिथौरागढ़ में दुगईआगर, अल्मोड़ा के कुंवाली नैणी में भी मिट्टी के पाइप मिले हैं। उनका कहना है कि मध्यकाल से लेकर कुमाऊं में अंग्रेजों के हस्तक्षेप से पूर्व पर्वतीय क्षेत्र में जल के उपयोग के लिए अनेक व्यवस्थाएं थी। जिसमें संचय के लिए नौलों की तकनीकी पर्वतीय क्षेत्रों में ही देखने को मुख्यत: मिलती है। पर्वतीय क्षेत्रों में नदी, घाटी, नालों, गधेरों को छोड़कर संभवत: ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में जब मानव ने बसना शुरू किया तो शुद्ध जल संचय के लिए छोटे-छोटे चुपटौले बनाए गए होंगे। मध्य घाटी में जहां पानी नहीं मिलता होगा चुपटौलों का ही उपयोग किया होगा। लंबे समय तक यह प्रक्रिया चलने के बाद विकास के साथ नौलों का विकास यहां तक हुआ कि उसमें आस्था, कला, संस्कृति व परंपराओं का अनूठे दर्शन देखने को मिलते हैं। हालांकि आज नौलों की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। पानी के संरक्षण के लिए चाल, खाल व खंती की परंपरा नई नहीं है, बल्कि आदिमानव द्वारा खोजी गई विधि है। जो आज के वैज्ञानिक युग में पहले से ज्यादा महत्व रख रही है। प्राचीनकाल से आधुनिककाल तक पर्वतीय क्षेत्र में विभिन्न राजवंशों ने शासन किया। प्राकृतिक जलस्रोतों, नौलों, धारों के संरक्षण को लेकर राजशाही के दौरान सैकड़ों ताम्र पत्र आज भी जल के संरक्षण के प्रति चिंता व जागरूकता को प्रदर्शित करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं जल के संरक्षण, संवद्र्धन के साथ संस्कृति का गहरा रिश्ता है।

-पौड़ी की रामलीला पहुंची यूनेस्को

पौड़ी गढ़वाल,\ संस्कृति नगरी के तौर पर जानी जाने वाली पौड़ी ने रंगमंचीय स्तर पर एक और मुकाम हासिल कर लिया है। पौड़ी की 112 वर्ष पुरानी रामलीला अब यूनेस्को में पहुंच गई है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला मंच ने रामलीला को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में स्थान देकर इसे पुरातात्विक धरोहर घोषित किया गया है। 112 वर्ष पूर्व पौड़ी में रामलीला शुरू की गई थी, तब आज जैसी बिजली व अन्य तकनीकी सुविधाएं मौजूद नहीं थीं। ग्रामीण छिलके जलाकर रामलीला देखा करते थे। उस समय चंद लोगों की पहल पर शुरू हुआ यह आयोजन अब विस्तृत रूप ले चुका है। आधुनिक तकनीक, विद्युत प्रकाश व अन्य सुविधाएं उपलब्ध हो गई हैं, लेकिन स्वरूप आज भी वही पुराना है। अंतर है तो बस इतना कि अब महिला पात्रों की भूमिकाएं महिलाएं ही निभाती हैं। पौड़ीवासियों में हर वर्ष होने वाले रामलीला आयोजन को लेकर उत्साह देखते ही बनता है। महीनों पहले से लोग आयोजन की तैयारियों में जुट जाते हैं। रामलीला से जुड़े कुछ कलाकारों ने अपनी अभिनय क्षमता की ऐसी छाप छोड़ी कि आज भी वे अपने पात्रों के नाम से ही जाने जाते हैं। एजेंसी मोहल्ले में राशन की दुकान चलाने वाले श्रीधर ऐसे ही शख्स थे। रावण की भूमिका में उन्होंने ऐसा जीवंत अभिनय किया कि उनका नाम ही रावण लाला पड़ गया। वह जब तक जीवित रहे, लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते रहे। यहां यह भी बता दें कि पौड़ी की रामलीला अन्य जगहों की अपेक्षा खास है। यहां शास्त्रीय रागों पर आधारित गेय शैली में लीला आयोजित होती है। विशेषत: रागदेश, राग विहाग, जैजवंती, मालकोश, जौनपुरी, आशावरी, बागेश्री, रागदरबारी आदि शामिल हैं। रामलीला समिति से लंबे समय जुड़े उमाचरण बड़थ्वाल, अरविंद मुदगिल बताते हैं कि वरिष्ठ रंगकर्मी व कमेटी अध्यक्ष हरीश रावत के नेतृत्व में वर्ष 2008 में 40 सदस्यों ने इंदिरा गांधी कला केंद्र नई दिल्ली में मंचन किया था। इसके बाद केंद्र ने पौड़ी की रामलीला को संग्रहालय में स्थान तो दिया ही, इसे यूनेस्को में भी भेजा। अब यूनेस्को इसे धरोहर के रूप में संग्रहीत कर रही है। इस वर्ष आठ अक्टूबर से शुरू हो रही रामलीला के दौरान इंदिरा गांधी केंद्र समेत यूनेस्को के अधिकारी भी पहुंच रहे हैं। वे यहां रामलीला का रेकार्ड तैयार करेंगे। रामलीला कमेटी के अध्यक्ष हरीश रावत बताते हैं कि वे रामलीला मंचन को और अधिक आकर्षक बनाना चाहते हैं, लेकिन धन की कमी इसमें बड़ा रोड़ा है।

Friday, 1 October 2010

एलटी शिक्षकों की भर्ती

एलटी शिक्षकों की भर्ती परीक्षा यूटीयू के हवाले करीब 1500 एलटी शिक्षकों की होनी है भर्ती Pahar1- एलटी शिक्षकों की भर्ती परीक्षा का जिम्मा उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय को सौंपा गया है। विद्यालयी शिक्षा विभाग ने मंगलवार को इसका जीओ जारी कर दिया। परीक्षा कराने और रिजल्ट जारी करने की सारी प्रक्रिया अगले तीन महीने में पूरी की जानी है। विवि के अधिकारी इस जीओ से अनभिज्ञ हैं। विद्यालयी शिक्षा विभाग में एलटी की करीब 1400 वैकेंसी है। उच्चीकरण से भी काफी पद रिक्त हुए हैं। इन पदों के साथ ही राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा मिशन और शिक्षा का अधिकार कानून के तहत और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए करीब 1700 पदों के लिए भर्ती परीक्षा कराने का निर्णय हुआ है। इन्हीं के साथ 5 प्रतिशत वे पद भी शामिल किए जाएंगे जो सीधी परीक्षा से भरे जाने हैं। सचिव विद्यालयी शिक्षा, मनीषा पवार के मुताबिक शनिवार को हुई बैठक में मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से एलटी भर्ती प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया। इसके लिए परीक्षा एजेंसी तकनीकी विश्वविद्यालय को बनाए जाने को कहा। इसी को ध्यान में रखते हुए मंगलवार को जीओ जारी कर दिया गया। 30 सितंबर से पहले हर हाल में इसकी विज्ञप्ति जारी होनी है। अगले तीन महीने में विवि परीक्षा कराकर रिजल्ट देगा। दूसरी ओर, तकनीकी विवि के अधिकारियों को विद्यालयी शिक्षा विभाग के इस जीओ की जानकारी तक नहीं। कुलपति प्रो. दुर्ग सिंह चौहान का कहना है कि इस बारे में विवि से कोई राय-मशविरा भी नहीं हुआ। अक्तूबर में विवि के सेमेस्टर एग्जाम हैं। नवंबर में दीक्षांत समारोह कराना है। ऐसे में भर्ती परीक्षा कराना सहज नहीं लगता।