Friday, 30 April 2010

-नंबर वन की दौड़ में उत्तराखंड सबसे आगे

- दो जिलों का डाटा पहुंचते ही तैयार हो जाएगा स्टेट रजिस्टर - सेंट्रल सर्वर से देखी जा सकेगी चालक व वाहन की जन्मकुंडली Pahar1-: यदि सब कुछ ठीकठाक रहा तो उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य होगा, जिसका अपना स्टेट रजिस्टर होगा। इस स्टेट रजिस्टर में 'सारथीÓ (लाइसेंस संबंधी साफ्टवेयर) व 'वाहनÓ (वाहनों के रजिस्ट्रेशन संबंधी साफ्टवेयर) शामिल हैं। यह रजिस्टर सेंट्रल सर्वर से जुड़ा रहेगा। इसके जरिए कहीं भी बैठकर वाहन व चालक की पूरी जन्मकुंडली बांची जा सकेगी। उत्तराखंड का संपूर्ण डाटा नेशनल इंफारमेटिक सेंटर (एनआईसी) को भेजा जा रहा है। एनआईसी ही विधिवत रूप से इस बात की घोषणा करेगा कि कौन सा राज्य स्टेट रजिस्टर तैयार करने में नंबर वन है। केंद्र में लंबे समय से एक नेशनल रजिस्टर तैयार करने की कवायद चल रही है। इसके तहत हर प्रदेश के वाहनों की जानकारी एक ही जगह से देखी जा सकेगी। इसी के तहत केंद्र ने हर प्रदेश को अपना स्टेट रजिस्टर तैयार करने के निर्देश दिए थे। पहले वाहनों का पंजीकरण कर उन्हें एक रजिस्टर में चढ़ाया जाता था। पहले अन्य प्रदेशों से किसी वाहन के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए पत्राचार के जरिए जानकारी हासिल की जाती थी। देश में आतंकी घटनाएं बढऩे के बाद वाहनों के लिए एक नेशनल रजिस्टर बनाए जाने पर जोर दिया गया, जिससे ही कहीं भी वाहन व चालक पर मिले प्रपत्रों के हिसाब से उसकी सही जानकारी प्राप्त की जा सके। इसके तहत सबसे पहले 'वाहनÓ साफ्टवेयर तैयार किया गया, जिसमें वाहन के रजिस्ट्रेशन संबंधी जानकारी डाली जाती है। इसके बाद 'सारथीÓ साफ्टवेयर डेवलेप किया गया। इसमें लाइसेंस बनाते समय लाइसेंस धारक के विषय में सभी जानकारियां डालने के अलावा उसकी अंगुलियां के निशान तक अंकित होते हैं। ये उन्हीं कार्यालयों में लगा है जो पूर्णत कंप्यूटरीकृत हो चुके हैं। इन कार्यालयों में अब वाहनों का रजिस्ट्रेशन व लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया इसी साफ्टवेयर के तहत होती है। सूबे में संभागीय और उप संभागीय कार्यालय मिलाकर कुल 15 कार्यालय हैं। यह सभी कार्यालय कंप्यूटरीकृत हो चुके हैं। ऐसे में इन सभी कार्यालयों से 'वाहनÓ व 'सारथीÓ साफ्टवेयर का डाटा कलेक्ट कर एनआईसी को भेजा जा रहा है। अब सिर्फ पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा का डाटा एनआईसी तक पहुंचना शेष है। डाटा तैयार है और एक दो दिनों में एनआईसी को भेज दिया जाएगा। एनआईसी को यह संपूर्ण डाटा उपलब्ध कराने वाला उत्तराखंड पहला राज्य होगा। हिमाचल प्रदेश भी उत्तराखंड से ज्यादा पीछे नहीं है, लेकिन अभी तक हिमाचल एनआईसी को पूरा डाटा उपलब्ध कराने में सफल नहीं हो पाया है। ऐसे में उत्तराखंड का ऐसा पहला राज्य बनना तय है, जिसका अपना स्टेट रजिस्टर होगा। सचिव परिवहन व परिवहन आयुक्त एस रामास्वामी का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि उत्तराखंड ऐसा करने वाला पहला राज्य होगा। उन्होंने कहा कि इतने कम संसाधनों में ऐसा करना अपने आप में एक बड़ा कार्य है। उन्होंने कहा कि दो जिलों का डाटा भी इसी सप्ताह भेज दिया जाएगा।

- बाघों की संख्या जानने को होगा री-सेंशस

-दूसरी बार नई पद्धति से राजाजी पार्क में होने जा रही गणना -रिपोर्ट पर डब्ल्यूआईआई करेगा मंथन Pahar1- बाघों का मसला है इसलिए फूंक- फूंककर कदम रखा जा रहा है। गणना की रिपोर्ट पर कोई सवाल न खड़ा हो, इसलिए री-सेंशस (पुनर्गणना) कराई जाएगी। राजाजी में बाघों की एक मई से गणना शुरू हो रही है। देश में लागू नई पद्धति के तहत दूसरी बार यह गणना होगी। पारदर्शिता के लिए गणना की रिपोर्ट आने के बाद वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) इसका अध्ययन करेगा। कैमरा ट्रैप पद्धति और एक मई से हुई गणना का मिलान करने के बाद ही दूसरी रिपोर्ट जारी होगी। 2005 में रिपोर्ट आई कि देश में करीब 4500 बाघ हैं। हालांकि इस बीच वनों में बाघ की तादाद घटने की खबरें आने लगी। इससे रिपोर्ट पर सवाल उठने लगे। काफी हंगामे के बाद हुई गणना में 3500 से 3600 के बीच बाघ की बात सामने आई। चूंकि मामला बेहद संवेदनशील था, इसलिए प्रधानमंत्री ने मामले में हस्तक्षेप किया। इसके बाद वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 2007 में गणना कराई। इसकी रिपोर्ट में देश भर में 1411 बाघों की मौजूदगी की बात सामने आई। दरअसल इस गणना के दौरान वन विभाग के रिटायर्ड अधिकारियों और विशेषज्ञोंं को पर्यवेक्षक बनाया गया था। रिपोर्ट केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी हुई। इसके बाद से इसी पद्धति से बाघों की गणना करने का निर्णय किया गया। पद्धति का नाम हैबीटाट इवैलुएशन एंड कैमरा ट्रैपिंग दिया गया। इसमें ट्रांजिट लाइन और जीपीआरएस सिस्टम के तहत गणना की जाती है। इसी पद्धति के तहत दूसरी बार राजाजी पार्क में बाघों की गणना एक मई से शुरू होने जा रही है। उत्तराखंड के जिम कार्बेट नेशनल पार्क और राजाजी नेशनल पार्क के जंगलों में बाघों की अच्छी खासी तादाद है। पिछले गणना में बाघों की रिपोर्ट भी आई थी। गणना में कोई चूक न रह जाए, इसलिए रिपोर्ट वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया को दिखाई जाएगी। इंस्टीट्यूट रिपोर्ट का अध्ययन कर संभावित जगहों पर कैमरा ट्रैप लगाएगा। फिर दोनों का मिलान कराया जाएगा। इसके बाद सही तस्वीर देश के सामने रखी जाएगी। राजाजी नेशनल पार्क के निदेशक एसएस रसायली ने बताया कि बाघों की गणना के उपरांत रिपोर्ट डब्ल्यूआईआई को सौंप दी जाएगी। इनसेट 2001 2003 2005 बाघ- 30 30 24 (राजाजी नेशनल पार्क की स्थिति) 2001 2003 2005 बाघ- 137 143 141 (कार्बेट नेशनल पार्क की स्थिति)

- परंपराओं ने संजाई प्राचीन धरोहरें

-वरुणावत के पांच कोस की परिधि में बिखरे पड़े हैं धार्मिक पुरावशेष -अनूठे शिल्प वाले मंदिर व मूर्तियों सहित प्राचीन गुफाएं भी हैं मौजूद -पुरातत्व विभाग ने नहीं ली है अभी इस क्षेत्र की कोई सुध उत्तरकाशी: वरुणावत पर्वत की पांच कोस की परिधि पौराणिक महत्व के अवशेषों से भरी पड़ी है। हालांकि प्राचीन काल के इन धार्मिक व ऐतिहासिक साक्ष्यों की ओर न तो पुरातत्व विभाग ने ध्यान दिया और न ही कोई विस्तृत अध्ययन सामने आया है। बावजूद इसके स्थानीय लोगों ने इन अवशेषों को अपनी परंपराओं में संजोया हुआ है। वरुणावत पर्वत के पूर्वी हिस्से में गंगा भागीरथी और वारुणी नदी के संगम से एक ऐसा क्षेत्र शुरू होता है जहां प्राचीन इतिहास के अवशेष बिखरे पड़े हैं। बड़ेथी में वरुणेश्वर मंदिर से शुरू होकर वरुणावत पर्वत के ऊपर शिखरेश्वर महादेव तक मंदिरों का शिल्प, शिवलिंगों व समय- समय पर खुदाई में मिली मूर्तियां हैरत में डालती हैं। बीते वर्ष ज्ञाणजा गांव के हारुना नामे तोक की प्राचीन गुफा में मिली भगवान कृष्ण के बालरूप की आकर्षक मूर्ति ने स्थानीय लोगों को हैरत में डाल दिया था। इससे आगे साल्ड गांव में जगन्नाथ मंदिर का अनूठा वास्तुशिल्प हर व्यक्ति को कौतुहल में डालने के लिये काफी है। साथ ही, साल्ड गांव में ही भगवती च्वाला का मंदिर, व्यास कुंड, समेश्वर देवता व नाग देवता के पौराणिक मंदिर व उनमें रखी मूर्तियां भी अत्यंत प्राचीन हैं। महावारुणी यात्रा मार्ग में पडऩे वाले ऊपरीकोट व भराणगांव भी इस लिहाज से अहम हैं। इन प्राचीन धरोहरों की अभी तक पुरातत्व विभाग ने सुध नहीं ली है। जबकि अकादमिक स्तर पर भी इस क्षेत्र का कोई अध्ययन सामने नहीं आ सका है। स्थानीय लोगों को भी इन धरोहरों के निर्माण की जानकारी नहीं है, लेकिन ये सभी धरोहरें उनकी परंपराओं से बखूबी जुड़ी हुई हैं। वारुणी यात्रा समेत, स्थानीय मेलों व धार्मिक क्रियाकलाप इन्हीं धरोहरों के इर्द गिर्द घूमते हैं। जगन्नाथ मंदिर के पुजारी सूर्य बल्लभ सेमवाल बताते हैं कि ये सभी धरोहरें अत्यंत प्राचीन हैं। इनके निर्माण व अवतरण के बारे में स्पष्ट ज्ञात तथ्य सामने नहीं आ सके हैं। उन्होंने माना कि पुरातत्व विभाग को ऐसे स्थलों को चिन्हित कर इनके संरक्षण के लिए आगे आना चाहिए। इस संबंध में क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी पीपी बडोनी ने बताया कि बीते वर्ष ज्ञाणजा में मिली भगवान कृष्ण की अनूठी मूर्ति की सूचना मिली थी। उन्होंने स्वीकार किया कि इस क्षेत्र से समय-समय पर ऐतिहासिक व प्राचीन वस्तुओं के संबंध में सूचनाएं मिलती हैं। शीघ्र ही इस क्षेत्र में पुरातत्व विभाग का दल भेजकर अध्ययन कराया जाएगा। -

-'डाक्टर साब! पहाड़ कब चढ़ोगेÓ

सात साल के छोटे से वक्फे में मानदेय में तीन गुना बढ़ोतरी और फिर भी सैकड़ों पद खाली। चौंकिए नहीं, यह सौ फीसदी सच है और ऐसा हो रहा है सूबे के स्वास्थ्य महकमे में। प्रदेश सरकार ने डाक्टरों की कमी से निजात पाने को कांटे्रक्चुअल डाक्टर तैनात करने शुरू किए तो सात साल में इनका मेहनताना तीन गुना तक बढ़ा दिया मगर इसके बावजूद राज्य में अब भी डाक्टरों के पचास फीसदी पद खाली पड़े हैं। पहाड़ के लिए सेहत की सुविधाएं जुटाना सरकार के लिए सचमुच पहाड़ सरीखा ही साबित हो रहा है। उत्तराखंड को अलग राज्य बने दस साल होने को आए लेकिन हालात ये हैं कि चिकित्सालयों व स्वास्थ्य केंद्रों में डाक्टर जाने को तैयार नहीं। खासकर पहाड़ी जिलों में जिस तरह डाक्टरों के सैकड़ों पद खाली पड़े हैं उससे सरकार के सबको स्वास्थ्य सुविधा देने के दावे हवा हवाई ही नजर आते हैं। स्थिति किस हद तक चिंताजनक है इस तथ्य का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि राज्य में ऐलोपैथिक डाक्टरों के कुल पद 2200 हैं और इनमें से आधे के करीब रिक्त हैं। लगभग ग्यारह-साढ़े ग्यारह सौ डाक्टरों में से दो सौ के आसपास कांट्रेक्चुअल हैं। यानी छोटे से राज्य की आधी आबादी को ही सरकारी डाक्टरों से उपचार की सुविधा मिल पा रही है। यह स्थिति आज-कल नहीं बल्कि राज्य गठन के वक्त से ही बनी हुई है। इसीलिए राज्य सरकार ने वर्ष 2003 में कांट्रेक्चुअल डाक्टर (संविदा पर नियुक्त डाक्टर) की नियुक्तिकी प्रक्रिया आरंभ की। तब संविदा पर नियुक्त डाक्टरों के लिए मानदेय तय किया गया प्रति माह 11 हजार रुपए और अब सात वर्ष गुजरने के बाद यह पहुंच गया है 34 हजार रुपए तक। दरअसल सरकार ने डाक्टरों को लुभाने के लिए इनके मानदेय में लगातार बढ़ोतरी की और दुर्गम व अति दुर्गम क्षेत्र में तैनाती के लिए अतिरिक्त धनराशि का भी प्रावधान किया लेकिन डाक्टर साहब हैं कि पहाड़ चढऩे को राजी ही नहीं। वर्ष 2005 में कांट्रेक्ट पर नियुक्त डाक्टरों का मानदेय 11 से बढ़ाकर पहले 13 व फिर 15 हजार रुपए किया गया जबकि इसके अगले ही साल वर्ष 2006 में यह धनराशि पहुंच गई 18 हजार रुपए महीना। वर्ष 2009 में सरकार ने पहाड़ी व दुर्गम क्षेत्रों तक डाक्टरों को पहुंचाने के लिए अतिरिक्त मानदेय की व्यवस्था आरंभ की। इसके मुताबिक मैदानी क्षेत्र में 25 से 29 हजार, दुर्गम में 29 से 33 हजार और अति दुर्गम क्षेत्र में तैनात होने वाले कांट्रेक्चुअल डाक्टरों को 30 से 34 हजार रुपए प्रतिमाह तक मानदेय का प्रावधान किया गया। इस सबके बावजूद सरकार के तमाम प्रयास पूरी तरह परवान चढ़ते नजर नहीं आ रहे क्योंकि अब भी राज्य में डाक्टरों के आधे पद खाली ही पड़े हुए हैं। जितने डाक्टर सरकारी सेवा में हैं उनमें से तकरीबन आधे तो चार मैदानी जिलों में ही नियुक्त हैं। देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जिलों में नियुक्त डाक्टरों की संख्या का आंकड़ा लगभग पांच सौ के आसपास पहुंचता है जबकि शेष नौ जिलों में छह सौ के आसपास सरकारी डाक्टर आम जनता के लिए उपलब्ध हैं। तस्वीर अपनी कहानी खुद बयां कर रही है, यानी अभी राज्य के पहाड़ी जिलों के बाशिंदों के पास यह कहने कि 'डाक्टर साब, पहाड़ कब चढ़ोगेÓ, कहने और इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं। --- बोले स्वास्थ्य महानिदेशक '' डाक्टरों की कमी को पूरा करने लिए प्रयास जारी हैं। जल्द उत्तराखंड लोक सेवा आयोग से विभाग को अस्सी स्पेशलिस्ट व पचास महिला चिकित्साधिकारी मिलने जा रहे हैं। इसके अलावा मई अंत तक आशा है कि सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज के डाक्टरों का पहला बैच हमें मिल जाएगा। जहां तक डाक्टरों का मैदानी जिलों तक सिमटे रहने का सवाल है इसके लिए स्थानान्तरण नीति को मजबूत बनाने की कोशिश की जा रही है। ताकि सभी जिलों में समान स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें। ÓÓ डा.सीपी आर्य स्वास्थ्य महानिदेशक, उत्तराखंड

-बढ़ता जा रहा है गंगा के आंचल पर मैल-

सफाई में अब तक 37 करोड़ रुपये किए जा चुके हैं खर्च pahar1- पवित्र गंगा का मैल धोने की जिम्मेदारी गंगा एक्शन प्लान से अब नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथारिटी के हवाले हो चुकी है लेकिन फिर भी अमृत जैसे गंगा के पानी की गुणवत्ता हरिद्वार जैसे तीर्थ में आचमन करने योग्य भी नहीं रह गई है। उत्तराखंड में अब तक एक्शन प्लान के अंतर्गत गंगा की सफाई में 37 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं मगर गंगा के आंचल का मैल लगातार बढ़ता ही जा रहा है। गंगा की सफाई के लिए केंद्र पोषित गंगा एक्शन प्लान 1985 में शुरू हुआ था। पहले चरण में तीन शहरों हरिद्वार, ऋषिकेश और स्वर्गाश्रम-लक्ष्मणझूला को इसमें लिया गया था। पहले चरण में 14.62 करोड़ रुपये खर्च हुए। एक्शन प्लान के दूसरे चरण में नौ शहर लिए गए हैं, जिनकी 30 परियोजनाओं में 23.38 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। इसके बाद भी यह तय नहीं है जिन शहरों-कस्बों में ट्रीटमेंट परियोजनाएं संचालित हो रही हैं, वहां का संपूर्ण सीवर और नाले इसके दायरे में आ गए हों। यदि गंगा के किनारे बसे किसी कस्बे के संपूर्ण सीवर तथा सभी गंदे नाले ट्रीटमेंट के दायरे में नहीं होंगे तो गंगा प्रदूषित होने से कैसे बच सकती है। उत्तराखंड में गंगा एक्शन प्लान की नोडल एजेंसी जल संसाधन विकास निगम के नोडल अधिकारी प्रभात राज कहते हैं कि अब गंगा एक्शन प्लान, नेशनल गंगा रीवर बेसिन अथारिथी में हस्तांतरित हो गया है। इस योजना के तहत 2020 तक गंगा को पूरी तरह क्लीन करने की योजना है। अर्थात गंगा के किनारे बसे हर शहर-कस्बे का सीवर तथा नाला ट्रीटमेंट प्लांट की जद में होगा। तेजी से बढ़ते जा रहे शहरीकरण के चलते हर नई बसासत को जब तक ट्रीटमेंट के दायरे में लेने की योजना नहीं होगी, गंगा में गंदगी जाने से नहीं बचाया जा सकता है। गंगा में शव दाह से भी अत्यधिक प्रदूषण होता है। हरिद्वार में विद्युत शव दाह गृह का निर्माण किया गया, जो शुरू से ही काम नहीं कर रहा है। कम लकड़ी में शव जलाने वाले दाह गृह चल रहे हैं। अब धूम्र रहित शवदाह गृह बनाने की योजना है लेकिन गंगा की धारा के साथ शवों का दाह करने की प्रवृत्ति नई तकनीकों को दरकिनार कर देती है। हरिद्वार में बिल्कुल यही हो रहा है। गंगा एक्शन प्लान के तहत वर्तमान में अलकनंदा और भागीरथी को शामिल किया गया है। उत्तराखंड की नदियां आगे जाकर कहीं न कहीं गंगा में ही मिलती हैं। इसलिए नदियों के किनारे बसे उत्तराखंड के 17 शहरों को ट्रीटमेंट प्लांट से जोडऩे का प्रस्ताव नोडल एजेंसी जल निगम ने केंद्र को भेजा है। मुश्किल यह है कि केंद्र परियोजना के बोझ को कम करने के लिए अपना हाथ खींचता जा रहा है। पहले गंगा एक्शन प्लान शत प्रतिशत केंद्र पोषित था। अब 70 प्रतिशत हिस्सा केंद्र और 30 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करेगी। इतनी सारी योजनाओं के बावजूद हरिद्वार में गंगा का प्रदूषण स्तर इस कदर बढ़ गया है कि पवित्र गंगा का पानी आचमन करने योग्य नहीं रह गया है। अधिकारी दावा करते हैं कि कुंभ के लिए बनाई गई नई परियोजनाओं की वजह से गंगा का प्रदूषण कम हुआ होगा। वास्तविकता यह है कि गंगा में सीवर बहने से गंगा की हालत और खराब हुई है। यदि गंगा एक्शन प्लान के तहत भागीरथी और अलकनंदा को ही लिया जाए तो इन नदियों के किनारे बसे कई शहर और कस्बे अभी सीवर ट्रीटमेंट के दायरे से बाहर हैं। इनमें गोचर, नंदप्रयाग, कीर्तिनगर और केदारनाथ शामिल हैं।

पर्यटन के अरमानों को केंद्र ने लगाए पंख

-102 करोड़ के नौ महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को मंजूरी -केंद्र के दिशा-निर्देशों के मुताबिक तैयार होंगे प्रोजेक्ट -मेगा सर्किट को 50 करोड़, सर्किट को आठ करोड़ व टूरिस्ट डेस्टिनेशन को मिलेंगे पांच करोड़ Pahr1- दुनिया की नजरों से दूर जगह-जगह बिखरी प्रकृति की खूबसूरती की नेमतों पर सिवाए इठलाने के उत्तराखंड के हाथ 'इकन्नीÓ भी नहीं लग रही। वजह ढांचागत सुविधाओं की कमी है। इसे जुटाने को केंद्रीय इमदाद पर टकटकी बांधे सूबे को राहत नजर आ रही है। केंद्र ने नए वित्तीय वर्ष तकरीबन 102 करोड़ के नौ महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर केंद्र की 'हांÓ ने राज्य के अरमानों को फिलहाल पंख लगा दिए हैं। खूबसूरती में सानी नहीं रखने वाले ऐसे स्थान काफी तादाद में उत्तराखंड में हैं, जहां पर्यटक पहुंच नहीं पाते। राज्य बनने के बाद पर्यटन से आमदनी की आस में जनता तरस कर रह गई है। यह तय है कि अपने दम पर पर्यटक स्थलों का विकास सूबे के बूते के बाहर है। इस वजह से केंद्र की मदद पाने को छटपटाहट बढ़ती जा रही है। राज्य ने ऐसे प्रोजेक्ट काफी संख्या में केंद्र को भेजे हैं। राहत यह है कि केंद्र ने नौ प्रोजेक्ट पर सहमति देने के साथ ही नए निर्देशों के साथ उनकी ठोस कार्ययोजना पेश करने को कहा है। जिन प्रोजेक्ट को वर्ष 2010-11 में प्राथमिकता दी गई, उनमें 50 करोड़ लागत से एक मेगा, 32 करोड़ लागत से चार सर्किट और 20 करोड़ लागत से चार टूरिस्ट डेस्टिनेशन विकसित किए जाने हैं। निर्मल गंगोत्री मेगा प्रोजेक्ट पर 50 करोड़, ऋषिकेश-नरेंद्रनगर-चंबा-उत्तरकाशी-भटवाड़ी-हर्षिल-गंगोत्री पर आठ करोड़, पंच प्रयाग-श्रीनगर सर्किट पर आठ करोड़, टिहरी झील डेस्टिेशन विकास पर आठ करोड़, अल्मोड़ा डेस्टिेशन विकास पर पांच करोड़, भवाली-रामगढ़-मुक्तेश्वर-धारी-भीमताल-सत्तल-हेडाखान-हल्द्वानी सर्किट पर आठ करोड़, हरिपुर व नानक सागर-श्यामलताल-चंपावत-लोहाघाट-मायावती-बगवाल-देवता-काठगोदाम सर्किट पर आठ करोड़, काठ की नाऊ-कूखेत-मनीला-मल्ला भिकियासैंण-नीलेश्वर मंदिर-जेनल-मासी-चौखुटिया-द्वाराहाट-कौसानी-बागेश्वर सर्किट पर आठ करोड़ का अनुमानित खर्चा आएगा। केंद्र के साथ सूबे के अफसरों की बैठक में इन प्रोजेक्ट का खाका तैयार करने को केंद्र ने निर्देश भी जारी किए हैं। इसके मुताबिक राज्यस्तरीय निगरानी समिति की बैठकों की कार्यवाही की नियमित सूचना केंद्र को भेजी जाएगी। हाईवे पर हर 30 किमी पर यात्रियों व पर्यटकों के लिए सड़क किनारे जरूरी सुविधाओं का बंदोबस्त करना होगा। पर्यावरण की सुरक्षा को सोलिड वेस्ट मैनेजमेंट, पर्यटन विकास के लिए एकीकृत ढंग से निजी व सरकारी क्षेत्रों की भागीदारी प्रोत्साहित करने, पार्किंग की समुचित सुविधाओं पर जोर दिया गया है। केंद्र ने पहले प्रस्तावित तीन प्रोजेक्ट औली इको टूरिज्म, देहरादून-हरिद्वार सर्किट व हरिद्वार मेगा सर्किट को भी मंजूरी दी है, लेकिन इनके लिए फंड उपलब्धता के आधार पर दिया जाएगा। पर्यटन प्रमुख सचिव राकेश शर्मा ने उक्त निर्देशों के मुताबिक प्रोजेक्ट की कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं।

-कुछ मीठे, कुछ खट्टे अनुभव दे गया कुंभ

-चार माह के कालखंड में कई मुद्दों पर हुई सार्थक चर्चा हरिद्वार: पेशवाइयों से शुरू होकर ब्रह्मकुंड पर आखिरी डुबकी लगाने के साथ सदी का पहला महाकुंभ विदा हुआ। चार माह के इस कालखंड में मीठी यादें भी रहीं और कुछ खट्टे अनुभव भी। सामाजिक मुद्दों पर व्यापक चिंतन हुआ तो हादसों और अखाड़ों के आपसी मनमुटाव भी सामने आए। कुंभ आमतौर पर धर्म और अध्यात्म का संगम माना जाता है, लेकिन सदी के पहले महाकुंभ पर इसके इतर भी बहुत कुछ नया हुआ, जिसने देश दुनिया को सार्थक संदेश दिया। जनवरी माह में हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच पेशवाइयों का दौर शुरू हुआ। सदी के पहले महाकुंभ में पेशवाई परंपरागत व आधुनिकता मिश्रित रही। नागा साधुओं ने धर्म रक्षा का संदेश दिया तो कई संतों ने कन्या भ्रूण हत्या रोकने, पर्यावरण के प्रति आम जन में चेतना जगाने का कार्य किया। घड़ी की सुई आगे खिसकी और पेशवाई का दौर थमने के बाद सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक सुरक्षा के मुद्दों पर व्यापक मंथन हुआ। कुंभ में पहली बार आंतरिक और बाह्य सुरक्षा पर विचार करने के लिए विषय विशेषज्ञ जुटे। विशेषज्ञ राय के आधार पर प्रस्ताव तैयार कर केंद्र और राज्य सरकारों को क्रियान्वयन के लिए भेजे गए। देश में आर्थिक असमानता दूर करने, आतंकवाद, संविधान सहित देश के विकास से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर कई दिन तक मंथन चला। नशा उन्मूलन सहित कई सामाजिक मुद्दों पर समाज के जागरूक लोगों व संस्थाओं ने अपनी भूमिका निभाई, जिसमें कई प्रमुख हस्तियां पहुंचीं। इस चार माह के दौरान शायद ही कुंभनगर में ऐसा कोई आश्रम, साधु-संतों के अस्थाई शिविर रहे हों जहां गो-गंगा के मुद्दे पर चर्चा न हुई हो। इस सार्थक पहल के बीच कई खट्टी यादें भी सदी के इस कुंभ को सालती रहेंगी। शंकराचार्य विवाद से इसकी शुरुआत हुई। चार मठों के इतर अन्य मठों को लेकर कई दिनों तक विवाद चलता रहा। चार पीठ, चार शंकराचार्य पर मेला प्रशासन ने मुहर तो लगाई, लेकिन विवाद का अंत तक पटाक्षेप नहीं हुआ। गंगा के मुद्दे पर अखाड़ों की एकता बिखर गई। गंगा पर जिस एका की जरूरत थी वह नहीं दिखी। यह मुद्दा फिर नेपथ्य में चला गया। कुल मिलाकर सदी का यह पहला महाकुंभ अपने साथ कुछ खट्टी तो कुछ मीठी यादों के साथ विदा हुआ। --- कुंभ पर दाग लगा गया हादसा -कुंभ संपन्न, पर दंश देता रहेगा बिरला घाट हादसा : महाकुंभ की विदाई हो चुकी है। अठाईस अप्रैल का अंतिम कुंभ स्नान निरापद संपन्न हो गया। जब कभी इस कुंभ को याद किया जाएगा उस पल महाकुंभ के दामन पर बिरला घाट हादसा 'टीसÓ बनकर चुभता रहेगा। महाकुंभ के चार महीने के दौरान कई श्रद्धालु, मेला प्रशासन, मेला पुलिस सहित आमजन तमाम अनुभवों से रूबरू हुए। सबके अपने अनुभव होंगे। स्नान पर क्या खोया, क्या पाया को लेकर भी चर्चाएं होंगी। सदी का पहला महाकुंभ था यह, इसलिए दुनिया की नजरें भी टिकी थीं इस पर। चार महीने के कुंभकाल के दौरान 11 स्नान पर्व, जिसमें चार शाही स्नान थे, को मेला प्रशासन और मेला पुलिस ने कमोबेश ठीकढंग से संपन्न करा दिया। लेकिन बिरला घाट हादसा जो चौदह अप्रैल को घटा, यदि यह असंयोग नहीं बनता तो महाकुंभ के दामन में कोई बड़ा दाग नहीं लगता। यह अलग बात है कि मेला प्रशासन और मेला पुलिस बिरला घाट हादसे को महज एक दुर्घटना करार देते रहे, दलील पेश करते रहे, पर इस धब्बे को वह इन दलीलों से छुड़ा नहीं सके। सवाल तो कई होंगे, जवाब भले ही नहीं देना पड़े, लेकिन उनके मन में भी यह पीड़ा रहेगी कि काश, सदी के महाकुंभ को निरापद शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न करा पाते। हां, इस बात की जरूर तारीफ होगी कि करोड़ों की भीड़ को भले ही कुछ बदइंतजामी के बीच संपन्न कराया गया हो, लेकिन मेला पुलिस की कुछ मामलों में पीठ भी थपथपाई जाएगी। मसलन इंटेलीजेंस के बेहतरीन तालमेल से कोई आतंकी वारदात करने की हिम्मत भी नहीं कर सका। जांबाज कमांडो हर मोर्चे पर तैनात किये गये थे। श्रद्धालुओं के साथ इनकी सहयोगी भूमिका को भी हमेशा याद किया जाएगा।

---कठिन है बाबा केदार की डगर

-केदारनाथ यात्रा को लेकर तैयारियों में जुटा प्रशासन -गौरीकुंड से केदारनाथ तक 14 किमी पैदल मार्ग पर हैं सबसे अधिक समस्याएं -समस्याओं को हल करने का हो रहा है प्रयास Pahar1- रुद्रप्रयाग केदारनाथ यात्रा को लेकर प्रशासन तैयारियों में लगा है। हालांकि प्रशासन के तमाम प्रयास के बाद भी केदारनाथ आने वाले यात्रियों को कई खामियों से दो चार होना पड़ता है और कड़े अनुभव के साथ वह यहां से जाते हैं। इससे सबक ले इस दफा यात्रा की तैयारियों को अंजाम दिया जा रहा है। केदारनाथ यात्रा अन्य धामों की अपेक्षा काफी कठिन यात्रा है। गौरीकुंड से केदारनाथ तक का चौदह किमी का सफर यात्रियों को तमाम समस्याओं से दो चार करा देता है। केदारनाथ यात्रा की व्यवस्थाएं भी पैदल मार्ग पर आकर टिक जाती हंै। प्रशासन भी गौरीकुंड से लेकर केदारनाथ तक यात्रा व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने में पूरी ताकत झोंक देता है, लेकिन बावजूद इसके कई खामियां रह जाती हैं। प्रत्येक वर्ष यात्रा से पूर्व जिला प्रशासन यात्रा को लेकर तमाम बैठकें करते हंै और व्यवस्थाओं के चुस्त दुरुस्त होने का दावा करते हैं, लेकिन सभी व्यवस्थाएं पूरी तरह धराशाही हो जाती है। इसका खामियाजा देश विदेश से आने वाले तीर्थ यात्रियों को भुगतना पड़ता है। यात्रा के दौरान आने वाली प्रमुख समस्या -गौरीकुंड में हजारों वाहन के जाम में फंसने पर गंभीर समस्या -गौरीकुंड में पालकी, डोली व घोड़ा में प्रीपेड व्यवस्था के बावजूद दलालों का राज -रहने व खाने की कम गुणवत्ता के बावजूद अधिक महंगा -केदारनाथ पैदल मार्ग पर भारी गंदगी से चलना दुश्वार -जर्जर केदारनाथ पैदल मार्ग पर अक्सर यात्रियों के दुर्घटनाग्रस्त होना -केदारनाथ में ठंड होने पर अलाव व किसी यात्री की मृत्यु होने पर लकड़ी तक की व्यवस्था न होना केदारनाथ पैदल मार्ग को सुधारने में जुटा लोक निर्माण विभाग रुद्रप्रयाग: लोनिवि इन दिनों गौरीकुंड से केदारनाथ तक पैदल मार्ग की हालत सुधारने में जुटा हुआ है, ताकि यात्रा से पूर्व मार्ग को तीर्थ यात्रियों की आवाजाही के लिए सुगम व बेहतर बनाया जा सके। इस बार मार्ग को ठीक करने के लिए लोनिवि को दैवीय आपदा मद से 30 लाख रुपये आवंटित हुए हैं, इस धनराशि में से 18 लाख रुपये से रामबाड़ा में पुल निर्माण किया जा रहा है। मौजूदा समय में दो दर्जन से भी अधिक मजदूरों को कार्य पर लगाया है। लोनिवि ऊखीमठ के अधिशासी अभियंता राजेश पंत का कहना है कि गौरीकुंड से केदारनाथ तक पैदल मार्ग का सुधारीकरण कार्य किया जा रहा है। अब तक अस्सी फीसदी कार्य हो चुका है।

-अल्मोड़ा में विराजमान हैं अष्ट भैरव

-अष्ट भैरवों की छत्र छाया में है अल्मोड़ा -चारों दिशाओं में स्थापित हैं मंदिर, विपदाओं से करते हैं रक्षा Pahar1-, अल्मोड़ा चंद राजाओं के वंशज बालोकल्याण चंद ने 1563 ईसवी में अल्मोड़ा को यूं ही कुमाऊं की राजधानी नहीं बनाया। इसके पीछे यहां के पौराणिक महत्व को देखते हुए यह निर्णय लिया होगा। अल्मोड़ा नगर की महत्ता, विशिष्टता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह नगर नवदुर्गा व अष्ट भैरवों की छत्र छाया में अपने स्थापना काल से ही रहा है। एक नगर में अष्ट भैरव, नवदुर्गा के मंदिर बिरले ही देखने को मिलते हैं। इसीलिए अल्मोड़ा को अपने विशिष्ट सांस्कृतिक, अध्यात्मिक व ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। कहा जाता है कि जहां भैरव विराजमान होते हैं वहां अनिष्ट, दु:ख दरिद्रता की छाया निकट नहीं आती। यहां तो अष्ट भैरव विराजमान हैं, जिसके कारण अल्मोड़ा नगरी प्रदेश, देश ही नहीं अंतरराष्ट्रीय मंच में अपना विशिष्ट स्थान रखती है। इसे लोग अष्ट भैरव व नवदुर्गा का ही आशीर्वाद मानते हैं। यहां हम अल्मोड़ा नगर के अष्ट भैरवों का जिक्र कर रहे हैं। अष्ट भैरवों के नाम में लोकबोली का अपना पूरा प्रभाव है। यही कारण है कि स्थानीय बोली भाषा के आधार पर अष्ट भैरवों के नाम प्रचलित हैं। नगरवासी भैरवों को अपना ईष्टदेव मानते हैं। नगर के उत्तर दिशा में प्रवेश द्वार पर खुटकुणी भैरव का ऐतिहासिक मंदिर है। जाखनदेवी के समीप भैरव का मंदिर है, जो अष्ट भैरव में एक है। इसी प्रकार लाला बाजार के पास शै भैरव मंदिर है। जिसका निर्माण चंदवंशीय राजा उद्योत चंद ने कराया था। बद्रेश्वर मंदिर से पूरब की ओर अष्ट भैरवों में एक भैरव शंकर भैरव के नाम से आसीन हैं। थपलिया मोहल्ले में गौड़ भैरव का मंदिर स्थापित है। चौघानपाटा के समीप अष्ट भैरवों में एक मंदिर बाल भैरव का है। यह मंदिर भी चंद राजाओं के काल का बताया जाता है। पल्टन फील्ड के पास गढ़ी भैरव विराजमान हैं, जो दक्षिण दिशा के प्रवेश द्वार पर रक्षा के लिए स्थापित किए गए हैं। पल्टन बाजार में ही अष्ट भैरवों में बटुक भैरव का मंदिर बना है। रघुनाथ मंदिर के समीप तत्कालीन राजमहल के दक्षिण की ओर काल भैरव मंदिर स्थापित है। इसी क्रम में बिष्टाकुड़ा के समीप अष्ट भैरव में एक प्राचीन भैरव मंदिर की स्थापना भी चंदवंशीय राजाओं के काल की मानी जाती है। एडम्स इंटर कालेज के समीप भी एक भैरव मंदिर है। इसे भी अष्ट भैरवों में एक बाल भैरव नाम से उच्चारित किया जाता है। यूं तो पूरे नगर में भगवान भैरव के 10 मंदिर विभिन्न स्थानों में हैं। कुछ बुजुर्गों का कहना है कि दो मंदिर निजी तौर पर बनाए गए हैं। यूं तो भैरव मंदिर में दु:खों के निवारण, अनिष्ट का हरण करने की कामना से लोग रोज मत्था टेकने जाते हैं। लेकिन शनिवार को भैरव मंदिरों में खासी भीड़ रहती है।

Thursday, 22 April 2010

जब रासलीला की चाह में शिव बने 'गोपीÓ

-श्रीकृष्ण का रास देख उपजी महादेव में भी यह भावना -श्रीकृष्ण ने पहचाना और नाम दिया गोपीनाथ -इसी नाम पर गोपेश्वर का भी नाम रखा गया Pahar1-गोपेश्वर (चमोली) रुद्र हिमालय में स्थित गोपेश्वर को प्राचीन एवं पवित्रतम तीर्थ माना जाता है। पुराणों के अनुसार इंद्रियों के नियंता और पशुओं के पति भगवान शिव को यहां गोपेश्वर या गोपीनाथ भी कहा जाता है और इन्हीं के नाम पर चमोली जिले के इस कस्बे को गोपेश्वर नाम मिला। शिव का नाम गोपीनाथ पडऩे के पीछे एक रोचक कहानी है। लोकमान्यता है कि सृष्टि रचनाकाल में जब गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण राधा के साथ महारासलीला में निमग्न थे, तो उन्हें देख भगवान शिव में भी गौरी के साथ रासलीला करने की इच्छा जाग्रत हुई, परन्तु भगवान त्रिपुरारी, स्वयं त्रैलोक्यनाथ कृष्ण नहीं बन सकते थे और उनकी अद्र्धांगिनी गौरी भी राधा नहीं बन सकती थी। इसलिए भगवान शिव स्वयं गोपी बन गए और गौरी ने गोप का रूप धारण किया और दोनों रासलीला में मग्न हो गए, लेकिन अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण को उन्हें पहचानने में देर नहीं लगी और उन्होंने मुस्कराते हुए भगवान शिव को गोपीनाथ की उपाधि प्रदान की। गोपीनाथ का मंदिर स्थित होने के कारण गोपेश्वर को यह नाम दिया गया। इसकी एक और वजह मानी जाती है। कहते हैं कि राजा सगर की सात हजार गायें थीं। उसके ग्वाले आसपास के क्षेत्र में इन गायों को चराते थे। उनमें से एक गाय हमेशा जंगल में स्थित एक शिवलिंग को अपने दूध से नहलाती थी। ग्वाले ने जब यह बात राजा को बताई, तो उन्होंने स्वयं मौके पर पहुंचकर यह नजारा देखा। चूंके उस समय ग्वालों को गोप कहा जाता था, इसलिए राजा ने उस शिवलिंग अथवा भगवान शिव को गोपेश्वर नाम से पुकारा और गोपीनाथ मंदिर की स्थापना की गई। मान्यता के मुताबिक गोपीनाथ मंदिर के कारण ही गोपेश्वर का भी नाम रखा गया।

दाल ही नहीं दवा भी है 'गहथ

-पथरी रोगियों के लिए रामबाण की तरह है यह दाल -कम पानी व पथरीली जमीन पर भी मिलता है अच्छा उत्पादन Pahar1- पहाड़ के किसान सदियों से अपने सीढ़ीदार खेतों में विविधतापूर्ण फसलें उगाते आ रहे हैं। यहां की पारंपरिक फसलों का विशेष महत्व है। दलहनी फसलों की बात करें, तो गहथ सबसे उपयोगी फसल है। इसे दाल ही नहीं, औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। पथरी के रोगियों के लिए तो यह दाल रामबाण की तरह है। गहथ को वैज्ञानिक भाषा में मैक्रोटाइलोमा कहते है। लगभग पंद्रह सौ से दो हजार मीटर तक की ऊंचाई पर इसकी फसल उगाई जाती है। खास बात यह है कि कम पानी वाली व पथरीली भूमि पर ही इसका बेहतर उत्पादन प्राप्त होता है। यह भी बता दें कि पर्वतीय अंचलों में गहथ को सिर्फ दाल के तौर पर ही भोजन में शामिल नहीं किया जाता, बल्कि इसके कई औषधीय गुण भी हैं। एक लोकगीत से गहथ का महत्व परिलक्षित होता है 'बरखा बथ्वाणी, ह्यूंद कू गथ्वाणीÓ यानी सर्दी का मौसम है, तो सर्दी-जुकाम व अन्य मौसमी बीमारियां घेर सकती हैं, लेकिन चिंता की कोई बात नहीं, क्योंकि हमारे पास गहथ है। पहाड़ी घरों में गहथ की दाल तो बनती ही है, कई अन्य पकवान भी तैयार किए जाते हैं। इनमें गथ्वाणी (गहथ की दाल को उबालकर तैयार पानी), फाणा (भीगी गहथ को सिलबट्टे पर पीसकर तैयार होने वाला पकवान) और भरवां रोटियां मुख्य हैं। यह सर्दियो में उर्जा पैदा करने वाली दाल है। जुकाम-खांसी के इलाज के लिए ग्रामीण गहथ की पटंूगी (पकोडिय़ां) बनाकर खाते हैं। पहाड़ से गहथ का अभिन्न रिश्ता है। गहथ से पथरी रोग के इलाज की जानकारी के पीछे पर्वतीय किसानों का पारंपरिक ज्ञान है। पुराने जमाने में पहाड़ों में जब लोग घरों का निर्माण करते थे, तो पथरीली जमीन होने के कारण खासी दिक्कतें होती थीं। तब विस्फोटक नहीं थे। ऐसे में पत्थरों को तोडऩे के लिए उन्हें लकड़ी के ढेर से ढक दिया जाता था और आग लगा दी जाती थी। बाद में गर्म पत्थर पर गहथ का उबलता पानी डाला जाता था, तो पत्थर टुकड़े-टुकड़े हो जाता था। कालांतर में ग्रामीणों ने पथरी रोग पर भी गहथ के पानी का प्रयोग शुरू किया, तो फायदे मिले। बता दें कि एक माह तक गहथ का सूप पीने व दाल खाने से पुरानी से पुरानी पथरी भी टूटकर प्राकृतिक प्रक्रिया के तहत मूत्र विसर्जन के साथ निकल जाती है। गुर्दे की पथरी के लिए तो यह रामबाण है। पर्वतीय परिसर रानीचौरी के वैज्ञानिक डा. एम. दत्ता का कहना है कि गहथ औषधीय गुणों से भरपूर होने के अलावा खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। गहथ के पौधों व फलियों के सूखे अवशेष पशुओं के लिए उत्तम चारा है। इनसेट प्रति सौ ग्राम गहथ से मिलने वाले पोषक तत्व (मिग्रा में) प्रोटीन 22.0 वसा 0.5 खनिज 3.2 रेशा 5.3 कार्बोहाइड्रेट 57.2 ऊर्जा 32 कैलोरी फास्फोरस 311 कैल्शियम 280 आर्द्रता 11.8 लोहा 8.4 कैरोटीन 71.0 विटामिन ए 118.3

अब विलुप्त नहीं होगी पहाड़ी नारंगी

-अकेले दम पर अनिल जोशी की पहल -मलेथा में 30 हजार पौध हैं रोपण के लिए तैयार -दो लाख पौध होंगी अगले साल तैयार श्रीनगर गढ़वाल,: पहाड़ी संतरा (नारंगी) विलुप्त होने के कगार पर आ गया है। संतरों की अन्य प्रजातियों की अपेक्षा पहाड़ी संतरा ज्यादा रसीला और स्वादिष्ट होता है। पहाड़ी नारंगी को बचाने को लेकर पंतनगर विश्वविद्यालय से वानिकी में चार वर्षीय स्नातक अनिल जोशी ने अकेले दम पर पहल करने की ठानी। महिला डेयरी विकास परियोजना की सरकारी नौकरी छोड़ अनिल कुमार जोशी ने अपनी इस पहल के लिए श्रीनगर से दस किमी दूर मलेथा के सेरों में 15 काश्तकारों से पांच साल के लिए 200 नाली खेत लीज पर लेकर पहाड़ी संतरे की पौध लगाने का कार्य शुरू किया। वर्तमान में जोशी की इस पौधशाला में 30 हजार पहाड़ी नारंगी की पौध रोपण के लिए तैयार हैं। दो लाख पौध अगले वर्ष रोपण के लिए तैयार हो जाएगी। अनिल जोशी ने बताया कि पौध को तैयार होने में डेढ़ वर्ष का समय लगता है। पौधशाला बनाने में श्रीनगर के घाटी फलशोध केंद्र और उद्यान विभाग कीर्तिनगर का तकनीकी सहयोग उन्हें मिला। पिछले वर्ष वह 40 हजार संतरे की पौध तैयार कर वितरित कर चुके हैं। युवाओं के लिए स्वरोजगार का एक आदर्श उदाहरण बने अनिल जोशी का कहना है कि प्रदेश का उद्यान, जलागम विभागों के साथ ही ब्लाक भी उनसे सरकारी दर पर यह पौध खरीदते हैं। वर्ष 2007-08 पंजाब के किन्नू की 97 हजार बीजू पौध भी जोशी की पौधशाला में तैयार हुई। इसके अतिरिक्त वर्ष 2009 में बीजू आम की एक लाख पौध भी उनके द्वारा विभिन्न विभागों को उपलब्ध करा दी गयी। अनिल जोशी का कहना है कि अपने हौसले और साथियों के सहयोग से ही वह इस क्षेत्र में आगे बढ़े हैं। इससे पूर्व वर्ष 2000 में खण्डाह में उनके द्वारा कचनार (चार वृक्ष) की 8 लाख पौध भी उगाई जा चुकी थी। श्री जोशी का कहना है कि उद्यानिकी और फल सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में आशातीत संभावनाएं हैं। इनके बाजार भी बेहतर रूप से उपलब्ध हो जाते हैं। युवाओं को इस क्षेत्र में आगे आना चाहिए।

Tuesday, 20 April 2010

गिनीज वल्र्ड रिकार्ड को भेजेंगे महाकुंभ का नाम

-मसूरी: केंद्रीय कैबिनेट सचिव के चंद्रशेखर राव शुक्रवार को लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी पहुंचे। श्री राव अकादमी में दो दिन रहेंगे। लाल टिब्बा भ्रमण पर निकले श्री राव ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार के बेहतर तालमेल का ही नतीजा है कि महाकुंभ जैसा बड़ा पर्व शांति से निपट गया। उन्होंने बताया कि महाकुंभ हरिद्वार का नाम गिनीज वल्र्ड रिकार्ड के लिए भेजा जाएगा। उन्होंने कहा कि शांति के नोबेल पुरस्कार से इसका कोई लेना-देना नहीं है। केंद्रीय कैबिनेट सचिव के चंद्रशेखर राव शुक्रवार को लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी पहुंचे। श्री राव दो दिन तक आईएएस प्रशिक्षु और अधिकारियों के बीच रहेंगे। अकादमी में लंच करने के बाद श्री राव ने मालरोड, लाल टिब्बा, चार दुकान आदि क्षेत्रों का भ्रमण किया। उन्होंने मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक की महाकुंभ हरिद्वार को शांति के नोबेल पुरस्कार की पेशकश को नकार दिया। उन्होंने कहा कि नोबेल के लिए ऐसे आयोजन का नाम शामिल नही किया जाता है। -- -कुंभ यानि दुनिया का सबसे बड़ा आयोजन देवभूमि की जनता के किया पांच करोड़ श्रद्धालुओं का आतिथ्य: निशंक मुख्यमंत्री ने शाही स्नान की श्रृंखला पूरी होने पर जताया सभी का आभार देहरादून, जागरण ब्यूरो मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि हरिद्वार कुंभ दुनिया के सबसे बड़े और सफल आयोजन के रूप में स्थापित हो गया है। उन्होंने कहा कि देवभूमि की जनता ने विश्वभर के 140 देशों से आए श्रद्धालुओं का भरपूर स्वागत किया है। 14 अप्रैल के शाही स्नान का क्रम पूरा होने के बाद आज पत्रकारों से रूबरू डा. निशंक ने कहा कि इस आयोजन में पांच करोड़ से अधिक लोगों ने गंगा में स्नान करके इसे दुनिया का सबसे बड़ा सफल आयोजन बना दिया है। इस आयोजन के जरिए उत्तराखंड ने पूरी दुनिया को एक सूत्र में पिरोकर शांति का संदेश दिया। इस आयोजन को कई आतंकी धमकियां भी मिलीं पर सरकार की तैयारियों के आगे ऐसे नापाक मंसूबे रखने वाले यहां आने की हिम्मत तक नहीं जुटा सके। अंतिम शाही स्नान के रोज तो स्नान करने वाले श्रद्धालुओं का आकंड़ा सारे अनुमान ध्वस्त करते हुआ डेढ़ करोड़ तक पहुंच गया है। इस बारे में अन्य स्रोतों से भी आंकड़े एकत्र करवाए जा रहे हैैं। सीएम ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि इस आयोजन पर 440 करोड़ रुपये व्यय किए गए। अहम बात यह है कि इस बार 70 से 80 फीसदी तक काम स्थायी प्रकृति के ही किए गए है। इससे पहले 1998 में कुल कामों में से महज बीस फीसदी और 2004 में महज 25 फीसदी काम ही स्थायी काम करवाए गए। इस मायने में भी सरकार ने मील का पत्थर स्थापित किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस सफल आयोजन के लिए पूरी टीम बधाई की पात्र है। उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ केंद्रीय योजना आयोग का भी मार्ग दर्शन के लिए आभार व्यक्त किया। सीएम ने यूपी की सीएम मायावती को भी मदद के लिए धन्यवाद दिया। सीएम ने कहा कि उत्तराखंड की जनता ने भी पांच करोड़ लोगों का सत्कार करके देवभूमि की परपंरा को निभाया। सीएम ने इस आयोजन में योगदान करने के लिए शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक और भाजपा की कोर कमेटी का भी आभार जताया। मुख्यमंत्री ने इस काम में लगे शासन के साथ ही पुलिस और प्रशासन के अफसरों की भी सराहना की। इस मौके पर मुख्य सचिव एनएस नपलच्याल और प्रमुख सचिव सुभाष कुमार भी मौजूद रहे। इंसेट शांति के नोबेल का हकदार कुंभ देहरादून: मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने बताया कि हरिद्वार कुंभ को शांति का नोबेल पुरस्कार देने की मांग कई विदेश संगठन उठा रहे हैैं। सीएम ने कहा कि वे अपने स्तर से इस मांग का समर्थन कर रहे हैैं। भले ही यह पुरस्कार देश की राष्ट्रपति ही क्यों न ग्र्रहण करें पर इस बार शांति का नोबेल भारत में ही आना चाहिए। कुंभ ने पूरी दुनिया को शांति और एकता का संदेश देने में पूरी तरह से सफलता हासिल की है।

'पीपल ने सेहरा, 'तुलसी ने ओढ़ी चुनरी

- मठ गांव: यहां है वृक्षों के विवाह की अनूठी परम्परा - एक परिवार कई पीढिय़ों से कर रहा है इस अनोखे रिवाज का निर्वहन - दुल्हन वृक्ष को सजाया जाता है सोने-चांदी के जेवरातों से - दान और दहेज के रूप में दिया जाता है सामान , गोपेश्वर (चमोली)- दो वृक्षों का विवाह शान-ओ-शौकत और धूमधाम से कराया जाए तो इस बात का चर्चाओं में शुमार होना लाजिमी है। जी हां! उत्तराखंड के चमोली जिले के मठ नामक गांव में वृक्षों के विवाह का अनूठा रिवाज है। यहां एक ऐसा परिवार है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी इस परम्परा का निर्वाह करता चला आ रहा है। इस अनोखे विवाह में 'पीपलÓ को दूल्हा तो 'तुलसीÓ अथवा 'बड़Ó के वृक्ष को दुल्हन माना जाता है। शादी के दिन पीपल के वृक्ष को सेहरा और शेरवानी पहनाई जाती है तो दुल्हन बने पेड़ का भी सोने-चांदी के जेवरातों से ऋंगार किया जाता है। और तो और, समारोह में सैकड़ों लोग शिरकत करते हैं, जिन्हें बाकायदा शादी का कार्ड देकर आमंत्रित किया जाता है। अजब है पर सच है। मठ गांव निवासी पीताम्बर दत्त तिवारी का परिवार पिछली कई पीढिय़ों से वृक्षों के विवाह की परम्परा का निर्वहन करता चला हा रहा है। इस परिवार का मानना है कि वृक्षों के विवाह का सकारात्मक प्रभाव न सिर्फ बुरे ग्रह-नक्षत्रों पर पड़ता है, बल्कि ऐसा करने से पर्यावरण संरक्षण में सहयोगी बना जा सकता है। वृक्षों के विवाह का बाकायदा मुहूर्त निकाला जाता है। उसके बाद तिवारी परिवार अपने नाते-रिश्तेदारों को प्रिंटेड कार्ड भेजकर शादी समारोह के लिए आमंत्रित करता है। फिर, अपने बेटे अथवा बेटी की शादी की तर्ज पर पूरा परिवार इस विवाह की तैयारियों में जुट जाता है। वर और दुल्हन के लिए शादी के कपड़े व जेवरात की खरीद की जाती है। दरअसल, तिवारी परिवार की हर पीढ़ी गांव में ही 'पीपलÓ के वृक्ष का रोपण करती है। करीब पांच-छह वर्ष बाद जब यह व़ृक्ष बड़ा हो जाता है तो उसका विवाह 'तुलसीÓ अथवा 'बड़Ó के वृक्ष के साथ किया जाना अनिवार्य माना जाता है। ऐसी परंपरा एक पीढ़ी एक बार निभाती है। विवाह के दिन एक ओर पीपल के पेड़ को सेहरा और शेरवानी पहनाकर दुल्हे तो दूसरी ओर तुलसी अथवा बड़ के वृक्ष (छोटी पौध) को जेवरात व चुनरी से घर में दुल्हन की तरह सजाया जाता है। उसके बाद बारातियों के साथ दुल्हन वृक्ष की डोली पीपल के पेड़ के पास लाई जाती है और फिर विवाह संस्कार शुरू हो जाते हैं। प्रतीकस्वरूप न सिर्फ सात फेरे होते हैं, बल्कि उसके बाद दुल्हन पौध को पीपल के वृक्ष के समीप रोपित कर दिया जाता है। इस तरह मंत्रोच्चारण के साथ विवाह संस्कार पूर्ण हो जाता है और फिर आमंत्रित लोगों को सामूहिक भोज करवाया जाता है।

नृत्य सम्राट की कर्मस्थली अल्मोड़ा

विराट गौरवशाली अतीत लघुतर होगा रूप चिंता का विषय सांस्कृतिक विघटन से उबारने वाला नहीं है कोई: पांडे लोक संस्कृति की आत्मा को खा गए हैं कैसेट: बोरा अल्मोड़ा- ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपराओं की थाती अल्मोड़ा नगरी का समृद्ध व गौरवशाली अतीत रहा है। यह जहां अपनी विविध लोक संस्कृतियों के लिए विख्यात है, वहीं नृत्य सम्राट उदयशंकर की मौजूदगी इसके शास्त्रीय पक्ष को भी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर खड़ा करती है। इसके अतीत पर नजर डालें तो यहां की लोक संस्कृति का अपना विराट स्वरूप देखने को मिलता है, जो आज लघु से लघुतर हो गया है। कभी चैत्र मास में शहर से लगे खासपर्जा गांव में हुड़के की थाप, झोड़े की स्वलहरियां सुनाई देती थी, जो अब लगभग बंद हो गई हैं। दूसरा पक्ष जो नृत्य सम्राट उदयशंकर से जुड़ा है उसकी समृद्धि का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उदयशंकर के शिष्ट जो प्रख्यात फिल्मकार रहे हैं, जिनमें गुरुदत्त, जौहरा सहगल, नरेन्द्र शर्मा शामिल हैं, ने अल्मोड़ा का बड़ा मान किया था। राजस्थान में जन्मे उदयशंकर ने अल्मोड़ा में भारत के विभिन्न लोक एवं शास्त्रीय नृत्यों को लेकर अनेक प्रयोग किए। अजंता, एलोरा जैसे प्राचीन मंदिरों की नृत्य मुद्राओं से प्रेरित होकर उन सभी का समायोजन नृत्य में कर एक विधा को जन्म दिया, जिसने कला के क्षेत्र में विश्व के मानचित्र पर सदा के लिए अपनी अमिट छाप छोड़ी है। देश-विदेश में ख्याति प्राप्त करने के बाद उदयशंकर ने एक आदर्श सांस्कृतिक केन्द्र की स्थापना करने की इच्छा से अल्मोड़ा को अपना कार्य क्षेत्र चुना। अल्मोड़ा में ही पहली बार रामलीला मंचन छाया नाट्य के रूप में दिखाई गई। अधोपतन की ओर जा रही संस्कृति, साहित्य व परंपराओं पर नगर के प्रतिष्ठित रंगकर्मी, होली गायक शिवचरण पांडे गहरी चिंता जताते हैं। उनका कहना है कि सांस्कृतिक विघटन की प्रक्रिया जारी है। इससे उबारने वाला वर्तमान में कोई नहीं दिखता है। न परिवार न समाज और न ही सरकार। हमारे जितने भी रीति-रिवाज, बोल-चाल पहचान, सांस्कृतिक मर्यादाएं हैं एक के बाद एक लोग उन्हें त्याग रहे हैं। यह बड़ी चिंता का विषय है। पूछने पर बताते हैं कि आशा की किरण तो तब जगे जब समाज का हर तबका कुछ न कुछ योगदान कर इसे बचाने का प्रयास करे। नहीं तो विघटन की गंगा में बहते रहे फिर उतरना मुश्किल हो जाएगा। जाने-माने कुमाऊं के रंगकर्मी व प्रतिष्ठित हुड़का वादक चंदन बोरा की चिंता भी कम नहीं है। उनका कहना है कि अब लोक गायकी ही समाप्त हो रही है। बैर, भगनोल, झोड़ा, छपेली, चैती, वसंत, बारामासी कहीं सुनने को ही नहीं मिलता है। लगता है अब न सुनाने वाले हैं और न सुनने वाले। इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ नहीं हो सकता। बाजार में बिक रहे कैसेटों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए श्री बोरा कहते हैं कि इन्होंने लोक संस्कृति की आत्मा को ही खा डाला है। बाजारू स्वरूप देकर इनकी निर्मम हत्या कर दी है। कुल मिलाकर कभी वैभवशाली संस्कृति, साहित्य व परंपराओं के लिए जाने जाने वाला अल्मोड़ा नगरी बढ़ते कंक्रीट के जंगल में खो सा रहा है।

धार्मिक पर्यटन को जल्द लगेंगे पंख

-कई धार्मिक स्थलों पर हेलीपैड बनने की पूरी संभावना -हेलीकाप्टर सेवाएं शुरू करने के लिए कंपनियां भी हैं संपर्क में -उत्तराखंड का पर्यटन जल्द ही उडऩखटोले पर सवार होने वाला है। इस बार के पर्यटन सीजन में हेलीपर्यटन के उड़ान भरने की पूरी संभावना है। उम्मीद की जा रही है कि चारों धामों और हेमकुंड साहिब में हेलीपैड बनाने की कवायद रंग लाने वाली है। महासू देवता के मंदिर तक भी उडऩखटोला पहुंचाने की कवायद की जा रही है। इनमें से कुछ जगहों पर तो हेलीपैड बन भी चुके हैैं, जबकि कुछ अन्य स्थानों पर हेलीपैड बनाने के लिए प्रपोजल स्वीकृत हो गए हैैं। राज्य सरकार के अपने हेलीपैडों के निर्माण के बाद सैन्य हेलीपैड पर अब तक रही निर्भरता समाप्त हो जाएगी। यूं तो देवभूमि उत्तराखंड की खूबसूरत वादियां सदा से ही पर्यटकों और श्रद्धालुओं को लुभाती रही हैैं। लेकिन केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन देश के करोड़ों लोगों के लिए आध्यात्मिक संतोष का एक बड़ा माध्यम है। इसके साथ ही हेमकुंट साहिब के दर्शन के लिए भी हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैैं। इनमें से केदारनाथ में तो राज्य सरकार के दो अपने हेलीपैड हैैं। पर बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री में अपने हेलीपैड नहीं हैैं। इसके चलते यहां तक हैलीकाप्टर के जरिए पहुंचने के लिए सेना के हेलीपैड का इस्तेमाल किया जाता है। सेना के हेलीपैड होने के चलते अक्सर यहां पर लैैंडिंग की परमीशन मिलने में दिक्कतें आती रहती हैैं। प्रमुख सचिव नागरिक उड्डयन पीसी शर्मा के मुताबिक केदारनाथ में पहले से कार्य कर रहे दो हेलीपैड के अतिरिक्त एक और हेलीपैड प्रस्तावित किया गया है। वहीं, बदरीनाथ में अब तक आर्मी के हेलीपैड से काम चलाया जा रहा था। यहां पर वन विभाग से जमीन आदि की सहमति मिल गई है अब हेलीपैड निर्माण शुरू किया जाएगा। इसी प्रकार, गंगोत्री से पहले हर्षिल में सेना के हेलीपैड से अभी काम चलाया जा रहा है। यह हेलीपैड सड़क से दूर भी है। अब हर्षिल में मुख्यमार्ग के समीप ही हेलीपैड तैयार किया जा रहा है। इसी प्रकार यमुनोत्री से पांच किमी पहले खरसाली में हेलीपैड का निर्माण किया जा रहा है। वहीं, हेमकुंट साहिब के लिए फिलहाल घांघरिया में हेलीपैड है। घांघरिया से हेमकुंट साहिब पहुंचने के लिए छह किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पार करनी पड़ती है। जिससे श्रद्धालुओं को यहां तक पहुंचने में काफी दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। हेमकुंट साहिब में पहले एक प्राइवेट फर्म ने हेलीपैड के लिए संभावना तलाशी थी। उसकी तरफ से प्रपोजल भी दिया गया था। पर अब यहां पर राज्य सरकार की तरफ से ही हेलीपैड निर्माण का कार्य करने की योजना है। श्री शर्मा के मुताबिक चारों धामों और हेमकुंट साहिब में बिना किसी रोक-टोक के हैलीकाप्टर उतरने की सुविधा मिलते ही उत्तराखंड के हेलीपर्यटन का काफी विस्तार हो जाएगा।

-अब 24 हजार में डाक्टरी की पढ़ाई

-हरिद्वार में ईसीएसआई के मेडिकल कालेज एवं हास्पिटल का रास्ता साफ -सस्ते एमबीबीएस को भरना होगा पांच साल ईसीएसआई सेवा का बांड -कालेज की सौ में से 40 उत्तराखंड व 20 सीट कर्मचारियों के बच्चों के लिए -राज्य सरकार ने केंद्र को भेज दिया 35 एकड़ भूमि उपलब्धता का प्रस्ताव देहरादून- दो साल तो लगे मगर केंद्र की दयानतदारी के बाद अब राज्य सरकार ने भी मेहरबानी दिखा ही दी। इससे जल्द ही सूबे के निम्न आय वर्ग के डाक्टर बनने को लालायित मेधावी छात्रों की बल्ले-बल्ले होनी तय है। यह संभव होगा राज्य में ईसीएसआई (कर्मचारी राज्य बीमा निगम) के मेडिकल कालेज एवं हास्पिटल के खुलने से, जिसमें महज 24 हजार रुपए सालाना में ही एमबीबीएस की पढ़ाई की सुविधा उपलब्ध होगी। वर्ष 2008 में केंद्र सरकार ने हिमाचल प्रदेश, बिहार व उत्तराखंड में ईसीएसआई मेडिकल कालेज एवं हास्पिटल खोलने की स्वीकृति दी थी। अन्य राज्यों में तो इन मेडिकल कालेजों की स्थापना की प्रक्रिया काफी आगे बढ़ चुकी है लेकिन उत्तराखंड में मामला केंद्र व राज्य सरकारों के दांवपेेच में फंसकर लटक गया। दरअसल, केंद्र सरकार को इस योजना के तहत राज्य सरकारों को धन उपलब्ध कराना है तो मेडिकल कालेज व हास्पिटल खोलने के लिए भूमि की उपलब्धता की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। पिछले दो सालों के दौरान राज्य में कुछ जगह जमीन तय की गई लेकिन फिर प्रपोजल रिजेक्ट कर दिए गए। तब से इस मेडिकल कालेज को लेकर खींचतान चल रही है। कभी इसे हरिद्वार तो कभी देहरादून या गढ़वाल के किसी अन्य जिले में ले जाए जाने की बात राजनीतिक हलकों में चलती रही। अब जाकर यह तय हो गया है कि ईसीएसआई का मेडिकल कालेज व हास्पिटल हरिद्वार जिले में खोला जाएगा। सूत्रों के मुताबिक ईसीएसआई को हरिद्वार में सिडकुल औद्योगिक क्षेत्र के पास अस्पताल खोलने को पांच एकड़ भूमि मिली थी और अब राज्य सरकार इसी भूमि के पास मेडिकल कालेज के लिए 30 एकड़ भूमि भी मुहैया कराने को तैयार हो गई है। इतनी भूमि की उपलब्धता पर पर वहां डेंटल कालेज और नर्सिंग कालेज भी अस्तित्व में आ जाएगा। एक हजार करोड़ की लागत वाले इस मेडिकल कालेज व हास्पिटल के अस्तित्व में आने पर डॉक्टर बनने की ख्वाहिश पाले उत्तराखंड के युवाओं का खासा लाभ मिलेगा। यहां एमबीबीएस की फीस मात्र 24 हजार प्रतिवर्ष होगी। अलबत्ता इस कालेज से निकलने वाले डाक्टरों से पांच साल का बांड भराया जाएगा कि वे इस अवधि में ईसीएसआई की सेवा करेंगे। कालेज में 40 फीसदी कोटा उत्तराखंड, 40 फीसदी सीपीएमटी और 20 फीसदी कोटा कर्मचारी वर्ग के बच्चों के लिए निर्धारित होगा। उल्लेखनीय है कि राज्य के सरकारी मेडिकल कालेज पंद्रह हजार सालाना में एमबीबीएस की पढ़ाई करा रहे हैं। जाहिर है, अब सस्ती मेडिकल पढ़ाई के मौके बढऩे से उत्तराखंड को फायदा होगा और चरमराती स्वास्थ्य सुविधाओं को दुरुस्त करने में खासी मदद मिलेगी। ----- ''राज्य में जल्द ही ईसीएसआई का मेडकिल कालेज व हास्पिटल अस्तित्व में आ जाएगा। हम चाहते हैं कि इसकी स्थापना हरिद्वार जिले में हो क्योंकि ईसीएसआई के अंतर्गत सर्वाधिक कर्मचारी इसी जिले में हैं। अब इसके लिए आवश्यक जमीन उपलब्ध कराना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।ÓÓ हरीश रावत, राज्य मंत्री श्रम एवं रोजगार, भारत सरकार। --- ''केंद्र सरकार ने ईसीएसआई मेडिकल कालेज व हास्पिटल के लिए हरिद्वार को उपयुक्त बताया है, इसलिए प्रदेश सरकार ने यहां 35 एकड़ भूमि की उपलब्धता का प्रस्ताव जिलाधिकारी के माध्यम से केंद्र को भेज दिया है। केंद्र की हरी झंडी मिलते ही राज्य सरकार इस भूमि का अधिग्रहण कर लेगी।ÓÓ प्रकाश पंत, मंत्री श्रम, पेयजल, संसदीय कार्य, उत्तराखंड सरकार।

Friday, 26 March 2010

उत्तराखंड समाज प्रताप नगर जयपुर द्वारा प्रथम युवक युवति परिचय सम्मेलन

पूरी जानकारी के लिए आगे देखे..... उत्तराखंड समाज प्रताप नगर जयपुर द्वारा प्रथम युवक युवति परिचय सम्मेलन का जयपुर के प्रताप नगर में 25 अप्रैल को आयोजन किया जा रहा है. रमेश चन्द्र शर्मा (भट्ट)

Wednesday, 24 March 2010

अमीरात (यूएई) मां भी उत्तरान्चली भै बन्दो दगडी अपणुपन कु अह्सास:-

उत्तरान्चली एशोसियेसन आफ़ ईमिरात परिवार क सभी सदस्यो कु अपणि संस्क्रति कु प्रति प्रेम/अपणि बोली-भाषा सी लबाव/अपणा उत्तरान्चली भै बन्दो दगडी अपणुपन कु अह्सास:- . उत्तरान्चली एशोसियेसन आफ़ ईमिरात परिवार क सभी सदस्यो कु अपणि संस्क्रति कु प्रति प्रेम/अपणि बोली-भाषा सी लबाव/अपणा उत्तरान्चली भै बन्दो दगडी अपणुपन कु अह्सास:- ये परिवार कु सदा प्रयास रायी कि कै प्रकार सि हम अपणु संस्क्रति तै रास्ट्रिय और अन्तरास्ट्रिय स्तर पर विकसित करा...हमारु खाणू (पकवानॊ) कि, हमारु पहनाओ कि, हमारु स्वर्ग समान उत्तरान्चल मा प्रयटन कु, हमारि बोली भाषा कि रास्ट्रिय और अन्तरास्ट्रिय स्तर पर पहचान होऊ....पर सबसी पहली अपणो बटी शुरुवात करण होलि...येही प्रयास क दगडी अपण तौहारों तै अपणु तरिका सि मानाण कि पुरी कोशिस रैन्दी....दिपावली तै "बग्वाल" क रुप मा, नयु ईयर तै "कौथिक" जै मा कि प्रितम भरतवाण जी, मीना राणा जी, सन्गीता ढौन्डीयाल जी व शिव दत्त पन्त जी न अपणि मधुर स्वरो सि दुबई मा रौनक बिखेरि दे छ फिर होली तै "छरोली" और फिर होलि मिलन "छरोली टोली" दुबई बटी अबु धाबी.....छरोली टोली कि बिशेष मकसद व आक्रषण छ उत्तरान्चली पहनाव.......! १९ मार्च २०१० होली/सांस्क्रतिक मिलन (छरोली टोली) कु प्रोग्राम बहुत हि सुन्दर सफ़ल व सुखद रायी... सुबेर बस अजमान बटी निकली और शारजहां, दुबई होईखन अबु धाबी कि तरफ़ चली.. बस मा ढोल-दमो कि दगडी गढवाली/कुमावनी गानो कि धुन पर ज्वान-जमान, दाना-सयाण सभी लोगो न खुब आन्नद लिनी...अबु धाबी पहुंची खन बडु हि सुन्दर प्यारु तरिका सि पठाई जुन्दाल लगै कि अबू धाबी मा बस्या उत्तरान्चली भै-बन्दॊ/दिदी-भुलीयो न मिलीखन स्वागत सतकार करि..वाकु बाद उडद कि दाल कि बलुणि वाह क्या बुन तब और दिन कु खाणू आलु गोभी कि भुजी राजमा कि दाल सभी लोग अन्गुली चटदी रै गेन.. बहुत बहुत धन्यबाद अबु धाबी परिवार कु जुन ईतका सुन्दर तरिका सि स्वागत सतकार क दगडी स्वादिस्ट खाणु और अच्छी ब्यवस्था करि.....! ग्रुप कु मकसद उत्तरान्चली सन्सक्रति कु विकास क साथ-साथ अपणी उत्तराखन्डी भै-बन्दॊ कि कै भि प्रकार सि सहायता करण भी छ - मदद बहुत सि प्रकार सि हवे सकदिन जन कि कैतै नौकरी लगाण मा, कैतै बिजनीस बढाण मा, कैतै शादी समबन्धीत ता कैतै कै प्रकार सी अभी कुछ महिना पहली श्री जसपाल राणा कि आकसमिक मिर्त्यू हवे गे छ ता ग्रुप क सभी सदस्यो न थोडा-थोडा पैसा जमा करि तै उन्कु परिवार तै आर्थिक सहायता क रुप मा देढ लाख (१५००००/-) रुपये भेजी छ.. "एकता मा बहुत बडी ताकत होन्दी यदी यी ताकत कु प्रयोग हम अच्छा कामॊ मा करा ता हमारी कामयाबी आसमान कि बुलन्दिया छ्वी सकदी"....हमार दगड मा बहुत सि उत्तराखन्डी बिजनिसमैन भी छन जुकी उपकरण व सेवा तै हम प्रयोग करि सकदिन और वाकु बदलू हम तै छुट मिललू ये मा दवीयो तै लाभ होलू उ तै उन्कु बिजने़स बढाण मा और हम तै सस्ती किमतो पर सामान लेण मा....! हम सभी लोग यख बिदेश अया छन ता अपणु परिवार कु भरण पोषण ठिक प्रकार सि करि ही सकदिन....हमारु उत्तराखन्ड मा बहुत सि परिवार ईन छ्न जुन्कू चुल पर ब्याखुन्दी दां आग नी जगदी किलै कि उन्कु घर मा कुछ नी छ पकाणु तै... बहुत सि बच्चा (नौन बाल) ईन छ्न कि जुन स्कुल कु मुक नी देखि किलै कि स्कुल मा फिस देण कु पैसा नी छ और कै भी प्रकार सि अगर ८-१० पास हवे गेन ता वासी अगने पढी नी सकदन किलै कि परिवार कि जिमेदारि ये जान्दी...बुढी-बुढ्या (बोडा-बोडी/दादा-दादी) तै बाझा कुडा जेल लगणू छ किलै कि कैक दगडी बचेण...लडीक ब्वारियों कि आण कि आ़स मा आंखो कु पाणि सुखी गे...यु.ए.ई ग्रुप फ़ाउन्डेसन शुरुवात ग्रुप क दगडि मिलि तै काम करलु और एक छोटू सि कोसिस व शुरुवात का रुप मा हमन फ़ाउन्डॆशन शुरुवात कु माध्यम सि उ बच्चो तै १ लाख रुपये (१०००००/-) भेजी.....और अगने भि कोशिश राली उ रैबासियों खातिर कुछ करण कि जुन अपणि सन्स्क्रति कि बुझदी दयो (दिया) तै हाथो न ढकी कि जगै कि रखियु छ......! जै कुल देवता नागराजा-जय देवभुमी उत्तराखन्ड... धन्यबाद व सुभकामनायें...! विनोद सिंह जेठुडी टीम यु.ए.ई ग्रुप

Tuesday, 23 March 2010

अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार की फोटो हमारे पहाड़ की

यह फोटो नगाधिराज हिमालय की पंचाचूली चोटी की है, जो इस पर सुबह के समय सूर्य की पहली किरनें पड़ने के दौरान ली गयी है, इस कारण इस फोटो मैं हिमालय सोने की तरह दमकता नजर आ रहा है. यह पुरस्कार मुझे पेनोरोमियो वेबसाइट की और से जनवरी २०१० की ''जियोटैग्ड फोटो कांटेस्ट" में दिया है. यह वेबसाइट गूगल अर्थ पर दुनियां के विभिन्न स्थानों की फोटो उपलब्ध कराती है. इस वेबसाइट पर मेरी २०० से अधिक फोटो बीते एक वर्ष से हैं. यह वेबसाइट दुनियां भर के अपने लाखों फोटोग्राफरों से हर माह प्रतियोगिता के लिए अपनी अधिकतम ५ फोटो नोमिनेट करने को कहती है. फिर पूरे माह इन फोटो पर दुनियां से वोटिंग होती है. कोई भी वेबसाइट पर लोग-इन कर वोटिंग कर सकता है. इस वेबसाइट पर चूँकि भारत के कम ही लोग जुड़े हैं, इसलिए किसी भारतीय का पुरस्कार जीतना काफी कठिन होता है. मेरी जानकारी में मुझसे पूर्व केवल उन्नीपिल्लई नाम के एक फोटोग्राफर के रूस में खींचे गए चित्र को यह पुरस्कार मिला था. मैं नैनीताल में मार्च २००८ से ब्यूरो प्रभारी के रूप में कार्यरत हूँ. इससे पूर्व दैनिक जागरण, उत्तर उजाला व बद्री विशाल आदि समाचार पत्रों से बीते एक दशक से पत्रकारिता से जुड़ा हूँ. पत्रकारिता के साथ फोटोग्राफी मेरा शौक है. नैनीताल और कुमाऊँ व उत्तराखंड की खूबसूरती इस कार्य में स्वयं मेरी मदद करती है. कुमाउनी लोक भाषा में काफी कुछ भी लिखता रहता हूँ. इस फोटो को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिला है Navin Joshi Reporter : Rashtriya Sahara, Nainital. Mobile-9412037779

पहाड़ों ने ही मुझे पहाड़ पर चढ़ा दिया: लव

-लव और रीना से गौरवान्वित है उत्तराखंड -दुनिया ने दिया सम्मान पर उत्तराखंड से बधाई न मिलने की टीस भी झलकी -तीन बार एवरेस्ट विजेता लवराज धर्मसत्तू ने बताया कि कैसे पैदा हुआ साहस -एवरेस्ट विजेता लव धर्मसत्तू और दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला उनकी पत्नी रीना कौशल धर्मसत्तू के साक्षात्कार -पर्वतारोहण में प्रतिभा विकास के लिए इंस्टीट्यूट खोलने की बताई जरूरत हल्द्वानी: दृढ़ इच्छा शक्ति और जुनून किसी भी व्यक्ति की मंजिल आसान कर देता है। इसका जीता-जागता उदाहरण है पिथौरागढ़ में जन्में लवराज सिंह धर्मसत्तू, जिन्हें आज देश-प्रदेश नहीं बल्कि दुनिया इतिहास रचयिता के रूप में पढ़ती है। रविवार को एक समारोह में यहां आए श्री धर्मसत्तू से रूबरू होने का मौका मिला। बातचीत में उन्होंने कहा कि पहाड़ों ने ही पहाड़ पर चढ़ा दिया। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर एक-दो बार नहीं बल्कि तीन बार चढऩे का इतिहास रचने वाले लव ने कहा कि पिथौरागढ़ जिले के तहसील मुनस्यारी क्षेत्र के गांव बोना में उनका जन्म हुआ। पहाड़ के दुर्गम क्षेत्र में बचपन बीता, कुछ समझ आई तो सोचने लगा कि उतार-चढ़ाव में जिंदगी कट जाएगी। क्यों न कुछ खास किया जाएगा। बस में मन में यही ठान लिया कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ुंगा। उसी संकल्प ने एवरेस्ट को फतह करा दिया। 19 मई 1998, 20 मई 2006 और 21 मई 2009 तिथियों को तीन बार एवरेस्ट पर चढऩे वाले लव ने बताया कि दो बार नेपाल से और एक बार चीन से उन्होंने चढ़ाई की। दोनों ओर से चढऩे पर डेढ़ महीना लगा। हालांकि लव बार्डर सिक्योरिटी फोर्स दिल्ली में इंस्पेक्टर हैैं, लेकिन प्रतिभाओं को उचित प्रोत्साहन की व्यवस्था न होने से व्यथित दिखे। कहने लगे कि प्रतिभा का विकास किया जाता है। अगर पर्वतारोहण के लिए जगह-जगह इंस्टीट्यूट खुल जाएं तो इससे सरकार को भी बड़ा राजस्व प्राप्त होगा और इस क्षेत्र में प्रतिभाएं भी विकसित होंगी। बोले-मनाली और उत्तरकाशी में उच्च स्तर इंस्टीट्यूट हैैं, मनाली के इंस्टीट्यूट से सरकार को प्रतिवर्ष छह करोड़ रुपये मिलते हैैं मगर वहां इसका बहुत अच्छा क्रेज है। बातचीत में भले ही उनकी जुवां पर बात नहीं आई लेकिन चेहरे के भाव ने साफ एहसास करा दिया कि दिल्ली सरकार ने तो उनको सम्मानित किया मगर उत्तराखंड के निवासी इस सपूत को यहीं की सरकार ने आज तक बधाई भी नहीं दी है।-- हर महिला पहुंच सकती है दक्षिणी ध्रुव पर: रीना हल्द्वानी: दुनिया जहां लवराज धर्मसत्तू को पलकों पर रखती है, तो उनकी पत्नी रीना कौशल धर्मसत्तू के साहस को भी इतिहास का सलाम है। यहां सम्मान समारोह में भाग लेने आईं रीना ने यात्रा के अनुभव बांटे। बोलीं- कॉमनवेल्थ की साठवीं सालगिरह पर आयोजित महिला स्कीइंग अभियान में सात देशों के प्रतिभागियों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। शून्य से नीचे तापमान और बर्फीले तूफानों में आठ से नौ घंटे प्रतिदिन स्कीइंग करके 40 दिन में 29 दिसंबर 2009 को छह अन्य प्रतिभागियों के साथ दक्षिणी ध्रुव पहुंचने की उपलब्धि हासिल करके प्रथम भारतीय महिला होने का गौरव प्राप्त किया। एक सवाल के जबाव में उनका यही कहना था कि अन्य खेल और कार्यक्रमों का प्रचार होता है उनको सुलभ कराया जाता है। इसलिए युवा वर्ग का रुझान भी उसी ओर बढ़ रहा है। ऐसे में स्कीइंग के क्षेत्र में भी प्रतिभा तरासने का काम करना होगा। महिला होने के बावजूद इतना बड़ा साहस जुटाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि कौन सा काम ऐसा है कि जो महिला नहीं कर सकती। आत्मविश्वास से लबरेज रीना कहती हैैं कि जब मैैं दक्षिणी ध्रुव पर पहुंच सकती हूं। तो हर महिला पहुंच सकती है। बस, इच्छाशक्ति जगाने की जरूरत है। साहस तो खुद व खुद आ जाता है। ---

परम्पराएं तोड़ शवयात्रा में शामिल हुई तीन महिलायें

जिले में पहला मामला , पिथौरागढ़: पर्वतीय क्षेत्र की महिलायें भी अब परम्पराएं तोडऩे के लिए आगे आ रही हैं। मैदानी क्षेत्रों में परिवार के मुखिया को मुखाग्नि देने महिलायें आगे आ चुकी हैं अब उत्तराखण्ड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ में पहली बार शव यात्रा में शामिल होकर महिलाओं के शव यात्रा में शामिल न होने की परम्परा को तोड़ डाला है। सामाजिक कार्यकत्री रीता गहतोड़ी के चचेरे भाई का बीसी गहतोड़ी निवासी वड्डा का दो रोज पूर्व आकस्मिक निधन हो गया था। अपने भाई से गहरा लगाव रखने वाली रीता उनकी बहन करुणा और मां हरिप्रिया इस घटना से खासी आहत हुई। भाई की शव यात्रा शुरु हुई तो बहनें भी अपने आप को रोक नहीं पायी और शव यात्रा में शामिल हो गयी। बेटियों को परम्परा तोड़ती देख मां को भी साहस आया और वह भी शवयात्रा में शामिल हो गयी। मां और दोनों बेटियां शव यात्रा में रामेश्वर घाट तक पहुंची और शवदाह की प्रक्रिया में शामिल हुई। महिलाओं के पहली बार शवयात्रा में शामिल होने का कई महिला संगठनों ने स्वागत किया है। ऑल इण्डिया प्रोग्रेसिव महिला एक्टेविस्ट की महिला नेत्री पुष्पा मर्तोलिया महिलाओं के इस कदम की सराहना करते हुए बताया कि रुढ़ परम्परायें टूटनी चाहिए। उन्होंने कहा इससे अन्य महिलाओं को भी बल मिलेगा। शव यात्रा में शामिल हुयी रीता का कहना है कि उन्हें अपने इस कदम से आत्मिक शांति मिली है।

पिछड़े गांव की भावना बनी टेलीविजन सेलीब्रिटी

- जमुनिया में मुख्य भूमिका निभा रही भावना खत्री है पिथौरागढ़ की बेटी - बचपन से अभिनय की दुनिया में नाम कमाना चाहती थी PAHAR1-: उत्तराखंड के सीमान्त जिले पिथौरागढ़ के सुदूरवर्ती अस्कोट से तीन किमी की पैदल दूरी पर स्थित दयाकोट नाम का छोटा सा गांव। गांव के दक्षिणी छोर पर अलग-थलग पुराना सा एक पहाड़ी मकान, जिसे देखकर कोई नहीं कह सकता कि यहां पर बेहद गरीब परिवार में जन्मा एक व्यक्ति भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर आसीन होगा। और अब उसकी बेटी टेलीविजन जगत की मशहूर सेलिब्रिटी बन गई है। आजकल इमेजिन चैनल पर प्रसारित हो रहे 'जमुनियाÓ धारावाहिक में जमुनिया की मुख्य भूमिका निभा रही भावना खत्री इसी गांव और इसी मकान की वंशज है। आजादी के छह दशक बाद भी लगभग समस्त सुविधाओं से महरूम दयाकोट गांव के स्व.खुशाल सिंह के बड़े पुत्र रुद्र सिंह खत्री 7 आसाम रेजीमेंट में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर कार्यरत हैं। उनकी दो पुत्रियां हैं- बड़ी भावना उर्फ मोना और छोटी मेघा। पिता भावना को गे्रजुएशन के बाद एयर होस्टेस बनाना चाहते थे, जिसके लिये उन्होंने उसे एयर होस्टेस का कोर्स भी कराया। वहींभावना अभिनय की दुनिया में नाम कमाना चाहती थी। मां शकुंतला ने भी बेटी की रुचि को देखते हुए उसे अभिनय के क्षेत्र में आगे बढऩे के लिये प्रोत्साहित किया। कहते हैं कि जहां चाह वहां राह। भावना की मेहनत और लगन का ही नतीजा रहा कि उसे पहले बालाजी टेलीविजन के बैनर तले 'ख्वाहिशेंÓ सीरियल और बाद में 'किस देश में है मेरा दिलÓ और अब इमेजिन चैनल के प्रसिद्ध धारावाहिक 'जमुनियाÓ में अपने अभिनय का जादू बिखरने का मौका मिला है। भावना की इस उपलब्धि से उसके माता-पिता एवं बहन के अलावा गांव के पैतृक मकान में निवास कर रहे उसके चाचा नेत्र सिंह, चाची सावित्री और चचेरी बहन बेहद खुश हैं। इसी के साथ पूरा अस्कोट क्षेत्र भी अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। सफलता को कर्मों का फल मानती है भावना अस्कोट: जमुनिया यानि भावना खत्री का कहना है कि प्रतिभा सभी के पास होती है, परन्तु उसे दिखाने का अवसर बिरलों को ही मिलता है। अपने को मिले अवसर को वह अपने मां-बाप के अच्छे कर्मों का फल बताती है। दूरभाष पर भावना ने बताया कि उत्तराखंड का पर्यावरण बेहद शुद्ध है। अपने गृह क्षेत्र में नहीं आ पाने का खासा मलाल रहता है। उसने बताया कि वह नवम्बर-दिसम्बर माह में अपने गृह क्षेत्र अस्कोट आएगी।

Sunday, 21 March 2010

जिनसे खेला करते थे भीम

-आकृति में छोटे पर उठाने में छूटते हैं पसीने -महासू मंदिर हनोल प्रांगण की शोभा बढ़ा रहे पाण्डु पुत्र भीम की बालक्रीड़ा के प्रतीक सीसे के दो गोले लोक मान्यता: ताकत का घमंड दिखाने पर नहीं उठाए जाते स्थानीय मेलों के दौरान क्षेत्र के लोग गोलों पर आजमाते हैं ताकत PAHAR1-आकृति गोल और दिखने में छोटे। देहरादून जिले के हनोल स्थित महासू मंदिर परिसर में रखे सीसे के दो गोले पाण्डु पुत्र भीम की ताकत का एहसास कराते हैं। लोक मान्यता है कि भीम बालकपन में इन गोलों को कंचे (गिटिया) के रूप में इस्तेमाल किया करते थे। गोलों को देखकर कोई भी कह देगा कि इन्हें आसानी से उठाया जा सकता है, पर उठाने में अच्छे से अच्छे बलशालियों के पसीने छूट जाते हैं। समय बदला और लोगों का नजरिया भी। ऐतिहासिक महत्व की यह धरोहर आज ताकत परखने का जरिया भर रह गई है। देहरादून जनपद के जौनसार-बावर क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक स्थल महासू मंदिर के प्रांगण में रखे सीसे के दोनों गोलों का धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व है। किवंदति है कि द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडव हनोल, चकराता व लाखामंडल आदि स्थलों पर ठहरे। लोक मान्यता है कि हनोल स्थित महासू मंदिर परिसर में रखे सीसे के दोनों गोलों से बचपन में पाण्डु पुत्र भीम खेला करते थे। आकृति में छोटे दिखने वाले इन गोलों का वजन छह और नौ मण है यानि ढाई से साढ़े तीन कुंतल। देखकर ऐसा ही लगता है मानों हर कोई इन्हें आसानी से उठा लेगा, लेकिन इन्हें उठाने में अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। सैलानियों के आकर्षण का केंद्र इन गोलों पर क्षेत्र के लोग स्थानीय मेलों के दौरान ताकत आजमाते हैं। सैलानी क्या, श्रद्धालु क्या, मंदिर में आने वाला हर शख्स इन गोलों को कंधों पर उठाने का भरसक प्रयास करता है। कुछ कामयाब होते हैं तो कुछ निराश। गोलों के वजन का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कंधें पर उठाने के बाद फेंकने पर जमीन में चार से पांच इंच तक गहरा गड्ढा हो जाता है। लोक मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति ताकत के घमंड में गोलों को कंधों पर उठाने का दावा करता है तो उसकी ताकत गोलों को छूते ही काफूर हो जाती है, पर श्रद्धापूर्वक उठाने पर गोलों को आसानी से उठाया जा सकता है। मंदिर में बिस्सू व जागड़ा पर्व के दौरान सैकड़ों लोग गोलों को कंधे पर उठाने का प्रयास करते हैं। मंदिर प्रांगण में रखे इन गोलों को देख ऐसा लगता है, मानों भारतीय पुरातत्व विभाग के लिए इनका कोई खास महत्व नहीं है। मंदिर में कई पीढिय़ों से देवता की सेवा कर रहे कारसेवकों व श्रद्धालुओं के लिए इन गोलों को विशेष महत्व देते हैं। शायद यही वजह है कि वर्षों से प्रांगण में रखी ये प्राचीन धरोहर आज तक सुरक्षित है।

अर्थ आवर डे पर जगमगाएंगे पहाड़

27 की रात हिमाचल और उत्तराखंड के सीमांत जिलों के हजारों गांवो में जलेंगी मशालें भैलो (पहाड़ी इलाकों में दीवाली मनाने का स्थानीय तरीका) खेला जाएगा। -गांवों के हजारों लोग लेंगे वनो को आग से बचाने का संकल्प PAHAR1-सत्ताइस मार्च का दिन पहाड़ों के लिए कुछ खास होगा। इस दिन जहां द़निया के शहर एक घंटे के लिए अपने घर, दफ्तर अथवा संस्थान में बत्तियां बंद रखेंगे, वहीं पहाड़ रोशनी से जगमगा रहे होंगे। हिमाचल और उत्तराखंड के गांवों में अर्थ आवर डे पर दीये रोशन किए जाएंगे और भैलो (पहाड़ी इलाकों में दीवाली मनाने का स्थानीय तरीका) खेला जाएगा। यह अनूठी पहल की है पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रहे मैती आंदोलन के संस्थापक व उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के वैज्ञानिक कल्याण सिंह रावत ने। इस विशेष आयोजन का उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रो को पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक करना तो है ही, साथ ही दुनिया का ध्यान हिमालय के पारिस्थितिकीय तंत्र की ओर आकर्षित करना भी है। इसीलिए अर्थ आवर डे को स्थानीय पुट देकर आयोजित किया जा रहा है। बता दें कि दीवाली के वक्त एकादशी को समूचे उत्तराखंड व नेपाल में भैलो त्योहार मनाया जाता है। इसमें रात को लोग मशालें लेकर भैलो, भैलो करते हुए लोकगीतों के साथ नृत्य करते हैैं। श्री रावत ने बताया कि इस मौके पर गांवों के लोग वनो को आग से बचाने का संकल्प भी लेंगे। उन्होंने बताया कि इस आयोजन में उत्तराखंड के दो हजार से ज्यादा गांव भाग लेंगे। पिथौरागढ़ के गुंजी व अस्कोट से लेकर उत्तरकाशी के सरनोल-बडियार व आराकोट तक के गांवों को प्रकाशोत्सव से जोड़ा गया है। हिमाचल प्रदेश में शिमला विश्वविद्याल.य के इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटेड हिमालयन स्टडीज के डॉ. रान्टा व आकाश दीप संस्था ने भी इस कार्यक्रम को लाहौल स्पीति व किन्नौर जिले के सीमांत गांवों में प्रकाशोत्सव मनाने का फैसला लिया। रैणी गांव में चिपको उत्सव देहरादून: मैती आंदोलन चिपको आंदोलन की सूत्रधार गौरादेवी की याद में 26 मार्च को चमोली के रैणी गांव में चिपको उत्सव आयोजित करेगा। पर्यावरण संरक्षण को समर्पित मैती आंदोलन के संस्थापक कल्याण सिंह रावत ने बताया कि 26 मार्च 1974 को गौरादेवी ने रैणी से चिपको आंदोलन की शुरुआत की थी। इसमें सीमांत क्षेत्रों के गांवों के मैती संगठन हिस्सा लेंगे

Saturday, 20 March 2010

पहाड़ की तकदीर बदल सकता है कम्युनिटी बेस्ट टूरिज्म

-जीबी पंत संस्थान ने भी गढ़वाल क्षेत्र के त्रिजुगीनारायण एवं सिरसी गांवों में इस सेवा को शुरु करने की पहल पहाड़1- पलायन के चलते एक-एक कर खाली हो रहे प्रदेश के पर्वतीय गांवों लिए कम्युनिटी बेस्ट टूरिज्म एक नई उम्मीद लेकर आया है । इसके जरिये स्थानीय लोग अपने घरों की ओर लौट रहे हैैं बल्कि देश विदेश के पर्यटकों को होम स्टे एकमोडेशन उपलब्ध करा कर आर्थिकी का जरिया भी बना रहे हैैं । कुमाऊं के विसर क्षेत्र में विलेज वे द्वारा शुरु की गई होम स्टे एकमोडेशन स्कीम के बाद अब जीबी पंत संस्थान ने भी गढ़वाल क्षेत्र के त्रिजुगीनारायण एवं सिरसी गांवों में इस सेवा को शुरु करने की पहल की हैैं । इसके तहत स्थानीय स्थानीय लोग देश-विदेश से आये पर्यटकों को उचित दरों अपने घरों में ठहरने की व्यवस्था करते हैैं और वर्षो से खाली पड़े ये पारंपरिक घर उनकी आर्थिकी का जरिया बनते हैैं। गोविंद वल्लभ पंत पर्यावरण विकास संस्थान की गढ़वाल इकाई के अभय ने बताया कि विलेज वे के द्वारा कुमाऊं में चलाई गई इस स्कीम की सफलता के बाद उनके संस्थान ने भी गढवाल में यह सेवा शुरु करने की पहल की है । इस स्कीम के तहत पहले चरण में त्रिजुगीनारायण एवं सिरसी गांवों में इस सेवा को शुरु करने की पहल की हैैं। तथा इन घरों के लोगों को प्रशिक्षित किया जा रहा हैैं। खूब हो रही है कमाई- कुमाऊ के विसर क्षेत्र में जिन गावों में विलेज के द्वारा होम स्टे स्कीम चलाई गई हैैं वहां पर ग्र्रामीण टूरिस्ट से एक रात स्टे के एक हजार से पंद्रह सौ रुपये तक लेते है । विसर क्षेत्र के ग्र्रामीणों ने विदेशों से भी सीधी बुकिंग शुरु कर दी है ।

उत्तराखंड लोक सेवा आयोग द्वारा 22 नवम्बर २००९- के परिणाम १३ मार्च २०१० को जारी

उत्तराखंड लोक सेवा आयोग द्वारा 22 नवम्बर 2009 को आयोजित उत्तराखंड सचिवालय लोक सेवा आयोग समीक्षा अधिकारी ,सहायक समीक्षा अधिकारी (प्रा.) परीक्षा 2007 के परिणाम के आधार पर 3507 अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा के लिए चयनित किया गया है । परिणाम को आयोग की वेबसाइट पर देख सकते है । -www. gov.ua.nic.in/ukpsc/

अब आकाश मार्ग से कीजिए महाकुंभ के शहर के दर्शन

उत्तराखंड हेली सर्विस ने शुरू की हरिद्वार से सेवा -कुंभ दर्शन को खर्च करने होंगे 2999 रुपये -अखाड़ा परिषद अध्यक्ष ने उड़ान भर की शुरुआत -पवन हंस हेलीकॉप्टर की सात सेवाएं होंगी संचालित pahar1- अब आकाश मार्ग से महाकुंभ के शहर के दर्शन हो सकेंगे। तीर्थनगरी से आज सस्ती दरों पर हेलीकॉप्टर सेवा की शुरुआत हुई। कुंभ दर्शन के लिए केवल 2999 रुपये प्रति यात्री खर्च करने होंगे। अभी एक हेलीकॉप्टर से शुरू हुई सेवा सात हेलीकाप्टर तक पहुंचेगी। विशेष बात यह है कि हेलीकाप्टर के सभी यात्रियों का बीमा होगा। इस सेवा के लिए उत्तराखंड हेली सर्विस ने पवन हंस के साथ अनुबंध किया है। पवन हंस के हेलीकाप्टर ने पहली उड़ान वैरागी कैंप से तकरीबन दोपहर 12.25 बजे भरी। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्री महंत ज्ञानदास ने विधिवत इसका उद्घाटन किया और पहली उड़ान में आकाश मार्ग से कुंभनगरी के दर्शन किये। उन्होंने सर्विस के चेयरमैन अजय मगन को इस शुभ अवसर पर बधाई देते हुए कहा कि यह सेवा महीने भर पहले ही शुरू हो जानी चाहिए थी। चलिए देर से ही सही, एक अच्छी सेवा का श्रीगणेश हुआ है। उन्होंने बताया कि आकाश मार्ग से कुंभ के मनोरम और बेहतरीन दृश्य को निहारने का इतने कम धन में अवसर देना सराहनीय है। उत्तराखंड हेली सर्विस के चेयरमैन डा. अजय मगन ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि पवन हंस के सात हेलीकाप्टर उड़ान भरेंगे। शुरुआत एक हेलीकाप्टर से कर दी गई है। उन्होंने बताया कि हेलीकाप्टर वेल 407 अत्याधुनिक और सुरक्षित है। वेबसाइट पर इस संबंध में पूरी जानकारी उपलब्ध है। टिकट बिक्री के लिए हरिद्वार में कई केन्द्र बनाए गए हैं। उन्होंने बताया कि कुंभ दर्शन के लिए एक यात्री को सिर्फ 2999 रुपये खर्च करने होंगे। कुंभ दर्शन, हरिद्वार और गंगा दर्शन के लिए 4975, कुंभ परिक्रमा (कुंभ, गंगा दर्शन, हरिद्वार, ऋषिकेश से लक्ष्मण झूला) 8490, गंगा अवतरण यानि देवप्रयाग जहां से गंगा निकलती है का दृश्य देखने के लिए 12850 रुपये खर्च करने होंगे। इस अवसर पर आह्वïान अखाड़े के श्री महंत शिव शंकर गिरी ने भी उड़ान भरकर अपनी शुभकामनाएं दीं। केवल एक घंटे में पहुंचेंगे दिल्ली हरिद्वार: यदि आप चार्टर हेलीकाप्टर से हवाई यात्रा करना चाहते हैं तो वह भी अब हरिद्वार से उपलब्ध होगा। फिलहाल यह सेवा हरिद्वार से दिल्ली के लिए शुरू की गई है। चार्टर हेलीकाप्टर केवल एक घंटे में आपको दिल्ली पहुंचा देगा।

Thursday, 18 March 2010

ये जिंदगी के मेले...

जिंदगी भी क्या है, बचपन से लेकर बुढ़ापे तक भाग-भागम, पहले अपने पैरों पर चलने की जल्दी में घुटने छिलवाए. किसी तरह चलना शुरू किया तो घर की चौखट लांघने की जल्दी. थोड़ा आगे बढ़े तो स्कूल में एडमिशन की भाग-दौड शुरू. ले देकर मम्मी डैडी ने एडमिशन करा दिया तो क्लास में आगे निकलने की होड़. हाय जिंदगी की मारमारी छुटपन से ही शुरू. आगे निकलो, आगे निकलो, कहां से आगे निकलो, हर तरफ तो जाम ही जाम है. क्लास में जाम. घर पर जाम, सड़क पर जाम. खेल के मैदान में जाम. कोई आगे ही नहीं बढ़ रहा है तो हम कैसे आगे बढ़े. बस भाग रहे चक्कर घिन्नी बने. जिनसे आगे निकलना है, उनका तो पता ही नहीं वह कहां तक पहुंच चुके है. किसी तरह घिसटते हुए स्कूल से बाहर निकले तो पता चला, अभी तो वही पर है, जहां से चले थे. एक बार फिर दौड़ शुरू हुई कॉलेज, इंस्टीट्यूट में एडमिशन कराने की, शायद यहां पर जिंदगी में ठहराव आ जाए, शायद यहां से सबसे आगे निकलने का रास्ता मिल जाए. पर किस्मत यहां भी दगा दे गई. मां-बाप के पैसों की पॉवर से चार-पांच साल और मिल गए, अपनी जिंदगी की फिनिशिंग के लिए. लगा अब तो ऐश के दिन ही आ गए समझो. कुछ समय बाद पता चला कि बेटा अभी आराम कहां है. असली भाग-दौड़ के दिन शुरू भी नहीं हुए. जब एक अदद नौकरी के लिए एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस, एक शहर से दूसरे शहर, इस स्टेट से उस स्टेट. इतनी भाग दौड़ में अपने कब कहां छूट गए, पता ही नहीं चला. नौकरी की लाइन में खड़े होने की जगह भी नहीं मिल पाई. अपने तो कब के पराए हो गए पता ही नहीं चला. फिर बेहताशा, कभी इधर, कभी उधर बस भागे चले जा रहे है. जाना कहां है, यह तो अभी तक तय नहीं हो पाया है. किसी तरह दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हुआ तो वह भी सुकून से नहीं खा पाते. सुबह घर से निकल कर काम पर जाने की जल्दी, शाम को घर पहुंचने की जल्दी के बीच पता ही नहीं चलता, हम किससे पीछे है और किससे आगे. ऐसे में अपडेट क्या खाक होगे. वक्त मिले तो कुछ करें भी, आजकल की बात ही है जिस देखो, वह कह रहा है हॉकी में तो नाक ही कट गई. वहां भी क्या कम भाग-दौड़ थी, इंडियन प्लेयर्स को भगा-भगा कर ऐसा पीटा कि वह भी जल्दी से हॉकी का नाम नहीं लेगे, हमें तो क्या याद रहेगा, थोड़ा बहुत याद आता तो उधर आईपीएल आ धमका. उसमें भी वही भाग-दौड़ पहले पांच दिन से 100 ओवर तक और अब सिर्फ 40 ओवर में ही पूरा मैच. पैसा कमाने की होड़ में जेंटलमैन गेम्स का नाश. क्या क्या याद करें, ठीक से याद भी रहा. सब कुछ भूल सा गए है. अपना बचपन, अपना घर, अपना मौहल्ला, अपना शहर, चाय की दुकान, अपनी रोज शाम की दोस्तों के साथ महफिले (भले ही लोकल लेबल की थी). मेहनत करके अपने शरीर को क्यों खराब करें. पहले कम से कम पढ़ तो लेते ही थे, पर तो हमारी सरकार ने पढ़वाने के नाम पर ही कह दिया किसी को फेल ही नहीं किया जाएगा. अब पास-फेल से क्या डरना, जब फेल ही नहीं होना. अब आने वाले कुछ समय में हमे भागदौड़ से मुक्ति मिल जाएगी, क्योंकि जिस स्पीड से दुनिया आगे बढ़ रही है और हर काम टच करते ही हो जाता है. तो भला फिर क्यों भागना. चलो अब लिखना खत्म करता हूं, अभी बहुत काम बचा है और फिर मुझे भी घर भागना है. 'लेखक हरीश भट्टï, यूं तो आई-नेक्स्ट देहरादून में ले-आउट आर्टिस्ट है. लेकिन लिखने-पढऩे का शौक भी कही दिल में रखते है. क्वार्क, कोरल, फोटोशॉप की दुनिया से जब भी फुरसत मिलती है, हरीश के अंदर का लेखक मौका देखकर चौका मार जाता है. ये चौका कुछ ऐसे ही फुरसत के लम्हों में लगा है.

-542 इकाइयों पर मंडराया खतरा

-औद्योगिक पैकेज पर 'ब्रेकÓ से बढ़ा खतरा -31 मार्च तक उत्पादन शुरू करने वाली इकाइयों को ही मिलेगी करों में छूट -लक्ष्य से काफी पीछे है राज्य के पांचोंं औद्योगिक आस्थान Pahar1-31 मार्च का दिन सरकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के लिए भले ही राज्य के लिए शुभ रहे, लेकिन औद्योगिक दृष्टि से यह दिन बुरा ही रहेगा। औद्योगिक पैकेज पर केन्द्र का रहमोकरम न होने पर राज्य से करोड़ों का निवेश हाथ से चला जायेगा, साथ ही 542 इकाइयां भी अपना दूसरा ठिकाना खोज सकती हंै, क्योंकि राज्य के पांचों औद्योगिक आस्थान लक्ष्य से काफी पीछे चल रहे हैैं। वर्ष 2000 में जन्मे उत्तराखंड राज्य के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विशेष राज्य का दर्जा दिया था। इसके तहत वर्ष 2013 तक औद्योगिक पैकेज घोषित किया गया था। पैकेज में निर्धारित अवधि में स्थापित होने वाली औद्योगिक इकाइयों के लिए करों में छूट मिलने का प्रावधान है लेकिन केन्द्र में सत्तासीन यूपीए सरकार ने पैकेज की अवधि 2013 से घटाकर 2010 कर दी है। यानि पैकेज की अवधि 14 दिनों बाद 31 मार्च 2010 को खत्म हो रही है। औद्योगिक पैकेज का लाभ लेने के लिए राज्य सरकार ने अपने स्तर से उत्तराखंड के पंतनगर, हरिद्वार, फार्मा सिटी (देहरादून) कोटद्वार, आईटी पार्क देहरादून व सितारगंज में औद्योगिक आस्थान स्थापित किये। इनमें 1465 औद्योगिक इकाइयों स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। राज्य के लिए इसके सकारात्मक परिणाम भी मिले। टाटा, बजाज, ब्रिटानिया, अशोक लेलैैंड, डाबर सहित देश के नामी औद्योगिक घरानों ने उत्तराखंड की ओर रुझान बढ़ाया और अपनी इकाइयां स्थापित की। इससे राज्य की बेरोजगारी के जख्म को भी काफी मरहम लगा। औद्योगिक इकाइयों के बारे में शासन स्तर पर एकत्र 15 फरवरी की रिपोर्ट के मुताबिक पांचों आस्थानों में 294 एकड़ भूमि रिक्त पड़ी है। 1465 औद्योगिक इकाइयों में 733 इकाइयां लग चुकी हैैं जबकि 542 इकाइयां निर्माणाधीन हैं। सूत्रों के मुताबिक 15631 करोड़ निवेश हो चुका है और करीब एक लाख 56 हजार बेरोजगारों को नौकरी मिल चुकी है जबकि प्रस्तावित इकाइयों में उत्पादन शुरू होने के बाद यह संख्या दो गुनी होने की संभावना है। जानकारों का मानना है कि 31 मार्च तक चंद इकाइयां ही उत्पादन शुरू करने में कामयाब हो सकेंगी। लिहाजा बाकी के लिए छूट का लाभ नहीं मिल सकेगा। ऐसे में उद्योगपति यहां उत्पादन शुरू करने का निर्णय बदल भी सकते हैैं। --- औद्योगिक पैकेज की अवधि बढ़ाने के लिए बृहद स्तर पर प्रयास किये जा रहे हैैं। खुद मुख्यमंत्री कांग्रेस के राज्य से निर्वाचित पांचों सांसदों के साथ प्रधानमंत्री से मिल चुके हैैं। इसके अलावा भी सरकार पैकेज की अवधि बढ़ाने अन्य स्तर से कोशिश कर रही है। बंशीधर भगत, परिवहन मंत्री, उत्तराखंड

ऐतिहासिक चैती मेला शुरू

मां बाल सुंदरी मंदिर में पूजा-अर्चना व ध्वजारोहण के साथ हुआ शुभारंभ - प्रथम नवरात्र में पूजा को उमड़े श्रद्धालु काशीपुर में ऐतिहासिक चैती मेले के शुभारंभ पर मां बाल सुंदरी देवी मंदिर में पूजा अर्चना करते व ध्वजा फहराते अतिथि राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष सुखदेव सिंह नामधारी। , काशीपुर pahar1-मां बाल सुंदरी देवी मंदिर (उज्जैनी शक्तिपीठ) में विधिवत पूजा अर्चना व ध्वजा फहराने के साथ ही मंगलवार को चैत्र नवरात्र के पहले दिन ऐतिहासिक चैती मेला शुरू हो गया। श्रद्धालु सुबह से ही मंदिर में पूजा अर्चना को उमडऩे लगे। मंगलवार को चैती मेला परिसर में मां बाल सुंदरी देवी मंदिर में पुरोहित दयाशंकर जोशी ने विधिवत पूजा-अर्चना करायी। इसके उपरांत अतिथि राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष सुखदेव सिंह नामधारी, प्रधान पंडा वंश गोपाल अग्निहोत्री आदि ने ध्वजा फहरा कर मेले का शुभारंभ किया। मंगलवार सुबह से ही मां बालसुंदरी मंदिर में श्रद्धालु पूजा अर्चना को पहुंचने शुरू हो गए। मेला परिसर में भी खासी गहमा-गहमी शुरू हो गई। उधर 23 मार्च की तड़के नगर मंदिर से मां बालसुंदरी का डोला आने के साथ ही मेले में रौनक बढ़ जाएगी। वहीं व्यापारियों तेजी से दुकानें लगानी शुरू कर दी हैं।

नदियां कहेंगी, आजा मेरे पास

-गुजरात की साबरमती नदी की तर्ज पर उत्तराखंड की नदियों की सूरत संवारेगा सिंचाई विभाग -सर्वे कर गुजरात से लौटे अधिकारी -गौला, कोसी व ढेला समेत छह नदियां चिह्नित हल्द्वानी: pahar1- जी हां, जो नदियां अब तक कहर ढाती रही हैैं, वे अब आपको आकर्षित करेंगी। सिंचाई विभाग रिवर फ्रंट डवलेपमेंट प्रोजेक्ट के तहत उत्तराखंड की प्रमुख नदियों की सूरत संवारने की तैयारी कर रहा है। इनकी साज-सज्जा गुजरात की साबरमती नदी की तर्ज पर की जाएगी। इसके लिए विभागीय अधिकारियों का एक दल गुजरात का दौरा भी कर आया है। नदी-नहरों का प्रदेश कहलाने वाले उत्तराखंड में नदियां और नहरें लोगों की जान-माल के लिए खतरा बनती जा रही हैैं। बरसात के मौसम में इनमें आने वाली बाढ़ भारी तबाही मचाती। इस स्थिति से निपटने के लिए सिंचाई विभाग ने रिवर फ्रंट डवलेपमेंट प्रोजेक्ट तैयार किया है। इसके तहत सिंचाई विभाग नदियों को सुंदर और सुरक्षित बनाने जा रहा है। इसके लिए सिंचाई विभागाध्यक्ष एबी पाठक ने छह अधिकारियों का एक दल साबरमती नदी के निरीक्षण और उसको आकर्षक बनाने के लिए किए गये जतन की जानकारी लेने गुजरात भेजा था, जो वापस लौट आया है। श्री पाठक ने बताया कि साबरमती नदी की तर्ज पर ही राज्य की नदियों का सौैंदर्यीकरण किया जाएगा। इसके लिए फिलहाल छह नदियों का चयन किया गया है। कुमाऊं में गौलानदी का काठगोदाम से लेकर किच्छा तक (35 किलोमीटर), कोसी नदी का रामनगर से बाजपुर तक (12 किमी) तथा ढेला नदी का काशीपुर से मुरादाबाद सीमा तक सौैंदर्यीकरण किया जाएगा। इसी तरह गढ़वाल में देहरादून शहर के बीच से होकर गुजरने वाली बिंदाल नदी (13 किमी) तथा सौैंग और रिस्पना नदियों का करीब 20 किलोमीटर तक सौंदर्यीकरण किया जाएगा। श्री पाठक ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के तहत नदियों के दोनों तटों को पक्का बनाने के साथ ही दोनों ओर टू-लेन मार्ग बनाया जायेगा। इससे जहां नदियों में आने वाली बाढ़ से होने वाली भूमि कटाव की समस्या खत्म होगी, वहीं आबादी भी सुरक्षित रहेगी। इसके अलावा नदियों के किनारे बनने वाली टू-लेन सड़कों के किनारे-किनारे विभिन्न किस्मों के पेड़-पौधे व फूल लगाए जाएंगे ताकि लोग प्राकृतिक सुंदरता का आनंद उठा सकें। इसके लिए विभागीय इंजीनियर प्रोजेक्ट तैयार कर रहे हैैं।

-संघर्ष ने भरी सफलता की 'उड़ान

महिलाओं को सेना में स्थान दिलाने में दून की विंग कमांडर अनुपमा जोशी रही हैं संघर्ष की सूत्रधार सबसे पहले विंग कमांडर जोशी ने उठायी थी सेना में महिलाओं के अधिकार की आवाज Pahar1- वायुसेना में शुरुआती पांच साल के कैरियर में उनके प्रदर्शन को सभी ने सराहा। अधिकारियों ने उनकी खूब तारीफ की। मेडल दिए गए और सर्टिफिकेट भी। साथ ही एक झटका भी। उन्हें कहा गया कि वह अब आगे काम नहीं कर सकती। मन ही मन सोचा जब मैं पुरुषों से बेहतर कर सकती हूं तो फिर आगे बढऩे से क्यों रोका जा रहा है। आला अधिकारियों से लेकर चीफ तक से इस पर प्रश्न पूछा, लेकिन जवाब किसी ने नहीं दिया। अंत में हाईकोर्ट के शरण ली। रिटायरमेंट के बाद थकी नहीं, अपने संघर्ष को जारी रखा। नतीजा आज सेना में काम करने वाली महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन देने के रूप में सामने आया। इस नतीजे से वह बहुत खुश हैं। वे इसे महिला अधिकारों की जीत मानती हैं। उन्हें उम्मीद है कि महिलाओं को अब कांबेट ट्रेनिंग में भी लिया जा सकेगा। बात हो रही है देहरादून में रहने वाली विंग कमांडर अनुपमा जोशी की। जिन्होंने सेना में रहते हुए महिला अधिकारियों के अधिकार की आवाज बुलंद की और अपने संघर्ष को अंजाम तक पहुंचाया। अनुपमा जोशी का 1992 में एयर फोर्स में पहली महिला अधिकारी के रूप में चयन हुआ। इसके बाद वह अपनी मेहनत और जज्बे के बल पर आगे बढ़ती रही। पहले पांच साल की सर्विस के बाद उन्होंने आवाज उठाई तो उन्हें तीन साल और फिर तीन साल का एक्सटेंशन मिला। हर बार टुकड़ों में मिल रहे एक्सटेंशन से वह खिन्न आ गई। उन्होंने 2002 में इसके लिए अपने सीनियर अधिकारियों से लिखित में जवाब मांगा। यहां से कोई जवाब न मिलने पर चीफ को पत्र लिखकर जवाब मांगा। कहीं से कोई जवाब नहीं आया तो फिर उन्होंने इसके लिए कोर्ट में मुकदमा करने की ठान ली। 2006 में उन्होंने अन्य महिला अधिकारी के साथ कोर्ट में याचिका दर्ज की। ऐसा करने वाली वह पहली महिला अधिकारी थी। कोर्ट ने इस केस की सुनवाई में नई भर्तियों को स्थायी कमीशन देने का फैसला दिया, लेकिन सर्विंग महिला अधिकारियों का फैसला नहीं हो पाया। 2008 में वह रिटायर हो गई लेकिन उनका संघर्ष जारी रहा। इस बीच कुछ अन्य अधिकारियों ने भी सेना में तैनात महिलाओं को स्थायी कमीशन देने को मुकदमा दायर किया। इस पर हाईकोर्ट ने एक संयुक्त सुनवाई ने महिला अधिकारियों के पक्ष में अपना निर्णय सुनाया है। विंग कमांडर जोशी कहती हैं कि इस फैसले से वह बहुत खुश हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि महिलाओं को अब कांबेट ट्रेनिंग में भी भर्ती किया जाएगा। दोबारा कर सकती हैं सेवा विंग कमांडर जोशी दुबारा वायुसेना को अपनी सेवाएं दे सकती हैं। विंग कमांडर अनुपमा जोशी कहती हैं कि कोर्ट ने याचिका में शामिल महिला अधिकारियों की सर्विस कंटीन्यू करने की बात कही हैं। ऐसे में उन्हें उम्मीद है कि दुबारा अपनी सेवाएं देने का मौका मिल सकता है।

कोई लौटा दे वो बीते हुए दिन...

-देश-विदेश में तूती थी लैंसडौन वनप्रभाग के 'खैरÓ से बने कत्था -आज प्रभाग में गिनती के ही रह गए हैं 'खैरÓ के पेड़ लैंसडौन pahar1- एक समय था जब लैंसडौन वन प्रभाग के जंगल 'बांसÓ व 'खैरÓ से अटे पड़े थे। प्रभाग में होने वाले 'खैरÓ से बने कत्था की देश ही नहीं, विदेशों में भी तूती थी, लेकिन, आज स्थितियां पूरी तरह जुदा हैं। हालात यह है कि आज लैंसडौन वन प्रभाग में 'खैरÓ सिर्फ नाम के लिए रह गया है, उस पर भी तस्करों की नजरें लगी हुई हैं। लैंसडौन वनप्रभाग का 'बांसÓ जहां देश-विदेश में ख्याति प्राप्त था, वहीं प्रभाग के जंगलों में होने वाले 'खैरÓ की भी खास पहचान थी। दरअसल, प्रभाग के जंगलों में होने वाले 'खैरÓ से बने 'कत्थाÓ की हिंदुस्तान ही नहीं, तमाम मुस्लिम देशों में भारी मांग थी। स्थिति यह थी के 'खैरÓ के पेड़ों की बोली लगती थी व ठेकेदार पेड़ों को काटकर जंगलों में ही कत्था बनाने के लिए बड़ी-बड़ी भट्ठियां लगा देते थे, जहां मजदूर पेड़ों का चिरान कर उससे कत्था निकालते थे। चालीस के दशक के बाद लैंसडौन वन प्रभाग के 'खैरÓ पर तस्करों की नजर लग गई। दरअसल, इस दौरान नजीबाबाद व आसपास के क्षेत्रों में कत्था फैक्ट्रियां लगनी शुरू हुई व कुछ ही समय में दर्जनों कत्था फैक्ट्रियां वजूद में आ गईं। बड़ी संख्या में फैक्ट्रियां लगने से कत्थे की मांग बढ़ी, तो 'खैरÓ की तस्करी होने लगी। वर्ष 1976 में वन विकास निगम का गठन होते ही 'खैरÓ के कटान व विपणन की जिम्मेदारी निगम पर आ गई। इसके बाद इसकी कीमतें आसमान छूने लगी। इसके साथ ही 'खैरÓ का अवैध पातन भी यकायक बढ़ गया। उस दौर में 'कत्था सरदारÓ के नाम से क्षेत्र में सक्रिय रहा 'खैरÓ तस्कर आज भी कोटद्वार व आसपास के क्षेत्र में लोगों के जुबां पर बसा है। हालांकि, 'खैरÓ की बढ़ती तस्करी को देखते हुए शासन ने कड़े नियम बनाए, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी और अधिकांश जंगल खैरविहीन होते चले गए। आज स्थिति यह है कि लैंसडौन वन प्रभाग के जो जंगल 'खैरÓ से भरे पड़े थे, आज वहां गिनती के पेड़ रह गए हैं व उन पर भी वन तस्करों की निगाहें लगी हुई हैं। पूर्व वनाधिकारी बीबीएस रावत भी मानते हैं कि प्रभाग में 'खैरÓ कम होने की मुख्य वजह अवैध पातन रही। उन्होंने बताया कि इस अवैध पातन में कहीं न कहीं विभागीय कर्मचारियों की कथित मिलीभगत भी होती थी। श्री रावत की मानें, तो अब खैर के दाम अधिक होने के कारण कत्था फैक्ट्री स्वामी अब कत्था बनाने के लिए 'गैविनÓ नामक कैमिकल का प्रयोग करने लगे है, जिससे खैर की तस्करी कम हो गई है। लैंसडौन वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी नरेंद्र सिंह चौधरी ने भी स्वीकारा कि पूर्व में लैंसडौन वन प्रभाग में 'खैरÓ के जंगलों में भारी अवैध पातन हुआ। नतीजतन, आज 'खैरÓ सीमित क्षेत्र में सिमट कर रह गया है। उन्होंने बताया कि प्रभाग में प्राथमिकता के आधार पर बंजर भूमि में खैर का रोपण किया जा रहा है, ताकि खैर के जंगल वापस लौट सकें।

बर्फीला बियाबान ले रहा शौकीनों की जान

-कालिंदी पास बदरीनाथ ट्रैक पर हर साल साहसिक पर्यटन को पहुंचते हैं पर्यटक -ट्रैक पर संचार माध्यमों का अभाव व सुरक्षा के नहीं रहते पर्याप्त इंतजाम -निजी ट्रैकिंग कंपनियां रख देती हैं जरूरी नियमों को ताक पर -प्रतिवर्ष ट्रैकर्स खराब मौसम में गंवा बैठते हैं जान Pahar1- उत्तरकाशी रोमांच और साहसिक पर्यटन के शौकीनों को उत्तराखंड के जोखिमभरे उच्च हिमालयी ट्रैक आकर्षित करते आए हैं। राज्य के प्रमुख ट्रैकरूट में शामिल उत्तरकाशी का कालिंदी पास बदरीनाथ ट्रैक पथारोहियों के बीच काफी लोकप्रिय है। हर साल सैकड़ों ट्रैकर इस रूट पर एडवेंचर टूरिज्म को पहुंचते हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं की कमी और राहत- बचाव के लचर इंतजामों के चलते यह बर्फीला बियाबान हर साल कई पर्यटकों की जान लील जाता है। पथारोहियों की खास पसंद बनता जा रहा कालिंदी पास बदरीनाथ ट्रैक करीब 106 किमी लंबा है, जिसमें ट्रैकिंग दल गंगोत्री से भोजवासा, गोमुख, नंदनवन, वासुकिताल, खड़ा पत्थर आदि पड़ावों के बाद कालिंदी बेस तक पहुंचते हैं। वहां से आठ किमी की कठिन चढ़ाई के बाद समुद्रतल से 5950 ऊंचे बर्फीले कालिंदी दर्रे को पार कर राजपड़ाव, अर्वाताल, सीमावर्ती चेकपोस्ट घस्तोली से होते हुए माणा व बदरीनाथ पहुंचते हैं। औसतन बारह दिन में पूरे होने वाले इस ट्रैक के लिये जिला प्रशासन ने वर्ष 2006 में चौबीस और 2008 में करीब 44 परमिट जारी किये गये, जबकि एक दर्जन से अधिक ट्रैकिंग दल बिना परमिट के इस जोखिम भरे ट्रैक पर निकल गये थे। इनमें रास्ता भटके दो रूसी दलों को बचाने में उत्तरकाशी व चमोली जिला प्रशासन को खासी मशक्कत करनी पड़ी थी। इस दौरान अलग अलग दुर्घटनाओं में दो लोगों की मौत भी हो गई थी। इससे पूर्व भी कई दल इस रूट पर दुर्घटनाओं का शिकार हो चुके हैं। इसे देखते हुए वर्ष 2009 में जिला प्रशासन ने कुछ समय बाद ही कालिंदी ट्रैक में जाने पर पाबंदी लगा दी थी। इसके बावजूद निजी ट्रैकिंग कंपनियों के जरिए ट्रैक पर पर्यटकों का जाना बदस्तूर जारी है, लेकिन कुशल गाइड व पोर्टरों की कमी और बिना अनुमति के जाने की यह प्रवृत्ति नुकसानदेह साबित हो रही है। दरअसल, इन दलों के पास राहत एवं बचाव के लिये जरूरी इंतजाम नहीं रहते। ट्रैकिंग कंपनियां भी अधिक मुनाफा कमाने के फेर में नियमों व जरूरी सुरक्षा उपायों को ताक पर रखकर ट्रैक करवा देती हैं। ऐसे में हर साल इस बर्फीले बियाबान में पर्यटकों को जान गंवानी पड़ती है। इस संबंध में उपजिलाधिकारी एसएल सेमवाल ने बताया कि बीते वर्ष मौसम को देखते हुए जिला प्रशासन ने इस ट्रैक की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन इस बार यदि मौसम ठीक रहा, तो कालिंदी ट्रैक खुला रहेगा। उन्होंने कहा कि ट्रैक पर जाने से पूर्व निजी ट्रैकिंग कंपनियों के सुरक्षा इंतजामों की पूरी जांच की जाएगी।

16 मई को खुलेंगे गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के कपाट

उत्तरकाशी pahar1-: गंगोत्री व यमुनात्री धामों के कपाट अक्षय तृतीया पर 16 मई को खुलेंगे। गंगोत्री की मूर्ति परंपरानुसार ढोल बाजों व भव्य जुलूस के साथ 15 मई को मुखवा गांव से गंगोत्री के लिए रवाना होगी। गंगोत्री मंदिर समिति की बैठक के बाद अध्यक्ष संजीव सेमवाल ने बताया कि इस बार कपाट एक माह की देरी से खुल रहे हैं। इस वर्ष अधिमास पडऩे के कारण यह स्थिति बनी है। कपाट बंद होने की तिथि भी एक माह आगे बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि इस बार मुखवा गांव में बड़ी तादाद में श्रद्धालुओं के जुटने की उम्मीद है, जो गंगा की भव्य शोभायात्रा के साथ 15 मई को गंगोत्री की ओर चलेंगे। रात्रि विश्राम भैरों घाटी में करने के बाद 16 मई को मुहूर्त के अनुसार दोपहर एक बजे गंगा की भोगमूर्ति गंगोत्री मंदिर में स्थापित की जाएगी। दूसरी ओर, यमुनोत्री मंदिर के सचिव मनोहर प्रसाद उनियाल ने बताया कि यमुनोत्री के कपाट भी अक्षय तृतीया को ही खुलेंगे। इसी दिन सुबह तीर्थ पुरोहित व श्रद्धालु खरसाली गांव से यमुना व समेश्वर देवता की डोली के साथ यमुनोत्री के लिये रवाना होंगे।

पानी के प्रदेश में इंसान प्यासा

नदियों से 40 हजार मेगावाट से ज्यादा बिजली उत्पादन की संभावना, पैदा हो रही दो हजार मेगावाट से भी कम हर साल 2.10 बिलियन घन मीटर पानी से भूजलाशय होते हैं रिचार्ज झीलों, चश्मों के बावजूद गर्मी में कई इलाके झेलते हैं जल संकट पानी के बावजूद 95 में 71 ब्लाक यानी पहाड़ का 89 फीसदी क्षेत्र बरसात के भरोसे देहरादून, pahar1- उत्तराखंड नदियों, झीलों, चश्मों का प्रदेश हैै। मैदानी क्षेत्र में भूजल की कोई कमी नहीं। इसे सरकारों की दूरदर्शिता की कमी कहें या योजनाओं का अभाव कि प्रदेश का पानी बेकार जा रहा है। हालात ये हैं कि छोटी बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं के जरिए यहां की नदियों से करीब 40 हजार मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है, मगर 20 हजार मेगावाट की निर्माणाधीन परियोजनाओं की तमाम कवायद के बाद अब तक करीब 2000 मेगावाट बिजली ही पैदा का जा सकी है। भरपूर जलस्रोतों के बावजूद पहाड़ के खेत प्यासे हैैं। प्रदेश के कुल 95 ब्लाकों में से 71 ब्लाक यानी पहाड़ का 89 फीसदी क्षेत्र बरसात के भरोसे खेती के लिए मजबूर है। पानी इफरात में होने के बावजूद पर्वतीय गांवों में महिलाओं को मीलों दूर से पानी ढोना पड़ता है। गर्मी आते ही कई गांव और कस्बे पानी की किल्लत से जूझते दिखाई देते हैं। राज्य बनने के 10 साल के बावजूद घर-घर साफ पानी पहुंचाने की मुहिम का हाल यह है कि पेयजल विभाग ने इस बार प्रदेश में 606 क्षेत्रों को संकटग्रस्त घोषित किया है। गंगा, यमुना, काली और उनकी सहायक नदियां मसलन टोंस, भागीरथी, अलकनंदा, भिलंगना, मंदाकिनी, रामगंगा, शारदा, पिंडर, सरयू, गोरी ,धौली जैसी सदानीरा नदियों के घर उत्तराखंड में यह स्थिति वास्तव में चिंताजनक है। पर्यावरणविद डॉ. अनिल जोशी कहते हैैं कि ये बात और है कि गंगोत्री, पिंडारी जैसे ग्लेशियरों से निकलने वाली ये नदियां गंगा यमुना के मैदानी इलाके के दुनिया के बसे बड़े सिंचाई की नहरों के नेटवर्क को पानी मुहैया कराती हैं मगर अफसोस की बात यह है कि इस पानी का पर्वतवासी उतना लाभ नहींले पा रहे जितना कि उन्हें मिलना चाहिए। हालांकि उत्तराखंड में पानी के प्रबंधन उपयोग और संरक्षण के लिए उत्तराखंड जल संस्थान, उत्तराखंड पेयजल संसाधन एवं निर्माण निगम जलागम, सिंचाई, लघु सिंचाई, जलागम, उत्तराखंड जल विद्युत निगम आदि कई विभाग है मगर उत्तराखंड अब तक अपने इफरात पानी का उतना बेहतर उपयोग करने में कामयाब नहींहुआ है। नदियों के अलावा जल संरक्षण और प्रबंधन के क्षेत्र में वन विभाग, जलागम प्रबंधन निदेशालय, स्वजल भी कार्यरत हैं लेकिन भूजल की बात करें तो हिमालय की तलहटी के जिलों देहरादून, ऊधमसिंहनगर और हरिद्वार जिलों की जमीन के नीचे भूगर्भीय जल का समुंदर है मगर इसका भी बेहतर उपयोग नहीं हो पा रहा। राज्य बनने के बाद प्रदेश में औद्योगिकीकरण इन्हीं मैदानी जिलों में हुआ है। जिससे पानी की मांग बढ़ी है। शिवालिक रेंज में ट्यूबवेल 50.4 घन मीटर प्रति घंटा और 79.2घन मीटर प्रति घंटा तो भाभर क्षेत्र में 332.4 घन मीटर प्रति घंटा और तराई में 36 से 144 घन मीटर प्रति घंटा की रफ्तार से पानी उगल सकते हैं। गंगा जमुना के दोआब में तो ट्यूबवेल 90 से 198 घन मीटर प्रति घंटा की दर से साफ पीने का पानी दे सकते हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक एके भाटिया का कहना है प्रदेश में हर साल औसतन 1523 मिलीमीटर के करीब बारिश होती है। बारिश और नदियों, चश्मों व अन्य जलस्रोतों के पानी से हर साल कम गहराई वाले भूजलाशय 2.27 बिलियन घनमीटर (बीसीएम) रिचार्ज हो जाते हैंै। इन छिछले भूगर्भीय जलाशयों में 2.10 बीसीएम पानी हमेशा उपयोग के लिए मौजूद रहता है यानी 0.17 बीसीएम पानी अनछुआ रह जाता है। प्रदेश में अभी 1.39 बिलियन घन मीटर भूजल यानी 66 फीसदी का ही दोहन हो रहा हैै। यानी 34 फीसदी भूजल भंडार अभी यूं ही मौजूद है। प्रदेश सरकार को भूजल के बेहतर उपयोग की नीति तैयार करनी चाहिए। सेंटर फॉर साइंस पॉलिसी के निदेशक प्रो. धीरेंद्र शर्मा का कहना है प्रदेश सरकार को वैज्ञानिक शोधो व नई तकनीकों का उपयोग कर पानी का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए।

'छोटी चूक का झटका 'बड़ा

उत्तराखंड को अब तक लग चुका है अरबों रुपये का चूना नहीं मिल रहा 'विशेष श्रेणी दर्जे का पूरा लाभ नौ सालों तक किसी अफसर का नहीं गया खामी पर ध्यान Pahar1- अब इसे केंद्र सरकार की मनमानी कहें या फिर सूबे के अफसरों की लापरवाही। वजह चाहें जो भी हो पर उत्तराखंड को विशेष श्रेणी का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। नतीजा इस नए राज्य को इससे अरबों की चपत के रूप में सामने आ रहा है। अब चेते सूबे के नियोजन विभाग ने यह मामला केंद्रीय योजना आयोग के समक्ष उठाया है। नौ नवंबर-2000 को जन्मे इस राज्य को एक सितंबर, 2001 में विशेष राज्य का दर्जा मिल दिया गया। केंद्र सरकार की व्यवस्था के तहत इस स्टेटस वाले राज्यों को केंद्र पोषित योजनाओं में केंद्रीय सहायता 90:10 के अनुपात में मिलती है। यानि कुल मिलने वाली राशि में से 90 प्रतिशत केंद्रीय अनुदान और 10 प्रतिशत ऋण के रूप में होता है। इस राज्य की वास्तविकता इसके एकदम उलट है। राज्य के करीब एक दर्जन से अधिक विभागों की विभिन्न योजनाओं में 50:50 या फिर 75:25 के अनुपात में केंद्रीय सहायता और ऋण मिल रहा है। इस वजह से चालू वित्तीय वर्ष में राज्य को 120 करोड़ का चूना लग चुका है। वित्तीय वर्ष 10-11 में उत्तराखंड को केंद्रांश में 307 करोड़ का नुकसान होने जा रहा है। अब सालों बाद यह मामला प्रमुख सचिव (नियोजन) विजेंद्र पाल ने पकड़ा है। उन्होंने वित्त विभाग के प्रमुख सचिव को एक पत्र भेजा है। इसमें कहा गया है किकेंद्र पोषित योजनाओं में राज्य को 50:50, 75:25 और 80:20 के अनुपात में केंद्रीय सहायता मिल रही है। उत्तराखंड को एक सितंबर 2001 से विशेष श्रेणी दर्जा हासिल है। योजना आयोग के वरिष्ठ सलाहकार श्री कल्ला को इस संबंध में सूचित किया जा चुका है। प्रमुख सचिव (वित्त) ने सभी प्रमुख सचिवों तथा सचिवों को अपने विभाग की केंद्र पोषित परियोजनाओं को 90:10 के अनुपात में स्वीकृत कराने के लिए केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों से संपर्क करने को कहा है। गौरतलब है कि केंद्र पोषित परियोजनाओं में विभागों की विभिन्न योजनाओं में कास्ट शेयरिंग पैटर्न भी अलग-अलग है। कोल्ड वाटर फिशरीज में केंद्रीय अनुदान और ऋण का अनुपात 75:25 के अनुपात में है। जबकि नेशनल फिशरमैन वेलफेयर में केंद्रीय सहायता और ऋण 50:50 है। यही हालत दूसरे विभागों में भी है। मौजूदा स्थिति विभाग कास्ट शेयरिंग कृषि 50:50 एनिमल हस्बेंड्री 50:50 फिसरीज 75:25 फारेस्ट वेल्फियर 80:20 रूरल डेवलपमेंट 75:25 रोड एंड ब्रिज 50:50 आईटी 60:40 शिक्षा 55:45 हेल्थ 75:25 (केंद्रीय मानकों के तहत यह अनुपात 90:10 का होना चाहिए)

Friday, 12 March 2010

उत्तराखंड के व्यंजनों का स्वाद चखेंगे मानसरोवर यात्री

- परोसी जाएगी चुड़कानी, भटिया व मडुवे की रोटी - केएमवीएन हर पड़ाव पर करेगा व्यवस्था पिथौरागढ़: कैलास मानसरोवर यात्रियों को इस वर्ष यात्रा के दौरान उत्तराखंड के व्यंजनों का स्वाद भी चखने को मिलेगा। कुमाऊं मंडल विकास निगम पर हर पड़ाव पर इन व्यंजनों की व्यवस्था करेगा। इसके लिए निगम ने मीनू तैयार कर लिया है। उल्लेखनीय है जून में कैलास मानसरोवर यात्रा 2010 शुरु हो जायेगी। यहां यात्रियों के लिए आवास व भोजन आदि की व्यवस्था कुमाऊं मंडल विकास निगम करता है। यात्री निगम के पर्यटक आवास गृहों में रुकते हैं और यहीं उनके लिए भोजन की व्यवस्था रहती है। इस वर्ष निगम ने कैलास मानसरोवर यात्रा पर आने वाले यात्रियों को उत्तराखंड के विशिष्टï व्यंजन परोसने का निर्णय लिया है। पिथौरागढ़ आवास गृह के प्रबंधक दिनेश गुुरुरानी ने बताया कि इस वर्ष यात्रा पर आने वाले यात्रियों को निगम चुड़कानी, भटिया व मंडुवे की रोटी आदि परोसेगा। उन्होंने कहा इससे न सिर्फ उत्तराखंडी व्यंजनों का प्रचार-प्रसार होगा, बल्कि यात्रियों को नया स्वाद भी चखने को मिलेगा। उन्होंने बताया कि निगम ने इसके लिए तैयारियां भी शुरु कर दी हैं। यात्रा की तैयारियों के लिए नौ मार्च को पिथौरागढ़ में बैठक होनी हैं। इस बैठक में कई अन्य निर्णय भी लिये जायेंगे।

सृजन के संघर्ष में उत्तराखंड की मातृशक्ति

-सूबे की पंचायतों में पचास फीसदी से अधिक भागीदारी -आज राज्य में करीब 60 फीसदी से ज्यादा महिलाएं साक्षर -जीवन के हर क्षेत्र में कामयाबी की कहानी गढ़ रहीं उत्तराखंड की महिलाएं देहरादून,-'आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दोÓ 'फूल नहीं चिंगारी है उत्तराखंड की नारी हैÓ। जरा याद कीजिए उत्तराखंड आंदोलन के दौर को, जब गांव, शहर, घाटियां ऐसे ही नारों से गूंज रहे थे और इन्हें स्वर दे रही थी उत्तराखंड की स्त्री शक्ति। यह किसी से छिपा नहीं है कि मातृशक्ति के संघर्ष के बूते ही उत्तराखंड का सपना साकार हो सका। राज्य प्राप्ति के बाद भी महिलाएं चुप नहीं बैठी हैं। उन्होंने उत्तराखंड को सरसब्ज बनाने का बीड़ा उठा लिया है। आज सूबे की पंचायतों में पचास फीसदी से अधिक भागीदारी कर वे अहसास करा रही हैं कि उन्हें अपने उत्तराखंड गांवों के विकास की अब भी उतनी ही चिंता है, जितनी की राज्य निर्माण से पहले थी। न सिर्फ पंचायत में बल्कि हर क्षेत्र में वह सकारात्मक पहल के लिए आगे बढ़ रही हैं। यह अलग बात है कि शहरी क्षेत्रों में यह रफ्तार ज्यादा है, मगर पहाड़ी इलाकों में भी धीरे-धीरे जागरूकता बढऩे लगी है। चार दशक पहले के परिदृश्य को देखें तो उत्तराखंड में महिलाएं घर-परिवार और कृषि के दायित्वों तक ही सिमटी हुई थीं। मगर तब भी उनकी चिंता में समाज और पर्यावरण शामिल था। विश्वभर में ख्याति प्राप्त चिपको आंदोलन हो या नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन इनकी कमान गौरादेवी, टिंचरी माई जैसी साधारण ग्रामीण महिलाओं ने ही संभाली। यह बात और है कि आंदोलन के क्षेत्र के अलावा उद्यमिता, नौकरियों और राजनीति में तब तक उनकी खास मौजूदगी नहीं थी। धीरे-धीरे हालात बदले और यहां की महिलाओं ने समय के साथ चलने की ओर कदम बढ़ाए। शिक्षा के लिए जगह-जगह स्कूल कालेज खुले तो महिलाओं को भी इसका फायदा मिला। साक्षरता अभियान ने भी उन महिलाओं को साक्षर बनाने में बड़ी मदद की, जो स्कूल का मुंह नहीं देख पाई थीं। आज राज्य में करीब 60 फीसदी सेे ज्यादा महिलाएं साक्षर हैं। महिलाएं शिक्षित हुई तो उनके सपनों को भी पंख लगे। किसी ने पंचायत में सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई तो किसी ने सरकारी सेवाओं में। कहीं स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाओं ने कामयाबी की दास्तान लिखनी शुरू की तो कहीं वे हवा में उड़ान भरने से पीछे नहीं रहीं। सेना, अद्र्धसैनिक बल समेत अन्य सेवाओं के साथ ही वे खेल, कला संस्कृति, प्रशासन यानी हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। वर्ष 2008 में सूबे में महिलाओं के लिए पंचायतों में पचास फीसदी आरक्षण की व्यवस्था के बाद तो उन्होंने इससे कहीं आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारी बखूबी संभाली है। वे अब गांवों के विकास पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। कई जगह उन्होंने मिसाल भी कायम की है। जागरूकता की बात करें तो महिलाओं में यह शहरी क्षेत्रों मेें अभी अधिक हैै। वजह यह कि वहां सुविधाओं की कमी नहीं है। इसके उलट पहाड़ी क्षेत्रों में अभी जागरूकता ने वैसी रफ्तार नहीं पकड़ी है, जैसी शहरी इलाकों में हैं। ऐसा नहीं है कि पर्वतीय क्षेत्रों से महिलाएं आगे न आ रही हों, आ रही हैं, मगर रफ्तार कम है। लेकिन, जैसे-जैसे सुविधाओं का विस्तार हो रहा है, वैसे-वैसे इसमें और तेजी आएगी।