Thursday, July 7, 2011

अदवानी के रानीगढ़ में छुपा है गढ़वाल राजघराने का खजाना !

पौड़ी। त्रावनकोर के पद्मनाभमन मंदिर से बेशकीमती खजाना मिला तो यहां भी गढ़वाल रियासत के दौर के खजाने की चर्चा छिड़ जाएगी।

गढ़वाल में ऐसे अनेक स्थान चिह्नित किए जाने लगे हैं जहां राजशाही के दौरान खजाने को सुरक्षित रखे जाने का जिक्र किया जा रहा है। मंडल मुख्यालय से 18 किमी की दूरी पर पौड़ी- कांसखेत-सतपुली मोटर मार्ग पर अदवानी के घने जंगलों के बीच एक ऐतिहासिक पौराणिक स्थल को इसी तरह रेखांकित किया जा रहा है। यहां भगवान शिव का प्राचीन मंदिर भी है, जिसे आदेर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। यहीं गढ़वाल के तत्कालीन नरेशों द्वारा ऐतिहासिक धरोहर को संजो कर रखे जाने का इन दिनों खूब जिक्र हो रहा है। हालांकि पुरातत्व विभाग इस संदर्भ में अभी भी अनभिज्ञ है लेकिन प्रसिद्ध इतिहासकार शिवप्रसाद डबराल ने अपनी पुस्तक में स्पष्ट उल्लेख किया है कि गढ़वाल राजघराने के शासन के दौरान जब श्रीनगर में राजधानी थी तब पति की असमय मृत्यु के बाद मंत्रिमंडल के सरदारों ने चार वर्षीय राजकुमार प्रदीप शाह की हत्या का षड़यंत्र रचा था, तब रानी मंत्री पूरिया नैथानी की सलाह पर उनके गांव नैथाणा के निकट अदवानी के जंगलों में राजकुमार की जान बचाने के लिए कुछ वफादार सैनिकों के साथ यहां आयी। बताया जाता है कि राजकुमार के साथ खेलने के लिए एक हाथी का बच्चा भी यहां पर लाया गया था और इसी स्थल पर यह चार वर्षीय राजकुमार हाथी के साथ खेला-कूदा करता था, तब से अब तक यह मैदान हाथी मैदान के नाम से प्रसिद्धि पाये हुए है। इतिहासकारों का कहना है कि इसी स्थल पर राजघराने का खजाना रखा गया था। पौड़ी के पास घने जंगलों के बीच रानीगढ़ नामक यह जगह गढ़वाल रियासत के इतिहास को छिपाये हुए है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर यह पुष्टि होती है कि 19वीं सदी के प्रारम्भ में रानी द्वारा यहां ऐतिहासिक धरोहरों को संजोकर रखा गया था। कोटद्वार अदवानी पौड़ी से होकर जाने वाला यह मार्ग पुराने समय में बदरी- केदार जाने का मार्ग भी था। गढ़वाल रियासत का खजाना यहां पर होने पर जब चर्चाओं ने जोर पकड़ा तो स्थानीय लोगों ने इस स्थल की खुदाई शुरू की तो खुदाई के दौरान लाल रंग के सांप निकलने लगे। दो बार खुदाई का यह दौरा जारी रहा और जब इस संदर्भ में भारतीय पुरातत्वीय सव्रेक्षण विभाग (एएसआई) को जब यह जानकारी मिली तो विभाग के अधिकारियों ने इस स्थल पर पहुंचकर इस स्थान को चहारदीवारी में कैद कर दिया लेकिन दु:खदायी पहलू यह कि पुरातत्व विभाग को इस संदर्भ में कोई जानकारी नहीं है और न ही यह जानकारी है कि विभाग यहां कब पहुंचा और कब चहारदीवारी कर चला गया। रानी 1720 में प्रदीप शाह को ले गई थी रानीगढ़ पौड़ी। क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता अवधकिशोर पटवाल नरोत्तम सिंह नेगी कहते हैं कि मुख्यालय से 18 किमी दूर इस स्थान पर जहां ऐतिहासिक धरोहर स्थित हैं, वहीं यह क्षेत्र बदरी-केदार यात्रा का भी मुख्य मार्ग था। सड़क मार्ग से एक किमी पैदल चलने के बाद घने जंगलों के बीच रानीगढ़ नामक स्थान पर इतिहासकार शिवप्रसाद डबराल के अनुसार 1720 के आसपास टिहरी राजघराने की रानी छजैला अपने चार वर्षीय पुत्र प्रदीप शाह की जान बचाने अपने वफादारों के साथ यहां पहुंची थी और इस प्रसिद्ध स्थल के प्राचीन शिव मंदिर आदेर महादेव में पूजा-अर्चना किया करती थी। श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को यहां दूर-दूर से भक्त पहुंचते हैं और यह भी मान्यता है कि यहां पर टिहरी राजघराने का खजाना भी दफन है।
क्षेत्रीय लोगों ने की खुदाई तो निकले थे लाल नाग भारतीय पुरातत्व सव्रेक्षण विभाग ने किया इस ऐतिहासिक स्थल को चहारदीवारी में कैद

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