Thursday, February 25, 2010

महाकुंभ: बसने लगी औघड़ों की दुनिया

- -श्मशान को ही बना लिया है अपना घर -आदमियों को देख हो जाते हैं लुप्त, वीरान क्षेत्र है पसंद -करीब चार सौ साल से चली आ रही है परंपरा हरिद्वार: उन्होंने श्मशान को ही अपना घर बना डाला। यहीं साधना भी होती है। आदमियों से जैसे चिढ़ हो, हां मृत आत्माओं से साक्षात्कार करने की अनोखी लगन है। इसका दावा भी करते हैं। यूं कहें कि किसी अजूबे से कम नहीं है औघड़ समुदाय। इनका मूड हो तो खूब बतियाएं अन्यथा सिर पटक लो, मुंह से एक शब्द भी नहीं निकलेगा। फिलहाल महाकुंभ में औघड़ों की उपस्थिति भी दर्ज हो गई है। औघड़ समुदाय की दुनिया ही अलग है, लेकिन पवित्र उद्देश्य समाज कल्याण ही है। सांसारिक जीवन से दूर हैं। तपस्या को ही जीवन का लक्ष्य बनाया है इस समुदाय ने। इनकी तपस्या मठ, मंदिरों में नहीं बल्कि श्मशान पर होती है। कुंभ की आस्था औघड़ समुदाय के राष्ट्रीय सरबरा छिन्नमस्तिका पीठाधीश्वर औघड़ महामदलेश्वर बाबा हरे राम ब्रह्मïचारी जी महाराज उर्फ बोरिया बाबा को खींच ले आई। इनकी दुनिया ही ऐसी कि किसी से मिलना ही नहीं चाहते हैं, जरा सा आभास हुआ तो वीरान क्षेत्र में पहुंच जाएंगे। बस श्मशान पर कहीं दिख जाएंगे। हमें देखकर भी मानों लुप्त हो गए। कई दिन चक्कर काटे, लेकिन न अता ना पता। उम्र पूरी सौ साल हो चुकी है। आखिर एक दिन बोरिया बाबा से मुलाकात हो ही गई। काफी देर तक बोलने को राजी ही नहीं थे, लेकिन अचानक आंखों से आंसू छलके और कहने लगे कि बड़ा दुखी हूं इस दुनिया के दस्तूर से। किसी को किसी से मतलब ही नहीं है, हर जगह बस वैमनस्य ही छा रखा है। बोरिया बाबा बताते हैं कि झारखंड के हजारीबाग क्षेत्र में महज 10 साल की उम्र में काले लिबास में एक आदमी आया था और मुझे उठा ले गया। उसने मुझे दीक्षा दी और मैने उसे गुरु माना। गुरु बाबा वैताली राम से करीब बारह साल तक दीक्षा ग्रहण की। गुरु जी के सानिध्य में ही करीब 35-40 साल पहले पूरे देश की पदयात्रा की। फिलहाल औघड़ समुदाय के बारे में बोरिया बाबा बताते हैं कि करीब चार सौ साल पहले से यह परंपरा चली आ रही है। ठीक से याद नहीं है, लेकिन बताते हैं कि बीस साल पहले गुरु जी के साथ नागपुर में एक अस्पताल में रक्तदान भी किया था। जीवन के बारे में बताते हैं कि हर रोज श्मशान पर जाकर साधना की जाती है। वहां विशेष मंत्र के जरिए मृत आत्माओं को बुलाया जाता है और उनसे साक्षात्कार भी किया जाता है। मंत्र के बारे में नहीं बताएंगे। मंत्र से श्मशान थामने में सप्ताह भर भी लग जाता है। फिर क्या होता है, बिल्कुल नहीं बताऊंगा। फिर बोले कि यहां कुंभ की आस्था खींच लाई है, लेकिन यहां भी दूर वीरान जंगलों व श्मशान में ही रहते हैं। इस बात का भी पता नहीं होता है कि कब कहां जाना है, लेकिन महादेव शिवशंकर की आराधना में ही लीन रहते हैं।

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