Monday, November 14, 2011

पहाड़ से बैर किलै, गैरसैंण गैर किलै , पहाड़ मांगी राजधानी देहरादून सैर किलै-( कौथिग-2011)

कौथिग में गढ़वाली कवि सम्मेलन में उभरी पहाड़ की पीड़ा
देहरादून, अपना राज मिलने के ग्यारह साल बाद भी विकास को तरसता पहाड़, पलायन से सूने होते गांव व खेत-खलिहान, गहरी होती भ्रष्टाचार की जड़ें, राजनीति के झूठे वायदे। यही तो है उत्तराखंड का सच,
जो रविवार को कौथिग-2011 में आयोजित गढ़वाली सम्मेलन में रचनाकारों के कंठ से प्रस्फुटित हुआ। कवियों ने न सिर्फ व्यवस्था पर तंज कसे, बल्कि लोगों से सूबे के विकास को पूरी मुस्तैदी से आगे आने का आह्वान भी किया।
कौथिग में रविवार को गढ़वाली कवि सम्मेलन में कवियों ने अपनी रचनाओं से सभी को झकझोर दिया। प्रसिद्ध गायक एवं कवि नरेंद्र सिंह नेगी ने अपनी बात कुछ इस तरह रखी-पहाड़ से बैर किलै, गैरसैण गैर किलै, पहाड़ मांगी राजधानी, देरादूणै सैर किलै। निरंजन सुयाल की रचना देखिये-राज ह्वैगि देरादूण, काज ह्वैगि देरादूण, ब्यालि तैं जो डेरा छौ, आज ह्वैगि देरादूण। देवेंद्र प्रसाद जोशी ने कहा-क्य सोचि छौ, क्य ह्वै, यु कनफणी, पहाड़ै पीड़ा जना-तनि। दिनेश ध्यानी की रचना की बानगी देखिये-गदनि ब्वगणि विकास की, कूल पैटाणा छन नेताजी, छाल पर बैठीं द्यखणी जनता, गारा चुलाणा नेताजी। वीरेंद्र पंवार ने कहा-ठगयैल यून, ठगाणा छिन ई जनता आज भोल मा, बतै द्या यूं चुनौं मा अब हमरि बारि आणी चा। गणेश खुगशाल गणी ने त्वै सौं छन तेरी ग्रामसभा का, जैकि परधनिल तुमारू गौं दुफंटु अर हुक्का पाणि बंद होयूं। जयपाल सिंह रावत छिपडु़ दा ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा-धामी थैं देखिकि मुर्गा लाचार, देवभूमि मा भुतु की पौबहार। उनकी अन्य रचना थी गुणचरु की मौज, घरपल्या लाचार। पूरन पंत पथिक ने कुर्सी की दौड़ को शब्द दिए-अहा कना खंड खेलि कुर्सी तेरा बाना, अहा कति म्वर्या बि ज्यूंदा कुर्सी तेरा बाना। गिरीश सुंद्रियाल ने उंचि डांडी कांठी मा अटगणू छ ह्यूंद, निसि गैरी घाट्यों पा पसरणू छ ह्यूद रचना सुनाई।

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