हिमालय की गोद में स्थित चारधाम की पावन भूमि,अपने अंदर यमुनोत्री,गंगोत्री ,केदारनाथ और बंद्रीनाथ को समाए हुए निर्वाण का मार्ग दर्शाती है। दैविक सौन्दर्य की अनुभूति कराता हुआ मेरा पहाड़ आपको ऐसी दुनिया की सैर कराता है । मै उसी पहाड़ मे आपका स्वागत करता हूं ।-राकेश जुयाल :Juyal2@gmail.com(भागीदार बनियें पहाड़ के)

Saturday, July 11, 2009

=देश भर में सर्वे ऑफ इंडिया के आठ दफ्तर बंद होंगे

-नागपुर, ग्वालियर, इंदौर, अजमेर, वाराणसी, विशाखापत्तनम समेत आठ जीडीसी पर गाज -स्टाफ की कमी, नई तकनीक का इस्तेमाल व आउटसोर्सिंग बनी वजह देहरादून देश का सबसे पुराना वैज्ञानिक महकमा सर्वे ऑफ इंडिया देश भर में अपने कम से कम आठ दफ्तर बंद करने की तैयारी में है। सर्वे की हर प्रदेश में उसका एक ही ज्योडीय आंकड़ा केेंद्र (जियोडिक डाटा सेंटर-जीडीसी) रखने की योजना है। इसके तहत सबसे पहली गाज नागपुर के सेमिनरी हिल्स स्थित सीजीओ कांप्लेक्स के दफ्तर पर गिरने की आशंका है। नागपुर का यह दफ्तर जीरो माइल पिलर के कारण मशहूर है। इस ऐतिहासिक पिलर की स्थापना 1802 में शुरू होकर 60 साल तक चले ग्रेट आर्क सर्वे (महान त्रिकोमितीय सर्वेक्षण)के दौरान की गई थी। यह सर्वे सर जॉर्ज एवरेस्ट ने पूरा किया था। नागपुर के पिलर का इस्तेमाल मानचित्र निर्माण में समुद्र तल से ऊंचाई मापने के लिए किया जाता रहा है। बताया जा रहा है कि नागपुर के बाद ग्वालियर, इंदौर, अजमेर, विशाखापत्तनम और वाराणसी समेत आठ दफ्तरों को भी बंद करने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। महाराष्ट्र में अब केवल पुणे में ही सर्वे आफ इंडिया का दफ्तर रहेगा। गौरतलब है कि 1767 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत का भौगोलिक सर्वेक्षण करने के लिए सर्वे आफ इंडिया की स्थापना की थी। सर्वे ऑफ इंडिया में नई तकनीक आने व आउट सोर्सिंग शुरू होने के बाद से 2004 से स्टाफ कम करने की कवायद चल रही है। नागपुर में इस वक्त सर्वे कार्य के लिए चार-पांच लोग हैं। एक सर्वे कैैंप टीम में कम से कम 29 लोग होने चाहिए। इसी तरह की स्थिति देश के अन्य केेंद्रों में भी है। इन दफ्तरों में इस वक्त 35 से40 लोग ही काम कर रहे हैं, जबकि एक केेंद्र में कम से कम 150 का स्टाफ होना चाहिए। नागपुर में दफ्तर बंद होने के बाद वहां का मानचित्र बिक्री केेंद्र भी बंद हो जाएगा। हालंाकि विभाग में कभी किसी किस्म की छंटनी नहींहुई, लेकिन कर्मचारियों को कम करने की योजना के तहत नई नियुक्तियां भी नहीं हुईं। सर्वे आफ इंडिया के ग्रुप बी आफिसर एसोसिएशन के अध्यक्ष बी पात्रो का कहना है कि नई नियुक्तियां न होने से सर्वे आफ इंडिया के कई दफ्तर कर्मचारियों की भारी कमी झोल रहे हैं। प्रिंटिंग प्रेसों का काम भी आउटसोर्स करने की कोशिश की जा रही है। जो प्रशासन की स्टाफ कम करने की योजना का हिस्सा है। यूनियनें विभाग में कर्मचारियों की तादाद कम करने का विरोध करती रही हैं। सर्वे के बंद हो रहे दफ्तरों के कर्मचारियों को दूसरे स्थानों पर स्थानांतरित करने की कवायद चल रही है। सर्वे आफ इंडिया के उप महासर्वेक्षक मेजर जनरल आरएस तंवर का कहना है कि केवल उन्हींकेेंद्रों को बंद किया जा रहा है जो व्यवहारिक नहींरह गए हैं। जहां केवल दो या चार कर्मचारियों का स्टाफ रह गया है और इमारत का किराया 40,000 रुपये तक देना पड़ रहा है।


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-'सास' ने कराया 'बहू' का गृह प्रवेश

मनमोहन के परिवार को करीब से जानने घर पहुंचीं राखी शुक्रवार सुबह तीर्थनगरी से विदा लेंगी राखी सावंत ऋषिकेश, स्वयंवर के माध्यम से वर का चयन करने की ठान चुकीं आइटम गर्ल राखी सावंत अपनी संभावित ससुराल व ससुरालियों का मिजाज जानने मनमोहन तिवारी के घर पहुंचीं। राखी की 'सास' ने अपनी 'बहू' का परंपरागत ढंग से गृह प्रवेश कराया। मनमोहन के परिवार ने राखी के स्वागत में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। गुरुवार को अभिनेत्री राखी सावंत कार्यक्रम के प्रतिभागी मनमोहन तिवारी के परिवार को जानने उनके घर पहुंचीं। दोपहर करीब तीन बजे राखी मनमोहन के साथ गंगा नगर गणेश विहार स्थित उनके आवास पहुंचीं। यहां पहले से ही राखी के स्वागत की पूरी तैयारियां की गई थीं। पूरे घर को फूलमालाओं से सजाया गया था। राखी व मनमोहन की जोड़ी जैसे ही कार से बाहर निकली, उनके दीदार पाने को सैकड़ों लोग वहां जुट गए। घर के मुख्य द्वार पर मनमोहन की मां गायत्री तिवारी व पिता एसएन तिवारी सहित परिवार के कई लोगों ने फूलमालाओं से उनका स्वागत किया। मनमोहन की मां ने बाकायदा पारंपरिक रूप से घर आई राखी की आरती उतारी। राखी भी परिवार के वरिष्ठजनों का सम्मान करना नहीं भूलीं और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद ग्रहण किया। संभावित 'बहू' के रूप में घर पहुंचीं राखी को देखने के लिए पड़ोस के लोग व रिश्तेदार पहले से ही घर में उपस्थित थे। राखी के पीछे उनके प्रशंसकों की बारात ने बिल्कुल 'बहू' के गृह प्रवेश का माहौल बना दिया। राखी ने परिवार के कई सदस्यों से अलग-अलग बातचीत की। बातचीत में अधिकांश सवाल राखी ने परिवार वालों से उसे बहू स्वीकार करने संबंधी पूछे। जबकि घर में होने वाले कार्यों के बारे में भी उन्होंने जानकारी ली। ये सभी चीजें एनडीटीवी इमेजिन के कैमरों के आगे शूट हुईं। टीम के साथ आए लोगों का कहना था कि चैनल पर अगले कार्यक्रमों के दौरान ये दृश्य दिखाए जाएंगे। घंटों तक परिवार के सदस्यों से बातचीत करने के बाद राखी मनमोहन के साथ घर के बाहर लॉबी में आ पहुंचीं। राखी ने बाहर आकर हाथ जोड़कर अपने प्रशंसकों व मिलने आए लोगों का अभिवादन किया। कुछ देर बाद राखी पुन: कमरे में जा पहुंचीं। राखी शुक्रवार को जौलीग्रांट हवाई अड्डे से वापस जाएंगी, जबकि देर रात तक विभिन्न स्थानों पर उनके कई शॉट फिल्माए गए। --- सिलबट्टे पर चटनी पीसकर दिया चैलेंज का जवाब ऋषिकेश: 'सास' का चैलेंज 'बहू' ने इतनी गंभीरता से लिया कि देखने वाले भी हक्के-बक्के रह गए। राखी ने सिलबट्टे पर चटनी पीसकर दिखा दिया कि वह एक आदर्श गृहणी की भूमिका भी निभा सकती हैं। मनमोहन की मां गायत्री तिवारी ने कार्यक्रम के दौरान राखी को बहू के रूप में स्वीकार करने की एक शर्त रखी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि क्या राखी सिलबट्टे पर मसाले व चटनी पीस सकती हैं। हालांकि यह शो अभी तक प्रदर्शित नहीं हो पाया है। जवाब में राखी ने उनका यह चैलेंज सहर्ष स्वीकार किया था। ऋषिकेश पहुंचीं राखी ने गायत्री तिवारी को उनका चैलेंज याद दिलाया और उनके रसोईघर में जा पहुंचीं। राखी ने सिलबट्टे पर अपने हाथों से चटनी पीसकर सास की चुनौती का जवाब दिया। राखी के इस स्वभाव को देखकर परिवार के लोगों ने उनकी प्रशंसा की। --- शूटिंग में व्यस्त रहीं राखी, प्रशंसक लौटे निराश 'राखी का स्वयंवर' कार्यक्रम की ऋषिकेश में शूटिंग ऋषिकेश, संभावित 'ससुराल' तीर्थनगरी में आइटम गर्ल राखी सावंत का दूसरा दिन काफी व्यस्त रहा। शूटिंग के सिलसिले में राखी व चैनल की टीम दिनभर शहर क्षेत्र में भटकती रही। राखी के प्रशंसकों ने भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। एनडीटीवी इमेजिन का चर्चित रियलिटी शो 'राखी का स्वयंवर' तीर्थनगरी के लिए खास बन गया है। कार्यक्रम में ऋषिकेश के प्रतिभागी मनमोहन तिवारी के साथ राखी सावंत इन दिनों शो के दृश्य फिल्माने के लिए तीर्थनगरी में हैं। बुधवार सायं राखी यहां पहुंची थीं। गुरुवार को शो के लिए विभिन्न जगहों पर शूटिंग की गई। सुबह सबसे पहले मनमोहन तिवारी के लक्ष्मण झाूला रोड स्थित पुराने आवास पर शूटिंग की गई। इसके बाद सत्यनारायण मंदिर में राखी के मनमोहन के साथ कई दृश्य फिल्माए गए।


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-राज्य में बीटेक, बीफार्मा व एमबीए की फीस तय

-13 कालेजों के मुआयने के लिए सब कमेटी गठित -ज्यादा फीस ली तो दस लाख रुपये जुर्माना भरना होगा -सरकार ने 12 निजी कालेजों के लिए फीस निर्धारित की -न्यूनतम फीस बीटेक के लिए 52 हजार, बीफार्मा के लिए 60 हजार व एमबीए के लिए 55 हजार तय देहरादून: सरकार ने एक दर्जन निजी कालेजों के लिए बीटेक, बीफार्मा व एमबीए की फीस तय की है। इनमें छह कालेजों में अंतिम रूप से फीस निर्धारित करने से पहले मुआयना किया जाएगा। यही नहीं, इन कालेजों ने ज्यादा शुल्क वसूल किया तो संबद्धता के खात्मे के साथ ही दस लाख रुपये जुर्माना भरना पड़ेगा। सरकार ने 13 कालेजों के मुआयने के लिए सब कमेटी गठित की है। उक्त कालेजों के लिए वर्ष 2009-10 से तीन वर्ष तक फीस निर्धारित की है। शासन स्तर पर सेवानिवृत्त न्यायाधीश लक्ष्मी बिहारी की अध्यक्षता में गठित फीस कमेटी ने 12 कालेजों की ओर से पेश किए गए अभिलेखों व पत्रजातों के आधार पर यह कदम उठाया। इनमें दून के आठ व अन्य स्थानों के चार कालेज शामिल हैं। कमेटी ने बीटेक पाठ्यक्रम के लिए दून के उत्तरांचल इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी में 59000 रुपये, तुलाज इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी में 57000 रुपये, रुड़की इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी रुड़की के लिए 56000 रुपये, आम्रपाली इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलाजी के लिए 52000 रुपये फीस तय की है। बीफार्मा पाठ्यक्रम के लिए दून के हिमालयन इंस्टीट्यूट आफ फार्मेसी एंड रिसर्च में 60 हजार, जीआरडी इंस्टीट्यूट एंड टेक्नोलाजी में 60 हजार, सरदार भगवान सिंह पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट बायोमेडिकल साइंस में 67500 रुपये, श्रीमती तारावती इंस्टीट्यूट आफ बायोमेडिकल एंड एप्लाइड साइंस रुड़की में 60 हजार, देवभूमि कालेज आफ फार्मेसी रुद्रपुर (वनस्थली विद्यापीठ) में 60 हजार रुपये, श्री देवभूमि इंस्टीट्यूट आफ एजुकेशन साइंस एंड टेक्नोलाजी में 60 हजार रुपये फीस छात्र-छात्राओं को देनी पड़ेगी। एमबीए के लिए दून बिजनेस स्कूल सेलाकुई देहरादून व एकेडमी आफ मैनेजमेंट स्टडीज देहरादून में 55 हजार रुपये फीस ली जाएगी। फीस नए सत्र 2009-10 से अगले तीन वर्षों के लिए लागू होगी। पुराने छात्र-छात्राओं को नया व बढ़ा शुल्क नहीं देना पड़ेगा। कमेटी छह कालेजों के लिए फीस अनंतिम रूप से तय की है। कमेटी ने उक्त कालेजों के मुआयने को तकनीकी शिक्षा अपर सचिव व चार्टर्ड एकाउंटेंट की सब कमेटी गठित की है। कमेटी में तकनीकी विशेषज्ञ को नामित किया जाएगा। उक्त कालेजों के अतिरिक्त आईएमटी काशीपुर, निंबस एकेडमी आफ मैनेजमेंट, देहरादून एकेडमी आफ मैनेजमेंट स्टडीज, दून बिजनेस स्कूल, सरस्वती इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट रुद्रपुर, माडर्न इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी ऋषिकेश एवं कुकरेजा इंस्टीट्यूट आफ होटल मैनेजमेंट देहरादून का मुआयना भी कमेटी करेगी। सब कमेटी को 20 जुलाई तक रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। फीस के संबंध में जारी शासनादेश में यह स्पष्ट किया गया है कि उक्त फीस में शिक्षण व डेवलपमेंट फीस शामिल है। इसके अलावा कालेज सिर्फ हास्टल व मैस की ही फीस ले सकेंगे। एग्जाम फीस तकनीकी विवि तय करेगा। तकनीकी शिक्षा प्रमुख सचिव राकेश शर्मा के मुताबिक निर्धारित से ज्यादा फीस लेने वाले कालेजों पर संबद्धता समाप्त करने के साथ ही न्यूनतम दस लाख रुपये जुर्माना लगाया जाएगा।


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एक गांव, जो मिसाल बना देश के लिए

-टिहरी के गेंवाली गांव में आठ साल में पहली बार गई बिजली -2001 में ग्रामीणों ने स्वयं की मेहनत से तैयार की थी परियोजना -मौसम की मार से पानी की कमी के चलते ठप हुई विद्युत परियोजना नई टिहरी जनपद के सीमांत गांव गेंवाली के ग्रामीणों की मेहनत पर मौसम की मार भारी पड़ी है। ग्रामीणों का अपनी मेहनत से बनाया हुआ 25 किलोवाट क्षमता की विद्युत परियोजना बेहतर ढंग से काम कर रही थी और लगातार आठ साल तक इसके जरिए यह गांव रोशन रहा, लेकिन इस बार गदेरे (पहाड़ी नदी) में पानी कम होने के कारण परियोजना से विद्युत उत्पादन ठप हो गया। इसके चलते पिछले छह माह से दूसरे गांवों के लिए मिसाल बना रहा यह गांव अंधेरे में डूबा हुआ है। नई टिहरी मुख्यालय से 85 किमी दूर स्थित गेंवाली गांव के लोगों को सड़क से गांव तक पहुंचने के लिए 15 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। यही कारण है कि अभी तक इस गांव में विद्युतीकरण नहीं हो पाया। दूसरे सीमांत गांवों की तरह बिजली के लिए सरकार की राह तकने की बजाय भिलंगना प्रखंड के गेंवाली गांव के लोगों ने खुद की मेहनत पर भरोसा जताया। इसके तहत ग्रामीणों ने साठ घरों वाले अपने गांव को रोशन करने का मन बनाया और 2001 में कड़ी मेहनत के बल पर 25 किलोवाट की विद्युत परियोजना का निर्माण कर लिया। इस परियोजना के लिए दिल्ली स्थित फोराल्ड नामक संस्था ने सहयोग दिया था। परियोजना में बिजली उत्पादन शुरू होने के बाद लकड़ी के खंभों से लाइन डालकर गांव तक बिजली पहुंचाई गई। इसके बाद से इस गांव ने आठ साल में एक भी रात अंधेरे में नहीं गुजारी। गांव के प्रत्येक घर में इस परियोजना की बदौलत चार बल्ब तो जले ही, अधिकांश परिवार टेलीविजन से भी जुड़े। परियोजना की सफलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आठ साल में एक भी दिन पावर कट नहीं हुआ, लेकिन इस बार मौसम की बेरुखी की मार ने परियोजना को नजर लगा दी। गदेरे में पानी कम होने के कारण करीब छह माह पूर्व विद्युत उत्पादन ठप्प हो गया। तब से गांव अंधेरे में डूबा हुआ है। घने बांज, बुरांश के जंगलों से घिरे इस गांव की ओर इस बार बादलों ने अब तक इस ओर रुख ही नहीं किया है। ग्रामीण नारायण सिंह का कहना है कि ऐसा पहली बार हुआ कि क्षेत्र में साल भर से बारिश नहीं हुई। साथ ही सर्दियों में बर्फ भी नहीं पड़ी। इसके कारण गांव में बहने वाले गदेरों में पानी कम हो गया है। परियोजना का कार्य देख रहे वीर सिंह राणा का कहना है कि परियोजना बनने के बाद आठ साल में पहली बार ग्रामीणों को अंधेरे में रहना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि परियोजना को दोबारा शुरू करने के प्रयास किए जा रहे हैं। --- पचास रुपये में मिलती थी बिजली नई टिहरी: दो साल की अथक मेहनत के बाद तैयार हुई परियोजना के संचालन के लिए ग्रामीणों ने पंचायत समिति गेंवाली का गठन किया था। परियोजना के रखरखाव के लिए प्रति परिवार हर माह 50 रुपये शुल्क लिया जाता था। गांव के ही एक व्यक्ति को परियोजना के रखरखाव के लिए पूर्णकालिक तैनाती दी गई थी। अन्य गांवों में जहां बिजली की आंखमिचौनी व भारी भरकम बिलों से उपभोक्ता परेशान रहते हैं, वहीं यह गांव स्वावलंबन के मामले में मिसाल था।


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Tuesday, July 7, 2009

-खामोश मौत की राह पर 'मौन साक्षी'

चंद्रशेख्रर आजाद ने दुगडडा के निकट एक वृक्ष पर गोली चलाकर बजाई थी क्रांति की रणभेरी -मौन साक्षी के तौर पर जाना जाता है यह पेड़ पेड़ गिरा, अब ठूंठ का संरक्षण करने को आतुर वन विभाग कोटद्वार(गढ़वाल), आजादी के मतवालों से जुड़ी यादों को सहेज कर रखने में हम कितने लापरवाह हैं, इसका अंदाजा पौड़ी गढ़वाल जिले में दुगड्डा-सेंधीखाल मार्ग पर नाथूपुर के निकट स्थित उस पेड़ की हालत को देखकर लगाया जा सकता है, जो कभी महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की यादों की गवाह था। आलम यह है कि संरक्षण के अभाव में यह वृक्ष जमींदोज होने की कगार पर है, लेकिन इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं। दुगड्डा के निकट नाथूपुर के रहने वाले क्रांतिकारी भवानी सिंह रावत के आग्रह पर वर्ष 1930 में चंद्रशेखर आजाद अपने साथियों रामचंद्र, हजारीलाल, छैल बिहारी, विशंबर दयाल के साथ यहां आए थे। यहां उन्होंने क्रांतिकारियों को शस्त्र प्रशिक्षण दिया था। प्रशिक्षण की समाप्ति पर जब साथियों ने आजाद से निशानेबाजी का कौशल दिखाने का आग्रह किया, तो उन्होंने इस पेड़ के एक छोटे से पत्ते पर निशाना साध अपनी पिस्टल से फायर किए। एक के बाद एक पांच गोलियां चलीं, लेकिन पत्ता हिला तक नहीं। साथी समझो कि बार-बार आजाद का निशाना चूक रहे हैं, छठा फायर किया, तो पत्ता हिला। पेड़ के निकट पहुंचकर पता चला कि सभी छह गोलियां पत्ते को भेदती हुई पेड़ पर लगी थीं। तब से यह पेड़ आजाद की यादगार बन गया। क्षेत्रवासी लंबे समय से इसे ऐतिहासिक धरोहर में शामिल करने की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। नतीजतन, 12 मई 2006 को आंधी में वृक्ष का एक बड़ा हिस्सा टूट कर गिर गया। इसके बाद होश आया, तो पालिका परिषद व गणमान्य नागरिकों के आग्रह पर मई 2008 में एफआरआई देहरादून से पहुंचे एक दल ने यहां आकर पेड़ के नमूने लिए। दल ने पाया कि पानी व फंगस के कारण पेड़ का क्षरण हो रहा है। उस समय इस पेड़ के बचे हिस्से पर रासायनिक लेप की बात कही गई थी, लेकिन एक वर्ष गुजरने के बाद अब तक ऐसा नहीं किया गया है। --- कौन है दोषी कोटद्वार: वन विभाग ने इस ऐतिहासिक वृक्ष की समय रहते सुध नहीं ली। हालांकि, वृक्ष के निकट पार्क बनाकर क्षेत्र का सौंदर्यीकरण किया गया, लेकिन इसके संरक्षण की दिशा में कोई प्रयास नहीं किए गए। लैंसडौन वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी निशांत वर्मा ने बताया कि वृक्ष के अवशेष ठूंठ को संरक्षित करने को शेड का निर्माण कराया जा रहा है। साथ ही टूटे हुए हिस्से को निकट ही स्थित पार्क में सुरक्षित रखा गया है। वृक्ष के संरक्षण को विभाग एक वृहद योजना भी तैयार कर रहा है।


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आयुर्वेदिक विवि को हरी झांडी

निशंक कैबिनेट की पहली बैठक में लिया गया निर्णय देहरादून कैबिनेट ने हरिद्वार में आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय की स्थापना को मंजूरी दे दी है। साथ ही आज कैबिनेट बैठक में होम्योपैथ चिकित्सा सेवा नियमावली को पारित किया गया। कैबिनेट ने बजट, बिजली व पानी के मुद्दों पर भी अनौपचारिक चर्चा की। कैबिनेट फैसलों के बारे में मुख्य सचिव इंदु कुमार पंाडे और प्रमुख सचिव (चिकित्सा एवं स्वास्थ्य) केशवदेसि राजू ने बताया कि आयुर्वेदिक विवि पर दिसंबर 2001 में निर्णय लिया गया था। किन्हीं कारणों से इस बारे में अधिनियम नहीं बन पाया। अब कैबिनेट ने इसे स्वीकृति दी है। हरिद्वार में ऋषिकुल व गुरुकुल आयुर्वेदिक कालेजों को मिलाकर आयुर्वेद विवि की स्थापना का प्रस्ताव है। होम्योपैथिक चिकित्सा सेवा नियमावली के संबंध में लिए गए निर्णय के बारे में प्रमुख सचिव श्री राजू ने बताया कि लंबे समय से नियुक्ति न होने से बड़ी संख्या में होम्योपैथिक चिकित्सक ओवर ऐज हो गए हैं। उनकी मांग पर आयु सीमा में पांच साल की छूट दी गई है। अब न्यूनतम आयु सीमा 35 से बढ़ाकर 40 वर्ष कर दी गई है। सूत्रों ने बताया कि ये दोनों मामले कुछ ही मिनटों की चर्चा के बाद पास हो गए। कैबिनेट का अधिकांश समय बिजली और पानी जैसे मुद्दों पर अनौपचारिक बातचीत में लगा। बैठक की अध्यक्षता करते हुए मुख्यमंत्री डा.निशंक ने कैबिनेट के साथियों से सूबे के आम बजट पर भी मंथन किया। --- राह आसान होने में लगे आठ साल डा. निशंक का ड्रीम प्रोजेक्ट है आयुर्वेद विश्वविद्यालय उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय की राह आठ साल बाद आसान होती दिख रही है। यह विवि मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट है। ऐसे में माना यही जा रहा है कि अपने सपने को जल्द पूरा करने को मुख्यमंत्री चिकित्सा शिक्षा विभाग अपने पास ही रख सकते हैैं। निशंक कैबिनेट की पहली औपचारिक बैठक में ही उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय को मंजूरी मिल गई है। अब इस विवि की स्थापना का राह आसान होती दिख रही है। खास बात यह है कि इस विवि को कैबिनेट की मंजूरी मिलने में आठ वर्ष लग गए। कहा तो यही जा रहा है कि यह आयुर्वेद विवि मुख्यमंत्री डा.निशंक का ड्रीम प्रोजेक्ट है। भाजपा की अंतरिम सरकार के समय में मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने बतौर चिकित्सा शिक्षा मंत्री इस बारे में एक प्रस्ताव तैयार करवाया था। उस वक्त किन्हीं कारणों से इसे मंजूरी नहीं मिल सकी थी। बाद में एनडी सरकार के समय में भी इस दिशा में कोशिशें शुरू हुईं पर उन्हें परवान नहीं चढ़ाया जा सका। सवा दो साल पहले सूबे की सत्ता पर भाजपा काबिज हुई तो डा.निशंक एक बार फिर से कैबिनेट में शामिल हुए। उन्हें चिकित्सा महकमा दिया तो गया पर चिकित्सा शिक्षा को सीएम ने अपने पास ही रखा। इसके बाद भी डा. निशंक इस बारे में प्रयास करते रहे। तमाम कोशिशों के बाद इसका प्रस्ताव तैयार भी हुआ तो वित्त विभाग ने इसमें अड़ंगा लगा दिया। इसके साथ ही अन्य आपत्तियां भी लगा दी गईं। नतीजा यह रहा कि विवि स्थापना की दिशा में कोई भी काम आगे नहीं बढ़ सका। सूबे की सरकार का मुखिया बनने के बाद डा.निशंक ने पहली कैबिनेट में ही इसे मंजूरी दिलाकर यह साबित कर दिया कि आयुर्वेद विवि उनका ड्रीम प्रोजेक्ट हैै। अब माना यही जा रहा है कि डा. निशंक चिकित्सा शिक्षा विभाग को अपने पास ही रख सकते हैैं। ऐसे में अपने सपने को तेजी से पूरा करने के लिए में सीएम को कोई भी दिक्कत नहीं होगी।


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टीम निशंक को मिला काम

: आखिरकार मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के बीच विभागों का बंटवारा कर ही दिया। रविवार देर रात मुख्यमंत्री ने विभागों के बंटवारे की घोषणा की। अब टीम निशंक की शक्ल कुछ यूं है। मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल- गोपन, कार्मिक, गृह एवं सतर्कता, ऊर्जा, लोक निर्माण एवं राज्य संपत्ति, सचिवालय प्रशासन, वित्त, आवास, नागरिक उड्डयन, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, आयुष एवं चिकित्सा शिक्षा, आपदा प्रबंधन, खेलकूद, उच्च व तकनीकी शिक्षा, संस्कृति शिक्षा, सूचना एवं सूचना प्रौद्योगिकी। कैबिनेट मंत्री मातबर सिंह कंडारी- सिंचाई, लघु सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, खादी एवं ग्रामोद्योग, समाज कल्याण एवं विकलांग कल्याण। बिशन सिंह चुफाल- वन एवं वन्य जंतु पर्यावरण, जलागम प्रबंधन, परिवहन, सहकारिता, प्रोटोकाल एवं ग्रामीण अभियंत्रण सेवा। प्रकाश पंत- संसदीय कार्य, विधायी, पेयजल, श्रम, नियोजन, पुनर्गठन, बाह्य सहायतित परियोजनाएं, निर्वाचन एवं भारत नेपाल से संबधित उत्तराखंड की नदी परियोजनाएं। दिवाकर भट्ट- राजस्व, भूप्रबंधन, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति एवं सैनिक कल्याण। मदन कौशिक- आबकारी, गन्ना विकास, चीनी उद्योग, नगर विकास एवं पर्यटन। त्रिवेंद्र सिंह रावत- कृषि, कृषि शिक्षा, कृषि विपणन, उद्यान, फलोद्योग, पशुपालन, दुग्ध विकास एवं मत्स्य पालन। राजेंद्र सिंह भंडारी- पंचायती राज, वैकल्पिक ऊर्जा, जनगणना, नागरिक सुरक्षा एवं होमगार्ड व कारागार। राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विजया बड़थ्वाल- ग्राम्य विकास, महिला कल्याण एवं बाल विकास। गोविंद सिंह बिष्ट- विद्यालयी शिक्षा (प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा)। राज्यमंत्री खजान दास- आपदा प्रबंधन एवं समाज कल्याण। बलवंत सिंह भौर्याल- चिकित्सा एवं स्वास्थ्य तथा सूचना प्रौद्योगिकी।


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पतंजलि विवि के कुलपति बने आचार्य बालकृष्ण

-स्वामी रामदेव ने योग शिविर में की घोषणा -कहा, आदर्श विवि बनाने की कोशिश होगी हरिद्वार, पतंजलि विश्वविद्यालय ने कुलाधिपति स्वामी रामदेव ने पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण विवि को कुलपति नियुक्त किया है। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के सहयोग से दिल्ली से आए योग शिक्षकों के लिए आयोजित शिविर में स्वामी रामदेव ने इसका ऐलान किया। पतंजलि योग विवि के कुलाधिपति योग गुरु स्वामी रामदेव ने कहा कि बाल्यकाल से गुरुकुल शिक्षा पद्धति में शिक्षित आचार्य बालकृष्ण अद्भुत प्रतिभा के धनी हैं। उन्होंने कहा कि कुलपति के रूप में आचार्य बालकृष्ण विवि को नई दिशा देंगे। स्वामी रामदेव ने कहा कि देश में लगभग 450 विवि, 13 लाख प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालय व लगभग 15 हजार महाविद्यालय हैं। विज्ञान, प्रबंधन व तकनीकी शिक्षा देने वाली अनेक शिक्षण संस्थाएं हैं, फिर भी शिक्षा संस्थानों में अपने संस्कारों एवं संस्कृति को पूरी तरह समाविष्ट नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पतंजलि विवि के माध्यम से उन्नत शिक्षा के साथ-साथ ध्यान, संयम व सदाचार की शिक्षा पर जोर दिया जाएगा। विवि योग, स्वास्थ्य, संस्कृति, पर्यटन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी व पंचकर्म के क्षेत्र में काम करेगा। विवि में योग व आयुर्वेद आधारित डिप्लोमा व डिग्री कोर्स शुरू किए गए हैं। नवनियुक्त कुलपति आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि आयुर्वेद सस्ती, सरल, सहज, शाश्वत, वैज्ञानिक, निर्दोष व संपूर्ण चिकित्सा विद्या है। उन्होंने कहा कि वे योग और आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति के रूप में प्रतिष्ठापित करना चाहते हैं। पतंजलि विवि के माध्यम से शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नूतन क्रांति लायी जा रही है। ऐसे स्नातक तैयार किए जाएंगे जो जो स्वयं तो जीवन में आत्मनिर्भर बने ही साथ ही अन्य को भी स्वास्थ्य के क्षेत्र में रोजगार व स्वावलंबन की नई दिशा देने में सक्षम हों।


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कतने सुरक्षित हैं कुमाऊं के कारागार!

तीन साल में फरार हुए डेढ़ दर्जन अपराधी ऊधमसिंह नगर से भागे सर्वाधिक १० बंदी नैनीताल के पांच बंदी अभी भी पकड़ के बाहर नैनीताल। दशकों पूर्व बने कुमाऊं के कारागार कितने सुरक्षित हैं? 1या यहां सुरक्षा मानकों का पालन होता है? इसका अंदाजा आप बंदियों के भागने की सं2या से खुद ब खुद लगा सकते हैं। अगर आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले तीन वर्षों में कुमाऊं की जेलों से डेढ़ दर्जन बंदी फरार हो चुके हैं, इनमें भी सर्वाधिक ऊधमसिंह नगर से हैं। अकेले इस जिले से १० बंदी अब तक भागने में सफल रहे हैं।यहां बताते चलें कि कुमाऊं के जेलों में अकसर घटने वाली घटनाओं से सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगते रहे हैं। बावजूद इसके सुरक्षा व्यवस्था पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। सबसे पहले हम बात करते हैं नैनीताल जेल की। यहां से २६ जून २००६ को तीन बंदी (राजेश कुमार, राजू रावत तथा मोहन पालीवाल) सुरक्षा व्यवस्था का धता बताकर फरार हो गए थे। हालांकि पुलिस ने उन्हें उसी रोज मार गिराया था। इस घटना से सबके लेने की बजाय जेल प्रशासन अब भी उसी पुराने ढर्रे पर चल रहा है। विभागीय सूत्रों की मानें तो बीते तीन वर्षों में कुमाऊं की विभिन्न जेलों से डेढ़ दर्जन बंदी फरार हुए। इनमें ऊधमसिंह नगर से १०, नैनीताल से आठ, पिथौरागढ़ से एक और चंपावत के दो बंदी थे। हालांकि पुलिस विभाग की ओर से तीन के एनकाउंटर समेत सात भगौड़ों की गिर3तारी कर ली गई, जिनका मुकदमा न्यायालय में चल रहा है। लेकिन ऊधमसिंह नगर के तीन तथा नैनीताल के पांच भगौड़े आज भी पुलिस की गिर3त से बाहर हैं। ऐसे में कुमाऊं की जेलों की सुरक्षा का सवाल हाईटेक होते दौर में साल दर साल बड़ा होता जा रहा है। ---- ये हैं पुलिस की गिर3त से बाहर ऊधमसिंह नगर की जेलों से भागे जितेन्द्र (रुद्रपुर), उमाशंकर (आगरा) और देवराम (गदरपुर)। नैनीताल जेलों से भागे अमरीक (काशीपुर), प्रकाश (हल्द्वानी), हेमराज (लालकुंआ), मुराद अली (रोहतक हरियाणा)।


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उत्तराखंड की भी है केंद्र पर खास निगाह

प्रदेश का अपना बजट भी प्रभावित होगा केंद्र के फैसलों से केंद्र केबजट पर उ8ाराखंड की भी खास निगाह है। केंद्र से औद्योगिक पैकेज की समय सीमा बढ़ाने की मांग तो सरकार कर ही चुकी है। अवस्थापना विकास और पयर्टन तथा सामाजिक क्षेत्र में राज्य को सहायता की अपेक्षा भी की जा रही है।प्रदेश के सामने वि8ाीय रूप से खासी मुश्किल है। राज्य की आर्थिकी गड़बड़ाई हुई है। विकास योजनाओं के लिए पैसा कम पड़ रहा है। सरकार के कमिटेड प्लान का खर्च बढ़ रहा है। ऐसे में विकास योजनाओं पर भी फर्क पड़ रहा है। इस हिसाब से देखा जाए तो राज्य को छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों को लागू करने के बाद अतिर1ित रूप से बढ़े करीब तीन हजार करोड़ के भरपाई की भी उ6मीद केंद्र से है। इसके अतिरि1त अवस्थापना विकास के क्षेत्र में भी अतिरि1त सहायता की अपेक्षा भी केंद्र से की जा रही है। उपभो1ता राज्य होने के कारण किसी नए टै1स का राज्य में शायद ही स्वागत हो। कने1िटविटी बढ़ाने के लिए सड़कों की सौगात की अपेक्षा भी राज्य को रहेगी ही। इनमें से कितनी अपेक्षाएं पूरी हो पाएंगी यह तो सोमवार को केंद्र के बजट का पिटारा खुलने के बाद ही साफ हो पाएगा। राज्य का बजट सत्र १३ जुलाई से शुरू हो रहा है और केंद्र के बजट का इस पर प्रभाव पडऩा भी तय है। बाह्य सहायतित योजनाओं में इजाफा हुआ तो राज्य सरकार राहत महसूस कर सकती है। कर्मचारियों और नौकरी पेशा वर्ग के लिए महंगाई का मुद्दा अह्म है। कौन-कौन सी उ6मीदें हैं उ8ाराखंड को -विशेष औद्योगिक पैकेज की अवधि बढ़े -अवस्थापना विकास को अतिरि1त सहायता -कने1िटविटी बढ़ाने को सड़क परियोजनाएं -नान प्लान में अतिरि1त सहायता की उ6मीद -बरकरार रहे ९०:१० के अनुपात की योजना -टै1स छूट के दायरे मेंं इजाफा -महंगाई पर नियंत्रण के ठोस उपाय हों -हाइड्रो पावर में केंद्र से अतिरि1त सहायता -सामाजिक क्षेत्र जैसे चिकित्सा, शिक्षा में सहयोग -जीएसटी का रोड मैप पूरी तरह से स्पष्ट हो -पर्यटन के विकास को अलग से योजनाएं 1या मानते हैं विशेषज्ञ -केंद्र से बहुत अधिक उ6मीद करना बेमानी है। मंदी के कारण केंद्र के हाथ भी तंग हैं। ऐसे में राज्यों को अतिरि1त सहायता मिलने की उ6मीद कम है। पर केंद्र के सहयोग से चलने वाली योजनाओं में अगर इजाफा होता है तो राज्यों को इसका फायदा मिलेगा ही। अप्रत्यक्ष लाभ तो मिलेगा ही -केंद्र के बजट से राज्य का सीधा वास्ता नही है। पर इतना है कि बाह्य सहायतित योजनाओं और केंद्र संचालित योजनाओं का फर्क राज्य पर पड़ता है। इन योजनाओं का संचालन राज्य करते हैं। इनमें इजाफा राज्यों की मदद होगी। राज्य को विशेष परियोजनाएं भी मिल सकती हैं। प्रमुख सचिव वि8ा, आलोक कुमार जैन ए1साइज छूट बढ़े -विशेष औद्योगिक पैकेज की सीमा बढऩी चाहिए। नवगठित राज्य को अवस्थापना विकास के लिए अधिक मदद की दरकार है। लघु उद्योगों के लिए ए1साइज में छूट की लिमिट १.५ करोड़ से बढ़कर ५ करोड़ होनी चाहिए। पंकज गुप्ता, अध्यक्ष, इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ उ8ाराखंड आयकर छूट में इजाफा हो -छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों के लागू होने के बाद से प्रदेश में आयकर की सीमा में वे कर्मचारी भी आ गए हैं जिन्होंंने कभी टै1स फाइल किया ही नहीं। केंद्र को आयकर छूट की सीमा बढ़ानी चाहिए। वरना यह तो एक हाथ से देना और दूसरे हाथ से लेना हो जाएगा। प्रहलाद सिंह, अध्यक्ष, राज्य कर्मचारी संयु1त परिषद महंगाई पर लगे अंकुश -आखिर महंगाई भी थमेगी या नहीं। मंदी के नाम पर खूब हो हल्ला मचा। पर कीमत कम नहीं हुई। रसोई गैस से लेकर आटे दाल तक केभाव आसमान छू रहे हैं। सरकार नया टै1स न लगाए और महंगाई को काबू में करने की कोशिश करे।


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इसी सप्ताह शुरू होगी सिटी बस सेवा श्रीनगर।

लंबे अर्से से सिटी बस सेवा का इंतजार कर रहे स्थानीय लोगों की मुराद अब जल्द ही पूरी होने जा रही है। नगर पालिका परिषद की ३२ सीटों वाली मिनी सिटी बस यहां पहुंच चुकी है। इसी सप्ताह के अंतर्गत बस सेवा शुरू कर दी जाएगी। श्रीनगर, श्रीकोट, चौरास, कीर्तिनगर क्षेत्र की जनता लंबे अर्से से सिटी बस सेवा की मांग करती आ रही थी। बीते वर्ष अगस्त माह में पालिका की सिटी बस सेवा शुरू हो जानी थी, लेकिन धनराशि के अभाव में बस का क्रय नहीं किया जा सका था। इसके बाद पालिका ने नए वर्ष के सौगात के रूप में २६ जनवरी से सिटी बस सेवा शुरू करने का फैसला लिया था। मगर परमिट और अन्य समस्याएं आड़े आने के चलते तब से बस के तैयार होने में छह माह का अति1ित समय लग गया था। अब सिटी बस बनकर यहां पहुंच चुकी है। पालिका अध्यक्ष मोहन लाल जैन ने बताया कि एक सप्ताह के अंतर्गत बस सेवा शुरू कर दी जाएगी।


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Monday, July 6, 2009

-गढ़वाल विवि: मोबाइल पर भी रिजल्ट

-गढ़वाल विवि अपना रहा हाइटेक तौर तरीके -परीक्षार्थियों को परिणाम जानने के लिए भेजना होगा मैसेज -सूबे समेत पूरे उत्तरी भारत का ऐसा करने वाला पहला विवि बना गढ़वाल विवि श्रीनगर गढ़वाल (पौड़ी गढ़वाल) : परीक्षा परिणाम उपलब्ध कराने को लेकर गढ़वाल विवि इस बार हाईटेक तौर तरीके अपना रहा है। विवि प्रशासन ने इस बार छात्रों को घर बैठे मोबाइल पर ही परीक्षा परिणाम देखने की सुविधा मुहैया कराने का निर्णय लिया है। इस योजना के तहत छात्रों को एक विशेष नंबर पर सिर्फ एक मैसेज भेजना होगा और उनका परिणाम मोबाइल स्क्रीन पर उपलब्ध हो जाएगा। गढ़वाल विवि न सिर्फ उत्तराखंड, बल्कि उत्तर भारत का भी पहला ऐसा विवि बन गया है, जो एसएमएस के जरिए छात्र-छात्राओं को रिजल्ट उपलब्ध करा रहा है। कुलपति प्रो. श्रीकृष्ण सिंह के निर्देशन में गढ़वाल विवि के विशेष कार्याधिकारी प्रो. एलजे सिंह के विशेष प्रयासों से यह हाईटेक योजना अमल में लाई गई है। इसके लिए विवि कंप्यूटर विभाग के अध्यक्ष प्रो. एमएमएस रौथाण, संदीप रावत, डा. सुरेन्द्र सिंह रावत ने विशेष साफ्टवेयर तैयार करवाया है। इससे पूर्व हर वर्ष गढ़वाल विवि विभिन्न पाठ्यक्रमों के परीक्षा परिणाम विवि की वेबसाइट पर उपलब्ध कराता रहा है। अब मोबाइल पर रिजल्ट मिलने की सुविधा उपलब्ध होने के बाद पहाड़ के दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले छात्र-छात्राओं को काफी सुविधा मिल जाएगी। विवि ने शनिवार को बीएससी तृतीय वर्ष संस्थागत और एमएससी प्रथम वर्ष कैमिस्ट्री और बॉटनी के रिजल्ट भी घोषित कर दिए हैं। विवि के विशेष कार्याधिकारी प्रो. एलजे सिंह ने बताया कि इंटरनेट कनेक्टिविटी की तकनीकी समस्या के कारण यह तीनों रिजल्ट रविवार को दोपहर तक विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध हो जाएंगे। साथ ही मोबाइल पर भी रिजल्ट देखे जा सकेंगे। इनसेट= कैसे टाइप करें मैसेज श्रीनगर गढ़वाल: गढ़वाल विवि के ओएसडी प्रो. एलजे सिंह ने बताया कि मोबाइल पर रिजल्ट प्राप्त करने के लिए संबंधित परीक्षार्थी को मोबाइल के मैसेज बाक्स में इस तरह मैसेज लिखना होगा- रिजल्ट स्पेस एचएनबी पाठ्यक्रम वर्ष रेगुलर है तो आर, प्राइवेट है तो पी और इसके बाद रोल नंबर टाइप किया जाएगा। मसलन यदि कोई छात्र एमए का रिजल्ट चाहता है, तो रिजल्ट(स्पेस)एचएनबी(स्पेस)एमए(स्पेस)आर या पी(स्पेस)रोल नंबर---। यह मैसेज 56263 पर भेजते ही परिणाम मोबाइल पर उपलब्ध हो जाएगा।


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=महंगा व लंबा होगा दिल्ली का सफर

कांवड़ के चलते दस जुलाई के बदलेंगे देहरादून, ऋषिकेश व हरिद्वार रूट की बसों के मार्ग देहरादून, सावन का महीना बस यात्रियों के लिए मुश्किलभरा होगा। जेब ढीली करने के साथ ही उन्हें यात्रा में समय भी अधिक लगेगा। कांवडिय़ों की भीड़ के चलते देहरादून, हरिद्वार और ऋषिकेश से दिल्ली, आगरा जाने-आने वाले यात्रियों को यह परेशानी होगी। कांवड़ यात्रा के दौरान उत्तराखंड परिवहन निगम की बसों से सफर करना महंगा हो जाएगा। इतना ही नहीं, लोगों को देहरादून से हरिद्वार, हल्द्वानी, दिल्ली व आगरा के सफर में 10 से लेकर बीस किमी का अधिक फासला तय करना होगा। देहरादून से हरिद्वार व हल्द्वानी जाने वाली बसों को इस दौरान वाया चीला भेजा जाएगा, जिससे इन दोनों ही रूटों का सफर तकरीबन 10 से लेकर 15 किमी लंबा हो जाएगा। देहरादून से दिल्ली जाने वाले यात्रियों को सहारनपुर, मुजफ्फरनगर के रास्ते गंतव्य तक पहुंचाया जाएगा। अगर किसी कारणवश यह मार्ग भी बंद हो जाता है तो बसों को वाया पांवटा दिल्ली के लिए चलाया जाएगा। इससे देहरादून से दिल्ली का सफर तकरीबन 40 किमी तक लंबा हो जाएगा। वहीं, ऋषिकेश से दिल्ली जाने वाले यात्री चीला, बिजनौर, मेरठ होकर गंतव्य तक पहुंचेंगे। निगम इस बढ़ी दूरी के हिसाब से ही किराये में बढ़ोतरी करेगा। इस प्रकार यात्रियों को साधारण बसों में यात्रा करने पर तकरीबन 50 से 55 पैसे प्रति किमी अतिरिक्त भुगतान करना होगा, जबकि डीलक्स बसों में यह किराया एक रुपये प्रति किमी और एसी बसों में सवा एक रुपये प्रति किमी अधिक लिया जा सकता है। अगर किसी दिन बस शामली और सोनीपत के रास्ते दिल्ली जाएगी तो किराया कुछ कम हो सकता है। परिवहन निगम के उप महाप्रबंधक (संचालन) दीपक जैन का कहना है कि कांवड़ यात्रा के दौरान ऋषिकेश और हरिद्वार रूट के यात्रियों के लिए सफर ज्यादा महंगा और लंबा होगा। देहरादून के यात्रियों के लिए यह वृद्धि काफी कम रहेगी। दस जुलाई के बाद ही बसों के मार्ग परिवर्तन किए जाएंगे।


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=उमा पहुंची भगवान मद्दमहेश्वर की शरण में

रुद्रप्रयाग: मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती रविवार को द्वितीय केदारनाथ भगवान मद्दमहेश्वर की शरण में पहुंच गई हैं। बताया जा रहा है कि यहां वह लंबे समय तक भगवान की साधना में लीन रहेंगी। रविवार को मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती दोपहर करीब बारह बजे ऊखीमठ पहुंची। इसके पश्चात वह मद्दमहेश्वर धाम के लिए रवाना हो गर्इं। बताया जा रहा है कि साध्वी तीन महीने तक यहीं द्वितीय केदार भगवान मद्दमहेश्वर की शरण में रहेंगी। विदित हो कि साध्वी उमाा भारती का पूर्व से ही द्वितीय केदार से काफी लगाव रहा है। वह समय-समय पर भगवान की शरण में आती रही हैं और लंबे समय तक यहां प्रवास पर रहती आई हैं।


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बदरीनाथ: प्रभु दर पहुंचीं राष्ट्रपति

-भगवान बदरीनाथ के दर्शन कर अर्जित किया पुण्य लाभ -महामहिम ने कराया 51 ब्राह्मणों को भोज -गौचर केवि के छात्र-छात्राओं से की मुलाकात बदरीनाथ, राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने भगवान बदरी विशाल के दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित किया। इस दौरान उन्होंने विधि-विधान से पूजन भी किया। बाद में पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार उन्होंने पितरों के पिंडदान कराने के अलावा 51 ब्राह्मणों को भोज भी कराया। इस दौरान उत्तराखंड के राज्यपाल बीएल जोशी व राज्य मंत्री श्रीमती विजया बड़थ्वाल भी मौजूद थे। राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल रविवार सुबह माणा स्थित सेना के हेलीपैड पर पहुंचीं। यहां बदरीनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष अनुसूया प्रसाद भट्ट, जिला पंचायत अध्यक्ष विजया रावत, जिलाधिकारी अरुण कुमार ढौंडियाल, एसपी विम्मी सचदेवा रमन व सेना के उच्चाधिकारियों ने राष्ट्रपति की अगवानी की। यहां से राष्ट्रपति कार से साकेत तिराहे तक पहुंची और फिर करीब पांच सौ मीटर पैदल चलकर बदरीनाथ मंदिर पहुंची। मंदिर में रावल केशव प्रसाद नंबूदरी व धर्माधिकारी जगदंबा प्रसाद सती ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ पूजन संपन्न कराया। इसके बाद वह मंदिर समिति के नारायण हाल में पहुंची, जहां 51 ब्राह्मणों को भोज कराया गया। इसके बाद वीआईपी गेस्ट हाउस में राष्ट्रपति के तीर्थ पुरोहित प्रकाश नारायण सत्यनाराण बाबुलकर शास्त्री व आचार्य शैलेन्द्र शास्त्री ने धार्मिक रीति रिवाजों के अनुसार अन्य पूजाएं संपन्न करवाई। पूजन के बाद राष्ट्रपति सपरिवार ब्रह्मकपाल पहुंचीं और पितरों के पिंडदान की रस्में निभाने के बाद वापस हेलीपैड रवाना हो गईं। यहां से उन्होंने हेलीकाप्टर के जरिए गौचर के लिए प्रस्थान किया। गौचर(चमोली): बदरीनाथ से लौटते हुए राष्ट्रपति आईटीबीपी मुख्यालय में विश्राम के लिए 50 मिनट तक रुकीं। इस दौरान आईटीबीपी के महानिदेशक विक्रम श्रीवास्तव के आग्रह पर उन्होंने हिंदवीर जवानों, अधिकारियों व केन्द्रीय विद्यालय गौचर के छात्र-छात्राओं से मुलाकात की।


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अग्नि वृक्ष' के विरुद्ध शंखनाद

-पौड़ी गढ़वाल जनपद के बीरोंखाल ब्लाक से शुरू हुआ अभियान -नंदाखेत के पूर्व सैनिक रमेशचंद्र बौड़ाई कर रहे अगुवाई -पंचायतें ले रहीं चीड़ का वृक्षारोपण न करने का संकल्प उत्तराखंड में कराहते जंगल सहायता के लिए पुकार रहे हैं। उनकी करुण पुकार सुनने का वक्त आ गया है। कहीं ऐसा न हो कि हमें पालने-पोषने वाले पेड़ों की प्रजातियां खत्म हो जाएं और प्रकृति की यह सुरम्य वाटिका देखने व रहने लायक ही न रहे। यह चिंता किसी पर्यावरणविद् की नहीं, बल्कि सूबे के आम ग्रामीणों की है। जंगलों में दावानल की मुख्य वजह बन रहे चीड़ के खिलाफ अब वे लामबंद होने लगे हैं और इसकी शुरुआत हुई है पौड़ी गढ़वाल जनपद के बीरोंखाल ब्लाक से। यह मुहिम रंग भी लाने लगी है। गंगा-यमुना का मायका जो कभी बांज, बुरांश, काफल, देवदार आदि के वृक्षों से लकदक था, आज वहां चीड़ का जंगल पसर गया है। यही चीड़ उत्तराखंड के जंगलों के लिए 'अग्नि वृक्ष' साबित हो रहा है। हर साल अग्नि दुर्घटनाओं में अमूल्य वन संपदा आग की भेंट चढ़ रही है। इस बार तो दावानल की घटनाओं ने विभाग के साथ ही ग्रामीणों की पेशानी में भी बल डाल दिए। हर बार की तरह इस मर्तबा भी आग के पीछे मुख्य वजह चीड़ के पेड़ और इसकी पत्तियां (पिरुल) ही रहे। ग्रामीण भी यह बात अब गंभीरता से समझाने लगे हैं कि चीड़ यहां की पारिस्थितिकी के लिए खतरा है और वे इसके वृक्षारोपण के खिलाफ लामबंद होने लगे हैं। बीरोंखाल प्रखंड से यह मुहिम शुरू हुई है। अभियान की बागडोर संभालने वाले पूर्व सैनिक रमेशचंद्र बौड़ाई (नंदाखेत) बताते हैं कि चीड़ के विस्तार से जहां जल संरक्षण में सहायक पेड़ों का लोप हो रहा है, वहीं इसकी पत्तियों में अम्ल की मात्रा ज्यादा होने से भूमि की उर्वरा शक्ति प्रभावित हो रही है। श्री बौड़ाई के अनुसार अभियान के तहत लोगों को चीड़ के खतरों से अवगत कराने के साथ ही इसका पौधरोपण न करने की सलाह दी जा रही है। ग्रामीण इसे समझा भी रहे हैं। उन्होंने बताया कि क्षेत्र पंचायत जयहरीखाल की बैठक में भी यह बात रखी गई और वहां की पंचायत ने यह प्रस्ताव पारित किया कि वह क्षेत्र में चीड़ का वृक्षारोपण नहीं होने देगी। उन्होंने बताया कि कि जल्द ही इस मुहिम के सिलसिले में वन महकमे के मुखिया से मुलाकात की जाएगी और उनसे इस बार चीड़ का किसी भी सूरत में रोपण न करने का आग्रह किया जाएगा। ''चीड़ के प्रसार को रोकने के लिए ग्रामीण यदि सचमुच ऐसी पहल कर रहे हैं तो यह निश्चित रूप से सराहनीय है। विभाग इसमें पूर्ण सहयोग करेगा। वैसे भी विभाग चीड़ के प्रसार पर अंकुश लगाकर वन क्षेत्र में मिश्रित वन विकसित करने को संकल्पबद्ध है। ग्रामीणों की यह पहल इसमें मददगार ही साबित होगी।'' -प्रेम कुमार, उप वन संरक्षक (मुख्यालय)


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Thursday, July 2, 2009

बेहतर पहल

उत्तराखंड के नये मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट लागू करने के लिए समिति गठित करने के निर्देश देकर प्रशासनिक व्यवस्था बेहतर करने की एक अच्छी पहल की है। राज्य में लंबे समय से इसकी जरूरत महसूस की जा रही थी। नौकरशाह नियंत्रण से परे होते जा रहे थे। इस तरह के कई ऐसे उदाहरण सामने भी आये। वस्तुत: प्रशासन सरकार का एक अहम हिस्सा है। सरकार जनहित के लिए अच्छी से अच्छी योजनाएं तैयार कर सकती है, बेहतर पहल कर सकती है, लेकिन इन योजनाओं को लागू करने का दायित्व तो प्रशासन के पास ही होता है। अगर ये कारगर तरीके से लागू न की गयीं तो उद्देश्यहीन हो जाती हैं। जाहिर है कि प्रशासन पर शासन की अच्छी पकड़ होनी चाहिए। अगर नौकरशाह बेलगाम हो गये तो निश्चित रूप से बड़ी से बड़ी योजनाओं का बेड़ा गर्क हो जाता है। नये मुख्यमंत्री इस बात से बखूबी परिचित हैं। शायद यही कारण है कि उन्होंने शासन की इस बुनियादी जरूरत पर सबसे पहले ध्यान दिया। नौकरशाहों के प्रति सख्त रुख का इजहार कर उन्होंने यही संकेत देने का प्रयास किया है कि अधिकारियों को अपने दायित्व के प्रति जिम्मेदार बनना होगा। अगर कोई अधिकारी इससे विमुख होता है तो उसके विरुद्ध शासन भी सख्त होगा। व्यवस्था के लिए सख्त होना आवश्यक होता है। दरअसल अगर शासन ढीला हुआ तो नौकरशाह वर्ग में यह संदेश चला जाता है कि उनकी किसी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। वे जो चाहें करने के लिए स्वतंत्र हैं। बस यहीं से अव्यवस्था का जन्म होता है। प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट आये काफी समय हो गया, लेकिन इसका सही परिप्रेक्ष्य में क्रियान्वयन नहीं हो सका। अगर प्रशासन की कार्य संस्कृति में बदलाव लाना है तो इसे लागू करना ही होगा। तभी प्रशासन भी समझा सकेगा कि उसे आगे किस प्रणाली से कार्य करना है। इसका उद्देश्य प्रशासन को कमजोर करना नहीं बल्कि उसे और प्रभावी बनाना है। हां, इसकी कार्यप्रणाली अवश्य भिन्न हो सकती है। अधिकारी वर्ग को नये मुख्यमंत्री के इस संकेत को समझाना चाहिए और अपनी कार्यप्रणाली में समय की जरूरत के मद्देनजर बदलाव लाना चाहिए ताकि उनका गौरव भी सुरक्षित रहे और राज्य भी विकास के पथ पर अग्र्रसर हो।


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यूएफएचटी मेडिकल कालेज को मिली मान्यता

ट्रस्ट पदाधिकारियों ने माना- प्रदेश के लिए है अभूतपूर्व सफलता पीजी कोर्सेज खोलने की होगी तैयारी:सचिव उत्तराखंड फारेस्ट हास्पिटल ट्रस्ट मेडिकल कालेज को लंबी कसरत के बाद आखिरकार भारत सरकार से एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लिए मान्यता मिल गयी है। इसके साथ ही कालेज में अब पीजी कोर्स शुरू करने का निर्णय लिया गया है। यूएफएचटी के सचिव मोनिष मलिक ने बुधवार को एसटीएच सभागार में पत्रकार वार्ता में कहा कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने निरीक्षण के बाद भारत सरकार को रिपोर्ट भेज दी थी। अब भारत सरकार के स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय से लेटर ऑफ परमिशन मिल चुका है। यह सफलता प्रदेश के लिए गौरव की बात है। मेडिकल कालेज के प्राचार्य प्रो. नारायण सिंह ज्याला का कहना है कि एमबीबीएस का पहला बैच पासआउट हो गया है। इस समय एक साल के लिए इंटर्नशिप कर रहा है। इसमें 92 छात्र-छात्रायें हैं। इसके बाद प्रदेश में चिकित्सकों का टोटा भी कम हो जाएगा। प्रो. ज्याला ने कहा कि कालेज में अब पीजी पाठ्यक्रम आरंभ किया जाएगा। इसमें एमडी, एमएस आदि विषय खोलने को लेकर सभी संसाधन व फैकल्टी जुटायी जा रही है। पीजी की पढ़ाई वाला यह उत्तराखंड का दूसरा और सरकारी क्षेत्र का पहला कालेज होगा। इस अवसर पर उपसचिव जीवन चन्द्र जोशी, चिकित्सा अधीक्षक डा. बलबीर छाबड़ा आदि उपस्थित थे। सेवा नियमावली का मामला शासन में लंबित हल्द्वानी। यूएफएचटी मेडिकल कालेज के सचिव मोनिष मलिक का कहना था कि सेवा नियमावली शासन में लंबित है। इसके लिए वह लगातार प्रयास कर रहे हैं। छठे वेतन आयोग के बारे में श्री मलिक का कहना है कि पहले ट्रस्ट में संख्या कम थी, इसलिए प्रबंध समिति की बैठक में ही सब कुछ हो जाता था लेकिन अब परिस्थितियां अलग हैं। संख्या भी दुगुनी हो गयी है। इसलिए प्रस्ताव शासन को भेजा गया है।


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=सूबे के विकास को तैयार 'टीम निशंक'

चार कैबिनेट, दो स्वतंत्र प्रभार समेत चार राज्यमंत्रियों ली ने शपथ मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल ने मंत्रिपरिषद में आठ और मंत्रियों को नियुक्त किया है। इन सभी को आज राजभवन में आयोजित एक समारोह में शपथ दिलाई गई। इसके साथ ही सूबे के विकास के लिए 'टीम निशंक' आज तैयार हो गई है। काफी मशक्कत के बाद ही सही, सीएम डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने अपने मंत्रियों की सूची आज तैयार कर ली। इसके बाद राज्यपाल बीएल जोशी ने सीएम की सलाह पर आठ और विधायकों को टीम निशंक में नियुक्त करने का ऐलान किया। राजभवन में आयोजित एक समारोह में राज्यपाल बीएल जोशी ने प्रकाश पंत और त्रिवेंद्र रावत के साथ ही निर्दलीय राजेंद्र भंडारी और उक्रांद (उत्तराखंड क्रांति दल) कोटे से दिवाकर भट्ट को कैबिनेट मंत्री पद की शपथ दिलाई। इसके बाद विधायक विजया बड़थ्वाल और गोविंद बिष्ट को राज्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। इन दोनों को स्वतंत्र प्रभार दिया गया है। विधायक खजान दास और बलवंत भौर्याल को भी राज्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई। इस कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष हरबंस कपूर, लोकायुक्त जस्टिस एमएम घिल्डियाल, भाजपा के प्रदेश प्रभारी केएम मोघे, सह प्रभारी डा.अनिल जैन, प्रदेश अध्यक्ष बची सिंह रावत, पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी समेत पूर्व मंत्री अजय टम्टा, पूर्व राज्यमंत्री बीना महराना के साथ ही भाजपा के कई विधायक और दायित्वधारी मौजूद रहे। पूर्व मंत्री बंशीधर भगत का कार्यक्रम में शिरकत न करना खासा चर्चा में रहा। इस आयोजन का संचालन मुख्य सचिव इंदु कुमार पांडे ने किया। इससे पहले मंत्रियों के नामों को लेकर लंबी कसरत की गई। बीती देर रात तक कवायद बेनतीजा रही तो आज सुबह से ही मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के बीच बीजापुर गेस्ट हाउस में कई दौर की वार्ता हुई। इसके बाद ही मंत्रियों के नाम फाइनल करके राजभवन भेजे जा सके। विधायकों को शपथ के लिए आमंत्रण सुबह साढ़े नौ बजे के बाद ही दिया जा सका।


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=आईएमए में झाुका है पाकिस्तान का सिर

आईएमए म्यूजियम में उल्टा लटका है पाकिस्तानी झांडा 1971 के सिलहत युद्ध में भारतीय सेना ने लिया था कब्जे में भारतीय योद्धाओं की जाबांजी करता है बयां इंडियन मिलेट्री एकेडमी (आईएमए) में पाकिस्तान का सिर झाुका हुआ है। चौंकिए नहीं यह सच है। आईएमए के म्यूजियम में 1971 के सिलहत युद्ध में भारतीय जांबाजों ने पाकिस्तानी सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। इसी युद्ध में सेना ने इस झांडे को पाकिस्तानी सेना से कब्जाया। आईएमए की गोल्डन जुबली पर तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल कृष्ण राव ने यह झांडा प्रदान किया। चूंकि यह झांडा कब्जाया हुआ है, इसलिए इसेे आईएमए के म्यूजियम में उल्टा लटकाया गया है। आईएमए के म्यूजियम में यूं तो विभिन्न प्रकार के हथियार, ट्राफी और डाक्यूमेंट हैं। इनमें हर एक की अलग कहानी है। भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 में हुए युद्ध की भी यहां कई निशानियां हैं। इनमें जनरल नियाजी की वह पिस्तौल भी शामिल है, जो उन्होंने आत्मसमर्पण के दौरान सौंपी थी। इसके अलावा हाल ही में जनरल नियाजी के स्टाफ मैस की विजिटर बुक भी आईएमए के म्यूजियम का हिस्सा बनी हैं। इसी युद्ध की एक निशानी ऐसी है, जो बाकी से थोड़ी जुदा है। वह है चांद सितारा लगा हरे और सफेद रंग का एक पाकिस्तानी ध्वज, जो म्यूजियम में उल्टा लटका हुआ है। यह भारतीय सेना के अदम्य साहस और उसकी गौरव गाथा को बयां करता है। अब आते हैं इस झांडे की कहानी पर। यह झांडा भारतीय सेना ने पाकिस्तान की 31 पंजाब बटालियन से 7 से 9 सितंबर तक चले सिलहत युद्ध के दौरान कब्जे में लिया था। 1971 के युद्ध में बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) बार्डर पर मेघालय के निकट सिलहत को सैन्य दृष्टि के काफी महत्वपूर्ण माना गया था। सिलहत से ही पूर्वी पाकिस्तान का रास्ता था और पाकिस्तानी सेना यहीं डेरा जमाए हुए थी। भारतीय सेना की 4/5 गोरखा रायफल्स ने यहां खुखरी से पाकिस्तानी सेना से आमने सामने की लड़ाई लड़ी। भारतीय सेना की कुछेक टुकडिय़ों ने ही अपने युद्ध कौशल और नेतृत्व क्षमता के बूते दुश्मन को काफी देर तक रोके रखा। भारतीय सेना की और टुकडिय़ां पहुंचने पर सेना ने पूरे क्षेत्र को कब्जे में ले लिया। इसी दौरान भारतीय रणबांकुरों ने पाकिस्तानी सेना से यह झांडा भी कब्जाया। इस लड़ाई में 8 माउंटेन डिवीजन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पूर्व भारतीय सेना अध्यक्ष और तत्कालीन मेजर जनरल कृष्ण राव ने इस डिवीजन का नेतृत्व किया। ऐसे में आईएमए की गोल्डन जुबली वर्ष (1982) में उन्होंने ही यह ध्वज आईएमए को प्रदान किया। चूंकि यह ध्वज कब्जाया हुआ था, ऐसे में इसे सीधा नहीं फहराया जा सकता। लिहाजा यह उल्टा लटका हुआ है। आईएमए म्यूजियम में रखी दुश्मनों की यह वस्तुएं यहां के भावी अधिकारियों के भीतर जोश और ऊर्जा का संचार करने के साथ ही उन्हें अपने गौरवशाली इतिहास को कायम रखने की भी प्रेरणा देती हैं। आईएमए के पूर्व कमांडेंट ले.जनरल जीएस नेगी बताते हैं कि लड़ाई के दौरान दुश्मन से कब्जाया ध्वज उलटा ही रखा जाता है।


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