Thursday, March 18, 2010

पानी के प्रदेश में इंसान प्यासा

नदियों से 40 हजार मेगावाट से ज्यादा बिजली उत्पादन की संभावना, पैदा हो रही दो हजार मेगावाट से भी कम हर साल 2.10 बिलियन घन मीटर पानी से भूजलाशय होते हैं रिचार्ज झीलों, चश्मों के बावजूद गर्मी में कई इलाके झेलते हैं जल संकट पानी के बावजूद 95 में 71 ब्लाक यानी पहाड़ का 89 फीसदी क्षेत्र बरसात के भरोसे देहरादून, pahar1- उत्तराखंड नदियों, झीलों, चश्मों का प्रदेश हैै। मैदानी क्षेत्र में भूजल की कोई कमी नहीं। इसे सरकारों की दूरदर्शिता की कमी कहें या योजनाओं का अभाव कि प्रदेश का पानी बेकार जा रहा है। हालात ये हैं कि छोटी बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं के जरिए यहां की नदियों से करीब 40 हजार मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है, मगर 20 हजार मेगावाट की निर्माणाधीन परियोजनाओं की तमाम कवायद के बाद अब तक करीब 2000 मेगावाट बिजली ही पैदा का जा सकी है। भरपूर जलस्रोतों के बावजूद पहाड़ के खेत प्यासे हैैं। प्रदेश के कुल 95 ब्लाकों में से 71 ब्लाक यानी पहाड़ का 89 फीसदी क्षेत्र बरसात के भरोसे खेती के लिए मजबूर है। पानी इफरात में होने के बावजूद पर्वतीय गांवों में महिलाओं को मीलों दूर से पानी ढोना पड़ता है। गर्मी आते ही कई गांव और कस्बे पानी की किल्लत से जूझते दिखाई देते हैं। राज्य बनने के 10 साल के बावजूद घर-घर साफ पानी पहुंचाने की मुहिम का हाल यह है कि पेयजल विभाग ने इस बार प्रदेश में 606 क्षेत्रों को संकटग्रस्त घोषित किया है। गंगा, यमुना, काली और उनकी सहायक नदियां मसलन टोंस, भागीरथी, अलकनंदा, भिलंगना, मंदाकिनी, रामगंगा, शारदा, पिंडर, सरयू, गोरी ,धौली जैसी सदानीरा नदियों के घर उत्तराखंड में यह स्थिति वास्तव में चिंताजनक है। पर्यावरणविद डॉ. अनिल जोशी कहते हैैं कि ये बात और है कि गंगोत्री, पिंडारी जैसे ग्लेशियरों से निकलने वाली ये नदियां गंगा यमुना के मैदानी इलाके के दुनिया के बसे बड़े सिंचाई की नहरों के नेटवर्क को पानी मुहैया कराती हैं मगर अफसोस की बात यह है कि इस पानी का पर्वतवासी उतना लाभ नहींले पा रहे जितना कि उन्हें मिलना चाहिए। हालांकि उत्तराखंड में पानी के प्रबंधन उपयोग और संरक्षण के लिए उत्तराखंड जल संस्थान, उत्तराखंड पेयजल संसाधन एवं निर्माण निगम जलागम, सिंचाई, लघु सिंचाई, जलागम, उत्तराखंड जल विद्युत निगम आदि कई विभाग है मगर उत्तराखंड अब तक अपने इफरात पानी का उतना बेहतर उपयोग करने में कामयाब नहींहुआ है। नदियों के अलावा जल संरक्षण और प्रबंधन के क्षेत्र में वन विभाग, जलागम प्रबंधन निदेशालय, स्वजल भी कार्यरत हैं लेकिन भूजल की बात करें तो हिमालय की तलहटी के जिलों देहरादून, ऊधमसिंहनगर और हरिद्वार जिलों की जमीन के नीचे भूगर्भीय जल का समुंदर है मगर इसका भी बेहतर उपयोग नहीं हो पा रहा। राज्य बनने के बाद प्रदेश में औद्योगिकीकरण इन्हीं मैदानी जिलों में हुआ है। जिससे पानी की मांग बढ़ी है। शिवालिक रेंज में ट्यूबवेल 50.4 घन मीटर प्रति घंटा और 79.2घन मीटर प्रति घंटा तो भाभर क्षेत्र में 332.4 घन मीटर प्रति घंटा और तराई में 36 से 144 घन मीटर प्रति घंटा की रफ्तार से पानी उगल सकते हैं। गंगा जमुना के दोआब में तो ट्यूबवेल 90 से 198 घन मीटर प्रति घंटा की दर से साफ पीने का पानी दे सकते हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक एके भाटिया का कहना है प्रदेश में हर साल औसतन 1523 मिलीमीटर के करीब बारिश होती है। बारिश और नदियों, चश्मों व अन्य जलस्रोतों के पानी से हर साल कम गहराई वाले भूजलाशय 2.27 बिलियन घनमीटर (बीसीएम) रिचार्ज हो जाते हैंै। इन छिछले भूगर्भीय जलाशयों में 2.10 बीसीएम पानी हमेशा उपयोग के लिए मौजूद रहता है यानी 0.17 बीसीएम पानी अनछुआ रह जाता है। प्रदेश में अभी 1.39 बिलियन घन मीटर भूजल यानी 66 फीसदी का ही दोहन हो रहा हैै। यानी 34 फीसदी भूजल भंडार अभी यूं ही मौजूद है। प्रदेश सरकार को भूजल के बेहतर उपयोग की नीति तैयार करनी चाहिए। सेंटर फॉर साइंस पॉलिसी के निदेशक प्रो. धीरेंद्र शर्मा का कहना है प्रदेश सरकार को वैज्ञानिक शोधो व नई तकनीकों का उपयोग कर पानी का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए।

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