Thursday, June 9, 2011

तो खैरालिंग में बंद होगी पशुबलि

पौड़ी गढ़वाल, : देर से ही सही, लेकिन पहाड़ के लोग भी समझने लगे हैं कि निरीह पशुओं की मंदिर में बलि देकर उनका भला होने वाला नहीं है। यही कारण है कि ऐतिहासिक खैरालिंग में पिछले कुछ सालों में तेजी से पशु बलि का ग्राफ घटा है। लोग भी समझने लगे हैं कि पशु बलि के बजाय फूल व दूध का चढ़ावा देकर भी भगवान को खुश किया जा सकता है। वर्ष 2005 में पशु बलि के तीव्र विरोध के बाद से यहां होने वाली पशु बलि काफी कम हो चुकी हैं। पौड़ी के करीब ब्लाक कल्जीखाल की पट्टी असवालस्यूं के ऐतिहासिक खैरालिंग (मुंडनेश्वर) मेले में निरीह पशुओं की बलि की वर्षो पुरानी परंपरा है। बताते चलें कि मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव का लिंग स्थापित है और इसके प्रवेश द्वार पर काली की एक प्रतिमा स्थापित है। इसे महिषासुर मर्दिनी के रूप में पूजा जाता है। लोग सालों से काली को खुश करने के लिए नर भैंसे व बकरों की बलि देते आए हैं। लोगों का विश्वास है कि यहां बलि देने से नव ग्रहों की शांति होती है। सालों से इसी विश्वास को मानते हुए कल्जीखाल ब्लाक की 86 ग्राम सभाओं व आस-पास की पट्टियों के सैकड़ों गांवों के साथ ही इन क्षेत्रों से दिल्ली, मुंबई समेत अन्य शहरों में बसे अप्रवासी भी मेले पर गांव में आकर बलि देते हैं। एक समय ऐसा भी था, कि जब इस मंदिर में दो दर्जन नर भैंसों व सैकड़ों बकरों की बलि दी जाती थी। गौरतलब है कि वर्ष 2005 में यहां बलि रोकने की दिशा में प्रशासन ने काफी प्रयास किए और तब बलि विरोधी संस्थाओं और ग्रामीणों के बीच तीखी झड़प हुई थी। ग्रामीणों ने इसके विरोध में तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक दर्शन लाल चित्रांण को लोगों ने बंधक बना लिया और पुलिस का एक वाहन भी जला दिया। हालांकि इसके बाद से लोगों में तेजी से बदलाव आया है। वर्तमान में यहां हर साल एक या दो नर भैंसों की ही बलि होती है। उम्मीद है कि इस साल 8 व 9 जून को होने वाले मेले में बलि समाप्त भी हो सकती है। गांव के लोग अब दूध और फूल से ही देवी की पूजा करेंगे ऐसा ग्राम सभाओं की बैठकों में भी तय किया गया। हालांकि बताया जा रहा है कि इस साल भी खैरालिंग में एक नर भैंसे की बलि देने के लिए बरेली से एक प्रवासी परिवार पहुंच रहा है। ग्राम सूला के इस परिवार को फिलहाल ग्रामीणों की ओर से समझाया जा रहा है। 'क्षेत्र की ग्राम सभाओं व जन प्रतिनिधियों की बैठक हो चुकी है। ग्रामीण बलि बंद करने के लिए तैयार हैं। अब यह मेला विकास मेले के रूप में आयोजित किया जाएगा। दिलीप जावलकर, जिलाधिकारी पौड़ी। खैरालिंग में बलि बंद करने को ग्रामीण स्वयं ही वातावरण तैयार कर रहे हैं, लेकिन बाहर से आने वाली संस्थाएं लोगों को कानून की धौंस देते हैं और ऐसे में ग्रामीण इसे प्रतिष्ठा का विषय मानकर जबरन मंदिर में बलि देते हैं। संस्थाओं की श्रेय पाने की होड़ बंद होनी चाहिए। सुरेश चन्द्र सिंह नेगी, अध्यक्ष मुंडनेश्वर मेला समिति, पौड़ी। इनसेट- वर्ष पशुबलि 2007 - 03 2008 - 02 2009 - 01 2010 - 01

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