Sunday, 30 January 2011

कपिल ऋषि की तपोस्थली गुमनाम

-ऐतिहासिक विरासतें विलुप्त होने के कगार पर -13वीं सदी में कत्यूरी शासकों ने कराया था भव्य मंदिर का निर्माण -मंदिर के पत्थरों में बनीं हैं देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियां नैनीताल: देवभूमि उत्तराखंड में आज भी असंख्य ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल उपेक्षित पड़े हैं। संरक्षण एवं देखरेख के अभाव में कई ऐतिहासिक विरासतें विलुप्त होने के कगार पर जा पहुंची हैं। मंडल मुख्यालय नैनीताल से करीब 60 किमी . की दूरी पर स्थित ऐसा ही बेहद प्राचीन ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल है कपिलेश्वर महोदव। कभी कपिल ऋषि की तपोस्थली रहा यह प्राचीन स्थल आज उपेक्षा का दंश झेल रहा है। कपिलेश्वर महादेव नैनीताल जिले के रामगढ़ विकास खंड के मौना गांव के समीप अल्मोड़ा व नैनीताल जिले की सीमा पर कुमियां व शकुनी नदियों के संगम पर स्थित है। कहा जाता है कि हिमालय की कंदराओं में तपस्या करने वाले कपिल ऋषि ने यहां भी तपस्या की थी। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार 13वीं शताब्दी में कत्यूरी शासकों ने इस स्थल पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जो आज कपिलेश्वर महोदव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। विशालकाय पत्थरों को सुंदर ढंग से तराश कर बनाए गए इस भव्य मंदिर की स्थापत्य कला बेजोड़ है। मंदिर के विशालकाय पत्थरों में देवी-देवताओं की आकर्षक मूर्तियां खुदीं हैं। मंदिर की ऊंचाई लगभग 37 फीट है। हाल ही में इस ऐतिहासिक मंदिर का सर्वेक्षण करने वाले कुमाऊं विवि के पूर्व इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो.अजय रावत के अनुसार प्राचीन मंदिर के चारों ओर भग्न मंदिरों के अवशेष विद्यमान हैं, जिससे स्पष्टï होता है कि यहां प्राचीन काल में और भी कई मंदिर रहे होंगे। प्रो.रावत के मुताबिक कपिलेश्वर मंदिर का वाह्य स्वरूप दोनों ओर अलंकृत रथिका वाला है, जिन पर पाश्र्व देवी-देवताओं की आकर्षक मूर्तियां विद्यमान हैं। इनमें चतुर्भुजा, महिषासुर मर्दिनी, द्विभुज लकुलीश (भगवान शिव) और चतुर्भुज गणेश भगवान की मूर्तियां उत्तर-पूर्व तथा दक्षिण की ओर विराजमान हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपरी हिस्से में लगे पत्थरों में सूरसेन की मूर्ति अलंकृत है और उसके ऊपर त्रिमुखी शिव विराजमान हैं। मंदिर के दरवाजे की चौखट में नाना प्रकार के फूलों की सुंदर आकृतियां भी खुदी हैं। उसके ऊपरी हिस्से में परिचारकों सहित मकर वाहिनी गंगा और कूर्म (कछुवे) पर सवार युमना (देवी) भी चित्रित है। देखरेख के अभाव में प्राचीन स्थापत्य कला की यह बेजोड़ कलाकृतियां धीरे-धीरे नष्टï होते जा रही हैं। मंदिर के उत्तरांग में राहु व केतु को छोड़कर अन्य सभी ग्रहों का उल्लेख मिलता है। मंदिर की शिलाओं में सूर्यमुखी फूल पकड़े सूर्य ग्रह भी विराजमान हैं। कपिलेश्वर मंदिर के पास ही काल भैरव का भी मंदिर है। शिवरात्रि को लगता है मेला नैनीताल: कपिलेश्वर धाम में हर साल शिवरात्रि को मेला लगता है। जिसमें आसपास के करीब दो दर्जन से भी अधिक गांवों से ग्रामीण पहुंचते हैं। कुमियां व शकुनी नदी के संगम पर स्नान करने के बाद श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। शिवरात्रि को यहां भंडारे का आयोजन होता है। इतिहासकार प्रो.अजय रावत के मुताबिक इस स्थल को जागेश्वर की भांति एतिहासिक एवं धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।

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