Thursday, 20 January 2011

बागबां ने बचा ली विरासत

चम्बा(टिहरी)-'बागबांÓ के जुनून ने नाउम्मीदी के रेगिस्तान को नखलिस्तान में बदल दिया। बीते चालीस साल से इस गुलिस्तां ने कभी 'पतझड़Ó नहीं देखा। टिहरी जिले के चम्बा ब्लाक के गांव सिलकोटी ने अपने उजड़े चमन को गुलजार कर दिया। आज छह वर्ग किलोमीटर में फैले बांज, बुरांश और काफल के वृक्षों पर सिलकोटी के लोगों को नाज है । इसके लिए उन्होंने न सरकार का मुंह ताका और न ही स्वयं सेवी संस्थाओं का। बस वक्त की नजाकत को समझ पौधे रोपे और बच्चों की तरह उनका पालन किया। ये पौधे अब 'जवानÓ हो चुके हैं। पसीने से सींची 'बगियाÓ की देखरेख के लिए एक वन सेवक भी रखा गया है। जिसे वेतन के रूप में हर परिवार अनाज और पैसे देता है। पर्यावरण पर बौद्धिक चिंतन हो रहा है। सरकार चिंतित है, करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा जा रहे हैं। सेमिनार, गोष्ठी और रैलियों में गूंज रहे नारों के बावजूद फाइलें भले मोटी हो रही हैं, लेकिन जमीन पर जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं। इन हालात में सिलकोटी के 750 लोगों का यह प्रयास आस के दीपक को जलाए रखने की कहानी है। वर्ष 1970 में जब जंगल के अनियोजित दोहन से जिंदगी की गाड़ी पटरी से उतरने लगी तो ग्रामीणों को अहसास हुआ कि वे क्या खो रहे हैं। फिर क्या था शुरू हो गई चमन की बेनूरी को लौटाने की कोशिश। ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि स्वयं अपनी तकदीर लिखेंगे। इसके बाद गांव वालों ने जंगल में न केवल बांज, बुरांश और काफल जैसे वृक्षों के पौधे रोपे, बल्कि उनका पालन-पोषण भी अपने बच्चों की तरह किया। तय किया कि अब जंगल में कटान नहीं होगा। शुरुआत में देखभाल के लिए दो वन सेवक भी रखे गये। जिन्हें मानदेय के रूप में प्रति परिवार कुछ धनराशि और अनाज दिया गया। हालांकि अब एक ही वनसेवक है। नतीजा सामने है। आज छह वर्ग किलोमीटर में शानदार वन लहलहा रहा है। गांव में पानी के स्रोत बढ़ गए हैं। जंगल में कटान की बजाए गांव वाले ईंधन के लिए सूखी या गिरी हुई लकडिय़ां चुनते हैं। घास व चारापत्ती भी इसी तरीके से लिया जाता है। गांव की प्रधान बंसती पुण्डीर का कहना है कि बुजुर्गों की परंपरा और समुदाय की भागीदारी के कारण यह संभव हुआ है। गर्मियों में फायर सीजन में ग्रामीण चौकन्ने हो जाते हैं आग लगने पर खुद आग बुझाने दौड़ पड़ते हैं। ::::

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