Wednesday, November 9, 2011

मेरी तकदीर को लिखकर खुदा भी मुकर गया...(उत्तराखंड स्थापना दिवस पर विशेष)


( विजय त्रिपाठी)
उम्र के नौवें दशक से गुजर रहे शारीरिक तौर पर अशक्त लेकिन हौसले से भरपूर सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों के जरिए सिस्टम से जीवन भर जूझते रहने वाले परिपूर्णानंद पैन्यूली से हाल ही हालचाल लेते हुए पूछा कि कैसे हैं, तो पूरी मासूमियत से बोले-उत्तराखंड से अच्छा। अब उनकी ये हाजिरजवाबी महज ठिठोली थी या तंज, लेकिन आज राज्य स्थापना दिवस पर राज्य की हालत बयान करने के लिहाज से सर्वाधिक उपयुक्त। आज अपना उत्तराखंड 11 साल का हो गया है। बाल्यावस्था से किशोरावस्था की ओर बढ़ चला है। लेकिन पीछे मुड़कर देखें आंखें गीली हो आती हैं। तमाम आधारभूत-मूलभूत सुविधाएं अभी भी नवजात अवस्था में ही हैं, तमाम सपने अभी भी अधूरे ही है, तमाम ख्वाहिशें खारिज-सी हो चुकी हैं। अभी दो आज दो उत्तराखंड राज्य दो-जैसे नारे उस वक्त आवाज नहीं, जुनून थे। हमारा राज्य-हमारा राज की जिद से जूझकर-जान देकर हासिल किया गया उत्तराखंड आज खंडित आशाओं का प्रदेश बनता जा रहा है, शासन-सत्ता से नैराश्य घर करता जा रहा है। कुछ हमने तरक्की की है, कुछ मिसालें कायम की हैं, लेकिन ये लौ अ-विकास केघनघोर-घटाटोप अंधेरे का मुकाबला करने के लिए नाकाफी हैं।
बात तो यही तय थी, हमारे अगुवाकारों को इस राज्य की नई कहानी लिखनी थी, लेकिन हम ठगे से खड़े हैं। किसी शायर की चंद लाइनें ऐसे मौके पर बरबस याद आ रही हैं।
मुझे उससे कोई शिकायत ही नहीं
शायद मेरी किस्मत में चाहत ही नहीं
मेरी तकदीर को लिखकर खुदा भी मुकर गया
पूछा तो बोला ये मेरी लिखावट ही नहीं
हकीकत यही है। जिन्हें हमने खुदा माना, वे नेता बन बैठे हैं। दुर्भाग्य कि विकास के नाम पर तो राजनीति हो रही है लेकिन विकास के लिए नहीं। विकास इस प्रदेश के लिए प्राथमिक जरूरत है, इसके लिए चाहिए तमाम विरोधों के बीच-बावजूद सर्वदलीय सर्वानुमति, लेकिन पहाड़ी क्षेत्र की तरह यह भी बेहद दुर्गम-दुर्लभ हो गई है और तरक्की की तमाम नेक मंशा भी दलीय विरोध के कारण मूर्त रूप नहीं ले पा रही है। सियासी दलों के आंदोलन का साझा मकसद पृथक राज्य था, लेकिन मकसद पूरा होते ही वे इतने कच्चे निकले कि बिखर गए।
11 साल में हम काफी कुछ चले, लेकिन गति अपेक्षित नहीं रही।
केंद्र के औद्योगिक पैकेज केबूते हम निवेश खींचकर सकल घरेलू उत्पाद और विकास दर तो बढ़ा ले गए लेकिन अब ये बैसाखी न होने से गिरावट का खतरा भी सामने खड़ा है। हमारी आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैय्या है। स्वास्थ्य सेवाओं का हाल ये है कि अस्पतालों में तैनात चिकित्सकों के 60 फीसदी पद खाली हैं और प्रसव के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है।
शिक्षा क्षेत्र के सबक भी विडंबना ही है। हमने कामचलाऊ-कथित राजधानी में तो एजूकेशन हब बना लिया, रुड़की में आईआईटी है लेकिन राज्य के बाकी हिस्सों में स्कूल हैं तो इमारत नहीं, इमारत है तो शिक्षक नहीं। और तो और, बिजली-पानी-शौचालय की व्यवस्था के लिए सुप्रीम कोर्ट तक को जोर लगाना पड़ रहा है और सरकार सफाई दिए-दिए परेशान है।
अलग राज्य के लिए एक आधार पलायन भी था। हाल ही में पेश एक रिपोर्ट के मुताबिक 1174 राजस्व ग्राम गैर आबाद घोषित हो चुकेहैं यानी जनशून्य। पहाड़ी राज्य के पहाड़ी गांव सूने होते जा रहे हैं और देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी क्षेत्र पर आबादी का दबाव बढ़ता जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्र को दुर्गम का दर्जा देकर विकास की मुख्य धारा से ही दूर कर दिया गया है। जिसे बाकी सहोदर सूबों के माफिक विकास प्रदेश बनना था, वो विकास को तरसता प्रदेश बनता जा रहा है।हां, एक बड़ी उपलब्धि हमने कमाई है। देश के पारिस्थितिकी और पर्यावरण के संतुलन को हमने अपने बूते काफी हद तक साधा हुआ है लेकिन इसके एवज में मान-मनी न मिलने से हमें ये भी सालता रहता है कि कहीं न कहीं हमारी पर्यावरणीय चिंता विकास की अपेक्षित तेज रफ्तार में रोड़ा है। सत्ता के विकास-दर्शन में भी खोट प्रतीत होता है। पलायन रोकने के लिए जरूरी है कि पहाड़ पर बुनियादी सुविधाएं और रोजगार के मौके विकसित हों और इसके लिए चाहिए छोटे उद्योग और बड़ी सोच, जिसका कि उत्तराखंड के जन्म के 11 साल बाद भी प्रसव नहीं हो सका है।
कहा जाता है कि स्वप्नदृष्टा ही सृष्टा होता है, लेकिन हमें सपने दिखाने वाले अपने सपने पूरे करने में लगे रहे और हम छले गए। लेकिन जनता को जवाब देना आता है, उसे सपने देखने और पूरे करने का सऊर आता है और दगाबाजों से हिसाब बराबर करने का हुनर भी। सो..जल्द ही मौका है और दस्तूर भी..आगे-आगे देखिए होता है क्या....।
भगवान इस राज्य और पैन्यूली जी, दोनों का स्वास्थ्य बेहतर करे, यही कामना है।
जय उत्तराखंड
(लेखक अमर उजाला देहरादून के संपादक है )

2 comments: