Saturday, 26 February 2011
अतीत बन गई पहाड़ की जांदरी-उरख्याली
विरासत को खतरा आज के अत्याधुनिक युग में लोप हो गई घरेलू आटा चक्की व ओखल पौष्टिकता से पूर्ण होते थे इससे पीसे गए अनाज
पहाड़ में घरेलू संयंत्रों के रूप में जांदरी-उरख्याली अब बीते दौर का किस्सा हो चुकी हैं। पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाले लोगों के बदलते रहन-सहन ने कभी घर गांव की इस जरूरत को आज ‘अनावश्यक’ मान लिया है या यूं कहें कि विकास की आंधी ने इसको अब अतीत की वस्तु बना डाला है। आइए..समय के पहिए को थोड़ा पीछे घुमा दें। पहले पहाड़ में जांदरी (घरेलू आटा चक्की) व उरख्याळी (ओखल) घर गांव के हर काम-काज में साझीदार होती थी। सिर्फ मांगलिक कायरे में ही नहीं बल्कि घर की रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी दोनों का उपयोग हर दिन होता था। कोठार (अनाज के संदूक) भरने के बाद भले ही अघा जाते थे, लेकिन जांदरी न पिसते हुए और उरख्याली न कुटते हुए थकती थी। तब जांदरी-उरख्याली को बनाने के लिए खास मजबूती वाला पत्थर चुनने के लिए दूर-दूर तक जाया जाता था। आज ठोस पहाड़ तो यथावत हैं, किंतु घर गांव में इनकी उपयुक्तता पूरी तरह से खत्म हो चुकी है। बदलाव का असर ही है कि अब पहाड़ों में जांदरी व उरख्याली की जगह मिक्सी ने ले ली है। जानकारों की मानें तो जांदरी- उरख्याली में कुटे-पिसे अनाज की पौष्टिकता पूर्णत: जैविक व प्राकृतिक होती थी। यह मानने में अतिशियोक्ति नहीं होगी कि भड़ों की वीरता में भौगोलिक स्थितियों के साथ ही इन घरेलू संयंत्रों का भी योगदान रहा है। तब यह भी घर गांव की एक धुरी होते थे जिनके इर्द-गिर्द उनके प्रयोग के साथ ही बीते और आने वाले कल को लेकर भी बातों का सिलसिला चल पड़ने पर खत्म ही नहीं होता था। दु:ख बांटे जाते थे, खुशियां खिलखिलाती थीं। हम कह सकते हैं कि अनायास ही जिंदगी की कहानियों में रिश्ते गढ़े जाते थे, या कि अपनी-अपनी सुनाकर कु छ हल्का हो लिया जाता था। इसी तरह पीढ़ियों की परंपराएं, सबक, संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी में हस्तांतरित हो जाया करते थे। यह किस्सा लगभग दो दशक पुराना, बिजली और डीजल की अफ रात से पहले मोटर रोड से दूर गांवों का था, लेकिन इस दौर में पहाड़ों में बढ़े पलायन, बदलते रहन- सहन, सुविधाओं की चाह, जिंदगी की आपाधापी ने आज घरों से जांदरी तो खलिहानों से उरख्याली को ठिकाने लगा दिया है। कारण कुछ भी हों पुरातन कहे जाने वाले उस दौर में कुछ तो बात थी कि जिसे हम अब शायद ही लौटा पायें
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