Friday, 27 August 2010
उत्तराखंड के सपनों में रंग भर रहा रैथल गांव
- गांव की तस्वीर ऐसी कि शहर भी रश्क कर उठें
- यहां रह रहे 200 परिवारों के मन में भी नहीं पलायन की बात भी नहीं आती
गांधी का भारत गांव में बसता था, गांवों का कायाकल्प ही उनका सपना था। पर हालात बड़ी तेजी से करवट ले रहे हैं। तमाम कारणों से गांव वजूद खोने लगे हैं। उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं है। यहां तो गांवों से पलायन को आंतरिक सुरक्षा के खतरे के रूप में देखा जाने लगा है। भले ही सूबे की ओवरऑल तस्वीर चिंता की लकीरें खींच रही हो, लेकिन यहां ऐसा भी एक गांव है जो बापू के सपने में रंग भर रहा है। वह भी सिर्फ ' मिनी सरकार यानी पंचायत के बूते। यह गांव है सीमांत जनपद उत्तरकाशी के दुरूह इलाके का रैथल। रैथल की तस्वीर सचमुच ऐसी है कि शायद शहर भी रश्क कर उठें।
दरअसल, गांवों में एक तो अभी तक विकास की 'सड़क नहीं पहुंच पाई। दूसरा शहर की ओर जाने वाली सड़कों पर शुरू हुई आधुनिकता की अंधी दौड़ गांवों से लोगों को बाहर निकाल रही है। आलम यह कि पहाड़ों में तो गांव खाली होते जा रहे हैं। कारण तमाम गिनाए जाते हैं, लेकिन रैथल गांव अलग ही कहानी बयां करता है।
इस गांव में बिछी सीवर लाइन, टाइल्स बिछी चमचमाती गलियां और जगमगाती स्ट्रीट लाइट देख लगता ही नहीं कि आप उत्तराखंड के किसी गांव में हैं। यह सब इंगित कर रहा है कि आचार-व्यवहार से भ्रष्टाचार दूर हो जाए तो लोक का तंत्र ही सच्चे अर्थ में तस्वीर बदल सकता है।
उत्तरकाशी मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर और समुद्रतल से 1800 मीटर की ऊंचाई पर बसे रैथल गांव से अभी तक न तो कोई मंत्री बना और न ही विधायक। इस गांव की तस्वीर लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई ग्राम सभा और ग्रामीणों ने खुद ही बदल डाली। शहर जैसी सुविधाओं से सम्पन्न रैथल गांव भटवाड़ी ब्लाक मुख्यालय से दस किमी दूर है और प्रसिद्ध दयारा बुग्याल (अल्पाइन ग्रास) पहुंचने के लिए सड़क मार्ग का अंतिम पड़ाव पर है। यहीं से द्यारा के लिए आठ किमी का पैदल मार्ग शुरू होता है। रैथल गांव चमचमाती पक्की सड़क से जुड़ा है। मुख्यमार्ग से ही गांव में प्रवेश के लिए कई रास्ते हैं। गांव में जिस गली से भी प्रवेश करो वह सीसी या फिर टाइल्स से बनी है। साफ सुथरी गलियों से ही ग्रामीणों का सफाई को लेकर जागरूकता का अंदाज लगाया जा सका है। गांव में बिजली की दो लाइनें हैं। एक विद्युत विभाग की तो दूसरी पर्यटन विभाग की स्ट्रीट लाइट वाली लाइन। पहाड़ के हर गांव की तरह रैथल गांव भी सीढ़ीनुमा है। गांव के बीचोंबीच भड़ (वीर ) राणा घमेरू का चार सौ नब्बे साल पुराना लकड़ी का बना पांच मंजिला मकान आज भी खड़ा है। लगभग दो सौ परिवारों वाला यह गांव उत्तराखंड का शायद पहला गांव होगा, जहां एक भी परिवार ने पलायन नहीं किया। सेब, आलू, राजमा और गेहूं यहां की मुख्य फसल है। गांव के बीचोंबीच लाखों की लागत से बना शानदार कम्युनिटी हाल और अत्याधुनिक सार्वजनिक शौचालय गांव की समृद्धि की कहानी बयां करता है। रैथल के ग्रामीणों की सादगी तो देखिए यदि वे गांव की सुख सुविधाएं भोगते हैं तो बरसात के मौसम में दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित गुई और दयारा की छानियों (घास से बनी झोपडिय़ां) में भी यह लोग अपने जानवरों के साथ रहते हैं। रैथल के विकास की कहानी यहीं समाप्त नहीं हो जाती है। गांव में गढ़वाल मंडल विकास निगम का गेस्ट हाउस है तो हेलीपैड और स्टेडियम निर्माण प्रक्रिया में है।
18 साल तक गांव के प्रधान और साढ़े नौ साल तक ब्लाक प्रमुख रहे चंद्र सिंह राणा का कहना है कि पर्यटन के नक्शे पर लाने के लिए अभी बहुत किया जाना बाकी है।
गांवों की तस्वीर भयावह
देहरादून: उत्तराखंड में गांवों के खाली होने की तस्वीर पर नजर डालें तो काफी भयावह है। अर्थ एवं संख्या विभाग के वर्ष 2001 के आंकड़ों के अनुसार राज्य तेरह से में नौ जिलों मेंं कुल 59 गांव जन शून्य हो गए। उत्तरकाशी के दो, चमोली के सात, टिहरी के नौ, पौड़ी के बीस, रुद्रप्रयाग के दो, पिथौरागढ़ के आठ, अल्मोड़ा के नौ, बागेश्वर और चंपावत के एक-एक गांव जनशून्य हो चुके हैं। रूद्रप्रयाग जनपद के नए आंकड़ों के मुताबिक जन शून्य होने वाले गांवों की संख्या अब 26 पहुंच गई है।
Wednesday, 25 August 2010
देवीधुरा के पत्थर युद्ध में साक्षी बने एक लाख से अधिक लोग
-पत्थर युद्ध में 150 रणबांकुरे घायल
-मां बाराही के जयकारे के साथ जमकर चले पत्थर
लोहाघाट (चंपावत),-: मिसाइल युग में पत्थर युद्ध के लिए विश्वविख्यात ऐतिहासिक देवीधुरा का बग्वाल मेला देखने के लिए देश-विदेश से करीब एक लाख से अधिक लोग पहुंचे। 13 मिनट चले पत्थर युद्ध में करीब 150 से अधिक योद्धा घायल हुए तथा दर्शक दीर्घा में पत्थर आने के कारण एक दर्जन से अधिक दर्शक भी चोटिल हुए। परंपरा के मुताबिक मंदिर की गुफा में स्थित शक्ति की परिक्रमा व पूजा अर्चना के बाद दूबचौड़ मैदान की पांच बार परिक्रमा पूरी कर रण बांकुरे पत्थर युद्ध के लिए तैयार हुए।
ढोल नगाड़ों के बीच बग्वाल खेलने आए जत्थों के पीछे महिलाओं ने भी बढ़-चढ़ कर सहभागिता करते हुए देव स्तुति व वीर रस एवं श्रंृगार रस पर आधारित गीता का गायन करते हुए बग्वाल खेलने वाले योद्धाओं का उत्साहवर्धन किया। इस बार सबसे पहले वालिक खाम (उपगांव) बद्री सिंह बिष्ट के नेतृत्व में मैदान में पहुंचा। उसके बाद लमगडिय़ा खाम वीरेन्द्र सिंह व लक्ष्मण सिंह लमगडिय़ा के नेतृत्व में चमयाल खाम, फिर गंगा सिंह चम्याल व गिरीश सिंगवाल के नेतृत्व में और अंत में त्रिलोक सिंह बिष्टï के नेतृत्व में गहड़वाल खाम के लोग पूरे जोश खरोश के साथ मैदान में पहुंचे। चारों खामों द्वारा अपने-अपने स्थानों पर मोर्चा जमाने के बाद अपराह्नï 2:51 बजे मंदिर से पुजारी के शंखनाद के साथ ही ऐतिहासिक बग्वाल शुरू हो गया। देखते ही देखते मैदान में चारों ओर से पत्थरों की बौछार होने लगी।
दो दलों में विभक्त बग्वाल खेलने वाले रणबांकुरों के पत्थर आसमान में इस तरह दिख रहे थे मानो कोई पुष्प वर्षा हो रही हो। 3 बजकर 04 मिनट पर पुजारी धर्मानन्द ने बग्वाल रोकने की घोषणा की लेकिन रणबांकुरों में इतना उत्साह था कि युद्ध विराम की घोषणा के बाद भी 3 मिनट तक बग्वाल चलता रहा। पत्थर युद्ध में लगभग 150 लोग घायल हुए। घायलों के सिर, हाथ, पांव खून से लथपथ थे, लेकिन उनके चेहरों पर दर्द के कोई भाव नहीं दिख रहे थे। दर्शक दीर्घा में बैठे एक दर्जन से अधिक लोग भी पत्थर लग जाने से घायल हुए। बग्वाल खत्म होने के बाद चारों खामों के लोग आपस में गले मिले। एक-दूसरे की कुशल पूछी और मां बाराही की जय-जयकार की। इस वर्ष बग्वाल में चम्याल और गहड़वाल खाम के सबसे अधिक लोग घायल हुए। विपरीत मौसम के बावजूद देश-विदेश के कोने-कोने से आज लगभग एक लाख से अधिक लोग यहां पहुंचे हुए थे।
प्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश तिवारी गिर्दा नहीं रहे
- उपचार के दौरान एसटीएच में हुआ निधन
- जनकवि के रूप में भी थे विख्यात
हल्द्वानी:प्रसिद्ध रंगकर्मी व जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा ने रविवार को सुशीला तिवारी चिकित्सालय में अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना से शोक की लहर दौड़ गयी। पिछले कई दिनों से उनकी तबीयत खराब चल रही थी।
नैनीताल में निवास कर रहे जाने-माने रंगकर्मी 67 वर्षीय गिरीश तिवारी गिर्दा को गत 20 अगस्त को पेट में तेज दर्द होने पर सुशीला तिवारी चिकित्सालय में भर्ती कराया गया था। अगले दिन पेट का सफल ऑपरेशन भी हुआ, लेकिन उनकी तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ। आज दोपहर 11 बजकर 31 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। वे अपने पीछे पत्नी हेमलता व दो बेटे प्रेम पिरम व तुहिन्नासु को छोड़ गये हैैं। उनका अंतिम संस्कार 23 अगस्त को पाइन्स श्मशान घाट नैनीताल में होगा। उनके निधन की सूचना से चारों तरफ शोक की लहर दौड़ गयी। अस्पताल में ही पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक, राजीव लोचन साह समेत रंगकर्मी, लेखक एवं शिक्षाविदों का जमावड़ा लग गया।
वर्ष 1945 में अल्मोड़ा के ज्योली गांव में माता जीवन्ती व पिता हंसा दत्त तिवारी के घर जन्मे गिरीश तिवारी को जनमानस गिर्दा उपनाम से पुकारते थे। गिर्दा बचपन से ही जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे। मेहनतकश अभावों से जूझती जिन्दगी को स्वर देने वाले गिर्दा का दर्द लोक गीतों में भी झलकता है। रंगकर्म के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले गिर्दा को युगों-युगों तक याद किया जाएगा। पर्यावरण को बचाने के लिए भी जुझारूपन से लगे रहे तथा पहाड़ के हर संघर्ष में लोगों का भरपूर साथ दिया। क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लेखों के माध्यम से उन्होंने अपने विचार व्यक्त किये। लोक गायक झूसिया दमाई पर शोध कार्य भी किया। राजीव कुमार निर्देशित फिल्म वसीयत में गिर्दा का अभिनय भी यादगार रहेगा। वर्ष 1996 में गिर्दा को उत्तराखंड लोक संस्कृति सम्मान से नवाजा गया। जनवादी लेखन के लिए भी मसूरी में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) ने उन्हें सम्मानित किया। उनके निधन पर मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी, राज्य सभा सदस्य तरुण विजय एवं परिवहन मंत्री बंशीधर भगत ने गहरा दु:ख व्यक्त किया है।
जनगीतों में हमेशा जिंदा रहेंगे जनकवि गिर्दा
फक्कड़ी की मिसाल थे गिरीश तिवारी गिर्दा
अल्मोड़ा-कवि कभी मरता नहीं है। गिर्दा बाबा नागार्जुन की फक्कड़ी परंपरा के ऐसे जनकवि थे, जिन्होंने हर दबे-कुचले, पीडि़त जन की पीड़ा को शब्द स्वर देकर उजागर किया। उत्तराखण्ड के किसी भी इलाके में किसी गरीब पर अत्याचार हो रहा हो या कहीं संघर्ष की बात हो, उसको भी मुखर स्वर देकर बेबाक जनकवि की भूमिका में सत्ता के खिलाफ सीना ताने खड़े हो जाते थे। गिरीश तिवारी गिर्दा की प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा के जीआईसी में हुई। गिर्दा ने लिखने की शुरुआत हिंदी गीत, गजल व कविताओं से की। कुमाऊंनी में लिखने की प्रेरणा उन्हें जीआईसी में उनके गुरु रहे चारु चन्द्र पांडे से मिली। चिपको आंदोलन के दौरान उनका जनगीत-आज हिमाला तुमनकैं धत्यों छ जागो-जागो ओ मेरा लाल, नि करि दी हलो हमरि निलामी, नि करि दि हलो हमरो हलाल- कुमाऊं ही नहीं पूरे उत्तराखण्ड में आंदोलनकारियों के मुंह से निकलता था। यही नहीं मौजूदा व्यवस्था में गैर बराबरी के खिलाफ उनके तेवर बहुत ही बागी रहते थे। बल्ली सिंह चीमा की कविता गिर्दा अक्सर आंदोलनों में गाते थे-ले मशाले चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के, अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के। वहीं उनकी कुमाऊंनी रचना आंदोलनकारियों को इस प्रकार शक्ति देती थी-हम ओड़, बारुडि़, ल्वार, कुल्ली कभाडि़ जै दिना य दूनिथैं हिसाब ल्यूलों। एक हांग निमांगू, एक फांग निमांगू, सारि खसरा खतौनि किताब ल्यूंलौ। राज्य आंदोलन के दौरान उत्तराखण्ड का कोई ऐसा कोना नहीं बचा, जहां गिर्दा के इस गीत के बोल न गूंजे हों-कस होलो उत्तराखण्ड कस हमार नेता, कसि होलि विकास नीति, कसि होलि व्यवस्था। यही नहीं गिर्दा की रचनाओं में जहां आग दिखाई देती है, वहीं जीवन दर्शन का फलक इतना व्यापक है कि उनकी छोटी सी कविता विश्व का फैलाव ले लेती है। प्रकृति व गांव के जनजीवन को भी उन्होंने शब्दों से ऐसे बुना कि गांव की सांझ सामने खड़ी हो गई-सावनि सांझ अकाश खुला है ओ हो रे ओ दिगोलालि, गीली है लकड़ी की गीला धुआं है, मुश्किल से आमा का चूला जला है। गिर्दा ने हमेशा आशा और विश्वास को अपने गीतों के माध्यम से बोया। बेहतर भविष्य के प्रति हमेशा आशावान रहे। यही कारण है कि उनके गीत हमेशा जीवन का संदेश देते थे।
अब कहां सुनाई देंगे गिर्दा के मधुर बोल...
-कौन करेगा खालीपन दूर, किसके साथ होगी जुगलबंदी...
नैनीताल: रंगकर्मी गिरीश तिवारी गिर्दा के अकस्मात चले जाने से कला एवं संस्कृति के पटल पर बहुत बड़ा शून्य छा गया है। उनकी रिक्तता की पूर्ति कैसे होगी, अब यहीं ज्वलंत प्रश्न जन संघर्षों से जुड़े लोगों के समक्ष उत्पन्न हो गया है। गिर्दा के बिछोह के गम से फिलवक्त कोई भी नहीं उबर सका है। अब उनके द्वारा जलाई गयी मशाल को आगे बढ़ाकर ही उनके खालीपन को दूर करने की कोशिश भर की जा सकती है।
गिर्दा के अचानक चले जाने से हर कोई स्तब्ध है। जब तक गिर्दा सभी के बीच थे, किसी ने सोचा भी न था कि उनकी विरासत को कैसे आगे बढ़ाया जाएगा। उनके चले जाने के बाद अब यही यक्ष प्रश्न जन संघर्षों तथा रंगमंच से जुड़े लोगों के सामने खड़ा हो गया है। हर कोई मानता है कि गिर्दा की कमी अब कतई पूरी नहीं की जा सकती। गिर्दा के साथ कई यात्राओं पर जाने वाले इतिहासकार डा.शेखर पाठक का भी यही मानना है कि गिर्दा के जाने से जन संघर्षों के समक्ष बहुत बड़ा शून्य छा गया है। इस शून्य को दूर करना किसी के वश में नहीं है। गिर्दा के साथ जुगलबंदी करने वाले लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी भी उन्हें इन्हीं शब्दों में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। बकौल श्री नेगी जन संघर्षों को सुर देना वाला कुमाऊं में अब गिर्दा के समकक्ष का कोई और जनकवि मुझे नजर नहीं आ रहा है।
वरिष्ठï पत्रकार एवं जन आंदोलनों में हमेशा सक्रिय रहने वाले राजीव लोचन साह गिर्दा के बारे में कहते हैं कि उन्हें मात्र जनकवि व रंगकर्मी कहकर शब्दों में सीमित नहीं किया जा सकता है। गिर्दा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, उनके खालीपन को अब दूर करना मुमकिन नहीं है। उत्तराखंड के चर्चित नशा नहीं-रोजगार दो आंदोलन समेत अन्य कई जन संघर्षों में गिर्दा के साथ रहे डा.शमशेर सिंह बिष्ट कहते हैं कि लोगों को साथ जोडऩे की जो कला उनमें थी, वह अब कहां से आएगी। प्रसिद्ध रंगकर्मी विश्वम्भर नाथ साह गिर्दा के उत्तराखंड राज्य आंदोलन मेें दिए गए अनुकरणीय योगदान की चर्चा करते हुए कहते हैं कि नैनीताल में उस आंदोलन में जिस तरह उन्होंने जान फंूकी थी, वह हर किसी के वश की बात नहीं है। गिर्दा के अन्य संगी साथी भी उनके बहुमुखी व्यक्तित्व को अब बस केवल याद करते हैं। इन्हीं यादों में उनकी आंखें भर आती हैं। हम सभी को मालूम है कि अब गिर्दा लौटकर नहीं आएंगे।
तो कह दिया अलविदा 'बबा
परम्परा को तोड़ महिलाओं ने भी दिया गिर्दा की अर्थी को कंधा
, नैनीताल: शव यात्रा 'गिर्दाÓ की थी, तो परम्पराएं टूटनी ही थी। महानायक की तरह रंगकर्मी व जनकवि को हर किसी ने अलविदा 'बबाÓ कहा। हर आंख में आंसू..हर हाथ अर्थी छूने को आतुर थे। महिलाओं ने परम्पराएं तोड़ कर न केवल उनकी अर्थी को कंधा दिया बल्कि घाट पहुंच कर उन्हें अंतिम विदाई भी दी। जनगीतों के साथ निकली उनकी अंतिम यात्रा में हर कोई एक दूसरे के कंधे पर सिर रख जार-जार रो रहा था।
यह गिरीश तिवारी 'गिर्दाÓ का मानव चुम्बकीय प्रभाव था, वह हमेशा लोगों को कुमाऊंनी शब्द 'बबाÓ कह कर पुकारते थे। सोमवार को उनकी शव यात्रा में प्रशासनिक अधिकारी, पत्रकार, रंगकर्मी, साहित्यकार, राजनेता, छात्र, न्यायाधीश, विभिन्न संगठनों के लोग, शिक्षक, महिलाएं, मजदूर तबका और सभी धर्मों के लोग शामिल थे। इससे झलक रहा था कि गिर्दा वह हस्ती थे जो कभी मिटेंगे नहीं। लग रहा था मानो उनकी शव यात्रा में नैनीताल ही नहीं, पूरा उत्तराखंड शामिल है। दिल्ली व लखनऊ से आये लोग भी शामिल थे। इस विराट व्यक्तित्व की अर्थी को हर हाथ छू लेना चाहता था। इस दौरान जो भी मार्ग में मिला वह यात्रा में शामिल हो गया और काफिला बढ़ता गया। गिर्दा की अन्तिम इच्छा थी कि उनकी शव यात्रा में उनके गीतों को अवश्य गाया जाय, साथियों ने यही किया भी। फिंजा में उनके लिखे, गाये जन मानस की पसंद बन चुके गीत 'जागो, जागो हो म्यारा लाल, म्यार हिमाल...Ó, 'हम ओड़, बारूड़ी, ल्वार, कुल्ली कबाड़ी, जता एक दिना तो आलो उ दिन य दुनि मां, एक हांग न मांगूलौ, एक पांख न मांगूलौ, सार खसरा खतौनी किताब ल्यूलौ..Ó, 'गिली है लकड़ी कि गिला धुंआ है, मुश्किल से आमा का चूल्हा जला है, साग क्या छौंका है पूरा गौं महका है...Ó जैसे गीत गूंज रहे थे। जन आंदोलनों के दौरान जब गिर्दा सड़कों में उतर कर अपने लिखे जन गीतों को गाते थे तो हजारों की भीड़ उन्हें घेर लेती थी। मगर आज वह गा नहीं रहे थे, तो भी हजारों लोग उन्हें घेरे हुए थे। हर तबका उनके साथ उसी तरह जुड़ा था जैसे जन आंदोलनों के दौरान उनके साथ लोग जुड़ जाते थे।
इस साल खो गये पहाड़ के दो लाल
नैनीताल: पहले सिने अभिनेता निर्मल पांडे और अब गिरीश तिवारी 'गिर्दाÓ दुनिया के मंच से रुखसत हो गये। पहाड़ ने इस साल दो लाल खो दिये यह क्षति कभी पूरी नहीं हो सकती। दोनों लोग मूल रूप से अल्मोड़ा जनपद के थे, लेकिन उनकी कर्मभूमि नैनीताल रही। निर्मल पांडे रंगमंच के साथ ही सिने जगत से भी जुड़े थे। उनका निधन इसी वर्ष 19 फरवरी को मुम्बई में हो गया। गिर्दा रंगमंच के अलावा प्रख्यात जनकवि भी थे। अच्छे लेखक व अच्छे वक्ता भी थे। रविवार को इस बहुआयामी व्यक्तित्व ने भी अलविदा कर दिया।
Tuesday, 27 July 2010
-शहादत देने वालों में पीछे नहीं उत्तराखंडी
-12 सौ से अधिक पदक जीत चुके हैं सूबे के जांबाज
उत्तराखंड को वीरों की भूमि यूं ही नहीं कहा जाता। लोक गीतों में यहां के शूरवीरों की जिस वीर गाथाओं का जिक्र होता है वह
अब सूबे की सीमाओं में ही न सिमट कर देश-विदेश में फैल गई हैं। हर साल यहां के औसतन दर्जन भर जवान देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान करते हैं। कारगिल युद्ध में सूबे के 75 सैनिकों ने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। ऐसा कोई पदक नहीं जो उत्तराखंड के जांबाजों ने अपने नाम न किया हो। इनकी याद में उत्तराखंड वासियों की पलकें जरूर नम होती हैं, लेकिन शहीदों की वीरगाथा से इनका सीना हमेशा फख्र से चौड़ा रहता है।
राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान के लिए उत्तराखंडी हमेशा से ही आगे रहे हैं। यहां के युवाओं में सेना में जाने का क्रेज आज भी बरकरार है। यही कारण है कि आईएमए से पास आउट होने वाला हर 12वां अधिकारी उत्तराखंड से है और भारतीय सेना का हर पांचवां जवान भी इसी वीर भूमि में जन्मा है। देश में जब भी कोई विपदा की घड़ी आई तो यहां के जवान अपने फर्ज से पीछे नहीं हटे। उन्होंने अपने सीने पर गोलियां खाकर देश की एकता और अखंडता पर कोई आंच नहीं आने दी। उन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर वतन की आन बान और शान को बरकरार रखा है। चाहे भारत-चीन युद्ध में परमवीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा का शौर्य हो या फिर हाल ही में मुंबई आतंकी हमले में शहीद हुए अशोक चक्र विजेता गजेंद्र सिंंह का अदम्य साहस। उत्तराखंड का जवान हमेशा से ही अपने फर्ज को पूरी शिद्दत के साथ निभाता रहा है। स्वतंत्रता से पूर्व यहां के कई वीर ब्रिटिश सेना के लिए भी अपनी जांबाजी दिखा चुके हैं। इसके लिए वह विक्टोरिया क्रास जैसा सम्मान भी पा चुके हैं। इनमें गबर सिंह का नाम आज भी याद किया जाता है। उनके नाम पर आज भी चंबा(टिहरी) में मेला लगाया जाता है।
पदकों की सूची
परमवीर चक्र- 1
अशोक चक्र- 04
महावीर चक्र- 10
कीर्ति चक्र- 23
वीर चक्र- 95
शौर्य चक्र- 124
उत्तम युद्ध सेवा मेडल -01
युद्ध सेवा मेडल -15
सेना, नो सेना व वायु सेना मेडल- 541
मेंशन इन डिस्पेच -115
कुल - 929
स्वतंत्रता पूर्व वीरता पदक
- विक्टोरिया क्रास - 3
- इंडियन आर्डर आफ मैरिट - 53
- मिलिट्री क्रास - 25
- इंडियन डिस्ंिटग्विस्ड सर्विस मेडल - 89
मिलिट्री मेडल - 44
मेंशन इन डिस्पेच- 150
कुल - 364
इनके अलावा यहां के अधिकारी व सैनिक परम विशिष्ट सेवा मेडल, अति विशिष्ट सेवा मेडल व विशिष्ट सेवा मेडल से भी नवाजे जा चुके हैं।
-कारगिल के शहीदों को शत-शत नमन
कारगिल युद्ध को बीते ग्यारह साल
सूबे के 75 व दून के 18 जांबाजों ने दी थी शहादत
pahar1: कारगिल युद्ध को ग्यारह साल हो चुके हैं। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने भारतीय सीमाओं में घुसपैठ कर कई इलाकों पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद भारतीय वीर जवानों ने अपने अदम्य साहस और युद्ध कौशल से इन घुसपैठियों को मार भगाया और इन इलाकों में फिर से तिरंगा लहराने लगा। कारगिल युद्ध के दौरान हजारों जवान शहीद हुए। सरकार ने ऑपरेशन विजय और शहीदों की याद में हर वर्ष 26 जुलाई को विजय दिवस मनाने का निर्णय लिया।
दून के अमर शहीद
1. मेजर विवेक गुप्ता (महावीर चक्र)
देहरादून के वसंत विहार निवासी ले. कर्नल (रिटायर्ड) बृजमोहन गुप्ता के घर 1970 में जन्मे मेजर विवेक गुप्ता 13 जून 1992 को द्वितीय राजपूताना रेजिमेंट में शामिल हुए। कारगिल में ऑपरेशन विजय के दौरान 12 जून 1999 को मेजर विवेक गुप्ता ने तोतोलिंग चोटी को पाक घुसपैठियों से मुक्त करते हुए कई आतंकवादियों को मौत के घाट उतारा। युद्ध के दौरान विवेक गंभीर रूप से घायल हो गए और मात्र 29 वर्ष की आयु में देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। इस वीरता और अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र दिया गया।
2. स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर
28 अप्रैल 1962 में ग्राम बड़ोवाला में ठाकुर राजपाल सिंह व हेमवती पुंडीर के घर इस वीर सपूत का जन्म हुआ। उन्होंने 1979 में राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी में प्रवेश कर सैन्य जीवन की शुरुआत की। शहीद पुंडीर एक बेहतरीन पायलट होने के साथ एक कुशल खिलाड़ी, गायक व संगीत प्रेमी थे। ऑपरेशन विजय के दौरान शत्रुओं की गतिविधियों की जानकारी लेने के लिए उन्होंने उड़ान भरी। वह दुश्मनों के क्षेत्र में शत्रुओं की गतिविधियों का जानकारी हासिल कर रहे थे कि पाकिस्तानी घुसपैठियों ने मिसाइल से उनके हेलीकॉप्टर पर हमला कर दिया। इस हमले में राजीव वीरगति को प्राप्त हुए।
3. नायक बृजमोहन (वीर चक्र)
देहरादून के ग्राम तुनवाला में एक जून 1975 में माधो सिंह नेगी के घर इस वीर सपूत का जन्म हुआ। शुरू से सेना में जाने की ललक के चलते बृजमोहन 9 पैरा कमांडों में भर्ती हुए। मई 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें कश्मीर में तैनाती मिली। एक जुलाई को पाकिस्तानी घुसपैठियों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए भारत मां का यह लाडला बृजमोहन मात्र 24 वर्ष की युवावस्था में देश के लिए शहीद हो गया। मरणोपरांत बृजमोहन को वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
4. रायफलमैन नरपाल सिंह
पट्टी मालकोट में सुरेंद्र सिंह के घर एक जुलाई 1969 को नरपाल सिंह का जन्म हुआ। बीए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह गढ़वाल रायफल में भर्ती हुए। कारगिल में ऑपरेशन विजय के दौरान उन्हें द्रास सेक्टर में तैनाती मिली। 29 जून 1999 को यह वीर सपूत अपने साथियों को बचाते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
5. रायफलमैन रमेश कुमार थापा
देहरादून के इस लाडले ने वर्ष 1976 में अनारवाला निवासी सर्वजीत थापा के घर जन्म लिया। प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद वह 5/3 गोरखा रेजीमेंट में भर्ती हुए। ऑपरेशन विजय के दौरान उनकी यूनिट को 32 राष्ट्रीय रायफल के साथ लगाया गया। पांच जुलाई 1999 को कारगिल में दुश्मनों को खदेड़ते हुए दून का यह जाबांज शहीद हो गया।
6. नायक कृष्ण बहादुर
भारत के इस वीर सपूत का जन्म 24 जून 1964 में सेलाकुई निवासी मोहन सिंह थापा के घर हुआ था। हाईस्कूल पास करने के बाद वह 4/3 गोरखा रेजीमेंट में भर्ती हो गए। ऑपरेशन विजय के दौरान बटालिक सेक्टर को मुक्त कराते हुए 11 जुलाई 1999 को वीरगति को प्राप्त हुए।
7. रायफलमैन जयदीप सिंह भंडारी
शहीद जयदीप सिंह भंडारी का जन्म 15 जनवरी 1978 को नेहरूग्राम निवासी बचन सिंह भंडारी के घर हुआ। इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर वह 17 गढ़वाल रायफल में भर्ती हुए। निशानेबाजी और बाक्सिंग के शौकीन जयदीप ने कई पदक भी हासिल किए। ऑपरेशन विजय के दौरान उन्हें बटालिक सेक्टर की जुबार हिल में तैनाती मिली। दुश्मनों से लोहा लेते हुए तीस जून को उत्तराखंड का यह जाबांज 21 वर्ष की आयु में वीरगति को प्राप्त हुआ।
8. लांस नायक शिवचरण
शहीद शिवचरण प्रसाद का जन्म 12 मई 1973 को अनारवाला निवासी सदानंद के घर हुआ। बीए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद व सेना में भर्ती हो गए। ऑपरेशन विजय में मश्को घाटी में दुश्मनों से लोहा लेते हुए छह जुलाई को इस वीर सपूत ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।
9. राजेश गुरुंग
अमर शहीद राजेश गुरूंग का जन्म 1975 को चांदमरी, घंघोड़ा निवासी श्याम सिंह गुरूंग के घर हुआ। हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे नागा रेजीमेंट में भर्ती हो गए। कारगिल में दुश्मनों से मुकाबले करते हुए छह जुलाई को राजेश वीरगति को प्राप्त हुए।
10. तेंगजिंग नमखा
कारगिल शहीद तेंगजिंग नमखा का जन्म विकासनगर निवासी नोरबू थुंडुप के घर 1979 में हुआ था। सातवीं परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे सेना में भर्ती हुए। युद्ध के दौरान व अपनी कंपनी के साथ तुरतुक सेक्टर में तैनात थे। 19 जुलाई को यह जाबांज मातृभूमि की रक्षा करता हुआ शहीद हो गया।
11. जय सिंह नेगी
अमर शहीद जय सिंह नेगी का जन्म नया गांव मल्हान निवासी शिवराज सिंह नेगी के घर 20 दिसंबर 1977 को हुआ। इंटरमीडिएट करने के बाद वे गढ़वाल रायफल्स में भर्ती हो गए। ऑपरेशन विजय के दौरान मश्कोह घाटी में दुश्मनों से लोहा लेते हुए सात जुलाई 1999 को भारत मां के इस लाडले ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
दून के अन्य शहीदों में
12. नायक मेख बहादुर गुरुंग, निवासी डाकरा कैंट, देहरादून
13.कैलाश कुमार, ग्राम डांडी, रानीपोखरी देहरादून
14. देवेंद्र सिंह, शांति विहार, गढ़ी कैंट, देहरादून
15. संजय गुरुंग, ग्राम नवादा, देहरादून
16. जिगमे सोनम, तिब्बत कालोनी, सहस्त्रधारा रोड, देहरादून
17. नायक विजय सिंह भंडारी, प्रेमनगर
18.नायक कश्मीर सिंह वीर चक्र, आमवाला, नींबूवाला, देहरादून
शेष स्थानों से कितने हुए शहीद
पौड़ी
- नायक मंगत सिंह
- रायफलमैन मान सिंह
- लांस नायक मदन सिंह
- रायफलमैन कुलदीप सिंह
- नायक धर्म सिंह
चमोली
- हवलदार पदम राम
- रायफलमैन सतीश चंद
- रायफलमैन रंजीत सिंह
- नायक दिवाकर सिंह
- लांस नायक कृपाल सिंह
- नायक हीरा सिंह
- सिपाही हिम्मत सिंह
- नायक आनंद सिंह
रुद्रप्रयाग
- रायफलमैन भगवान सिंह
- नायक गोविंद सिंह
- नायक सुनील दत्त
टिहरी
- रायफलमैन दलबीर सिंह
- रायफलमैन विरेंद्र लाल
- लांस नायक दिनेश दत्त
- रायफलमैन बिक्रम सिंह
- नायक शिव सिंह
- सिपाही सुंदर सिंह
- रायफलमैन राजेंद्र सिंह
- नायक जगत सिंह
- रायफलमैन बिजेंद्र सिंह
- सुबेदार प्रताप सिंह
- नायक सुबाब सिंह
- रायफलमैन दिलवर सिंह
लैंसडौन
- नायक हरेंद्र सिंह
- लांस नायक सुरमन सिंह
- रायफलमैन डबल सिंह
- नायक अनिल सिंह
- लांस नायक देवेंद्र प्रसाद
- नायक ज्ञान सिंह
- नायक सुरेंद्र सिंह
- हवलदार मदन सिंह
- रायफलमैन बलबीर सिंह नेगी
- नायक भरत सिंह
- सिपाही भरत सिंह
- रायफलमैन अनसुया प्रसाद ध्यानी
उत्तरकाशी
- रायफलमैन दिनेश चंद्र
नैनीताल
- मेजर आरएस अधिकारी
- लांस नायक चंदन सिंह
- लांस नायक राम प्रसाद
- सिपाही एमसी जोशी
पिथौरागढ़
- रायफलमैन जौहर सिंह
- नायक किशन सिंह
- हवलदार गिरीश ंिसह
- पीटीआर कुंडल सिंह
अल्मोड़ा
- लांस नायक हरी सिंह देवडी
- नायक हरी बहादुर घले
- हवलदार तम बहादुर क्षेत्री
- कैप्टन आदित्य मिश्रा
बागेश्वर
- पीटीआर राम सिंह बोरा
- सिपाही मोहन सिंह
- हवलदार हरी सिंह थापा
ऊधमसिंह नगर
- रायफलमैन अमित नेगी
भुला दिए जाते हैं शहीद
कारगिल शहीदों के लिए मात्र विजय दिवस मनाकर सरकार व प्रशासन अपने कार्यों की इतिश्री कर लेता है, लेकिन शहीदों के परिजन और गांव वाले एकत्र होकर अपने लाडलों को याद करते हैं।
शहीद नरपाल सिंह - 29 जून
शहीद बृजमोहन सिंह - 1 जुलाई
शहीद विवेक गुप्ता - 12 जून
शहीद रमेश कुमार थापा- 5 जुलाई
शहीद जय दीप सिंह नेगी- 30 जून
शहीद शिव चरण- 6 जुलाई
शहीद राजेश गुरुंग - 6 जुलाई
शहीद जय सिंह नेगी- 7 जुलाई
शहीद तेंजिग नेमखा- 11 जुलाई
शहीद कृष्ण बहादुर- 11 जुलाई
Saturday, 24 July 2010
बारह हजार पदों पर नियुक्तियां जल्द
-कैबिनेट ने लिए महत्वपूर्ण फैसले, तीन माह में शुरू होगी भर्ती प्रक्रिया
-राज्य लोक सेवा आयोग के दायरे में समूह-ग की भर्ती को रोजगार दफ्तर में पंजीकरण अनिवार्य
-आयोग से बाहर के पदों की भर्ती परीक्षा कराएगा प्राविधिक शिक्षा परीक्षा परिषद, आवेदकों को आयु सीमा में पांच वर्ष की छूट
-तकनीकी शिक्षा महकमे के तहत होंगे आईटीआई और पालीटेक्निक
-आईटीआई के आठ नए ट्रेडों को मंजूरी, मृतप्राय: ट्रेडों के पद होंगे कन्वर्ट
pahar1-
प्रदेश में समूह-ग की भर्तियों में अब स्थानीय युवाओं को रोजगार के ज्यादा मौके मिलेंगे। इस श्रेणी में राज्य लोक सेवा आयोग के पदों पर भर्ती की पात्रता के लिए अब रोजगार दफ्तर में पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। आयोग से बाहर और उसके दायरे के तकरीबन 12 हजार पदों पर तीन माह में भर्ती प्रक्रिया शुरू होगी। भर्ती परीक्षा के लिए आयु सीमा में पांच वर्ष की बढ़ोत्तरी की गई है। साथ ही आईआईटी व पालीटेक्निक अब तकनीकी शिक्षा का हिस्सा होंगे। राज्य कैबिनेट ने मंगलवार को कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए।
सचिवालय में मंगलवार को कैबिनेट की बैठक के निर्णयों को मुख्य सचिव एनएस नपलच्याल ने ब्रीफ किया। उन्होंने बताया कि सूबे में समूह-ग के रिक्त 12 हजार पदों में तकरीबन 1500 पद आयोग के परिधि में हैं, जबकि 10500 पद इससे बाहर हैं। आयोग से बाहर समूह-ग के पदों पर भर्ती के लिए राज्य के सेवायोजन दफ्तरों में पंजीकरण अनिवार्य है। पड़ोसी राज्य हिमाचल की तर्ज पर उत्तराखंड ने भी कदम बढ़ा दिए हैं। आयोग के पदों पर भर्ती के लिए रोजगार दफ्तर में पंजीकरण जरूरी होगा। यही नहीं समूह-ग के लिए आयोग की लिखित परीक्षा अथवा साक्षात्कार में भी राज्य की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विशिष्ट रीति-रिवाज से संबंधित सवाल पूछे जाएंगे।
समूह-ग की भर्ती के नए प्रावधानों को सेवा नियमावली में शामिल किया जाएगा। विभिन्न महकमों में इन पदों के लिए अलग-अलग के बजाए एक नियमावली होगी। तृतीय श्रेणी के इन 12 हजार पदों को जल्द भरा जाएगा। आयोग के बाहर के साढ़े दस हजार पदों के लिए भर्ती परीक्षा का जिम्मा प्राविधिक शिक्षा परीक्षा परिषद रुड़की को दिया गया है। परिषद की चयन समिति इस कार्य को अंजाम देगी। भर्ती परीक्षा में शामिल होने वाले सभी अभ्यर्थियों को आयु सीमा में पांच वर्ष की छूट मिलेगी। इस परीक्षा में 40 वर्ष आयु के युवा आवेदन कर सकेंगे। यह व्यवस्था सिर्फ मौजूद वर्ष के लिए लागू होगी। इसके बाद पहले से तय आयु सीमा 35 वर्ष लागू रहेगी। समूह-ग की भर्ती प्रक्रिया को लेकर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित समिति की संस्तुतियों पर चर्चा के बाद कैबिनेट ने यह निर्णय लिया। अधीनस्थ चयन सेवा आयोग के गठन पर भी कैबिनेट में चर्चा की गई, लेकिन इस पर फैसला नहीं लिया गया।
तकनीकी शिक्षा का कैनवास अब बड़ा हो गया। इसके दायरे में अब आईटीआई भी होंगे। विशेष तौर पर आईटीआई संचालित कर रहा प्रशिक्षण महकमा अब तकनीकी शिक्षा के अधीन होगा। विद्यार्थियों को बेहतर तकनीकी प्रशिक्षण के लिए आईटीआई, पालीटेक्निक भी तकनीकी शिक्षा की एक छतरी के नीचे होंगे। तकनीकी कौशल से जुड़े सर्टिफिकेट, डिप्लोमा व डिग्री कोर्स की गुणवत्ता और विद्यार्थियों को बेहतर प्रशिक्षण के लिए तकनीकी शिक्षा का एकीकरण किया गया है। अलबत्ता, एक महकमे के तहत दोनों निदेशालय बदस्तूर काम करेंगे। मुख्य सचिव के मुताबिक नई व्यवस्था में आईटीआई पास करने वालों को पालीटेक्निक में लेटरल इंट्री का मौका देने पर विचार किया जाएगा। आईटीआई में आठ नए कोर्स को भी मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी। इनमें एडवांस मॉड्यूल आटोमोबाइल सेक्टर, एडवांस मॉड्यूल इलेक्ट्रिकल सेक्टर, एडवांस मॉड्यूल प्लांट प्रोसेसिंग, लाइब्रेरी एंड इनफोरमेशन साइंस, हास्पिटल हाउसकीपिंग, हेयर एंड स्किन केयर, डेंटल टेक्निशियन व फ्रंट आफिस असिस्टेंट शामिल हैं। इंडस्ट्रीज और रोजगार की जरूरत को ध्यान में रखकर नए ट्रेड तैयार किए गए। नए ट्रेड के लिए अलग से अनुदेशकों के नए पद सृजित नहीं किए जाएंगे। मृतप्राय: अथवा जिन ट्रेड की मांग बेहद कम हो गई है, उनके रिक्त पदों को नए में कन्वर्ट किया जाएगा। इससे सरकार पर वित्तीय भार नहीं पड़ेगा।
कैबिनेट ने हिमगिरी नभ विश्वविद्यालय उत्तरांचल के नए नाम हिमगिरी जी विश्वविद्यालय उत्तराखंड को मंजूरी दी। इसके लिए निजी विवि अधिनियम में आंशिक संशोधन होगा। इस मौके पर तकनीकी शिक्षा प्रमुख सचिव राकेश शर्मा, उच्च शिक्षा प्रमुख सचिव पीसी शर्मा व मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव डीके कोटिया भी मौजूद थे।
नैनीताल तक नहीं पहुंचेगी ट्रेन!
- अत्यधिक लंबा रूट व भूगर्भीय संरचना बनी बाधक
- कच्ची पहाडिय़ों के दरकने का खतरा
- चीफ इंजीनियर कर चुके हैं प्री-फिजिबिलटी स्टडी
- आजादी से पूर्व भी हो चुकी है कवायद
हल्द्वानी (नैनीताल): विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल नैनीताल तक ट्रेन का सफर शुरू हो पाने की कवायद को प्रथम चरण में ही तगड़ा झटका लगा है। हाल ही में रेलवे बोर्ड ने काठगोदाम से नैनीताल तक रेलवे लाइन बिछाने की संभावनाएं तलाशने के निर्देश दिए थे। पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय से चीफ इंजीनियर भी यहां का प्राथमिक मुआयना (प्री-फिजिबिलिटी स्टडी) कर चुके हैं। यहां के लंबे रूट, दरकती तथा कमजोर पहाडिय़ों ने इस राह को मुश्किल बना दिया है।
खूबसूरत झील के चारों ओर बसा नैनीताल शहर देश से ही नहीं विदेश से भी हजारों पर्यटकों को हर वर्ष अपनी ओर आकर्षित करता है। झील के अलावा आसपास के तमाम पर्यटन स्थल सैलानियों के जेहन में उत्तराखंड की विशेष तस्वीर पेश करते हैं। भीमताल, सातताल, भवाली, सूखाताल सहित आसपास के सुंदर पर्यटक स्थल नैनीताल आने वाले सैलानियों को आकर्षित करते हैं। राज्य की पहचान में भी नैनीताल का अहम रोल है। इसी को देखते हुए रेलवे ने कुमाऊं के अंतिम स्टेशन काठगोदाम से नैनीताल तक रेलवे लाइन बिछाने की बात कही। पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक यूसी द्वादशश्रेणी ने मई में काठगोदाम के वार्षिक निरीक्षण के दौरान बोर्ड की मंशा को सार्वजनिक भी किया था। तभी से कुमाऊं वासियों की आशाओं को मानो पंख लग गए थे। उन्होंने इसके लिए जुलाई में प्री फिजीबिलिटी स्टडी कराने के निर्देश दिए थे। इधर इसी माह पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय गोरखपुर से चीफ इंजीनियर टीम सहित यहां का दौरा कर चुके हैं, लेकिन इस स्टडी के जो रिजल्ट सामने आए है उसने पहाड़ पर ट्रेन चढऩे की कवायद को फिर तगड़ा झटका लगा दिया है। स्टडी में एक ओर काठगोदाम से नैनीताल की रेल लाइन के लिहाज से स्थलीय दूरी को अत्यधिक पाया गया है। दूसरी ओर दरकती पहाडिय़ों का खतरा भी बाधा बना। स्टडी के मुताबिक काठगोदाम से नैनीताल की हवाई दूरी करीब 16 किमी और सड़क मार्ग से 35 किमी है। वहीं रेल लाइन के लिहाज से यह करीब 250 किमी होगी। ऐसे में अत्यधिक लंबे रूट के चलते योजना का खर्च भी बहुत अधिक हो जाएगा। जानकारों के मुताबिक यहां की पहाडिय़ां भी अत्यंत कमजोर हैं और इनके दरकने का खतरा भी अधिक है। इतना ही नहीं आजादी से पूर्व पहाडिय़ों पर ट्रेन चढ़ा चुके अंग्रेजों ने भी नैनीताल तक रेलवे लाइन बिछाने की कवायद शुरू की थी। वर्ष 1930 से 35 के बीच इसकी पहल हुई थी, लेकिन यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी थी। पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (सीपीआरओ) अमित सिंह ने बताया कि प्री-फिजीबिलिटी स्टडी में इस रूट की लंबाई अत्यधिक पाई गई है। इससे फिलहाल यहां ट्रेन संचालन की कोशिश मुश्किल हो गई है।
अब प्री फिजीबिलिटी स्टडी में ही रेल लाइन बन पाने की संभावनाओं पर लगे विराम से कुमाऊं वासियों के साथ-साथ पर्यटन व्यवसाय को भी तगड़ा झटका लगा है।
कदमों को हौसला मिले तो नाप डालेंगे दूरियां
- मध्यम-लंबी दूरी के एथलीट कर रहे अंतर्राष्ट्रीय फलक पर सूबे का नाम रोशन
- कसक बस इतनी कि बढ़ते कदमों को कोई प्रोत्साहन देेने वाला नहीं
- सुविधाओं की कमी बन रही प्रतिभाओं की राह में रोड़ा
केरल की तर्ज पर सूबे में भी डेवलप हो एथलेटिक्स एकेडमी
देहरादून: बढ़ते कदमों को हौसला मिलता रहे तो मंजिल आसान हो जाती है। ऐसा ही कुछ कर दिखा रहे हैं सूबे के मध्यम-लंबी दूरी के एथलीट। अपने प्रदर्शन से उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय फलक पर सूबे का नाम रोशन किया है। कसक है तो बस इतनी कि उनके बढ़ते कदमों को कोई प्रोत्साहन देेने वाला नहीं मिल पा रहा।
वर्तमान में प्रदेश के लंबी-मध्यम दूरी के धावकों ने देशभर में अपने प्रदर्शन की छाप छोड़ी है। ओलंपियन सुरेंद्र भंडारी, पंकज डिमरी, ईलम सिंह, प्रीतम बिंद आदि ऐसे नाम हैं, जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय फलक पर पहचान कायम की है। पंकज डिमरी ने हाल ही में एशियन ग्रां प्री 'एकÓ व 'दोÓ में कांस्य व रजत पदक जीतकर प्रदेश का झंडा बुलंद किया। ईलम सिंह के अलावा लंबे अर्से बाद ट्रैक पर लौटे प्रीतम सिंह ने भी अपने प्रदर्शन से सभी को प्रभावित किया। इन दिनों ये सभी धावक इंटर स्टेट चैंपियनशिप के साथ-साथ कॉमनवेल्थ की तैयारी के लिए पसीना बहा रहे हैं। सूबे की अंतर्राष्ट्रीय महिला एथलीट किरन तिवारी भी कॉमनवेल्थ की तैयारियों में जुटी हैं।
पिछले कुछ समय से उत्तराखंड मध्यम व लंबी दूरी के धावकों की नर्सरी के रूप में उभरा है। इस सब के बावजूद मूलभूत सुविधाओं और प्रोत्साहन की कमी प्रतिभाओं की राह में रोड़ा बन रही है। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय फलक पर प्रदेश का नाम चमका रहे एथलीट अभी भी सरकार से सम्मान की आस लिए हुए हैं।
इंटर स्टेट चैंपियनशिप की तैयारियों में जुटे पंकज डिमरी का कहना है कि पिछले दो साल में राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने के बावजूद अभी तक उन्हें प्रोत्साहन राशि नहीं मिली। सरकार ने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खिलाडिय़ों के लिए पुरस्कार राशि की घोषणा तो कर दी, मगर कब देगी, इसका किसी को पता नहीं।
प्रीतम बिंद का कहना है कि खिलाडिय़ों की हौसलाअफजाई के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाना जरूरी है। वह कहते हंै कि सूबे में सिंथेटिक ट्रैक की बेहद जरूरत है। इसके लिए सरकार को जल्द से जल्द व्यवस्था करनी चाहिए।
एथलेटिक्स एसोसिएशन के सचिव संदीप शर्मा कहते हंै कि लंबी-मध्यम दूरी में प्रदेश के धावकों ने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय जो चमक बिखेरी है, इसके लिए उन्हेें प्रोत्साहन मिलना ही चाहिए। इससे युवा एथलीट भी प्रेरित होंगे। इसके अलावा विभागों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे एथलीटों के सहयोग को आगे आएं।
पूर्व अंतर्राष्ट्रीय एथलीट विनोद पोखरियाल का कहना है कि केरल की तर्ज पर यहां भी एथलेटिक्स एकेडमी डेवलप करने की जरूरत है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं मिलने से अन्य स्पर्धाओं में भी सूबे के खिलाड़ी अपनी चमक बिखेर सकेंगे।
Thursday, 1 July 2010
उत्तराखण्ड राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में अनुदेशकों के पदों पर भर्ती के लिये विज्ञापन
अनुदेशक भर्ती विवरणिका-2010 (आवेदन पत्र सहित) उत्तराखण्ड राज्य की वेबसाईट
www.gov.ua.nic.in OR www.ubter.in से अथवां जिले की नोडल आई0टी0आई0 से दिनांक 22-06-2010 से रु0 50/- अतिरिक्त शुल्क देकर प्राप्त कर सकते है। पूर्ण आवेदन प़त्र ,समस्त शैक्षिक योग्यता एवं अन्य वांछित प्रमाण पत्रों सहित सामान्य / अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यथियों के लिए रु0 500/-और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जन जाति के अभ्यर्थियां के लिए रु0 250/- का बैंक ड्राप्ट जो कि सचिव ,उत्तराखण्ड प्राविधिक शिक्षा परिषद रुड़की को देय हो के साथ दिनांक 13-07-2010 तक पंजीकृत डाक/स्पीडपोस्ट /स्वयं द्वारा निदेशक , व्यवसायिक परीक्षा परिषद, आई0टी0आई0 (युवक) कैम्पस निरंजनपुर देहेहरादून-248001 कार्यालय में प्राप्त हो जाने चाहिए ।
क्वींस बेटन का उत्तराखंड में होगा शानदार अभिनंदन
-छह जुलाई को पांवटा साहिब से सूबे की सीमा में प्रवेश करेगी क्वींस बेटन
रैली में बिखरेगी गढ़वाली-कुमाऊंनी संस्कृति की छटा
परेड ग्राउंड पर आयोजित होगा भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम
-हरिद्वार में गंगा आरती में शरीक होगी 'क्वींस बेटन रिलेÓ
pahar1- राष्ट्रकुल खेलों की मशाल क्वींस बेटन के स्वागत के लिए प्रशासन ने तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया है।
रैली में स्कूली बच्चों को शामिल करने के साथ ही भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियां दी जाएंगी। कुल्हाल गेट से सूबे की सीमा में प्रवेश करने वाली क्वींस बेटन विभिन्न रास्तों से होते हुए परेड ग्राउंड तक पहुंचेगी। एडीएम प्रशासन विनोद कुमार सुमन के मुताबिक रैली की तैयारियों के लिए सभी अधिकारियों को निर्देश दिए जा चुके हैैं। हरिद्वार में सात जुलाई को क्वींस बेट रिले गंगा आरती में शामिल होगी ।
छह जुलाई को क्वींस बेटन हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब की ओर से उत्तराखंड की सीमा में प्रवेश करेगी। अपराह्न लगभग तीन बजे कुल्हाल गेट पर मशाल के जनपद की सीमा में प्रवेश करने पर इसका जोरदार स्वागत किया जाएगा। प्रेमनगर से राष्ट्रकुल खेलों की मशाल को मोटरसाइकिल रैली द्वारा एस्कार्ट किया जाएगा। राजभवन गेट के पास से उत्तराखंड की दो सांस्कृतिक टीमें (एक गढ़वाली तथा एक कुमाऊंनी) एक बड़े ट्रक पर रैली में शामिल होंगी। ट्रक पर बने प्लेटफार्म पर उत्तराखंड की सांस्कृतिक झलकियों की छटा बिखेरते हुए क्वींस बेटन परेड ग्राउंड तक पहुंचेगी। खेल विभाग द्वारा तय किए गए खिलाड़ी राजभवन गेट से इसे रिले के रूप में परेड ग्राउंड तक लाएंगे। गांधी पार्क के आगे के रास्ते पर लगभग एक हजार स्कूली बच्चे रैली का स्वागत करेंगे। परेड ग्राउंड में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। इसके लिए वहां वाटर प्रूफ पंडाल तैयार किया जाएगा।
हरिद्वार: कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 की क्वींस बेटन रिले सात जुलाई को अलसुबह शहर में प्रवेश करेगी। सबसे पहले गंगा आरती में शरीक होने के बाद यह मशाल राफ्ट के जरिये बिरला घाट तक पहुंचेगी। इसके बाद यहीं से यह मशाल हेलीकॉप्टर के माध्यम से श्रीनगर गढ़वाल के लिए रवाना हो जाएगी। इसके स्वागत के लिए जिला प्रशासन तैयारियों में लग गया है।
मंगलवार को क्वींस बेटन रिले के स्वागत की तैयारियों की समीक्षा के लिए जिलाधिकारी डा. आर. मीनाक्षी सुंदरम ने एक बैठक का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने कहा कि अतिथि देवो भव: की तर्ज पर रिले का स्वागत किया जाएगा। उन्होंने बताया कि रिले सुबह 5.10 बजे हर की पैड़ी स्थित गंगा आरती में शामिल होने के बाद राफ्ट के जरिये बिरला घाट पहुंचेगी।
नैनीताल: राष्टï्रकुल खेलों की मशाल 'क्वींस बेटन रिलेÓ का 7 जुलाई को नैनीताल पहुंचने पर भव्य स्वागत किया जाएगा। स्वागत समारोह में शहर के विभिन्न संगठनों का सहयोग लिया जाएगा। जिलाधिकारी शैलैश बगौली की अध्यक्षता में मंगलवार को कलेक्ट्रेट सभागार में एक बैठक आयोजित की गयी, जिसमें स्वागत समारोह की तैयारियों पर विचार विमर्श किया गया। जिलाधिकारी ने बताया कि तय कार्यक्रम के अनुसार राष्टï्रकुल खेलों की मशाल क्वींस बेटन रिले 7 जुलाई को हैलीकाप्टर से कैलाखान हैलीपैड पहुंचेगी। उसके बाद वह नैनीताल क्लब के लिए रवाना होंगी। यहां तल्लीताल बस स्टैण्ड पर क्वींस वेटन रिले का छोलिया नृतकों द्वारा परम्परागत ढंग से स्वागत किया जाएगा।
Thursday, 17 June 2010
हुनर को जला गई पेट की आग
pahar1- कम ही लोग जानते होंगे कि ढाई-तीन दशक पूर्व तक देवभूमि में कलाकारों की एक ऐसी जाति भी थी, जिसने सदियों से यहां की सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण किया। वक्त बदला और चकाचौंध लोक पर हावी होने लगी। जमीन से जुड़ी कला ही नहीं, कलाकार भी सुविधाओं के मोहताज हो गए। पेट की भूख ने उन्हें यहां-वहां हाथ-पांव मारने को मजबूर कर दिया और धीरे-धीरे प्रकृति प्रदत्त यह कला इतिहास के पन्नों में दफन हो गई।
बात उत्तराखंड की बाद्दी जाति की हो रही है, जिसके बिना एक दौर में घर-आंगन सूने नजर आते थे। बाद्दी यहां के मूल लोक कलाकार हैं, जो आशुकवि होने के कारण अपने गीत-नृत्यों के जरिए ऐतिहासिक घटनाओं और लोक अनुष्ठानों को संरक्षित रखते थे। इनकी स्ति्रयों (बादिण्यों-बेडिण्यों) को नृत्य व गायन में महारथ हासिल थी। एक गांव से दूसरे गांव बिना आमंत्रण के वे अपनी कला व प्रतिभा का प्रदर्शन करते और वहां से मिला प्रोत्साहन उनके परिवार का संबल बनता। उत्तराखंड की संस्कृति को अपनी कला के माध्यम से जीवित रखने वाले ये कलाकार उपेक्षा और उदासीनता का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। दूरदराज के कुछेक इलाकों में जहां-कहीं उनकी मौजूदगी दिखाई भी देती है, उसमें भी मजबूरी का भाव झलकता है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की चकाचौंध में बाद्दियों को पूछने वाला कोई नहीं रहा। उनका जो रहा-सहा दर्शक वर्ग है भी, वह खुद अभावों से जूझ रहा है। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब, बाद्दी परंपरा के अवशेष भी ढूंढने मुश्किल हो जाएंगे।
हुनरमंद बनेंगे उत्तराखंड के युवा
देहरादून- सूबे की इंडस्ट्रीज युवाओं का हुनर निखारने को आगे आ रही हैं। स्टेट ओपन
यूनिवर्सिटी और टाटा मोटर्स के बीच सर्टिफिकेट कोर्स इन टेक्निकल एक्सीलेंस को लेकर करार इसकी तस्दीक कर रहा है। अन्य नामचीन कंपनियां अशोक लीलैंड व बजाज भी विवि से करार की इच्छुक हैं।
ओपन यूनिवर्सिटी ने उद्योगों को रोजगारपरक प्रोग्राम से सीधे जोड़ने की पहल की है। इसके तहत उद्योगों की जरूरत पर आधारित कोर्स तैयार किए जाएंगे। कोर्स की अध्ययन सामग्री विवि तैयार करेगा, जबकि व्यावहारिक प्रशिक्षण इंडस्ट्रीज देंगी। सूबे में प्रशिक्षित युवाओं की फौज खड़ी करने और रोजगार देने से सीधे जुड़े इस कोर्स में आटोमोबाइल इंडस्ट्री ने बाजी मारी है। इसके लिए विवि और टाटा मोटर्स ने बाकायदा करार किया है। करार के मुताबिक आटोमोबाइल सेक्टर में युवाओं को तराशने को विवि टेक्निकल एक्सीलेंस में सर्टिफिकेट कोर्स तैयार करेगा। छह माह के इस कोर्स में दो महीने थ्योरी और चार माह प्रशिक्षण की व्यवस्था होगी। प्रशिक्षण टाटा मोटर्स कंपनी देगी। प्रशिक्षण के दौरान युवाओं को बतौर स्टाइपेंड चार-पांच हजार रुपये की आमदनी भी होगी। इस सर्टिफिकेट कोर्स के चार प्रमुख कंपोनेंट होंगे। पहला कंपोनेंट इंजीनियरिंग व ड्राइंग, दूसरा मशीनों की जानकारी, तीसरा व्यक्तित्व विकास और चौथा सामान्य व्यवहार का होगा। दसवीं व बारहवीं पास युवा इस कोर्स में दाखिला ले सकेंगे। टाटा मोटर्स इस कोर्स में 600 छात्र-छात्राओं को प्रशिक्षण देने की हामी भर चुकी है। खास बात यह है कि इस सेक्टर की अन्य नामचीन कंपनियों ने भी कोर्स में खासी रुचि दर्शाई है।
विशेष रूप से अशोक लेलैंड व बजाज के रुख को देखकर विवि बेहद उत्साहित है। बजाज कंपनी ने गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले युवाओं को प्रशिक्षण देने की मंशा जताई है। संपर्क करने पर विवि के कुलपति प्रो. विनय पाठक ने टाटा मोटर्स के साथ करार की पुष्टि की। प्रो. पाठक के मुताबिक मुक्त विवि सूबे के लिए दो उद्देश्यों सशक्तिकरण व रोजगार को ध्यान में रखकर कोर्स तैयार कर रहा है। पहले कोर्स तैयार करने के बजाए इंडस्ट्रीज व रोजगार के अन्य क्षेत्रों से संपर्क साधा जा रहा है। उनकी जरूरत के मद्देनजर रोजगारपरक व व्यावहारिक कोर्स तैयार किए जाएंगे। अकेले आटोमोबाइल सेक्टर में हजारों युवाओं को खपाने की कुव्वत है।
Thursday, 10 June 2010
-समूह 'गÓ की भर्ती स्थगित
रास्ता निकालने को उच्चस्तरीय समिति गठित
- बुधवार को आंदोलनकारी संगठनों ने मुख्य सचिव से भी की मुलाकात
देहरादून,--: सरकार ने समूह ग की भर्ती प्रक्रिया स्थगित कर दी है। भर्ती का रास्ता निकालने के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में तीन प्रमुख सचिवों की उच्चस्तरीय कमेटी गठित करने के निर्देश दिए गए हैैं। कमेटी पंद्रह दिन के भीतर यह संस्तुति देगी कि इन पदों पर भर्ती के लिए क्या रास्ता अपनाया जाए। लोक सेवा आयोग के माध्यम से भर्ती का विरोध होने के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है।
समूह ग की भर्ती के मामले में बुधवार को गहन मंथन के बाद मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने चयन प्रक्रिया को स्थगित करने के निर्देश दिए। उन्होंने इसके लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में सचिवों की उच्चस्तरीय समिति गठित करने के निर्देश दिए। समिति की रिपोर्ट मिलने तक चयन प्रक्रिया को स्थगित रखा जाएगा। समिति में प्रमुख सचिव सुभाष कुमार, आलोक जैन व डीके कोटिया को बतौर सदस्य शामिल किया गया है।
मुख्यमंत्री डा. निशंक ने कहा कि राज्य सरकार युवाओं के हितों के लिए वचनबद्ध है। सरकार सभी पहलुओं का परीक्षण कर रही है और ऐसा निर्णय करेगी, जिससे युवाओं को रोजगार के अधिक से अधिक अवसर मिल सकें।
राज्य सरकार ने हाल ही में 337 पदों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी। इन नियुक्तियों को लोक सेवा आयोग के माध्यम से कराने पर स्थानीय युवाओं में नाराजगी थी। वह हित प्रभावित होने का अंदेशा जताकर नियुक्ति प्रक्रिया को आयोग के दायरे से बाहर करने की मांग कर रहे थे। इसको लेकर दो दिनों से राजधानी में उबाल आ गया था। यह पहला मौका नहीं है, जबकि समूह ग की भर्ती स्थगित हुई है। इससे पहले भी 2002 व 2004 में भी इन पदों पर भर्ती नहीं हो सकी। युवाओं की मांग है कि समूह ग की भर्ती अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के माध्यम से की जानी चाहिए। राज्य में अभी तक चयन आयोग का गठन नहीं हुआ है। ऐसे में सरकार पसोपेश में है।
इससे पूर्व आज दोपहर आंदोलनकारी संगठनों ने मुख्य सचिव एनएस नपलच्याल से मुलाकात कर भर्ती प्रक्रिया रोकने की मांग की। ऐसा नहीं होने पर आंदोलनकारियों ने 11 जून को सचिवालय कूच की चेतावनी दी थी।
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अब तो वो बात कहां?
-आज के गहनों में तिमणियां, बुलाक जैसी कहां बात
-आभूषण ही नहीं संस्कृति की पहचान भी थे यह
-आधुनिक आभूषणों ने ले लिया इनका स्थान
(टिहरी गढ़वाल:-- तिमणियां व बुलाक आज भले ही यह नाम सुनने में अजीब लगते हों, लेकिन कभी यही खास गहने पहाड़ की महिलाओं की पहचान हुआ करते थे। त्योहार-पर्वों के अवसर पर जब महिलाएं इन्हें पहनती थी तो उनकी सुंदरता में चार चांद लग जाते थे। आधुनिक चकाचौंध में आज यह सब खो गए हैं और इनकी जगह अब आधुनिक गहनों ने ले ली है।
उल्लेखनीय है कि तिमणियां (गले का हार) व बुलाए (नाक में पहने जाने वाला जेवर) मात्र गहने ही नहीं थे, बल्कि पहाड़ की संस्कृति सभ्यता की पहचान भी थे। शादी-ब्याह व त्योहारों के अवसर पर महिलाएं विशेष तौर पर इन्हें पहनती थी। गले में पहना जाने वाला तिमणियां की बनावट भी विशेष होती थी। इन्हें तैयार करने में काफी दिन लग जाते थे। इन आभूषणों का प्रचलन राजशाही के जमाने से बताया जाता है। उस समय इन आभूषणों का काफी प्रचलन था। लम्बे समय तक इन आभूषणों का राज रहा है। कई स्थानों पर आयोजित होने वाले नृत्य व मेले में महिलाएं इन आभूषणों से लकदक होकर सामूहिक नृत्य करती थी। इन आभूषणों को लेकर कई गढ़वाली गीत भी लिखे गए हैं।
तिमणियां व बुलाक केवल आभूषण ही नहीं थे बल्कि वक्त पडऩे पर यह लोगों के आर्थिक मदद के काम भी आते थे। यहां यह बता दें कि आज के आभूषणों के अपेक्षा बुलाक व तिमणियां काफी भारी-भरकम होते थे।
आज भी गढ़वाली एलबमों पर यदाकदा पहाड़ की संस्कृति के पहचान यह आभूषण दिखाई देते हैं। आज गांव में यह आभूषण दिखाई नहीं देते बहुत कम गांवों में बुजुर्ग महिलाओं के पास ही यह आभूषण मिलेंगे, लेकिन वह भी अब इन्हें संदूक में ही संभाले हुए हैं। आज यह आभूषण बीते जमाने की बात हो गई है। नई पीढ़ी तो इन आभूषणों से परिचित ही नहीं है। आधुनिक चकाचौंध में इन प्राचीन आभूषणों की जगह नए-नए आभूषणों ने ले लिया है। समय के साथ-साथ गहने भी बदल गए हैं। तिमणियां की जगह अब हार व बुलाक की जगह नथ ने ले ली है। पहले जहां दशकों तक नथ व बुलाक आभूषणों का चलन रहा है वहीं आधुनिक समय में इसमें नित नए बदलाव आ रहे हैं।
गांव की महिला सुमणी देवी का कहना है कि पहले जैसे आभूषण अब कहां रह गए हैं। उनका कहना है कि वर्षों बाद भी गांव में बुलाक व तिमणियों का प्रचलन रहा है, लेकिन अब धीरे-धीरे गांव में यह दिखाई नहीं देते। उनका कहना है कि आज के गहनों में बुलाक व तिमणियां जैसी बात कहां।
-नवदुर्गा की छत्र-छाया में सुरक्षित है अल्मोड़ा
-चारों दिशाओं में विविध रूपों में विराज मान हैं मां
- पर्यटन के रूप में विकसित नहीं हो पायी सांस्कृतिक नगरी
अल्मोड़ा-संस्कृति, परम्परा व ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे कुमाऊं में अल्मोड़ा का विशिष्ट स्थान है। यहां नौ दुर्गा के मंदिरों में हर साल सैकड़ों भक्त पहुंचते हैं। अल्मोड़ा शहर को बसाने वाले चंद राजाओं ने इसे जहां भौतिक रूप से सुरक्षित बनाया, वहीं दैवीय शक्तियों से भी चारों दिशाओं से सुरक्षित बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कभी चंद राजाओं की राजधानी रही अल्मोड़ा नगरी की चारों दिशाओं मेंं विघ्न विनाशक भगवान गणेश स्थापित हैं। यही नहीं नगर की रक्षा के लिए अष्ट भैरव विपदाओं को हरने के लिए हर पल मौजूद हैं। प्रदेश में यहीं नौ दुर्गाओं के मंदिर भी स्थापित हैं। इसके बावजूद सरकारें इस सांस्कृतिक नगरी को पर्यटन के रूप में विकसित नहीं कर पायीं।
अल्मोड़ा के चारों ओर की चोटियों व नगर में विभिन्न रूपों में शक्ति स्वरूपा देवी माताएं रक्षा कर रही हैं। माता के नौ रूपों का वर्णन पुराणों व धार्मिक ग्रंथों में देखने को मिलता है। नगर में अलग-अलग स्थानों पर मां कई रूपों में विद्यमान हैं। इसी प्रकार मां के अलग-अलग उपासक भी हैं। कोई उपासक मां को वैष्णवी रूप में पूजता है, तो कोई शक्ति के रूप में मां के अराधना करता है। इसी लिए कहीं पर 'या देवी सर्वभूतेषु दया रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:Ó तो कोई भक्त 'जयंती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुतेÓ के भाव से मां का वंदन नमन करता है। इसे अल्मोड़ा नगरी का सौभाग्य ही कहा जाएगा कि अल्मोड़ा के चारों ओर रहने वाले वाशिंदों को प्रात: उठते ही हर दिशा में शिखरों पर स्थित मां के दर्शन होते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अल्मोड़ा की रक्षा चारों ओर से देवी-देवता करते हैं। नगर के चारों ओर नजर डालें तो कलेक्टे्रट के ठीक सामने मां बानड़ी देवी (विंध्यवासिनी), पीछे की ओर स्याही देवी (श्यामा देवी), बायीं ओर कसार देवी, पश्चिम दिशा की ओर मां दूनागिरी, नगर में चंद राजाओं की कुल देवी मां नंदा-सुनंदा, मां त्रिपुरा सुन्दरी, मां उल्का देवी, मां शीतला देवी, मां पाताल देवी, मां कालिका देवी, मां जाखन देवी जागृत अवस्था में हैं।
मां के भक्त अल्मोड़ा में देश भर से पहुंचते हैं। प्रदेश में केवल अल्मोड़ा ही ऐसा स्थान है जहां नौदुर्गा के मंदिर स्थित हैं। इसके बावजूद सरकार ने इस सांस्कृतिक नगरी को पर्यटन के रूप में विकसित करने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किये।
-शिलाएं खुद का उद्धार कर बन गईं अहिल्या
-राज्य की 26 विधवाओं ने फिर मांग भरने का दिखाया साहस
-पहाड़ में भी धीरे-धीरे टूटने लगी हैं रूढिय़ां
-समाजशास्त्रियों की नजर में साहसिक एवं जायज कदम
हल्द्वानी (नैनीताल): एक दरिया तूफानी है वो, झांसी वाली रानी है वो, कोई पढऩे वाला हो तो, खुद में एक कहानी है वोÓ। हम बात कर रहे हैं उस कहानी की जिसमें राज्य की अबलाओं ने अपने जज्बे से सबला बनने की ठान ली है। इस राह पर वे नित नये मील के पत्थरों को पीछे छोड़ रही हैं। वह भी उस पर्वतीय क्षेत्र के मार्ग पर जहां रूढिय़ों की गहरी खाई और मान्यताओं के दुर्गम रास्ते हैं। अब अल्मोड़ा जिले की नीलिमा (काल्पनिक नाम) को ही देखें। शादी में लगी मेहंदी का रंग भी नहीं छूटा कि खुशियों को ग्रहण लग गया। मार्ग दुर्घटना में घायल पति की मौत ने जिदंगी जीने के सभी रास्ते बंद कर दिये। रूढिय़ों की जंजीर में कैद वह मानसिक मौत की गिरफ्त में थी, लेकिन एक दिन उसने सबला बनने की ठान ली। उसने फिर से शादी रचाई और आज नजीर बन समाज के सामने आ गई।
अल्मोड़ा की नीलिमा तो महज एक उदाहरण है। इस तरह का साहस और मान्यताओं को आइना दिखाने में राज्य की 26 महिलाओं को सरकार ने भी अपनी प्रोत्साहन योजना से 11-11 हजार रुपये से पुरस्कृत किया है। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि पिछले एक दशक में राज्य में विधवा विवाह का ग्राफ उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। समाज कल्याण निदेशालय के आंकड़े गवाह हैं कि गुजरे वित्तीय वर्ष (2009- 10) में राज्य भर में 26 (35 वर्ष से कम आयु) विधवाओं ने पुर्नविवाह किया। इन्हें प्रोत्साहन के रूप में सरकार ने 2 लाख 86 हजार रुपये दिये। भले ही कुछ लोग विधवा विवाह के पक्ष में न हों लेकिन समाजशास्त्रियों ने इसे वक्त व समय की जायज मांग बताया है। पिथौरागढ़ निवासी समाजशास्त्री एवं वरिष्ठ पत्रकार गणेश पाठक कहते हैं कि अगर समाज तरक्की के रास्ते पर है तो उसकी आलोचना नहीं बल्कि उसे प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। श्री पाठक विधवा विवाह को प्रोत्साहन के लिए जागरूकता की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि कम उम्र में (जब बच्चे भी न हों) अगर इस विपत्ति का पहाड़ टूट पड़े तो महिला अपने ही घर में (भले वह हर तरह से सम्पन्न हो) उपेक्षित हो जाती है। उसका पूरा सामाजिक ताना-बाना बिखर जाता है, कुदृष्टि का दंश ऊपर से उसे और असुरक्षित कर देता है। कमोवेश इसी तरह की राय हल्द्वानी के ललित बल्लभ सनवाल रखते हैं। मैदानी क्षेत्रों को छोड़ दें तो पर्वतीय क्षेत्र में आज भी मान्यता और रूढिय़ां ही पूरी सामाजिक व्यवस्था का संचालन कर रही हैं। इसमें लोग बदलाव की वकालत करने लगे है। बदलाव की हवा पर्वतीय क्षेत्र में बह चली है। 26 में 17 विधवा विवाह के मामले पर्वतीय जिले से ही सामने आये हैं।
अपर निदेशक समाज कल्याण आरपी पंत कहते हैं कि सरकार भी इस दिशा में प्रोत्साहन देने में पीछे नहीं है। बजट में इस मद में अलग से प्रावधान किया जाता है। पिछले दो वर्षो में विभाग ने विधवा विवाह प्रोत्साहन में 5 लाख 83 हजार रूपये खर्च किये हैं। इस दिशा में अभी और जागरूकता की जरूरत है।
प्रोत्साहन राशि पाने वाले विधवा विवाह के मामले
टिहरी- 2
उत्तरकाशी- 3
देहरादून- 1
हरिद्वार- 1
अल्मोड़ा- 4
बागेश्वर- 1
चंपावत- 4
ऊधमसिंह नगर-9
-पहाड़ों में दम तोड़ रहीं स्वास्थ्य सेवाएं
-मीलों पैदल चलकर भी नसीब नहीं हैं चिकित्सक
- डाक्टरों का टोटा, अस्पताल बने रेफर सेंटर
- फार्मेसिस्ट व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के सहारे चल रहे कई अस्पताल
, बागेश्वर-
सरकार स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर बनाने के लाख दावे करे लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों कई किमी पैदल चलकर भी मरीजों का इलाज नहीं हो पा रहा है। चिकित्सा के अभाव में आए दिन कई मरीजों की मौत हो जाती है। मुख्यालयों में भी सरकारी अस्पताल महज रेफर सेंटर बन गये हैं।
दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित सरकारी अस्पताल फार्मेसिस्टों व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के भरोसे चल रहे हैं। जिला मुख्यालय के अस्पताल भी मरीजों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने में नाकाम साबित हो रहे हैं। चिकित्सकों के सैकड़ों पद रिक्त होने से अस्पताल मात्र रेफर सेंटर बन गये हैं। पिथौरागढ़, चंपावत, अल्मोड़ा व बागेश्वर जिलों के दूरस्थ क्षेत्रों की हालत बेहद खस्ता है। चंपावत के तल्लादेश, डांडा, ककनई, साल मछियाड़ तथा पिथौरागढ़ जिले में मुनस्यारी, धारचूला व डीडीहाट क्षेत्रों में अस्पताल भवन तो बनाये गये लेकिन यहां चिकित्सक ही नहीं हैं। बागेश्वर के गरुड़, कपकोट, कांडा तथा अल्मोड़ा जिले में सल्ट, चौखुटिया, मासी आदि क्षेत्रों के ग्रामीण मीलों पैदल चलकर या मरीज को डोली में रखकर अस्पताल पहुंचाते हैं। जिला मुख्यालयों पर स्थित अस्पतालों में भी मरीजों को बेहतर इलाज नहीं मिल पाता है।
कुमाऊं मंडल के छह जिलों में डाक्टरों के 685 पद स्वीकृत हैं लेकिन काफी समय से 408 पद रिक्त हैं। अल्मोड़ा जिले में 149 स्वीकृत पद हैं जिसमें से 94 पद रिक्त हैं। बागेश्वर में 63 पद स्वीकृत हैं जबकि 44 पद रिक्त हैं। पिथौरागढ़ में 121 स्वीकृत पदों में से 64 पद रिक्त, चंपावत में 45 पद स्वीकृत हैं लेकिन 30 पद रिक्त चल रहे हैं। महिला चिकित्सकों की नियुक्ति नहीं होने से प्रसव पीडि़त कई महिलाएं दम तोड़ देती हैं। कुमाऊं मंडल के छह जिलों में महिला चिकित्सकों के 122 पद स्वीकृत हैं जिनमें से 67 पद रिक्त चल रहे हैं। छह जिलों में दंत चिकित्सकों के कुल 27 पद स्वीकृत हैं जिसमें से 15 रिक्त हैं।
इनसेट
जल्द होगी डाक्टरों की तैनाती: भौर्याल
बागेश्वर: प्रदेश के स्वास्थ्य राज्यमंत्री बलवंत सिंह भौर्याल ने डाक्टरों की कमी से हो रही दिक्कतों को स्वीकार करते हुए कहा कि सरकार को ढाई सौ से अधिक चिकित्सक मिल चुके हैं। शीघ्र ही प्रदेश के विभिन्न अस्पतालों में चिकित्सकों की तैनाती की जायेगी। उन्होंने कहा कि डाक्टरों की कमी के बाद भी प्रदेश सरकार एंबुलेंस 108 सेवा के जरिये लोगों को बेहतर सेवाएं मुहैया कराने का प्रयास कर रही है। जल्द ही चिकित्सकों की कमी को पूरा किया जाएगा।
इनसेट
डाक्टरों के स्वीकृत व रिक्त पदों की सूची
जिला स्वीकृत पद रिक्त पद
नैनीताल 202 87
अल्मोड़ा 193 121
पिथौरागढ़ 156 112
ऊधमसिंह नगर 160 71
चम्पावत 58 38
बागेश्वर 75 54
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तिब्बती रिफ्यूजी भी विदेशी अधिनियम के दायरे में
बेरोकटोक आ-जा नहीं सकेंगे, प्रावधानों को मानना होगा
, रुद्रपुर-
तिब्बती नागरिक देश में बेरोक-टोक नहीं आ जा सकेंगे। उन्हें बाकायदा विदेशी अधिनियम (दॅ फॉरेनर्स एक्ट) 1946 के प्रावधानों के तहत स्पेशल एंट्री परमिट प्राप्त करना होगा। उन पर वे सभी नियम-कानून लागू होंगे, जो सामान्यत: विदेशियों पर लागू होते हैं।
हालांकि इस किस्म की व्यवस्था पहले से भी थी, किंतु सख्ती के साथ लागू नहीं हो पा रही है। अब इसे समुचित तरीके से लागू करने के लिए विदेश मंत्रालय ने राज्यों को एक बार फिर दिशा-निर्देश दिये हैं। इन निर्देशों में कहा गया है कि सन 1959 में तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा को भारत में राजनीतिक शरण दी गयी थी। इस दौरान हजारों तिब्बतियों को भी देश में रिफ्यूजी की तरह रहने की अनुमति दी गयी थी। इन रिफ्यूजियों को यहां राहत तथा पुनर्वास के तौर पर जमीन तथा अन्य सुविधायें मुहैया कराई गयी थीं। यह सब इसलिये किया गया था, ताकि सामान्य परिस्थितियां होने पर वे तिब्बत लौट सकें। उस दौरान यह भी साफ किया गया था कि रिफ्यूजियों को विध्वंसकारी व चीन के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियां संचालित करने की अनुमति नहीं दी जायेगी। साथ ही उन्हें अन्य विदेशियों की तरह ही समझा जायेगा।
मंत्रालय के मुताबिक चूंकि तिब्बती रिफ्यूजी विदेशी माने गये हैं, लिहाजा उनको भी यहां आने, ठहरने तथा लौटने के लिए विदेशी अधिनियम के प्रावधान मानने होंगे। लेकिन देखने में आ रहा है कि 1980 तथा 90 के दशक में यहां आये रिफ्यूजी भारत के आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन में इस तरह रच-बस गये हैं कि वे स्वयं को विदेशी ही नहीं मानते। यही नहीं वे यहां संपत्ति खरीदने तथा भारतीय नागरिक की तरह बर्ताव को भी अपना अधिकार समझने लगे हैं। इससे कई स्थानों पर स्थानीय नागरिकों के साथ टकराव की स्थिति भी पैदा हो रही है। कुल मिलाकर इसका कानून एवं शांति व्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। मंत्रालय का यह भी मानना है कि तिब्बतियों के यहां प्रवेश का उद्देश्य व पंजीयन के साफ दिशा-निर्देश हैं, लेकिन बॉर्डर पर इमीग्र्रेशन चेक पोस्ट और फॉरेनर्स रजिस्ट्रेशन अफसरों की कोताही से दिशा-निर्देश समुचित तौर पर लागू नहीं हो पा रहे हैं। साथ ही देश के भीतर तिब्बतियों के एक से दूसरे स्थान पर होने वाले मूवमेंट से संबंधित प्रावधानों का भी इस्तेमाल नहीं हो रहा है।
मंत्रालय के अनुसार 1959 तक भारत में आने वाले अस्थायी रिफ्यूजी ही पुनर्वास का लाभ लेने के हकदार हैं। 1959 तक भारत आने वालों के 1987 तक जन्मे बच्चे भी इस सुविधा के हकदार हैं। मौजूदा दौर में तिब्बतियों की आवाजाही बढ़ी तो वर्ष 2000 में इनके लिए स्पेशल एंट्री परमिट की व्यवस्था की गयी है। यह परमिट काठमांडू स्थित तिब्बती स्वागत केंद्र की सिफारिश पर भारतीय दूतावास जारी करेगा। यह परमिट तिब्बतियों के बच्चों को भी लेना होगा। देश में प्रवेश के बाद इन लोगों के 14 दिन के भीतर संबंधित क्षेत्र के फॉरेनर्स रजिस्ट्रेशन ऑफिसर को रिपोर्ट करनी तथा पंजीकरण कराना होगा। एंट्री, स्टे तथा एग्जिट को रेगुलेट करने के लिए तिब्बतियों को उत्तर प्रदेश के सोनौली तथा बिहार के रक्सौल के चेक पोस्ट से ही देश में आने की अनुमति होगी। जब वे वापस जायेंगे तो उन्हें इसके बारे में बताना होगा। जो लंबे समय से स्पेशल एंट्री परमिट पर रह रहे हैं उन्हें अवधि समाप्त होने पर इसका नवीनीकरण कराना होगा। अध्ययन, शोध, चिकित्सा या तीर्थाटन के लिए आने वाले तिब्बतियों पर भी वे सभी नियम व कानून लागू होंगे जो अमूमन विदेशियों पर लागू होते हैं। मंत्रालय ने जिन इलाकों में तिब्बतियों की मौजूदगी अधिक है वहां प्रावधान लागू हों इसके लिए संबंधित जिलाधिकारियों व पुलिस अधीक्षकों का संवेदीकरण करने पर भी जोर दिया।
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-धान की रोपाई अनुष्ठान है यहां
-पंचांग से निकाला जाता है रोपाई के लिए दिन
-समापन पर दी जाती है बकरे की बलि
नई टिहरी-
धान की रोपाई का तरीका देश में एक जैसा है। कई स्थानों पर इसे पूजा-अर्चना के साथ किया जाता है। उत्तराखंड राज्य के टिहरी जनपद के मलेथा में पंचांग के मुताबिक धान रोपाई के लिए विधिवत ढंग से दिन निकाला जाता है और समापन पर पशु बलि दी जाती है।
कीर्तिनगर ब्लाक मुख्यालय से महज तीन किमी दूरी पर ऋषिकेश-बदरीनाथ मोटर मार्ग पर बसा हैे गांव मलेथा। वीर शिरोमणि माधो सिंह भंडारी की कर्म स्थली मलेथा में पिछले कई सदियों से धान की रोपाई अपने आप मिसाल है। इस गांव में वर्षों से यह परंपरा है कि धान की रोपाई से पूर्व ग्रामीण गांव की राशि के आधार पर पंचांग से रोपाई शुरू करने के लिए दिन निकालते हैं। नागराजा देवता को मानने वाले मलेथावासी दिन निकल आने पर सबसे पहले एक खेत में नागराजा देवता की सामूहिक रूप से पूजा अर्चना के साथ रोपाई का श्रीगणेश करते हैं। परंपरा बनी हुई है कि इस खेत में रोपाई के बाद ग्रामीण फिर अपने-अपने खेतों में रोपाई का काम प्रारंभ करते हैं। इसके बाद पाटा का बौलू नामक तोक में स्थित गांव के अंतिम खेत में रोपाई के दिन समापन पर बकरे की बलि देने के बाद रोपाई का विधिवत ढंग से समापन किया जाता है।
बुजुर्गों के अनुसार मलेथा गांव में एक समय में सिंचाई का कोई विकल्प न होने पर यहां पर माधो सिंह भंडारी ने छेंडाधार के पहाड़ पर सुरंग गूल बनाकर चन्द्रभागा नदी से मलेथा के खेतों में पानी लाने की व्यवस्था सोची। इसके बाद उन्होंने पहाड़ को खोदकर अंदर ही अंदर गूल (सिंचाई की छोटी नहर) बनाने में सफलता भी हासिल कर ली, लेकिन इसके बाद भी इस गूल में पानी नहीं आया। ग्रामीणों में मान्यता है कि जब भंडारी द्वारा बनाई गई गूल में पानी नहीं आया तो एक रात माधो सिंह के सपने में देवी मां आई और बताया कि जब तक वह नरबलि नहीं देंगे तब तक गूल में पानी आगे नहीं बढ़ेगा।
कहा जाता है कि देवी मां के इस संदेश के बाद भंडारी ने जहां से गूल शुरू होती है वहां पर अपने बेटे की बलि दी थी। बताया जाता है कि आज जिस खेत में ग्रामीण रोपाई का समापन करते हैं उसी खेत में बलि के बाद भंडारी के बेटे का सिर पानी में बहकर आया था। इसके बाद ही समापन पर तब से अब तक यह परंपरा चली आ रही है और इस खेत में बकरे की बलि दी जाती है और बलि के बाद बकरे का मांस पूरे गांव में प्रसाद के तौर पर बांटाा जाता है।
यदि मलेथा के खेतों को इस गूल से पानी नहीं मिलता तो आज यह खेत सोना नहीं उगल रहे होते। आज भी दूर से देखने पर ही मलेथा के यह खेत हर किसी का मन मोह लेते हैं। यात्रा सीजन में तो बाहर से आने वाले तीर्थ यात्री व पर्यटक भी मलेथा में रुककर कुछ देर हरियाली से भरे खेतों को निहारते देखे जा सकते हैं।
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ये वादियां ये फिजाएं बुला रही हैं तुम्हें
-कुंभ के दबाव से घटे इस बार देशी सैलानी
-वर्ष के आखिरी सप्ताह में विदेशी सैलानी बढऩे की उम्मीद
-पिछले वर्ष की तुलना में अधिक बरसा धन
-सोलह जून से सैलानियों के लिए बंद होगा पार्क
हरिद्वार: महाकुंभ के दबाव ने देशी सैलानियों को राजाजी के दीदार से रोक दिया, वहीं विदेशी सैलानियों की आमद ने पार्क के चेहरे पर चमक बिखेर दी। पिछले वर्ष प्रवेश शुल्क की बढ़ोतरी ने तो कमाल कर दिया। पार्क बंद होने से सप्ताह भर पहले ही पिछले सीजन की कमाई का पार्क की चीला रेंज ने रिकार्ड तोड़ दिया। राजाजी की चीला रेंज मालामाल हो चुकी है। राजाजी पार्क 16 जून से सैलानियों के लिए बंद कर दिया जाएगा।
गढ़वाल की वादियों में राजाजी नेशनल पार्क प्रकृति के अद्भुत और वन्य जीवों के संगम से गुलजार है। एशियन एलीफेंट की शरणस्थली कहे जाने वाले राजाजी पार्क में इन दिनों बहार आई हुई है। हाथियों का झुंड नजर आ रहे हैं। तेंदुए भी सैलानियों को दिख रहे हैं। चीतल का कुलांचे भरना सैलानियों को रोमांचित कर रहा है। पिछले सीजन में राजाजी नेशनल पार्क का प्रवेश शुल्क प्रति सैलानी 40 से बढ़ाकर 150 रुपये कर दिया गया था। राजाजी पार्क में भ्रमण के लिए प्रति भारतीय सैलानी 350 रुपये और विदेशी सैलानी 600 रुपये के करीब शुल्क पहुंचा दिया गया। शुल्क बढऩे की वजह से राजाजी के खजाने में लक्ष्मी की बरसात हुई है। पिछले सीजन में राजाजी के खजाने में 17 लाख 35 हजार रुपये आए थे, जबकि इस बार अब तक 28 लाख 62 हजार की आमदनी हो चुकी है। हां, देशी सैलानियों के पांव राजाजी की ओर बढऩे से जरूर थमे। पिछले सीजन में 16000 भारतीय सैलानी राजाजी पार्क पहुंचे थे, जबकि इस बार अब तक 12 हजार देशी सैलानी ही पहुंचे हैं। हालांकि पार्क प्रशासन कुंभ के चार महीने के दबाव को इसकी मुख्य वजह मान रहा है। थोड़ी सी मायूसी के साथ खुशी की बात यह है कि विदेशियों का राजाजी पार्क से मोहभंग नहीं हुआ है। पिछले सीजन की तुलना में विदेशी मेहमानों की आमद पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। पिछले सीजन में पार्क बंद होने तक 1888 विदेशी सैलानियों ने राजाजी की चीला रेंज के दीदार किये, जबकि इस बार अभी तक यह तादाद 1865 पर ही पहुंची है। अभी पार्क बंद होने में सप्ताह भर का समय शेष है। इसलिए माना जा रहा है कि पिछले रिकार्ड को विदेशियों की आमद तोड़ सकती है। पार्क प्रशासन भी यही मान रहा है।
'राजाजी की चीला रेंज सोलह जून से बंद हो जाएगी। हाथियों सहित वन्य जीव खूब नजर आ रहे हैं। कुंभ की वजह से भारतीयों की तादाद कम हुई, लेकिन विदेशियों की मौजूदगी अच्छी रही। प्रवेश शुल्क सहित अन्य में बढ़ोतरी की वजह से पिछले वर्ष की आमदनी को पीछे छोड़ राजाजी के चीला रेंज ने नई उपलब्धि हासिल की हैÓ
महेन्द्र सिंह नेगी
चीला रेंज, राजाजी नेशनल पार्क
-धूल फांक रहे गढ़वाल कमिश्नरी के जनक
-बच्चा पार्क में 1987 में स्थापित की थी बैरिस्टर मुकंदी लाल की प्रतिमा
-वर्ष 2006 से शुरू हुए पार्क के दुर्दिन
, कोटद्वार (गढ़वाल)
गढ़वाल कमिश्नरी के जनक व बहुमुखी प्रतिभा के धनी बैरिस्टर मुकंदी लाल की प्रतिमा चंद लोगों की राजनीति के चलते राजमार्ग के किनारे धूल फांक रही है। वर्ष 1987 में जिस प्रतिमा को युवाओं व बच्चों में इस महान शख्स के प्रति जिज्ञासा पैदा करने को स्थापित किया गया था, आज उसकी देखरेख करने वाला कोई नहीं है।
सत्तर के दशक में कोटद्वार पहुंचे संत स्वामी राम के समक्ष स्थानीय नगर पालिका परिषद ने बच्चों के लिए नगर में एक पार्क स्थापित करने का बात रखी। स्वामी राम ने पार्क के लिए तीन लाख की धनराशि पालिका को उपलब्ध करवा दी, जिसके बाद पालिका ने यहां बदरीनाथ मार्ग पर डाकघर के समीप करीब एक बीघा भूमि पर 'बच्चा पार्कÓ की स्थापना कर वहां झूले व सी-सॉ लगा दिए। इसी पार्क के एक कोने में व्यायामशाला भी थी। शाम होते ही पार्क का नजारा दर्शनीय होता था। एक ओर युवा अपने शरीर को बलिष्ठ बनाते नजर आते, तो दूसरी ओर छोटे-छोटे बच्चे झूलों में झूलते दिखाई देते। पार्क में बच्चों की लगातार बढ़ती आवाजाही को देखते हुए पालिका ने पार्क में बहुमुखी प्रतिभा के धनी बैरिस्टर मुकंदी लाल की प्रतिमा स्थापित की थी। 14 अक्टूबर वर्ष 1987 को उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन वन मंत्री बलदेव सिंह आर्य ने प्रतिमा का अनावरण किया, साथ ही पार्क का नाम 'बैरिस्टर मुकंदी लाल पार्कÓ कर दिया गया। हालांकि क्षेत्रीय जनता आज भी इसे बच्चा पार्क के नाम से ही जानती है। मूर्ति स्थापित करने का उद्देश्य स्पष्ट था कि पार्क में आने वाले बच्चों में बैरिस्टर साहब के बारे में जिज्ञासा उत्पन्न हो व भविष्य में वे भी उनके आदर्शों को आत्मसात कर उन्नति के चरम पर पहुंच सकें। वर्ष 2006 में इस बच्चा पार्क के दुर्दिन शुरू हो गए। तत्कालीन कांग्रेस शासनकाल में नगर पालिका ने तमाम विरोधों के बावजूद बच्चा पार्क की भूमि 'प्रेक्षागृहÓ निर्माण को दे दी। कांग्रेस शासनकाल में प्रेक्षागृह के नाम पर इस भूमि में कुछ पिल्लर खड़े कर निर्माण कार्यों की इतिश्री कर दी गई। आज स्थिति यह है कि पिछले चार वर्षों से इस प्रेक्षागृह में निर्माण के नाम पर एक ईंट तक नहीं लगी है व बैरिस्टर साहब की प्रतिमा इस खंडहर के मध्य खड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग का धूल फांक रही है।
''वर्तमान में बैरिस्टर मुकंदी लाल की प्रतिमा जिस हालत में है, उसे कोटद्वार के लिए दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। पूर्व पालिका बोर्ड की ओर से बच्चा पार्क को प्रेक्षागृह के लिए दिया जाना पूरी तरह गलत था।ÓÓ
शशि नैनवाल,
अध्यक्ष, नगरपालिका कोटद्वार
''शासन की ओर से बजट अवमुक्त न होने से प्रेक्षागृह का निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो पाया है। बैरिस्टर साहब की नई मूर्ति बनाने के लिए भी शासन को प्रस्ताव भेजा गया है।ÓÓ
डा. बीपी बडोनी
जिला संस्कृति अधिकारी, पौड़ी
''बैरिस्टर मुकंदी लाल की प्रतिमा के वर्तमान हालात दुर्भाग्यपूर्ण है। गढ़वाल की जिस जानी-मानी शख्सियत को युवाओं का आदर्श बनना था, चंद लोगों की 'राजनीतिÓ के चलते खंडहर में पड़ी है।ÓÓ शशिधर भट्ट
पूर्व पालिकाध्यक्ष, नगरपालिका परिषद
कोटद्वार
Thursday, 20 May 2010
- देवभूमि : नीर-क्षीर की जगह बह रही मदिरा
- बढ़ रही शराब की खपत, उजड़ रहे घर, बिखर रहे परिवार
- गत वर्ष 400 लाख लीटर शराब की खपत
Pahar1-: देवभूमि उत्तराखंड में नीर-क्षीर की जगत अब मदिरा की नदियां बहने लगी हैं। बढ़ रही खपत के अनुपात में आबकारी राजस्व भले ही कई गुना हो गया हो, लेकिन घर उजड़ रहे हैं और परिवार बिखर रहे हैं। पिछले साल सूबे में चार सौ लाख लीटर शराब और 110 लाख बोतल बीयर की खपत हुई। पहाड़ में जहां महिलाएं इस कारोबार में आगे आने लगी हैं वहीं बड़े नगरों में अब हाई क्लास महिलाएं भी इसका सेवन करने लगी हैं।
पहाड़ में एक दौर था जब शराब नहीं रोजगार दो के नारे गूंजते थे। अल्मोड़ा के बसभीड़ा से सत्तर के दशक का यह आंदोलन गांव-गांव चला। पर बदले वक्त में अब पर्वतीय समाज में शराब की स्वीकार्यता आम हो गयी है। शादी उत्सव जैसे कार्यक्रमों के अलावा देवकार्यों और मातमपुर्सी में भी आसुरी प्रवृति बढ़ गई है। सूबे में भले ही आयकर के बाद आबकारी से सबसे ज्यादा राजस्व मिलता हो, लेकिन बर्बाद हो रही युवा पीढ़ी की चिंता न तो नुमाइंदों को है न ही पहाड़ के कथित झंडा बरदारों को। वर्ष 2006 में नैनीताल शरदोत्सव में आये गायक अन्नू कपूर ने सूर्य अस्त पहाड़ी मस्त कहा तो इसका खूब विरोध हुआ, लेकिन हकीकत का आइना देखने के बाद भी आज विरोध करने वाले स्वीकारते है कि स्थिति दिनोंदिन बिगड़ रही है। अब तो भोर में ही कई शराबी नजर आ जाते हैं। फलस्वरूप शराब ने हजारों परिवार बेघर कर दिये हैं। कई परिवारों में हर रोज कलह अशांति का कारण शराब बन रही है।
आबकारी महकमे के आंकड़े देखे तो राजधानी दून पहले और धर्मनगरी हरिद्वार दूसरे स्थान पर है। भले ही इस बार महाकुंभ में करोड़ों लोगों ने यहां गोते लगाकर पुण्य कमाया हो। पर्यटक नगरी नैनीताल में भी शराब की रेलमपेल है। पूरे जिले में वर्ष 2008-09 में 65 लाख लीटर शराब और 15 लीटर बियर से गला तर किया गया है। महानगरों की तरह उत्तराखंड की राजधानी देहरादून, हल्द्वानी, रुद्रपुर, नैनीताल, हरिद्वार में तो महिलाओं में भी आसुरी प्रवृति पनपने लगी है। कई स्थानों पर साधु वेशधारी भी कच्ची-पक्की गटक जा रहे हैं। युवा पीढ़ी के अलावा शार्टकट तरीके से नव धनाढ्य बन रहे लोगों में भी शराब का प्रचलन बढ़ा है।
बहरहाल देवभूमि में जड़े जमा रही आसुरी प्रवृति ने यहां के सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने में सेंध लगा दी है। राजस्व के नाम पर जहां भविष्य से खिलवाड़ हो रहा है, वहीं कई परिवर बिखर रहे हैं। इसके बावजूद सरकार बिजली, पानी, राशन से ज्यादा इस बात की चिंता करती है कि शराब का ठेका किसी कीमत पर बंद नहीं होना चाहिए।
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आबकारी विभाग का आंकड़ा (वर्ष 2008-09)
जनपद देशी शराब विदेशी शराब बियर
चम्पावत 8.16 4.66 2.22
पिथौरागढ़ 5.58 9.98 5.87
बागेश्वर 6.21 6.08 2.01
अल्मोड़ा 20.98 34.94 5.43
यूएसनगर 16.49 9.79 16.23
नैनीताल 39.58 25.24 14.62
चमोली - 8.07 4.22
पौड़ी - 23.59 8.07
रुद्रप्रयाग - 4.02 0.30
उत्तरकाशी - 8.30 1.98
टिहरी - 16.61 6.38
हरिद्वार 52.97 12.97 13.57
देहरादून 60.80 34.04 27.02
कुल- 210.77 189.29 107.92
नोट- शराब लाख रुपये में तथा बियर लाख बोतल में है।
बदरीनाथ धाम के कपाट खुले
-पहले दिन किए हजारों भक्तों ने भगवान बदरी विशाल के दर्शन
-अगले छह माह तक भक्त कर सकेंगे दर्शन
-पहले दिन दर्शन करने वालों में प्रसिद्ध उद्योगपति अनिल अंबानी भी
बदरीनाथ,: रिमझिम बारिश और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच चार धामों में सर्वश्रेष्ठ धाम बदरीनाथ के कपाट बुधवार को श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए। इस दौरान गढ़वाल स्काउट के बैंड की भक्तिमय धुनों और बदरीनाथ के जयकारों से पूरा बदरीकाश्रम गुंजायमान हो उठा। देश-विदेश से आए हजारों भक्तों ने पहले दिन भगवान बदरीविशाल के दर्शन किए।
बुधवार की तड़के ही बदरीनाथ क्षेत्र में बारिश शुरू हो गई। सुबह लगभग पौने आठ बजे मुख्य पुजारी रावल केशव प्रसाद नम्बूदरी, धर्माधिकारी जगदम्बा प्रसाद सती, भीतला बड़वा भगवती प्रसाद डिमरी, मुख्य कार्याधिकारी पीसी डंडरियाल आदि ने मंदिर में प्रवेश किया। तत्पश्चात सभी धार्मिक व पौराणिक परम्पराओं का निर्वहन करते हुए मुख्य पुजारी रावल केशव प्रसाद नम्बूदरी ने शीतकाल में छह माह तक गर्भगृह में नारायण की मूर्ति के साथ विराजित महालक्ष्मी की मूर्ति को बाहर लाकर मंदिर परिसर में यथास्थान विराजित किया। इसी दौरान बदरीश पंचायत में भगवान की उत्सव मूर्ति उद्धव जी एवं धन के देवता कुबेर जी को भी पुजारी रावल ने गर्भगृह के भीतर यथास्थान विराजित किया। इसके बाद भगवान की महाभिषेक पूजा के साथ ही उन्हें खीर भोग चढ़ाया गया और फिर ठीक 8 बजकर 6 मिनट पर वेदमंत्रों के उच्चारण के बीच बदरीविशाल के कपाट ग्रीष्मकाल के लिए श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए। कपाट खुलने के मौके पर जहां मंदिर के भीतर मंत्रोच्चारण किए जा रहे थे, वहीं मंदिर के बाहर गढ़वाल स्काउट के बैंड की धुनों ने वातावरण को अधिक भक्तिमय बना दिया। माणा व बडग़ांव की महिलाओं ने भी देव स्तुति में गीत गाकर श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध किया। कपाट खुलते ही जयकारों के साथ पंक्तिबद्ध भक्तजनों ने बदरीविशाल के दर्शन किए।
-चारधाम: हवाई सेवा को दो कंपनियों को अनुमति
फेरों की संख्या पर सरकार शीघ्र करेगी निर्णय
Pahar1-
सरकार ने चारधाम के लिए हेलीकाप्टर सेवा शुरू करने के लिए दो कंपनियों को अनुमति दी है। हालांकि फेरों की संख्या अभी निर्धारित नहीं की गई है। हेलीकाप्टर सेवा शुरू करने पर कुछ अन्य कंपनियों व सरकार के बीच अभी वार्ता जारी है।
चारधाम यात्रा को सरकार ने व्यापक तैयारी की है। संबंधित विभागों को यात्रियों की सहूलियतों का पूरा ख्याल रखने के कड़े निर्देश दिए गए हैं। इसे देखते हुए नागरिक उड्डयन विभाग ने यात्रा मार्ग पर हेलीकाप्टर सेवा शुरू करने की योजना बनाई और सरकार को एक प्रस्ताव भेजा। विभिन्न स्तरों पर हुई वार्ता के बाद दस कंपनियां यात्रा रूट पर हेलीकाप्टर सेवा शुरू करने पर राजी हो गई। बाद में किसी कारणवश दो कंपनियों के प्रस्ताव निरस्त करने पड़े। शासन द्वारा जारी आदेश में फिलहाल मैसर्स पवनहंस हेलीकाप्टर्स लिमिटेड व मैसर्स प्रभातम एविएशन प्राइवेट लिमिटेड को यात्रा रूट पर अपनी सेवाएं शुरू करने की अनुमति दे दी गई है। शेष छह कंपनियों द्वारा हेलीकाप्टर सेवा शुरू करने के बाद ही तय किया जाएगा कि एक दिन में कितने चक्कर लगाने हैं।
राज्य आंदोलनकारियों को नौकरी देने संबंधी शासनादेश निरस्त
-हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 का उल्लंघन करार दिया
, नैनीताल: हाईकोर्ट ने राज्य आंदोलनकारियों को नौकरी देने संबंधी
शासनादेश को संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 का उल्लंघन करार देते हुए उसे निरस्त कर दिया है।
राज्य आंदोलनकारी करूणेश जोशी व नारायण सिंह राणा द्वारा हाईकोर्ट में दायर याचिकाओं में उन्हें शासनादेश के अनुरूप नियुक्ति दिए जाने का आग्रह किया गया था। याचिका कर्ता करुणेश जोशी का कहना था कि सरकार द्वारा 11 अगस्त 04 को एक शासनादेश जारी किया गया था, जिसमें उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों को सेवा नियमों में शिथिलता बरतते हुए तृतीय श्रेणी की नौकरियों मेें नियुक्ति देने के निर्देश दिये गये थे। याचिका कर्ता का कहना था कि उक्त शासनादेश के तहत आंदोलन के दौरान घायल होने के नाते वह नौकरी पाने का अधिकारी है, परन्तु सरकार द्वारा उसे नौकरी देने से इंकार किया जा रहा है। दूसरे याची नारायण सिंह राणा का कहना था कि सरकार के अनुमोदन बावजूद ऊधमसिंह नगर के जिला शिक्षाधिकारी द्वारा उन्हें विभाग में नौकरी नहीं दी जा रही है। दोनों याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूर्व में ऊधमसिंह नगर के जिला शिक्षाधिकारी को तलब किया था, जिस पर जिला शिक्षाधिकारी द्वारा याचिका कर्ता नारायण सिंह राणा को कोर्ट में नियुक्ति पत्र दिया गया।
इधर न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल की एकलपीठ ने दोनों याचिकाओं में एक साथ बहस सुनने के बाद पाया कि उक्त शासनादेश संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 का उल्लंघन है तथा राजकीय कर्मचारियों की सेवा नियमावली में संशोधन किये बिना जारी किया गया है। एकलपीठ का कहना था कि उक्त शासनादेश विभिन्न न्यायालयों के न्याय निर्णयों के भी विरुद्ध है। इस आधार पर हाईकोर्ट की एकलपीठ ने राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरियों में नियुक्ति देने संबंधी 11 अगस्त 04 के शासनादेश को निरस्त कर दिया।
342 संविदा प्रवक्ताओं की होगी भर्ती
- पर्वतीय क्षेत्रों के महाविद्यालयों में शिक्षकों की कमी को दूर करने में जुटा विभाग
- शासन को भेजा प्रस्ताव
, हल्द्वानी: पर्वतीय क्षेत्रों के महाविद्यालयों में प्रवक्ताओं की कमी को दूर
करने के लिए उच्च शिक्षा निदेशालय स्तर से कवायद चल रही है। निदेशालय की ओर से 343 पदों पर प्रवक्ताओं को संविदा पर नियुक्ति के लिए प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है। इससे उम्मीद जतायी जा रही है कि नये सत्र से दूरस्थ क्षेत्र के छात्र-छात्राओं को लाभ मिल सकेगा।
राज्य में 69 राजकीय महाविद्यालय संचालित हो रहे हैं। इनमें प्रवक्ताओं के 1260 पद सृजित हैं। इसमें 540 शिक्षक ही नियमित हैं। 384 प्रवक्ता विजिटिंग व संविदा पद पर कार्यरत हैं। इसमें से अधिकांश शिक्षकों ने अपना स्थानान्तरण शहरी क्षेत्रों के महाविद्यालयों में कराया है। इसके चलते पर्वतीय क्षेत्रों के महाविद्यालयों की स्थिति बेहद दयनीय हो रही है। शिक्षकों की जबरदस्त कमी है। राज्य लोक सेवा आयोग से समय रहते नियुक्ति नहीं होना भी समस्या बनी हुई है। अब इस कमी को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए उच्च शिक्षा निदेशालय ने 343 प्रवक्ताओं को संविदा पर नियुक्त करने के लिए प्रस्ताव शासन को भेजा है। उच्च शिक्षा निदेशालय के संयुक्त निदेशक प्रो. बहादुर सिंह बिष्ट ने बताया कि शिक्षकों की कमी को दूर किया जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ किया जा रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों के छात्र-छात्राएं भी उच्च शिक्षा का लाभ उठा सकें। इसके लिए संविदा पर प्रवक्ताओं की नियुक्ति के लिए प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। उम्मीद है कि नये सत्र में शिक्षकों की कमी नहीं रहेगी।
भक्तों के दर्शनार्थ खुले केदारनाथ के कपाट
-सुबह 7:15 पर खुले कपाट
-मुख्यमंत्री डा. निशंक के अलावा पूर्व उप प्रधानमंत्री आडवाणी ने की पूजा अर्चना
-पहले दिन हजारों भक्तों ने किए दर्शन
केदारनाथ,: ग्यारह ज्योतिर्लिंगों में एक केदारनाथ धाम के कपाट मंगलवार को वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ सुबह 7:15 बजे श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। इस मौके पर मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक के अलावा पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी केदारबाबा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की। इसके साथ ही यहां पहले दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं दर्शनों को पहुंचे।
मंगलवार सुबह सर्वप्रथम शुभलग्नानुसार मंदिर के कपाट पर मंदिर समिति के मुख्य पुजारी गंगाधर ने पूजा अर्चना कर मंदिर के कपाट खोले। तत्पश्चात गर्भ गृह की पूजा हुई। यहां पर मंदिर के मुख्य पुजारी के साथ ही रावल भीमाशंकर लिंग, वेद पाठी व मंदिर समिति के कर्मचारियों ने पूजा अर्चना की तथा अखण्ड ज्योति के दर्शन किए। इसके पश्चात कपाट दर्शनार्थियों के लिए खोल दिए गए। अब अगले छह माह तक भक्तभोले बाबा के दर्शन केदारनाथ में कर सकेंगे। इस मौके पर भक्तों ने भोले बाबा की जय जयकार के नारे लगाए। कपाट खुलने के अवसर पर मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक पत्नी समेत मौजूद थे और कपाट खुलने पर उन्होंने पूजा अर्चना की। पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने तकरीबन साढ़े दस बजे मंदिर में पूजा-अर्चना कर केदारबाबा के दर्शन किए। उनके साथ उनकी पुत्री प्रतिभा आडवाणी भी थी।
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Wednesday, 19 May 2010
उत्तराखंड में राजकीय इंटर कालेजों में प्रवक्ताओ के लिए परीक्षा
उत्तराखंड में राजकीय इंटर कालेजों में प्रवक्ताओ के लिए परीक्षा तिथि २६ म्र्ई २०१० को ।
Thursday, 13 May 2010
उत्तराखण्ड सचिवालय/लोक सेवा आयोग परीक्षा परिणाम
Result of Data Entry Operator examination 2007
Result of Drug Inspector
Result of A.M.O. Male
Rejection List Of Candidates Applied For Lecturer In Govt. Inter College
शुद्विपत्र- उत्तराखण्ड सचिवालय/लोक सेवा आयोग समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी मुख्य परीक्षा-2007 से सम्बन्धित शुद्विपत्र
विज्ञप्ति-उत्तराखण्ड राज्य सम्मिलित सिविल/प्रवर अधीनस्थ सेवा (मुख्य)परीक्षा-2006 का परीक्षा परिणाम
विज्ञप्ति- उत्तराखण्ड सचिवालय/लोक सेवा आयोग समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी मुख्य परीक्षा-2007 से सम्बन्धित पाठयक्रम के प्रकाशन के सम्बन्ध में
विज्ञप्ति- सम्मिलित राज्य अभियन्त्रण सेवा परीक्षा 2007 के आयोजन सम्बन्धित विज्ञप्ति
चयन परिणाम-उत्तराखण्ड शासन के उच्च्ा शिक्षा विभाग के अर्न्तगत महाविद्यालयों में प्रवक्ता शिक्षा शास्त्र के रिक्त पदों हेतु
चयन परिणाम विज्ञप्ति-उत्तराखण्ड शासन के चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अर्न्तगत चिकित्सा अधिकारी विशेषज्ञ-उप संवर्ग के पदो पर चयन हेतु
see-http://gov.ua.nic.in/tenders/showtenders.aspx?Did=22
Thursday, 6 May 2010
-बदरीनाथ में तैयार हो रहा है 'नन्हा भारत
-नौ हेक्टेयर क्षेत्र में फैल रहा है बदरीश एकता वन
-सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को वन क्षेत्र में आरक्षित है भूमि
-पर्यावरण संरक्षण को आस्था से जोडऩे की हो रही है अनूठी पहल
-यात्री यात्रा की स्मृति में वन क्षेत्र में लगा रहे हैं एक-एक पौध
Pahar1- गोपेश्वर(चमोली): श्रीबदरीनाथ धाम में मिनी इंडिया तैयार हो रहा है। महज सात वर्ष के इस नन्हे भारत की आबादी अब तक 734 हो गई है। आस्था और विश्वास से सींचे जा रहे इस भारत में सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के लिए भूमि आरक्षित है, जिनमें फिलहाल चार प्रजातियों की वंशवृद्धि की जा रही है। यह नया भारत न सिर्फ अनेकता में एकता का प्रतीक है, बल्कि देश और दुनिया को पर्यावरण संरक्षण के लिए एकजुट होने का संदेश भी दे रहा है।
बात हो रही है भू-बैकुंठधाम बदरीनाथ में तैयार किए जा रहे बदरीश एकता वन की। 23 जून 2002 को वन महकमे ने श्रीबदरीनाथ धाम में पर्यावरण संरक्षण को आस्था से जोडऩे की एक अनूठी पहल की। माणा और बामणी गांव के सहयोग से बदरीनाथ में देवदर्शनी के पास नौ हेक्टेयर भूमि का चयन किया गया। इस भूमि को 35 हिस्सों में बांटकर सभी 28 राज्यों व 7 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए जमीन आरक्षित की गई, जिसे बदरीश एकता वन नाम दिया गया।
इसका मकसद था आस्था को पर्यावरण संरक्षण से जोडऩा। यानि बदरीनाथधाम में आने वाले यात्रियों को इस बात के लिए प्रेरित किया जाना कि वे अपने पूर्वजों, परिजनों, मित्रों अथवा यात्रा की स्मृति में अपने-अपने राज्यों के लिए आवंटित भूमि पर एक पौध रोपित करें। इसके लिए पेड़ लगाने वाले प्रत्येक यात्री को वन विभाग को सौ रुपए देने होते हैं, जिसमें वृक्ष की कीमत और उसके रखरखाव का खर्च शामिल है। धीरे-धीरे ही सही लेकिन यह योजना रंग लाने लगी है।
अब तक देश के कोने-कोने से यहां आए आम से लेकर खास तीर्थयात्री बदरीश एकता वन में भोजपत्र, कैल, देवदार, जमनोई प्रजातियों के कुल 734 पौधे लगा चुके हैं। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि प्रचार-प्रसार के अभाव में बदरीश वन फल-फूल नहीं पाया। हालांकि, अब बदरीश वन पर सूबे के मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक की नजरें इनायत हुई हैं। गत 26 अप्रैल को जोशीमठ पहुंचे डा. निशंक ने न सिर्फ बदरीश वन के कांसेप्ट की सराहना की, बल्कि उसके रखरखाव और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने की अहम घोषणा भी की। नई व्यवस्था के तहत इस अनूठे वन को संवारा जाएगा। वन क्षेत्र पर लगे प्रत्येक पौधे पर उसे लगाने वाले व्यक्ति की नेम प्लेट भी लगाई जाएगी और वृक्ष की देखरेख के लिए बाकायदा कर्मचारी भी तैनात किए जाएंगे।
''बदरीश एकता वन को कैम्पा (कंपनसेटरी एफारेस्टेशन मानीटरिंग प्लान अथारिटी) प्रोजेक्ट के तहत विकसित करने के निर्देश मुख्यमंत्री ने दिए हैं। वन क्षेत्र में वृक्षों की देखभाल के लिए कर्मचारी तैनात होंगे और योजना के प्रचार प्रसार के लिए सभी राज्यों में प्रचार सामग्रियां भेजी जाएंगी। हाईटैक प्रचार को भी अपनाया जाएगाÓÓ
सनातन, डीएफओ अलकनन्दा भूमि संरक्षण वन प्रभाग
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नदियों का उद्गम स्थल ही 'प्यासा
हालात बेकाबू: प्रति व्यक्ति जरूरत
135 लीटर पानी की, मिल नहीं रहा
आधा भी
-17 लाख आबादी मात्र 10
लीटर प्रति व्यक्ति में ही चला रही है
काम
Pahar1- हल्द्वानी: पहाड़ों का पानी भले ही देशभर का गला तर कर रहा हो, पर यह सच है कि आज 'पहाड़Ó खुद भी प्यासा है। सरकारी विभाग के आंकड़े भी इस बात की गवाही दे रहे हैं कि उत्तराखंड के ग्र्रामीण इलाकों में रहने वाली 17 लाख आबादी को बमुश्किल 10 लीटर प्रति व्यक्ति पानी मिल रहा है, जबकि मानक अनुरूप जरूरत 135 लीटर प्रति व्यक्ति पानी की है। ऐसे में व्यक्ति क्या नहा रहा होगा और क्या पी रहा होगा, समझना कठिन नहीं है।
उत्तराखंड नदी-नहरों का प्रदेश कहा जाता है। हल्द्वानी में गौला नदी, कुमाऊं नेपाल सीमा में काली, अल्मोड़ा में नयार, बागेश्वर से सरयू, चौखुटिया से रामगंगा, बागेश्वर से गोमती तो अल्मोड़ा से कोसी नदी निकलती है। यहां से निकलने वाली यही नदियां देश की लाखों आबादी की प्यास बुझा रही हैं। मगर हैरत की बात तो यह है कि पानी देने वाला उत्तराखंड आज खुद ही प्यासा है। थोड़ी-बहुत राहत केवल तराई में है, पहाड़ पर तो केवल त्राहि-त्राहि है। सिंचाई विभाग के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि नदियों का जलस्तर जहां तेजी से गिर रहा है तो जलस्रोतों की कमी के कारण नहरें सूखती जा रही हैैं। कोसी नदी का जलस्तर गिरने से अल्मोड़ा जिला त्राहि-त्राहि कर रहा है तो बागेश्वर समेत राज्य के कई पर्वतीय हिस्सों में तो लोग कई-कई दिनों का रखा पानी पीने को मजबूर हैं। गौला नदी का जल स्तर गिरने से कुमाऊं के प्रवेश द्वार हल्द्वानी की जनता को भी अब गला तर करने में दिक्कतें आ रही हैं। अगर जल संस्थान के निर्धारित मानकों की बात करें तो हर व्यक्ति को 135 लीटर पानी की जरूरत होती है। मगर पहाड़ के 21 ऐसे शहर-कस्बे हैं, जहां की आबादी को आधा यानि 70 लीटर पानी तक नसीब नहीं हो पा रहा है। ग्रामीण अंचलों में तो लोग 40 लीटर प्रति व्यक्ति पानी से ही काम चला रहे हैैं। सिंचाई विभाग के उच्चाधिकारियों का कहना है कि प्रदेश में करीब 39,180 ग्र्रामीण क्षेत्र हैैं। जिनमें करीब 70.60 लाख आबादी निवास करती है। इस आबादी में करीब 17 लाख लोगों को महज दस लीटर पानी ही रोजाना मिल पा रहा है। सोचने वाली बात है कि 135 लीटर पानी की जरूरत वाला व्यक्ति 10 लीटर पानी में कैसे जरूरत पूरी कर रहा होगा।
संकट हल करने का पूरा प्रयास: पंत
हल्द्वानी: पेयजल मंत्री प्रकाश पंत का कहना है कि पेयजल संकट तो है, मगर सरकार भी पूरी गंभीरता से उसको ले रही है। शहर की सीमा में आ चुकी ग्र्रामीण बस्तियों को स्वैप योजना से बाहर किया जा रहा है, ताकि इन्हें मानकों के अनुसार पानी दिया जा सके।
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-'कुदरत की हिफाजत है संस्कार
यहां जंगल और पानी हैं देवता
--पर्वतीय क्षेत्रों में लोक जीवन की परंपराएं कर रही पर्यावरण संरक्षण
-म_ी गांव और डख्याट गांव ने संरक्षित रखा है अपने जंगलों को
-इन गांवों में कभी नहीं हुई पानी की कमी और बीमारी का प्रकोप
Pahar1-उत्तरकाशी
आस्था ईमान को जन्म देती है और पैसा भ्रष्टाचार को। इसे साबित करने के लिए किसी उदाहरण की जरूरत नहीं। देवभूमि में जो काम अरबों रुपये नहीं कर पाए, उसे आस्था ने कर दिखाया। पूर्वजों से विरासत में मिली परंपराओं को सहेजे ग्रामीणों ने जो मिसाल कायम की, वह सरकार और उन्नति के पथ पर दौड़ रहे समाज के लिए किसी आइने से कम नहीं। उत्तरकाशी जिले के म_ी और डख्याट गांव के लहलहाते जंगल आस्था और विश्वास से ही सींचे गए हैं। ये देवता के वन हैं, मजाल क्या कोई इन्हें काटने की सोचे। इन वृक्षों की बाकयदा पूजा-अर्चना की जाती है।
पर्यावरण पर छाए संकट को लेकर दुनियाभर में चिंतन और मनन का दौर चल रहा है। योजनाएं बनीं, कानून बने और जनजागरूकता के नाम पर करोड़ों रुपये बहाए जा रहे हैं। पानी की तरह बह रहा पैसा भी हरियाली नहीं लौटा पा रहा है।
गंगा और यमुना के मायके में श्रद्धा और विश्वास ने जो कर दिखाया वह सचमुच अनुकरणीय है। म_ी गांव के ऊपर का जंगल मटियाल देवता का जंगल कहलाता है। बांज, खर्सू और मोरू के इस घने जंगल को गांव के पूर्वजों ने देवता का जंगल घोषित कर दिया था, जिसकी बाकायदा पूजा की जाती है। जंगल में कोई भी ग्रामीण पेड़ों को काटना तो दूर उन्हें नुकसान तक नहीं पहुंचाता है। दस हजार पेड़ों वाले इस जंगल का साल में माघ व पौष मास में पूजन किया जाता है। तभी इसकी कटाई छंटाई और नए पेड़ों के लिये कलम भी लगाई जाती है।
दूसरी ओर यमुना घाटी में डख्याट गांव में 15 हेक्टेयर भूमि में विकसित घना बांज का जंगल भी सौ साल पहले गांव के पूर्वजों की देन है। जंगल पनपाने के बाद पूर्वजों ने जो परंपराएं कायम की थी वो आज भी ज्यों की त्यों हैं। आज भी इस जंगल में कोई भी ग्रामीण हथियार लेकर नहीं जाता और ना ही पेड़ों को नुकसान पहुंचाता है।
पंरपराओं में प्रकृति सर्वोपरि-----
उत्तरकाशी: पर्वतीय क्षेत्रों में अब भी ऐसी परंपराएं कायम हैं, जिनमें प्रकृति को सर्वोपरि माना जाता है। धारा (पानी का स्रोत) पूजन भी ऐसी ही एक परंपरा है, जिसमें विवाह के बाद नवविवाहिता अपने ससुराल में सबसे पहले पानी के प्राकृतिक स्रोत की पूजा करती है। इसके अलावा उत्तरकाशी जिले के गाजणा क्षेत्र के हर गांव में एक पेड़ को पूजने की परंपरा आज भी कायम है। ठांडी गांव में खर्सू और मोरू के दो पेड़ों को चौरंगीनाथ और बौल्या राजा देवता का पेड़ माना जाता है। गोरसाड़ा गांव में भैरव देवता का खड़ीक का पेड़ और कमद गांव में चौरंगीनाथ का पेड़ भी पूजनीय हैं।
---लोकजीवन से दूर न हों जंगल
उत्तरकाशी: जिन गांवों की परंपराओं ने जंगलों को संरक्षित रखा है उन गांवों में पानी की कमी महसूस नहीं की गई और ना ही उन गांवों में डायरिया या अन्य बीमारियों का प्रकोप हुआ। डख्याट गांव की प्रधान सुनीता जयाड़ा बताती हैं कि उनके गांव में अब भी पांच प्राकृतिक जल स्रोत हैं। गांव में आज तक डायरिया जैसी बीमारी का असर नहीं देखा गया। वहीं म_ी गांव के देशबंधु भट्ट बताते हैं कि उनके गांव में पानी का मुख्य स्रोत प्राकृतिक ही है।
तंत्र विधान से होती है मां नंदा की पूजा
-चंदवंशीय राज परिवार के वंशज हर वर्ष नंदाष्टमी पर पहुंचते हैं अल्मोड़ा
अल्मोड़ा pahar1-
मां नंदा को शैलपुत्री, तारा व शक्ति की अधिष्ठात्री देवी के रूप में मान्यता प्रदान है। मां नंदा के प्रति आस्था, श्रद्धा व उनकी महत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उत्तराखण्ड के हिमशिखरों का नाम मां नंदा के नाम पर हैं। इसलिए उन्हें पर्वतपुत्री भी कहा जाता है।
मां नंदा की पूजा के अलग-अलग विधान हैं। यूं तो पूरे उत्तराखण्ड की ईष्ट देवी के रूप में मां की मान्यता है। कुमाऊं के चंदवंशीय राजाओं की कुलदेवी के रूप में मां अल्मोड़ा की ऐतिहासिक नगरी नंदादेवी मंदिर में विराजमान है। राज परिवार के वंशज आज भी प्रतिवर्ष भाद्र मास के शुक्ल पक्ष में तंत्र विधान से मां की पूजा-अर्चना विधि-विधान से करते हैं। भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी से गणेश पूजा के साथ मां का पूजा-अर्चन शुरू होता है। पूजा के दौरान यज्ञ, हवन, बलिदान किया जाता है।
नगर के जाने-माने शिक्षाविद् सुशील चन्द्र जोशी ने अपने एक लेख में कहा है कि 1670 ईसवी के आसपास राजा बाजबहादुर चंद ने मां नंदा को मल्ला महल में स्थापित किया। 1699 में राजा ज्ञान चंद तथा 1710 में राजा जगत चंद ने पुनरप्रतिष्ठित किया। अंग्रेज कमिश्नर ट्रेल ने 1816 व 1830 में वर्तमान स्थल मल्ला महल में स्थानांतरित किया। स्थापत्य कला की दृष्टि से मंदिरों की शैली उत्तर भारतीय नागरशैली है। नंदादेवी मंदिर की विशेषता यह है कि हर वर्ष लगने वाले नंदादेवी मेले व नंदाष्टमी के पर्व पर तांत्रिक पूजा-अनुष्ठान के लिए चंदवंशीय राज परिवार के नैनीताल लोकसभा के सांसद केसी सिंह बाबा प्रतिवर्ष यहां आते हैं। तांत्रिक विधान से होने वाली इस पूजा में अष्ट बलि दी जाती है। इसमें भैंसा, बकरी, नारियल आदि तंत्र पूजा में उपयोग होने वाली अन्य सामग्री शामिल होती है। अल्मोड़ा में बलिदान के समय भैंसे से निकले रक्त को टीका लगाने की पुरानी परंपरा है, जो आज भी बरकरार है।
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लटके-झटकों में गुजरा दौर, नहीं मिला 'ठौर
- अपनों के बीच बेगाने से हुए संस्कृति के संवाहक
- दस साल में भी सांस्कृतिक पहचान नहीं बना पाया यह पहाड़ी प्रदेश
- हवाई साबित हुए कला संस्कृति को बढ़ावा देने के दावे
- संस्कृति महकमे में धूल फांक रहे पहाड़ी लोकवाद्य
Pahar1-न सावन बरसा, न भादौ सूखाÓ, ऐसा ही है अपने संस्कृति महकमे का हाल। एक दशक बीतने जा रहा राज्य बने, लेकिन हम जहां थे, वहीं कदमताल कर रहे हैं और अपनों के बीच बेगाने से हो गए हैं संस्कृति के वाहक। बुजुर्ग कलाकार उपेक्षा सहने को मजबूर हैं और युवाओं का साल-दो साल में ही उत्साह ठंडा पड़ जा रहा है। ऐसा नहीं कि कला-संस्कृति को बढ़ावा देने के दावे न हुए हों। खूब हुए और साल-दर-साल हुए, पर हकीकत शर्मसार कर देने वाली है और यही वजह भी है कि कला-संस्कृति का धनी यह पहाड़ी प्रदेश देश-दुनिया में अपनी कोई सांस्कृतिक पहचान नहीं बना पाया।
राज्य गठन के पीछे एक वजह इस भूभाग को सांस्कृतिक पहचान दिलाना भी रही है, लेकिन हुआ कहां। बीते दस सालों में भाषा-संस्कृति को लेकर किसी भी स्तर पर गंभीरता दिखी हो, याद नहीं आता। इस अवधि में कला-संस्कृति के नाम पर जो भी घटित हुआ, वह विशुद्ध रूप से संस्कृति कर्मियों के स्वप्रयासों का फल है। सरकारों व संस्कृति महकमे का हाल तो 'नाच न जाने आंगन टेढ़ाÓ वाला रहा। महकमे की पहल पर साल में जो दो-चार बड़े सांस्कृतिक आयोजन होते भी हैं, उनमें भी स्थानीय कलाकारों की कितनी भूमिका होती है, यह बताने की जरूरत नहीं। फिर इन आयोजनों में ऐसा होता भी क्या है। वही दो-तीन पारंपरिक सांस्कृतिक दल, वही लटके-झटके और बाजारू गीत-संगीत। अगर यही संस्कृति है तो खुदा खैर करे।
संस्कृति के झंडाबरदार वातानुकूलित कक्षों में बैठकर यह भी भूल गए कि संस्कृति का संरक्षण भाषणों से नहीं होता। इसके लिए जड़ें सींचनी पड़ती हंै, लोक को गले लगाना पड़ता है। यहां तो उल्टा ही हो रहा है। युवा कलाकार उपेक्षित हैं और बुजुर्ग गर्दिश में। इन दस सालों में संस्कृति महकमा जिस एकमात्र उपलब्धि पर फूला नहीं समा रहा, वह है 122 लोकधर्मियों के लिए स्वीकृत एक-एक हजार रुपये की पेन्शन। इसे पाने के लिए भी उन्हें कम पापड़ नहीं बेलने पड़ते। संस्कृति के संरक्षण के नाम पर पहाड़ी लोकवाद्य संस्कृति महकमे में धूल फांक रहे हैं। अब कौन समझाए कि लोकवाद्यों का संरक्षण उन्हें म्यूजियम में रखकर नहीं, बल्कि व्यवहार में लाकर ही संभव है।
'जैकÓ पर घिसटती संस्कृति
संस्कृति महकमे में लगभग 95 सांस्कृतिक दल पंजीकृत हैं, लेकिन आयोजनों में भाग लेने का मौका चुनिंदा दलों को ही मिल पाता है और वह भी 'जैकÓ पर। बजट ले जाने में भी वह दल सफल हो पाते हैं, जिनकी 'जैकÓ है। समझा जा सकता है कि किस तरह 'जैकÓ पर संस्कृति को ढोया जा रहा है। इसी तरह विभाग में पंजीकृत लोक कवियों का हाल भी है। कुछ को तो खूब मौका मिल जाता है और कुछ मौका पाने को विभाग के चक्कर काटते रह जाते हैं।
''लोक विधाओं के संरक्षण-संवद्र्धन को सूबे के छह जिलों पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, बागेश्वर, टिहरी, चमोली व उत्तरकाशी में गुरु-शिष्य परंपरा की शुरुआत की जा रही है। इसके तहत छह विशेषज्ञ लोकधर्मी युवाओं को लोकगायन, राधाखंडी संगीत, लोकगाथा गायन, माच्र्छा नृत्य, ढोल सागर व छोलिया नृत्य की दीक्षा देंगे। इन विधाओं का विजुअल फार्म में डाक्युमेंटेशन भी होगाÓÓ।
- बीना भट्ट, निदेशक, संस्कृति विभाग उत्तराखंड
प्रस्तावित योजनाएं :
- उत्तराखंडी लोकनृत्यों को नई पहचान देने को तैयार होगा शास्त्रीय व लोकनृत्य का फ्यूजन
- सूबे के लोक कलाकारों को मिलेंगे आइडेंटिटी कार्ड
- कैटेगराइज्ड होंगे विभाग में पंजीकृत सांस्कृतिक दल
- अपडेट की जाएंगी सांस्कृतिक दलों से जुड़ी समस्त जानकारियां
Friday, 30 April 2010
-नंबर वन की दौड़ में उत्तराखंड सबसे आगे
- दो जिलों का डाटा पहुंचते ही तैयार हो जाएगा स्टेट रजिस्टर
- सेंट्रल सर्वर से देखी जा सकेगी चालक व वाहन की जन्मकुंडली
Pahar1-: यदि सब कुछ ठीकठाक रहा तो उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य होगा, जिसका अपना स्टेट रजिस्टर होगा। इस स्टेट रजिस्टर में 'सारथीÓ (लाइसेंस संबंधी साफ्टवेयर) व 'वाहनÓ (वाहनों के रजिस्ट्रेशन संबंधी साफ्टवेयर) शामिल हैं। यह रजिस्टर सेंट्रल सर्वर से जुड़ा रहेगा। इसके जरिए कहीं भी बैठकर वाहन व चालक की पूरी जन्मकुंडली बांची जा सकेगी। उत्तराखंड का संपूर्ण डाटा नेशनल इंफारमेटिक सेंटर (एनआईसी) को भेजा जा रहा है। एनआईसी ही विधिवत रूप से इस बात की घोषणा करेगा कि कौन सा राज्य स्टेट रजिस्टर तैयार करने में नंबर वन है।
केंद्र में लंबे समय से एक नेशनल रजिस्टर तैयार करने की कवायद चल रही है। इसके तहत हर प्रदेश के वाहनों की जानकारी एक ही जगह से देखी जा सकेगी। इसी के तहत केंद्र ने हर प्रदेश को अपना स्टेट रजिस्टर तैयार करने के निर्देश दिए थे। पहले वाहनों का पंजीकरण कर उन्हें एक रजिस्टर में चढ़ाया जाता था। पहले अन्य प्रदेशों से किसी वाहन के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए पत्राचार के जरिए जानकारी हासिल की जाती थी। देश में आतंकी घटनाएं बढऩे के बाद वाहनों के लिए एक नेशनल रजिस्टर बनाए जाने पर जोर दिया गया, जिससे ही कहीं भी वाहन व चालक पर मिले प्रपत्रों के हिसाब से उसकी सही जानकारी प्राप्त की जा सके। इसके तहत सबसे पहले 'वाहनÓ साफ्टवेयर तैयार किया गया, जिसमें वाहन के रजिस्ट्रेशन संबंधी जानकारी डाली जाती है। इसके बाद 'सारथीÓ साफ्टवेयर डेवलेप किया गया। इसमें लाइसेंस बनाते समय लाइसेंस धारक के विषय में सभी जानकारियां डालने के अलावा उसकी अंगुलियां के निशान तक अंकित होते हैं। ये उन्हीं कार्यालयों में लगा है जो पूर्णत कंप्यूटरीकृत हो चुके हैं। इन कार्यालयों में अब वाहनों का रजिस्ट्रेशन व लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया इसी साफ्टवेयर के तहत होती है। सूबे में संभागीय और उप संभागीय कार्यालय मिलाकर कुल 15 कार्यालय हैं। यह सभी कार्यालय कंप्यूटरीकृत हो चुके हैं। ऐसे में इन सभी कार्यालयों से 'वाहनÓ व 'सारथीÓ साफ्टवेयर का डाटा कलेक्ट कर एनआईसी को भेजा जा रहा है। अब सिर्फ पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा का डाटा एनआईसी तक पहुंचना शेष है। डाटा तैयार है और एक दो दिनों में एनआईसी को भेज दिया जाएगा। एनआईसी को यह संपूर्ण डाटा उपलब्ध कराने वाला उत्तराखंड पहला राज्य होगा। हिमाचल प्रदेश भी उत्तराखंड से ज्यादा पीछे नहीं है, लेकिन अभी तक हिमाचल एनआईसी को पूरा डाटा उपलब्ध कराने में सफल नहीं हो पाया है। ऐसे में उत्तराखंड का ऐसा पहला राज्य बनना तय है, जिसका अपना स्टेट रजिस्टर होगा।
सचिव परिवहन व परिवहन आयुक्त एस रामास्वामी का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि उत्तराखंड ऐसा करने वाला पहला राज्य होगा। उन्होंने कहा कि इतने कम संसाधनों में ऐसा करना अपने आप में एक बड़ा कार्य है। उन्होंने कहा कि दो जिलों का डाटा भी इसी सप्ताह भेज दिया जाएगा।
- बाघों की संख्या जानने को होगा री-सेंशस
-दूसरी बार नई पद्धति से राजाजी पार्क में होने जा रही गणना
-रिपोर्ट पर डब्ल्यूआईआई करेगा मंथन
Pahar1-
बाघों का मसला है इसलिए फूंक- फूंककर कदम रखा जा रहा है।
गणना की रिपोर्ट पर कोई सवाल न खड़ा हो, इसलिए री-सेंशस (पुनर्गणना) कराई जाएगी। राजाजी में बाघों की एक मई से गणना शुरू हो रही है। देश में लागू नई पद्धति के तहत दूसरी बार यह गणना होगी। पारदर्शिता के लिए गणना की रिपोर्ट आने के बाद वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) इसका अध्ययन करेगा। कैमरा ट्रैप पद्धति और एक मई से हुई गणना का मिलान करने के बाद ही दूसरी रिपोर्ट जारी होगी।
2005 में रिपोर्ट आई कि देश में करीब 4500 बाघ हैं। हालांकि इस बीच वनों में बाघ की तादाद घटने की खबरें आने लगी। इससे रिपोर्ट पर सवाल उठने लगे। काफी हंगामे के बाद हुई गणना में 3500 से 3600 के बीच बाघ की बात सामने आई। चूंकि मामला बेहद संवेदनशील था, इसलिए प्रधानमंत्री ने मामले में हस्तक्षेप किया। इसके बाद वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 2007 में गणना कराई। इसकी रिपोर्ट में देश भर में 1411 बाघों की मौजूदगी की बात सामने आई। दरअसल इस गणना के दौरान वन विभाग के रिटायर्ड अधिकारियों और विशेषज्ञोंं को पर्यवेक्षक बनाया गया था। रिपोर्ट केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी हुई। इसके बाद से इसी पद्धति से बाघों की गणना करने का निर्णय किया गया। पद्धति का नाम हैबीटाट इवैलुएशन एंड कैमरा ट्रैपिंग दिया गया। इसमें ट्रांजिट लाइन और जीपीआरएस सिस्टम के तहत गणना की जाती है।
इसी पद्धति के तहत दूसरी बार राजाजी पार्क में बाघों की गणना एक मई से शुरू होने जा रही है। उत्तराखंड के जिम कार्बेट नेशनल पार्क और राजाजी नेशनल पार्क के जंगलों में बाघों की अच्छी खासी तादाद है। पिछले गणना में बाघों की रिपोर्ट भी आई थी। गणना में कोई चूक न रह जाए, इसलिए रिपोर्ट वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया को दिखाई जाएगी। इंस्टीट्यूट रिपोर्ट का अध्ययन कर संभावित जगहों पर कैमरा ट्रैप लगाएगा। फिर दोनों का मिलान कराया जाएगा। इसके बाद सही तस्वीर देश के सामने रखी जाएगी। राजाजी नेशनल पार्क के निदेशक एसएस रसायली ने बताया कि बाघों की गणना के उपरांत रिपोर्ट डब्ल्यूआईआई को सौंप दी जाएगी।
इनसेट
2001 2003 2005
बाघ- 30 30 24
(राजाजी नेशनल पार्क की स्थिति)
2001 2003 2005
बाघ- 137 143 141
(कार्बेट नेशनल पार्क की स्थिति)
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