Tuesday, 28 September 2010
कानकून में लहराएगा उत्तराखंड का परचम
इस बार कानकून (मेक्सिको) विश्व वातावरण महासम्मेलन में उत्तराखंड का परचम लहराने वाला है।
मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने इसकी मजबूत बुनियाद रख दी है। तब तक उत्तराखंड अकूत वन संपदा एवं पर्यावरण संतुलन के लिए किये गये तमाम अभिनव प्रयोगों में एक मुकाम हासिल कर लेगा। इन दिनों इन अभिनव प्रयोगों की उच्चस्तर पर समीक्षा हो रही है और धरातल पर परिणाम दिखाई देने लगे हैं।
मुख्यमंत्री हरित योजना, स्पर्श गंगा, हर्बल गार्डन और पिरूल के व्यावसायिक दोहन के लिए राज्य के तमाम इलाकों में तेजी से काम हो रहा है। इससे महासम्मेलन तक उत्तराखंड 50 लाख टन से अधिक कार्बन उत्सर्जन को कम कर भारत समेत दुनिया के तमाम राज्यों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण पेश कर देेगा। यही नहीं ग्लेशियरों को पिघलने से बचाने के लिए भोज के जंगल विकसित करने की पहल भी महासम्मेलन में उत्तराखंड को वाहवाही मिल सकती है।
उत्तराखंड के 53 हजार 657 वर्ग किमी क्षेत्रफल में 35 हजार 651 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जंगल का है। निर्विवाद रूप से दुनिया के पर्यावरण संतुलन के लिए उत्तराखंड की महत्वपूर्ण भूमिका है। अब मुख्यमंत्री डा. निशंक इस भूमिका में एक नये 'हरित अध्याय' जोड़ने जा रहे हैं। यह अध्याय उत्तराखंड को राष्ट्रीय फलक पर एक नया मुकाम देने जा रहा है।
पर्यावरण एवं वन सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष अनिल बलूनी ने इस संबंध में बताया कि राज्य के सभी जनपदों में उनकी मौलिक पहचान के तहत पौधरोपण किया जा रहा है। इसमें हल्दू, देवदार, बांज से लेकर तमाम छायादार पौधे लगाये जा रहे हैं। अब तक 65 लाख पौधे रोपे जा चुके हैं। सीएम की महत्वाकांक्षी 'स्पर्श गंगा' योजना यूरोप की 'राइन' और इंग्लैंड की 'थेम्स' नदी में चले अभियान से आगे निकल गई है।
उन्होंने बताया कि यूरोप और इंग्लैंड में नदियों को साफ सुथरा करने के लिए केवल सरकारी अभियान चला था, जबकि उत्तराखंड में महिला और युवक मंगल दलों की भागीदारी से स्पर्श गंगा अभियान एक जनांदोलन के रूप में सामने आया है। इससे लोगों में गंगा में मिलने वाली हजारों नदी-नाले-गदेरों को साफ-सुथरा रखने की संस्कृति विकसित हुई है। गंगा के किनारे रीवर वन विकसित किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री के नेतृत्व में देहरादून, पौड़ी, चंपावत, चमोली और अल्मोड़ा में हर्बल गार्डन तैयार किये जा रहे हैं। इन जनपदों के 5 से 10 हेक्टेयर-भूमि में हर्बल गार्डन एक अभिनव प्रयोग है जबकि राज्य भर के सबसे खतरनाक दुर्घटना क्षेत्र में 'बायो फे सिंग' किया जा रहा है। रानीबाग-भीमताल, नैनीताल-भीमताल, दुगड्डा तथा सतपुली में यह सपना साकार रूप लेने लगा है। पर्यावरण मंत्रालय पिरूल के व्यावसायिक दोहन की रूपरेखा पर भी काम कर रहा है।
राज्य सरकार इस योजना को मनरेगा की तर्ज पर शुरू कर रही है जबकि पिरूल से बिजली बनाने के लिए अगले साल फरवरी तक बेरीनाग (पिथौरागढ़) में एक 100 किलोवाट का पावर प्लांट लगाने का काम अंतिम चरण में है। पिरूल से महिलाओं को सीधा रोजगार मिल रहा है। पिछले साल हजारों महिलाओं ने केवल पिरूल एकत्र करने पर लाखों रुपये की आय अर्जित की।
श्री बलूनी के अनुसार पूरे राज्य में 12 हजार से अधिक वन पंचायत हैं। पिरूल से इन वन पंचायतों को सीधा लाभ मिलेगा। पिरूल से ऊर्जा तैयार होने से प्रतिवर्ष 20 से 25 लाख टन कार्बन उत्सर्जन वातावरण में कम हो जाएगा। श्री बलूनी ने दावा किया कि मेक्सिको सम्मेलन में इन तमाम अभिनव प्रयोगों से उत्तराखंड को पर्यावरण संरक्षण और संतुलन के लिए चौतरफा शाबाशी मिलेगी। उन्होंने कहा कि केंद्रीय योजना आयोग पहले ही उत्तराखंड की पीठ थपथपा चुका है। इस बीच उच्च सरकारी सूत्रों के अनुसार मेक्सिको सम्मेलन की उत्तराखंड ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है। इस सम्मेलन की तिथि अभी तय नहीं है।
इस दैवीय आपदा से हम उत्तराखंड को बहुत जल्द उभार देगें- 'निशंक'
ये राजनिति करने का समय नहीं,मिलकर चलने का समय है- 'निशंक'
पिछले दिनों उत्तराखंड में आयी बारिश की तबाही ने उत्तराखंड को हिलाकर रख दिया है। यही नहीं राज्य में बारिश और बादल फटने की अलग-अलग घटनाओं में इस साल करीब 150 लोग मारे जा चुके हैं। पिछले कुछ दिनों में ही 60 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। राजधानी देहरादून में बारिश ने पिछले 44 सालों के रिकॉर्ड को तोड़ दिया। बादल जिस तरह से इस देव भूमि पर कहर बनकर बरसे,उन्होंने पहाड़ के आसुओं को रोके नहीं रूकने दिया। यहां कोई मार्ग-खेत-खलिहान और मकान ऐसा नहीं बचा जिसने इस बार आई इस प्राकृतिक आपदा की त्रासदी को ना झेला हो। बिजली,पानी,संचार,संपर्क,खाद्यान्न,दवाओं का अभाव इस बाढ़ की चपेट में आए। राज्य के ज्यादातर हिस्सों में लोग मुख्यालय से कट गए तो चारों ओर तबाही का मंजर ही मंजर नज़र आया।
उत्तराखंड में आयी इस प्राकृतिक विपदा से घिरे लोग कई बार टापू पर खडे होकर मदद की गुहार लगाते रहे। ऐसे कुदरती दुर्दिन में राज्य सरकार जहां पूरी संजीदगी के साथ इस आपदा का मुकाबला करती दिखायी दी। वहीं कांग्रेस का हात आम आदमी के साथ नारा देने वाली कांग्रेस ऐसे भीषणतम् समय में भी राजनिति करती हुई दिखायी दी। जहां उत्तराखंड के युवा और कर्मठ मुख्यमंत्री खुद जान जोखिम में डालकर दूर-दराज आपदाग्रस्त क्षेत्रों में पहुंचकर,विषम परिस्थियों में भी राहत एवं बचाव कार्यों की निगरानी करने में लगे है।
उत्तराखंड को केंद्र से मिली थोड़ी सी राहत को कांग्रेस के केंद्रीय मंत्री हरीश रावत इस आपदा से ग्रस्त लोगों के घाव भरने की जगह,उनको मदद पहुंचाने जगह,पत्रकारों की बड़ी मंडली को अपने साथ घुमा-घुमाकर इस दैवीय आपदा को तराजू में तौल रहे है। यही नहीं उत्तराखंड में विपक्ष के नेता भी रावत के शुर में शुर मिलाकर कह रहे हैं कि केंद्र ने राज्य को इस आपदा से निपटने के लिए भारी धन उपलब्ध कराया है। जबकि सच्चायी सब के सामने है। आज उत्तराखंड को जिस तरह से इस प्राकृतिक आपदा से घेरा है। उसे विश्व के मानचित्र पर साफ-साफ देखा जा सकता है। लेकिन विपक्ष को इस सब की जगह खुद के लिए राजनैतिक रोटियां सैकने का ज्यादा उचित समय लग रहा है। लेकिन इसके बावजूद राज्य के मुख्यमंत्री इन तमाम नेताओं से निवेदन कर रहे हैं कि कृपया,ये राजनिति करने का समय नहीं,मिलकर चलने का समय है।
वर्षों बाद उत्तराखंड में आयी इस दैवीय आपदा ने पहाड़ों को जिस तरह से नुकसान पहुंचाया है। इसे देखते हुए डॉ.निशंक ने केंद्र से 21 हजार करोड़ रूपये की सहायता और राज्य को आपदाग्रस्त राज्य घोषित करने का अनुरोध भी किया है। साथ ही राहत कार्यों में सहयोग हेतु सैन्य बलों को भेजने की बात भी कही। मुख्यमंत्री ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी राज्य के हालातों से अवगत कराया है। भारी वर्षा,बाढ़ एवं भू-स्खलन के कारण राज्य में उत्पन्न हुई विकट स्थिति से नई दिल्ली में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी,लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने राज्य के हालात को मजबूती से प्रधानमंत्री के समक्ष रखा। मुख्यमंत्री डॉ.निशंक के इन प्रयासों के परिणाम भी निश्चित तौर पर सामने आएं और केंद्र द्वारा तत्काल प्रभाव से 100 एन.डी.आर.एफ. के जवान उत्तराखंड के लिए रवाना किए गए और भूस्खलन एवं आपदा में मृत लोगों के परिजनों के लिए एक-एक लाख रूपये तथा घायलों को 50-50 हजार रूपये की सहायता प्रधानमंत्री द्वारा स्वीकृत की गयी। जबकि राज्य सरकार द्वारा भी मृतकों के परिजनों को एक-एक लाख रूपये मुआवजे के रूप में स्वीकृत किए गए। इस बारे में हमने जब अल्मोडा,उत्तरकाशी और यमुनोत्री-गंगोत्री राजमार्ग में फंसे लोगों से बात की तो,इन लोगों का कहना था कि,'उत्तराखंड के युवा मुख्यमंत्री खुद अपनी जान की परवा किए बगैर,विषम परिस्थियों में भी हमारे गांव आएं,हमसे मिले और हमें दि जाने वाली तमाम सुविधाओं के बारे में जानकारी भी ली,साथ ही उन्होंने सभी उचअधिकारियों को निर्देश दिए की जल्द से जल्द राहत सामग्री उन लोगों तक पहुंचनी चाहिए। जिन लोगों को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है'।
मुख्यमंत्री की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से हैं कि उन्होंने 18 सितंबर 10 को प्रदेश में दैवीय आपदा से हुए भारी नुकसान को देखते हुए तत्काल जिलाधिकारियों और शासन के वरिष्ठ अधिकारियों को राहत और बचाव कार्यों में तेजी लाने के निर्देश जारी किए। 19 सितंबर 10 को मुख्यमंत्री सचिवालय में वरिष्ठ अधिकारियों से इस आपदा पर एक अहम बैठक कर वीडियो कांफ्रेसिंग के माध्यम से सभी जिलाधिकारियों के साथ चर्चा की और उन्हें निर्देश दिया कि वे बचाव एवं रहात कार्यों में तेजी लाए। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि आपदा राहत के लिए धन की कमी को आड़े नहीं आने दिया जायेगा। साथ ही मुख्यमंत्री ने जिलाधिकारियों को आवश्यकता पड़ने पर हैलीकाप्टर के माध्यम से बचाव व राहत कार्य को जल्द से जल्द पूरा करने का निर्देश दिए है। मुख्यमंत्री खुद इस अधिकारियों से लगातार संपर्क बनाए हुए हैं,और पल-पल की जानकारी ले रहे है।
और तेज हुआ दैवीय आपदा से निपटने का 'मिशन राहत'
सोमवार को मौसम थोड़ा साफ होते ही उत्तराखंड में आयी दैवीय आपदा से निपटने के लिए मिशन राहत और तेज हो गया है। मुख्यमंत्री डॉ.रमेश पोखरिया निशंक ने हैलीकाप्टर औप पैदल चलकर आपदाग्रस्त क्षेत्रों का भ्रमण किया और अफसरों को राहत कार्य में तत्परता बरतने के निर्देश भी दिए। उन्होंने तमाम अधिकारियों को निर्देश दिए कि सरकार की पहली प्राथमिकता लोगों को सुरक्षित बचाना और उन्हें फौरी राहत मुहैया कराना है। इस बारे में जब हमने आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र से सूचना प्राप्त की तो,हमें प्राप्त सूचना के आधार पर, मुख्यमंत्री की अगवाही में उच्च हिमालयी क्षेत्र में फंसे पर्यटकों की खोज का कार्य राज्य सरकार द्वारा भारतीय थल सेना के दो चीता हैलीकॉप्टरों के मदद से जारी है। गंगोत्री-कालिन्दीखाल मार्ग पर फंसे पर्यटक दल की खोज के लिए 25 सिंतबर 10 से भारतीय थल सेना के चीता हैलीकॉप्टरों को लगाया गया है। जिनके द्वारा उस क्षेत्र का लगातार सर्वेक्षण किया जा रहा है। जहां यह पर्यटक हो सकते हैं,लेकिन पिछले दिनों ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में हुई भारी बर्फबारी के चलते इन क्षेत्रों में इन पर्यटकों के होने के कोई चिन्ह नहीं पाये गए है। दूसरी तरफ पिथौरागढ़ जनपद के गुंजी में फंसे लोगों को हैलीकाप्टर की मदद से सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया। गुंजी में फंसे मीडिया के पांच लोगों को धारचुला तथा तीन घायलो को हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल लाया गया है। जहां पर इन का उपचार किया जा रहा है। इसके साथ ही मरतोली में फंसे एक महाराज को मुंस्यारी लाया गया है।
इसी के साथ मुख्यमंत्री द्वारा उत्तराखंड के कई दूसरे आपदाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया गया है। अल्मोड़ा जनपद में आपदा से प्रभावित क्षेत्रों के 5593 लोगों को ठहराने के लिए 204 राहत कैंप स्थापित किए गए है। इसके अंतर्गत तहसील अल्मोड़ा में 57,रानीखेत में 60,द्वाराहाट में 03,जैंती में 60,सोमेश्वर में 02,भनौली में 17 एवं सल्ट में 05 राहत कैंप स्थापित किए गये है। मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामग्री पहुंचाने का काम तेजी से किया जा रहा है। सभी राहत शिविरों में आवश्यक खाद्य सामग्री पहुंचा दी गया है और संबंधित क्षेत्र के उपजिलाधिकारी के माध्यम से उसका वितरण भी सुनिश्चित् कर दिया गया है। जनपद में रसोई गैस की आपूर्ति का प्राथमिकता के आधार पर कराए जाने के साथ ही पेट्रोल,डीजल का स्टॉक प्रर्याप्त मात्रा में रख दिया गया हैं,ताकि किसी प्रकार की असुविधा न हो। क्षतिग्रस्त सड़कों के सुधारीकरण का कार्य तेजी से किया जा रहा है। आपदा के कारण जो भी मार्ग क्षतिग्रस्त हुए हैं,उन्हें ठीक करने का काम युद्धस्तर पर जारी है। इसी के साथ उत्तराखंड को जोड़ने वाले मार्ग एवं सभी अवरुद्ध हुए मार्गों को खोलने के लिए भी युद्धस्तर पर काम किया जा रहा है।
इसी के साथ मुख्यमंत्री भी पूरे प्रदेश की स्थिति को जानने के लिए खुद दौरा भी कर रहे है। जिससे प्रदेश की जनता काफी राहत महसूस कर रही है कि उनकी समस्याओं को जानने के लिए मुख्यमंत्री स्वयं पैदल चलकर उनके पास आ रहे है। निश्चित तौर पर डॉ.निशंक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लोगों से व्यक्तिगत तौर से मिलकर उन्हें ढांढस बंधा रहे कि इस दुःख की घड़ी में सरकार उनके साथ खड़ी है। जिससे लोगों में आशा जगी,साथ ही जिला प्रशासन भी हरकत में और प्रभावितों को तत्काल सहायता पहुंचाने में ओर तेजी लायी जा रही है। डॉ.निशंक ने शासन स्तर पर भी मुख्य सचिव को आपदा कार्यो की निगरानी के लिए कमान सौंपी है। मुख्य सचिव प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों से भली-भांती परिचित है। उन्होंने मुख्यमंत्री के निर्देश पर देर शाम तक शासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक बैठक की और राहत एवं बचाव की समीक्षा की
इस दैवीय आपदा से प्रभावित क्षेत्रों में लगातार मुख्यमंत्री जा रहे है। पिछले दिनों प्रभावित क्षेत्रों में बीमार लोगों को हैलीकॉप्टर से देहरादून लाने की व्यवस्था और उत्तरकाशी जनपद के नैटवार से 22 वर्षीय आशाराम,पुरोला से 65 वर्षीय लालचंद तथा पुरोला के ही ग्राम कण्डियाल से गंभीर रूप से बीमार 4 वर्षीय बच्चे धर्मेंद्र को हेलीकॉप्टर से देहरादून पहुंचाना मुख्यमंत्री का एक सराहनीय प्रयास रहा है। जहां दून अस्पताल में इन सभी का ईलाज चल रहा है। डॉ.निशंक प्रत्येक जनपद और गांव-गांव जाकर खुद देख रहे है कि इस दैवीय आपदा में घायल हुए लोगों और पशुओं को बेहतर चिकित्सा सुविधा प्रदान की जा रही हैं कि नहीं। इस बारे में जब हमने निशंक जी से जानना चाह की अभी उत्तराखंड के हालत कैसे है तो उन्होंने बताया कि, धीरे-धीरे जीवन खुद को संवारने की कोशिश कर रहा है। हम केवल उसे एक राह से जोड़ रहे है। क्योंकि उत्तराखंड पर इतनी भयभीत कर देने वाली दैवीय आपदा पहली बार आयी हैं,लेकिन हम अपना सब कुछ झोंक कर इस आपदा से निपटने का प्रयास कर रहे है। हमें उम्मीद हैं कि हम इस स्वर्ग में फिर से फूल खिला देगें। जहां तक इस आपदा में घायलों की बात हैं तो उनके उपचार में सरकार कोई कसर नहीं छोड़ेगी और उनका पूरा ध्यान रखा जायेगा। मैं आपको अवगत करना चाहूंगा की बड़कोट में राहत सामग्री लेकर गए हैलीकॉप्टर से 13 लोगों को देहरादून लाया गया हैं,जिनमें सात फ्रांसीसी पर्यटक है। इसके साथ ही कई अन्य लोगों में एक गर्भवती महिला और एक बीमार बच्चे को यहां लाया गया है। पुरोला से सात लोगो को और चिन्यालीसौढ़ से 22 लोगों को हैलीकॉप्टर से सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया है। इसी के साथ चिन्यालीसौढ़ में चार अतिरिक्त नौकाएं भी लगा दी गयी और प्रारम्भिक चरण में लगभग सौ से ज्यादा लोगों सुरक्षित स्थानों तक पहुंचा दिया गया है। कुमाऊं में बहुत से स्थानों पर सड़क मार्ग खुल जाने से कई ट्रकों से राहत सामग्री अल्मोडा़,बागेश्वर और पिथौरागढ़ के निकटतम स्थानों तक पहुंचायी दी गयी है। तीन ट्रक गैस सिलेण्डर भी कुमाऊं के विभिन्न क्षेत्रों के लिए भेज दिए गए है। जहां तक मानसरोवर यात्रा की बात हैं तो इसके 16वें समूह के 31 पुरूष एवं छः महिला समेत कुल 37 यात्रियों को गुंजी से धारचूला पहुंचाया गया। गुंजी में फंसे कैलाश मानसरोवर यात्रा के 37 यात्रियों को वायु सेना के एमआई-17 हैलीकॉप्टर से तीन चक्रों में सुरक्षित धारचूला तक लाया गया हैं और फिर टनकपुर पहुंचाया गया। जब हमने मुख्यमंत्री से इस आपदा के समय कांग्रेस के बयानों के बारे में जानना चाहा तो,डॉ.निशंक ने साफ किया की यह वक्त इस विपादा से निपटने का हैं,हमें इस पर ध्यान देना है। ये राजनिति करने का समय नहीं हैं बल्कि मिलकर चलने का प्रदेश की जनता के दुःखों को दूर करने का उन्हें राहत पहुंचाने का समय है'।
निश्चित तौर पर यह मिलकर काम करने का समय है। मुख्यमंत्री डॉ.रमेश पोखरियाल निशंक जिस प्रकार से दैवीय आपदा से प्रभावित क्षेत्रों का हवाई एवं स्थलीय निरीक्षण कर रहे है। वह अपने आप में सराहनीय है। मुख्यमंत्री के एक दिन में कई जनपदों का दौर करना और राहत कार्यों का निरीक्षण करने से आम लोगों में सरकार के प्रति और अधिक विश्वास बढ़ा है। साथ ही मुख्यमंत्री की कार्यशैली की सभी सभी सराहना कर रहे है,और उनकी इस कर्मठता और अपने राज्य के प्रति,राज्य की जनता के प्रति खुद के संर्पण को देखते हुए अब कई सामाजिक और स्वयंसेवी संगठन में अपनी ओर से हर संभव मदद के लिए आगे आ रहे है।
- जगमोहन 'आज़ाद'
Monday, 27 September 2010
सभी उत्तराखंडवासियों से एक अपील
उत्तराखंड में बारिश ने इस बार किस तरह की तबाही मचायी है...इस आपदा से निपटने के लिए हम सब को आगे आना है...क्योंकि यह हम सबके लिए बहुत जरूरी ही नहीं...बल्कि हमारा यह फ़र्ज भी है कि,हम इस आपदा के समय अपने पहाड़ों के लिए कुछ करें...इसी के लिए माननीय मुख्यमंत्री जी उत्तराखंड डॉ.रमेश पोखरियाल निशंक जी ने देश-विदेश और उत्तराखंड में बसे सभी उत्तराखंडवासियों से एक अपील की है। आप सभी लोग इस समय पहाड़ की मदद के लिए आगे आएं
Wednesday, 22 September 2010
देवभूमि में बाढ़ से बिगड़े हालात का ताजा हाल-२२ सिंतबर
देहरादून
दूसरे दिन भी कटा रहा दून का रेल संपर्क
थम नहीं रहा दैवीय आपदा से नुकसान का सिलसिला
प्रदेश में गहराया बिजली संकट
दून स्टेशन में यात्रियों की सुविधा के इंतजाम
हरिद्वार
गुस्से में है शिवालिक का यंग पर्वत
नहीं खुला हरिद्वार-देहरादून रेलवे ट्रैक
सीबीसीआईडी टीम फिर पहुंची हरिद्वार
नॉन पोस्टल स्टांप का मुख्य डिपो बनेगा हरिद्वार
पौड़ी
सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम करने का आह्वान
पेड़ गिरने से एनएच रहा बाधित
चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी में संचार सेवा ठप
श्रीनगर मेडिकल कॉलेज भी खतरे की जद में
रूद्रप्रयाग
बीआरओ के वाहनों को रोका, कैंप हटाने की मांग
डेढ़ करोड़ की लागत से निर्मित टैक्सी पार्किंग पर खतरा!
अतिक्रमण के तहत जिले के १४ धार्मिक स्थल चिह्नित
हेलीकॉप्टर से लाया जा सकता है जवान का शव
टिहरी
कोटेश्वर डैम के पावर हाउस में घुसा पानी
राज्य स्तरीय हॉकी प्रतियोगिता में शामिल हुई कुल दो टीम
राज्यपाल ने लिया टिहरी बांध से हुए नुकसान का जायजा
झील का जलस्तर अब ८३१ मीटर पर स्थिर ः शाह
उत्तर काशी
यमुना के कटाव से सैकड़ों नाली कृषि भूमि बही
मेजर मनीष के निधन पर उत्तरकाशी में शोक
टिहरी झील से मनेरी भाली स्टेज टू में उत्पादन ठप
टिहरी झील से मनेरी भाली स्टेज टू में उत्पादन ठप
अल्मोड़ा
नगर में चौथे दिन भी पेयजल आपूर्ति ठप
देवली॒गांव में दो और शव निकाले गए॒
सड़क खुलने तक हैलीकाप्टरों॒से आएगा राशन
अब भी फंसे पड़े हैं प्रभावित परिवार
बागेश्वर
सरयू के कटाव से खतरा बढ़ा
बारिश के बाद गहराया पानी का संकट
बारिश ने तबाह की फसल
तेल के लिए॒मची रही रेलमपेल
चंपावत
बैराज में पांचवें दिन भी रहा रेड अलर्ट
१.८॒किलोग्राम चरस के साथ नेपाली गिरफ्तार
परीक्षण कराए बगैर बकरे काटे तो खैर नहीं
नाकाफी है प्रभावितों की मिलने वाली राहत राशि
नैनीताल
अयोध्या फैसले के मद्देनजर चौकसी
कट्टरपंथियों और मिश्रित बस्तियों की सूची तैयार
गुंजी॒से आगे नहीं बढ़ पाए कैलास यात्री
खैरना-रानीखेत॒रोड खुलने से मिली यात्रियों को राहत
पिथौरागढ़
आंवलाघाट॒से बन सकती है नई पेयजल योजना
समस्या समाधान को गांवों का दौरा करें अफसर
कांगे्रसियों ने फूंके मंत्रियों के पुतले
मुनस्यारी तहसील की संचार सेवाएं चौपट
ऊधम सिंह नगर
बारिश के बाद अब रसोई गैस की मार
अल्मोड़ा के पीड़ितों को हैलीकाप्टर से जाएगी खाद्य सामग्री
कैंटर॒ने बाइक सवारों को रौंदा, दो युवकों की मौत
भू-कटाव॒से सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि नदियों में समाई
रामपुर
जमीन धंसने से खनोटू स्कूल का भवन क्षतिग्रस्त
आधे किन्नौर में तीन दिन से बत्ती गुल
तीन माह से बंद पड़ी सड़क खोली जाए
पंद्रह बीस क्षेत्र में ठप रहा यातायात
चमोली
नंदाकिनी घाटी में बारिश और भूस्खलन से तबाही
निजमुला-पाणा ईराणी पैदल मार्ग क्षतिग्रस्त
अब तो हद हो गइ, कब मिलेगी राहत
सड़क न खुलने से खाद्य वस्तुओं के लिए हाहाकार
किसकी नजर लगी मेरे पहाड़ को
शनिवार रातभर खबरें आती रहीं और डराती रहीं। कभी श्रीनगर में मकान ढहने की खबर आई, तो कभी अल्मोड़ा में लगातार मलबा गिरने की। हरिद्वार और ऋषिकेश से लगातार गंगा का जलस्तर बढ़ने के साथ ही बांध के धंसने की जानकारियां आती रहीं। कोई फोन पर मदद मांग रहा था, तो कोई एसएमएस कर रहा था। भोर मौत की खबरों से शुरू हुई, और दोपहर होते-होते ऐसा लगने लगा मानो प्रलय करीब हो। कुमाऊं में तो मौत साक्षात तांडव कर रही है। यहां तक कि जो रिपोर्टर जिलों से जानकारी दे रहे थे, उनकी आवाज में दर्द और रुआंसापन था। कुछ ने तो यह भी कहा कि यह क्या हो रहा है मेरे पहाड़ में। देव कहां सोए हैं। कोई तो बचाए। यह हालात हैं उत्तराखंड के। कहीं 72 घंटे से तो कहीं 60 घंटे से लगातार बारिश हो रही है। पहाड़ धंस रहा है। सड़कें बह रही हैं। भूस्खलन जारी है। मलबा सड़कों और मकानों पर आ रहा है। घरों में फर्श फोड़कर पानी की धार बह रही है। मकान बहे जा रहे हैं। पेड़ ध्वस्त हो रहे हैं। पिछले 150 सालों में ऐसे हालात न देखे, न सुने। ऐसा सूबे के बड़े-बुजुर्गों का कहना है।
चमोली, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर सहित गढ़वाल के सभी जिले एक दूसरे से कटे हुए हैं। देहरादून, हरिद्वार से कट गया तो दिल्ली से भी। कुमाऊं में भी अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, नैनीताल और ऊधमसिंहनगर के कई इलाके एक दूसरे से पूरी तरह कट गए हैं। कई जिलों में 48 घंटे से बिजली नहीं है, तो कई जगह पीने का पानी भी मयस्सर नहीं है। बिजली के खंभे सड़कों पर हैं। पाइप लाइनें बह गई हैं। घरों में बंद लोग कांप रहे हैं। कुछ तो यह भी कह रहे हैं कि यह पानी बरस रहा है या फिर काल। सिर्फ अल्मोड़ा में ही 34 से अधिक मौतों की खबर दिल दहला रही है। कितने मलबे में दबे पड़े हैं यह पक्का नहीं है। देवली, बाड़ी, पिलखी और धुरा जैसे गांवों में रूदन, बारिश की आवाज में खो गया है। मौत के आंकड़े 60 को पार कर रहे हैं। सरकार मदद पहुंचाए तो कैसे। हेलीकॉप्टर भी नहीं उड़ पा रहे हैं। पायलटों ने इनकार कर दिया है कि दुर्घटना हो जाएगी। लोगों में आक्रोश बढ़ रहा है। सब्जी, दूध, दवा, खाद्य सामग्रियों, मिट्टी तेल, रसोई गैस की आपूर्ति ठप पड़ी है। यहां तक कि खबरों को जानने के लिए समाचार पत्र भी नहीं पहुंच पा रहे हैं। संचार साधन ध्वस्त पड़े हैं। कुमाऊं और गढ़वाल के बीच ट्रेन संपर्क भी टूट गया है। अब जरूरत है क्षेत्र, राजनीति और वैमनस्य सबकुछ भूलकर एक दूसरे की मदद करने की और सूबे में विपदा में फंसे लोगों को बचाने की। आइए हम सब जुट जाएं, इस अभियान में।
ड्
जरूरत है क्षेत्र, राजनीति और वैमनस्य भूलकर एक दूसरे की मदद करने की
निशीथ जोशी, देहरादून।
Tuesday, 21 September 2010
त्तराखंड में लगातार बढ़ रही हैं निशंक की लोकप्रियता
त्तराखंड में लगातार बढ़ रही हैं निशंक की लोकप्रियता
और...कैमरे-कलम तैयार कर विपक्ष ने बैठा दिए है निशंक के खिलाफ...'दलाल'
डा0 रमेश पोखरियाल 'निशंक' यानि ज़मीन से जुड़ते हुए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचने वाला एक ऐसा नाम जिसने खुद के हितों को दरकिनारे कर आम आदमी के भाषा
में आम आदमी से जुड़ कर,एक छोटे से कार्यकाल में स्थापित करके दिखा दिया कि विकास की भयार किस तरह बहती है। उन्होंने सिर्फ विकास ही नहीं बल्कि उत्तराखंड के जन-मानस के चेहरे पर जो मुस्कान बिखेर दि है। इसे शायद ही कोई दूसरा व्यक्ति कर पाता है। यह हम नहीं बल्कि प्रदेश का जन-मानस और युवा स्वर कह रहा है।
इन पंक्तियों के लेखक ने पिछले दिनों उत्तराखंड के तमाम गांवों का दौरा किया। ऐसे गांव जहां आज तक न बिजली-पानी की सुविधाएं थी। ना ही किसी को बुद्धु बक्से पर देश-विदेश के चेहरे दिखायी देते थे। ऐसे गांव जिन्होंने कभी विकास की राह देखी ही नहीं थी। जिन्हें सड़क के मायने ही मालूम नहीं थे। जो विश्व के मानचित्र पर खुद को सिर्फ और सिर्फ एक पहाड़ की तरह स्थिर मानते थे। जिनके लिए विकास की कोई परिभाषा ही नहीं थी। जिनके नौनिहालों ने दो कदम विकास की दौड़ तक नहीं देखी थी। लेकिन रमेश पोखरियाल 'निशंक' के लोकप्रिय फैसलों ने,इन गांवों को गांव होने का महत्व दिया है। नौनिहालों को विकास के दौड़ में शामिल किया है। ग्राम पंचायतों और प्रधानों के माध्यम से इन गांवों में निशंक सरकार ने जो विकास के नींव रखी है। वह यकीनन निशंक सरकार की लोकप्रियता के लिए कई मायने दिखाती है। सरकार के कई लोकप्रिय फैसलो ने आज जिस तरह से कई गांव की तस्वीर बदल कर रख दी है। वह किसी से आज छुप्पी नहीं है। विकास के धरातल पर प्रकृति ने भले है कहर बरपाया हो,लेकिन निशंक ने इस कहर को भी चुनौती पूर्ण स्वीकार करते हुए। इसक कहर को पिछे हटने को मजबूर कर दिया है। फिर चाहे वह सुमगढ़ का बादल हो,या उत्तकाशी की तबाही या फिर अल्मोड़ा-पौड़ी गढ़वाल के भयानक हादसे। निशंक सरकार ने हर हादसे का डट कर मुकाबला किया हैं,और इन हादसों में मारे लोगों को इनसे बाहर निकालने का बरस्क प्रयास किया है।
उत्तराखंड के गांव की जो तस्वीर आज के समय में है। निश्चित तौर पर ऐसा पहले कभी नहीं था। यहां के सुसजित रास्ते,जल-जगल और बिजली-पानी के व्यवस्था के जो मायने आज के समय में पहाड़ों में मौजूद है। उसे प्रदेश की जनता स्वयं के लिए एक बड़ा विस्तार मानती है। जिसका श्रेय वह निशंक सरकार को देने से नहीं चुकती है। उत्तराखंड के बेरोजगारों के चेहरो पर जो मुस्कान आज है वह आप रोजगार कार्यलयों में खुद का नाम लिखवाते चेहरों पर साफ तौर पर देख सकते है। फिर चाहे वह समुह 'ग' के पद हो या बीटीसी शिक्षकों के,यह अब सभी जानते हैं कि शिक्षा विभाग 4400 शिक्षकों को नियुक्ति देने जा रहा है, इसमें 18 सौ एलटी शिक्षकों के पद शामिल हैं। नियुक्तियां एनसीईटी के मानकों पर होगी। इसके लिए मंत्रालयों से हरी झंडी मिल गई है। इससे साफ है कि इससे एक ओर तो शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहे विद्यालयों को राहत मिलेगी वहीं राज्य सरकार के इस कदम से भाजपा सरकार की लोकप्रियता में बढोत्तरी होगी। क्योंकि इससे पहले उत्तराखंड में कितनी सरकारें आयी और गयी लेकिन ऐसा कभी पहले नहीं हुआ। जैसा निशंक सरकार ने कर दिखाया है। कौन नहीं जानता की विकास के क्षेत्र में आज उत्तराखंड देश के 28 राज्यों में तीसरे स्थान पर हैं। केंद्रीय वित्त आयोग ने मुख्यमंत्री के प्रयासों को सराहा है और इसलिए एक हजार करोड़ की प्रोत्साहन राशि भी राज्य को अनुमोदित की, राज्य की प्रति व्यक्ति आय जो राज्य गठन के समय 14 हजार वार्षिक थी,बढ़कर आज लगभग तीन गुना हो गई है। यह देश का पहला राज्य है जिसने केंद्रीय कर्मियों की तरह सबसे पहले अपने राज्य कर्मियों को छठे वेतनमान का लाभ दिया है।
साहित्य-संस्कृति-शिक्षा की बात हो तो,इस क्षेत्र में भी निशंक सरकार तेजी के साथ आगे बढ़ रही है। खुद एक पत्रकार-साहित्याकार होने पर डॉ.निशंक द्वारा जिस तरह से उत्तराखंड के लेखक-पत्रकारों को सम्मानित करने उनकी पुस्तकों को प्रकाशित करने को जो ऐतिहासिक निर्णय लिया गया यह अपने आप श्रेय कर ही नहीं बल्कि डॉ.निशक की उपलब्धियों का एक नया आयाम है। राज्य आंदोलनकारियों की बात की जाए तो सरकार ने पूर्ण विकलांग आंदोलनकारियों को प्रतिमाह दस हजार की पेंशन सम्मान रूप में दिए जाने का फैसला भी लिया,जो अपने आप में सरकार का एक श्रेयकर फैसला है। जिसकी चौतरफा चर्चाएं हो रही है।
उत्तराखंड के दूर-दराज क्षेत्रों के बात की जाएं तो इन दिनों यहां के गांव में 'काम करों,गांव को साफ रखों और मेहनताना लेकर खुशी-खुशी घर को जाओं' जैसे अभियान चालाए जा रहे है। पिछले लगातार कई दिनों से उत्तराखंड में बारिश का प्रकोप जारी है। जिसके चलते यहां के रास्तों-सड़कों में खर-पतवार फैल गया है। इसे तुरंत हटाने के लिए सरकार के माध्यम से गांव के लोगों के सहयोग से खर-पतवार हटाओं अभियान चलाया जा रहा है। जिसके लिए गांव के लोगों को मेहनताना भी दिया जा रहा है। इस योजना से गांव के लोगों को एक तो काम मिल रहा है। दूसरी तरफ उनके गांव की सड़के और रास्ते साफ सुथरे भी हो रहे है। निशंक सरकार के इन लोकप्रिय प्रयासों से गांव के लोगों-युवाओं में जोश भरा हैं और इस जोश की चलते गांव के लोग इन कार्यों में बढ़चढ़ का अपनी भागीदारी निभा रहे हैं,साथ नार भी लगा रहे है। हमारी विकास की राह,निशंक सरकार के हाथ...और मिशन 2012,निशंक के साथ होगा वोट हमारा। जिसके सुन निश्चित तौर पर विपक्ष ही नहीं बल्कि बीजेपी के कुछ वरिष्ठ चेहरे भी घबरा गए हैं.और इन्होंने निशंक के खिलाफ मीडिया से लेकर कुछ ऐसे दलाल भी लगा दिए हैं कि जो कैमरों और कलम के माध्यम से निशंक को घेरने की तैयारी में देहरादून की चोर गलियों में दुबके के अपने कैमरों की लाईटें ओन कर बैठे है...कि किसी तरह तो निशंक के खिलाफ इन्हें कोई ख़बर मिलें...या स्टिंग मिले...जिससे यह निशंक की विकास यात्रा को रोक सकें...अब देखने वाली बात ये हैं...कि विकास रूकता है...या इन दुश्मनों की लाईटें फ्यूज होती है...।
- धन्यवाद...जगमोहन आज़ाद,दिल्ली
Saturday, 18 September 2010
बेटी ने घाट पर पिता की चिता को दी मुखाग्नि
तोड़ीं वर्जनाएं: देहरादून जिले के भानियावाला गांव निवासी गढ़वाल राइफल के पूर्व सैनिक प्रेम सिंह तोमर का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार बेटी ही करे। उनकी बेटी श्वेता ने रूढि़यों की जकड़न को तोड़कर बेटे का कर्तव्य निभाया। पार्थिव शरीर को पूर्णानंद घाट ऋषिकेश पर उसने न सिर्फ चिता को मुखाग्नि दी, बल्कि सिर मुंडवाकर कपाल क्रिया भी की। श्वेता ने दिखा दिया कि वंश का निशान सिर्फ बेटे से ही नहीं, बेटी से भी घर का चिराग रोशन है। सच तो यह है कि अपने ही खून में फर्क क्यों और कैसा।
ऋषिकेश। हिंदू धर्म में महिलाओं को अंतिम यात्रा में शामिल होने की स्पष्ट इजाजत नहीं है और न ही चिता को मुखाग्नि देने और क्रियाकर्म पर बैठने की शास्त्राज्ञा है। मगर भानियावाला निवासी एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनकी पुत्रियों ने अंतिम यात्रा में शामिल होकर इन वर्जनाओं को तोड़ दिया। यह घटना चर्चा की विषय बनी रही।
भानियावाला निवासी पूर्व सैनिक प्रेम सिंह तोमर की अस्वस्थता के कारण शुक्रवार सुबह निधन हो गया। सगे-संबंधी, नाते रिश्तेदार अंतिम यात्रा के लिए निकले तो दिवंगत तोमर की चारों पुत्रियां भी शवयात्रा में निकल पड़ीं। लोगों ने समझाया मगर वह नहीं मानी। उत्तराखंड पूर्व सैनिक संगठन के केंद्रीय उपाध्यक्ष बुद्धि प्रकाश शर्मा ने बताया कि मुनिकीरेती श्मशानघाट पर चिता बनाई गई, जब मुखाग्नि देने की बात आई तो दिवंगत प्रेम सिंह के भाई बलराम तोमर और शैलेंद्र तोमर के अलावा भतीजे तैयार हुए, साथ ही उनकी बेटियां भी मुखाग्नि देने के लिए आगे आ गईं।
पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक रिश्तेदारों और परिजनों से उन्हें समझाने की कोशिश की मगर वह नहीं मानी। बेटियों का कहना था कि उनके दिवंगत पिता की ऐसी ही इच्छा थी, लिहाजा वह उनकी इच्छा के संकल्प को पूरा करेंगी। उनके इस तर्क पर वहां मौजूद अन्य लोगों ने भी मूक सहमति दे दी।
इस मौके पर दिवंगत तोमर की तीसरी बेटी श्वेता ने पिता की चिता को मुखाग्नि दी और कपालक्रिया के बाद मुंडन भी कराया। श्वेता ही क्रियाकर्म करेंगी।
पिता की अंतिम इच्छा पूरी की : श्वेता
ऋषिकेश। दिवंगत प्रेम सिंह तोमर के अग्निदाह संस्कार में उनकी चार पुत्रियों समेत पांच महिलाओं ने भाग लिया। पुत्रियों में ममता और संगीता (दोनों विवाहित) के अलावा श्वैता और शिवानी शामिल हैं। इनमें से तीसरे नम्बर की पुत्री श्वेता ने पिता की चिता को मुखाग्नि दी और कपालक्रिया के साथ ही मुंडन कराया। जानकारी के अनुसार बताया गया कि वही संपूर्ण क्रियाकर्म सम्पन्न कराएंगी। बकौल श्वेता मेरे पिता की अंतिम इच्छा थी कि भाई नहीं बेटी ही अंतिम संस्कार करे। श्वेता के अनुसार चाचा लोग क्रियाकर्म के लिए तैयार थे, मगर हमें अपने पिता की की अंतिम इच्छा पूरी करनी थी।
पत्रकार शंकर सिंह भाटिया की पुस्तक नन्दा राजजात का विमोचन
नन्दा राजजात यात्रा का देश और दुनिया में प्रचार-प्रसार करने के लिए एक फिल्म भी तैयार कराई जाएगी।
: मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने आज पत्रकार शंकर सिंह भाटिया की पुस्तक नन्दा राजजात का विमोचन किया।इस मौके पर सीएम ने नन्दा राजजात यात्रा समिति को इस मेले की व्यवस्थाओं के लिए पांच करोड़ रुपये देने की घोषणा की।
सचिवालय परिसर स्थित मीडिया सेंटर में पुस्तक का विमोचन करने के बाद सीएम ने कहा कि नन्दा राजजात यात्रा का देश और दुनिया में प्रचार-प्रसार करने के लिए एक फिल्म भी तैयार कराई जाएगी। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं देने की कोशिश की जा रही है। इस बारे में शासन स्तर पर एक समिति का गठन करने के साथ ही आयोजन समिति को पांच करोड़ रुपये दिए जाएंगे। यात्रा मार्ग में बेदनी बुग्याल समेत अन्य स्थानों पर हैलीपैड निर्माण की संभावनाओं पर भी सरकार विचार कर रही है। सीएम ने कहा कि नारी सम्मान हिमालयी सांस्कृतिक धरोहर है। नन्दा देवी की विदाई इसी परंपरा का एक प्रासंगिक दृश्य है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने तय किया है कि रचनात्मक कार्य करने वालों के साथ ही सृजनशील पत्रकारों को हर साल सम्मानित किया जाएगा। कार्यक्रम में मौजूद पर्यटन मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि सदियों से चली आ रही नन्दा राजजात यात्रा की इस अनूठी परंपरा से दुनियाभर को अवगत कराया जाएगा। इस मौके पर पुस्तक के लेखर शंकर सिंह भाटिया ने इस यात्रा से जुड़े संस्मरण भी सुनाए। इस कार्यक्रम में पर्यटन विभाग के प्रमुख सचिव राकेश शर्मा समेत मीडिया जगत के तमाम लोग मौजूद रहे। इस कार्यक्रम का संचालन प्रो.डीआर पुरोहित ने किया।
Friday, 17 September 2010
मेरे गीत रहेगें ना तुम्हारे साथ - गिरीश तिवारी 'गिर्दा'
22 अगस्त 2010 उत्तराखण्ड लोक और रंगमंच इतिहास के लिए एक दुःखद दिन रहा है। इस दिन उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध रंगकर्मी-जनकवि गिरीश तिवारी 'गिर्दा' हमारे बीच नहीं रहे। यह सुनने पर विश्वाश तो नहीं होता,लेकिन यह सच है। अभी जुलाई माह की तो बात हैं,जब गिर्दा से मुलाकात हुई थी। काफी दिनों से उन्हें वरिष्ठ चित्र बी.मोहन नेगी जी के जीवन परिवेश को लेकर एक लेख लिखने का मैने निवेदन किया था। लेकिन 'गिर्दा' लिख नहीं पा रहे थे। इसलिए उन्होंने कहा था,'बबा तुम आ जाओ,मैं बोल दूगां तो लिख लेना',। बस इसी बहाने 'गिर्दा' से मिलने का मुझे शायद यह सौभाग्य प्राप्त हुआ।
'गिर्दा' से इससे पहले जब मेरी मुलाकात हुई थी,या फोन पर बातचीत हुई थी तो तब के मुकाबले गिर्दा इस बार मुझे काफी थके हुए और कमाजोर दिख रहे थे। इसकी वजह शायद यह भी रही हो की वह कुछ देर पहले ही अल्मोड़ा से लौटकर आएं थे। फिर भी 'गिर्दा' से मिलना मेरे लिए सुखद ही था। वह थके जरूर थे,लेकिन रूके नहीं थे। उनकी आवाज़ में जो मिठास थी,वह हमेशा की तरह अपनी माटी की खुशबू लिए थी। नैनीताल स्थित कैलाखान का वह घर मुझे अब रह-रहकर याद आता हैं। 'गिर्दा' का अतिथि निवेदन मेरे लिए निसंदेह बहुत बड़ा आशीर्वाद था। मुझे उनके वह शब्द बार-बार याद आते हैं कि,अब लगता हैं,समय कम रह गया है। दवाईयां भी साथ नहीं दे रही हैं,देखो बबा क्या होता है? कुछ देरे आराम करने के बाद 'गिर्दा' ने बीं.मोहन नेगी जी पर बातचीत शुरू की और इसी दौरान उनसे कुछ दूसरे विषयों पर भी बातचीत हुई। 'गिर्दा' वर्तमान लोक-सांस्कृति और रंगमंच में हो रहे बदवाल को लेकर काफी चिंतित जरूर दिख रहे थे। आख़िर क्यों इन तमाम मुद्दो पर एक अनऔपचारिक बातचीत हुई थी,उसी के कुछ अंशः-
1- 'गिर्दा' आप पहले के मुकाबले अभी काफी थके हुए लग रहे मुझे?
- नहीं-नहीं ऐसा नहीं है,गांव गया था ना। वहां बहुत सारे काम थे,उन्हें पूरा करना था। काफी भाग-दौड़ करनी पड़ी,शायद इसलिए थका सा लग रहा हूं बबा,.हंसते हुए.और अब बूढ़ा भी तो हो गया ना बबा.।
2- अभी कहां बूढ़े हैं दादा आप,अभी तो आपको एक लंबी यात्रा तय करनी है। हमारे साथ?
- हां.हां.क्यों नहीं,और नहीं भी कर पाया तो क्या। तुम लोगों के साथ मेरे गीत तो रहेगें ही ना बबा,कहते है ना व्यक्ति चला जाता है,लेकिन उसकी यादें उसकी सौगात हमारे पास हमेशा रह जाती है। इन्हें हमें हमेशा अपने पास संभाल कर रखना चाहिए।
3- इस उम्र में भी आप इतना भागा-दौड़ी इतना काम कर रहे है। कैसे कर पाते हैं,इतना कुछ?
- में संघर्ष करने में विश्वास रखता हूं.बबा.। यही मेरी शक्ति हैं,मैं निरंतर चलते रहने में विश्वास रखता हूं। क्योंकि इससे मेरे सामने नये आयाम खुलते हैं। लेकिन आज ऐसा नहीं हैं,आज बाजारवाद की डिमाण्ड के चक्कर में मानवीय गरिमा,मानवीय मूल्य,मानवीय संवेदनायें रिमाण्ड में जा रही है,नीलाम हो रही है। मैं इनसे लड़ने की क्षमता हमेशा खुद में रखता हूं। गाता हूं गुनगुनाता और आगे बढ़ता चला जाता हूं। मुझे लगता हैं,तुम जैसे युवा भी इस संघर्ष को खुद में समाहित कर एक नये दिन की शुरूआत करेगें। मुझे ऐसा लगता हैं,यह दिन जरूर आयेगा।
4- 'तो जैंता एक दिन त आलो ऊ दिन यो दुनीं में'.?
- जैंता एक दिन त आवो ऊ दिन यो दुनी में,गीत के मनुष्य के मनुष्य होने की यात्रा का गीत है। मनुष्य द्वारा जो सुंदरतम् समाज भविष्य में निर्मित होगा उसकी प्रेरणा का गीत है,यह उसका खाका भर है। इसमें अभी और कई रंग भरे जाने हैं,मनुष्य की विकास यात्रा के लिए। इसलिए वह दिन इतनी जल्दी कैसे आ जायेगा,इस वक्त तो घोर संकटग्रस्त-संक्रमणकाल से गुज़र रहे है नां हम सब,लेकिन एक दिन यह गीत-कल्पना जरूर साकार होगी,इसका विश्वास हैं और इसी विश्वास की सटीक अभिव्यक्ति वर्तमान में चाहिए।
5- गिर्दा ईश्वर को मानते है आप?
- थोड़ी देर चुप रहने के बाद.हां मानता हूं,जैसे गीत-संगीत को पूजता हूं वैसे ही ईश्वर को भी। लेकिन मैं अंधविश्वासी नहीं हूं। पहाड़ से हूं,जैसे देव भूमि कहा जाता है। फिर देवा से कैसे हम दूर हो सकते है। वो तो है ना बबा हमारे साथ.।
6- तो पूर्नजन्म में भी विश्वास करते होगें.यदि आपका पूर्नजन्म हो तो कहां जन्म लेना चाहेगें?
- जोर से हसते हुए.ऐसा हो सकता हैं क्या.यदि हां तो मैं तो बबा,इन्हीं पहाड़ की वादियों में जन्म लेना चाहूंगा.और अगर ऐसा हो ही गया तो.मैं किसी लोक गीत के धुन तो जरूर बनना चाहूंगा।
7- कुछ ऐसा,जो करने की चाहत हो.लेकिन अभी तक कर नहीं पाए हो?
- बकौल गालिब,'हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि,हर ख्वाहिश पै दम निकले' सो मेरे भाई किसी भी आदमी की हर चाहत तो कभी पूरी नहीं हो सकती,और मैं भी एक सामान्य आदमी हूं। मगर वास्तविकता यह है कि जब मानव विकास यात्रा का मर्म समझ में आ जायें तो फिर व्यक्तिगत चाहतों की कामी-नाकामी का कोई ख़ास महत्व नहीं रह जाता।
8- गिर्दा आप पुरानी पीढ़ी के कलाकारों समेत नवांकुरों तक के साथ आत्मीयता से अभी अनवरत कार्य कर रहे हैं.नई पीढ़ी के काम को कैसा मानते हैं और उसे क्या सीख देंगे आप?
- किसी भी सचेत संस्कृतिकर्मी को सभी 'वय' के लोगों के साथ काम करना ही चाहिए। दरअसल नये-पुराने वाली बात ज्यादा माने नहीं रखती बल्कि काम करने का मूल उद्देश्य महत्वपूर्ण होता हैं और नये लोगों के साथ काम करने में तो और अच्छा लगता है। कई नई-नई चीजें मिलती है। नये आयाम खुलते है। ख़ास तौर पर रंगमंच संदर्भ में कोशिश करता हूं कि बच्चों के बीच अधिक से अधिक भागीदारी हो सके। नये लोगों से इतना ही कहना चाहता हूं कि बाजारवाद के इस खतरनाक दौर को विश्लेषित करते हुए सांस्कृति कार्य का महत्व समझें और सामाजिक-ऐतिहासिक-वैज्ञानिक चेतना के साथ रतना कार्य करें।
जगमोहन आज़ाद ,दिल्ली
हिंदू-मुस्लिम एकता का गवाह है डांगी और बेडूबगड़ गांव
सौहार्द के साथ मनाया रमजान का महीना
अगस्त्यमुनि। हिन्दू-मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे का परिचय देते हुए मंदाकिनी घाटी के डांगी सिनघटा और बेडूबगड़ गांव में इन दिनों रमजान का पवित्र महीना सौहार्द के साथ मनाया गया। वर्षों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए ग्रामीण धर्म के नाम पर देश को बांटने वालों के सामने एक मिसाल कायम कर रहे हैं।
सिनघटा और बेडूबगड़ गांव में हिन्दू-मुस्लिम परिवार कई वर्षों से साथ-साथ रह रहे हैं। इतना ही नहीं सभी तीज-त्यौहार को ग्रामीण मिलजुल कर मनाते हैं। आजादी से पहले गढ़वाल के राजाओं ने यहां पर कु छ मुस्लिम परिवारों को बसाया था, जो आज भरे-पूरे गांव के रूप में विकसित हो गए हैं। ये परिवार न केवल मुस्लिम सभ्यताओं को संजोए हुए हैं, बल्कि साथ ही गढ़वाल की संस्कृति का भी निर्वहन कर रहे हैं। लोक संस्कृति के बीच रचे-बसे इन गांवों में मुस्लिम लोग ठेठ स्थानीय गढ़वाली बोली बोलते हैं।
गढ़वाल की पारंपरिक तिबारी, पठालों (पत्थर) की छत और खान-पान यहां तक की रिश्ते-नाते भी आम गांवों की तरह हैं। ये लोग हिंदुओं के देवी-देवताओं के साथ ही त्योहारों का भी ये पूरी तरह से सम्मान करते हैं। जिस उत्साह से स्थानीय निवासी ईद और रमजान मनाते हैं, उसी उत्साह से होली, दीपावली, श्रावण व बसंत का आगमन भी मनाते हैं।
डांगी और सिनघटा गांवों में हिंदुओं और मुस्लिम परिवारों के मकान आस-पास ही हैं। दोनों बस्तियों के बीच गांव की कुल देवी शाकुंभरी देवी मंदिर और इसके ऊपर मस्जिद और ईदगाह स्थित है। इन दिनों जहां गांव में शारदीय नवरात्रों की तैयारियां चल रही हैं, वहीं मुस्लिम परिवार क्षेत्र की खुशहाली के लिए नेम्मते मांगते हुए रमजान के पवित्र महीने में रोजा अदा किया।
पंचायती कार्यों में मुस्लिम परिवार भी देते हैं साथ
अगस्त्यमुनि। गांव के प्रत्येक पंचायती कार्य में सभी अपनी हिस्सेदारी निभाते हैं। मां भगवती के मंदिर में यज्ञ के अवसर पर मुस्लिम परिवार भी अपनी फाट (हिस्सा) देते हैं। गांव के प्रत्येक परिवार के जन्म से लेकर मृत्यु तक के हर संस्कार में इनकी सहभागिता देखने लायक है।
दिलों में बसता है प्यार
अगस्त्यमुनि। ग्राम पंचायत सिनघटा की मुस्लिम प्रधान सबाना और प्रधान डांगी मोहम्मद यूसुफ कहते हैं कि दुनिया चाहे कितनी भी मजहब की दीवारें खड़ी कर दे, इसका असर ग्रामीणों पर नहीं पड़ेगा। क्योंकि यहां पर हर किसी के दिल में मजहब से बढ़कर प्यार बसता है। दीवाली में अली और रमजान में राम का नाम मिला हुआ है।
देश-विदेश के लोग उत्तराखंड की संस्कृति से परिचित होंगे।
दिल्ली कामनवेल्थ गेम्स में देश-विदेश के लोग उत्तराखंड की संस्कृति से परिचित होंगे।
भागीरथी कला संगम समिति के कलाकार पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को मंच पर पेश करेंगे। समिति के कलाकार दो अक्टूबर को दिल्ली पहुंच रहे हैं।
आगामी तीन अक्टूबर को कामनवेल्थ गेम्स की दिल्ली के नेहरू स्टेडियम में रंगारंग शुरुआत होगी। 13 अक्तूबर तक रविंद्र भवन में विभिन्न प्रदेशों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। संस्कृति मंत्रालय ने संगीत नाटक अकादमी को इसकी जिम्मेदारी सौंपी है।
उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व भागीरथी कला संगम समिति से जुड़े कलाकार करेंगे। इसके लिए समिति को संगीत नाटक अकादमी का निमंत्रण प्राप्त हो गया है। इस मौके पर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को शानदार तरीके से प्रस्तुत करने के लिए तैयारियां भी शुरू कर दी गई हैं।
समिति के अध्यक्ष नत्थी लाल नौटियाल ने कहा कि समिति की 16 सदस्यीय कलाकारों की टीम दो अक्टूबर को दिल्ली पहुंचेगी। इससे पहले भी समिति से जुड़े कलाकार कई जगह प्रस्तुति दे चुके है। उन्होंने कहा कि कलाकार घस्यारी नृत्य और गान प्रस्तुत करेंगे। यह नृत्य संयोग और वियोग श्रृंगार से ओतप्रोत हैं।
सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में इन लोकगीतों को प्रमुखता से गाया जाता है। इसके माध्यम से यहां की सांस्कृतिक विरासत को शानदार तरीके से उकेरा जाएगा। उन्होंने बताया कि अंतराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत शानदार हो इसके लिए कलाकार रात-दिन तैयारियों में जुटे हैं। इसके अलावा सीमांत पिथौरागढ़ जिले की पारंपरिक लोक संस्कृति के प्रमुख उत्सव 'हिलजात्रा' का मंचन भी राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान किया जाएगा।
Friday, 27 August 2010
उत्तराखंड के सपनों में रंग भर रहा रैथल गांव
- गांव की तस्वीर ऐसी कि शहर भी रश्क कर उठें
- यहां रह रहे 200 परिवारों के मन में भी नहीं पलायन की बात भी नहीं आती
गांधी का भारत गांव में बसता था, गांवों का कायाकल्प ही उनका सपना था। पर हालात बड़ी तेजी से करवट ले रहे हैं। तमाम कारणों से गांव वजूद खोने लगे हैं। उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं है। यहां तो गांवों से पलायन को आंतरिक सुरक्षा के खतरे के रूप में देखा जाने लगा है। भले ही सूबे की ओवरऑल तस्वीर चिंता की लकीरें खींच रही हो, लेकिन यहां ऐसा भी एक गांव है जो बापू के सपने में रंग भर रहा है। वह भी सिर्फ ' मिनी सरकार यानी पंचायत के बूते। यह गांव है सीमांत जनपद उत्तरकाशी के दुरूह इलाके का रैथल। रैथल की तस्वीर सचमुच ऐसी है कि शायद शहर भी रश्क कर उठें।
दरअसल, गांवों में एक तो अभी तक विकास की 'सड़क नहीं पहुंच पाई। दूसरा शहर की ओर जाने वाली सड़कों पर शुरू हुई आधुनिकता की अंधी दौड़ गांवों से लोगों को बाहर निकाल रही है। आलम यह कि पहाड़ों में तो गांव खाली होते जा रहे हैं। कारण तमाम गिनाए जाते हैं, लेकिन रैथल गांव अलग ही कहानी बयां करता है।
इस गांव में बिछी सीवर लाइन, टाइल्स बिछी चमचमाती गलियां और जगमगाती स्ट्रीट लाइट देख लगता ही नहीं कि आप उत्तराखंड के किसी गांव में हैं। यह सब इंगित कर रहा है कि आचार-व्यवहार से भ्रष्टाचार दूर हो जाए तो लोक का तंत्र ही सच्चे अर्थ में तस्वीर बदल सकता है।
उत्तरकाशी मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर और समुद्रतल से 1800 मीटर की ऊंचाई पर बसे रैथल गांव से अभी तक न तो कोई मंत्री बना और न ही विधायक। इस गांव की तस्वीर लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई ग्राम सभा और ग्रामीणों ने खुद ही बदल डाली। शहर जैसी सुविधाओं से सम्पन्न रैथल गांव भटवाड़ी ब्लाक मुख्यालय से दस किमी दूर है और प्रसिद्ध दयारा बुग्याल (अल्पाइन ग्रास) पहुंचने के लिए सड़क मार्ग का अंतिम पड़ाव पर है। यहीं से द्यारा के लिए आठ किमी का पैदल मार्ग शुरू होता है। रैथल गांव चमचमाती पक्की सड़क से जुड़ा है। मुख्यमार्ग से ही गांव में प्रवेश के लिए कई रास्ते हैं। गांव में जिस गली से भी प्रवेश करो वह सीसी या फिर टाइल्स से बनी है। साफ सुथरी गलियों से ही ग्रामीणों का सफाई को लेकर जागरूकता का अंदाज लगाया जा सका है। गांव में बिजली की दो लाइनें हैं। एक विद्युत विभाग की तो दूसरी पर्यटन विभाग की स्ट्रीट लाइट वाली लाइन। पहाड़ के हर गांव की तरह रैथल गांव भी सीढ़ीनुमा है। गांव के बीचोंबीच भड़ (वीर ) राणा घमेरू का चार सौ नब्बे साल पुराना लकड़ी का बना पांच मंजिला मकान आज भी खड़ा है। लगभग दो सौ परिवारों वाला यह गांव उत्तराखंड का शायद पहला गांव होगा, जहां एक भी परिवार ने पलायन नहीं किया। सेब, आलू, राजमा और गेहूं यहां की मुख्य फसल है। गांव के बीचोंबीच लाखों की लागत से बना शानदार कम्युनिटी हाल और अत्याधुनिक सार्वजनिक शौचालय गांव की समृद्धि की कहानी बयां करता है। रैथल के ग्रामीणों की सादगी तो देखिए यदि वे गांव की सुख सुविधाएं भोगते हैं तो बरसात के मौसम में दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित गुई और दयारा की छानियों (घास से बनी झोपडिय़ां) में भी यह लोग अपने जानवरों के साथ रहते हैं। रैथल के विकास की कहानी यहीं समाप्त नहीं हो जाती है। गांव में गढ़वाल मंडल विकास निगम का गेस्ट हाउस है तो हेलीपैड और स्टेडियम निर्माण प्रक्रिया में है।
18 साल तक गांव के प्रधान और साढ़े नौ साल तक ब्लाक प्रमुख रहे चंद्र सिंह राणा का कहना है कि पर्यटन के नक्शे पर लाने के लिए अभी बहुत किया जाना बाकी है।
गांवों की तस्वीर भयावह
देहरादून: उत्तराखंड में गांवों के खाली होने की तस्वीर पर नजर डालें तो काफी भयावह है। अर्थ एवं संख्या विभाग के वर्ष 2001 के आंकड़ों के अनुसार राज्य तेरह से में नौ जिलों मेंं कुल 59 गांव जन शून्य हो गए। उत्तरकाशी के दो, चमोली के सात, टिहरी के नौ, पौड़ी के बीस, रुद्रप्रयाग के दो, पिथौरागढ़ के आठ, अल्मोड़ा के नौ, बागेश्वर और चंपावत के एक-एक गांव जनशून्य हो चुके हैं। रूद्रप्रयाग जनपद के नए आंकड़ों के मुताबिक जन शून्य होने वाले गांवों की संख्या अब 26 पहुंच गई है।
Wednesday, 25 August 2010
देवीधुरा के पत्थर युद्ध में साक्षी बने एक लाख से अधिक लोग
-पत्थर युद्ध में 150 रणबांकुरे घायल
-मां बाराही के जयकारे के साथ जमकर चले पत्थर
लोहाघाट (चंपावत),-: मिसाइल युग में पत्थर युद्ध के लिए विश्वविख्यात ऐतिहासिक देवीधुरा का बग्वाल मेला देखने के लिए देश-विदेश से करीब एक लाख से अधिक लोग पहुंचे। 13 मिनट चले पत्थर युद्ध में करीब 150 से अधिक योद्धा घायल हुए तथा दर्शक दीर्घा में पत्थर आने के कारण एक दर्जन से अधिक दर्शक भी चोटिल हुए। परंपरा के मुताबिक मंदिर की गुफा में स्थित शक्ति की परिक्रमा व पूजा अर्चना के बाद दूबचौड़ मैदान की पांच बार परिक्रमा पूरी कर रण बांकुरे पत्थर युद्ध के लिए तैयार हुए।
ढोल नगाड़ों के बीच बग्वाल खेलने आए जत्थों के पीछे महिलाओं ने भी बढ़-चढ़ कर सहभागिता करते हुए देव स्तुति व वीर रस एवं श्रंृगार रस पर आधारित गीता का गायन करते हुए बग्वाल खेलने वाले योद्धाओं का उत्साहवर्धन किया। इस बार सबसे पहले वालिक खाम (उपगांव) बद्री सिंह बिष्ट के नेतृत्व में मैदान में पहुंचा। उसके बाद लमगडिय़ा खाम वीरेन्द्र सिंह व लक्ष्मण सिंह लमगडिय़ा के नेतृत्व में चमयाल खाम, फिर गंगा सिंह चम्याल व गिरीश सिंगवाल के नेतृत्व में और अंत में त्रिलोक सिंह बिष्टï के नेतृत्व में गहड़वाल खाम के लोग पूरे जोश खरोश के साथ मैदान में पहुंचे। चारों खामों द्वारा अपने-अपने स्थानों पर मोर्चा जमाने के बाद अपराह्नï 2:51 बजे मंदिर से पुजारी के शंखनाद के साथ ही ऐतिहासिक बग्वाल शुरू हो गया। देखते ही देखते मैदान में चारों ओर से पत्थरों की बौछार होने लगी।
दो दलों में विभक्त बग्वाल खेलने वाले रणबांकुरों के पत्थर आसमान में इस तरह दिख रहे थे मानो कोई पुष्प वर्षा हो रही हो। 3 बजकर 04 मिनट पर पुजारी धर्मानन्द ने बग्वाल रोकने की घोषणा की लेकिन रणबांकुरों में इतना उत्साह था कि युद्ध विराम की घोषणा के बाद भी 3 मिनट तक बग्वाल चलता रहा। पत्थर युद्ध में लगभग 150 लोग घायल हुए। घायलों के सिर, हाथ, पांव खून से लथपथ थे, लेकिन उनके चेहरों पर दर्द के कोई भाव नहीं दिख रहे थे। दर्शक दीर्घा में बैठे एक दर्जन से अधिक लोग भी पत्थर लग जाने से घायल हुए। बग्वाल खत्म होने के बाद चारों खामों के लोग आपस में गले मिले। एक-दूसरे की कुशल पूछी और मां बाराही की जय-जयकार की। इस वर्ष बग्वाल में चम्याल और गहड़वाल खाम के सबसे अधिक लोग घायल हुए। विपरीत मौसम के बावजूद देश-विदेश के कोने-कोने से आज लगभग एक लाख से अधिक लोग यहां पहुंचे हुए थे।
प्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश तिवारी गिर्दा नहीं रहे
- उपचार के दौरान एसटीएच में हुआ निधन
- जनकवि के रूप में भी थे विख्यात
हल्द्वानी:प्रसिद्ध रंगकर्मी व जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा ने रविवार को सुशीला तिवारी चिकित्सालय में अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना से शोक की लहर दौड़ गयी। पिछले कई दिनों से उनकी तबीयत खराब चल रही थी।
नैनीताल में निवास कर रहे जाने-माने रंगकर्मी 67 वर्षीय गिरीश तिवारी गिर्दा को गत 20 अगस्त को पेट में तेज दर्द होने पर सुशीला तिवारी चिकित्सालय में भर्ती कराया गया था। अगले दिन पेट का सफल ऑपरेशन भी हुआ, लेकिन उनकी तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ। आज दोपहर 11 बजकर 31 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। वे अपने पीछे पत्नी हेमलता व दो बेटे प्रेम पिरम व तुहिन्नासु को छोड़ गये हैैं। उनका अंतिम संस्कार 23 अगस्त को पाइन्स श्मशान घाट नैनीताल में होगा। उनके निधन की सूचना से चारों तरफ शोक की लहर दौड़ गयी। अस्पताल में ही पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक, राजीव लोचन साह समेत रंगकर्मी, लेखक एवं शिक्षाविदों का जमावड़ा लग गया।
वर्ष 1945 में अल्मोड़ा के ज्योली गांव में माता जीवन्ती व पिता हंसा दत्त तिवारी के घर जन्मे गिरीश तिवारी को जनमानस गिर्दा उपनाम से पुकारते थे। गिर्दा बचपन से ही जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे। मेहनतकश अभावों से जूझती जिन्दगी को स्वर देने वाले गिर्दा का दर्द लोक गीतों में भी झलकता है। रंगकर्म के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले गिर्दा को युगों-युगों तक याद किया जाएगा। पर्यावरण को बचाने के लिए भी जुझारूपन से लगे रहे तथा पहाड़ के हर संघर्ष में लोगों का भरपूर साथ दिया। क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लेखों के माध्यम से उन्होंने अपने विचार व्यक्त किये। लोक गायक झूसिया दमाई पर शोध कार्य भी किया। राजीव कुमार निर्देशित फिल्म वसीयत में गिर्दा का अभिनय भी यादगार रहेगा। वर्ष 1996 में गिर्दा को उत्तराखंड लोक संस्कृति सम्मान से नवाजा गया। जनवादी लेखन के लिए भी मसूरी में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) ने उन्हें सम्मानित किया। उनके निधन पर मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी, राज्य सभा सदस्य तरुण विजय एवं परिवहन मंत्री बंशीधर भगत ने गहरा दु:ख व्यक्त किया है।
जनगीतों में हमेशा जिंदा रहेंगे जनकवि गिर्दा
फक्कड़ी की मिसाल थे गिरीश तिवारी गिर्दा
अल्मोड़ा-कवि कभी मरता नहीं है। गिर्दा बाबा नागार्जुन की फक्कड़ी परंपरा के ऐसे जनकवि थे, जिन्होंने हर दबे-कुचले, पीडि़त जन की पीड़ा को शब्द स्वर देकर उजागर किया। उत्तराखण्ड के किसी भी इलाके में किसी गरीब पर अत्याचार हो रहा हो या कहीं संघर्ष की बात हो, उसको भी मुखर स्वर देकर बेबाक जनकवि की भूमिका में सत्ता के खिलाफ सीना ताने खड़े हो जाते थे। गिरीश तिवारी गिर्दा की प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा के जीआईसी में हुई। गिर्दा ने लिखने की शुरुआत हिंदी गीत, गजल व कविताओं से की। कुमाऊंनी में लिखने की प्रेरणा उन्हें जीआईसी में उनके गुरु रहे चारु चन्द्र पांडे से मिली। चिपको आंदोलन के दौरान उनका जनगीत-आज हिमाला तुमनकैं धत्यों छ जागो-जागो ओ मेरा लाल, नि करि दी हलो हमरि निलामी, नि करि दि हलो हमरो हलाल- कुमाऊं ही नहीं पूरे उत्तराखण्ड में आंदोलनकारियों के मुंह से निकलता था। यही नहीं मौजूदा व्यवस्था में गैर बराबरी के खिलाफ उनके तेवर बहुत ही बागी रहते थे। बल्ली सिंह चीमा की कविता गिर्दा अक्सर आंदोलनों में गाते थे-ले मशाले चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के, अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के। वहीं उनकी कुमाऊंनी रचना आंदोलनकारियों को इस प्रकार शक्ति देती थी-हम ओड़, बारुडि़, ल्वार, कुल्ली कभाडि़ जै दिना य दूनिथैं हिसाब ल्यूलों। एक हांग निमांगू, एक फांग निमांगू, सारि खसरा खतौनि किताब ल्यूंलौ। राज्य आंदोलन के दौरान उत्तराखण्ड का कोई ऐसा कोना नहीं बचा, जहां गिर्दा के इस गीत के बोल न गूंजे हों-कस होलो उत्तराखण्ड कस हमार नेता, कसि होलि विकास नीति, कसि होलि व्यवस्था। यही नहीं गिर्दा की रचनाओं में जहां आग दिखाई देती है, वहीं जीवन दर्शन का फलक इतना व्यापक है कि उनकी छोटी सी कविता विश्व का फैलाव ले लेती है। प्रकृति व गांव के जनजीवन को भी उन्होंने शब्दों से ऐसे बुना कि गांव की सांझ सामने खड़ी हो गई-सावनि सांझ अकाश खुला है ओ हो रे ओ दिगोलालि, गीली है लकड़ी की गीला धुआं है, मुश्किल से आमा का चूला जला है। गिर्दा ने हमेशा आशा और विश्वास को अपने गीतों के माध्यम से बोया। बेहतर भविष्य के प्रति हमेशा आशावान रहे। यही कारण है कि उनके गीत हमेशा जीवन का संदेश देते थे।
अब कहां सुनाई देंगे गिर्दा के मधुर बोल...
-कौन करेगा खालीपन दूर, किसके साथ होगी जुगलबंदी...
नैनीताल: रंगकर्मी गिरीश तिवारी गिर्दा के अकस्मात चले जाने से कला एवं संस्कृति के पटल पर बहुत बड़ा शून्य छा गया है। उनकी रिक्तता की पूर्ति कैसे होगी, अब यहीं ज्वलंत प्रश्न जन संघर्षों से जुड़े लोगों के समक्ष उत्पन्न हो गया है। गिर्दा के बिछोह के गम से फिलवक्त कोई भी नहीं उबर सका है। अब उनके द्वारा जलाई गयी मशाल को आगे बढ़ाकर ही उनके खालीपन को दूर करने की कोशिश भर की जा सकती है।
गिर्दा के अचानक चले जाने से हर कोई स्तब्ध है। जब तक गिर्दा सभी के बीच थे, किसी ने सोचा भी न था कि उनकी विरासत को कैसे आगे बढ़ाया जाएगा। उनके चले जाने के बाद अब यही यक्ष प्रश्न जन संघर्षों तथा रंगमंच से जुड़े लोगों के सामने खड़ा हो गया है। हर कोई मानता है कि गिर्दा की कमी अब कतई पूरी नहीं की जा सकती। गिर्दा के साथ कई यात्राओं पर जाने वाले इतिहासकार डा.शेखर पाठक का भी यही मानना है कि गिर्दा के जाने से जन संघर्षों के समक्ष बहुत बड़ा शून्य छा गया है। इस शून्य को दूर करना किसी के वश में नहीं है। गिर्दा के साथ जुगलबंदी करने वाले लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी भी उन्हें इन्हीं शब्दों में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। बकौल श्री नेगी जन संघर्षों को सुर देना वाला कुमाऊं में अब गिर्दा के समकक्ष का कोई और जनकवि मुझे नजर नहीं आ रहा है।
वरिष्ठï पत्रकार एवं जन आंदोलनों में हमेशा सक्रिय रहने वाले राजीव लोचन साह गिर्दा के बारे में कहते हैं कि उन्हें मात्र जनकवि व रंगकर्मी कहकर शब्दों में सीमित नहीं किया जा सकता है। गिर्दा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, उनके खालीपन को अब दूर करना मुमकिन नहीं है। उत्तराखंड के चर्चित नशा नहीं-रोजगार दो आंदोलन समेत अन्य कई जन संघर्षों में गिर्दा के साथ रहे डा.शमशेर सिंह बिष्ट कहते हैं कि लोगों को साथ जोडऩे की जो कला उनमें थी, वह अब कहां से आएगी। प्रसिद्ध रंगकर्मी विश्वम्भर नाथ साह गिर्दा के उत्तराखंड राज्य आंदोलन मेें दिए गए अनुकरणीय योगदान की चर्चा करते हुए कहते हैं कि नैनीताल में उस आंदोलन में जिस तरह उन्होंने जान फंूकी थी, वह हर किसी के वश की बात नहीं है। गिर्दा के अन्य संगी साथी भी उनके बहुमुखी व्यक्तित्व को अब बस केवल याद करते हैं। इन्हीं यादों में उनकी आंखें भर आती हैं। हम सभी को मालूम है कि अब गिर्दा लौटकर नहीं आएंगे।
तो कह दिया अलविदा 'बबा
परम्परा को तोड़ महिलाओं ने भी दिया गिर्दा की अर्थी को कंधा
, नैनीताल: शव यात्रा 'गिर्दाÓ की थी, तो परम्पराएं टूटनी ही थी। महानायक की तरह रंगकर्मी व जनकवि को हर किसी ने अलविदा 'बबाÓ कहा। हर आंख में आंसू..हर हाथ अर्थी छूने को आतुर थे। महिलाओं ने परम्पराएं तोड़ कर न केवल उनकी अर्थी को कंधा दिया बल्कि घाट पहुंच कर उन्हें अंतिम विदाई भी दी। जनगीतों के साथ निकली उनकी अंतिम यात्रा में हर कोई एक दूसरे के कंधे पर सिर रख जार-जार रो रहा था।
यह गिरीश तिवारी 'गिर्दाÓ का मानव चुम्बकीय प्रभाव था, वह हमेशा लोगों को कुमाऊंनी शब्द 'बबाÓ कह कर पुकारते थे। सोमवार को उनकी शव यात्रा में प्रशासनिक अधिकारी, पत्रकार, रंगकर्मी, साहित्यकार, राजनेता, छात्र, न्यायाधीश, विभिन्न संगठनों के लोग, शिक्षक, महिलाएं, मजदूर तबका और सभी धर्मों के लोग शामिल थे। इससे झलक रहा था कि गिर्दा वह हस्ती थे जो कभी मिटेंगे नहीं। लग रहा था मानो उनकी शव यात्रा में नैनीताल ही नहीं, पूरा उत्तराखंड शामिल है। दिल्ली व लखनऊ से आये लोग भी शामिल थे। इस विराट व्यक्तित्व की अर्थी को हर हाथ छू लेना चाहता था। इस दौरान जो भी मार्ग में मिला वह यात्रा में शामिल हो गया और काफिला बढ़ता गया। गिर्दा की अन्तिम इच्छा थी कि उनकी शव यात्रा में उनके गीतों को अवश्य गाया जाय, साथियों ने यही किया भी। फिंजा में उनके लिखे, गाये जन मानस की पसंद बन चुके गीत 'जागो, जागो हो म्यारा लाल, म्यार हिमाल...Ó, 'हम ओड़, बारूड़ी, ल्वार, कुल्ली कबाड़ी, जता एक दिना तो आलो उ दिन य दुनि मां, एक हांग न मांगूलौ, एक पांख न मांगूलौ, सार खसरा खतौनी किताब ल्यूलौ..Ó, 'गिली है लकड़ी कि गिला धुंआ है, मुश्किल से आमा का चूल्हा जला है, साग क्या छौंका है पूरा गौं महका है...Ó जैसे गीत गूंज रहे थे। जन आंदोलनों के दौरान जब गिर्दा सड़कों में उतर कर अपने लिखे जन गीतों को गाते थे तो हजारों की भीड़ उन्हें घेर लेती थी। मगर आज वह गा नहीं रहे थे, तो भी हजारों लोग उन्हें घेरे हुए थे। हर तबका उनके साथ उसी तरह जुड़ा था जैसे जन आंदोलनों के दौरान उनके साथ लोग जुड़ जाते थे।
इस साल खो गये पहाड़ के दो लाल
नैनीताल: पहले सिने अभिनेता निर्मल पांडे और अब गिरीश तिवारी 'गिर्दाÓ दुनिया के मंच से रुखसत हो गये। पहाड़ ने इस साल दो लाल खो दिये यह क्षति कभी पूरी नहीं हो सकती। दोनों लोग मूल रूप से अल्मोड़ा जनपद के थे, लेकिन उनकी कर्मभूमि नैनीताल रही। निर्मल पांडे रंगमंच के साथ ही सिने जगत से भी जुड़े थे। उनका निधन इसी वर्ष 19 फरवरी को मुम्बई में हो गया। गिर्दा रंगमंच के अलावा प्रख्यात जनकवि भी थे। अच्छे लेखक व अच्छे वक्ता भी थे। रविवार को इस बहुआयामी व्यक्तित्व ने भी अलविदा कर दिया।
Tuesday, 27 July 2010
-शहादत देने वालों में पीछे नहीं उत्तराखंडी
-12 सौ से अधिक पदक जीत चुके हैं सूबे के जांबाज
उत्तराखंड को वीरों की भूमि यूं ही नहीं कहा जाता। लोक गीतों में यहां के शूरवीरों की जिस वीर गाथाओं का जिक्र होता है वह
अब सूबे की सीमाओं में ही न सिमट कर देश-विदेश में फैल गई हैं। हर साल यहां के औसतन दर्जन भर जवान देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान करते हैं। कारगिल युद्ध में सूबे के 75 सैनिकों ने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। ऐसा कोई पदक नहीं जो उत्तराखंड के जांबाजों ने अपने नाम न किया हो। इनकी याद में उत्तराखंड वासियों की पलकें जरूर नम होती हैं, लेकिन शहीदों की वीरगाथा से इनका सीना हमेशा फख्र से चौड़ा रहता है।
राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान के लिए उत्तराखंडी हमेशा से ही आगे रहे हैं। यहां के युवाओं में सेना में जाने का क्रेज आज भी बरकरार है। यही कारण है कि आईएमए से पास आउट होने वाला हर 12वां अधिकारी उत्तराखंड से है और भारतीय सेना का हर पांचवां जवान भी इसी वीर भूमि में जन्मा है। देश में जब भी कोई विपदा की घड़ी आई तो यहां के जवान अपने फर्ज से पीछे नहीं हटे। उन्होंने अपने सीने पर गोलियां खाकर देश की एकता और अखंडता पर कोई आंच नहीं आने दी। उन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर वतन की आन बान और शान को बरकरार रखा है। चाहे भारत-चीन युद्ध में परमवीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा का शौर्य हो या फिर हाल ही में मुंबई आतंकी हमले में शहीद हुए अशोक चक्र विजेता गजेंद्र सिंंह का अदम्य साहस। उत्तराखंड का जवान हमेशा से ही अपने फर्ज को पूरी शिद्दत के साथ निभाता रहा है। स्वतंत्रता से पूर्व यहां के कई वीर ब्रिटिश सेना के लिए भी अपनी जांबाजी दिखा चुके हैं। इसके लिए वह विक्टोरिया क्रास जैसा सम्मान भी पा चुके हैं। इनमें गबर सिंह का नाम आज भी याद किया जाता है। उनके नाम पर आज भी चंबा(टिहरी) में मेला लगाया जाता है।
पदकों की सूची
परमवीर चक्र- 1
अशोक चक्र- 04
महावीर चक्र- 10
कीर्ति चक्र- 23
वीर चक्र- 95
शौर्य चक्र- 124
उत्तम युद्ध सेवा मेडल -01
युद्ध सेवा मेडल -15
सेना, नो सेना व वायु सेना मेडल- 541
मेंशन इन डिस्पेच -115
कुल - 929
स्वतंत्रता पूर्व वीरता पदक
- विक्टोरिया क्रास - 3
- इंडियन आर्डर आफ मैरिट - 53
- मिलिट्री क्रास - 25
- इंडियन डिस्ंिटग्विस्ड सर्विस मेडल - 89
मिलिट्री मेडल - 44
मेंशन इन डिस्पेच- 150
कुल - 364
इनके अलावा यहां के अधिकारी व सैनिक परम विशिष्ट सेवा मेडल, अति विशिष्ट सेवा मेडल व विशिष्ट सेवा मेडल से भी नवाजे जा चुके हैं।
-कारगिल के शहीदों को शत-शत नमन
कारगिल युद्ध को बीते ग्यारह साल
सूबे के 75 व दून के 18 जांबाजों ने दी थी शहादत
pahar1: कारगिल युद्ध को ग्यारह साल हो चुके हैं। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने भारतीय सीमाओं में घुसपैठ कर कई इलाकों पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद भारतीय वीर जवानों ने अपने अदम्य साहस और युद्ध कौशल से इन घुसपैठियों को मार भगाया और इन इलाकों में फिर से तिरंगा लहराने लगा। कारगिल युद्ध के दौरान हजारों जवान शहीद हुए। सरकार ने ऑपरेशन विजय और शहीदों की याद में हर वर्ष 26 जुलाई को विजय दिवस मनाने का निर्णय लिया।
दून के अमर शहीद
1. मेजर विवेक गुप्ता (महावीर चक्र)
देहरादून के वसंत विहार निवासी ले. कर्नल (रिटायर्ड) बृजमोहन गुप्ता के घर 1970 में जन्मे मेजर विवेक गुप्ता 13 जून 1992 को द्वितीय राजपूताना रेजिमेंट में शामिल हुए। कारगिल में ऑपरेशन विजय के दौरान 12 जून 1999 को मेजर विवेक गुप्ता ने तोतोलिंग चोटी को पाक घुसपैठियों से मुक्त करते हुए कई आतंकवादियों को मौत के घाट उतारा। युद्ध के दौरान विवेक गंभीर रूप से घायल हो गए और मात्र 29 वर्ष की आयु में देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। इस वीरता और अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र दिया गया।
2. स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर
28 अप्रैल 1962 में ग्राम बड़ोवाला में ठाकुर राजपाल सिंह व हेमवती पुंडीर के घर इस वीर सपूत का जन्म हुआ। उन्होंने 1979 में राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी में प्रवेश कर सैन्य जीवन की शुरुआत की। शहीद पुंडीर एक बेहतरीन पायलट होने के साथ एक कुशल खिलाड़ी, गायक व संगीत प्रेमी थे। ऑपरेशन विजय के दौरान शत्रुओं की गतिविधियों की जानकारी लेने के लिए उन्होंने उड़ान भरी। वह दुश्मनों के क्षेत्र में शत्रुओं की गतिविधियों का जानकारी हासिल कर रहे थे कि पाकिस्तानी घुसपैठियों ने मिसाइल से उनके हेलीकॉप्टर पर हमला कर दिया। इस हमले में राजीव वीरगति को प्राप्त हुए।
3. नायक बृजमोहन (वीर चक्र)
देहरादून के ग्राम तुनवाला में एक जून 1975 में माधो सिंह नेगी के घर इस वीर सपूत का जन्म हुआ। शुरू से सेना में जाने की ललक के चलते बृजमोहन 9 पैरा कमांडों में भर्ती हुए। मई 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें कश्मीर में तैनाती मिली। एक जुलाई को पाकिस्तानी घुसपैठियों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए भारत मां का यह लाडला बृजमोहन मात्र 24 वर्ष की युवावस्था में देश के लिए शहीद हो गया। मरणोपरांत बृजमोहन को वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
4. रायफलमैन नरपाल सिंह
पट्टी मालकोट में सुरेंद्र सिंह के घर एक जुलाई 1969 को नरपाल सिंह का जन्म हुआ। बीए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह गढ़वाल रायफल में भर्ती हुए। कारगिल में ऑपरेशन विजय के दौरान उन्हें द्रास सेक्टर में तैनाती मिली। 29 जून 1999 को यह वीर सपूत अपने साथियों को बचाते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
5. रायफलमैन रमेश कुमार थापा
देहरादून के इस लाडले ने वर्ष 1976 में अनारवाला निवासी सर्वजीत थापा के घर जन्म लिया। प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद वह 5/3 गोरखा रेजीमेंट में भर्ती हुए। ऑपरेशन विजय के दौरान उनकी यूनिट को 32 राष्ट्रीय रायफल के साथ लगाया गया। पांच जुलाई 1999 को कारगिल में दुश्मनों को खदेड़ते हुए दून का यह जाबांज शहीद हो गया।
6. नायक कृष्ण बहादुर
भारत के इस वीर सपूत का जन्म 24 जून 1964 में सेलाकुई निवासी मोहन सिंह थापा के घर हुआ था। हाईस्कूल पास करने के बाद वह 4/3 गोरखा रेजीमेंट में भर्ती हो गए। ऑपरेशन विजय के दौरान बटालिक सेक्टर को मुक्त कराते हुए 11 जुलाई 1999 को वीरगति को प्राप्त हुए।
7. रायफलमैन जयदीप सिंह भंडारी
शहीद जयदीप सिंह भंडारी का जन्म 15 जनवरी 1978 को नेहरूग्राम निवासी बचन सिंह भंडारी के घर हुआ। इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर वह 17 गढ़वाल रायफल में भर्ती हुए। निशानेबाजी और बाक्सिंग के शौकीन जयदीप ने कई पदक भी हासिल किए। ऑपरेशन विजय के दौरान उन्हें बटालिक सेक्टर की जुबार हिल में तैनाती मिली। दुश्मनों से लोहा लेते हुए तीस जून को उत्तराखंड का यह जाबांज 21 वर्ष की आयु में वीरगति को प्राप्त हुआ।
8. लांस नायक शिवचरण
शहीद शिवचरण प्रसाद का जन्म 12 मई 1973 को अनारवाला निवासी सदानंद के घर हुआ। बीए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद व सेना में भर्ती हो गए। ऑपरेशन विजय में मश्को घाटी में दुश्मनों से लोहा लेते हुए छह जुलाई को इस वीर सपूत ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।
9. राजेश गुरुंग
अमर शहीद राजेश गुरूंग का जन्म 1975 को चांदमरी, घंघोड़ा निवासी श्याम सिंह गुरूंग के घर हुआ। हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे नागा रेजीमेंट में भर्ती हो गए। कारगिल में दुश्मनों से मुकाबले करते हुए छह जुलाई को राजेश वीरगति को प्राप्त हुए।
10. तेंगजिंग नमखा
कारगिल शहीद तेंगजिंग नमखा का जन्म विकासनगर निवासी नोरबू थुंडुप के घर 1979 में हुआ था। सातवीं परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे सेना में भर्ती हुए। युद्ध के दौरान व अपनी कंपनी के साथ तुरतुक सेक्टर में तैनात थे। 19 जुलाई को यह जाबांज मातृभूमि की रक्षा करता हुआ शहीद हो गया।
11. जय सिंह नेगी
अमर शहीद जय सिंह नेगी का जन्म नया गांव मल्हान निवासी शिवराज सिंह नेगी के घर 20 दिसंबर 1977 को हुआ। इंटरमीडिएट करने के बाद वे गढ़वाल रायफल्स में भर्ती हो गए। ऑपरेशन विजय के दौरान मश्कोह घाटी में दुश्मनों से लोहा लेते हुए सात जुलाई 1999 को भारत मां के इस लाडले ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
दून के अन्य शहीदों में
12. नायक मेख बहादुर गुरुंग, निवासी डाकरा कैंट, देहरादून
13.कैलाश कुमार, ग्राम डांडी, रानीपोखरी देहरादून
14. देवेंद्र सिंह, शांति विहार, गढ़ी कैंट, देहरादून
15. संजय गुरुंग, ग्राम नवादा, देहरादून
16. जिगमे सोनम, तिब्बत कालोनी, सहस्त्रधारा रोड, देहरादून
17. नायक विजय सिंह भंडारी, प्रेमनगर
18.नायक कश्मीर सिंह वीर चक्र, आमवाला, नींबूवाला, देहरादून
शेष स्थानों से कितने हुए शहीद
पौड़ी
- नायक मंगत सिंह
- रायफलमैन मान सिंह
- लांस नायक मदन सिंह
- रायफलमैन कुलदीप सिंह
- नायक धर्म सिंह
चमोली
- हवलदार पदम राम
- रायफलमैन सतीश चंद
- रायफलमैन रंजीत सिंह
- नायक दिवाकर सिंह
- लांस नायक कृपाल सिंह
- नायक हीरा सिंह
- सिपाही हिम्मत सिंह
- नायक आनंद सिंह
रुद्रप्रयाग
- रायफलमैन भगवान सिंह
- नायक गोविंद सिंह
- नायक सुनील दत्त
टिहरी
- रायफलमैन दलबीर सिंह
- रायफलमैन विरेंद्र लाल
- लांस नायक दिनेश दत्त
- रायफलमैन बिक्रम सिंह
- नायक शिव सिंह
- सिपाही सुंदर सिंह
- रायफलमैन राजेंद्र सिंह
- नायक जगत सिंह
- रायफलमैन बिजेंद्र सिंह
- सुबेदार प्रताप सिंह
- नायक सुबाब सिंह
- रायफलमैन दिलवर सिंह
लैंसडौन
- नायक हरेंद्र सिंह
- लांस नायक सुरमन सिंह
- रायफलमैन डबल सिंह
- नायक अनिल सिंह
- लांस नायक देवेंद्र प्रसाद
- नायक ज्ञान सिंह
- नायक सुरेंद्र सिंह
- हवलदार मदन सिंह
- रायफलमैन बलबीर सिंह नेगी
- नायक भरत सिंह
- सिपाही भरत सिंह
- रायफलमैन अनसुया प्रसाद ध्यानी
उत्तरकाशी
- रायफलमैन दिनेश चंद्र
नैनीताल
- मेजर आरएस अधिकारी
- लांस नायक चंदन सिंह
- लांस नायक राम प्रसाद
- सिपाही एमसी जोशी
पिथौरागढ़
- रायफलमैन जौहर सिंह
- नायक किशन सिंह
- हवलदार गिरीश ंिसह
- पीटीआर कुंडल सिंह
अल्मोड़ा
- लांस नायक हरी सिंह देवडी
- नायक हरी बहादुर घले
- हवलदार तम बहादुर क्षेत्री
- कैप्टन आदित्य मिश्रा
बागेश्वर
- पीटीआर राम सिंह बोरा
- सिपाही मोहन सिंह
- हवलदार हरी सिंह थापा
ऊधमसिंह नगर
- रायफलमैन अमित नेगी
भुला दिए जाते हैं शहीद
कारगिल शहीदों के लिए मात्र विजय दिवस मनाकर सरकार व प्रशासन अपने कार्यों की इतिश्री कर लेता है, लेकिन शहीदों के परिजन और गांव वाले एकत्र होकर अपने लाडलों को याद करते हैं।
शहीद नरपाल सिंह - 29 जून
शहीद बृजमोहन सिंह - 1 जुलाई
शहीद विवेक गुप्ता - 12 जून
शहीद रमेश कुमार थापा- 5 जुलाई
शहीद जय दीप सिंह नेगी- 30 जून
शहीद शिव चरण- 6 जुलाई
शहीद राजेश गुरुंग - 6 जुलाई
शहीद जय सिंह नेगी- 7 जुलाई
शहीद तेंजिग नेमखा- 11 जुलाई
शहीद कृष्ण बहादुर- 11 जुलाई
Saturday, 24 July 2010
बारह हजार पदों पर नियुक्तियां जल्द
-कैबिनेट ने लिए महत्वपूर्ण फैसले, तीन माह में शुरू होगी भर्ती प्रक्रिया
-राज्य लोक सेवा आयोग के दायरे में समूह-ग की भर्ती को रोजगार दफ्तर में पंजीकरण अनिवार्य
-आयोग से बाहर के पदों की भर्ती परीक्षा कराएगा प्राविधिक शिक्षा परीक्षा परिषद, आवेदकों को आयु सीमा में पांच वर्ष की छूट
-तकनीकी शिक्षा महकमे के तहत होंगे आईटीआई और पालीटेक्निक
-आईटीआई के आठ नए ट्रेडों को मंजूरी, मृतप्राय: ट्रेडों के पद होंगे कन्वर्ट
pahar1-
प्रदेश में समूह-ग की भर्तियों में अब स्थानीय युवाओं को रोजगार के ज्यादा मौके मिलेंगे। इस श्रेणी में राज्य लोक सेवा आयोग के पदों पर भर्ती की पात्रता के लिए अब रोजगार दफ्तर में पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। आयोग से बाहर और उसके दायरे के तकरीबन 12 हजार पदों पर तीन माह में भर्ती प्रक्रिया शुरू होगी। भर्ती परीक्षा के लिए आयु सीमा में पांच वर्ष की बढ़ोत्तरी की गई है। साथ ही आईआईटी व पालीटेक्निक अब तकनीकी शिक्षा का हिस्सा होंगे। राज्य कैबिनेट ने मंगलवार को कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए।
सचिवालय में मंगलवार को कैबिनेट की बैठक के निर्णयों को मुख्य सचिव एनएस नपलच्याल ने ब्रीफ किया। उन्होंने बताया कि सूबे में समूह-ग के रिक्त 12 हजार पदों में तकरीबन 1500 पद आयोग के परिधि में हैं, जबकि 10500 पद इससे बाहर हैं। आयोग से बाहर समूह-ग के पदों पर भर्ती के लिए राज्य के सेवायोजन दफ्तरों में पंजीकरण अनिवार्य है। पड़ोसी राज्य हिमाचल की तर्ज पर उत्तराखंड ने भी कदम बढ़ा दिए हैं। आयोग के पदों पर भर्ती के लिए रोजगार दफ्तर में पंजीकरण जरूरी होगा। यही नहीं समूह-ग के लिए आयोग की लिखित परीक्षा अथवा साक्षात्कार में भी राज्य की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विशिष्ट रीति-रिवाज से संबंधित सवाल पूछे जाएंगे।
समूह-ग की भर्ती के नए प्रावधानों को सेवा नियमावली में शामिल किया जाएगा। विभिन्न महकमों में इन पदों के लिए अलग-अलग के बजाए एक नियमावली होगी। तृतीय श्रेणी के इन 12 हजार पदों को जल्द भरा जाएगा। आयोग के बाहर के साढ़े दस हजार पदों के लिए भर्ती परीक्षा का जिम्मा प्राविधिक शिक्षा परीक्षा परिषद रुड़की को दिया गया है। परिषद की चयन समिति इस कार्य को अंजाम देगी। भर्ती परीक्षा में शामिल होने वाले सभी अभ्यर्थियों को आयु सीमा में पांच वर्ष की छूट मिलेगी। इस परीक्षा में 40 वर्ष आयु के युवा आवेदन कर सकेंगे। यह व्यवस्था सिर्फ मौजूद वर्ष के लिए लागू होगी। इसके बाद पहले से तय आयु सीमा 35 वर्ष लागू रहेगी। समूह-ग की भर्ती प्रक्रिया को लेकर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित समिति की संस्तुतियों पर चर्चा के बाद कैबिनेट ने यह निर्णय लिया। अधीनस्थ चयन सेवा आयोग के गठन पर भी कैबिनेट में चर्चा की गई, लेकिन इस पर फैसला नहीं लिया गया।
तकनीकी शिक्षा का कैनवास अब बड़ा हो गया। इसके दायरे में अब आईटीआई भी होंगे। विशेष तौर पर आईटीआई संचालित कर रहा प्रशिक्षण महकमा अब तकनीकी शिक्षा के अधीन होगा। विद्यार्थियों को बेहतर तकनीकी प्रशिक्षण के लिए आईटीआई, पालीटेक्निक भी तकनीकी शिक्षा की एक छतरी के नीचे होंगे। तकनीकी कौशल से जुड़े सर्टिफिकेट, डिप्लोमा व डिग्री कोर्स की गुणवत्ता और विद्यार्थियों को बेहतर प्रशिक्षण के लिए तकनीकी शिक्षा का एकीकरण किया गया है। अलबत्ता, एक महकमे के तहत दोनों निदेशालय बदस्तूर काम करेंगे। मुख्य सचिव के मुताबिक नई व्यवस्था में आईटीआई पास करने वालों को पालीटेक्निक में लेटरल इंट्री का मौका देने पर विचार किया जाएगा। आईटीआई में आठ नए कोर्स को भी मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी। इनमें एडवांस मॉड्यूल आटोमोबाइल सेक्टर, एडवांस मॉड्यूल इलेक्ट्रिकल सेक्टर, एडवांस मॉड्यूल प्लांट प्रोसेसिंग, लाइब्रेरी एंड इनफोरमेशन साइंस, हास्पिटल हाउसकीपिंग, हेयर एंड स्किन केयर, डेंटल टेक्निशियन व फ्रंट आफिस असिस्टेंट शामिल हैं। इंडस्ट्रीज और रोजगार की जरूरत को ध्यान में रखकर नए ट्रेड तैयार किए गए। नए ट्रेड के लिए अलग से अनुदेशकों के नए पद सृजित नहीं किए जाएंगे। मृतप्राय: अथवा जिन ट्रेड की मांग बेहद कम हो गई है, उनके रिक्त पदों को नए में कन्वर्ट किया जाएगा। इससे सरकार पर वित्तीय भार नहीं पड़ेगा।
कैबिनेट ने हिमगिरी नभ विश्वविद्यालय उत्तरांचल के नए नाम हिमगिरी जी विश्वविद्यालय उत्तराखंड को मंजूरी दी। इसके लिए निजी विवि अधिनियम में आंशिक संशोधन होगा। इस मौके पर तकनीकी शिक्षा प्रमुख सचिव राकेश शर्मा, उच्च शिक्षा प्रमुख सचिव पीसी शर्मा व मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव डीके कोटिया भी मौजूद थे।
नैनीताल तक नहीं पहुंचेगी ट्रेन!
- अत्यधिक लंबा रूट व भूगर्भीय संरचना बनी बाधक
- कच्ची पहाडिय़ों के दरकने का खतरा
- चीफ इंजीनियर कर चुके हैं प्री-फिजिबिलटी स्टडी
- आजादी से पूर्व भी हो चुकी है कवायद
हल्द्वानी (नैनीताल): विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल नैनीताल तक ट्रेन का सफर शुरू हो पाने की कवायद को प्रथम चरण में ही तगड़ा झटका लगा है। हाल ही में रेलवे बोर्ड ने काठगोदाम से नैनीताल तक रेलवे लाइन बिछाने की संभावनाएं तलाशने के निर्देश दिए थे। पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय से चीफ इंजीनियर भी यहां का प्राथमिक मुआयना (प्री-फिजिबिलिटी स्टडी) कर चुके हैं। यहां के लंबे रूट, दरकती तथा कमजोर पहाडिय़ों ने इस राह को मुश्किल बना दिया है।
खूबसूरत झील के चारों ओर बसा नैनीताल शहर देश से ही नहीं विदेश से भी हजारों पर्यटकों को हर वर्ष अपनी ओर आकर्षित करता है। झील के अलावा आसपास के तमाम पर्यटन स्थल सैलानियों के जेहन में उत्तराखंड की विशेष तस्वीर पेश करते हैं। भीमताल, सातताल, भवाली, सूखाताल सहित आसपास के सुंदर पर्यटक स्थल नैनीताल आने वाले सैलानियों को आकर्षित करते हैं। राज्य की पहचान में भी नैनीताल का अहम रोल है। इसी को देखते हुए रेलवे ने कुमाऊं के अंतिम स्टेशन काठगोदाम से नैनीताल तक रेलवे लाइन बिछाने की बात कही। पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक यूसी द्वादशश्रेणी ने मई में काठगोदाम के वार्षिक निरीक्षण के दौरान बोर्ड की मंशा को सार्वजनिक भी किया था। तभी से कुमाऊं वासियों की आशाओं को मानो पंख लग गए थे। उन्होंने इसके लिए जुलाई में प्री फिजीबिलिटी स्टडी कराने के निर्देश दिए थे। इधर इसी माह पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय गोरखपुर से चीफ इंजीनियर टीम सहित यहां का दौरा कर चुके हैं, लेकिन इस स्टडी के जो रिजल्ट सामने आए है उसने पहाड़ पर ट्रेन चढऩे की कवायद को फिर तगड़ा झटका लगा दिया है। स्टडी में एक ओर काठगोदाम से नैनीताल की रेल लाइन के लिहाज से स्थलीय दूरी को अत्यधिक पाया गया है। दूसरी ओर दरकती पहाडिय़ों का खतरा भी बाधा बना। स्टडी के मुताबिक काठगोदाम से नैनीताल की हवाई दूरी करीब 16 किमी और सड़क मार्ग से 35 किमी है। वहीं रेल लाइन के लिहाज से यह करीब 250 किमी होगी। ऐसे में अत्यधिक लंबे रूट के चलते योजना का खर्च भी बहुत अधिक हो जाएगा। जानकारों के मुताबिक यहां की पहाडिय़ां भी अत्यंत कमजोर हैं और इनके दरकने का खतरा भी अधिक है। इतना ही नहीं आजादी से पूर्व पहाडिय़ों पर ट्रेन चढ़ा चुके अंग्रेजों ने भी नैनीताल तक रेलवे लाइन बिछाने की कवायद शुरू की थी। वर्ष 1930 से 35 के बीच इसकी पहल हुई थी, लेकिन यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी थी। पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (सीपीआरओ) अमित सिंह ने बताया कि प्री-फिजीबिलिटी स्टडी में इस रूट की लंबाई अत्यधिक पाई गई है। इससे फिलहाल यहां ट्रेन संचालन की कोशिश मुश्किल हो गई है।
अब प्री फिजीबिलिटी स्टडी में ही रेल लाइन बन पाने की संभावनाओं पर लगे विराम से कुमाऊं वासियों के साथ-साथ पर्यटन व्यवसाय को भी तगड़ा झटका लगा है।
कदमों को हौसला मिले तो नाप डालेंगे दूरियां
- मध्यम-लंबी दूरी के एथलीट कर रहे अंतर्राष्ट्रीय फलक पर सूबे का नाम रोशन
- कसक बस इतनी कि बढ़ते कदमों को कोई प्रोत्साहन देेने वाला नहीं
- सुविधाओं की कमी बन रही प्रतिभाओं की राह में रोड़ा
केरल की तर्ज पर सूबे में भी डेवलप हो एथलेटिक्स एकेडमी
देहरादून: बढ़ते कदमों को हौसला मिलता रहे तो मंजिल आसान हो जाती है। ऐसा ही कुछ कर दिखा रहे हैं सूबे के मध्यम-लंबी दूरी के एथलीट। अपने प्रदर्शन से उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय फलक पर सूबे का नाम रोशन किया है। कसक है तो बस इतनी कि उनके बढ़ते कदमों को कोई प्रोत्साहन देेने वाला नहीं मिल पा रहा।
वर्तमान में प्रदेश के लंबी-मध्यम दूरी के धावकों ने देशभर में अपने प्रदर्शन की छाप छोड़ी है। ओलंपियन सुरेंद्र भंडारी, पंकज डिमरी, ईलम सिंह, प्रीतम बिंद आदि ऐसे नाम हैं, जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय फलक पर पहचान कायम की है। पंकज डिमरी ने हाल ही में एशियन ग्रां प्री 'एकÓ व 'दोÓ में कांस्य व रजत पदक जीतकर प्रदेश का झंडा बुलंद किया। ईलम सिंह के अलावा लंबे अर्से बाद ट्रैक पर लौटे प्रीतम सिंह ने भी अपने प्रदर्शन से सभी को प्रभावित किया। इन दिनों ये सभी धावक इंटर स्टेट चैंपियनशिप के साथ-साथ कॉमनवेल्थ की तैयारी के लिए पसीना बहा रहे हैं। सूबे की अंतर्राष्ट्रीय महिला एथलीट किरन तिवारी भी कॉमनवेल्थ की तैयारियों में जुटी हैं।
पिछले कुछ समय से उत्तराखंड मध्यम व लंबी दूरी के धावकों की नर्सरी के रूप में उभरा है। इस सब के बावजूद मूलभूत सुविधाओं और प्रोत्साहन की कमी प्रतिभाओं की राह में रोड़ा बन रही है। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय फलक पर प्रदेश का नाम चमका रहे एथलीट अभी भी सरकार से सम्मान की आस लिए हुए हैं।
इंटर स्टेट चैंपियनशिप की तैयारियों में जुटे पंकज डिमरी का कहना है कि पिछले दो साल में राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने के बावजूद अभी तक उन्हें प्रोत्साहन राशि नहीं मिली। सरकार ने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खिलाडिय़ों के लिए पुरस्कार राशि की घोषणा तो कर दी, मगर कब देगी, इसका किसी को पता नहीं।
प्रीतम बिंद का कहना है कि खिलाडिय़ों की हौसलाअफजाई के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाना जरूरी है। वह कहते हंै कि सूबे में सिंथेटिक ट्रैक की बेहद जरूरत है। इसके लिए सरकार को जल्द से जल्द व्यवस्था करनी चाहिए।
एथलेटिक्स एसोसिएशन के सचिव संदीप शर्मा कहते हंै कि लंबी-मध्यम दूरी में प्रदेश के धावकों ने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय जो चमक बिखेरी है, इसके लिए उन्हेें प्रोत्साहन मिलना ही चाहिए। इससे युवा एथलीट भी प्रेरित होंगे। इसके अलावा विभागों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे एथलीटों के सहयोग को आगे आएं।
पूर्व अंतर्राष्ट्रीय एथलीट विनोद पोखरियाल का कहना है कि केरल की तर्ज पर यहां भी एथलेटिक्स एकेडमी डेवलप करने की जरूरत है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं मिलने से अन्य स्पर्धाओं में भी सूबे के खिलाड़ी अपनी चमक बिखेर सकेंगे।
Thursday, 1 July 2010
उत्तराखण्ड राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में अनुदेशकों के पदों पर भर्ती के लिये विज्ञापन
अनुदेशक भर्ती विवरणिका-2010 (आवेदन पत्र सहित) उत्तराखण्ड राज्य की वेबसाईट
www.gov.ua.nic.in OR www.ubter.in से अथवां जिले की नोडल आई0टी0आई0 से दिनांक 22-06-2010 से रु0 50/- अतिरिक्त शुल्क देकर प्राप्त कर सकते है। पूर्ण आवेदन प़त्र ,समस्त शैक्षिक योग्यता एवं अन्य वांछित प्रमाण पत्रों सहित सामान्य / अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यथियों के लिए रु0 500/-और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जन जाति के अभ्यर्थियां के लिए रु0 250/- का बैंक ड्राप्ट जो कि सचिव ,उत्तराखण्ड प्राविधिक शिक्षा परिषद रुड़की को देय हो के साथ दिनांक 13-07-2010 तक पंजीकृत डाक/स्पीडपोस्ट /स्वयं द्वारा निदेशक , व्यवसायिक परीक्षा परिषद, आई0टी0आई0 (युवक) कैम्पस निरंजनपुर देहेहरादून-248001 कार्यालय में प्राप्त हो जाने चाहिए ।
क्वींस बेटन का उत्तराखंड में होगा शानदार अभिनंदन
-छह जुलाई को पांवटा साहिब से सूबे की सीमा में प्रवेश करेगी क्वींस बेटन
रैली में बिखरेगी गढ़वाली-कुमाऊंनी संस्कृति की छटा
परेड ग्राउंड पर आयोजित होगा भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम
-हरिद्वार में गंगा आरती में शरीक होगी 'क्वींस बेटन रिलेÓ
pahar1- राष्ट्रकुल खेलों की मशाल क्वींस बेटन के स्वागत के लिए प्रशासन ने तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया है।
रैली में स्कूली बच्चों को शामिल करने के साथ ही भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियां दी जाएंगी। कुल्हाल गेट से सूबे की सीमा में प्रवेश करने वाली क्वींस बेटन विभिन्न रास्तों से होते हुए परेड ग्राउंड तक पहुंचेगी। एडीएम प्रशासन विनोद कुमार सुमन के मुताबिक रैली की तैयारियों के लिए सभी अधिकारियों को निर्देश दिए जा चुके हैैं। हरिद्वार में सात जुलाई को क्वींस बेट रिले गंगा आरती में शामिल होगी ।
छह जुलाई को क्वींस बेटन हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब की ओर से उत्तराखंड की सीमा में प्रवेश करेगी। अपराह्न लगभग तीन बजे कुल्हाल गेट पर मशाल के जनपद की सीमा में प्रवेश करने पर इसका जोरदार स्वागत किया जाएगा। प्रेमनगर से राष्ट्रकुल खेलों की मशाल को मोटरसाइकिल रैली द्वारा एस्कार्ट किया जाएगा। राजभवन गेट के पास से उत्तराखंड की दो सांस्कृतिक टीमें (एक गढ़वाली तथा एक कुमाऊंनी) एक बड़े ट्रक पर रैली में शामिल होंगी। ट्रक पर बने प्लेटफार्म पर उत्तराखंड की सांस्कृतिक झलकियों की छटा बिखेरते हुए क्वींस बेटन परेड ग्राउंड तक पहुंचेगी। खेल विभाग द्वारा तय किए गए खिलाड़ी राजभवन गेट से इसे रिले के रूप में परेड ग्राउंड तक लाएंगे। गांधी पार्क के आगे के रास्ते पर लगभग एक हजार स्कूली बच्चे रैली का स्वागत करेंगे। परेड ग्राउंड में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। इसके लिए वहां वाटर प्रूफ पंडाल तैयार किया जाएगा।
हरिद्वार: कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 की क्वींस बेटन रिले सात जुलाई को अलसुबह शहर में प्रवेश करेगी। सबसे पहले गंगा आरती में शरीक होने के बाद यह मशाल राफ्ट के जरिये बिरला घाट तक पहुंचेगी। इसके बाद यहीं से यह मशाल हेलीकॉप्टर के माध्यम से श्रीनगर गढ़वाल के लिए रवाना हो जाएगी। इसके स्वागत के लिए जिला प्रशासन तैयारियों में लग गया है।
मंगलवार को क्वींस बेटन रिले के स्वागत की तैयारियों की समीक्षा के लिए जिलाधिकारी डा. आर. मीनाक्षी सुंदरम ने एक बैठक का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने कहा कि अतिथि देवो भव: की तर्ज पर रिले का स्वागत किया जाएगा। उन्होंने बताया कि रिले सुबह 5.10 बजे हर की पैड़ी स्थित गंगा आरती में शामिल होने के बाद राफ्ट के जरिये बिरला घाट पहुंचेगी।
नैनीताल: राष्टï्रकुल खेलों की मशाल 'क्वींस बेटन रिलेÓ का 7 जुलाई को नैनीताल पहुंचने पर भव्य स्वागत किया जाएगा। स्वागत समारोह में शहर के विभिन्न संगठनों का सहयोग लिया जाएगा। जिलाधिकारी शैलैश बगौली की अध्यक्षता में मंगलवार को कलेक्ट्रेट सभागार में एक बैठक आयोजित की गयी, जिसमें स्वागत समारोह की तैयारियों पर विचार विमर्श किया गया। जिलाधिकारी ने बताया कि तय कार्यक्रम के अनुसार राष्टï्रकुल खेलों की मशाल क्वींस बेटन रिले 7 जुलाई को हैलीकाप्टर से कैलाखान हैलीपैड पहुंचेगी। उसके बाद वह नैनीताल क्लब के लिए रवाना होंगी। यहां तल्लीताल बस स्टैण्ड पर क्वींस वेटन रिले का छोलिया नृतकों द्वारा परम्परागत ढंग से स्वागत किया जाएगा।
Thursday, 17 June 2010
हुनर को जला गई पेट की आग
pahar1- कम ही लोग जानते होंगे कि ढाई-तीन दशक पूर्व तक देवभूमि में कलाकारों की एक ऐसी जाति भी थी, जिसने सदियों से यहां की सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण किया। वक्त बदला और चकाचौंध लोक पर हावी होने लगी। जमीन से जुड़ी कला ही नहीं, कलाकार भी सुविधाओं के मोहताज हो गए। पेट की भूख ने उन्हें यहां-वहां हाथ-पांव मारने को मजबूर कर दिया और धीरे-धीरे प्रकृति प्रदत्त यह कला इतिहास के पन्नों में दफन हो गई।
बात उत्तराखंड की बाद्दी जाति की हो रही है, जिसके बिना एक दौर में घर-आंगन सूने नजर आते थे। बाद्दी यहां के मूल लोक कलाकार हैं, जो आशुकवि होने के कारण अपने गीत-नृत्यों के जरिए ऐतिहासिक घटनाओं और लोक अनुष्ठानों को संरक्षित रखते थे। इनकी स्ति्रयों (बादिण्यों-बेडिण्यों) को नृत्य व गायन में महारथ हासिल थी। एक गांव से दूसरे गांव बिना आमंत्रण के वे अपनी कला व प्रतिभा का प्रदर्शन करते और वहां से मिला प्रोत्साहन उनके परिवार का संबल बनता। उत्तराखंड की संस्कृति को अपनी कला के माध्यम से जीवित रखने वाले ये कलाकार उपेक्षा और उदासीनता का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। दूरदराज के कुछेक इलाकों में जहां-कहीं उनकी मौजूदगी दिखाई भी देती है, उसमें भी मजबूरी का भाव झलकता है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की चकाचौंध में बाद्दियों को पूछने वाला कोई नहीं रहा। उनका जो रहा-सहा दर्शक वर्ग है भी, वह खुद अभावों से जूझ रहा है। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब, बाद्दी परंपरा के अवशेष भी ढूंढने मुश्किल हो जाएंगे।
हुनरमंद बनेंगे उत्तराखंड के युवा
देहरादून- सूबे की इंडस्ट्रीज युवाओं का हुनर निखारने को आगे आ रही हैं। स्टेट ओपन
यूनिवर्सिटी और टाटा मोटर्स के बीच सर्टिफिकेट कोर्स इन टेक्निकल एक्सीलेंस को लेकर करार इसकी तस्दीक कर रहा है। अन्य नामचीन कंपनियां अशोक लीलैंड व बजाज भी विवि से करार की इच्छुक हैं।
ओपन यूनिवर्सिटी ने उद्योगों को रोजगारपरक प्रोग्राम से सीधे जोड़ने की पहल की है। इसके तहत उद्योगों की जरूरत पर आधारित कोर्स तैयार किए जाएंगे। कोर्स की अध्ययन सामग्री विवि तैयार करेगा, जबकि व्यावहारिक प्रशिक्षण इंडस्ट्रीज देंगी। सूबे में प्रशिक्षित युवाओं की फौज खड़ी करने और रोजगार देने से सीधे जुड़े इस कोर्स में आटोमोबाइल इंडस्ट्री ने बाजी मारी है। इसके लिए विवि और टाटा मोटर्स ने बाकायदा करार किया है। करार के मुताबिक आटोमोबाइल सेक्टर में युवाओं को तराशने को विवि टेक्निकल एक्सीलेंस में सर्टिफिकेट कोर्स तैयार करेगा। छह माह के इस कोर्स में दो महीने थ्योरी और चार माह प्रशिक्षण की व्यवस्था होगी। प्रशिक्षण टाटा मोटर्स कंपनी देगी। प्रशिक्षण के दौरान युवाओं को बतौर स्टाइपेंड चार-पांच हजार रुपये की आमदनी भी होगी। इस सर्टिफिकेट कोर्स के चार प्रमुख कंपोनेंट होंगे। पहला कंपोनेंट इंजीनियरिंग व ड्राइंग, दूसरा मशीनों की जानकारी, तीसरा व्यक्तित्व विकास और चौथा सामान्य व्यवहार का होगा। दसवीं व बारहवीं पास युवा इस कोर्स में दाखिला ले सकेंगे। टाटा मोटर्स इस कोर्स में 600 छात्र-छात्राओं को प्रशिक्षण देने की हामी भर चुकी है। खास बात यह है कि इस सेक्टर की अन्य नामचीन कंपनियों ने भी कोर्स में खासी रुचि दर्शाई है।
विशेष रूप से अशोक लेलैंड व बजाज के रुख को देखकर विवि बेहद उत्साहित है। बजाज कंपनी ने गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले युवाओं को प्रशिक्षण देने की मंशा जताई है। संपर्क करने पर विवि के कुलपति प्रो. विनय पाठक ने टाटा मोटर्स के साथ करार की पुष्टि की। प्रो. पाठक के मुताबिक मुक्त विवि सूबे के लिए दो उद्देश्यों सशक्तिकरण व रोजगार को ध्यान में रखकर कोर्स तैयार कर रहा है। पहले कोर्स तैयार करने के बजाए इंडस्ट्रीज व रोजगार के अन्य क्षेत्रों से संपर्क साधा जा रहा है। उनकी जरूरत के मद्देनजर रोजगारपरक व व्यावहारिक कोर्स तैयार किए जाएंगे। अकेले आटोमोबाइल सेक्टर में हजारों युवाओं को खपाने की कुव्वत है।
Thursday, 10 June 2010
-समूह 'गÓ की भर्ती स्थगित
रास्ता निकालने को उच्चस्तरीय समिति गठित
- बुधवार को आंदोलनकारी संगठनों ने मुख्य सचिव से भी की मुलाकात
देहरादून,--: सरकार ने समूह ग की भर्ती प्रक्रिया स्थगित कर दी है। भर्ती का रास्ता निकालने के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में तीन प्रमुख सचिवों की उच्चस्तरीय कमेटी गठित करने के निर्देश दिए गए हैैं। कमेटी पंद्रह दिन के भीतर यह संस्तुति देगी कि इन पदों पर भर्ती के लिए क्या रास्ता अपनाया जाए। लोक सेवा आयोग के माध्यम से भर्ती का विरोध होने के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है।
समूह ग की भर्ती के मामले में बुधवार को गहन मंथन के बाद मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने चयन प्रक्रिया को स्थगित करने के निर्देश दिए। उन्होंने इसके लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में सचिवों की उच्चस्तरीय समिति गठित करने के निर्देश दिए। समिति की रिपोर्ट मिलने तक चयन प्रक्रिया को स्थगित रखा जाएगा। समिति में प्रमुख सचिव सुभाष कुमार, आलोक जैन व डीके कोटिया को बतौर सदस्य शामिल किया गया है।
मुख्यमंत्री डा. निशंक ने कहा कि राज्य सरकार युवाओं के हितों के लिए वचनबद्ध है। सरकार सभी पहलुओं का परीक्षण कर रही है और ऐसा निर्णय करेगी, जिससे युवाओं को रोजगार के अधिक से अधिक अवसर मिल सकें।
राज्य सरकार ने हाल ही में 337 पदों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी। इन नियुक्तियों को लोक सेवा आयोग के माध्यम से कराने पर स्थानीय युवाओं में नाराजगी थी। वह हित प्रभावित होने का अंदेशा जताकर नियुक्ति प्रक्रिया को आयोग के दायरे से बाहर करने की मांग कर रहे थे। इसको लेकर दो दिनों से राजधानी में उबाल आ गया था। यह पहला मौका नहीं है, जबकि समूह ग की भर्ती स्थगित हुई है। इससे पहले भी 2002 व 2004 में भी इन पदों पर भर्ती नहीं हो सकी। युवाओं की मांग है कि समूह ग की भर्ती अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के माध्यम से की जानी चाहिए। राज्य में अभी तक चयन आयोग का गठन नहीं हुआ है। ऐसे में सरकार पसोपेश में है।
इससे पूर्व आज दोपहर आंदोलनकारी संगठनों ने मुख्य सचिव एनएस नपलच्याल से मुलाकात कर भर्ती प्रक्रिया रोकने की मांग की। ऐसा नहीं होने पर आंदोलनकारियों ने 11 जून को सचिवालय कूच की चेतावनी दी थी।
:
अब तो वो बात कहां?
-आज के गहनों में तिमणियां, बुलाक जैसी कहां बात
-आभूषण ही नहीं संस्कृति की पहचान भी थे यह
-आधुनिक आभूषणों ने ले लिया इनका स्थान
(टिहरी गढ़वाल:-- तिमणियां व बुलाक आज भले ही यह नाम सुनने में अजीब लगते हों, लेकिन कभी यही खास गहने पहाड़ की महिलाओं की पहचान हुआ करते थे। त्योहार-पर्वों के अवसर पर जब महिलाएं इन्हें पहनती थी तो उनकी सुंदरता में चार चांद लग जाते थे। आधुनिक चकाचौंध में आज यह सब खो गए हैं और इनकी जगह अब आधुनिक गहनों ने ले ली है।
उल्लेखनीय है कि तिमणियां (गले का हार) व बुलाए (नाक में पहने जाने वाला जेवर) मात्र गहने ही नहीं थे, बल्कि पहाड़ की संस्कृति सभ्यता की पहचान भी थे। शादी-ब्याह व त्योहारों के अवसर पर महिलाएं विशेष तौर पर इन्हें पहनती थी। गले में पहना जाने वाला तिमणियां की बनावट भी विशेष होती थी। इन्हें तैयार करने में काफी दिन लग जाते थे। इन आभूषणों का प्रचलन राजशाही के जमाने से बताया जाता है। उस समय इन आभूषणों का काफी प्रचलन था। लम्बे समय तक इन आभूषणों का राज रहा है। कई स्थानों पर आयोजित होने वाले नृत्य व मेले में महिलाएं इन आभूषणों से लकदक होकर सामूहिक नृत्य करती थी। इन आभूषणों को लेकर कई गढ़वाली गीत भी लिखे गए हैं।
तिमणियां व बुलाक केवल आभूषण ही नहीं थे बल्कि वक्त पडऩे पर यह लोगों के आर्थिक मदद के काम भी आते थे। यहां यह बता दें कि आज के आभूषणों के अपेक्षा बुलाक व तिमणियां काफी भारी-भरकम होते थे।
आज भी गढ़वाली एलबमों पर यदाकदा पहाड़ की संस्कृति के पहचान यह आभूषण दिखाई देते हैं। आज गांव में यह आभूषण दिखाई नहीं देते बहुत कम गांवों में बुजुर्ग महिलाओं के पास ही यह आभूषण मिलेंगे, लेकिन वह भी अब इन्हें संदूक में ही संभाले हुए हैं। आज यह आभूषण बीते जमाने की बात हो गई है। नई पीढ़ी तो इन आभूषणों से परिचित ही नहीं है। आधुनिक चकाचौंध में इन प्राचीन आभूषणों की जगह नए-नए आभूषणों ने ले लिया है। समय के साथ-साथ गहने भी बदल गए हैं। तिमणियां की जगह अब हार व बुलाक की जगह नथ ने ले ली है। पहले जहां दशकों तक नथ व बुलाक आभूषणों का चलन रहा है वहीं आधुनिक समय में इसमें नित नए बदलाव आ रहे हैं।
गांव की महिला सुमणी देवी का कहना है कि पहले जैसे आभूषण अब कहां रह गए हैं। उनका कहना है कि वर्षों बाद भी गांव में बुलाक व तिमणियों का प्रचलन रहा है, लेकिन अब धीरे-धीरे गांव में यह दिखाई नहीं देते। उनका कहना है कि आज के गहनों में बुलाक व तिमणियां जैसी बात कहां।
-नवदुर्गा की छत्र-छाया में सुरक्षित है अल्मोड़ा
-चारों दिशाओं में विविध रूपों में विराज मान हैं मां
- पर्यटन के रूप में विकसित नहीं हो पायी सांस्कृतिक नगरी
अल्मोड़ा-संस्कृति, परम्परा व ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे कुमाऊं में अल्मोड़ा का विशिष्ट स्थान है। यहां नौ दुर्गा के मंदिरों में हर साल सैकड़ों भक्त पहुंचते हैं। अल्मोड़ा शहर को बसाने वाले चंद राजाओं ने इसे जहां भौतिक रूप से सुरक्षित बनाया, वहीं दैवीय शक्तियों से भी चारों दिशाओं से सुरक्षित बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कभी चंद राजाओं की राजधानी रही अल्मोड़ा नगरी की चारों दिशाओं मेंं विघ्न विनाशक भगवान गणेश स्थापित हैं। यही नहीं नगर की रक्षा के लिए अष्ट भैरव विपदाओं को हरने के लिए हर पल मौजूद हैं। प्रदेश में यहीं नौ दुर्गाओं के मंदिर भी स्थापित हैं। इसके बावजूद सरकारें इस सांस्कृतिक नगरी को पर्यटन के रूप में विकसित नहीं कर पायीं।
अल्मोड़ा के चारों ओर की चोटियों व नगर में विभिन्न रूपों में शक्ति स्वरूपा देवी माताएं रक्षा कर रही हैं। माता के नौ रूपों का वर्णन पुराणों व धार्मिक ग्रंथों में देखने को मिलता है। नगर में अलग-अलग स्थानों पर मां कई रूपों में विद्यमान हैं। इसी प्रकार मां के अलग-अलग उपासक भी हैं। कोई उपासक मां को वैष्णवी रूप में पूजता है, तो कोई शक्ति के रूप में मां के अराधना करता है। इसी लिए कहीं पर 'या देवी सर्वभूतेषु दया रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:Ó तो कोई भक्त 'जयंती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुतेÓ के भाव से मां का वंदन नमन करता है। इसे अल्मोड़ा नगरी का सौभाग्य ही कहा जाएगा कि अल्मोड़ा के चारों ओर रहने वाले वाशिंदों को प्रात: उठते ही हर दिशा में शिखरों पर स्थित मां के दर्शन होते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अल्मोड़ा की रक्षा चारों ओर से देवी-देवता करते हैं। नगर के चारों ओर नजर डालें तो कलेक्टे्रट के ठीक सामने मां बानड़ी देवी (विंध्यवासिनी), पीछे की ओर स्याही देवी (श्यामा देवी), बायीं ओर कसार देवी, पश्चिम दिशा की ओर मां दूनागिरी, नगर में चंद राजाओं की कुल देवी मां नंदा-सुनंदा, मां त्रिपुरा सुन्दरी, मां उल्का देवी, मां शीतला देवी, मां पाताल देवी, मां कालिका देवी, मां जाखन देवी जागृत अवस्था में हैं।
मां के भक्त अल्मोड़ा में देश भर से पहुंचते हैं। प्रदेश में केवल अल्मोड़ा ही ऐसा स्थान है जहां नौदुर्गा के मंदिर स्थित हैं। इसके बावजूद सरकार ने इस सांस्कृतिक नगरी को पर्यटन के रूप में विकसित करने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किये।
-शिलाएं खुद का उद्धार कर बन गईं अहिल्या
-राज्य की 26 विधवाओं ने फिर मांग भरने का दिखाया साहस
-पहाड़ में भी धीरे-धीरे टूटने लगी हैं रूढिय़ां
-समाजशास्त्रियों की नजर में साहसिक एवं जायज कदम
हल्द्वानी (नैनीताल): एक दरिया तूफानी है वो, झांसी वाली रानी है वो, कोई पढऩे वाला हो तो, खुद में एक कहानी है वोÓ। हम बात कर रहे हैं उस कहानी की जिसमें राज्य की अबलाओं ने अपने जज्बे से सबला बनने की ठान ली है। इस राह पर वे नित नये मील के पत्थरों को पीछे छोड़ रही हैं। वह भी उस पर्वतीय क्षेत्र के मार्ग पर जहां रूढिय़ों की गहरी खाई और मान्यताओं के दुर्गम रास्ते हैं। अब अल्मोड़ा जिले की नीलिमा (काल्पनिक नाम) को ही देखें। शादी में लगी मेहंदी का रंग भी नहीं छूटा कि खुशियों को ग्रहण लग गया। मार्ग दुर्घटना में घायल पति की मौत ने जिदंगी जीने के सभी रास्ते बंद कर दिये। रूढिय़ों की जंजीर में कैद वह मानसिक मौत की गिरफ्त में थी, लेकिन एक दिन उसने सबला बनने की ठान ली। उसने फिर से शादी रचाई और आज नजीर बन समाज के सामने आ गई।
अल्मोड़ा की नीलिमा तो महज एक उदाहरण है। इस तरह का साहस और मान्यताओं को आइना दिखाने में राज्य की 26 महिलाओं को सरकार ने भी अपनी प्रोत्साहन योजना से 11-11 हजार रुपये से पुरस्कृत किया है। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि पिछले एक दशक में राज्य में विधवा विवाह का ग्राफ उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। समाज कल्याण निदेशालय के आंकड़े गवाह हैं कि गुजरे वित्तीय वर्ष (2009- 10) में राज्य भर में 26 (35 वर्ष से कम आयु) विधवाओं ने पुर्नविवाह किया। इन्हें प्रोत्साहन के रूप में सरकार ने 2 लाख 86 हजार रुपये दिये। भले ही कुछ लोग विधवा विवाह के पक्ष में न हों लेकिन समाजशास्त्रियों ने इसे वक्त व समय की जायज मांग बताया है। पिथौरागढ़ निवासी समाजशास्त्री एवं वरिष्ठ पत्रकार गणेश पाठक कहते हैं कि अगर समाज तरक्की के रास्ते पर है तो उसकी आलोचना नहीं बल्कि उसे प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। श्री पाठक विधवा विवाह को प्रोत्साहन के लिए जागरूकता की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि कम उम्र में (जब बच्चे भी न हों) अगर इस विपत्ति का पहाड़ टूट पड़े तो महिला अपने ही घर में (भले वह हर तरह से सम्पन्न हो) उपेक्षित हो जाती है। उसका पूरा सामाजिक ताना-बाना बिखर जाता है, कुदृष्टि का दंश ऊपर से उसे और असुरक्षित कर देता है। कमोवेश इसी तरह की राय हल्द्वानी के ललित बल्लभ सनवाल रखते हैं। मैदानी क्षेत्रों को छोड़ दें तो पर्वतीय क्षेत्र में आज भी मान्यता और रूढिय़ां ही पूरी सामाजिक व्यवस्था का संचालन कर रही हैं। इसमें लोग बदलाव की वकालत करने लगे है। बदलाव की हवा पर्वतीय क्षेत्र में बह चली है। 26 में 17 विधवा विवाह के मामले पर्वतीय जिले से ही सामने आये हैं।
अपर निदेशक समाज कल्याण आरपी पंत कहते हैं कि सरकार भी इस दिशा में प्रोत्साहन देने में पीछे नहीं है। बजट में इस मद में अलग से प्रावधान किया जाता है। पिछले दो वर्षो में विभाग ने विधवा विवाह प्रोत्साहन में 5 लाख 83 हजार रूपये खर्च किये हैं। इस दिशा में अभी और जागरूकता की जरूरत है।
प्रोत्साहन राशि पाने वाले विधवा विवाह के मामले
टिहरी- 2
उत्तरकाशी- 3
देहरादून- 1
हरिद्वार- 1
अल्मोड़ा- 4
बागेश्वर- 1
चंपावत- 4
ऊधमसिंह नगर-9
-पहाड़ों में दम तोड़ रहीं स्वास्थ्य सेवाएं
-मीलों पैदल चलकर भी नसीब नहीं हैं चिकित्सक
- डाक्टरों का टोटा, अस्पताल बने रेफर सेंटर
- फार्मेसिस्ट व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के सहारे चल रहे कई अस्पताल
, बागेश्वर-
सरकार स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर बनाने के लाख दावे करे लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों कई किमी पैदल चलकर भी मरीजों का इलाज नहीं हो पा रहा है। चिकित्सा के अभाव में आए दिन कई मरीजों की मौत हो जाती है। मुख्यालयों में भी सरकारी अस्पताल महज रेफर सेंटर बन गये हैं।
दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित सरकारी अस्पताल फार्मेसिस्टों व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के भरोसे चल रहे हैं। जिला मुख्यालय के अस्पताल भी मरीजों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने में नाकाम साबित हो रहे हैं। चिकित्सकों के सैकड़ों पद रिक्त होने से अस्पताल मात्र रेफर सेंटर बन गये हैं। पिथौरागढ़, चंपावत, अल्मोड़ा व बागेश्वर जिलों के दूरस्थ क्षेत्रों की हालत बेहद खस्ता है। चंपावत के तल्लादेश, डांडा, ककनई, साल मछियाड़ तथा पिथौरागढ़ जिले में मुनस्यारी, धारचूला व डीडीहाट क्षेत्रों में अस्पताल भवन तो बनाये गये लेकिन यहां चिकित्सक ही नहीं हैं। बागेश्वर के गरुड़, कपकोट, कांडा तथा अल्मोड़ा जिले में सल्ट, चौखुटिया, मासी आदि क्षेत्रों के ग्रामीण मीलों पैदल चलकर या मरीज को डोली में रखकर अस्पताल पहुंचाते हैं। जिला मुख्यालयों पर स्थित अस्पतालों में भी मरीजों को बेहतर इलाज नहीं मिल पाता है।
कुमाऊं मंडल के छह जिलों में डाक्टरों के 685 पद स्वीकृत हैं लेकिन काफी समय से 408 पद रिक्त हैं। अल्मोड़ा जिले में 149 स्वीकृत पद हैं जिसमें से 94 पद रिक्त हैं। बागेश्वर में 63 पद स्वीकृत हैं जबकि 44 पद रिक्त हैं। पिथौरागढ़ में 121 स्वीकृत पदों में से 64 पद रिक्त, चंपावत में 45 पद स्वीकृत हैं लेकिन 30 पद रिक्त चल रहे हैं। महिला चिकित्सकों की नियुक्ति नहीं होने से प्रसव पीडि़त कई महिलाएं दम तोड़ देती हैं। कुमाऊं मंडल के छह जिलों में महिला चिकित्सकों के 122 पद स्वीकृत हैं जिनमें से 67 पद रिक्त चल रहे हैं। छह जिलों में दंत चिकित्सकों के कुल 27 पद स्वीकृत हैं जिसमें से 15 रिक्त हैं।
इनसेट
जल्द होगी डाक्टरों की तैनाती: भौर्याल
बागेश्वर: प्रदेश के स्वास्थ्य राज्यमंत्री बलवंत सिंह भौर्याल ने डाक्टरों की कमी से हो रही दिक्कतों को स्वीकार करते हुए कहा कि सरकार को ढाई सौ से अधिक चिकित्सक मिल चुके हैं। शीघ्र ही प्रदेश के विभिन्न अस्पतालों में चिकित्सकों की तैनाती की जायेगी। उन्होंने कहा कि डाक्टरों की कमी के बाद भी प्रदेश सरकार एंबुलेंस 108 सेवा के जरिये लोगों को बेहतर सेवाएं मुहैया कराने का प्रयास कर रही है। जल्द ही चिकित्सकों की कमी को पूरा किया जाएगा।
इनसेट
डाक्टरों के स्वीकृत व रिक्त पदों की सूची
जिला स्वीकृत पद रिक्त पद
नैनीताल 202 87
अल्मोड़ा 193 121
पिथौरागढ़ 156 112
ऊधमसिंह नगर 160 71
चम्पावत 58 38
बागेश्वर 75 54
::::
तिब्बती रिफ्यूजी भी विदेशी अधिनियम के दायरे में
बेरोकटोक आ-जा नहीं सकेंगे, प्रावधानों को मानना होगा
, रुद्रपुर-
तिब्बती नागरिक देश में बेरोक-टोक नहीं आ जा सकेंगे। उन्हें बाकायदा विदेशी अधिनियम (दॅ फॉरेनर्स एक्ट) 1946 के प्रावधानों के तहत स्पेशल एंट्री परमिट प्राप्त करना होगा। उन पर वे सभी नियम-कानून लागू होंगे, जो सामान्यत: विदेशियों पर लागू होते हैं।
हालांकि इस किस्म की व्यवस्था पहले से भी थी, किंतु सख्ती के साथ लागू नहीं हो पा रही है। अब इसे समुचित तरीके से लागू करने के लिए विदेश मंत्रालय ने राज्यों को एक बार फिर दिशा-निर्देश दिये हैं। इन निर्देशों में कहा गया है कि सन 1959 में तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा को भारत में राजनीतिक शरण दी गयी थी। इस दौरान हजारों तिब्बतियों को भी देश में रिफ्यूजी की तरह रहने की अनुमति दी गयी थी। इन रिफ्यूजियों को यहां राहत तथा पुनर्वास के तौर पर जमीन तथा अन्य सुविधायें मुहैया कराई गयी थीं। यह सब इसलिये किया गया था, ताकि सामान्य परिस्थितियां होने पर वे तिब्बत लौट सकें। उस दौरान यह भी साफ किया गया था कि रिफ्यूजियों को विध्वंसकारी व चीन के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियां संचालित करने की अनुमति नहीं दी जायेगी। साथ ही उन्हें अन्य विदेशियों की तरह ही समझा जायेगा।
मंत्रालय के मुताबिक चूंकि तिब्बती रिफ्यूजी विदेशी माने गये हैं, लिहाजा उनको भी यहां आने, ठहरने तथा लौटने के लिए विदेशी अधिनियम के प्रावधान मानने होंगे। लेकिन देखने में आ रहा है कि 1980 तथा 90 के दशक में यहां आये रिफ्यूजी भारत के आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन में इस तरह रच-बस गये हैं कि वे स्वयं को विदेशी ही नहीं मानते। यही नहीं वे यहां संपत्ति खरीदने तथा भारतीय नागरिक की तरह बर्ताव को भी अपना अधिकार समझने लगे हैं। इससे कई स्थानों पर स्थानीय नागरिकों के साथ टकराव की स्थिति भी पैदा हो रही है। कुल मिलाकर इसका कानून एवं शांति व्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। मंत्रालय का यह भी मानना है कि तिब्बतियों के यहां प्रवेश का उद्देश्य व पंजीयन के साफ दिशा-निर्देश हैं, लेकिन बॉर्डर पर इमीग्र्रेशन चेक पोस्ट और फॉरेनर्स रजिस्ट्रेशन अफसरों की कोताही से दिशा-निर्देश समुचित तौर पर लागू नहीं हो पा रहे हैं। साथ ही देश के भीतर तिब्बतियों के एक से दूसरे स्थान पर होने वाले मूवमेंट से संबंधित प्रावधानों का भी इस्तेमाल नहीं हो रहा है।
मंत्रालय के अनुसार 1959 तक भारत में आने वाले अस्थायी रिफ्यूजी ही पुनर्वास का लाभ लेने के हकदार हैं। 1959 तक भारत आने वालों के 1987 तक जन्मे बच्चे भी इस सुविधा के हकदार हैं। मौजूदा दौर में तिब्बतियों की आवाजाही बढ़ी तो वर्ष 2000 में इनके लिए स्पेशल एंट्री परमिट की व्यवस्था की गयी है। यह परमिट काठमांडू स्थित तिब्बती स्वागत केंद्र की सिफारिश पर भारतीय दूतावास जारी करेगा। यह परमिट तिब्बतियों के बच्चों को भी लेना होगा। देश में प्रवेश के बाद इन लोगों के 14 दिन के भीतर संबंधित क्षेत्र के फॉरेनर्स रजिस्ट्रेशन ऑफिसर को रिपोर्ट करनी तथा पंजीकरण कराना होगा। एंट्री, स्टे तथा एग्जिट को रेगुलेट करने के लिए तिब्बतियों को उत्तर प्रदेश के सोनौली तथा बिहार के रक्सौल के चेक पोस्ट से ही देश में आने की अनुमति होगी। जब वे वापस जायेंगे तो उन्हें इसके बारे में बताना होगा। जो लंबे समय से स्पेशल एंट्री परमिट पर रह रहे हैं उन्हें अवधि समाप्त होने पर इसका नवीनीकरण कराना होगा। अध्ययन, शोध, चिकित्सा या तीर्थाटन के लिए आने वाले तिब्बतियों पर भी वे सभी नियम व कानून लागू होंगे जो अमूमन विदेशियों पर लागू होते हैं। मंत्रालय ने जिन इलाकों में तिब्बतियों की मौजूदगी अधिक है वहां प्रावधान लागू हों इसके लिए संबंधित जिलाधिकारियों व पुलिस अधीक्षकों का संवेदीकरण करने पर भी जोर दिया।
::::
">
-धान की रोपाई अनुष्ठान है यहां
-पंचांग से निकाला जाता है रोपाई के लिए दिन
-समापन पर दी जाती है बकरे की बलि
नई टिहरी-
धान की रोपाई का तरीका देश में एक जैसा है। कई स्थानों पर इसे पूजा-अर्चना के साथ किया जाता है। उत्तराखंड राज्य के टिहरी जनपद के मलेथा में पंचांग के मुताबिक धान रोपाई के लिए विधिवत ढंग से दिन निकाला जाता है और समापन पर पशु बलि दी जाती है।
कीर्तिनगर ब्लाक मुख्यालय से महज तीन किमी दूरी पर ऋषिकेश-बदरीनाथ मोटर मार्ग पर बसा हैे गांव मलेथा। वीर शिरोमणि माधो सिंह भंडारी की कर्म स्थली मलेथा में पिछले कई सदियों से धान की रोपाई अपने आप मिसाल है। इस गांव में वर्षों से यह परंपरा है कि धान की रोपाई से पूर्व ग्रामीण गांव की राशि के आधार पर पंचांग से रोपाई शुरू करने के लिए दिन निकालते हैं। नागराजा देवता को मानने वाले मलेथावासी दिन निकल आने पर सबसे पहले एक खेत में नागराजा देवता की सामूहिक रूप से पूजा अर्चना के साथ रोपाई का श्रीगणेश करते हैं। परंपरा बनी हुई है कि इस खेत में रोपाई के बाद ग्रामीण फिर अपने-अपने खेतों में रोपाई का काम प्रारंभ करते हैं। इसके बाद पाटा का बौलू नामक तोक में स्थित गांव के अंतिम खेत में रोपाई के दिन समापन पर बकरे की बलि देने के बाद रोपाई का विधिवत ढंग से समापन किया जाता है।
बुजुर्गों के अनुसार मलेथा गांव में एक समय में सिंचाई का कोई विकल्प न होने पर यहां पर माधो सिंह भंडारी ने छेंडाधार के पहाड़ पर सुरंग गूल बनाकर चन्द्रभागा नदी से मलेथा के खेतों में पानी लाने की व्यवस्था सोची। इसके बाद उन्होंने पहाड़ को खोदकर अंदर ही अंदर गूल (सिंचाई की छोटी नहर) बनाने में सफलता भी हासिल कर ली, लेकिन इसके बाद भी इस गूल में पानी नहीं आया। ग्रामीणों में मान्यता है कि जब भंडारी द्वारा बनाई गई गूल में पानी नहीं आया तो एक रात माधो सिंह के सपने में देवी मां आई और बताया कि जब तक वह नरबलि नहीं देंगे तब तक गूल में पानी आगे नहीं बढ़ेगा।
कहा जाता है कि देवी मां के इस संदेश के बाद भंडारी ने जहां से गूल शुरू होती है वहां पर अपने बेटे की बलि दी थी। बताया जाता है कि आज जिस खेत में ग्रामीण रोपाई का समापन करते हैं उसी खेत में बलि के बाद भंडारी के बेटे का सिर पानी में बहकर आया था। इसके बाद ही समापन पर तब से अब तक यह परंपरा चली आ रही है और इस खेत में बकरे की बलि दी जाती है और बलि के बाद बकरे का मांस पूरे गांव में प्रसाद के तौर पर बांटाा जाता है।
यदि मलेथा के खेतों को इस गूल से पानी नहीं मिलता तो आज यह खेत सोना नहीं उगल रहे होते। आज भी दूर से देखने पर ही मलेथा के यह खेत हर किसी का मन मोह लेते हैं। यात्रा सीजन में तो बाहर से आने वाले तीर्थ यात्री व पर्यटक भी मलेथा में रुककर कुछ देर हरियाली से भरे खेतों को निहारते देखे जा सकते हैं।
::::
ये वादियां ये फिजाएं बुला रही हैं तुम्हें
-कुंभ के दबाव से घटे इस बार देशी सैलानी
-वर्ष के आखिरी सप्ताह में विदेशी सैलानी बढऩे की उम्मीद
-पिछले वर्ष की तुलना में अधिक बरसा धन
-सोलह जून से सैलानियों के लिए बंद होगा पार्क
हरिद्वार: महाकुंभ के दबाव ने देशी सैलानियों को राजाजी के दीदार से रोक दिया, वहीं विदेशी सैलानियों की आमद ने पार्क के चेहरे पर चमक बिखेर दी। पिछले वर्ष प्रवेश शुल्क की बढ़ोतरी ने तो कमाल कर दिया। पार्क बंद होने से सप्ताह भर पहले ही पिछले सीजन की कमाई का पार्क की चीला रेंज ने रिकार्ड तोड़ दिया। राजाजी की चीला रेंज मालामाल हो चुकी है। राजाजी पार्क 16 जून से सैलानियों के लिए बंद कर दिया जाएगा।
गढ़वाल की वादियों में राजाजी नेशनल पार्क प्रकृति के अद्भुत और वन्य जीवों के संगम से गुलजार है। एशियन एलीफेंट की शरणस्थली कहे जाने वाले राजाजी पार्क में इन दिनों बहार आई हुई है। हाथियों का झुंड नजर आ रहे हैं। तेंदुए भी सैलानियों को दिख रहे हैं। चीतल का कुलांचे भरना सैलानियों को रोमांचित कर रहा है। पिछले सीजन में राजाजी नेशनल पार्क का प्रवेश शुल्क प्रति सैलानी 40 से बढ़ाकर 150 रुपये कर दिया गया था। राजाजी पार्क में भ्रमण के लिए प्रति भारतीय सैलानी 350 रुपये और विदेशी सैलानी 600 रुपये के करीब शुल्क पहुंचा दिया गया। शुल्क बढऩे की वजह से राजाजी के खजाने में लक्ष्मी की बरसात हुई है। पिछले सीजन में राजाजी के खजाने में 17 लाख 35 हजार रुपये आए थे, जबकि इस बार अब तक 28 लाख 62 हजार की आमदनी हो चुकी है। हां, देशी सैलानियों के पांव राजाजी की ओर बढऩे से जरूर थमे। पिछले सीजन में 16000 भारतीय सैलानी राजाजी पार्क पहुंचे थे, जबकि इस बार अब तक 12 हजार देशी सैलानी ही पहुंचे हैं। हालांकि पार्क प्रशासन कुंभ के चार महीने के दबाव को इसकी मुख्य वजह मान रहा है। थोड़ी सी मायूसी के साथ खुशी की बात यह है कि विदेशियों का राजाजी पार्क से मोहभंग नहीं हुआ है। पिछले सीजन की तुलना में विदेशी मेहमानों की आमद पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। पिछले सीजन में पार्क बंद होने तक 1888 विदेशी सैलानियों ने राजाजी की चीला रेंज के दीदार किये, जबकि इस बार अभी तक यह तादाद 1865 पर ही पहुंची है। अभी पार्क बंद होने में सप्ताह भर का समय शेष है। इसलिए माना जा रहा है कि पिछले रिकार्ड को विदेशियों की आमद तोड़ सकती है। पार्क प्रशासन भी यही मान रहा है।
'राजाजी की चीला रेंज सोलह जून से बंद हो जाएगी। हाथियों सहित वन्य जीव खूब नजर आ रहे हैं। कुंभ की वजह से भारतीयों की तादाद कम हुई, लेकिन विदेशियों की मौजूदगी अच्छी रही। प्रवेश शुल्क सहित अन्य में बढ़ोतरी की वजह से पिछले वर्ष की आमदनी को पीछे छोड़ राजाजी के चीला रेंज ने नई उपलब्धि हासिल की हैÓ
महेन्द्र सिंह नेगी
चीला रेंज, राजाजी नेशनल पार्क
-धूल फांक रहे गढ़वाल कमिश्नरी के जनक
-बच्चा पार्क में 1987 में स्थापित की थी बैरिस्टर मुकंदी लाल की प्रतिमा
-वर्ष 2006 से शुरू हुए पार्क के दुर्दिन
, कोटद्वार (गढ़वाल)
गढ़वाल कमिश्नरी के जनक व बहुमुखी प्रतिभा के धनी बैरिस्टर मुकंदी लाल की प्रतिमा चंद लोगों की राजनीति के चलते राजमार्ग के किनारे धूल फांक रही है। वर्ष 1987 में जिस प्रतिमा को युवाओं व बच्चों में इस महान शख्स के प्रति जिज्ञासा पैदा करने को स्थापित किया गया था, आज उसकी देखरेख करने वाला कोई नहीं है।
सत्तर के दशक में कोटद्वार पहुंचे संत स्वामी राम के समक्ष स्थानीय नगर पालिका परिषद ने बच्चों के लिए नगर में एक पार्क स्थापित करने का बात रखी। स्वामी राम ने पार्क के लिए तीन लाख की धनराशि पालिका को उपलब्ध करवा दी, जिसके बाद पालिका ने यहां बदरीनाथ मार्ग पर डाकघर के समीप करीब एक बीघा भूमि पर 'बच्चा पार्कÓ की स्थापना कर वहां झूले व सी-सॉ लगा दिए। इसी पार्क के एक कोने में व्यायामशाला भी थी। शाम होते ही पार्क का नजारा दर्शनीय होता था। एक ओर युवा अपने शरीर को बलिष्ठ बनाते नजर आते, तो दूसरी ओर छोटे-छोटे बच्चे झूलों में झूलते दिखाई देते। पार्क में बच्चों की लगातार बढ़ती आवाजाही को देखते हुए पालिका ने पार्क में बहुमुखी प्रतिभा के धनी बैरिस्टर मुकंदी लाल की प्रतिमा स्थापित की थी। 14 अक्टूबर वर्ष 1987 को उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन वन मंत्री बलदेव सिंह आर्य ने प्रतिमा का अनावरण किया, साथ ही पार्क का नाम 'बैरिस्टर मुकंदी लाल पार्कÓ कर दिया गया। हालांकि क्षेत्रीय जनता आज भी इसे बच्चा पार्क के नाम से ही जानती है। मूर्ति स्थापित करने का उद्देश्य स्पष्ट था कि पार्क में आने वाले बच्चों में बैरिस्टर साहब के बारे में जिज्ञासा उत्पन्न हो व भविष्य में वे भी उनके आदर्शों को आत्मसात कर उन्नति के चरम पर पहुंच सकें। वर्ष 2006 में इस बच्चा पार्क के दुर्दिन शुरू हो गए। तत्कालीन कांग्रेस शासनकाल में नगर पालिका ने तमाम विरोधों के बावजूद बच्चा पार्क की भूमि 'प्रेक्षागृहÓ निर्माण को दे दी। कांग्रेस शासनकाल में प्रेक्षागृह के नाम पर इस भूमि में कुछ पिल्लर खड़े कर निर्माण कार्यों की इतिश्री कर दी गई। आज स्थिति यह है कि पिछले चार वर्षों से इस प्रेक्षागृह में निर्माण के नाम पर एक ईंट तक नहीं लगी है व बैरिस्टर साहब की प्रतिमा इस खंडहर के मध्य खड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग का धूल फांक रही है।
''वर्तमान में बैरिस्टर मुकंदी लाल की प्रतिमा जिस हालत में है, उसे कोटद्वार के लिए दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। पूर्व पालिका बोर्ड की ओर से बच्चा पार्क को प्रेक्षागृह के लिए दिया जाना पूरी तरह गलत था।ÓÓ
शशि नैनवाल,
अध्यक्ष, नगरपालिका कोटद्वार
''शासन की ओर से बजट अवमुक्त न होने से प्रेक्षागृह का निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो पाया है। बैरिस्टर साहब की नई मूर्ति बनाने के लिए भी शासन को प्रस्ताव भेजा गया है।ÓÓ
डा. बीपी बडोनी
जिला संस्कृति अधिकारी, पौड़ी
''बैरिस्टर मुकंदी लाल की प्रतिमा के वर्तमान हालात दुर्भाग्यपूर्ण है। गढ़वाल की जिस जानी-मानी शख्सियत को युवाओं का आदर्श बनना था, चंद लोगों की 'राजनीतिÓ के चलते खंडहर में पड़ी है।ÓÓ शशिधर भट्ट
पूर्व पालिकाध्यक्ष, नगरपालिका परिषद
कोटद्वार
Subscribe to:
Posts (Atom)
