Tuesday, June 7, 2011

शहरों में पढ़ाते नहीं गुरुजी!

गुरु जी को नौकरी घर के नजदीक चाहिए, पर पढ़ाई का लोड उठाने को कतई नहीं हैं तैयार। दायित्वबोध तो जैसे भूल ही गए हैं। शहरी इलाकों के गुरुजी शायद, यही सोच नौकरी बजा रहे हैं कि उनकी तो एप्रोच है, पढ़ाई से उन्हें क्या लेना-देना। चौंकिए नहीं जनाब! यही सच है और इसे बयां कर रहा है उत्तराखंड बोर्ड का रिजल्ट। शहरी इलाकों के स्कूल मेरिट में बस, नाम दर्ज करा सके, इसके उलट पहाड़ी इलाकों का खूब जलवा रहा। टाप टेन में ये भारी पड़े। इंटरमीडिएट और हाईस्कूल की मेरिट लिस्ट बुद्धिजीवियों को यह सोचने को विवश कर रही है कि शहरों में क्या मास्साब पढ़ा नहीं रहे हैं। अगर, यह सही नहीं तो फिर यहां से टेलेंट क्यों उभर कर सामने नहीं आ रहा। शहरी इलाकों के स्कूल मेरिट और ओवरआल परफारमेंस के इस मोर्चे पर फिसड्डी साबित हुए हैं। वह भी तब जबकि इन इलाकों में न केवल मानव संसाधन सरप्लस हैं, बल्कि दूसरी बुनियादी सुविधाओं के टोटे जैसे हालात भी नहीं हैं। मेरिट में उन स्कूलों ने बाजी मारी, जहां विषय शिक्षक न होने के कारण एक ही टीचर दो-तीन विषयों की पढ़ाई करवा रहे हैं। बोर्ड परीक्षाओं में पौड़ी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, चमोली और अल्मोड़ा उम्मीदों से बढ़कर परफार्म ही नहीं किया, बल्कि शहरों को आइना दिखाया है। राजधानी देहरादून, जिसे कि एजुकेशन हब के नाम से जाना जाता है, हाईस्कूल की मेरिट में टाप टेन में जगह तक नहीं बना पाया। इंटर के 62 मेधावी बच्चों में बामुश्किल एक स्थान बना पाया। हरिद्वार भी इसी राह पर चला। यह हालात तब हैं जब सरकार की इन पर चौबीसों घंटे नजर टिकी है। उसकी नाक के नीचे चल रहे इन स्कूलों में वैल क्वालीफाइड स्टाफ है, टीचर मानक से ज्यादा हैं, छात्र-शिक्षक अनुपात भी आदर्श, सुविधाओं में बाकी को मात दे रहे और इलाका भी अति सुगम। फिर भी रिजल्ट देखकर सिर चकराए तो इसे क्या कहेंगे..। परफारमेंस के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि सरकारी स्कूलों के गुरुजी कुछ ज्यादा ही आरामतलब होते जा रहे हैं। कुल संख्या के तीन चौथाई शिक्षक पूरे साल गांवों से शहरों में आने के लिए दांव-पेच भिड़ाते हैं। मकसद, उनका इतना भर कि नौकरी बजाने में जरा भी तकलीफ न हो। इसके लिए उन्होंने एप्रोच को बना रहे हैं हथियार। पहले गांव से शहर आ के लिए और फिर आराम से नौकरी बजाने में एप्रोच का गुरु जी बड़ी ही चतुराई से इस्तेमाल करने लगे हैं। टोका टोकी की भी जल्दी से किसी की हिम्मत नहीं होती, फिर क्या गुरुजी की तो मौज ही मौज.. । ऐसे में बेचारे बच्चों का क्या होगा, इससे गुरुजी को जैसे कोई खास सरोकार ही नहीं।

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