Thursday, 25 February 2010
-अग्नि नहीं भगवान बदरीनाथ के फेरों से होता है विवाह
-रुद्रप्रयाग जिले के निरवाली गांव में विवाह की अनोखी परंपरा
-भगवान बदरीनाथ को आदिदेव मानते हैं ग्रामीण
-बदरीनाथ जाते हुए आद्यगुरु शंकराचार्य ने इस गांव में किया था विश्राम
रुद्रप्रयाग
हिंदू विवाह संस्कार की परंपरा लगभग पूरे देश में एक सी हैं, जिसके तहत वर- वधु के अग्निवेदी के फेरे लेने के बाद विवाह संपन्न माना जाता है, लेकिन रुद्रप्रयाग जिले का एक गांव ऐसा है, जहां वेदी के फेरे नहीं लिए जाते। मान्यता है कि निरवाली नामक इस गांव बदरीनाथ जाते हुए आद्यगुरु शंकराचार्य ने विश्राम किया था। तब से गांव में विवाह के दौरान वर- वधु भगवान बदरीनाथ की मूर्ति के फेरे लेते हैं।
रुद्रप्रयाग जनपद के अगस्त्यमुनि विकासखंड की ग्रामसभा धारकोट के निरवाली गांव में शादी की परंपरा अनोखी है। यहां पर सती ब्राह्मण निवास करते हैं। जहां देशभर में बिना वेदी के विवाह संपन्न होने की कल्पना तक नहीं की जा सकती, वहीं इस गांव में वेदी के स्थान पर भगवान बदरीनाथ की मूर्ति रखी जाती है, जिसे साक्षी मानकर वर- वधु फेरे लेते हैं। सदियों पुरानी यह परंपरा कब शुरू हुई इसका स्पष्ट पता तो नहीं चलता, लेकिन मान्यता है कि बदरीनाथ की ओर जाते हुए आद्यगुरु शंकराचार्य इस गांव में रुके थे। उन्हीं के निर्देशों के मुताबिक यह गांव भगवान बदरीनाथ की परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
गांव में आज भी भगवान बदरीनाथ का पौराणिक निशान मौजूद है। ग्रामीण टीकाप्रसाद सती बताते हैं कि विवाह समेत अन्य सभी समारोहों में इस निशान को भगवान बदरीनाथ के प्रतीक रूप में शामिल किया जाता है। उन्होंने बताया कि निशान की यात्रा भी आयोजित की जाती है, लेकिन इसे ले जाने वाले व्यक्ति को निशान के साथ रहने के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है। इतना ही नहीं, पूजा संपन्न होने तक वह अन्न ग्रहण भी नहीं कर सकता। श्री सती ने बताया कि गांव में स्थित भगवान बदरीनाथ की मूर्ति को कोई नहीं छू सकता। मूर्ति ले जाने वाले व्यक्ति को भी नहीं छुआ जाता। गांव के निवासी विजय प्रसाद सती, बलीराम सती, पारेश्वर दत्त सती बताते हैं कि ऋषिकेश से बदरीनाथ की ओर चले आद्यगुरु शंकराचार्य ने एक ही स्थान पर विश्राम किया था, वह है निरवाली गांव। यही वजह है कि इस गांव के लोग भगवान बदरीनाथ को अपना आदिदेव मानते हैं। वे बताते हैं कि आज भी गांव में शंकराचार्य के आगमन के निशान मौजूद हैं। उनके द्वारा स्थापित किया गया सूरजकुंड मंदिर भी गांव में है।
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नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महर्षि लक्ष्मीबाइ
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महर्षि लक्ष्मीबाई व्यायाम मंदिर
झांसी द्वारा दी जाने वाली व्यायाम रत्न की उपाधि को डीपीएड के समकक्ष मान्य ठहराते हुए उत्तराखंड सरकार को ऐसे डिग्रीधारी अभ्यर्थियों को सहायक अध्यापक (शारीरिक शिक्षा) के पद पर नियुक्ति देने हेतु विचार करने के निर्देश दिए हैं।
याची संजय सिंह समेत अनेक व्यायाम रत्न डिग्री धारकों द्वारा हाईकोर्ट मेें एक याचिका दायर करते हुए कहा गया था कि उनके द्वारा वर्ष 2002 में सहायक अध्यापक (शारीरिक शिक्षा) हेतु आवेदन किया गया था, परन्तु सरकार द्वारा उनके आवेदन पर विचार नहीं किया गया और कहा गया कि व्यायाम रत्न की डिग्री डीपीएड के समकक्ष नहीं होती। याचिका कर्ताओं के अधिवक्ता द्वारा कोर्ट को बताया गया कि उक्त डिग्री डीपीएड के समकक्ष है, जिस पर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने याचिका को स्वीकार करते हुए सरकार को निर्देश दिया था कि वह याचिका कर्ताओं को सहायक अध्यापक शारीरिक शिक्षा के रूप में नियुक्त करने पर विचार करे। इधर उक्त आदेश के विरुद्ध सरकार द्वारा विशेष अपील दायर की गई। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने विशेष अपील की सुनवाई के बाद एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखते हुए विशेष अपील खारिज कर सरकार को निर्देश दिए कि वह याचिका कर्ताओं की नियुक्ति पर विचार करे। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर व न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की खंडपीठ में हुई।
वायु सेना में एयरमैनों की भर्ती रुद्रपुर में होगी
-एयर फोर्स के विंग कमांडर ने डीएम के साथ स्पोट्र्स स्टेडियम का लिया जायजा
-कुमाऊं के युवाओं के लिए जून के तीसरे सप्ताह में होगी भर्ती रैली
रुद्रपुर: भारतीय वायु सेना में एयरमैन के पदों पर भर्ती के लिए प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां तेज हो गई हैं। जून के तीसरे सप्ताह में आहूत भर्ती रैली के मद्देनजर विंग कमांडर ने जिलाधिकारी के साथ पीएसी, पुलिस लाइन व स्पोट्र्स स्टेडियम का दौरा भी किया। इसमें स्टेडियम को उपयुक्त मानते हुए व्यवस्थाएं दुरुस्त करने के निर्देश दिये गये।
वायु सेना में एयरमैनों की भर्ती रैली को लेकर गुरुवार को कलेक्ट्रेट में अहम बैठक हुई। विंग कमांडर वीपी सिंह ने बताया कि पांच दिवसीय रैली में कुमाऊं क्षेत्र के 17 से 23 आयु वर्ग के प्रतिभागी भाग ले सकेंगे। इसके लिए शैक्षिक योग्यता विज्ञान वर्ग से इंटरमीडिएट उत्तीर्ण निर्धारित है। इधर विंग कमांडर ने जिलाधिकारी मोहन चंद्र उप्रेती के साथ पीएसी मैदान, पुलिस लाइन व स्पोर्ट्स स्टेडियम का भी दौरा किया। सर्वे बाद स्टेडियम को भर्ती रैली के लिए उपयुक्त पाया गया। जिलाधिकारी ने रैली के सफल आयोजन को प्रभारी अधिकारी कलेक्ट्रेट हेमंत वर्मा को समन्वयक नामित किया है। साथ ही रैली के लिए व्यवस्थाएं जुटाने तथा संबंधित अफसरों को समन्वय के निर्देश दिये गये हैं। उन्होंने कहा कि रैली के लिए प्रशासन सभी सुविधायें मुहैया करायेगा। इसके अलावा अपर पुलिस अधीक्षक अशोक भट्टï, एसडीएम सदर पीसी दुम्का, जिला क्रीड़ा अधिकारी वीके वर्मा तथा युवा कल्याण अधिकारी जीसी परगाईं को व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
हर जगह मिलेगी झंगोरे की खीर
पर्वतीय क्षेत्रों के व्यंजनों और जैविक फसलों को देश-दुनिया में मशहूर करने की पहल
Pahar1- जल्द ही आपको अगर राजधानी देहरादून में देशी-विदेशी पर्यटक झंगोरे की खीर, फाणू, कफली, बाड़ी, गंजड़ू, धबड़ी, मंडुए की रोटी, रैम्वडि़, चुरक्याणी, ठठ्वाणी, भट्वाणी, भट का जौला जैसे स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेते दिखाई दिए तो अचरज न करें। सब कुछ ठीकठाक रहा तो प्रदेश में पहली बार ऐसे ग्रीन रेस्टोरेंट खुलेंगे। जहां पर्यटक मंडुआ, झंगोरा, कौणी, मक्का, कुट्टू, गहत, चौलाई, मास, रंयास और अन्य जैविक फसलों के स्थानीय व्यंजनों का लुत्फ उठा सकेंगे।
उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद ने प्रदेश के कम मशहूर स्थानीय व्यंजनों को पर्यटकों के बीच लोकप्रिय करने का बीड़ा उठाया है। इस शुभ कार्य की शुरुआत के लिए परिषद ने पहले देहरादून को ही चुना है। ग्रीन रेस्टोरेंट स्थापित करने, और चलाने के लिए परिषद ने एक्सप्रेशन आफ इंटरेस्ट आमंत्रित की हैं। परिषद की वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी बिनीता शाह के मुताबिक अब तक ग्रीन रेस्टोरेंट के लिए चार आवेदन भी आ चुके हैं। उनका कहना है कि ग्रीन रेस्टोरेंट की अवधारणा उत्तराखंड के लिए कुछ नई है। परिषद की इन ग्रीन रेस्टोरेंट में लोगों को पूरी तौैर पर जैविक तरीके से उत्पादित फसलों से बने व्यंजन परोसने की योजना है। इन रेस्टोरेंट को स्थापित कराने का एक बड़ा उद्देश्य उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के व्यंजनों को मशहूर करना भी है। बिनीता शाह का कहना है कि पर्यटक जब भी किसी प्रदेश में जाते हैं तो जब वे लौटते हैं तो उनकी जुबान पर वहां के किसी न किसी व्यजंन का स्वाद और नाम होता है। उत्तराखंड के व्यंजन अभी इतने मकबूल नहींहो पाए हैं। ऐसे में ग्रीन रेस्टोरेंट इस उद्देश्य को पूरा कर पाएंगे। उनका कहना है कि दरअसल आज दुनिया भर में खासकर यूरोप और अमेरिका आदि में लोग जैविक उत्पादों की ओर लौट रहे हैं। ऐसे में ग्रीन रेस्टोरेंट में अगर जैविक तरीके से उगाई गई फसलों से बने स्थानीय व्यंजन परोसे जाएंगे तो एक ओर विदेशी पर्यटक उनकी ओर आकर्षित होंगे और दूसरी ओर उत्तराखंड के व्यंजन अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पा सकेंगे। उनका कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में वैसे भी अभी रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बगैर ही फसलें उगाई जाती हैं। ऐसे में प्रदेश भर में ग्रीन रेस्टोरेंट खुलेंगे तो पर्वतीय किसानों को सीधा लाभ होगा क्योंकि ग्रीन रेस्टोरेंट में केवल जैविक फसल उत्पादों
-निर्मल को सालता रहा पहाड़ की महिलाओं का दर्द
-कठिन संघर्षों के साथ किया बालीवुड का सफर तय
-उपलब्धियों पर समूचा ग्रामीण भारत गौरवान्वित
नैनीताल: प्रसिद्ध अभिनेता निर्मल पांडे ने साधारण परिवार में जन्म लेने के बावजूद बालीवुड में जिस तरह अपनी असाधारण अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया उससे उत्तराखंड ही नहीं पूरा ग्रामीण भारत गर्व महसूस कर रहा है। उनके साथियों के अनुसार पहाड़ में ग्रामीण महिलाओं की बेहद जटिल जीवन चर्या का दर्द निर्मल को हमेशा सालता रहा।
जागरण ने शुक्रवार को अभिनेता निर्मल पांडे के साथियों व रंगकर्मियों के अलावा सिने कलाकार हेमंत पांडे से बातचीत की तो सभी ने उनकी अभिनय क्षमता को अद्वितीय बताया। नाट्य संस्था युगमंच के जरिए नाटकों में अमिट छाप छोड़ चुके निर्मल के बारे में संस्था के अध्यक्ष जहूर आलम का कहना था कि निर्मल पांडे ने साधारण परिवार में जन्म लेकर मेहनत व अपनी निष्ठा से जो मुकाम फिल्म इंडस्ट्री व रंगमंच के क्षेत्र में हासिल किया, उसकी भरपाई होना निकट समय में मुश्किल है। जहूर आलम के शब्दों में निर्मल बेहद कर्मठ व उदयीमान कलाकार थे। उनके जाने से रंगमंच मेें शून्य पैदा हो गया है। उन्होंने बताया अंग्रेजी का ज्ञान कम होने पर भी निर्मल ने अंग्रेजी नाटकों के डॉयलाग याद कर अभिनय के झंडे गाड़े। उन्होंने बताया नाटक के रिहर्सल में जरा सी देरी होने पर वह साथी कलाकारों पर बिगड़ जाते थे। उन्होंने कहा निर्मल पांडे ने काम व प्रतिभा के दम पर वह मुकाम हासिल किया, जिसकी कल्पना सभी कलाकार करते हैं। राष्टï्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली में अध्ययन के दौरान निर्मल पांडे के रूम पार्टनर रहे रंगकर्मी एम दिलावर बताते हैं कि सीआरएसटी के सिल्वर जुबली समारोह में निर्मल ने नाटक 'एक कफन औरÓ में अभिनय कर तत्कालीन सीएम एनडी तिवारी को खासा प्रभावित किया था। वह बताते हैं कि निर्मल रंगमंच का निपुण कलाकार थे और साथी कलाकारों को भी प्रेरित करता थे।
निर्मल पांडे ने वर्ष 1992 में श्रीराम सेवक सभा द्वारा आयोजित होली महोत्सव में बढ़ चढ़कर भागीदारी निभाई। निर्मल के सीनियर रहे व पूर्व विधायक डा. नारायण सिंह जंतवाल बताते हैं कि अभिनेता होने के बावजूद निर्मल पाण्डे पहाड़ के विकास के प्रति हमेशा चिंतित रहे। वर्ष 2002 में हुए राज्य के पहले विस चुनाव में पहली फरवरी को निर्मल पांडे ने कालाढूंगी, भीमताल व भवाली में उक्रांद के पक्ष में जनसभा को संबोधित करते हुए क्षेत्रीय ताकतों को मजबूत बनाने का आह्वान किया।
इनसेट
ग्रामीण भारत ने खोया उभरता सितारा: हेमंत
नैनीताल: सिने अभिनेता निर्मल पांडे के अचानक संसार से विदा होने पर टीवी कलाकार हेमंत पांडे भी बेहद दु:खी हैं। दूरभाष पर हुई बातचीत में उनका कहना था-'छोटे से शहर से इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करना बहुत मायने रखता है। भारत के गांवों से सैकड़ों कलाकार मुंबई आते हैं, लेकिन कम ही लोगों को मुकाम हासिल हो पाता है, निर्मल पाण्डे सभी में भाग्यशाली रहेÓ। निर्माता-निर्देशक शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन में निर्मल के साथ काम कर चुके हेमंत का कहना था निर्मल ने उन्हें हमेशा सम्मान दिया। निर्मल का अचानक इस संसार से विदा होने से उत्तराखंड ही नहीं समूचे ग्रामीण भारत के कलाकारों को झटका लगा है। हेमंत की निर्मल से आखिरी मुलाकात करीब डेढ़ वर्ष पूर्व मुंबई में प्रवासी उत्तराखण्ड के लोगों द्वारा आयोजित संगीत संध्या में हुई थी।
निर्मल की घड़ी बनी अनमोल निशानी
नैनीताल: अभिनेता निर्मल पांडे द्वारा रंगकर्मी जहूर आलम को भेंट की गई जापानी घड़ी अब उनकी अनमोल निशानी बन गई है। जहूर बताते हैं कि जापान में शूटिंग से लौटकर जब निर्मल घर आया तो उन्हें भेंट स्वरूप घड़ी प्रदान की। जहूर मानते हैं कि यही घड़ी हमेशा उन्हें निर्मल की याद ताजा कराती रहेगी।
विदेशों में भी फैलेगा वेद व पुराण का ज्ञान
-जगद्गुरु आश्रम चला रहा है विशेष मुहिम
- वेद पाठियों को किया जा रहा तैयार
-पहले चरण में 25 वेदपाठी होंगे पारंगत
Pahar1- हरिद्वार
भारतीय जीवन दर्शन के प्राण वेद व पुराण में समाहित हैं। धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजनों की परिपाटी भी वेद व पुराणों पर ही चलती आ रही है। अगर सबकुछ ठीक रहा, तो विदेशों में भी वेद व पुराण का महात्म्य प्रचारित किया जाएगा। मजेदार बात यह कि संबंधित देश की भाषा में ही वेद व पुराण की महत्ता बताई जाएगी। जगद्गुरु आश्रम ने इस दिशा में पहल शुरू की है। वेदपाठियों को इसके लिए तैयार किया जा रहा है।
एक साल पूर्व हरिद्वार के जगद्गुरु आश्रम के स्वामी श्री राजराजेश्वराश्रम ने इस दिशा में पहल शुरू की थी। मंशा यह थी कि वेद व पुराण का आध्यात्मिक महत्व देश की सीमाओं से बाहर पहुंचाने के लिए वेदपाठी तैयार किए जाएं। इसे एक अभियान के तौर पर लिया जाए। इसके तहत उक्त आश्रम में दस से बीस वर्ष तक के कुल 25 वेदपाठियों को वेद व पुराणों की शिक्षा देनी शुरू की गई। उनको वेद, पुराणों में पारंगत बनाने का जिम्मा आचार्याें को सौंपा गया। वेदपाठियों के रहने-ठहरने के साथ ही अन्य समस्त सुविधाएं आश्रम की ओर से मुहैया कराई गई। आश्रम में हर रोज उन्हें सुबह व शाम वेद, पुराणों की शिक्षा दी जा रही है। समय-समय पर उनके ज्ञान का मूल्यांकन भी आचार्य करते हैं। यह शिक्षा पूरी तरह हाइटेक पद्धति से दी जा रही है। कहने का मतलब है कि कंप्यूटर के जरिये वेदपाठियों को वेद व पुराणों में दक्ष किया जा रहा है। एक साल की अवधि के मूल्यांकन में ही अध्ययनरत वेदपाठियों में दक्षता पायी गई है। वेद, पुराणों में निपुणता हासिल करने के बाद वेदपाठियों को किसी एक देश विशेष की भाषा का भी ज्ञान कराया जाएगा। जब वे विदेशी भाषा में पारंगत हो जाएंगे, तो उन्हें संबंधित देश में भेजा जाएगा। वहां वे वेद, पुराणों का प्रचार-प्रसार करेंगे। इसके बाद फिर अगले सत्र में भी उनको इसी ढंग से तैयार करने की योजना है। फिलहाल, अध्ययनरत वेदपाठियों को वेद, पुराणों में दक्ष बनाने में अभी एक से डेढ़ साल और लगेगा।
इस बाबत जगदगुरु आश्रम के स्वामी श्री राजराजेश्वराश्रम ने बताया कि इन वेदपाठियों को धर्म प्रचार के लिए तैयार किया जा रहा है। इनके जरिये भारतीय जीवन दर्शन के प्राण तत्व वेद, पुराणों के आध्यात्मिक महात्म्य को विदेशों में भी प्रचारित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि वर्तमान में वेद, पुराणों के प्रति विदेशों में भी खासा उत्साह बढ़ने लगा है, जिसकी बानगी महाकुंभ में भी देखने को मिल रही है। उन्होंने कहा कि महाकुंभ में इस बार विदेशियों की संख्या में इजाफा हुआ है। उन्होंने कहा कि आश्रम की यह कोशिश आगे भी जारी रहेगी।
-राज्य पशु व पक्षी का अस्तित्व खतरे में
-तेजी से गिर रही है कस्तूरी मृग और मोनाल की संख्या
-राज्य प्रतीकों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दे रही है सरकार, वंश वृद्धि के लिए नहीं बनी कोई योजना
-कस्तूरी मृगों की संख्या महज पंद्रह हजार, मोनाल का संख्या घनत्व भी हुआ 20 प्रति वर्ग किलोमीटर
Pahar1- गोपेश्वर (चमोली)
उत्तराखंड में राज्य प्रतीकों का अस्तित्व ही खतरे में है। राज्य पशु 'कस्तूरी मृग' और राज्य पक्षी 'मोनाल' की संख्या लगातार कम होती जा रही है। राज्य प्रतीकों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देना सरकार का दायित्व है, लेकिन सरकारी लापरवाही का आलम यह है कि अब तक सूबे में कस्तूरी मृग और मोनाल के संरक्षण व वंशवृद्धि के लिए कोई योजना तैयार नहीं की गई है। नतीजतन, सरकारी उपेक्षा के बीच बेहद खूबसूरत ये पशु-पक्षी अपने वजूद की लड़ाई लड़ने को मजबूर हो गए हैं।
भारत गणराज्य में प्रत्येक राज्य अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति, वन तथा वन्यजीव संपदा के परिप्रेक्ष्य में अपने-अपने राज्य प्रतीकों का निर्धारण करता है। इसके तहत उत्तराखंड पृथक राज्य गठन के बाद वर्ष 2001 में कस्तूरी मृग को राज्य पशु व मोनाल को राज्य पक्षी घोषित किया गया। संविधान के मुताबिक ये प्रतीक राज्य की संपदा माने जाते हैं और इनका संरक्षण एवं प्रजाति संवर्धन करना राज्य सरकार का दायित्व है, लेकिन राज्य सरकार इस दायित्व पर खरी नहीं उतर रही है। राज्य गठन के नौ वर्ष बाद भी कस्तूरी मृग व मोनाल पक्षी के संरक्षण व वंशवृद्धि के लिए कोई ठोस योजना तैयार नहीं की गई। स्पष्ट रूप से यह कहा जा सकता है कि सरकार ने अभी तक इस ओर ध्यान दिया ही नहीं।
हालात ऐसे हैं कि मखमली बुग्यालों में पाए जाने वाले कस्तूरी मृग (मस्क डियर) की संख्या पूरे उत्तराखंड में सिमटकर मात्र पंद्रह हजार के आसपास रह गई है, जबकि दस वर्ष पूर्व इनकी संख्या करीब तीस हजार थी। इसी तरह मोनाल (हिमालयन मोर) पक्षी का संख्या घनत्व भी दस वर्ष पूर्व 30 प्रति वर्ग किमी से घटकर 20 प्रति वर्ग किलोमीटर पर जा पहुंच है। अस्तित्व के लिहाज से ये आंकड़े बेहद चिंताजनक माने जा रहे हैं। दरअसल, इन दोनों पशु-पक्षियों की विशेषता ही इनके लिए खतरनाक बनी हुई है। कस्तुरी मृग के शरीर में मिलने वाला पदार्थ 'कस्तूरी' दमा, मिरगी, निमोनिया, टाइफायड व हृदय रोग की औषधि बनाने में प्रयुक्त होता है, जबकि मोनाल का उसके बेहद स्वादिष्ट मीट व अन्य उपयोगों की वजह से बड़े पैमाने पर शिकार हो रहा है। इसके अलावा, ग्लोबल वार्मिग के चलते प्रतिकूल हुआ मौसम भी इनकी संख्या में तेजी से आ रही गिरावट का कारण माना जा रहा है।
केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग के डीएफओ धीरज पाण्डे ने भी स्वीकार किया कि लगातार कम हो रही संख्या के आधार पर ही कस्तूरी मृग व मोनाल पक्षी को दुर्लभ श्रेणी में रखा गया है। उन्होंने कहा कि इनके सरंक्षण की योजना तैयार करने पर विचार किया जा रहा है।
पानी: खुद से ही जंग की तैयारी में पहाड़
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चोटियों व मध्य ऊंचाई के लोगों की प्यास बुझाने में विफल घाटियों की नदियां
शासन और विभाग ने किया पुख्ता तैयारियों को दावा
Pahar1-चोटियों तथा मध्य ऊंचाई पर बसे गांवों की प्यास बुझाने में पहाड़ की घाटियों में बहती नदियां विफल रही हैं। इस बार कम बफबारी-वर्षा की वजह से पहाड़ों पर आने वाले पेयजल संकट की आहट पहले से ही सुनी जा सकती है। यह संकट आभास दे रहा है कि इस बार पानी के लिए पहाड़ को खुद से ही बड़ा युद्ध लड़ना होगा।
बर्फबारी और बारिश पहाड़ के पेयजल स्रोतों को जीवन देते हैं। पिछले कई सालों से कम बर्फबारी और कम बारिश के साथ ही पर्यावरण हानि की वजह से सूख रहे स्रोतों के सामने नया संकट उठ खड़ा हुआ है। शासन स्तर पर इस संकट से बचने के लिए प्रयास करने के दावे किए जा रहे हैं पर इन पर बहुत विश्वास करने को कोई तैयार नहीं है।
पेयजल सचिव एमएच खान बताते हैं कि गरमी में पेयजल संकट की आहट अभी से सुनी जा सकती है। कोशिश है कि योजनाएं पूर्ण होने के करीब हैं, उन्हें तेजी से मुकाम तक पहुंचाया जाए। श्री खान स्वीकार करते हैं कि अधिकांश जल स्रोतों पर पानी की मात्रा कम हो रही है। इस बात का पता लगाया जा रहा है कि कहां पानी की उपलब्धता सबसे कम होगी, ताकि वहां के लिए कंटिजेंसी प्लान अभी से तैयार किए जा सकें। पिथौरागढ़ समेत उन तमाम शहरों में मिनी ट्यूबवेल लगाए जा रहे हैं, जहां पानी की समस्या अधिक है।
सूत्रों ने बताया कि पौड़ी को पानी देने वाली श्रीनगर पंपिंग योजना की पुरानी मशीनों को बदला जा रहा है। कोशिश की जा रही है कि जल्द ही यह काम हो जाए, ताकि पूरी क्षमता से पौड़ी को पानी मिलता रहे। पौड़ी में दो ट्यूबवैल बनाए हैं पर ग्रामीणों के विरोध से उन्हें संचालित नहंी किया जा सका है। विरोध करने वालों का मानना है कि यदि ये ट्यूबवेल चलेंगे तो उनके प्राकृतिक जल स्रोत सूख जाएंगे। जिला पंचायत अध्यक्ष के सहयोग से ग्रामीणों को सही जानकारी दी जा रही है, साथ ही इन ट्यूबवेलों से उन्हें पानी देने की योजना भी बनाई जा रही है।
विभागीय सचिव की मानें तो पहाड़ों में दूसरे स्थानों पर और हैंडपंप लगाए जा रहे हैं। एससी-एसटी क्षेत्रों के लिए प्राथमिकता से पेयजल योजनाएं बनाई जा रही हैं। कोशिश की जा रही है कि पानी की कमी को वितरण में निपुणता लाकर पूरा किया जा रहा है। पेयजल योजनाओं के आड़े धन की कमी नहीं आने दी जाएगी।
अमानउल्ला खां की देन है बैठकी होली
1850 में रामपुर से अल्मोड़ा आए थे महान कलाकार
कुमाऊंनी बैठकी होली के वरिष्ठ गायक शिवचरण पांडे से बातचीत
अल्मोड़ा: कुमाऊं की बैठकी होली की समृद्ध व वैभवशाली शुरूआत अल्मोड़ा से हुई है। इस नगरी को यदि बैठकी होली की गंगोत्री कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यह कहना है परंपरागत होली गायकी के 76 वर्षीय वरिष्ठ कलाकार शिवचरण पांडे का।
पूछने पर उन्होंने बताया कि अल्मोड़ा में 1850-60 के दशक में रामपुर के महान संगीतज्ञ उस्ताद अमानउल्ला खां की ही देन है कि यहां अपनी विशिष्ट पहचान व चलन के साथ बैठकी होली की शुरूआत हुई है। श्री पांडे बताते हैं कि बैठकी होली में जो चांचर ताल का चलन है यह भी उस्ताद अमानउल्ला खां का ही प्रसाद है। उन्होंने बताया कि जिस दौर में अमानउल्ला खां ने बैठकी होली का बीजारोपण किया तब गाने-बजाने को बहुत महत्व नहीं दिया जाता था।
पांडे जी बताते हैं कि उस दौर में रामप्यारी नामक गणिका थी, जिन्होंने इस परंपरा को बढ़ने में सहायता की। अल्मोड़ा के जाने-माने होली गायक शिव लाल वर्मा ने रामप्यारी से ही बैठकी का अंदाज सीखा। मौजूदा दौर में होली गायकी में आए बदलाव पर पूछने पर उनका कहना था कि अमानउल्ला खां से चली यह परंपरा यूं तो आज तक अपने स्वरूप को बरकरार रखे हुए है। लेकिन कुछ लोग नकल करने वाले ऐसे हैं जिन्होंने इसको भटका दिया है। हालांकि उनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं है।
हाल के दौर के होली गायकी में अपना ऊंचा मुकाम बनाने वाले तारा प्रसाद पांडे तारी मास्साब का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वह तो अपने फन के पुरोधा थे, लेकिन कुछ लोग उनकी नकल कर वैसा तो नहीं कर पाते बिगाड़ जरूर देते हैं। शिवचरण पांडे होली गायक ही नहीं एक अच्छे होली के गीतों के रचयिता भी हैं। उनके लिखे चार गीत हर होली गायक की जुबान पर हैं।
पूछने पर वह बताते हैं कि बैठकी होली में तुलसी, कबीर, मीरा, सूर के पद तो गाए ही जाते हैं, इसके अतिरिक्त भी चारु चन्द्र पांडे, महेशानंद गौड़ की रचनाएं भी शामिल हैं। पुराने होली गायकों का जिक्र करते हुए बताते हैं कि पिछले दौर में गांगीथोक, चन्द्र सिंह नयाल, भगवान सिंह नयाल, मोहन सिंह, गुलाम उस्ताद, ललि उस्ताद, मोहन रईस, पूरन चन्द्र पांडे, जवाहर लाल साह, मोती राम उस्ताद, उदय लाल साह नेता, रामलीला कलाकार उदय लाल साह जैसे होली गायक थे। जिनका अपना अलग अंदाज, अलग ठाट था। नई पीढ़ी को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि वह बैठकी होली के पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखें, तभी हमारी पहचान कायम रहेगी। यदि हम इसको बिगाड़ेंगे तो होली के स्वरूप को नहीं बल्कि अपनी पहचान को बिगाड़ रहे होंगे।
Thursday, 18 February 2010
नैनीताल में तिब्बती नववर्ष 'लोसर'
नैनीताल में तिब्बती नववर्ष 'लोसर' की तैयारियां जोरों पर
- बौद्ध मठ में विशेष पूजा 18 को, तीन दिन तक मनेगा त्यौहार
नैनीताल: तिब्बती समुदाय के नववर्ष 'लोसर' की तैयारियां सरोवरनगरी में जोरशोर से चल रही हैं। तीन दिनों तक होने वाले आयोजन को लेकर तिब्बती समुदाय में विशेष उत्साह है। इस मौके पर तिब्बती बाजार बंद रहेगा। इधर लोसर को देखते हुए विशेष पूजा के लिए बौद्ध मठ को आकर्षक ढंग से सजाया जा रहा है।
तिब्बती समुदाय हिंदुओं की दीपावली की तर्ज पर नववर्ष का उत्सव मनाता है। लगातार तीन दिनों तक घरों में भगवान बुद्ध की पूजा अर्चना कर विश्व शांति की कामना की जाती है। इस अवसर पर समुदाय द्वारा विशेष पकवान बनाए जाते हैं और भवनों को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है।
तिब्बती फ्रीडम मूवमेंट के सचिव तेंजिन ने बताया कि लोसर के कार्यक्रम 14 फरवरी को शुरू होंगे। 15 व 16 फरवरी तक समुदाय के लोग अपने घरों में भगवान बुद्ध की पूजा अर्चना कर विश्व शांति की कामना करेंगे। 18 फरवरी को बौद्ध मठ में विशेष पूजा अर्चना की जाएगी। बौद्ध मठ में पूजा अर्चना व सामूहिक भोज के लिए तैयारियां जोरशोर से चल रही हैं। तिब्बती यूथ कांग्रेस, तिब्बती रिफ्यूजी फाउंडेशन तथा तिब्बती महिला कांग्रेस समेत कई संगठनों के कार्यकर्ता व धर्म प्रचारक आयोजन को सफल बनाने में जुटे हैं।
घिंगरी गांव के डा. सजवान अमेरिका में सम्मानित
पुरस्कृत 22 लोगों में डा. सजवान अकेले भारतीय
रानीखेत: रानीखेत के निकटवर्ती देवलीखेत इलाके के गांव घिंगरी निवासी
डा. केएस सजवान को पर्यावरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए अमेरिका में सम्मानित किया गया है। पुरस्कृत होने वाले शिक्षा जगत के 22 शिक्षकों की सूची में शामिल डा. सजवान एक मात्र भारतीय हैं। डा. सजवान अमेरिका के जार्जिया की सवाना स्टेट यूनिवर्सिटी में प्राकृतिक विज्ञान एवं गणित विभाग के प्रोफेसर हैं।
पर्यावरण के विद्वान शोधकर्ताओं में माने जाने वाले डा. सजवान के अब तक 100 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। इस क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए अमेरिका में विश्व शिक्षा जगत से 22 शिक्षकों को चयनित किया गया। जिनमें डा. सजवान अकेले भारतीय हैं। उन्हें यह पुरस्कार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दिया। जिसमें पुरस्कार स्वरूप 10 हजार डालर की राशि प्रदान की गई है। डा. सजवान ग्राम घिंगरी देवलीखेत के स्व. धन सिंह सजवान के ज्येष्ठ पुत्र हैं, और उनके छोटे भाई जीएस सजवान वर्तमान में एसएसबी में कार्यरत हैं। डा. सजवान के परम मित्रों में शामिल शोध एवं प्रसार केन्द्र चौबटिया के प्रशासनिक अधिकारी बीएस रौतेला ने बताया कि डा. सजवान की प्रारंभिक शिक्षा देवलीखेत इंटर कालेज में हुई, और रानीखेत मिशन इंटर कालेज से इंटर की शिक्षा पाने के बाद उन्होंने पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय से बीएससी (एजी) व जेएन कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर मध्यप्रदेश से एमएससी (एजी)की उच्च शिक्षा पाई। इसके उपरांत उनकी नियुक्ति केन्द्रीय धान अनुसंधान केन्द्र कटक उड़ीसा में वैज्ञानिक के पद पर हुई। उन्होंने अमेरिका से पीएचडी की मानद उपाधि ली और अमेरिका में ही सेवा शुरू कर दी। जहां उन्होंने कई उच्च पदों पर कार्य किया है। श्री रौतेला ने बताया कि डा. सजवान विश्व बैंक में सलाहकार के पद पर कार्य करने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय वैज्ञानिक रहे हैं। उन्होंने बताया कि डा. सजवान को अपने मातृ भूमि से लगाव है तथा समय-समय पर पारिवारिक कार्यक्रमों में आते रहते हैं।
-प्रेरणादायी परंपरा है 'पानी पंचायत'
-खेतों की सिंचाई को जड़धार गांव के ग्रामीणों ने बनाई यह परंपरा
-बदले में पैसा नहीं, लिया जाता है अनाज
चम्बा (टिहरी):
विकास योजनाओं के अलावा सामूहिक भागीदारी के कामों को संपन्न कराने में अकसर
ग्रामीण आपस में भिड़ जाते हैं। खासकर सिंचाई के पानी का सार्वजनिक बंटवारा ऐसा काम है, जिसका विवादों से चोली-दामन का साथ रहता है, लेकिन जड़धार गांव की सदियों पुरानी परंपरा 'पानी पंचायत' दूसरे गांवों के लिए मिसाल बनकर उभरी है। दरअसल, सिंचाई के लिए पानी का बंटवारा इसी पंचायत की देखरेख में किया जाता है। किसी विवाद की स्थिति में ग्रामीण आपस में लड़ने की बजाय पंचायत का निर्णय ही मानते हैं।
टिहरी जनपद के चम्बा प्रखंड की ग्राम पंचायत जड़धार गांव में सदियों पुरानी पानी पंचायत आज भी कार्य कर रही है। पंचायत का कार्य है किसानों की जरूरत के अनुसार खेतों तक पानी पहुंचाना और समय-समय फसलों की सिंचाई करना। जड़धार गांव लगभग चार सौ परिवारों वाला हेंवलघाटी का सबसे बड़ा गांव है। यहां के लोगों के नागणी में बड़े भू-भाग पर सिंचित खेत हैं। खेतों की सिंचाई के लिए सदियों पुरानी व्यवस्था है, जो पानी पंचायत या जल समिति द्वारा तय की जाती है। सिंचित खेतों में मुख्य रूप से धान और गेहूं की फसल ली जाती है।
गांव के बड़े-बुर्जुगों ने बडी सूझबूझ से ऐसी व्यवस्था बनाई की सभी को पानी मिल सके और किसी तरह का विवाद न हो। हालांकि, पानी पंचायत का गठन कब हुआ, किसी को पता नहीं, लेकिन गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि यह सदियों पुरानी परंपरा है। गांव के समाजसेवी विजय जड़धारी का कहना है, कि पानी पंचायत न होती, तो पानी के बंटवारे को लेकर लोग आपस में झगड़ते, सभी को एक साथ पानी चाहिए तो यह संभव न होता। ऐसे में आज भी पंचायत के लोग बारी-बारी से जरूरत के अनुसार गूल के जरिए खेतों तक पानी पहुँचाते हैं। इसमें सभी समुदायों की भागीदारी होती है और किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता।
सिंचाई के बदले पंचायत के लोगों को धन नहीं, बल्कि अनाज दिया जाता है, वह भी उपज के अनुसार। पंचायत का चुनाव हर वर्ष होता है। खास बात यह है कि जिन नियम- कायदों के आधार पर विवादों के निर्णय लिये जाते है, वे लिखित नहीं बल्कि मुंहजबानी हैं। काम का बंटवारा, कब, कौन, कहां, किसके खेतों में पानी देगा, कब बैठक होगी, काम के बदले लिये अनाज का बंटवारा आदि कार्य भी सिर्फ आपसी विश्वास के आधार पर मुंहजबानी ही किए जाते हैं। खास बात यह है कि पंचायत में लिए निर्णय पर कोई सदस्य मुकर नहीं सकता।
समय के साथ पानी पंचायत की भूमिका में और अधिक व्यापकता आई है और आज इसके सदस्य सिंचाई करने के साथ खेतों की जंगली जानवरों से सुरक्षा भी करते है। इतना ही नहीं, पंचायत की देखरेख में खेतों के निकट सामुदायिक घास भी उगाई गई है। पंचायत को मिलने वाले अनाज को सिंचाई व अन्य कार्य करने वाले करीब एक दर्जन लोगों को बांट दिया जाता है, यानी यह पंचायत इन ग्रामीणों की रोजी का जरिया भी है।
पानी पंचायत के वर्तमान मुखिया मंगल सिंह का कहना है कि यह सामूहिक भागीदारी का कार्य है। खेतों को कब पानी देना है, यह जिम्मेदारी पानी पंचायत की है। खेत स्वामी को महज अनाज बोने व काटने का कार्य करना होता है, शेष चिंता पंचायत करती है। वह बताते हैं कि पंचायत में अच्छा काम करने वाले सदस्य फिर चुन लिए जाते हैं।
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धान के धनी 'इंद्रासन' गुमनाम
-चावल की महक तो देशभर में फैलाई, पर खुद हैं अनजान
-तराई के कृषक इंद्रासन सिंह ने ही विकसित की थी प्रजाति
, रुद्रपुर: गरीबों का बासमती कहलाने वाले इंद्रासन धान की महक लगभग पूरे देश में फैली हुई है, लेकिन विडंबना देखिए,इस धान को खोजने व विकसित करने वाले कृषक इंद्रासन सिंह गुमनाम हैं।
इंद्रासन प्रजाति का धान पूरे देश में उगाया तथा बड़े चाव से खाया जाता है। अखबारों में मंडी के भावों में इसका प्रमुख स्थान होता है, लेकिन इस सबसे दूर इस प्रजाति को विकसित करने वाला कृषक आज भी सरकारी सम्मान का मोहताज है। सरकार ने तो नहीं, नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन अहमदाबाद ने जरूर वर्ष 2005 में मेधा की पहचान कर उसे तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों सम्मान दिलाया। उत्तराखंड के तराई में स्थित ऊधम सिंह नगर जिला खेती के मामले में काफी समृद्ध है। दूर तक फैले खेत तथा हरियाली यहां की विशेषता है। जिला मुख्यालय रुद्रपुर से करीब 14 किलोमीटर दूर इंद्रपुर गांव है। इसी गांव में रहते हैं इंद्रासन सिंह। वह आजादी के बाद 1952 में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से यहां आकर बसे थे। स्वतंत्रता आंदोलन में 1942 के दौरान जेल जाने के एवज में सरकार की ओर से आवंटित 15 एकड़ भूमि पर खेती करने लगे। बाद में वह 25 वर्षाे तक इंद्रपुर गांव के ग्राम प्रधान भी रहे।
1972 की बात है, एक दिन वह अपने खेत में टहल रहे थे तो रत्ना नामक धान के खेत में उन्हें कुछ ऐसे पौधे दिखाई दिये जो अन्य की अपेक्षा लंबे व स्वस्थ तो थे ही, उनकी बालियां भी चमकदार व हृष्टपुष्ट थीं। इंद्रासन इन पौधों की बढ़वार से आकर्षित होकर उनकी खास देखभाल करने लगे। जब यह धान तैयार हुआ तो उन्होंने कौतूहलवश उसकी बालियां तोड़कर अलग रख दीं। अगले वर्ष उनसे निकला बीज अलग खेत में बोया। पहले वर्ष इसका बीज एक खेत के लायक ही हुआ। बाद में वह साल दर साल इसके बीज को बोते चले गये। इस धान के पौध की लंबाई व बाली देखकर आसपास के किसान भी इससे आकर्षित हुए बिना नहीं रह सके। धीरे-धीरे यह धान समूचे इलाके में बोया जाने लगा। इसके धान का छिलका पतला व चावल चमकदार होने के कारण लोग इसमें खूब दिलचस्पी लेने लगे। यह धान इलाके में बोया तो जा रहा था, लेकिन तब तक इसका कोई नाम नहीं था। इस पर 1978 में गांव के कृषक डॉ.हरवंश ने एक बैठक बुलाई। चूंकि यह प्रजाति इंद्रासन सिंह के प्रयास से ही विकसित हुई थी, इसलिए उन्होंने इसका नामकरण इंद्रासन कर दिया। तब से यह धान इंद्रासन नाम से ही जाने जाना लगा।
इसी दौरान इंद्रासन धान के बारे में पंतनगर विश्वविद्यालय की मासिक पत्रिका किसान भारती में एक लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख को पढ़कर बिहार, उड़ीसा, पंजाब, महाराष्ट्र समेत अन्य प्रदेशों के प्रगतिशील कृषकों ने इंद्रासन सिंह को पत्र भेजकर धान का बीज मंगवाया। धीरे-धीरे इस धान का पूरे देश में उत्पादन किया जाने लगा। चूंकि यह बासमती से मिलता-जुलता था, लिहाजा इसे गरीबों का बासमती भी कहलाया जाने लगा।
विडंबना यह है कि जिस धान को आज समूचे देश में बोया अथवा खाया जाता है, उसी धान को विकसित करने वाला कृषक गुमनामी में जीने को विवश है। सरकार ने उसे कोई पुरस्कार देना तो दूर सम्मानित करना तक उचित नहीं समझा। यह कृषक सरकारी उपेक्षा के कारण अपने गांव में परिवार के साथ रह रहा है। पंतनगर विवि के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक के अनुसार इंद्रासन सिंह ने भले ही विज्ञान के दृष्टिकोण से कोई नई खोज नहीं की हो, लेकिन धान की एक प्रजाति तो विकसित की ही है। इस लिहाज से वह सम्मान व पुरस्कार के हकदार हैं।
अब गांवों में नहीं रहना चाहते लोग
-राज्य गठन के बाद तेजी से बढ़ा शहरीकरण
-नगरों में बढ़ीं समस्याएं, गांव हो रहे हैं खाली
पिथौरागढ़: प्रदेश से हो रहे पलायन के साथ ही बढ़ता शहरीकरण भी गंभीर समस्या बनता जा रहा है। शहरों से नाममात्र की दूरी पर रहने वाले ग्रामीण भी अब गांव छोड़ रहे हैं, बढ़ते शहरीकरण से जहां शहरों में तमाम समस्याएं बढ़ रही हैं, वहीं ग्रामीण विकास योजनाओं पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
उत्तराखण्ड गांवों का ही प्रदेश है, पूरे प्रदेश में 16826 गांव हैं। नगरों की संख्या 70 के आस-पास है। राज्य गठन की अवधारणा के पीछे गांवों का विकास तेज करना था, लेकिन धरातल पर हुआ उल्टा है। इसकी पुष्टि खुद सरकारी आंकड़े करते हैं। प्रदेश के सीमांत जिले पिथौरागढ़ को उदाहरण के रुप में देखे तो वर्ष 2001 में जिले की कुल जनसंख्या का 80 प्रतिशत गांवों में रह रहा था। पिछले नौ वर्षो में इस आंकड़ें में भारी बदलाव आया है। पिथौरागढ़ नगर की जनसंख्या 2001 में 59000 थी आज यह संख्या 80 हजार से ऊपर पहुंच चुकी हैं। दूरदराज के गांवों के साथ ही छोटे-छोटे कस्बों से भी लोगों शहर में आ रहे हैं। इससे नगरों में तमाम समस्यायें पैदा हो रही हैं। नगर के आस-पास के गांव आज नगर के वार्डो में बदल गये हैं। बढ़ते शहरीकरण से तमाम समस्यायें खड़ी हुई हैं। नगर और उसके आस-पास के गांवों में जमीन के दाम पिछले दस वर्षो में दस गुने से भी ऊपर चले गये हैं। इन गांवों में रहने वाले लोग आज भूमिहीन होने की स्थिति में हैं। नगर में सफाई, सड़क, रास्ते, पानी, बिजली जैसी तमाम दिक्कतें जन दबाव के चलते खड़ी हुई हैं। नये विकसित मोहल्लों में आवागमन के लिए न रास्ते हैं और पानी की व्यवस्था। सीवर निस्तारण बड़ी समस्या बना हुआ है। तमाम समस्याओं के बावजूद गंावों से नगरों में हो रहा पलायन जारी है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद एवं समाजसेवी प्रो.प्रभात उप्रेती कहते हैं यह अनियोजित विकास का परिणाम है। गांवों में शिक्षा, चिकित्सा, संचार, यातायात जैसी सुविधाओं की कमी लोगों को शहरों में आने के लिए मजबूर करती हैं। उनका कहना है गांवों को छोड़ कस्बों तक में भी शिक्षा की सुविधायें नहीं हैं। आम आदमी अन्य समस्यायें झेल भी ले लेकिन बच्चों की पढ़ाई से वह समझौता नहीं चाहता है, इसी के चलते आर्थिक रुप से थोड़ी सी सम्पन्नता होने पर ही गांव के लोग शहरों की और रुख कर लेते हैं। बढ़ते शहरीकरण से नगरों में तो समस्यायें पैदा हो ही रही हैं गांव भी लगातार खाली हो रहे हैं। गांवों में आज आर्थिक रुप से कमजोर परिवार या फिर बुजुर्ग ही शेष रह गये हैं। सर्वोदयी मोहन सिंह रावत का कहना है इस समस्या का समाधान महात्मा गांधी के विचारों से ही संभव है। गांवों को शिक्षा, चिकित्सा, यातायात जैसी मजबूत बुनियादी सुविधायें देकर ही बढ़ते शहरीकरण पर रोक लगायी जा सकती है।
आंकड़ों की नजर में शहरीकरण
गांव कुल परिवार शहरों में
---- -------- बसे परिवार
बीसाबजेड़ 431 111
टोटानौला 317 120
खर्कदौली 21 14
सटगल 480 80
बुंगाछीना 392 76
देवलथल 427 119
बिसौनाखान 485 113
मोडी 120 90
-'खूनी' नाम की छांव तले मासूमों का गांव
केंद्र को प्रस्ताव भेजा, गांव का नाम बदलने का अनुरोध
-लोगों के लिए अभिशाप साबित हो रहा अपने ही गांव का नाम
-गांव का नया नाम 'पनियालीछीना' करने का आग्रह
'झिक् ह्वेगी आब नाति यां रूंन' (बस बहुत हो गया अब नहीं रहना यहां)..
'ह्वेगी अब और न सुणी जानू' (बस अब और नहीं सुना जाता)। अल्मोड़ा के 'खूनी' गांव में रहने वाले खिन्न गोविंद के मुंह से अब ऐसी बाते सुनने को नहीं मिलेगी। दरअसल लंबे अरसे से गांव वालों के लिए 'अभिशाप' बने गांव का नाम बदलने की फरियाद कर रहे लोगों की राज्य सरकार ने सुन ली है अब बारी केंद्र की है। सरकार ने गृह मंत्रालय को इस आशय का एक प्रस्ताव भेज गांव का नाम बदलने का अनुरोध किया है।
जागेश्वर विधान सभा क्षेत्र के अंतर्गत अल्मोड़ा जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर जैंती तहसील के लमगड़ा ब्लाक के इस गांव का नाम खूनी कैसे पड़ा, पूर्व प्रधान नयन सिंह बताते हैं करीब तीन सौ साल पूर्व चंपावत जिले के 'खूना' गांव के करीब दो दर्जन राजपूत परिवारों (वोरा)ने यहां डेरा डाला और सर्व सहमति से अपने नये आसरे का नाम खूनी रखा। चूंकि लोग बड़े ही सीधे-सादे स्वभाव के थे इसलिए किसी ने सोचा भी नहीं था कि भविष्य में गांव का नाम उनके लिए अभिशाप भी बन सकता है। बकौल नयन सिंह, जैसे-जैसे लोग शिक्षित होकर रोजगार की तलाश में बाहर गये उन्हें गांव का नाम अखरने लगा। दोस्तों और रिश्तेदारों के मुंह से गांव के नाम पर मजाक उड़ाने से वे और भी परेशान हो उठते, नौबत यहां तक आ पहुंची कि गांव के नाम की काली छाया शादी ब्याह पर भी पड़ने लगी, रिश्तेदारी में दिक्कतें आने लगी। देखते ही देखते अरसा बीत गया। पर पिछले कुछ सालों से गांव का नाम बदलने की मांग जोर पकड़ने लगी और करीब ढाई सौ आबादी वाली ग्राम पंचायत ने जिला प्रशासन को अपनी व्यथा सुनाई, तब प्रशासन ने लोगों की भावनाओं की कद्र करते हुए शासन को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। इस पर शासन स्तर से कार्यवाही शुरू हुई। सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेज गांव का नाम 'पनियालीछीना' करने का आग्रह किया है। गांव का नया नाम ग्राम पंचायत और जिला प्रशासन की ओर से सुझाया गया है। स्थानीय विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल के मुताबिक खूनी नाम से लोग उकता चुके हैं, नाम बदले जाने पर वे राहत की सांस लेंगे। बकौल विधायक मंत्रालय की ओर से शीघ्र हरी झंडी मिलने की उम्मीद है।
:एक और गांव का नाम बदलेगा
सरकार ने इसी आशय का एक और प्रस्ताव गृह मंत्रालय को भेज अल्मोड़ा के सल्ट तहसील के 'मल्ली महरौली' गांव का नाम 'स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गांव' रखने का आग्रह किया है। प्रस्ताव के मुताबिक आजादी की लड़ाई में वर्ष 1942 में गांव वालों ने अंग्रेजों का डटकर सामना किया था और उन्हें अंग्रेजी हुकूमत का शिकार होना पड़ा था। इस दौरान यहां के दो लोग शहीद हुए कई लोगों को जेल भी जाना पड़ा था।
Friday, 12 February 2010
बीते दिनों की बात हुए 'तिबारी और 'जंगला
-विलुप्ति की कगार पर पहुंची पहाड़ की परंपरागत भवन निर्माण शैली
-नगरों से लेकर गांवों तक में कंक्रीट के ढांचों का बढ़ रहा दायरा
उत्तराखंड-सदियों पहले पर्वतीय परिवेश की जरूरतों के मुताबिक विकसित हुई भवन निर्माण शैली विलुप्ति की कगार पर है। नगरीय इलाकों के साथ अब गांवों में भी कंक्रीट के ढांचे आकार लेने लगे हैं, जिनमें पुरानी शैली का बिलकुल इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसके चलते कभी पर्वतीय घरों की पहचान रहे तिबारी और जंगला भी बीते दिनों की बात बनते जा रहे हैं।
कभी पहाड़ की पहचान के तौर पर जाने जाने वाले परंपरागत निर्माण शैली से बने मकान अपना सदियों पुराना स्वरूप खोते जा रहे हैं। कभी पहाड़ी पूर्वजों ने पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों के मुताबिक लकड़ी, पत्थर, मिट्टी से बने इन मकानों का निर्माण शुरू किया था। इन घरों में बनने वाली तिबारी, देहरी, जंगला, खोली आदि बेहद कलात्मक होते थे। खास बात यह है कि पत्थरों की मोटी दीवार और उसके बाहर खास तरह की मिट्टी (कमेड़ा) की परत इन मकानों को वातानुकूलित बनाए रखती थी, जिससे ये घर सर्दियों में गर्म व गर्मियों में ठंडे रहते थे। इतना ही नहीं, मकान की बनावट में देवदार, तुन, शीशम व चीड़ का इस्तेमाल इस तरह किया जाता था कि ये भूकंपरोधी होते थे। मकान का डिजाइन इस तरह बनाया जाता था कि दो से तीन मंजिला मकानों में लकड़ी की सीढिय़ां अंदर ही बनी होती थीं, जिससे दूसरी मंजिल पर जाने को बाहर आने की जरूरत नहीं रहती।
इन भवनों का वास्तु शिल्प भी पुराने कारीगरों की मेहनत को बयां करता है। तिबार में लगे लकड़ी के खंबों समेत दरवाजे, खिड़कियों व जंगलों पर की गई नक्काशी काबिले तारीफ थी। हालांकि, उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में भौगोलिक स्थितियों के अनुरूप भवन शैलियों में अंतर भी पाया जाता है, लेकिन छत के लिये पठाल व दीवारों की मजबूती के लिये लकड़ी के मोटे खंबों का इस्तेमाल सभी जगह समान रूप से होता था।
हर तरह से पहाड़ के लिए उपयोगी होने के बावजूद नगरीकरण की होड़ में पहाड़वासी खुद अपनी पहचान को छोड़ते जा रहे हैं। गत दो दशक में पर्वतीय नगरों, कस्बों सहित सड़क से सटे गांवों में ऐसे परंपरागत मकानों का अस्तित्व काफी सिमट गया है। जिन गांवों में सड़कें नहीं पहुंच सकी हैं, वहां भी घोड़ों- खच्चरों के जरिए सीमेंट, सरिया आदि निर्माण सामग्री पहुंचाकर आधुनिक मकान तैयार किए जाने लगे हैं।
उधर, परंपरागत भवन निर्माण शैली के हाशिये पर जाने से इसके कारीगरों का रोजगार छिन गया है। ये लोग मजदूरी से जुडऩे लगे हैं। मुस्टिकसौड़ निवासी बलवीर, जमनालाल व विमला ने बताया कि दस साल पहले तक उन्हें ऐसे मकान बनाने का काम मिल जाता था, लेकिन अब कोई इसके लिए तैयार नहीं है।
आर्किटेक्ट केसी कुडिय़ाल के मुताबिक परंपरागत भवन शैली पहाड़ों में अनुभव के आधार पर तैयार हुई थी। वह कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के दौर में ऐसे मकानों की जरूरत भी बढ़ गई है। इनमें लखवाड़ में महासू देवता मंदिर व धराली में परंपरागत व आधुनिक शैली के मिश्रण से तैयार हो रही एक इमारत शामिल हैं।
संस्कृत को प्रोत्साहन
सूबे में संस्कृत को दूसरी राजभाषा का दर्जा देने के बाद सरकार ने इस भाषा के प्रचार-
प्रसार के लिए बहु आयामी कदम उठाने के संकेत दिए हैं। देवभूमि उत्तराखंड में देववाणी समझी जाने वाली संस्कृत के उत्थान के लिए माहौल उपयुक्त है, ऐसा सरकार का मानना है। दो साल की अवधि में संस्कृत के लिए अलग महकमा, निदेशालय का गठन तो किया ही गया, दूसरी राजभाषा का दर्जा देकर सरकार ने रोजगार के नए अवसर मुहैया कराने के संकेत भी दिए हैं। संस्कृत भाषा को प्रोत्साहन सिर्फ नई योजनाएं बनाने से ही नहीं मिल सकता। योजनाओं को जमीन पर उतारने के साथ ही इस क्षेत्र में रोजगार के नए मौके पैदा करने की जरूरत है। संस्कृत भाषा फिलवक्त पूजा-अर्चना व कर्मकांड तक सीमित है। वेद अध्ययन, शोध व आयुर्वेद के ज्ञान के लिए संस्कृत भाषा में दीक्षित होना जरूरी है। आमतौर पर संस्कृत महाविद्यालयों में अध्ययन करने वालों को पंडिताई या शिक्षक के तौर पर रोजगार उपलब्ध हो रहा है। उच्च रोजगार के मौके बेहद सीमित हैं। इस वजह से आम अभिभावक अपने बच्चों को संस्कृत में अध्ययन के लिए प्रोत्साहित करने से बचता ही है। राज्य सरकार ने संस्कृतपाठियों को आईएएस व पीसीएस की परीक्षा की तैयारी के लिए प्रोत्साहित करने का बीड़ा उठाया है, उससे इस भाषा में अध्ययन करने वालों को पिछड़ेपन की मनोभावना से निजात मिलेगी। इस नजरिए से उत्तराखंड देश का पहला राज्य होगा, जहां संस्कृत पर इसतरह फोकस किया गया है। एक प्राचीनतम भाषा के रूप में संस्कृत के विकास उसके प्रचार-प्रसार के लिए उठाए जा रहे कदमों से संस्कृत के गर्भ में छिपे ज्ञान के भंडार के साथ भाषा व संस्कृति की जड़ों को टटोलने का मौका नई पीढ़ी को मिल सकता है। वैश्वीकरण व बाजारीकरण के इस दौर में नई पीढ़ी ने हौसलों से नई उड़ानें तो भरी हैं, लेकिन सांस्कृतिक क्षरण व नैतिकता के बोध का ह्रास तेजी से हुआ है। उम्मीद की जानी चाहिए कि संस्कृत में सामाजिकता व नैतिकता के बोध से ओतप्रोत शिक्षा देश के भावी कर्णधारों में सांस्कृतिक चेतना का विकास करेगी।
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Tuesday, 2 February 2010
यहां सरकंडा की कलम से होता है लेखन
होल्डर, पेन व पेंसिल का नहीं किया जाता है प्रयोग
1974 में खुला था प्राथमिक विद्यालय अपर छरबा
विकासनगर(देहरादून):पछवादून में एक ऐसा भी विद्यालय है, जहां न होल्डर, न पेन और न ही पेंसिल का प्रयोग होता है। यहां केवल लकड़ी (सरकंडा) की कलम से लेखन होता है। जब से यह विद्यालय खुला है, तब से यहां यही परिपाटी चलती आ रही है। लकड़ी की कलम के प्रयोग से विद्यार्थियों का लेख सुंदर बनता है, वहीं अभिभावकों को पैसे भी खर्च नहीं करने पड़ते।
सहसपुर विकासखंड अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय अपर छरबा में लकड़ी की कलम के सिवा लेखन में और किसी चीज का प्रयोग नहीं किया जाता है। विद्यालय की स्थापना वर्ष 1974 में हुई थी। स्कूल के पहले हेडमास्टर ने यहां छात्रों से लकड़ी की कलम से लेखन शुरू कराया था, उसके बाद से लगातार यही परंपरा चलती आ रही है। कक्षा एक से लेकर पांच तक हर बच्चा लेखन में लकड़ी की ही कलम का प्रयोग करता है। अन्य विद्यालयों में छात्र लेखन में होल्डर, पेन व पेंसिल का प्रयोग करते हैं, लेकिन यहां ऐसा नहीं है। यहां अध्ययनरत विद्यार्थियों का लेखन भी काफी साफ-सुथरा है। इस विद्यालय में विभिन्न कक्षाओं में 105 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। बच्चों को लेखन में कोई दिक्कत न आए, इसके लिए विद्यालय में हर विद्यार्थी के लिए डेस्क की व्यवस्था है। छात्र टाट-पल्ली पर बैठकर डेस्क पर कॉपी रखकर लिखते हैं। स्कूल में कक्षा पांच में अध्ययनरत अनुजा व तनुजा का कहना है कि उन्होंने विद्यालय में तीसरी कक्षा में दाखिला लिया था। इससे पूर्व, उन्होंने जौनसार में एक राजकीय प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई की। जब वे यहां आई तो उनका लेखन साफ नहीं था, लेकिन जब से उन्होंने लकड़ी की कलम से लिखना शुरू किया, उनकी राइटिंग काफी सुंदर हो गई है। विद्यालय की अध्यापिका सावित्री भटनागर का कहना है कि लकड़ी की कलम से अक्षर साफ-साफ और बढि़या ढंग से लिखे जाते हैं। कक्षा पांच तक लेखन में जितना सुधार हो गया, वही आगे चलता है। इसके बाद लेखन में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हो पाता। उनका कहना है कि विद्यालय में साफ-सुथरे लेखन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। अन्य विद्यालयों से जो छात्र आते हैं, लकड़ी की कलम से लेखन करने से उनकी राइटिंग भी सुधर जाती है। छात्रों द्वारा लेखन में प्रयुक्त की जाने वाली कलम सरकंडा की लकड़ी से बनाई जाती है, जो गांव में काफी अधिक मात्रा में पाई जाती है। एक लकड़ी की कलम एक साल से अधिक चल जाती है। इससे अभिभावकों को पेन व पेंसिल पर पैसे खर्च नहीं करने पड़ते हैं।
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पंचायतीराज में भी 'शक्ति' बनेगी नारी
पहाड़ी सूबे में पंचायतीराज व्यवस्था की रीढ़ बन चुकी है मातृशक्ति
-नारी सशक्तीकरण के चौतरफा प्रयासों से मजबूत होंगी पहाड़ी सूबे की पंचायतें
-महिला बाल विकास, समाज कल्याण व शिक्षा विभाग से बंधी उम्मीदें
- लंबे संघर्ष के बूते पहाड़ी राज्य का सपना साकार करने वाली मातृशक्ति अब उत्तराखंड में पंचायतीराज व्यवस्था की रीढ़ बन चुकी हैं। सितंबर 2008 में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में पहली दफा सूबे की नारीशक्ति को 50 फीसदी प्रतिनिधित्व मिला। वर्ष 2009 'आधी-आबादी' को मिले इस सम्मान की खुमारी में गुजरा, तो अब नूतन वर्ष 2010 में नारी-सशक्तीकरण की मुहिम को सही मायने में अमलीजामा पहनाने के लिए सरकारी महकमे नए जोश के साथ जुट गये हैं।
सितंबर 2008 में हरिद्वार को छोड़कर बाकी सभी 12 जनपदों में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में कुल 61011 में से 30473 सीटों पर महिला प्रत्याशी निर्वाचित हुई। इनमें 3817 ग्राम प्रधान, 24831 ग्राम पंचायत सदस्य, 1622 क्षेत्र पंचायत सदस्य व 203 जिला पंचायत सदस्य शामिल हैं। साफ है कि राज्य सरकार द्वारा लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे में 'आधी-आबादी' को 50 फीसदी आरक्षण दिए जाने के बाद पहाड़ी सूबे की पंचायतों की कमान मातृशक्ति के हाथों में आ गई है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि 59.6 प्रतिशत महिला साक्षरता (जनगणना 2001) वाले राज्य की यह पंचायतें वास्तव में कितनी शिक्षित, जागरूक व सक्षम होंगी। सचाई यह भी है कि 2008 पंचायत चुनावों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों में 17 फीसदी अशिक्षित व तकरीबन 17 फीसदी ही कहने भर को साक्षर हैं। यही कारण है, कि लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे से शुरू हुई नारी-सशक्तीकरण की इस मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए अभी लंबा सफर तय करना होगा।
खासतौर पर दूर-दराज व ग्रामीण अंचलों में निरक्षरता इसमें बड़ी बाधा बनकर सामने आ रही है, लेकिन सरकार ने महिलाओं को साक्षर बनाकर विकास की नई इबारत लिखने की जो योजनाएं गढ़ी हैं, उससे नववर्ष की नई उमंगों व उम्मीदों को पंख लगते दिख रहे हैं। कन्याओं को सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक रूप से बराबरी का दर्जा दिलाने में महिला एवं बाल विकास विभाग की नंदादेवी कन्या योजना उम्मीद की किरण जगाती है। इसके तहत बीपीएल परिवार में जन्म लेने वाली दो बालिकाओं को 5000 रुपये दीर्घावधि जमा योजना के रूप में दी जाएगी।
इसे कन्या के 18 वर्ष पूर्ण होने व हाईस्कूल उत्तीर्ण करने के बाद ही भुनाया जा सकेगा। समाज कल्याण विभाग की गौरादेवी कन्या धन योजना के तहत वित्त वर्ष 209-10 में इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण करने वाली बीपीएल परिवार की कन्याओं को 25000 रु. की वित्तीय सहायता दी जाएगी। पिछड़ी जाति के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति, आश्रम पद्वति विद्यालयों के जरिए भी महिला शिक्षा को प्रोत्साहित किया जा रहा है। शिक्षा विभाग ने भी इस दिशा में कई उम्मीदें जगाई हैं।
सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा गारंटी केंद्र, वैकल्पिक शिक्षा केंद्र, निशुल्क पाठ्य पुस्तक, मध्याह््न भोजन, बालिकाओं की प्रारंभिक शिक्षा के राष्ट्रीय कार्यक्रम के साथ-साथ कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय भी इस दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे।
निदेशक, विद्यालयी शिक्षा पुष्पा मानस बताती हैं कि इस वर्ष शासकीय विद्यालयों में छात्राओं की सुविधा के लिए कॉमन-रूम, शौचालय निर्माण के साथ ही बालिकाओं को छात्रवृत्ति भी दी जानी हैं।
इंटरमीडिएट तक निशुल्क बालिका शिक्षा के अलावा कक्षा 8 में की शत-प्रतिशत छात्राओं को कक्षा 9 में प्रवेश दिलाने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। जाहिर है, अलग-अलग मोर्चे पर होने वाले इन प्रयासों के बूते नारी-सशक्तीकरण की उम्मीदें धरातल पर नजर आएंगी। जिसके फलस्वरूप त्रिस्तरीय पंचायतों की कमान शिक्षित, जागरूक व समक्ष नारीशक्ति के हाथों में होगी।
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'एमटीएम' बनने की राह पर पहाड़ की नारी
सरकार के होमवर्क से प्रतिभा निखारने को तैयार 'आधी आबादी'
बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार होगा मुख्य फोकस
'पहाड़ की नारी, सब पर भारी' का जुमला इस साल चरितार्थ होने की दहलीज पर है। सरकार महिलाओं को सशक्त बनाने का होमवर्क पूरा कर चुकी है तो देहात से लेकर शहर तक की नारी मल्टी टास्क मैनेजर (एमटीएम) की भूमिका निभाने को तैयार है। खेत-खलिहान से लेकर आफिस और घर-परिवार से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों तक महिलाएं अपनी प्रतिभा से किसी को भी हतप्रभ कर सकती हैं। उन्हें केवल प्रोत्साहन की दरकार है और इसका ताना-बाना बुना जा चुका है।
देवभूमि की जुझारू और संघर्षशील नारी को अगर जरूरत है तो केवल उचित अवसर की। उनके पास काबलियत भी है और कुछ करने का जज्बा भी। नववर्ष में एक नई सोच और आत्मविश्वास के साथ तरक्की के रथ पर सवार जल, जंगल व चारे के ताने-बाने के बीच देवभूमि में महिलाएं मल्टी टास्क मैनेजर के रूप में नजर आएंगी। और हो भी क्यों नहीं, जब लक्ष्य तय है और निशाना बेहतर है। प्रयासों में कोई कंजूसी नहीं। पहाड़ हो या फिर तराई का अंतिम छोर। आगाज ठीक है, तैयारी चुस्त है, काम दुरुस्त है तो नये साल में अंजाम भी बेहतर होने की उम्मीद है।
नए साल में योजनाओं का लाभ सही और सुनिश्चित कराने को सरकारी प्रयास तेज होंगे तो इसके सही मायने समझने को महिलाओं की भी तैयारी पूरी है चाहें गांव की हो या शहर की। हम कह सकते हैं कि सरकारी प्रयास में बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार मुख्य फोकस रहेगा। सभी गांवों में आंगनबाड़ी केंद्र खोले जाएंगे मौजूदा केंद्रों व मिनी केंद्रों के लिए प्री-स्कूल किट और मेडिसील किट उपलब्ध कराई जाएगी। लैंगिक असमानता दूर करने,भ्रूण हत्या रोकने, बाल विवाह को कम करने के साथ ही कन्या शिशु को आर्थिक सुरक्षा प्रदान की योजना पर तेजी से काम होगा। राज्य महिला समेकित विकास योजना के तहत महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से महिला समूहों के माध्यम से रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएंगे। चारधाम के प्रसाद वितरण व्यवस्था का जिम्मा महिलाओं को दिया जाना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसी तरह की कुछ योजनाएं और भी है जो आने वाले दिनों में दिखाई देगा। उरेडा के सहयोग से माता समितियों को सोलर कुकर वितरण के काम में तेजी लाने के प्रयास किए जाएंगे। कामकाजी महिलाओं की बढ़ती तादाद को देखते हुए उनके आवास की व्यवस्था अब हर जिले में कराने की तैयार की जा रही है। इसके लिए सभी जिलों में हास्टल निर्माण पर काम शुरू होगा। मोनाल परियोजना के अंतर्गत 11 से 18 वर्ष के बीच की करीब एक हजार किशोरियों को आत्मरक्षा के गुर सिखाने के लिए उत्तराखंड प्रशासन अकादमी नैनीताल के सहयोग से मास्टर ट्रेनर बनाया जाएगा। ये ही मास्टर ट्रेनर सूबे के सभी विकास खंडों की किशोरियों को आत्मरक्षा के गुर सिखाएंगी।
संयुक्त राष्ट्र संघ की मदद से सूचना शिक्षा और संचार रणनीति का मसौदा तैयार करने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाएगी। बीपीएल श्रेणी से नीचे के परिवारों की कन्याओं को शिक्षा उपलब्ध कराने की योजनाओं का और विस्तार होगा। घरेलू हिंसा रोकने को बने कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर दिए जाने के साथ राज्य महिला आयोग के अंतर्गत जनपद स्तर पर महिला अधिकार उत्पीड़न मामलों की सुनवाई एवं निस्तारण की प्रक्रिया सुनिश्चित करने की तैयारी है।
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Saturday, 30 January 2010
-खाली हो रही देश की द्वितीय रक्षा पंक्ति
-चमोली जिले में तिब्बत सीमा पर सटे गांवों से पलायन बढ़ा
-सुरक्षा से लिहाज से माना जा रहा है खतरनाक
-बार्डर विलेज के बाशिंदों को माना जाता है 'द्वितीय रक्षा पंक्ति'
-भारतीय गांवों की अपेक्षा तिब्बती गांवों में विकास की गति तीव्र
गोपेश्वर(चमोली)
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से यह समाचार बेहद चिंताजनक है। उत्तराखंड के तिब्बत की सीमा से सटे भारतीय गांवों में पलायन तेजी से बढ़ रहा है। आलम यह है कि कई सीमांत गांवों में वर्तमान में जनसंख्या वर्ष 1991 के मुकाबले महज आधी रह गई है। इन गांवों का अपेक्षित विकास न होना पलायन का मुख्य कारण माना जा रहा है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर द्वितीय रक्षा पंक्ति माने जाने वाले ग्रामीणों की संख्या में तेजी से आ रही कमी को लेकर प्रशासन और सेना के अफसर भी चिंतित नजर आ रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि भारत-तिब्बत सीमा पर चमोली जनपद के माणा, नीती, गमशाली, बाम्पा, मलारी, कैलाशपुर, जेलम, जुम्मा समेत दस गांव बसे हुए हैं। इन गांवों के लोग शीतकाल में छह महीने के लिए जिला मुख्यालय के आसपास बसे गांवों में आ जाते हैं और गर्मी के मौसम में वे फिर वहीं लौट जाते हैं, लेकिन सीमा पर स्थित होने के बावजूद इन गांवों का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है। लिहाजा, यहां के परिवार एक के बाद एक पलायन करते जा रहे हैं। हालात इस कदर खराब हो चुके हैं कि अधिकांश गांवों की जनसंख्या 1991 से आधी कम हो चुकी है। सीमांत गांवों के विकास पर विशेष फोकस न किया जाना इसकी एक सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। इनमें से अधिकांश गांव तो मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित हैं। ऐसी विकट स्थिति में ग्रामीण गांव छोड़कर रोजगार और सुविधा की तलाश में बड़े पैमाने पर बाहर जाने लगे हैं।
दूसरी ओर, इन गांवों से लगे तिब्बती गांवों की बात करें, तो वहां चीन (वर्ष 1959 में कब्जे के बाद) पर्यटन विकास की दिशा में उल्लेखनीय कदम बढ़ा रहा है। वहां के गांवों में संचार सुविधाएं मुहैया कराने के बाद न सिर्फ सड़कों का चौड़ीकरण किया गया, बल्कि ल्हासा से किघाई प्रांत तक रेलवे लाइन तक बिछा दी गई, जिससे इन गांवों के लोगों को जनजीवन में आमूल-चूल परिवर्तन देखने को मिला।
यहां यह भी बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर बसे गांवों की भूमिका सुरक्षा की दृष्टि से अहम मानी जाती है। भौगोलिक परिस्थितियों से भलीभांति वाकिफ होने की वजह से यहां के लोगों को द्वितीय रक्षा पंक्ति के रूप में देखा जाता है। इसके बावजूद भारत के गांवों का विकास न होना भविष्य के लिए खतरा बढ़ाता है। जोशीमठ में तैनात सेना के अफसर भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि सीमांत गांवों से ग्रामीणों का पलायन सुरक्षा के लिहाज से अच्छा नहीं है। हालांकि उनका कहना है कि यह देखना होगा कि ये गांव बार्डर पर फ्रंट, इंटरमीडिएट अथवा डैप्थ जोन में से किसमें बसे हैं।
''यह बेहद गंभीर विषय है। सीमांत गांवों से पलायन रोकने के लिए नई योजना तैयार की जाएगी। इस सम्बंध में सैन्य अधिकारियों के साथ बैठक कर उनसे भी सुझाव लिए जाएंगे''
- नीरज सेमवाल, जिलाधिकारी चमोली।
माणा और नीति घाटियों की आबादी
वर्ष 1991 वर्ष 2001 गांव परिवार जन परिवार जन
माणा 199 942 186 594
नीती 47 123 54 98
गमशाली 71 208 78 147
बाम्पा 35 97 46 74
मलारी 128 564 89 434
कैलाशपुर 41 143 44 245
जेलम 100 409 85 315
जुम्मा 82 214 27 98
कागालगा 21 72 14 58
गरपक 09 49 08 33
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अब दुनिया जानेगी गढ़वाली बोली
-अब दुनिया जानेगी गढ़वाली बोली
-जल्द आने वाला है 'गढ़वाली-हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोष'
-गत पांच वर्ष से निर्माण में जुटे हैं चार साहित्यकार
-अब तक 45 हजार गूढ़ गढ़वाली शब्दों को शामिल किया
-अखिल गढ़वाल सभा देहरादून की पहल पर हो रही है इसकी रचना
गोपेश्वर(चमोली)
गढ़वाली लोकधुनों में पिरोए कर्णप्रिय गीत सुनने अच्छे लगते हैं, लेकिन इसके बोल समझ नहीं आते, तो परेशान होने की जरूरत नहीं। गढ़वाली बोली में रुचि रखने वालों के लिए अच्छी खबर है। अखिल गढ़वाल सभा देहरादून की पहल पर सूबे के चार नामी साहित्यकार गत पांच वर्ष से 'गढ़वाली-हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोष' (डिक्शनरी) तैयार करने में जुटे हुए हैं। मई- जून तक यह शब्दकोष बाजार में आने की उम्मीद है। अब तक 45 हजार गढ़वाली शब्द इसमें संग्रहित किए जा चुके हैं।
'गढ़वाली भाषा एवं साहित्य समिति' पिछले कई वर्ष से गढ़वाली बोली के संरक्षण और संवर्धन के भरसक प्रयास कर रही है। यह समिति अखिल गढ़वाल सभा, देहरादून की साहित्य इकाई है। समिति की तत्कालीन अध्यक्ष रजनी कुकरेती और संरक्षक भगवती प्रसाद नौटियाल ने वर्ष 2005 में गूढ़ गढ़वाली शब्दों के संरक्षण और उनका अर्थ समझाने के लिए शब्दकोष बनाने की योजना तैयार की। इसके बाद समिति की बैठक में चार साहित्यकारों का एक पैनल बनाया गया। भगवती प्रसाद नौटियाल देहरादून को शब्दकोष का संयोजक, डा. अचलानंद जखमोला देहरादून, शिवराज सिंह रावत 'नि:संग' गोपेश्वर और प्रोफेसर डा. रुक्मसिंह असवाल उत्तरकाशी को सम्पादक मंडल का सदस्य बनाया गया। ये चारों लोग पिछले पांच वर्ष से गूढ़ और कठिन गढ़वाली शब्दों का चयन कर शब्दकोष में संग्रहित कर रहे हैं। कोष में इन शब्दों का हिंदी और अंग्रेजी में शब्दार्थ दिया गया है।
निर्माणाधीन शब्दकोष के संपादक मंडल के सदस्य शिवराज सिंह रावत 'नि:संग' का कहना है कि कोष में अब तक सभी सदस्यों ने लगभग 45 हजार गढ़वाली शब्दों को शामिल कर लिया है। कोष की रचना आगामी मार्च माह तक पूर्ण कर ली जाएगी। इसके बाद शब्दों की स्क्रूटनी करके इसका प्रकाशन किया जाएगा। 'नि:संग' ने यह भी दावा किया कि कई हिन्दी और अंग्रेजी शब्दों की उत्पत्ति गढ़वाली बोली से ही हुई है।
तो शहर में गुम नहीं होगा गांव का आदमी
आर्थिक सेवाओं की मजबूती पर टिकी नई आस
-ग्रामीण आर्थिकी: न्याय पंचायतें बनेंगी गांवों की मंडियां
-कर्ज से बढ़ी छटपटाहट, नई नीति में है समस्या से छुटकारे का खाका
देहरादून: 'कौन कहता है कि आसमान में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों', दुष्यंत की ये पंक्तियां नए वर्ष 2010 के आगाज के साथ उत्तराखंड के दामन से जुड़ती नजर आ रही हैं। जी हां, 85 लाख का आंकड़ा पारकर एक करोड़ के नजदीक सूबे की आबादी की नई उम्मीदें आर्थिक सेवाओं की मजबूत बुनियाद पर टिकने जा रही हैं। सरकार की योजना परवान चढ़ी तो गांव का आदमी पलायन कर शहरों की गलियों में गुम नहीं होगा। यही नहीं, यह वर्ष भविष्य में 60 हजार से ज्यादा नए रोजगार सृजित करे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
सूबे के संसाधन लंबे समय तक बहु आयामी विकास का सिर्फ भरोसा भर नहीं रहेंगे, बल्कि बेहतर और नियोजित जन संसाधन की बदौलत आम आदमी की चाहत को जमीन पर उतारते दिखेंगे। इसके लिए सरकार आर्थिक सेवाओं, सामान्य सेवाओं व सामाजिक सेवा की 'तिकड़ी' की पहली सीढ़ी को ज्यादा तवज्जो देने जा रही है। कर्ज के बढ़ते जाल से सूबे को बचाने के लिए भी यह कदम उठाना जरूरी हो गया है। उम्मीद की इस रोशनी को उद्योग, उद्यानिकी, वन, पर्यटन और ऊर्जा के क्षेत्रों ने जगाया है। ये क्षेत्र शहरी विकास के साथ ग्रामीण क्षेत्रों की कायापलट का जरिया बनेंगे। सरकार की नई नीति में गांव की पैदावार के लिए मंडी जिला या मंडल मुख्यालयों के बजाए न्याय पंचायतें होंगी। एक न्याय पंचायत तकरीबन आठ से दस गांवों को समेटे है। पर्वतीय और विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इलाकों में उपज के सही विपणन के लिए साझेदारी की इस व्यवस्था को कारगर बनाने की तैयारी है।
सूबे में इस प्रयोग के लिए जमीन तैयार हो चुकी है। पर्वतीय व ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन की बड़ी वजह स्तरीय शिक्षा व रोजगार के अवसरों की कमी है। नान प्लान के बजट में बढ़ोत्तरी सूबे की चिंता बढ़ा रही है। राज्य का प्लान व नान प्लान का बजट ही करीब पंद्रह हजार करोड़ है। कोशिश प्लान के बजट को बढ़ाने की है, ताकि विकास रफ्तार पकड़ सके। सरकारी क्षेत्र पर बोझ कम करने को रोजगार की संभावनाओं वाले प्राइवेट सेक्टर में हरिद्वार, देहरादून व ऊधमसिंहनगर के तराई की करीब तीन हजार फैक्ट्रियों में 1.75 लाख लोगों को रोजगार मिला है।
गांवों और एग्रो बेस्ड इंडस्ट्रीज को रोजगार के नजरिए से नई संभावना का क्षेत्र माना जा रहा है। कच्चे माल पर आधारित इंडस्ट्रीज को पहाड़ों में चढ़ाने की तैयारी है। पिछड़े गांवों प्रतिस्पर्धा को तत्पर हों, इसके लिए उन्हें सेंटर आफ एक्सीलेंस के तौर पर विकसित किया जाएगा। अटल आदर्श ग्राम योजना के रूप में शुरू किए गए प्रयोग का मकसद स्थानीय स्तर पर स्तरीय शिक्षा व रोजगार के संसाधन जुटाना है। उम्मीद है कि इससे गांव का व्यापारी व किसान नई दृष्टि के साथ आगे आएगा। पंचायतों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण के साथ खनन में उनकी भूमिका पर विचार किया जा रहा है। उत्तराखंड में नदियों से चुगान के साथ तांबा, मैग्नासाइड, व अस्कोट जैसे क्षेत्र सोने की खदान की संभावनायुक्त हैं। राज्य की नीति निर्माताओं की मानें तो खनन से ही एक हजार करोड़ की आय संभव है। आय के नए स्रोत 13वें वित्त आयोग की संस्तुतियों का लाभ लेने में सूबे की मदद करेंगे।
ग्रामीण आर्थिकी को खंगालने, उसे विकसित करने से सूबे को शत-प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य भी नजदीक लग रहा है। अभी हरिद्वार, टिहरी, उत्तरकाशी, ऊधमसिंहनगर, बागेश्वर व चंपावत ऐसे जिले हैं, जिनकी साक्षरता का प्रतिशत सूबे के औसत से नीचे है। ग्रामीण पर्यटन रोजगार नए मौके लाया है। नए साल में ऐसे जिलों में आर्थिकी की नई कवायद को ढांचागत सुविधाओं की ठोस बुनियाद के रूप में देखा जा सकता है। प्रदेश के नियोजन मंत्री प्रकाश पंत भी मानते हैं कि ग्रामीण आर्थिकी की मजबूत जमीन तैयार करना जरूरी है। सरकार इसकी तैयारी में जुटी है।
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-पहाड़ी खेती: तैयार हुआ उत्तराखंडी हल
-परंपरागत हल से वजन में काफी हल्का और टिकाऊ
-हल में लकड़ी की बजाए लोहे का उपयोग किया
-सिमली की कृषि संयंत्र इकाई जुटी है इस काम में
उत्तरकाशी, : जिले के काश्तकारों के लिए हल जोतना अब आसान होगा। कृषि संयंत्र इकाई सिमली (चमोली) नपरिक हल से हल्का और टिकाऊ हल तैयार किया है। े उत्तराखंडी हल के नाम से पारंजिला कृषि विभाग ने इस हल के अलावा इकाई द्वारा तैयार नई तरह की दरांती, कुदाल व गार्डन रैक जैसे संयंत्रों का परीक्षण कर लिया है।
समय के साथ पहाड़ में खेती के तौर तरीकों में भी बदलाव जरूरी हैं। इसी दिशा में बीते 11 वर्षो से काम कर रही सिमली स्थित कृषि संयंत्र इकाई ने उत्तराखंडी हल व कुछ अन्य उपकरण तैयार किये हैं। इकाई द्वारा तैयार हल खास तौर पर खेत जोतने के काम को काफी आसान करेगा। परंपरागत हल से काफी हल्के इस हल का वजन महज सात किलो है। इसमें लकड़ी की जगह इस्पात का प्रयोग किया गया है। इसकी फाल पर सात एमएम मोटी पत्ती बनाई गई है। इसमें ऐसी तकनीक का अपनाई गई है कि जुताई के समय फाल को जमीन में कम या ज्यादा गहराई पर रखा जा सकता है। वहीं मिट्टी के बड़े ढेलों को एक बार में ही पूरी तरह तोड़ देता है। हल की लाट काफी हल्की और जुए पर आसानी से फिट हो सकती है।
परंपरागत हल का फाल बनावट ठीक न होने पर कई बार बैलों के पैर से टकराने की समस्या भी आती है। उत्तराखंडी हल की खास बनावट के कारण ऐसा होने की कोई संभावना नहीं है। इसके अलावा महिलाओं के लिये नई तरह दरांतियां व कुदाल भी तैयार की गई हैं, जिनमें लकड़ी का उपयोग काफी कम किया गया है। गार्डन रैक नामक बहुद्देशीय यंत्र से हल लगने के बाद मिट्टी को समतल करने के साथ ही धान कूटना, गोबर निकालना आदि काम किये जा सकते हैं।
शुक्रवार को इकाई के प्रतिनिधियों ने कृषि विभाग में अपने इन यंत्रों का प्रदर्शन किया। विभाग ने यंत्रों का परीक्षण कर उन्हें न्याय पंचायतों में बने कृषि उपकरण विपणन केंद्रों पर भिजवा दिया है। इकाई के संचालक गोपाल राम टम्टा ने बताया कि इन उपकरणों से जहां खेती व अन्य कार्य आसान होंगे, वहीं लकड़ी के कम उपयोग से वनोपज की भी काफी बचत होगी।
जिला कृषि अधिकारी देवेंद्र सिंह रावत ने बताया कि ये उपकरण विभाग की ओर से सब्सिडी पर किसानों को उपलब्ध हैं। उन्होंने बताया कि उत्तराखंडी हल पहाड़ी खेती के लिये एकदम मुफीद है और जल्द ही यह गांवों में नजर आएगा।
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--अटूट आस्था का प्रतीक है 'मदन नेगी'
-यहां भगवान के रूप में मनुष्य की होती है पूजा
-पूजा अर्चना व शुभ कार्य के समय मनदनेगी को चढ़ाते हैं शराब
-देवता के मेले के समय प्रसाद के तौर पर वितरित होती है शराब
, नई टिहरी
यूं तो उत्तराखंड को देवभूमि के रूप में जाना जाता है। पौराणिक आख्यानों व धार्मिक मान्यताओं के तहत माना जाता है कि इस राज्य के कण- कण में देवों का वास है। यही वजह है कि यहां पग- पग पर स्थित शिवालय व सिद्धपीठों के जरिए श्रद्धालु धर्म- अध्यात्म से जुड़े रहते हैं। भगवान के विभिन्न रूपों की पूजा करने की तो यहां परंपरा है ही साथ ही सामाजिक उत्थान की दृष्टि से विशेष योगदान करने वाले मनुष्यों को भी यहां देवता स्वरूप पूजा जाता है। ऐसा ही एक मंदिर है टिहरी जिले में स्थित मदन नेगी।
जिला मुख्यालय से करीब 62 किमी की दूरी पर स्थित जाखणीधार ब्लाक के रैका धारमंडल क्षेत्र के लोगों का प्रमुख देवता है मदन नेगी। मदन सिंह नेगी सदियों पूर्व क्षेत्र में पैदा हुए एक साधारण व्यक्ति थे। हालांकि, उनके बारे में किसी पौराणिक, ऐतिहासिक पुस्तक में वर्णन नहीं मिलता, लेकिन क्षेत्र के बुजुर्गो से जो जानकारी मिलती है, उसके मुताबिक सन् 1700 से लेकर 1740 के बीच नीति माणा से नेगी जाति के चार भाइयों में से दो महाराज नेगी व स्याल नेगी पटुड़ी गांव में, तीसरा भाई चंपूका नेगी कफलोग व चौथा बागा नेगी धारकोट गांव में बसे। इनमें से स्याल नेगी का एक पुत्र हुआ मदन नेगी। बताया जाता है कि मदन नेगी बहुत वीर थे। मदन नेगी की मृत्यु तीस वर्ष की अल्पायु में हुई थी, उस समय वह अविवाहित थे। बताया जाता है कि वह अपने मामा जीतू बगड़वाल के साथ धान रोपने को बैल लेने के लिए पटुड़ी से अठूड़ कोटी गांवआए थे। वापसी में रास्ते में टिहरी राजा के आदेश पर उन्हें रोक लिया गया, उन्हें टिहरी की सीमा के भीतर से होकर न जाने के निर्देश दिए गए। बताया जाता है कि मदन नेगी सुरापान के शौकीन थे और दिन का अधिकांश वक्त वह शराब पीने में गुजारते थे। राजा के आदेश पर वह आक्रोशित हो गए और जमकर शराब का सेवन किया। इसके बाद नेगी व उनके मामा ने टिहरी के बाहरी इलाके से सटे भुज्याड़ी के सेरा रास्ते से घर पहुंचने का निर्णय लिया। यह रास्ता काफी बीहड़ था, रास्ते में एक बैल को भागीरथी पार कराते वक्त नेगी कोटी की धार में नदी में डूब गए।
इस घटना को लंबा वक्त गुजरने के बाद एक बार टिहरी राजा प्रतापशाह अपने रथ पर इस मार्ग से होकर गुजरे, तो उनका रथ कोटी की धार से आगे नहीं बढ़ पाया। दो-तीन बार यही घटना होने पर राजा ने अपने कुल पुरोहितों को बुलाया और चर्चा की। कुलपुरोहितों ने बताया कि उक्त स्थान पर किसी शक्ति का वास है, जिसका पता लगने पर ही निवारण किया जा सकेगा। जब कुल पुरोहितों ने उस शक्ति को अवतरित किया, तो उसने अपने को मदन नेगी बताया और उक्त स्थान पर मंदिर बनाने की इच्छा जाहिर की। नेगी ने मंदिर में प्रसाद रूप में शराब चढ़ाने को भी कहा, साथ ही मंदिर के पास पेड़ पर झूला लगाने को भी कहा। इसके बाद टिहरी राजा ने यहां मंदिर का निर्माण कराया, तब से इस स्थान का नाम मदन नेगी पड़ गया।
सदियों से यहां रैका व धारमंडल क्षेत्र के ग्रामीण प्रतिवर्ष तीन-चार अप्रैल को मेला आयोजित करते हैं। स्थानीय निवासियों में मदन नेगी के प्रति विशेष श्रद्धा है। लोग मंदिर में मन्नतें मांगने के अलावा घर में शादी या अन्य कोई आयोजन होने पर सर्वप्रथम मदन नेगी को शराब चढ़ाते हैं।
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-क्या जेल जाने वाले ही आंदोलनकारी !
-सरकार की ओर से जारी आंदोलन चयन प्रक्रिया से हताश रचनाधर्मी
-आंदोलनकारी धारा ही नहीं, संघर्षात्मक मानव चेतना का भी अपमान
, कोटद्वार (गढ़वाल)
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान तमाम तरह के लोकगीतों व कविताओं से पर्वतीय क्षेत्रों के बाशिंदों को झकझोरने वाले रचनाधर्मी आज बेहद हताश हैं। उनकी ही नहीं, बल्कि राज्य आंदोलन में पूरी निष्ठा से भागीदारी करने वाले प्रत्येक उत्तराखंडी की यह हताशा वर्तमान हालात के साथ ही सरकार की ओर से जारी राज्य आंदोलनकारियों के चिह्नीकरण प्रक्रिया को लेकर भी है।
यूं तो प्रत्येक आंदोलन में रचनाधर्मियों की भागीदारी का अपना महत्व है, लेकिन उत्तराखंड आंदोलन में रचनाधर्मियों की क्रांतिकारी रचनाओं व नारों ने जनगीतों का रूप ले लिया। उन्होंने अभिव्यक्ति के माध्यम से न सिर्फ आंदोलन को बिखराव से बचाया बल्कि, पहाड़ व मैदान के लोगों से एक साथ मिलकर इस लड़ाई में सड़कों पर उतरने का आह्वान भी किया। स्थानीय गढ़वाली-कुमाऊंनी लोकगीतों के साथ ही 'पर्वतों के गांव से आवाज उठ रही संभल, औरतों की मुट्ठियां हवा में तन गई संभल..', 'लड़के लेंगे, भिड़के लेंगे, छीनके लेंगे उत्तराखंड, शहीदों की हमें कसम, मिल के लेंगे उत्तराखंड..' 'ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के..'। जैसे जनगीतों, नारों, नुक्कड़ नाटकों ने पहाड़ को सुलगा दिया था। मकसद था अपने राज्य में आत्म सम्मान को पाना, इसके लिए गांव-गांव से बच्चे, बूढ़े, नौजवान, महिलाएं सड़कों पर उतरे। लेकिन, राज्य गठन के बाद राजनेताओं ने उत्तराखंड को राजनीति के 'तवे' में चढ़ा दिया। हालत यह है कि जिस उत्तराखंड में विकास की बातें होनी चाहिए थी, वहां बातें हो रही हैं आंदोलनकारियों के चयन की। इससे न सिर्फ रचनाधर्मी, बल्कि हर वह उत्तराखंडी बेहद हताश है, जिसने सच्चे मन से उत्तराखंड की लड़ाई लड़ी थी।
क्या कहते हैं रचनाधर्मी
राज्य आंदोलन आत्मसम्मान की लड़ाई थी, जिसकी खातिर प्रत्येक उत्तराखंडी सड़कों पर उतरा, लेकिन आंदोलनकारियों के चयन की बात कर सरकार ने आंदोलनकारियों का घोर अपमान किया है। यह प्रक्रिया भविष्य में होने वाले जनांदोलनों पर भी बुरा प्रभाव डालेगी।
-नरेंद्र सिंह नेगी
'उस लड़ाई में तुम कहां थे, जो अब यहां हो, ये बात तुम बताओ कि अब कहां हो'। उत्तराखंड के विरोधी राज्य गठन के बाद आंदोलनकारियों के चयन के नाम पर न सिर्फ आंदोलनकारी धारा बल्कि, संघर्षात्मक मानव चेतना का भी अपमान कर रहे हैं। चिह्नीकरण के नाम पर प्रदेश सरकार आंदोलनकारियों को बांटने की साजिश रच रही है।
-गिरीश तिवारी 'गिर्दा'
आंदोलन पहचान, पानी, पर्यावरण, पलायन, पर्यटन के लिए लड़ा गया था। राज्य मिला, लेकिन समस्याएं बदस्तूर हैं। यह कहना बेमानी होगा कि आंदोलन समाप्त हो गया है, क्योंकि आंदोलनकारियों की लंबी जमात आज भी राज्य के विकास को संघर्षरत है। ऐसे में आंदोलनकारियों के चयन की बात तो सोचना ही बेवकूफी है।
-डा.अतुल शर्मा
चिह्नीकरण प्रत्येक उत्तराखंडी के लिए शर्म की बात है। सच्चा सिपाही किसी पुरस्कार का मोहताज नहीं। आंदोलनकारियों के चयन से स्पष्ट है कि प्रदेश में गांधीवादी विचारों को कोई अहमियत नहीं है।
-कमल जोशी
आंदोलन के दौरान सबसे बड़ी चिंता इसे मुकाम तक पहुंचाने की थी। प्रत्येक रचनाधर्मी पुलिस से दूरियां बनाकर गांव-गांव में आंदोलन की अलख जगा रहा था, लेकिन सरकार ने चयन प्रक्रिया के नाम पर आंदोलन को चंद लोगों में समेट कर रख दिया है।
-कुटज भारती
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उत्तराखंड में खुलेगा हिंदू अध्ययन केंद्र
-राज्य में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने पर सीएम का अभिनंदन
हरिद्वार, मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि राज्य में हिंदू अध्ययन केंद्र खोला जाएगा। इसमें देश-विदेश के लोग हिंदू संस्कृति के बारे में तथ्यात्मक जानकारी हासिल करेंगे।
रविवार को सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में संस्कृत भारती के तत्वावधान में राज्य में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिए जाने पर आयोजित अभिनंदन समारोह में डा. निशंक ने कहा कि संस्कृत अकादमी प्रत्येक वर्ष संस्कृत प्रतियोगिता आयोजित कराएगी, जिसमें विजेता को एक लाख रुपये के पुरस्कार दिए जाएंगे। डा. निशंक ने कहा कि उत्तराखंड आदि काल से ही अध्यात्म का केंद्र रहा है। यदि भारत विश्व गुरु है तो उत्तराखंड उसका भाल है। चारों वेद, पुराण, उपनिषदों की रचना देवभूमि में ही हुई। राज्य में सरकार द्वारा संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए किए गए कार्यो पर संतोष जताते हुए उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा भाषा के लिए कई कार्य किए गए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सर संघ चालक केसी सुदर्शन ने पूर्व प्रधानमंत्री स्व. जवाहर लाल नेहरू की इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने संस्कृत को राष्ट्रभाषा नहीं बनने दिया। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद डा. भीमराव अंबेडकर ने संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था लेकिन नेहरू ने इसे नकार दिया। श्री सुदर्शन ने कहा कि संस्कृत को केवल राजभाषा बनाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि इसे आम बोल चाल की भाषा बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। उत्तराखंड में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा बनाने का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि देश के अन्य प्रांतों के मुख्यमंत्रियों को भी इस दिशा में सोचना चाहिए। संस्कृत अकादमी के सचिव व संस्कृत भारती के प्रदेश अध्यक्ष डा. बुद्धदेव शर्मा, संस्कृत भारती के संरक्षक आचार्य बुद्धिवल्लभ शास्त्री, विश्व आयुर्वेद परिषद के राष्ट्रीय सचिव डा. प्रेम चंद शास्त्री ने कहा कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। उन्होंने उत्तराखंड में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिए जाने पर मुख्यमंत्री का आभार जताया।
Friday, 29 January 2010
] -महाकुंभ: धर्मध्वजाएं स्थापित, कुंभ का विधिवत आगाज
-जूना अखाड़े की धर्मध्वजा स्थापना के दौरान हादसा टला
-52 हाथ की धर्मध्वजा की पहले हुई पूजा, देवताओं का आह्वान
-महाकुंभ में अखाड़ों से मिली जमीन पर डेरा सजाने का काम शुरू
हरिद्वार, तीर्थनगरी अब महाकुंभ नगरी का रंग लेने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी है। दो दिन में पांच अखाड़ों की पांच धर्मध्वजाओं की शुभ मुहूर्त में स्थापना कर दी गई है। हालांकि जूना अखाड़े की धर्मध्वजा स्थापित करने के दौरान ध्वजा से रस्सी की पकड़ ढीली पड़ गई, जिससे ध्वजा एकाएक एक ओर गिरने लगी। ऐन वक्त पर बमुश्किल इसे रोक लिया गया, जिससे बड़ा हादसा टल गया। धर्मध्वजाओं को स्थापित करने के साथ ही अब महाकुंभ का विधिवत आगाज हो चुका है। अखाड़े अब अपना डेरा बसाने की तैयारी तेज करने में जुट गए हैं।
तीर्थनगरी में 26 जनवरी को जूना, आह्वान और अग्नि जबकि 27 जनवरी को महानिर्वाणी अखाड़ा और अटल अखाड़ा की धर्मध्वजाएं स्थापित की गईं। 26 जनवरी को सबसे पहले नागा संन्यासियों के सबसे मजबूत अखाड़ा जूना अखाड़े में धर्मध्वजा की स्थापना की गई। धर्मध्वजा की स्थापना से पहले ध्वज की पूजा की गई। माया देवी मंदिर में जूना अखाड़े के देवता दत्तात्रेय की चरण पादुका की पूजा अर्चना के बाद ध्वज को बावन हाथ की साल की लकड़ी पर चढ़ाया गया। विधि-विधान से पूजा अर्चना के बाद मोटी रस्सी से धर्मध्वजा की लकड़ी को बांध कर उसे गड्ढे में ले जाने की कवायद शुरू हुई। सभी देवी-देवताओं का आह्वान किया गया। चूंकि धर्मध्वजा 52 हाथ की और बहुत ही भारी थी, इसलिए सैकड़ों की तादाद में साधु-संत इसे थामे हुए थे। धर्मध्वजा की स्थापना के दौरान मंत्रोच्चारण और शंख ध्वनि के बीच घंटों यह प्रक्रिया चली। करीब 11.57 बजे धर्मध्वजा को लगभग स्थापित कर दिया गया था। ध्वज स्थापित होते ही साधु-संत और नागा साधु खुशी से झूमने लगे इसी बीच धर्मध्वजा को रोकने वाले हाथ कमजोर पड़ गए और धर्मध्वजा एक ओर तेजी से गिरने लगी। जिस ओर धर्मध्वजा का हिस्सा गिरने लगा वहां पर मीडिया और साधु-संतों का जमावड़ा लगा हुआ था। बमुश्किल साधू-संतों ने रस्सी को खींच कर धर्मध्वजा को नीचे गिरने से रोक लिया और हादसे को टाल दिया। दूसरी बार हर-हर महादेव के जयघोष से धर्मध्वजा 12.08 के करीब स्थापित हो गई। सभी खुशी से नाच उठे। आह्वान अखाड़े की 52 हाथ की ध्वजा भी विधि-विधान से माया देवी क्षेत्र में स्थापित की गई। ध्वजा को स्थापित करने के दौरान की गई। अग्नि अखाड़े की भी धर्मध्वजा माया देवी परिक्षेत्र में अपने ईष्ट देवता सहित सभी के आह््वान के बाद लगाई गईं। 27 जनवरी को सुबह करीब 10 बजे महानिर्वाणी अखाड़ा कनखल की धर्मध्वजा स्थापित की गई, जबकि अटल अखाड़े की धर्मध्वजा भी दोपहर को लहराई। धर्म ध्वजाओं की स्थापना के बाद अब अखाड़ों में साधु-संत अपने लिए अखाड़ों से मिली जमीन पर अपना डेरा बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ कर चुके हैं। इस मौके पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्री महंत ज्ञानदास, राष्ट्रीय महामंत्री हरि गिरी महाराज, अग्नि के सभापति महंत बापू गोपालनानंद ब्रह्मïचारी, श्री महंत कैलाशानंद ब्रह्मचारी, श्री महंत आनंद चेतन, श्री महंत गोविंदानंद ब्रह्मचारी, अच्युतानंद ब्रह्मचारी, श्री महंत प्रेम गिरी, अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री महंत रामानंद पुरी, स्वामी देवानंद, मेलाधिकारी आनंदबद्र्धन, डीआईजी मेला आलोक शर्मा, सहित प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस के अधिकारी मौजूद रहे।
दो अखाड़ों की धर्मध्वजाएं आज लगेंगी
हरिद्वार: निरंजन और आनंद अखाड़े की धर्मध्वजाएं लगाने की तैयारी पूरी हो चुकी है। निरंजन अखाड़े के श्री महंत रामानंद पुरी ने बताया कि बृहस्पतिवार को धर्मध्वजा सुबह दस बजे लगाई जाएगी।
महाकुंभ: आसमान से बातें करने लगीं धर्मध्वजाएं
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-सीना तानकर खड़ी पांच धर्मध्वजाओं ने रच दिया इतिहास
-धर्मध्वजाएं लहराते ही झूम उठे हजारों साधु, संत और आम जन
-ऋचाओं में वेद मंत्र, शंखनाद, घंटा घडिय़ाल ने माहौल में फूंका भक्ति रस
हरिद्वार: तीर्थनगरी ने धर्म की अनूठी मिसाल पेश कर इतिहास रच दिया। जूना, आह्वïन, अटल, अग्नि और महानिर्वाणी अखाड़ों की धर्मध्वजाएं जब सीना तानकर आसमान की बुलंदियां छूने को आतुर हुईं तो ऐसा लगा कि मानो वह आसमान से बातें कर रही हों। हजारों संत और आम जन इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बने।
ऋचाओं में वेद मंत्र और शंख की ध्वनि घंटों गूंजती रही। महाकुंभ के माहौल को रंगने के सिलसिले में धर्मध्वजा ने पूरी ताकत झोंक दी। माना जा रहा है कि अब धीरे-धीरे तीर्थनगरी कुंभ नगर का स्वरूप लेते हुए महाकुंभ में डूब जाएगी। अखाड़ों में धर्म के प्रचार-प्रसार का अनूठा सिलसिला जल्द ही शुरू होगा।
महाकुंभ में तीर्थनगरी के मायादेवी मंदिर और माया देवी क्षेत्र में 26 जनवरी को इतिहास रचा गया। एक तरफ देश भक्ति के गीत गूंज रहे थे, वहीं ऋचाओं में वेद मंत्र, घंटे-घडिय़ाल की ध्वनि, शंख से निकली पवित्र ध्वनि, हर-हर महादेव के जयकारों से गूंज रही थी। हजारों आंखें इस अद्भ्त क्षण को देखने के लिए आतुर थीं। सैकड़ों हाथ धर्मध्वजा को आसमान की बुलंदियों तक पहुंचाने के लिए बेकरार दिखे। माया देवी मंदिर में जूना अखाड़े की धर्मध्वजा के ऊपर मोर पंख लगाकर जब साधु, संत और नागाओं ने उसे आसमान से बाते करने को लहराया तो तालियों की गडग़ड़ाहट से माहौल गूंज उठा। नागा साधुओं ने अपने करतब दिखाने शुरू कर दिए। नोटों की जमकर बारिश हुई। धर्मध्वजा का आशीर्वाद लेने को आम जन टूट पड़ा। पूरा माहौल महाकुंभ के सागर में डुबकी लगाता हुआ नजर आया। पचास से अधिक की तादाद में बैंड बाजों के भक्ति गीत वातावरण में मिठास घोल रहे थे। महिला संवासिनियों ने भी धर्मध्वजा के सीना तानकर खड़े होने पर खुशियां मनाईं। माया देवी मंदिर प्रांगण और माया देवी मंदिर क्षेत्र का नजारा पहली बार ऐसा लग रहा था कि अब महाकुंभ की जमात में साधुओं के कुंभ की शुरुआत हो रही है। गेरुआ धारी संतों की मायानगरी में अचानक बढ़ी चहलकदमी यह बता रही थी कि धर्मध्वजा को लेकर पिछले कई महीनों से उनकी तैयारी यूं ही नहीं थी।
महाकुंभ: क्षणभर को बनता है कुंभ का दुर्लभ योग
-हरिद्वार में कुंभस्थ गुरु होने पर मेष संक्रांति को बनता है कुंभ स्नान का योग
-प्रयाग में माघ मौनी अमावस्या, उज्जैन में वैशाख पूर्णिमा, नासिक में भाद्रपद कुशोत्पाटिनी अमावस्या को कुंभ का योग
-संसारबंधन से मुक्तकर अमरत्व प्रदान करता है इस खास घड़ी पर किया गया स्नान
-हरिद्वार व प्रयाग में तीन-तीन, उज्जैन में दो और नासिक में चार कुंभ स्नानों का विशिष्ट महात्म्य
हरिद्वार
'विष्णु पुराण में कहा गया है कि एक बार अश्वमेध यज्ञ, सौ बार वाजपेय यज्ञ और एक लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने का जो फल है, वही एक बार कुंभपर्व स्नान करने से मिलता है। इसी तरह 'स्कंद पुराण में उल्लेख है कि कार्तिक में एक हजार बार, माघ में एक सौ बार गंगा स्नान करने और वैशाख में एक करोड़ बार नर्मदा स्नान करने का जो फल है, वही फल एक बार कुंभ स्नान का है। यह फल क्या है, इसे 'विष्णुयागÓ में इस तरह परिभाषित किया गया है, 'जो मनुष्य कुंभपर्व के समागम में सम्मिलित होकर स्नान करते हैं, वे संसार बंधन से मुक्त होकर अमरत्व को प्राप्त होते हैं। उनके सामने देवतागण वैसे ही नमन करते हैं, जैसे धनवानों के सामने निर्धन लोगÓ।
क्या सचमुच ऐसा संभव है और इसका जवाब यह है कि आस्था कुछ भी संभव करा सकती है। आप सोच रहे होंगे कि फिर तो अपनी भी लाटरी लग गई। अभी तो तीन महीने बाकी हैं, किसी भी दिन जाकर पुण्य बटोर लेंगे, लेकिन ऐसा है नहीं। कुंभपर्व का यह दुर्लभ योग तो घड़ी विशेष पर बनता है। इस कुंभपर्व में यह योग 14 अप्रैल को मेष संक्रांति पर बन रहा है। 'विष्णुयाग में कहा गया है कि कुंभराशिस्थ गुरु के समय जब सूर्य का मेष संक्रमण होता है, तब हरिद्वार में कुंभ नामक उत्तम पर्व का योग होता है। इस पुण्य घड़ी में समस्त पृथ्वी के साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हरिद्वार में उपस्थित होते हैं। इसलिए वहां स्नान करने से पृथ्वी के समस्त तीर्थों का स्नान हो जाता है। हरिद्वार कुंभपर्व के तीन स्नान प्रमुख माने गए हैं, पहला महाशिवरात्रि, दूसरा चैत्र कृष्ण अमावस्या और तीसरा मेष संक्रांति। यह तीसरा स्नान ही कुंभपर्व का वास्तविक स्नान है।
प्रयाग कुंभपर्व का पुण्यदायी योग माघ की मौनी अमावस्या को बनता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि कुंभपर्व के तीनों प्रमुख स्नान माघ में ही होते हैं। हरिद्वार में होने वाले उत्तरायणी व माघ पंचमी के सामान्य स्नान यहां कुंभपर्व के महास्नान हैं, लेकिन इनमें मौनी अमावस्या का द्वितीय स्नान उस घड़ी में पड़ता है, जब गुरु वृष और सूर्य व चंद्रमा मकर राशि में आ जाते हैं। इस पावन योग पर ब्रह्मï, विष्णु, महादेव, रुद्र, आदित्य, मरुद्गण आदि देवता गंगा-यमुना के संगम में होते हैं। 'स्कंद पुराण के अनुसार प्रयाग में गंगा-यमुना का जल माघ में सब प्राणियों से कहता है कि 'अद्र्ध उदित सूर्य के समय जो प्राणी यहां आकर डुबकियां लगाता है, वह महापापी होने पर भी पवित्र बन जाता है।
उज्जैन कुंभपर्व पर वैसे तो तीन स्नान होते हैं, लेकिन मुख्य दो ही माने गए हैं। हरिद्वार कुंभपर्व का मेष संक्रांति को पडऩे वाला मुख्य स्नान यहां सामान्य स्नान होता है। द्वितीय स्नान वैशाख कृष्ण अमावस्या और तृतीय वैशाख पूर्णिमा का है। परंपरा के अनुसार उज्जैन कुंभपर्व के मुख्य स्नान के लिए सिंहस्थ बृहस्पति, मेषस्थ सूर्य, वैशाख मास, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा तिथि, तुला राशिस्थ चंद्रमा, स्वाति नक्षत्र, व्यतिपात योग, सोमवार व अवंतिका क्षेत्र, ये दस योग माने गए हैं। इसी दिन कुंभपर्व का प्रधान स्नान होता आया है। प्राय: यह योग वैशाख पूर्णिमा को होता है।
'स्कंद पुराण में उल्लेख है कि सिंह राशि में गुरु, सूर्य एवं चंद्रमा स्थित हों और अमावस्या का योग हो, तब गोदावरी के उद्गम स्थल कुशावर्त कुंड त्र्यंबक में पृथ्वी पर कुंभपर्व होता है। गोदावरी सिंहस्थ कुंभपर्व के कुशावर्त कुंड त्र्यंबकेश्वर में होने वाले चार मुख्य स्नान हैं, जिनमें पहला श्रावण कृष्ण अमावस्या, दूसरा सिंह संक्रांति, तीसरा श्रावणी पूर्णिमा व चौथा भाद्रपद कुशोत्पाटिनी अमावस्या को होता है, जो कि कुंभपर्व का सबसे महत्वपूर्ण स्नान है। 'पद्मपुराण में उल्लेख है कि साठ हजार वर्ष तक भागीरथी में स्नान का जो फल है, वही फल सिंहस्थ गुरु के अवसर पर एक बार गोदावरी में स्नान करने से मिलता है।
कुंभपर्वों का क्रम
हरिद्वार कुंभ : कुंभस्थ गुरु होने पर मेष संक्रांति के दिन
प्रयाग कुंभ : वृषस्थ गुरु होने पर मकरस्थ सूर्य की अमावस्या के दिन तीन वर्ष बाद
हरिद्वार अद्र्धकुंभ : सिंहस्थ गुरु होने पर मेष संक्रांति के दिन छह वर्ष बाद
उज्जैन कुंभ : सिंहस्थ गुरु होने पर मेषस्थ सूर्य की अमावस्या के दिन छह वर्ष बाद
नासिक कुंभ : सिंहस्थ गुरु होने पर सिंहस्थ सूर्य की अमावस्या के दिन छह वर्ष बाद
प्रयाग अद्र्धकुंभ : वृश्चिकस्थ गुरु होने पर मकरस्थ सूर्य की अमावस्या के दिन नौ वर्ष बाद
हरिद्वार कुंभ : पुन: कुंभस्थ गुरु होने पर मेष संक्रांति के दिन 12 वर्ष बाद
खुदाई में मिली मूर्तियां खोल रही देवभूमि के रहस्य
-गढ़वाल मंडल में पुरातात्विक खुदाई में सूर्य, शिव, विष्णु, गणेश व दुर्गा की मिलीं सर्वाधिक मूर्तियां
-आठवीं-नवीं सदी में पहाड़ी शिल्पकला थी उच्च शिखर पर
पौड़ी गढ़वाल
देवभूमि उत्तराखंड का वर्णन विभिन्न पौराणिक आख्यानों में मिलता है। रामायण, महाभारत व वेद- पुराणों में वर्णित विभिन्न घटनाओं का यहां से संबंध रहा है। गढ़वाल मंडल में विभिन्न स्थानों पर चल रही पुरातात्विक खुदाई भी उत्तराखंड के ऐतिहासिक महत्व को प्रमाणित करती है। खुदाई से पता चला है कि उत्तराखंडवंशी पंचदेवों सूर्य, शिव, विष्णु, गणेश और दुर्गा की सबसे अधिक पूजा करते थे। इतना ही नहीं, आठवीं-नवीं सदी में उत्तराखंड की शिल्पकला भी उच्च शिखर पर थी।
बदरी- केदार व यमुनोत्री- गंगोत्री धामों के साथ हिमालय की उच्च पर्वत श्रृंखलाएं उत्तराखंड को देवस्थान बनाती हैं। इसके अलावा उत्तरकाशी में लाखामंडल मंदिर समूह, रैथल मंदिर समूह, शिव मंदिर, चमोली में कुलसारी, टिहरी में सूर्य मंदिर पलेठी व पौड़ी में वैष्णव मंदिर समूह, देवल मंदिर समूह, पौड़ी के पैठाणी में स्थित राहु मंदिर यहां पूजे जाने वाले देवी- देवताओं की जानकारी देते हैं। इन मंदिरों का वास्तु व शिल्पकला भी अनूठे हैं। मंदिरों की बनावट ऐसी है कि गर्भगृह में गूंजने वाले मंत्रों- स्वरों से विशेष तरंगें पैदा होती हैं। इसके अलावा गढ़वाल मंडल में कई ऐसे मंदिर भूगर्भ में दबे हुए हैं, जो पहाड़ी शिल्पकला के रहस्यों को उजागर करते हैं।
पुरातत्व विभाग की ओर से विभिन्न स्थानों पर खुदाई के जरिए मंदिरों की जानकारी जुटाई जा रही है। इसके अलावा जनपद उत्तरकाशी में रैथल मंदिर समूह क्यार्क, जमदग्नि मंदिर थान, महासू मंदिर पूजेली, महासू मंदिर गैर व शिव मंदिर पौंटी का मंदिर जीर्णोद्धार किया जा रहा है। जनपद चमोली में लक्ष्मीनारायण मंदिर कुलसारी, रुद्रप्रयाग में महड़ मंदिर, टिहरी में सूर्य मंदिर पलेठी व जनपद पौड़ी में वैष्णव मंदिर समूह देवल (कोट), शिव मंदिर पैठाणी, प्राचीन मंदिर समूह कुक्खड़ गांव का जीर्णोद्धार प्रस्तावित है।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डा. बीपी बडोनी ने बताया कि विभिन्न मंदिरस्थलों की खुदाई के दौरान आठवीं- नवीं सदी की पाषाण मूर्तियां मिली हैं, जिनकी शिल्पकारी बेहद उच्चकोटि की है। उन्होंने बताया कि अधिकांश मूर्तियां सूर्य, विष्णु, शिव, गणेश व दुर्गा की मिली हैं, जिससे पता चलता है कि प्राचीन काल में यहां इन्हीं पंचदेवों की पूजा मुख्य रूप से की जाती थी। उन्होंने बताया कि उत्तरकाशी के ज्ञाणजा में मिली कृष्णमूर्ति, देवल मंदिर समूह, वैष्णव मंदिर समूह समेत अन्य मंदिरों पर शोध भी चल रहे हैं।
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तो रोल माडल बन सकता है उत्तराखंड
देवभूमि मुस्कान योजना पर तेजी से हो रहा काम
केंद्र की टीम लेगी योजना की प्रगति का जायजा
देहरादून, राज्य सरकार की कोशिशों पर केंद्र ने मुहर लगा दी तो आने वाले दिनों में सूबे के ही नहीं दूसरे अन्य राज्यों के खनन क्षेत्रों में रह रहे बच्चे शिक्षित होने के साथ-साथ सेहतमंद भी होंगे। जी हां हम बात कर रहें हैं खनन श्रमिकों के स्वास्थ्य पोषण एवं शिक्षा की समुचित सुविधा उपलब्ध कराने वाली देवभूमि मुस्कान योजना की, जिस पर सभी की निगाहें टिकी है।
सूबे के ईट भट्टे, कंस्ट्रक्शन साइट और खनन क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक परिवारों के बच्चों की चिंताजनक हालत को सुधारने का दावा तो जाने कई वर्षों से किया जाता रहा पर शुरूआत करीब चार वर्ष पूर्व नैनीताल में शुरू हुई। इसे देवभूमि मुस्कान योजना का नाम दिया गया। इसके तहत स्थापित किए गए 41 केंद्रों पर आंगनबाड़ी के माध्यम से उक्त परिवारों के 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को आठवीं तक की पढ़ाई के साथ उनके बेहतर स्वास्थ्य की व्यवस्था की जानी है।
महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास,स्वास्थ्य, शिक्षा और वन विभाग के संयुक्त प्रयासों का नतीजा है कि योजना के तहत नैनीताल में पांच व ऊधमसिंह नगर में एक दर्जन केंद्र केंद्र तेजी से काम कर रहें हैं। महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास की मानें तो पिछले सप्ताह नंदौर रीवर के किनारे आधा दर्जन ऐसे केंद्रो पर नए सिरे काम शुरू कराया गया जिससे ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंदों को इसका फायदा दिलाया जा सके। सूबे के लिए योजना इसलिए और भी मायने रखती है क्योंकि सरकार का यह प्रयास यदि केंद्र के पैमाने पर खरा उतरा तो योजना देश के दूसरे राज्यों में लागू किया जाएगा। लिहाजा उत्तराखंड दूसरे राज्यों के लिए रोल माडल बन जाएगा।
सूत्रों ने बताया कि सूबे की सरकार ने योजना पर तेजी से काम करने के निर्देश सभी विभागों को दिए हैं। मुख्यमंत्री डा.रमेश पोखरियाल निशंक ने भी योजना की प्रगति पर संतोष जताया है। सूत्रों ने बताया कि इस माह के अंत में दो दिवसीय दौरे पर आ रही केंद्र की एक टीम योजना की प्रगति का जायजा लेगी। योजना के तहत किए जा रहे काम के जिस तरह सकारात्मक परिणाम आ रहे हैं उसे देखकर उम्मीद है कि राज्य सरकार केंद्र के पैमाने पर खरी उतरेगी। सूबे के लिए यह अहम इसलिए भी है कि क्योंकि केंद्र की सहमति के बाद योजना का खर्च केंद्र उठाएगी। याद रहे योजना पर अब तक का सारा खर्च राज्य सरकार ने उठाया है।
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दून में बनी 'वीर की 'तलवार
--आज देशभर में रिलीज होगी सलमान खान की फिल्म 'वीर
-दून में बनी हैं फिल्म में प्रयोग की गईं तलवार
-पिंडारी मॉडल में बनी है तलवार
-इससे पूर्व धारावाहिक चंद्रकांता और हॉलीवुड की कई फिल्मों के लिए तैयार कर चुके हैं वैपन्स
देहरादून
दून में बनीं वस्तुएं देश-विदेशों में अपना डंका बजा रही हैं। इस बार रुपहले परदे पर जो अपनी चमक बिखेरने को बेकरार है वह है यहां की बनी एक तलवार। यह तलवार पिंडारियों की साहसिक गाथा को प्रदर्शित करने वाली सलमान खान की फिल्म 'वीरÓ में नजर आएगी। इतना ही नहीं, फिल्म में युद्ध में प्रयोग किए गए हथियारों का निर्माण में दून में ही हुआ है। ये सभी हथियार देहरादून के पटेलनगर स्थित दून हैंडीक्राफ्ट में बने हैं।
सलमान खान की बहुप्रतिक्षित फिल्म 'वीर शुक्रवार को देश भर में रिलीज हो रही है। इस फिल्म से ही लोगों में पिंडारियों के प्रति जिज्ञासा बढ़ी। डायरेक्टर अनिल शर्मा निर्देशित फिल्म 'वीर में सलमान खान के हाथ में चमचमाती तलवार दून की बनी हुई है। सलमान खान ने इस फिल्म में पिंडारी योद्धा की भूमिका निभाई है। सलमान खान जिस तलवार से अपने दुश्मनों के सरों को कलम करते हैं, उसे देहरादून के कुशल कारीगरों ने तैयार किया है। इस फिल्म में इस्तेमाल होने वाले भाले और टोप भी इसी फैक्ट्री में बने हैं।
दून हैंडीक्राफ्ट के मालिक मोहम्मद जावेद कहते हैं कि लगभग डेढ़ साल पहले फिल्म के प्रोड्यूसर विजय गलानी का फोन आया और उन्होंने फिल्म के लिए तलवार बनाने को कहा। इसके बाद पिंडारियों के समय की तलवार के फोटो के जरिए इसका सैंपल तैयार किया गया। सैंपल तैयार करते समय बहुत ही एहतियात बरतनी पड़ी। इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि ऐतिहासिकता बरकरार रहे। इसके बाद सैंपलों को मुंबई भेजा गया, वहां से स्वीकृति मिलने के बाद ही फिल्म के लिए तलवार तैयार की गईं। उन्होंने बताया कि इससे पहले वे धारावाहिक चंद्रकांता और हालीवुड की कई फिल्मों के लिए वैपन्स तैयार कर चुके हैं। तलवार के साथ-साथ फिल्म में प्रयोग कई अन्य हथियार भी दून में ही बनाए गए हैं। श्री जावेद ने बताया कि तलवार का वजन कुल दो किलो है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका पिंडारी मॉडल में बना होना है। उन्होंने बताया कि सलमान खान के लिए बनाई गई तलवार की कीमत तीस हजार रुपये है। इस फिल्म में प्रयोग भाले, टोपे वाली तलवार का निर्माण भी यहीं किया गया है।
ओंकारेश्वर दर्शन में पंचकेदारों का पुण्य
-स्कंद पुराण में है मंदिर के महत्व का उल्लेख
-साल भर किए जा सकते हैं भगवान के दर्शन
, रुद्रप्रयाग
समय की कमी है, सेहत साथ नहीं दे रही या शारीरिक रूप से सक्षम नहीं हैं, लेकिन मन में भगवान केदारनाथ समेत परम आस्था के केंद्र पंचकेदारों के दर्शन की इच्छा भी बलवती हो, तो परेशान होने की जरूरत नहीं। पंचकेदारों के गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर में भगवान शिव के पांचों स्वरूपों के दर्शन का लाभ लिया जा सकता है। खास बात यह है कि जहां केदारधाम के कपाट शीतकाल में बंद रहते हैं, वहीं ओंकारेश्वर मंदिर में साल भर श्रद्धालु दर्शन कर सकते हैं।
उत्तराखंड में भगवान शिव के पांच स्वरूप स्थापित हैं। इनमें केदारनाथ के साथ तुंगनाथ, मदमहेश्वर, कल्पेश्वर और रुद्रनाथ मंदिर शामिल हैं। प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु पांचों केदार मंदिरों में भगवान का दर्शन करने पहुंचते हैं, लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित होने के कारण शीतकाल में मौसम की विपरीत परिस्थितियों में यहां मानवीय गतिविधियां नगण्य रहती हैं। ऐसे में शीतकाल में पांचों केदारों की गद्दियां ओंकारेश्वर मंदिर में स्थापित की जाती है। ग्रीष्मकाल में पंचकेदारों के कपाट खुलने के बाद भी उनके स्वरूपों की पूजा यहां की जाती है। ऐसे में ओंकारेश्वर मंदिर में वर्ष भर पांचों केदारों के दर्शन किए जा सकते हैं।
मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण में भी मिलता है। इसके मुताबिक इस मंदिर में पंचकेदारों दर्शन से उतना ही पुण्य मिलता है, जितना कि केदारनाथ व अन्य चार केदारस्थानों पर दर्शन का मिलता है।
हालांकि, धार्मिक व पौराणिक महत्व होने के बावजूद पर्यटकों व श्रद्धालुओं को ओंकारेश्वर मंदिर के बारे में जानकारी नहीं है। जहां केदारनाथ में ग्रीष्मकाल में पांच लाख व अन्य चारों केदारों में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, वहीं गद्दीस्थल होने के बावजूद ओंकारेश्वर मंदिर में सीमित संख्या में ही भक्त पहुंचते हैं। जानकारी के अभाव में अधिसंख्य श्रद्धालु ग्रीष्मकाल में कपाट खुलने के बाद ही पंचकेदारों के दर्शन करते हैं।
इस संबंध में मंदिर समिति के कार्याधिकारी अनिल शर्मा का कहना है कि मंदिर समिति लगातार भक्तों को पांचों केदारों के बाबत जानकारी उपलब्ध कराती रहती है। उन्होंने बताया कि मंदिर के विकास व जनसामान्य को यहां आने के लिए प्रेरित करने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं।
-खतरे में हैं उत्तराखंड के मखमली बुग्याल
-एचआरडीआई और वन विभाग की आरएमई रिपोर्ट में हुआ खुलासा
-वनस्पति प्रजातियों की संख्या में आ रही है भारी गिरावट
-पादपों के कम होने से बढ़ सकता है भूस्खलन कर खतरा
गोपेश्वर(चमोली),
उत्तराखंड के मखमली बुग्यालों का अस्तित्व संकट में है। मवेशियों का अनियंत्रित चुगान और जड़ी-बूटियों का अवैज्ञानिक दोहन आनेवाले समय में इन बुग्यालों का वजूद खत्म कर सकता है। यह खुलासा जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान (एचआरडीआई) और वन विभाग द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई शोध रिपोर्ट 'रेंडम मैपिंग एक्सरसाइज(आरएमई) में हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक बुग्यालों में कई घास और औषधीय पादपों की प्रजातियां तेजी से कम हो रही हैं।
उत्तराखंड के गढ़वाल हिमायल में हिमशिखरों की तलहटी में टिंबर लाइन (पेड़ों का उगना) समाप्त हो जाती है और मखमली घास के मैदान शुरू हो जाते हैं, जिन्हें बुग्याल कहा जाता है। बुग्याल आमतौर पर आठ से 10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित होते हैं। शीतकाल में ये बुग्याल बर्फ से लकदक रहते हैं, जिससे प्राकृतिक सौंदर्य और निखरकर सामने आता है। इन बुग्यालों में मखमली घास के साथ औषधीय पादपों की 250 से 300 तक प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से अधिकांश दुर्लभ हैं। पिछले कुछ वर्षों में बुग्यालों में मानवीय दखल बढ़ा है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव यहां की वनस्पति पर पड़ रहा है।
जड़ी- बूटी एवं विकास संस्थान गोपेश्वर और वन विभाग ने हाल ही में स्थानीय बुग्यालों पर एक रेंडम मैपिंग एक्सरसाइज की, जिसकी रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार नंदा देवी, फूलों की घाटी, गंगोत्री राष्ट्रीय पार्क और कुछ वन पंचायतों को छोड़कर कई बुग्यालों में स्थानीय तथा घुमंतू चरवाहे मवेशियों को चराने और जड़ी-बूटियां ढूंढऩे जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार उत्तराखंड के बुग्यालों में करीब डेढ़ लाख भेड़- बकरियां और करीब दस हजार गाय-भैंस व घोड़े-खच्चर चरते हैं। नतीजतन, बुग्याल में वनस्पतियों का आवरण घटने के साथ खरपतवारों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है, जिसका बुग्यालों के वजूद पर बुरा असर पड़ रहा है।
जड़ी बूटी शोध एवं विकास संस्थान के निदेशक डा. आरसी सुन्दरियाल का कहना है कि इन दो कारणों से बुग्याल में अतीश, कटुकी, जटामासी, वनककड़ी, मीठा, सालमपंजा, सुगन्धा आदि प्रजातियों की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। दूसरी ओर, केदारनाथ वन प्रभाग के डीएफओ धीरज पांडे के मुताबिक बुग्यालों में मवेशियों के चुगान से भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि बुग्यालों के संरक्षण के लिए विभाग की ओर से एक प्रोजेक्ट तैयार कर शासन को भेजा गया है।
उत्तराखंड के प्रमुख बुग्याल, अनुमानित क्षेत्रफल और मवेशियों की संख्या
प्रमुख बुग्याल क्षेत्रफल (वर्ग मीटर में) मवेशियों की संख्या
1. पलंग गाड़, छियालेख-गब्र्याल, कालापानी, नाबी, ढांग, लीपूलेख, नम्पा, कुटी, सेला यांगती ज्योलिंग कॉग
365 15000 भेड़-बकरी व 250 गाय-भैंस
2. चोरहोती, कालाजोवार, नीती, तिमर सेन, गोथिंग, ग्यालडुंग, ढामनपयार, मलारी
280 188500 भेड़-बकरी
व 350 गाय भैंस
3. सुंदर ढुंगा, पिण्डारी, कफनी, नामिक 125 2000 भेड़-बकरी व 350 गाय भैंस
4. धरांसी, सरसो पातल, भिटारतोनी वेदनी औली, रूपकुंड
215 4500 भेड़-बकरी व 500 गाय भैंस
5. सतोपंथ, ढानू पयार, सेमखरक, देववन, नीलकंठआधार, खीरोंघाटी, फूलों की घाटी, राजखर्क, कागभुसण्डी
220 4800 भेड़-बकरी व 300 गाय भैंस
6. रूद्रनाथ, तुंगनाथ, विसूरी ताल, मनिनी, खाम, मदमहेश्वर, केदारनाथ, वासुकीताल
235 14000 भेड़-बकरी व 1500 गाय भैंस
Friday, 1 January 2010
साजिश का शिकार हुआ
देहरादून, आंध्र प्रदेश राज्यपाल पद से इस्तीफा देने वाले नारायण दत्त तिवारी का कहना है
कि वे तेलंगाना संघर्ष की राजनीति का शिकार हुए हैं। श्री तिवारी ने कहा कि जनता की सेवा का उनका आंदोलन जारी रहेगा। हैदराबाद से देहरादून लौटे श्री तिवारी ने पत्रकारों से संक्षिप्त वार्ता की। स्वयं पर लगे आरोपों के बारे में पूछे गए एक सवाल पर उनका कहना है कि सब बेबुनियाद बातें हैं। असल में वे तेलंगाना संघर्ष की साजिश का शिकार हुए हैं। वहां राजभवन में रोजाना सैकड़ों लोग घुसने की कोशिश करते रहे हैं। वे लोग चाहते थे कि राज्यपाल अपने स्तर से इस बारे में कुछ कहें। संवैधानिक पद पर रहते हुए उनके लिए कुछ कहना संभव हीं नहीं था। इसी से नाराज लोगों ने एक साजिश के तहत आरोप लगाए। अब 86 साल की उम्र में ऐसे आरोप खुद की असलियत बयां करने को काफी है। आरोप लगाने वालों के खिलाफ कानूनी जंग के सवाल पर श्री तिवारी ने कहा कि लोग जो चाहें कहें, उन्हें किसी से कुछ भी नहीं कहना है। कहीं संघर्ष होता है तो जनसेवा करने वालों पर भी कुछ छींटे पड़ ही जाते हैं। सक्रिय राजनीति से संन्यास के सवाल पर कांग्रेसी नेता ने कहा कि वे महात्मा गांधी के शिष्य रहे हैं और जवाहर लाल नेहरू से उन्होंने बहुत कुछ सीखा है। फिर आजादी का संग्राम लड़ने के बाद से ही जनता की सेवा में लगे हैं। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया है। पहले तो कुछ दिनों तक यहीं रहकर आराम करना है। फिर नए साल में उत्तर प्रदेश की तरफ जाने का इरादा है। सभी के आशीर्वाद और दुआओं से शायद कुछ वर्ष और जी लूंगा। श्री तिवारी ने कहा कि उत्तर प्रदेश के 200 से अधिक गांवों के लोग उत्तराखंड में आने की मांग कर रहे हैं। इसकी वजह यही है कि इस राज्य का तेजी से विकास हुआ है और यूपी में लोग मायावती से आजिज आ चुके हैं। इस मांग के समर्थन विषयक एक सवाल पर श्री तिवारी ने कहा कि इसका फैसला तो देश की संसद को ही करना है। फिर भी देखा जनता की मांग पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इससे पहले तिवारी का देहरादून पहुंचने पर एयरपोट और गेस्ट हाउस में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने जोरदार स्वागत किया।
मोहना तेरि मुरलि बाजी ग्वाल-बालों का संग
देहरादून, प्रसिद्ध गढ़वाली लोकगायक प्रीतम भरतवाण के जागर व गीत और राजन-साजन मिश्रा के
शास्त्रीय गायन से सजी विरासत-2009 की चौदहवीं शाम में चार चांद लगा दिए। यादगार बनी इस शाम में लोगों ने जागर व गढ़वाली गीतों का भरपूर लुत्फ उठाया तो संगीत की महफिल में विभिन्न रागों पर सुध-बुध बिसरा बैठे। राजधानी में अंबेडकर स्टेडियम स्थित डाडामंडल मंदिर परिसर में बुधवार को विरासत की सांस्कृतिक संध्या का आगाज प्रीतम भरतवाण ने मां सुरकुंडा देवी के जागर से किया। इसके बाद तो उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में जागर और गीतों की ऐसी झड़ी लगाई कि दर्शकों को मंत्रमुग्ध हो गए। क्या नहीं था उनके तरकश में। न सिर्फ जागर, बल्कि बद्दी शैली के गीत, पारंपरिक पंवाड़े, पंडवार, शिव शैली के गीत, सरैं गीत और न जाने क्या-क्या। प्रीतम ने जा बाडुली सुवा मा रैबार पौंछयो, त्वै बगैर भलु नि लगदु बतैयो सुनाकर फौजी की व्यथा को बयां किया तो मोहना तेरी मुरलि बाजी ग्वाल बालों का संग से दर्शकों को झूमने पर विवश कर दिया। फिर उन्होंने राजुला-मालुशाही की गाथा के अलावा पंडवार में महाभारत के द्यूत प्रसंग सुनाया। इसके पश्चात उन्होंने युवाओं की नब्ज को भांपते हुए जब सरुली मेरु जिया लगीगे सुनाया तो दर्शकों की थिरकन बढ़ गई। फिर तो प्रीतम ने बंग्लादेश कालौंडांड लड़ै लगी चा तेरि सूरत मेरि बिमुलु मन मा बसीं चा, सुंदरा छोरी कई गीत नॉन स्टाप सुनाए। इसके साथ ही उन्होंने मंच से विदा ली। जागर और गढ़वाली गीतों के बाद फिर महफिल सजी और राजन-साजन मिश्रा बंधुओं ने विभिन्न रागों की ऐसी तान छेड़ी कि दर्शक सुध-बुध ही खो बैठे। उन्होंने कार्यक्रम की शुरूआत राग मालकोंस पर आधारित भजन जिनके मन राम विराजे से की। फिर उन्होंने राग दुर्गा जै-जै मां दुर्गे भवानी सुनाया। इसके बाद राग जोग, दरबारी, कांगड़ा आदि की प्रस्तुतियां भी उन्होंने दी। देर रात तक रसिकजन उनके शास्त्रीय गायन में डूबे रहे।
कोदा-झंगोरा खाएंगे, उत्तराखंड बनाएंगे।
कोदा-झंगोरा खाएंगे, उत्तराखंड बनाएंगे। उत्तराखंड बना जरूर, लेकिन लोग कोदा-झंगोरा के नाम से ही ऐसे बिदकने लगे-
जब मंडुवे की कोई कमी नहीं थी, घरों में भंडार भरे रहते थे, तब लोगों ने उसे हिकारतभरी नजरों से देखा और अब ढूंढकर भी नहीं मिलता तो मारे-मारे फिर रहे हैं। मंडुवे की रोटी का जिक्र आते ही ऐसे चहक उठते हैं, मानो जनम-जनम के भूखे हों और इस हाल में कहीं खाने को मिल जाए तो नजारा देखने लायक होता है। नेशनल हैंडलूम एक्सपो के त्रिवेणी परिसर में लगे गढ़भोज के स्टाल पर मंडुवे की रोटी और तिल की चटनी का जायका लेने के लिए उमड़ रही भीड़ तो यही कहानी बयां कर रही है। जिसने भूले-भटके भी कभी मंडुए का जायका लिया होगा, वह जानता है उसकी अहमियत और कहीं न कहीं से थोड़ा-बहुत जुगाड़ हर साल कर लेता है। लेकिन, जिसने उसे कम हैसियत वाले लोगों का आहार माना, वह आज उसका स्वाद चखने को बेकरार है तो इसके पीछे कहीं न कहीं जड़ों से छूट जाने का दर्द है। जरा एक दशक पूर्व सड़कों पर गूंजते उन नारों को स्मृति में लाने की कोशिश कीजिए, एक ही स्वर सुनाई देता था, कोदा-झंगोरा खाएंगे, उत्तराखंड बनाएंगे। उत्तराखंड बना जरूर, लेकिन लोग कोदा-झंगोरा के नाम से ही ऐसे बिदकने लगे, जैसे उसे देखने भर से ही अछूत हो जाएंगे। हुआ क्या, लोग खेती-बाड़ी छोड़कर स्टेटस मेंटेन करने को छानने लगे शहरों की खाक। पहले दिल्ली-मुंबई-चंडीगढ़ जैसे शहरों की ओर दौड़ते थे, अब देहरादून, हल्द्वानी जैसे शहरों में बसने की होड़ लग गई। जेंटलमैन जरूर बन गए, लेकिन जड़ें सूखने लगीं, भला सूखती जड़ें भी कभी पेड़ को हरा-भरा रख सकती हैं। जड़ों से कटकर कौन-सा समाज अपना अस्तित्व कायम रख पाया। यह बात देर ही सही, लेकिन लोगों की समझ में आने लगी है। तभी तो पहाड़ी उत्पादों का जिक्र होते ही निकल पड़ते हैं उनकी खोज में। परेड ग्राउंड में चल रहे नेशनल हैंडलूम एक्सपो में लगा गढ़भोज का स्टाल इसका गवाह है। 25 दिसंबर को जब चंबा (टिहरी) निवासी विक्रम सुयाल ने वहां मंडुवे की रोटी के साथ भांग का तड़का वाले आलू के गुटके बनाने शुरू किए तो शाम होते-होते करीब दो हजार की बिक्री हो चुकी थी। अगले दिन से विक्रम ने तिल की चटनी व झंगोरे की खीर बनानी भी शुरू कर दी। बकौल विक्रम, स्टाल में पहले आओ-पहले पाओ वाली स्थिति है। जो भी एक्सपो में पहुंच रहा है, मंडुवे की रोटी व तिल की चटनी का स्वाद जरूर चखता है। यहां तक कि लोग रोटी व आलू के गुटके पैक कराकर घर भी ले जा रहे हैं
सूबे में फार्मासिस्टों की कमी होगी दूर
देहरादून: सूबे के सरकारी अस्पतालों में आयुर्वेदिक और यूनानी फार्मासिस्टों की कमी दूर सरकार ने190 फार्मासिस्टो की नियुक्ति पर मोहर लगा दी है। विभाग के इस पहल का सबसे ज्यादा फायदा दूर दराज इलाकों के लोगों को होगा। सरकारी अस्पतालों में कार्मिकों की कमी से स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिकूल असर पड़ा है। दूर दराज इलाकों की बात तो दूर मैदानी इलाकों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। शासन स्तर पर हुई समीक्षा के बाद सरकार ने विभाग को कार्मिकों की नियुक्ति शीघ्र करने के निर्देश दिए। आयुर्वेदिक और यूनानी पद्धति के 225 फार्मासिस्टों की नियुक्ति की जानी है। इसमें से 190 की नियुक्ति पर निदेशालय की ओर से आदेश जारी हो गया है। शेष 35 की नियुक्ति पर भी कार्रवाई की जा रही है। चूंकि सूबे के ज्यादातर आयुर्वेदिक व यूनानी अस्पताल दूर दराज इलाके में है ऐसे में यहां के लोगों को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं में इजाफा होगा।
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