Saturday, November 7, 2009

मौडि़वी की पूजा बिन कैसे होगी राजजात

-नंदा राजजात यात्रा से छह माह पूर्व होती है मौडि़वी की पूजा -वर्ष 2000 के बाद अब तक यहां नहीं की गई पूजा -मौडि़वी नामक स्थान पर पत्थरों में खाना पड़ता है प्रसाद उत्तराखंड सदियों से धर्म- अध्यात्म की धरती रही है। देशभर के करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र बदरी- केदार धाम के अलावा यहां कई पौराणिक स्थल व मंदिर हैं, जो इस राज्य के कण- कण में भगवान का वास करने संबंधी उक्तियों को चरितार्थ करते हैं। इसके अलावा मेलों, धार्मिक यात्राओं व अन्य विशेष पूजा आयोजनों के जरिए यहां के लोक का प्रभु से जुड़ाव साफ उजागर होता है। ऐसा ही एक आयोजन है नंदा देवी की राजजात यात्रा। प्रति 12 वर्ष में आयोजित होने वाली इस यात्रा में हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। पूरे विधि- विधान व वैदिक रीतियों के साथ यात्रा का आयोजन किया जाता है और भक्त सुख, शांति की कामना करते हैं। अगली यात्रा वर्ष 2012 में प्रस्तावित है, लेकिन अब तक यात्रा शुरू करने के लिए अनिवार्य मौडि़वी पूजा नहीं की जा सकी है। इससे यह सवाल बहस का विषय बन गया है कि क्या इस बार मौडि़वी पूजा बिना ही यात्रा की जाएगी। उल्लेखनीय है कि 280 किमी की राजजात एशिया की सबसे लंबी पैदल यात्रा है। परंपरा के मुताबिक यात्रा के शुभारंभ से छह वर्ष पूर्व मौडि़वी पूजा किया जाना अनिवार्य है। लोकमान्यताओं के अनुसार नौटी व मैठाणा गांव में 12 वर्ष में दो बड़ी पूजाएं मौडि़वी व राजजात का आयोजन होता है। क्षेत्र की भूम्याल देवी के रूप में उफराईं (अपर्णा) देवी की पूजा की जाती है। ऐसे में अपर्णा देवी जन- जन की पूज्या मानी जाती है। देवी की यात्रा को ही मौडि़वी के नाम से जाना जाता है, जबकि नंदा देवी की यात्रा राजजात कहलाती है। मान्य रीति के मुताबिक मौडि़वी के बाद ही राजजात आयोजित की जा सकती है। उल्लेखनीय है कि नौटी सहित उफरांई देवी की पूजा छातोली, कल्याड़ी, बैनोली, देवल व चौण्डली आदि गांवों में भी होती है। यहां लोग नया अनाज तैयार होने पर उपयोग से पूर्व देवी को भोग चढ़ाते हैं। देवी का प्रिय भोग चौंसा-भात है। श्रद्धालु उफरांई ढांग केनीचे मौडि़वी नामक स्थान पर इसे पकाते हैं। खास बात यह है कि यह प्रसाद बर्तन में नहीं, बल्कि पत्थरों में खाने की परंपरा है। दूसरी ओर, नंदा देवी को क्षेत्रीय लोग अपनी ध्याण (विवाहित पुत्री) रूप में मानते हैं। राजजात यात्रा का तात्पर्य नंदा के कैलाश प्रस्थान यानी विदाई से है। यही वजह है कि विदाई से पूर्व ध्याणी की पूजा के रूप में मौडि़वी पूजा की जाती है। नंदा देवी राजजात का वर्ष 2000 में आयोजन हुआ था, तो छह वर्ष पूर्व 1994 में मौडिवी पूजा का भी आयोजन किया गया था। इससे पहले भी सभी यात्राओं से पूर्व यह पूजा अबाध रूप से की गई है, लेकिन वर्ष 2012 की यात्रा की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और इस बार अब तक मौडि़वी पूजा नहीं की जा सकी है, जबकि कायदे से यह पूजा वर्ष 2006 में ही हो जानी चाहिए थी। जिला पंचायत अध्यक्ष विजया रावत ने बताया कि वर्ष 2012 में राजजात होगी। ऐसे में मौडि़वी का निर्वाह न होना धर्मप्रेमियों को अखरने लगा है। उन्होंने राजजात यात्रा की तैयारियों से पूर्व मौडिवी की मान्य परंपराओं का निर्वहन न होने को लेकर धार्मिक बहस को छेड़ दिया है। मौडिवी के बिना लोग राजजात को आधा अधूरा मानने की बात कहने लगे हैं। इस बाबत, मंदिर के पुजारी मदन प्रसाद ने बताया कि भूम्याल की पूजा बिना गांव की कोई भी सामूहिक पूजा आयोजित करना धार्मिक परंपराओं के विपरीत होने के साथ ही शास्त्रसम्मत भी नहीं है।

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