Sunday, March 21, 2010

जिनसे खेला करते थे भीम

-आकृति में छोटे पर उठाने में छूटते हैं पसीने -महासू मंदिर हनोल प्रांगण की शोभा बढ़ा रहे पाण्डु पुत्र भीम की बालक्रीड़ा के प्रतीक सीसे के दो गोले लोक मान्यता: ताकत का घमंड दिखाने पर नहीं उठाए जाते स्थानीय मेलों के दौरान क्षेत्र के लोग गोलों पर आजमाते हैं ताकत PAHAR1-आकृति गोल और दिखने में छोटे। देहरादून जिले के हनोल स्थित महासू मंदिर परिसर में रखे सीसे के दो गोले पाण्डु पुत्र भीम की ताकत का एहसास कराते हैं। लोक मान्यता है कि भीम बालकपन में इन गोलों को कंचे (गिटिया) के रूप में इस्तेमाल किया करते थे। गोलों को देखकर कोई भी कह देगा कि इन्हें आसानी से उठाया जा सकता है, पर उठाने में अच्छे से अच्छे बलशालियों के पसीने छूट जाते हैं। समय बदला और लोगों का नजरिया भी। ऐतिहासिक महत्व की यह धरोहर आज ताकत परखने का जरिया भर रह गई है। देहरादून जनपद के जौनसार-बावर क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक स्थल महासू मंदिर के प्रांगण में रखे सीसे के दोनों गोलों का धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व है। किवंदति है कि द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडव हनोल, चकराता व लाखामंडल आदि स्थलों पर ठहरे। लोक मान्यता है कि हनोल स्थित महासू मंदिर परिसर में रखे सीसे के दोनों गोलों से बचपन में पाण्डु पुत्र भीम खेला करते थे। आकृति में छोटे दिखने वाले इन गोलों का वजन छह और नौ मण है यानि ढाई से साढ़े तीन कुंतल। देखकर ऐसा ही लगता है मानों हर कोई इन्हें आसानी से उठा लेगा, लेकिन इन्हें उठाने में अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। सैलानियों के आकर्षण का केंद्र इन गोलों पर क्षेत्र के लोग स्थानीय मेलों के दौरान ताकत आजमाते हैं। सैलानी क्या, श्रद्धालु क्या, मंदिर में आने वाला हर शख्स इन गोलों को कंधों पर उठाने का भरसक प्रयास करता है। कुछ कामयाब होते हैं तो कुछ निराश। गोलों के वजन का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कंधें पर उठाने के बाद फेंकने पर जमीन में चार से पांच इंच तक गहरा गड्ढा हो जाता है। लोक मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति ताकत के घमंड में गोलों को कंधों पर उठाने का दावा करता है तो उसकी ताकत गोलों को छूते ही काफूर हो जाती है, पर श्रद्धापूर्वक उठाने पर गोलों को आसानी से उठाया जा सकता है। मंदिर में बिस्सू व जागड़ा पर्व के दौरान सैकड़ों लोग गोलों को कंधे पर उठाने का प्रयास करते हैं। मंदिर प्रांगण में रखे इन गोलों को देख ऐसा लगता है, मानों भारतीय पुरातत्व विभाग के लिए इनका कोई खास महत्व नहीं है। मंदिर में कई पीढिय़ों से देवता की सेवा कर रहे कारसेवकों व श्रद्धालुओं के लिए इन गोलों को विशेष महत्व देते हैं। शायद यही वजह है कि वर्षों से प्रांगण में रखी ये प्राचीन धरोहर आज तक सुरक्षित है।

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