Friday, 23 September 2011

कृषि भूमि खरीद कानून निरस्त


नैनीताल- हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उत्तराखंड राज्य के भीतर कृषि भूमि खरीद की सीमा निर्धारण करने संबंधी कानून को निरस्त कर दिया है।
कोर्ट के इस फैसले के बाद ढाई सौ वर्ग मीटर कृषि भूमि खरीदने संबंधी सीमा खुद ही समाप्त हो गई है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बारिन घोष व न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की खंडपीठ में हुई।
कालाढूंगी के कमोला निवासी जसवंत सिंह द्वारा एक याचिका हाईकोर्ट में दायर की थी। जिसमें कहा गया था कि वर्ष 2003 में उत्तराखंड सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश जमींदारी, विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 की धारा 154(3,4,5) में संशोधन किया गया था। जिसके तहत उत्तराखंड में ढाई सौ वर्ग मीटर से अधिक कृषि भूमि खरीदने से पहले सरकार की संस्तुति लेनी जरूरी कर दी गई थी।
इसके तहत किसी व्यक्ति अथवा परिवार के पास अक्टूबर 03 या इससे पूर्व कोई कृषि भूमि उत्तराखंड राज्य में नहीं है, तो वह सिर्फ ढाई सौ वर्ग मीटर भूमि से अधिक क्रय नहीं कर सकता है। याचीकर्ता का कहना था कि वह उत्तराखंड का मूल निवासी है, किन्तु उसके व उसके परिवार के पास कोई कृषि भूमि नहीं है। वह अपनी आजीविका चलाने के लिए कृषि भूमि क्रय करना चाहता है, लेकिन इस अधिनियम के चलते राज्य में भूमि खरीदने पर रोक लगी है।
सरकारी अधिवक्ता की ओर से कोर्ट में बहस के दौरान तर्क दिया गया कि कृषि भूमि खरीद की आड़ में कई लोग आवासीय कालोनियां व होटलों इत्यादि का निर्माण कर रहे हैं। याचिका पर सुनवाई के बाद अदालत ने 129 बी व 154(3,4 व 5) संशोधित कानून को असंवैधानिक घोषित करार देते हुए उसे निरस्त कर दिया। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बारिन घोष व न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की खंडपीठ में हुई। उधर, राजस्व मंत्री दिवाकर भट्ट ने कहा कि कोर्ट के निर्णय की समीक्षा के बाद सरकार कदम उठाएगी।

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