Saturday, June 4, 2011

अब गांवों व शहरों के नाम और इतिहास का चलेगा पता

भाषा वैज्ञानिक करेंगे गांवों के नामों पर अध्ययन, पांच सदस्यीय समिति का गठन, आज होगी बैठक स्थान और नाम खुद करते हैं अतीत का खुलासा देहरादून।- निकट भविष्य में उत्तराखंड के लोग यह जान सकेंगे कि उनके गांव या शहर का नाम कैसे पड़ा और इसका क्या इतिहास है। उत्तराखंड भाषा संस्थान प्रदेश के स्थान नामों के भाषा वैज्ञानिक अध्ययन की एक महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू कर रहा है। प्रदेश में कुछ भाषाविदों ने कुछ खास इलाकों के स्थान नामों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन किया है लेकिन अब तक समूचे प्रदेश के स्थान नामों का कोई एक व्यापक व समग्र अध्ययन नहीं हो पाया है। भाषाविद मानते हैं कि स्थान नाम खुद बहुत कुछ कहते हैं अगर उनके विकास और उनकी मौजूदा स्थिति का अध्ययन किया जाए तो इतिहास की कई परतें खुलती हैं। उत्तराखंड में बोली जाने वाली गढ़वाली व कुमाऊंनी बोलियां खस प्राकृत से विकसित हुई हैं। ऐसे में इन स्थान नामों के पीछे इस भाषा के विकास का क्या इतिहास रहा है यह भी अध्ययन किया जाएगा। उत्तराखंड में माना जाता है कि कुछ स्थानों का नाम वहां रहने वाली जातियों के नाम से पड़ा है या जाति नाम ही स्थान नामों से बनी हैं। मसलन नौटी के नौटियाल, सुंद्री के सुंदरियाल, डोभ के डोभाल आदि जातिनाम स्थान नाम से विकसित हुए या जातियों के नाम से स्थानों ने नाम पड़े। भाषाविद यह भी मानते हैं कि मानव समाज का इतिहास घमंतू जातियों का इतिहास भी रहा है। विभिन्न मानव समूह इतिहास की उथलपुथल के बीच एक स्थान से दूसरे स्थान में बसते रहे हैं। इसी लिए उत्तराखंड में बहुत से स्थान एक नाम वाले मिलते हैं मसलन अस्कोट पिथौरागढ़ में भी है तो गढ़वाल में भी, इसी तरह पौड़ी नाम का गांव बागेर जिले में भी है। अब सवाल यह है कि क्या वहीं के लोग किसी ऐतिहासिक राजनैतिक हलचल की वजह से दूसरे स्थान पर पहुंचे या इसकी कोई और वजह है। इसी तरह खांद या खाल वाले स्थान नाम जैसे जड़ाऊखांद, अदालीखाल, सफदरखाल, कद्दूखाल आदि के पीछे क्या उनकी कोई भौगोलिक संरचना वाली विशेषता है। इसी तरह के तमाम सवालों का इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत अध्ययन किया जाएगा। उत्तराखंड भाषा संस्थान की निदेशक डा. सविता मोहन ने बताया कि उत्तराखंड के स्थान ग्राम नामों के भाषा वैज्ञानिक व ऐतिहासिक अध्ययन के लिए भाषाविदों व इतिहासकारों की एक समिति भी बना ली गई है जिसमें डा. केशव दत्त रुबाली, डा. तारादत्त त्रिपाठी, डा. उमा मैठाणी, डा. कल्पना पंत और डॉ. राम विनय सिंह को शामिल किया गया है। इस समिति की पहली बैठक चार जून को हल्द्वानी स्थित उत्तराखंड मुक्त विविद्यालय परिसर में होगी। जिसमें विशेषज्ञों की सलाह से परियोजना का खाका तैयार किया जाएगा।

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