Saturday, November 21, 2009

पौड़ी में एडवेंचर टूरिज्म की असीम संभावनाएं

-पैराग्लाइडिंग के मामले में विश्वस्तरीय है कंडारा घाटी -सरकार के ध्यान न देने से नहीं हो पा रहा विकास पौड़ी गढ़वाल: दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियों में पंख लगाकर उडऩे की कल्पना में अक्सर बच्चे खोए रहते हैं, लेकिन पौड़ी में यह कहानी हकीकत में बदल चुकी है। यहां की कंडारा, गगवाड़स्यूं और कोट की प्राकृतिक सुंदरता से लबरेज घाटी में घंटों ग्लाइडर लगाकर आसमान चूमने वाले पर्यटक बार-बार इसी ओर दौड़ते हैं, लेकिन राज्य सरकार को यह नजर नहीं आता और यही वजह भी है कि यह खेल अभी चंद पर्यटकों को ही लुभा पा रहा है। 'पंख होते तो उड़ आती रे' इस गीत की पंक्तियां पौड़ी में साकार की जा सकती हैं। वर्ष 1994 में हिमालयन पैराग्लाइडिंग इंस्टीट्यूट के मनीष जोशी ने अपने निजी खर्चे पर पौड़ी का पहला सर्वे किया और खुलासा किया कि पौड़ी की कंडारा, कोट व गगवाड़स्यूं ऐसी घाटियां हैं, जो पौड़ी की बेरोजगारी और गरीबी को पैराग्लाइडिंग के जरिए मिटा सकती है। इसी साल उन्होंने ट्रायल के तौर पर कुछ उड़ानें भरीं, जिन्हें देखने को पौड़ी ही नहीं बल्कि आसपास के गांवों के सैकड़ों लोग भी पहुंचे। वर्ष 1997 में कंडारा वैली के 12 युवक-युवतियों को पैराग्लाइडिंग का प्रशिक्षण दिया गया। तब उत्तर प्रदेश सरकार में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री डा. रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने प्रशिक्षण का व्यय वहन किया। तत्कालीन आयुक्त सुभाष कुमार ने प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले छात्रों को पुरस्कार व प्रमाणपत्र वितरित किए। इसके बाद यूपी पुलिस के छह प्रशिक्षु, आईआईटी दिल्ली, आईआईटी रुड़की, दिल्ली कालेज आफ इंजीनियरिंग, आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस व विदेशी छात्रों के एक दल ने भी यहां पैराग्लाइडिंग का प्रशिक्षण लिया। तब ऐसा लगा कि अब पौड़ी पैराग्लाइडिंग के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर स्थापित हो जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं सका। वर्ष 1989 में पैराग्लाइडिंग की बदौलत लिम्का बुक आफ रिकाडर््स में नाम दर्ज करवा चुके मनीष जोशी पौड़ी में पैराग्लाइडिंग की जिम्मेदारी संभालने को तैयार हैं। उनका कहना है कि पौड़ी की घाटियों में हवा का दबाव पैराग्लाइडिंग के लिए सबसे उपयुक्त है। यहां चलने वाले मंद हवा के झाोंके पैराग्लाइडर को आसमान की ऊंचाईयों तक पहुंचा देते हैं और यही वजह भी है कि विदेशी भी पौड़ी की घाटियों में उड़ान भरने के लिए लालायित रहते हैं। जिला साहसिक खेल अधिकारी जसपाल चौहान बताते हैं कि अभी तक करीब 60 युवक-युवतियों को पैराग्लाइडिंग का प्रशिक्षण दिया गया है और भविष्य में भी प्रशिक्षण दिए जाते रहेंगे। उन्होंने कहा कि इसके लिए शासन से बजट मांगा जाता है, लेकिन कई बार बजट आवंटित न होने से खेल नहीं हो पाते।

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