Monday, July 18, 2011

फिल्मकारों को लुभाने में सरकार फेल

हल्द्वानी- खूबसूरत वादियां, हिमालय की चोटियां, ऊंचे-नीचे पर्वतों की अनूठी श्रृंखला के बीच बसे उत्तराखंड में फिल्मांकन की अपार संभावनाएं हैं,

लेकिन राज्य सरकार का नकारात्मक रवैया फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों में आक्रोश पैदा कर रहा है। यहां तक कि भाजपा सरकार ने कांग्रेस सरकार के फिल्मों को अनुदान देने के शासनादेश को भी कूड़े में फेंक दिया।
तत्कालीन कांग्रेस सरकार में क्षेत्रीय फिल्म विकास परिषद का गठन किया गया था। महेश शर्मा को इसका उपाध्यक्ष बनाया गया था। 15 दिसंबर 2006 को सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के अपर सचिव सुव‌र्द्धन ने शासनादेश जारी किया था। इसमें क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को अनुदान दिये जाने का प्रावधान था। इसमें उल्लेख था कि गढ़वाली व कुमाऊंनी बोलियों में बनी फीचर फिल्मों के निर्माण के लागत का 30 प्रतिशत अथवा अधिकतम 10 लाख रुपये का अनुदान दिया जाएगा। इसके लिए फिल्म को सेंसर प्रमाण पत्र प्राप्त करना होगा। इन फिल्मों का 75 प्रतिशत फिल्मांकन राज्य में ही करना होगा। साथ ही शूटिंग स्थलों का नाम उनके वर्तमान नाम के अनुरुप ही रखना होगा। स्थानीय कलाकारों को अधिक प्रतिनिधित्व देना होगा। इसके साथ ही डाक्यूमेंट्री फिल्मों व सेलूलाइड पर निर्मित फीचर फिल्मों के अतिरिक्त वीडियो तथा सीडी पर निर्मित फिल्मों को भी अनुदान दिया जाएगा। लोक फिल्मकारों ने फिल्में बनायी और अनुदान के लिए आवेदन किया। विडंबना यह है कि जब तक अनुदान मिलने की प्रक्रिया पूरी होती, तब तक सरकार बदल गयी। राज्य में भाजपा की सरकार बनी। साढ़े चार साल पूरे होने को हैं, लेकिन दु:खद यह है कि इस शासनादेश को कूड़े में ही फेंक दिया गया। लोक फिल्मों को बढ़ावा देने की कोई पहल नहीं हुई। फिल्म निर्माता व निर्देशक विक्की योगी का कहना है कि राज्य में फिल्म ऐसा महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिससे राज्य की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर तक हो सकती है, लेकिन राज्य सरकार इसे बढ़ावा नहीं दे रही है। मीडिया सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष डा. अनिल डब्बू का कहना है कि प्रदेश सरकार लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।

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कांग्रेस शासनकाल में राज्य में फिल्मी माहौल था। हजारों युवा इसमें भाग्य आजमा रहे थे। राज्य में कई नामचीन फिल्मों की शूटिंग हुई थी। फिल्म परिषद का कार्यालय बना, लेकिन भाजपा सरकार ने यहां के कलाकारों के अरमानों में पानी फेर दिया। साढ़े चार वर्ष तक कुछ भी नहीं किया।
महेश शर्मा
पूर्व उपाध्यक्ष, क्षेत्रीय फिल्म सलाहकार परिषद
राज्य में संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अनुदान दिया जाता है। सरकार प्रयासरत है। फिल्में कामर्शियल श्रेणी में आ जाती है। इसलिए अनुदान नहीं मिलता है।
बीना भट्ट
निदेशक, संस्कृति विभाग

विडंबना
6कांग्रेस शासन के समय के शासनादेश को भी कूड़े में फेंका
6नई नीति बनाने की नहीं हुई पहल
610 लाख रुपये तक के अनुदान देने का था प्रावधान
उपेक्षा : सरकार के रवैये से आक्रोशित हैं कलाकार

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