Saturday, April 30, 2011

हेमवती नंदन विवि को हाईकोर्ट ने दिए निर्देश

2009-10 का परिणाम घोषित करे नैनीताल। हाईकोर्ट ने ऋषिकेश की कृष्णा सेवा आश्रम सोसाइटी की याचिका पर हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय को बैचलर ऑफ फिजियोथेरेपी एवं बैचलर ऑफ मेडिकल लेबोरेट्री का वर्ष 2009-10 का परिणाम घोषित करने का निर्देश दिया है। साथ ही 2010-11 के लिए याची संस्थान को उक्त कोर्स के संचालन की अनुमति प्रदान करने को कहा है। न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। ऋषिकेश के कृष्णा सेवा आश्रम सोसाइटी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि 29 मार्च 2010 को गढ़वाल विवि ने एक आदेश पारित कर संस्थान को उपरोक्त कोर्स चलाने की अनुमति नहीं दी। इसका कारण गढ़वाल विवि को केंद्रीय विवि का दर्जा मिलना बताया गया। याचिका में कहा गया था कि संस्थान 2006 से मान्यता प्राप्त है और वर्ष 2009-10 की परीक्षा हो चुकी है, लेकिन परिणाम घोषित नहीं किया जा रहा है। पूर्व में हाईकोर्ट ने एक अंतरिम आदेश पारित कर परीक्षा परिणामों को न्यायालय के आदेश के अधीन रखा था। आज पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने विवि को आदेश दिया कि वह परिणाम घोषित करने के साथ ही 2010-11 के लिए याची संस्थान को कोर्स के संचालन की अनुमति प्रदान करे।

जौनसार बावर का बिस्सू मेला

बिस्सू का त्योहार उत्तराखंड के जौनसार बावर इलाके और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि जौनसार बावर और सिरमौर के सांस्कृतिक महत्व की देश-दुनिया में पहचान है। यह पर्व हर साल 12 से 30 अप्रैल तक मनाया जाता है। इस उत्सव की तैयारी एक महीना पहले से ही होने लगती है। गांववासी अपने मकानों और गोशालाओं की लिपाई के लिए स्थानीय मिट्टी इकट्ठा करने लगते हैं। इस मिट्टी का लेप करने के बाद सफेद मिट्टी (गदिया/कमेड़ा) से पुताई की जाती हैं। बिस्सू के पहले दिन पारंपरिक हथियारों जैसे ढांगरा (फरसा), तलवार और धनुष-बाण को साफ करने की तैयारी की जाती हैं। इस त्योहार की खास विशेषता धनुष-बाण (ठोउड़ा) का प्रदर्शन है, जो लोगों के लिए खास आकर्षण का केंद्र रहता है। धनुष-बाण खेलने वाले कलाकारों को स्थानीय भाषा में ठोउड़ाय के नाम से पुकराते हैं। इस पर्व में विविध लोकनृत्य का आयोजन होता है और सामूहिक रूप से गीत भी गाए जाते हैं। इन गातों के लय व ताल के साथ गांव का सामूहिक आंगन (साजो आंगण) थिरक उठता है। जिस स्थान पर बिस्सू का त्योहार मनाया जाता हैं, वहां पर गोल समूह बनाकर तांद/हारुल जैसे ऐतिहासिक और पौराणिक गीत गाए जाते हैं। इस ठोउड़ा खेल में कौरव-पांडवों के समय की परंपरा के आधार पर अस्त्र-शस्त्र व तीर-कमान तैयार करना, उसका अभ्यास करना और योद्धाओं की प्रतिष्ठा को प्रमुखता देना होता है। ठोउड़ा खेलने वाले कलाकार दूसरे कलाकार पर बाण मारते हुए कहते हैं, जैथे लागों ली शाटो तैथे कइड़ी भी फाटों (यानी जहां पर मैं बाण मारता हूं, वहां पत्थर भी फट जाता है)। खेल में भाग लेने वाले कलाकार जो पोशाक धारण करते हैं, उसे जंगेल कहते हैं। इस खेल में सुरक्षा की दृष्टि से पांव में विशेष जूते पहने जाते हैं। इस खेल की एक विशेषता यह भी है कि इसमें हमउम्र कलाकार ही भाग लेते हैं। जहां यह खेल होता है, वहां दुकानें भी सजी रहती हैं। कहीं-कहीं पर बिस्सू के पहले दिन दूर जंगल से बुरांस के फूल लाने की परंपरा है, जिसे अगले दिन देवताओं को चढ़ाया जाता है। इस पर्व की इस इलाके में काफी मान्यता है। हालांकि गांवों से पलायन के कारण युवा पीढ़ी इस पारंपरिक त्योहार को अब उतनी अहमियत नहीं दे रही। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि जिस कोटा क्वानू (चकराता) के प्रसिद्ध खिलाड़ी नैन सिंह राणा ने इस ठोउड़ा खेल में प्रसिद्धि पाई है, उस गांव में आज कोई युवा इस खेल में भाग लेने को उत्सुक नहीं दिखता। जबकि इस परंपरागत त्योहार को बचाने में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए।

उच्च शिक्षा में ऊंची उड़ान

काशीपुर में सिब्बल ने किया आईआईएम का शिलान्यास काशीपुर। शुक्रवार को आईआईएम काशीपुर का शिलान्यास होते ही राज्य ने उच्च शिक्षा में ऊंची उड़ान भरी। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने दावा किया कि आईआईएम के शिलान्यास के साथ ही काशीपुर ने अंतरराष्ट्रीय मानचित्र में अपना स्थान बना लिया है। कहा कि आईआईएम काशीपुर देश ही नहीं विदेश का इंस्टीट्यूट ऑफ एक्सीलेंस बनेगा। यही नहीं किसी अर्द्धशहरी क्षेत्र में स्थापित होने वाला यह देश का पहला आईआईएम है। उन्होंने कहा कि देश में 30 सेंट्रल यूनिवर्सिटी, आठ आईआईएम, सात एनआईटी, 20 ट्रिपल आईऱ्टी की स्थापना की जाएगी। शुक्रवार को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के साथ कुंडेश्वरी स्थित एस्कार्ट फार्म की 200 एकड़ भूमि में 800 करोड़ रुपये की लागत से स्थापित होने वाले आईआईएम का शिलान्यास किया। इस मौके पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि कपिल सिब्बल ने कहा कि आईआईएम काशीपुर को संचालित करने वाले गवर्निंग बोर्ड के अध्यक्ष, सदस्य, निदेशक से लेकर फैकल्टी तक का चयन मेरिट के आधार पर किया गया है।

Thursday, April 28, 2011

क्वालीफाइंग मा‌र्क्स होंगे अब 50 प्रतिशत

हरिद्वार, लोक सेवा आयोग ने युवाओं को सौगात देते हुए पीसीएस-जे की प्री परीक्षा में सफलता के लिए 50 प्रतिशत अंक निर्धारित कर दिए हैं, जबकि एससी और एसटी श्रेणी के अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा तक पहुंचने के लिए 40 फीसदी अंक लाने होंगे। अब तक अभ्यर्थियों को लिखित परीक्षा में सफलता के लिए 60 प्रतिशत अंक लाने होते थे। आयोग को इस संबंध में शासन से निर्देश मिल चुके हैं।उत्तराखंड लोक सेवा आयोग ने पीसीएस-जे (ज्यूडिशियरी ) लिखित परीक्षा में सफल होने के लिए सामान्य और ओबीसी श्रेणी के अभ्यर्थियों को अब 50 प्रतिशत अंक लाने होंगे, जबकि अब तक 60 प्रतिशत अंक लाने पर अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा के लिए चयनित किया जाता था। आयोग ने एससी और एसटी श्रेणी के अभ्यर्थियों के लिए 50 प्रतिशत की जगह अब 40 प्रतिशत अंक निर्धारित कर दिए हैं।

मुख्य परीक्षा के बाद दायर याचिका खारिज

नैनीताल: हाईकोर्ट ने उत्तराखंड सचिवालय के समीक्षा व सहायक समीक्षा अधिकारी के रिक्त पदों पर भर्ती प्रक्रिया को चुनौती संबंधी याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट के अनुसार याचिका मुख्य परीक्षा के बाद दायर की गई। साथ ही लोक सेवा आयोग को परीक्षा परिणाम घोषित करने के लिए एक माह तक इंतजार करने का आदेश दिया है।फरवरी 2007 में राज्य लोक सेवा आयोग ने सचिवालय के समीक्षा व सहायक समीक्षा अधिकारी के रिक्त पदों के लिए भर्ती को विज्ञप्ति जारी की थी। इन पदों के लिए प्रारंभिक परीक्षा 22 नवंबर 09 को हुई थी और परिणाम 11 मार्च 10 को घोषित किया गया। इसके बाद हुई मुख्य परीक्षा का परिणाम अभी घोषित नहीं हुआ है।

Wednesday, April 27, 2011

यहां हर घर में पैदा होता है एक अफसर

बागेश्वर। कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं होता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो। ये लाइनें खंतोली गांव के उन युवाआं पर सटीक बैठती हैं जिन्होंने किसी भी स्कूल से सात किमी दूर रहते हुए भारत की सरकारी सेवाओं में सबसे ऊंचा मुकाम पाया। गांव छोड़कर सड़कों की तरफ भाग रहे लोगों को आईना दिखाया कि सुविधाओं से प्रतिभा नहीं प्रतिभाएं सुविधाओं को जन्म देती हैं। तमाम सुविधाओं के अभाव में इस गांव के छह लोग केंद्रीय प्रशासनिक सेवा के उच्च पदों तक पहुंचे तो यह किसी आश्चर्य से कम नहीं। सात सौ लोगों के इस गांव में लगभग हर घर से एक अधिकारी निकला है। कुमाऊं में बिजली की रोशनी पहुंचाने वाले पहले इंजीनियर रामचंद्र पंत के गांव में आज भी प्रतिभाओं की कमी नहीं। कांडा-विजयपुर मार्ग से तीन किमी दूर खंतोली गांव में भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव उसी तरह है जैसे पहाड़ के और गांवों में है। इन अभावों के बावजूद यह गांव कुछ अलग है। इस गांव में इतनी प्रतिभाएं हैं की अंगुली में नहीं गिनी जा सकतीं। देश का शायद ही कोई सेवा क्षेत्र हो जिसका कोई बड़ा पद खंतोली के हिस्से न आया हो। खंतोली से निकली प्रतिभाओं की बात करें तो इसमें एक आईएएस, एक आईएएस एलाइड, दो आईएफएस और एक आईईएस है। सफलता की कहानी यहीं खत्म नहीं होती पांच पीसीएस भी हैं और तीन वैज्ञानिक भी। इसमें दो वैज्ञानिक देश के परमाणु केंद्रों में काम कर रहे हैं। देश की सीमाओं की रक्षा के लिए इस गांव ने एक ब्रिगेडियर, तीन विंग कमांडर और एक कमांडेंट भी दिया है। चिकित्सा और इंजीनियरिंग में भी गांव के युवाओं का बड़ा योगदान है। गांव के पांच युवा डाक्टर और 30 इंजीनियर हैं। कुमाऊं में बिजली पहुंचाने का काम भी इसी गांव के इंजीनियर रामचंद्र पंत के निर्देशन में हुआ। शिक्षा और संगीत के क्षेत्र में भी खंतोली के नाम बड़ी उपलब्धि है। गांव के आठ लोग महाविद्यालयों में प्रोफेसर हैं तो संगीतज्ञ चंद्रशेखर पंत के नाम पर नैनीताल में संगीत विद्यालय चल रहा है। देश की आजादी में देवी दत्त पंत, नारायण दत्त पंत, हरि दत्त पंत, कीर्ति बल्लभ पंत, पूर्णानंद पंत, चंद्र शेखर पंत, पुरुषोत्तम का नाम भुलाया नहीं जा सकता। सेवानिवृत्त शिक्षक दयाधर पंत बताते हैं कि गांव की सफलता का सबसे बड़ा कारण है लोगों का गांव से जुड़े रहना। वह कहते हैं गांव में अधिकारियों की कोई कमी नहीं लेकिन हर अधिकारी आज भी गांव से जुड़ा है। समय-समय पर गांव आकर यही अधिकारी गांव में शिक्षा ले रहे युवाओं को आज भी ऊर्जा और आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहे हैं।

मुख्यमंत्री निशंक पर मुकदमा

देहरादून, हरिद्वार में सन 2010 में आयोजित महाकुंभ मेले में षडयंत्र रचकर सरकारी धन की बंदरबाट व साक्ष्य मिटाने के आरोप में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक समेत तीन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है। अधिवक्ता जेडी जैन की ओर से सीजेएम कोर्ट में याचिका दायर कर मुख्यमंत्री, मेला मंत्री और मेला अधिकारी पर दो सौ करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया गया। मुख्यमंत्री के सचिव डॉ. उमाकांत पंवार ने मामले की जानकारी होने से इंकार किया है। याचिकाकर्ता जेडी जैन ने यह याचिका बीती 15 अप्रैल को दायर की थी, मगर यह चर्चा में शनिवार शाम को आई। महाकुंभ मेले के समापन के एक वर्ष बाद दायर इस याचिका में आरोप है कि मेले के आयोजन में मुख्यमंत्री डॉ. निशंक ने सरकारी धन के खर्चे की समस्त जिम्मेदारी मेला अधिकारी आनंद वर्धन को दी थी। आरोप है कि मुख्यमंत्री, मेला अधिकारी व मेला मंत्री मदन कौशिक ने आपराधिक षडयंत्र रचकर दो सौ करोड़ रुपये का घोटाला कर सरकारी धन की बंदरबांट की। उधर, एडवोकेट जेडी जैन ने मुकदमा दर्ज कराए जाने की पुष्टि की।

Sunday, April 24, 2011

भ्रष्टाचार का बादशाह है उत्तराखंड

इकोनोमिक टाइम्स के सर्व में यूपी और यूके को करेप्शन में सबसे ज्यादा 8.88 अंक मिले है नई दिल्ली. बिमारु कहे जाने वाले बिहार और नक्सली हिंसा से ग्रस्त झारखंड को पीछे छोड़कर उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड इकोनोमिक टाइम्स के करप्शन इंडेक्स में नम्बर वन बन गये हैं। करप्शन के इस ताज़ का पूरा श्रेय दोनों सूबों के मुख्यमंत्रियों को जाता है। देवभूमि का भी है जहां जंगल कट रहा है, सुखना भूमि घोटानो के तर्ज पर ज़मीन करप्शन से बिक रही है, जहां के जवानों को रोज़गार नहीं मिलता बस देहरादून जाने पर जेल ज़रुर मिल जाती है। हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट में पानी बिकना और मुख्यमंत्री कविता सुनाते है..पानी और जवानी की..। इकोनोमिक टाइम्स के सर्व में यूपी और यूके को करेप्शन में सबसे ज्यादा 8.88 अंक मिले है उसका स्थान आता है बिहार, झारखंड और राजधानी दिल्ली का..। हांलाकि इसके पड़ोसी पंजाब और हरियाणा में कहीं कम भ्रष्टाचार है। इकोनॉमिक टाइम्स की माने तो खाद्य और राशनिंग में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है, उसके बाद नम्बर आता है बिजली और शिक्षा लेकिन खनिज और सड़को पर अच्छा खासा काला धन कमाया जा सकता हैं। इकोनॉमिक टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में विस्तार से बताया है कि कैसे प्रभाव, लॉबिंग और डर दिखाकर नीलामी और टेंडरों में काला धन कमाया जा सकता है। ठीक वैसे ही जैसे नोएडा में बाजार की कीमतों से कहीं कम दामों पर ज़मीन मिल जाती है। सरकारी कीमत और बाजारु कीमत के बीच का काला-धन बंटना है सियासी नेताओं और उद्योगपतियों के बीच..। आजकल सस्ती कीमत पर ज़मीन मिलने के मामले मे कुछ शांति भूषण और प्रशांत भूषण की सुर्खियों में हैं। इस गोरखधंधे में जो पिसता है, वो है आम-आमदी। पहले एक किसान के रुप में जिसके खेती की ज़मीन सरकार ने औने-पौने दामों पर ख़रीद ली और वो सड़क पर आ गया। फिर सड़को के नाम पर नए-नए टेंडरों से घोटाले हुऐ और बिल्डिंग के मुखौटे के पीछे बिल्डरों और नेताओं ने पैसा कमाया। इसके बाद भी आम-आदमी भी पिस्ता है जो अपना पसीना बेचकर पैसा जोड़कर किसानों से सस्ती खरीदी ज़मीन को उंची कीमत देकर खरीदने पर मजबूर हैं। इकोनॉमिक टाइम्स के सर्वे में यूपीए सरकार की हालत भी पतली ही दिखाई देती है, जिसे 77 फीसदी लोग फिक्स या भ्रष्ट मानते हैं। लेकिन आज हालात को लोकपाल बिल बनाने वाली अन्ना की टीम की भी पतली है। यूपी और यूके के सिर भले ही भ्रष्टाचार का ताज़ है लेकिन इस ताज़ में तिनके हमने ही जोड़े हैं, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर..।

जिस ब्लाक में नौकरी वहीं कटेगी जिंदगी

देहरादून। प्राइमरी शिक्षकों की नई भर्ती में शिक्षक पात्रता परीक्षा के साथ ही सरकार ने ब्लाक काडर भी लागू कर दिया है। प्रस्ताव पर मंत्री की मंजूरी मिल चुकी है। अब शासनादेश जारी होना है। विधानसभा में दिए गए आश्वासन के मुताबिक शिक्षा विभाग मई-जून में टीईटी कराने की तैयारी में है। इसका नोटीफिकेशन जल्द जारी कर दिया जाएगा। प्राइमरी शिक्षकों की जुलाई तक नई नियुक्तियां शुरू हो जाएंगी। लेकिन ये नियुक्तियां अब ब्लाक काडर की कहलाएंगी। प्राइमरी के शिक्षक जिस ब्लाक में नियुक्त होंगे, पूरे सेवाकाल में उसी ब्लाक के अंतर्गत आने वाले प्राइमरी स्कूलों में उनकी तैनाती रहेगी। उसके बाहर सामान्य तबादले संभव नहीं होंगे। इस व्यवस्था को आरटीई की नियमावली में भी शामिल किया जा रहा है। निदेशालय की ओर से भेजे गए टीईटी के प्रस्ताव की मंजूरी के साथ ही शिक्षा मंत्री ने ब्लाक काडर के प्रस्ताव को भी स्वीकृति दे दी है। शिक्षा विभाग को इसका जीओ जारी करना है। शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह बिष्ट ने ब्लाक काडर की पुष्टि की है। उनका मानना है कि इस व्यवस्था से स्कूलों में शिक्षकों की मौजूदगी बनी रहेगी। महकमे पर तबादलों का दबाव कम होगा। नियुक्ति के वक्त ही शिक्षक को पता होगा कि उसे पूरी सेवा में कहां रहना है। सबसे ज्यादा लाभ विद्यार्थियों को होगा। अब स्कूलों में विलेज काडर अथवा ब्लाक काडर का कोई न कोई शिक्षक मौजूद रहेगा। स्कूलों में कभी भी ताले नहीं लटकेंगे। इस व्यवस्था से स्कूलों में शिक्षकों की मौजूदगी बनी रहेगी। महकमे पर तबादलों का दबाव कम होगा। नियुक्ति के वक्त ही शिक्षक को पता होगा कि उसे पूरी सेवा में कहां रहना है। सबसे ज्यादा लाभ विद्यार्थियों को होगा। स्कूलों में विलेज काडर अथवा ब्लाक काडर का कोई न कोई शिक्षक मौजूद रहेगा। स्कूलों में कभी ताले नहीं लटकेंगे। - गोविंद सिंह बिष्ट, शिक्षा मंत्री द ड शिक्षा मंत्री ने की टीईटी कराने की संस्तुति ड

परीक्षा प्रक्रिया ही निरस्त कर दी

राज्य अवर अधीनस्थ सेवा परीक्षा 2010 का विज्ञापन भी रद्द हरिद्वार। उत्तराखंड लोकसेवा आयोग की ओर से सम्मिलित राज्य अवर अधीनस्थ सेवा परीक्षा 2010 की पूरी प्रक्रिया निरस्त कर दी गई है। आयोग के सचिव कुंवर सिंह का कहना है कि सम्मिलित राज्य अवर अधीनस्थ सेवा परीक्षा 2010 का विज्ञापन 20 अप्रैल को निरस्त कर दिया गया। 22 अप्रैल को इसकी सूचना सार्वजनिक की गई। फार्म का मूल्य अभ्यर्थियों को लौटाए जाने के बारे में कोई निर्देश नहीं मिला है। उधर, आवेदन पत्र खरीदने वाले युवाओं का कहना है कि उनका पैसा हजम कर लिया गया है। आवेदन पत्र की बिक्री कर युवाओं की जेब से निकाला गया पैसा कौन लौटाएगा यह तय नहीं है। उत्तराखंड लोकसेवा आयोग की ओर से सम्मिलित राज्य अवर अधीनस्थ सेवा परीक्षा के लिए 29 मई 2010 को विज्ञापन निकाला गया था। आवेदन पत्रों की बिक्री प्रमुख डाकघरों से शुरू हुई थी लेकिन इसी बीच इन पदों को लोकसेवा आयोग की परिधि से बाहर करने की मांग को लेकर बवाल हो गया। कई स्थानों से मांग उठी कि परीक्षा के लिए राज्य का मूल निवासी होने की शर्त लागू की जाए। 10 दिन बाद सरकार ने आवेदन की बिक्री पर रोक लगा दी। इस बीच उत्तराखंड और दूसरे प्रदेशों के युवा आवेदन पत्र खरीद चुके थे। आयोग की ओर से सम्मिलित राज्य अवर अधीनस्थ सेवा परीक्षा 2010 का विज्ञापन 20 अप्रैल को निरस्त कर दिया गया है। 22 अप्रैल को इसकी सूचना सार्वजनिक की गई। फॉर्म का मूल्य अभ्यर्थियों को लौटाए जाने के बारे में निर्देश नहीं मिले हैं। - कुंवर सिंह, सचिव उत्तराखंड लोक सेवा आयोग

Saturday, April 23, 2011

जीएमवीएन में नियुक्तियां रद्द करने के फैसले पर लगी मुहर

नियुक्तियां रद्द होने के एक माह बाद भी जमे थे पदों पर शासन नहीं दे रहा था स्वीकृति देहरादून = गढ़वाल मंडल विकास निगम (जीएमवीएन) में सवालों के घेरे में आई नियुक्तियों के मामले में शासन ने फैसला सुना दिया है। प्रमुख सचिव पर्यटन राकेश शर्मा ने निदेशक मंडल की बैठक में नियुक्तियों को रद्द करने के बाबत लिए गए फैसले को तत्काल लागू करने के निर्देश प्रबंध निदेशक जीएमवीएन को दिए हैं। इस निर्णय के बाद कर्मचारियों व जीएमवीएन प्रबंधन के बीच बना गतिरोध खत्म हो गया है। जुलाई 2010 में तत्कालीन एमडी पुरुषोत्तम पुरी के कार्यकाल में जीएमवीएन में डीजीएम स्तर व क्षेत्रीय प्रबंधक के पदों पर नियुक्तियां की गई थीं। नियुक्तियां शुरू से ही सवालों के घेरे में थीं। निगम कर्मचारियों सहित विभिन्न संगठनों ने नियुक्तियों में धांधली होने का आरोप लगाते हुए इन्हें रद्द करने की मांग की थी। इस पर शासन ने मंडलायुक्त को नियुक्तियों में धांधली की जांच के आदेश दिए थे। जांच रिपोर्ट में नियुक्तियों में धांधली उजागर हुई थी।

आयु सीमा में शिथिलता को सीएम को भेजा पत्र

देहरादून: राज्य लोक सेवा आयोग की परिधि में आने वाली व राज्याधीन सेवाओं में उत्तराखंड के निवासियों को पांच वर्ष की शिथिलता की मांग को लेकर राज्य निर्माण आंदोलनकारी सम्मान परिषद के पूर्व अध्यक्ष रविंद्र जुगरान ने दोबारा मुख्यमंत्री को पत्र भेजा। जुगरान ने अन्य राज्यों का हवाला देते हुए शीघ्र मामले में कार्यवाही की मांग दोहराई। मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक को भेजे पत्र में जुगरान ने कहा कि छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश समेत तमाम राज्य इन सेवाओं में 40 वर्ष आयु को स्वीकारते हैं, जबकि राज्य में अभी भी 35 वर्ष आयु निर्धारित है। उन्होंने कहा कि राज्य गठन के दस वर्ष बीतने के बाद भी आयोग केवल तीन बार पीसीएस परीक्षा करा पाया। ऐसे में राज्य के निवासियों को ज्यादा मौके मुहैया कराने के लिए आयु में शिथिलता दी जानी चाहिए। बीते माह जारी पीसीएस पदों के लिए भी आयु सीमा 35 वर्ष रखी गई है। उन्होंने मांग की कि इस मामले में शीघ्र निर्णय लिया जाए, ताकि युवाओं को लाभ मिल सके। -

बीसी गब्बर सिंह मेला पर्यटन मेला घोषित

शहीद गब्बर सिंह का घर बनेगा राजकीय धरोहर संस्कृति विभाग करेगा शहीद के घर का संरक्षण शहीद के नाम पर होने वाले पर्यटन मेले के लिए निशंक ने पांच लाख रुपये देने का किया ऐलान चम्बा,: मुख्यमंत्री डा.रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि देवभूमि वीरों की भूमि है जिसमें समय-समय पर बीसी गब्बर सिंह जैसे कई योद्धाओं ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इस मौके पर उन्होंने बीसी गब्बर सिंह मेले को पर्यटन मेला घोषित कर प्रतिवर्ष इसके लिए पांच लाख रुपये देने की घोषणा की। डॉ. निशंक ने मेले के शुभारंभ से पूर्व वीर गब्बर सिंह के स्मारक पर पहुंचकर पुष्प चक्र अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। गुरुवार दोपहर एक बजे चम्बा पहुंचे मुख्यमंत्री ने मेले का शुभारंभ करते हुए कहा कि विक्टोरिया क्रास विजेता वीर गब्बर सिंह के पैतृक निवास को संस्कृति विभाग के माध्यम से संरक्षित कर उनके जीवनक्रम को पाठ्यक्रम में शामिल किया जायेगा ताकि नई पीढ़ी के लोग उनसे प्रेरणा ले सके। इस अवसर पर उन्होंने चम्बा में सैनिक विश्राम गृह खोलने की बात कही। उन्होंने शहीद के गांव मज्यूड़ को शीघ्र सड़क से जोड़ने का आश्र्वासन दिया। मुख्यमंत्री निशंक ने कहा कि उत्तराखंड को 2020 तक आदर्श राज्य के रूप में विकसित किया जायेगा। मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि वीर गब्बर सिंह के घर को संरक्षित किया जाएगा। यह कार्य संस्कृति विभाग को दिया गया है। चंबा सैनिक विश्राम गृह गब्बर सिंह के नाम से जाना जाएगा। उन्होंने शहीद के नाम से आयोजित मेले को प्रतिवर्ष पर्यटन मेले के रूप में मनाने के लिए पांच लाख रुपये की धनराशि देने के घोषणा की। इसके अलावा तीन सैनिक विधवाओं की पुत्रियों की शादी के लिए 25-25 हजार रुपये की धनराशि देने का ऐलान भी सीएम ने किया।

Friday, April 22, 2011

पद्मश्री प्रो. डीडी शर्मा को उत्तराखंड भाषा सम्मान

हल्द्वानी: प्रसिद्ध भाषाविद व पद्मश्री प्रो. डीडी शर्मा को उनके शोधपरक ग्रंथों के लिए एक और सम्मान से नवाजा गया है। उन्हें उत्तराखंड भाषा संस्थान की ओर से उत्तराखंड भाषा सम्मान प्रदान किया है। नवाबी रोड निवासी प्रो. डीडी शर्मा को यह सम्मान मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक द्वारा देहरादून में 16 अप्रैल को दिया गया है। प्रो. शर्मा के अब तक 56 अनुसंधान ग्रंथों, 200 से अधिक अनुसंधान पत्रों का प्रकाशन किया जा चुका है। उत्तराखंड पर ही उनके 28 ग्रंथ प्रकाशित हैं। इसमें 16 हिन्दी और 12 अंग्रेजी विषय पर हैं। उनके द्वारा प्रकाशित कल्चरल हिस्ट्री ऑफ उत्तराखंड एवं हिमालय के खश ग्रंथों की खूब चर्चा हो रही है। इससे पहले प्रो. शर्मा को राष्ट्रपति सम्मान, मिलेनियम सम्मान, वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा युगाब्द सम्मान, ज्ञान कल्याण दातव्य न्यास दिल्ली द्वारा सरस्वती सम्मान, साहित्य शिरोमणी सम्मान, भागीरथी सम्मान, केदार संस्कृति संस्थान का केदार गौरव सम्मान, कुमाऊं गौरव सम्मान समेत तमाम राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं। श्री शर्मा ने कहा कि यह पुरस्कार उनके अथक प्रयासों का ही फल है।

Saturday, April 16, 2011

History will be lost and Ssirane इतिहास में खो जाएंगे घोंटी और सिरांई

नई टिहरी - टिहरी बांध परियोजना में अनेक गांव जलमग्न हुए हैं, जो अपने विस्थापित इलाकों में उसी नाम से बसाये गए। विस्थापित होने वाले कस्बों में सिरांई और घोंटी ऐसे कस्बे रहे हैं जो कई पट्टियों के केन्द्र बिन्दु तो रहे हैं साथ ही यहां पर बड़ी जनसंख्या के भू-भाग के कभी व्यापारिक केन्द्र के रूप में भी जाने जाते थे। टिहरी बांध बनने के बाद न तो सिरांई आस पास के क्षेत्र में बसाया गया और न ही घोंटी।आने वाले समय में इन स्थानों का इतिहास से भी नाम मिट जाएगा। टिहरी बांध की झील बनने से पूर्व की बात करें तो टिहरी जिले के घोंटी और सिरांई नाम आते ही हर व्यक्ति के जेहन में यही दृश्य आता कि उक्त स्थान पर पहुंचने के बाद घोड़े-खच्चरों की ढूंढ शुरू हो जाती जो दर्जनों गांव के लिए हर रोज चलते। घनसाली के पास घोंटी एक ऐसा कस्बा था जिसमें करीबन चार दर्जन से अधिक दुकानें थी। इन दुकानों में वस्तुविनिमय भी होता था। लोग ग्रामीण क्षेत्रों से कृषि उपज यहां के दुकानदारों को बेचते और वहां से अपनी जरूरत का सामान ले जाते। यदि घोंटी की बात की जाए तो यह ढुंगमन्दार, धारमण्डल, कोटी फैगुल और पट्टी खास के करीबन एक लाख लोगों का व्यापारिक केन्द्र था। हर गांव से सुबह दर्जनों खच्चर और घोड़े यहां आते और शहरी क्षेत्रों से आने वाले लोगों का सामान के साथ साथ ग्रामीणों क्षेत्रों की रोजमर्रा की वस्तुएं गांव के लिए ले जाते। सैकड़ों लोगों का व्यवसाय घोड़े खच्चरों पर टिका था। टिहरी बांध में जलमग्न होने के बाद घोंटी अन्यत्र कहीं नहीं बस पाया। झील बन जाने से धारमण्डल और ढुंगमन्दार क्षेत्र के लोगों के लिए घोंटी से ऊपर डूब क्षेत्र से ऊपर कहीं भी आने के लिए कोई रास्ता ही नहीं है, जिससे नया घोंटी न तो कहीं बस पाया और न ही नये घोंटी के बसाये जाने का कोई शुलभ स्थान ही मिल पाया। रही सही कसर प्रस्तावित घोंटी पुल के निर्माण न होने से निकल गई। यह माना जा रहा था कि घोंटी और पिपोला के बीच पुल निर्माण होने से पुल के दोनों ओर घोंटी बाजार के रूप में एक कस्बा विकसित हो जाएगा, जो ढुंगमंदार व कोटी फैगुल के दर्जनों गांवों का व्यापारिक केन्द्र बन पाएगा। यही स्थिति सिरांई के साथ भी रही है, सिरांई कभी सारजूला, रैका पट्टी का मिलन केन्द्र रहा है। खासकर रैका के एक दर्जन से अधिक गांव के लिए यहीं से सामान के खच्चर लदते और इस पूरी पट्टी का यह मोटरहेड भी था। जहां पर लोग उतरते और आस-पास के अपने गांवों में सामान पहुंचाने के लिए घोड़े-खच्चरों की ढूंढ करते। ग्रामीण क्षेत्र से भी विभिन्न प्रकार कृषि उपजें सहित कई वस्तुओं का यहां पर विनिमय होता। नजदीक बसे टिहरी शहर से भी लोग ग्रामीण उपज को खरीदने को भी यहां आते। सिरांई कई गांवों का व्यापारिक केन्द्र था, जिसमें करीबन पांच दर्जन से अधिक दुकानें स्थापित थी। झील के बीच में आने के कारण सिरांई के डूब क्षेत्र से उपर बसने की कहीं गुजाइश ही नहीं बची। जिससे नया सिरांई आज तक स्थापित नहीं हो पाया है। यहां के व्यापारियों को पुनर्वासित स्थलों पर दुकानें देने की बात पुनर्वास विभाग ने की है लेकिन न तो सिरांई और न ही घोंटी नाम का कोई कस्बा बस पाया। इन कस्बों के स्थापित होने में भले ही सैकड़ों वर्ष लग गए हों लेकिन इतिहास के पन्नों मे अब कुछ वर्षों के बाद लोग इन कस्बों का नाम ही भूल जाएंगे। नहीं बस पाए इन नामों के कस्बे कभी ग्रामीण क्षेत्रों के बड़े व्यापारिक केंद्र थे ये कस्बे

Golden Forest, Government of the land now Significant case to the Supreme Court, High Court reversed the decision

गोल्डन फारेस्ट की भूमि अब सरकार की सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, पलटा हाईकोर्ट का निर्णय हजारों एकड़ बेशकीमती जमीन पर थी भ्रष्ट अफसरों व भू-माफिया की नजर राष्ट्रीय सहारा ने उठाया था जमीन खुर्द- बुर्द करने का मामला देहरादून - सुप्रीम कोर्ट ने गोल्डन फारेस्ट जमीन के मामले में राज्य सरकार को बड़ी राहत दी है। उच्चतम न्यायालय ने हाईकोर्ट द्वारा वर्ष 2005 में दिए गए एक फैसले को खारिज कर दिया है। इस फैसले में हाई कोर्ट ने बेशकीमती जमीन पर गोल्डन फारेस्ट, सवरेदय रिट्रीट व अन्य कंपनियों का मालिकाना हक दे दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस जमीन पर राज्य सरकार का हक करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से इस केस की पैरवी कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता रचना श्रीवास्तव ने इस फैसले की पुष्टि की है। टेलीफोन पर उन्होंने बताया कि इस फैसले से उत्तराखंड राज्य को बहुत फायदा होगा। इस फैसले से भू-माफिया व भ्रष्ट अफसरों को करारा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को उत्तराखंड सरकार बनाम गोल्डन फारेस्ट, सवरेदय रिट्रीट व अन्य कंपनियों के मामले में फैसला सुनाया गया। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी व अशोक गांगुली की बेंच ने इस फैसले में हाईकोर्ट द्वारा वर्ष 2005 में गोल्डन फारेस्ट और सवरेदय रिट्रीट के पक्ष में दिए गए फैसले को खारिज कर दिया है। केस की पैरवी कर रही अधिवक्ता रचना ने बताया कि पूरे मामले को मुख्य राजस्व आयुक्त को रिमांड कर दिया गया है, ताकि कई स्थानों की जमीन पर कब्जे लेने के लिए कार्रवाई की जा सके। इस फैसले से भू- माफिया की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। भू-माफिया ने शीशमबाड़ा स्थित इस बेशकीमती जमीन को खुर्द-बुर्द करने के लिए बड़े स्तर से प्रयास किए थे, लेकिन राष्ट्रीय सहारा ने समय रहते इस मामले का भांडा फोड़ दिया था। (शेष पेज 15) गोल्डन फारेस्ट.. भू-माफिया ने 2006 में तत्कालीन उपजिलाधिकारी राशिद अली से फर्जी तरीके से इस जमीन का परवाना जारी कराया था और एक बार फिर कोर्ट द्वारा फैसला सुरक्षित रखने के बाद भी कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से इसी फर्जी परवाने के आधार पर परवाना अमल दरामद करने का कुत्सित प्रयास किया था। खबर प्रकाशित होने के बाद इसी मकसद से वहां तैनात किए गए तहसीलदार व एसडीएम ने भी परवाना चढ़ाने में असमर्थता जताने से यह बेशकीमती जमीन भू- माफिया के हाथ में जाने से बच गयी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिसम्बर 2010 में ही फैसला सुरक्षित कर लिया था। सरकार बनाम सवरेदय रिट्रीट के बीच हाईकोर्ट में वाद संख्या 34/96-97 चला था। दिसम्बर 2005 में राज्य सरकार यह मुकदमा हार ग थी। इससे बाद राज्य सरकार ने 2006 में सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की। दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिए जाने के बाद भी इस जमीन का परवाने को चढ़ाने की कोशिश हुई। तत्कालीन एसडीएम विकासनगर झरना कमठान व तहसीलदार शालिनी नेगी हटा दिया गया था। रजिस्ट्रार कानूनगो द्वारा मामला सुप्रीम कोर्ट में होने के कारण परवाना चढ़ाने में असमर्थता जताने पर इन दोनों अधिकारियों ने भी हाथ खड़े कर दिए थे। जबकि इस मामले में डीजीसी ने कानूनी अड़चन न होने की बात कही थी।मामला खुलने के बाद सचिव राजस्व राकेश कुमार ने जिलाधिकारी से इस मामले की फाइल भी तलब की थी और जांच चल रही थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से राज्य सरकार को बहुत बड़ी राहत मिली है। देहरादून में ही सरकारी उपयोग के लिए जमीनों की बहुत अधिक आवश्यकता होने के कारण जिला प्रशासन सरकारी जमीनों का चिह्नीकरण कर रहा है।

Friday, April 8, 2011

शास्त्र की मर्यादाओं में ढलकर रस की वर्षा करते हैं लोकगीत

ग्ततुक नी लगा उदेख, घुनन मुनई नि टेक (सोरठ) ग्चम चमकि घाम डांड्यूं मा (मिश्र जोगकौंश) ग्सुरमा स्याली कलौ टीपि ल्यादी (मिश्र गारा) ग्दैणा हूयां खोली का गणेशा, दैणा हूयां पंचनाम द्यवतौं (दुर्गा) ग्कैला बाजी मुरूली हे बैणा..(धानी) ग्मेरी उनाल्या माणी लौ बिजी जादी (भैरवी) ग्ग्वीराल फूल फुलगिना, डांड्यूं बुरांश फुलगिना (पहाड़ी) लोकगायक स्व. मोहन उप्रेती का कालजयी गीत बेडू पाको बारामासा, नारैणा काफल पाको चैता मेरी छैला इसका प्रमाण है। राग दुर्गा में गाया गया यह गीत आज पूरी दुनिया में हृदयग्राही बन गया। रागों की उत्पत्ति लोक से मानी गई है, फिर भी लोक में स्वच्छंदता है। -लोकगीत कानों में उसी तरह रस घोलते हैं, जैसे होम्योपैथिक चिकित्सक द्वारा दी जाने वाली चीनी की बारीक गोलियां मुंह में मिठास। इन गोलियों में मदर टिंचर की चार बूंदें मिलते ही यह साधारण से असाधारण बन जाती हैं। ठीक इसी तरह लोकगीतों में भी राग-रागनियों का समावेश होने पर फिजा में सुरों की महताबी रोशनी-सी लहरा उठती है। लोकगीत तो पहाड़ी नदी की तरह हैं, जहां गए वहीं के रंग में ढल गए, लेकिन जब उन्हें शास्त्र की मर्यादाओं में ढाला गया तो रस की वर्षा करने लगे। लोकगायक स्व. मोहन उप्रेती का कालजयी गीत बेडू पाको बारामासा, नारैणा काफल पाको चैता मेरी छैला इसका प्रमाण है। राग दुर्गा में गाया गया यह गीत आज पूरी दुनिया में हृदयग्राही बन गया। रागों की उत्पत्ति लोक से मानी गई है, फिर भी लोक में स्वच्छंदता है। लोकगीत उस अल्हड़ नवयौवना की तरह हैं, जो अपने सौंदर्य के प्रति बेपरवाह है। वह कंदराओं में फ्यूंली की तरह महकते हैं, आंगन में गौरेया की तरह चहकते हैं, लेकिन मिट्टी से जुदा नहीं हो पाते। जब यही गीत षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत व निषाद सुरों में गूंजते हैं तो मिट्टी की महक पूरी दुनिया में फैल जाती है। देवभूमि में गाए जाने वाले थडि़या, चौंफला, बाजूबंद, झुमैला, झोड़ा, चांचरी, न्योली, बारामासा, चौमासा, छपेली, छोपती आदि लोकगीतों में मिश्र गारा, पहाड़ी, भीम पलासी, मदमाद सारंग, मिश्र मदमाद सारंग, मिश्र धानी, भैरवी, मिश्र मालकौंश, मिश्र जोग कौंश, मालगुंजी, भूपाली, सोरठ आदि रागों का प्रयोग बहुतायत में देखने को मिलता है। यही वजह है इनकी मधुर सुरलहरियां कानों में पड़ते ही हृदय के तार झंकृत होने लगते हैं। कुछ लोकगीत ऐसे भी हैं, जो विलंबित लय और द्रुत लय में अलग-अलग अनुभूति कराते हैं।

Wednesday, April 6, 2011

विकलांगों के लिए आरक्षित पदों पर होगी अब नियुक्ति

2130 पद आरक्षित हैं सरकारी सेवाओं में विकलांगों के लिए विभिन्न श्रेणियों के 913 पद ही भरे गए हैं कुल आरक्षित पदों में से बाकी 1217 हैं खाली विकलांगों के लिए आरक्षित पदों को खाली नहीं रख सकेंगे महकमे देनी ही होगी अब नियुक्ति देहरादून। कोई भी महकमा अब विकलांगों को आरक्षित तीन प्रतिशत पदों को खाली नहीं रख सकेगा। पदों का चिह्नांकन होने के बाद इन पदों पर विकलांग अभ्यर्थियों को नियुक्ति देनी ही होगी। अभी तक पात्र अभ्यर्थी न मिलने की बात कहकर विभाग इन्हें खाली छोड़ दिया करते थे। इससे बैकलाग काफी बढ़ गया है। सरकारी सेवाओं में विकलांगों के लिए विभिन्न श्रेणियों के 2130 पद आरक्षित हैं। इनमें से कुल 913 पद ही भरे गए हैं। बाकी 1217 खाली हैं। विभागों का तर्क है कि इन पदों के लिए पात्र अभ्यर्थी नहीं मिल सके। इन दिक्कतों को देखते हुए ही सरकार ने विकलांगों के लिए आरक्षित पदों का चिह्नांकन करवाया है। किस पद पर किस तरह के विकलांग अभ्यर्थी भर्ती किए जा सकते हैं, इसका कार्य पूरा कर लिया गया है। समाज कल्याण विभाग द्वारा सभी महकमों से विकलांगों के लिए आरक्षित तीन प्रतिशत पदों को भरने का अनुरोध किया गया है। प्रदेश में लोक सेवाओं में दृष्टिहीनता या कम दृष्टि, श्रवण ह्रास और चलन क्रिया संबंधी नि:शक्तता या प्रमस्तिष्कीय अंघात वाले व्यक्तियों के लिए क्रमश: एक-एक प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। सचिव एवं आयुक्त समाज कल्याण विभाग एमएच खान द्वारा जारी आदेश में सभी विभागों से विकलांगजनों के लिए आरक्षित पदों पर नियुक्ति सुनिश्चित करने को कहा गया है। ड् ड् आयोग की सेवाओं में विकलांगों को तीन प्रतिशत आरक्षण द्

विशिष्ट बीटीसी भर्ती विज्ञप्ति इसी महीने

शिक्षकों के 2200 पद विशिष्ट बीटीसी के लिए आरक्षित टीईटी के माध्यम से होगी भर्ती, मई में टीईटी की योजना सरकार से मिले आश्वासन पर काम शुरू देहरादून। बीएड-बीपीएड प्रशिक्षितों को सरकार से मिले आश्वासन पर काम शुरू हो गया है। विद्यालयी शिक्षा विभाग ने विशिष्ट बीटीसी भर्ती की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसी महीने भर्ती की विज्ञप्ति जारी हो जाएगी। टीईटी के माध्यम से ये भर्तियां होंगी। मई में टीईटी की योजना है। विशिष्ट बीटीसी भर्ती का यह अंतिम मौका होगा। केंद्र ने इस साल 31 दिसंबर तक ही विशिष्ट बीटीसी भर्ती की छूट दे रखी है। बीए-बीएस के साथ बीएड योग्यताधारियों के लिए मई में टीईटी का फैसला हुआ है। इसके बाद बीएड की वर्षवार मेरिट के आधार पर जुलाई तक नियुक्ति कर छह महीने की ट्रेनिंग पर भेज दिया जाएगा। शिक्षा विभाग ने विशिष्ट बीटीसी के लिए फिलवक्त 2200 पद आरक्षित कर रखे हैं। आगे से विशिष्ट बीटीसी खत्म हो जाएगी। शिक्षा का अधिकार कानून के तहत प्राइमरी शिक्षक की भर्ती में इंटरमीडिएट मुख्य शैक्षिक अर्हता होगी और शिक्षक भर्ती के लिए टीईटी पास करना अनिवार्य होगा। सचिव विद्यालयी शिक्षा, मनीषा पवार का कहना है कि टीईटी की प्रक्रिया के लिए सोमवार को मंजूरी दे दी गई है। अब टीईटी कराने वाली एजेंसी उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद को अपनी व्यवस्थाएं बनाकर तारीख की घोषणा करनी है। उन्होंने कहा कि टीईटी में एनसीटीई के निर्धारित मानकों को पूरा करने वाला कोई भी अभ्यर्थी शामिल हो सकता है।

Tuesday, April 5, 2011

..जहां छतरी में विदा होती है दुल्हन

युवाओं के पलायन व कहारों की कमी के कारण निकाला विकल्प चम्बा। गढ़वाल में परंपरागत रूप से जब दुल्हन की विदाई होती है तो उसे पालकी में बिठाकर विदा किया जाता है। पालकी को कहार उठाकर ले जाते हैं, लेकिन चंबा का एक गांव ऐसा है जहां दुल्हन को सजी-धजी छतरी के नीचे विदा होती है। धारकोट गांव में यह परंपरा सत्तर के दशक में शुरू हुई। इस परंपरा की शुरूआत के लिए भी पलायन को ही जिम्मेदार है। कारण, अब गांवों में डोली ले जाने वाले कहार मिलते ही नहीं हैं। विकासखंड चम्बा के धारकोट गांव कुछ ऐसी ही अलग पहचान के लिए जाना जाता है। यहां शादी में जब दूल्हा-दुल्हन अपने ससुराल जाते हैं तो वह डोली या पालकी में नहीं, बल्कि सजी-धजी छतरी में विदाई लेते हैं। ग्रामीणों के अनुसार सन 70 के दशक में जब यातायात की सुविधाएं नहीं होती थी और गांव से बारात मीलों पैदल चलकर दूसरे गांव जाती थी तो डोली उठाने वाले कहारों की संख्या कम थी और कहारों को डोली ले जाने के एवज में रुपया नहीं अनाज दिया जाता था। इस कारण अधिकतर लोगों ने इस काम को छोड़ दिया। कारण गांवों से युवाओं का पलायन होना भी है। इस समस्या से निजात पाने के लिए गांव के बुजुगरे ने इसका विकल्प छतरी को बनाया। इसमें न तो किसी कहार की आवश्यकता होती है और न ही किसी शारीरिक परिश्रम की। पहली बार महिलाओं व युवतियों ने इसका विरोध भी किया था, लेकिन फिर धीरे-धीरे समझने लगे और इस तरह की परम्परा कायम होने लगी। धारकोट गांव की कविता बताती है कि वह अपनी शादी में छतरी ओढ़कर आई थी। हालांकि उस समय उसे काफी बुरा लगा लेकिन अब यह परम्परा बन चुकी है। गांव के एसएस तोपवाल का कहना है कि उन्हें खुशी भी होती है कि इस तरह की परम्परा से गांव को एक अलग पहचान मिली है। गांव के लोगों का कहना है कि कई बार दूसरे गांववालों ने भी बिना डोली के बारात लाने पर लड़की को विदा करने से मना किया, लेकिन अब सभी इस परम्परा का निर्वहन करने लगे हैं। गांव की लड़कियां भी खुश है कि इस तरह की परम्परा केवल उनके गांव में ही है।

82 हजार युवाओं को मिल सकता है रोजगार

सरकार चाहे तो बेरोजगारों की हो सकती है बल्ले-बल्ले ताजा आंकड़ों में हुआ खुलासा, कई महकमों में रिक्त हैं 82 हजार पद कई विभागों में तो 50 प्रतिशत से भी अधिक पद हैं खाली प्रदेश में विभिन्न सरकारी महकमों में करीब 82,000 पद रिक्त चल रहे हैं। इनमें राजकीय व सहायतित विभागों सहित निगम भी शामिल हैं। सरकार चाहे तो इन पदों में भर्ती कर बेरोजगारों को रोजगार के अवसर मुहैया करा सकती है। इससे जहां कार्मिकों की कमी से जूझ रहे विभागों को राहत मिलेगी, वहीं विकास की गति को नया आयाम मिलेगा। वर्तमान में प्रदेश में लाखों की संख्या में युवा रोजगार की तलाश में घूम रहे हैं। इसके लिए वह प्रदेश से भी पलायन कर रहे हैं। कार्मिकों की कमी का बहाना बना कर विभाग विकास कायरे में लापरवाही बरत रहे हैं। आलम यह है कि कई विभागों में 50 प्रतिशत से भी अधिक पद रिक्त चल रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के 120 राजकीय विभागों में कुल 246299 पद स्वीकृत हैं। इनमें से 178268 पद पर कार्मिक हैं, जबकि 68031 पद रिक्त चल रहे हैं। इसी प्रकार करीब 30 ऐसी संस्थाएं व बोर्ड जो कि राज्य सरकार की सहायतित हैं, इनमें कुल 19,464 स्वीकृत पदों के सापेक्ष 13,425 पद ही भरे हैं, शेष 6039 पद रिक्त चल रहे हैं। प्रदेश के 24 निगमों में कुल 32,544 पद स्वीकृत हैं। इन निगमों में 25287 पद ही भरे हैं, शेष 7257 पद इनमें भी रिक्त चल रहे हैं। इस प्रकार प्रदेश में विभिन्न महकमों में कुल 81327 पद रिक्त हैं। इसके अतिरिक्त करीब 500 पद ऐसे हैं जो उत्तरप्रदेश के विकल्पधारियों से भरे हुए हैं। यदि इन सभी को वापस उत्तर प्रदेश भेज दिया जाए तो इन पदों पर भी प्रदेश के बेरोजगारों को भर्ती किया जा सकता है। विगत दिनों सरकार ने करीब 50 हजार सरकारी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की घोषणा की थी। बावजूद इसके इसमें अभी उसे सफलता हासिल नहीं हो सकी है। सरकार की मंशा यदि साफ रही तो ताजा आंकड़ों से उसके समक्ष और अतिरिक्त सरकारी रोजगार उपलब्ध कराने के अवसर उपलब्ध हो गए हैं। कई महकमें ऐसे हैं जहां कार्मिकों की भर्ती करना अतिआवश्यक है। शासन की बात करे, जहां से पूरे प्रदेश का संचालन होता है। वह भी कार्मिकों की कमी से जूझ रहा है। सचिवालय में कुल 1664 पद स्वीकृत हैं, जिसमें से 829 पद रिक्त चल रहे हैं। प्रदेश को राजस्व उपलब्ध कराने वाला वाणिज्य कर विभाग में कुल 1891 पदों के सापेक्ष 1090 पद रिक्त चल रहे हैं। कोषागार निदेशालय में कुल 49 पद स्वीकृत है जिसमें मात्र 15 पद भरे हैं। प्रदेश की योजना का जिम्मा जिस योजना विभाग के पास है उसमें 101 पद के सापेक्ष 80 पद रिक्त चल रहे हैं। पुलिस विभाग में 4054 पद रिक्त चल रहे हैं। कारगार में कुल 704 पदों के सापेक्ष 262 पद रिक्त चल रहे हैं। यही हाल विद्यालयी शिक्षा का है। इसमें कुल 86642 पदों के सापेक्ष 18,737 पद रिक्त चल रहे हैं। उच्च शिक्षा में 2585 पदों के सापेक्ष 1201 पद रिक्त हैं। स्वास्थ्य विभाग में 13870 पदों के सापेक्ष 4324 पद रिक्त हैं। होम्योपैथी विभाग में 417 पदों के सापेक्ष 187 पद रिक्त चल रहे हैं। चिकित्सा शिक्षा में 619 पद के सापेक्ष 422 पद रिक्त है।, आयुव्रेदिक एवं यूनानी सेवाओं में 3138 पदों के विपरीत 893 पद रिक्त हैं। यही हाल परिवार कल्याण का है, कुल 3777 पदों के सापेक्ष 1115 पद खाली हैं। महिला सशक्तिकरण में 34065 पद के सापेक्ष 14460 पद रिक्त हैं। यही हाल अन्य विभागों का भी है।

Sunday, April 3, 2011

ढोल के बोल में रमते हैं राम

ढोल बजता है तो पहाड़ में हर दिल धड़कता है, ढोल स्वागत करता है और विदाई भी, यह अगवानी है और नेतृत्वकारी भी। इसका संगीत मानव मन को तरंगित और देव आत्माओं को अह्लादित करता है। यानी ढोल का धर्म-अध्यात्म से गहन संबंध है। अनुष्ठान में इसकी भी उपस्थिति अनिवार्य है। पहाड़ के पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोल का निश्चित शास्त्रीय आधार है। ढोल सागर में इसकी तालों (वाद्य विधियां), उत्पत्ति और बनावट का वर्णन है। यूं तो इसकी कई तालें हैं, लेकिन लिपिबद्धता के अभाव में अब करीब तीन दर्जन ही अस्तित्व में हैं। ढोल सागर के विखरे अंशों को सर्वप्रथम 1926 में भवानी दत्त पर्वतीय ने ढोल सागर के नाम से प्रकाशित किया था। 1932 में ब्रह्मानंद थपलियाल और पचास के दशक में मोहन लाल बाबुलकर ने लोगों को ढोल सागर से परिचित कराने में अहम भूमिका निभाई। सत्तर के दशक में केशव अनुरागी ने इस क्षेत्र में अहम कार्य किया, जबकि 1983 में शिवानंद नौटियाल ने गढ़वाल के लोक नृत्य गीत में लोगों को इससे रूबरू कराया। उत्तराखंड में शादी-समारोहों के अलावा अनुष्ठानों में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। अनेक अनुष्ठानों में ढोल के संगीत पर ही देवता अवतरण होता है। हर देवी-देवता के अवतरण की निश्चित वाद्य शैली है। यह इसके संगीत का जादू ही है कि दूर गांव में बजते ढोल की धुन सुनकर लोग अनुमान लगा लेते हैं कि वहां क्या अनुष्ठान हो रहा है। कई बार मनौती पूरी होने पर संबंधित आराध्य को ढोल भेंट चढ़ाया जाता है। ढोल का रोचक इतिहास है। प्राथमिक अवस्था में यह लकड़ी का, इसके बाद लोहे का बना। फिर चांदी का और अब तांबे व पीतल का होता है। कुमाऊं में अधिकांशत: लकड़ी का ही ढोल होता है। इसका सहायक यंत्र दमाऊं इससे छोटे आकार का होता है। दोनों की संगत और बोल बड़े और छोटे तबले की जैसे होते हैं। ढोल सागर में ढोल की दायीं पूड़ को सूर्य और बायीं को चंद्रमा का स्वरूप माना है। कंधे में डाले जाने वाले कपड़े को नाग का स्वरूप बताया गया है।

छोटे सुर की लंबी तान

श्रीनगर - इन दिनों सोहन लाल अमेरिका जाने की तैयारी में व्यस्त हैं। अपने बड़े भाई सुकारु के साथ वे सात समंदर पार के लिए यात्रा की औपचारिकताएं पूरी करने में जुटे हैं। उत्साह से लबरेज सोहन में थोड़ा सा संकोच है और मन में कुछ सवाल। न अपनी भाषा और न अपना देश यानि परदेश। फिर भी एक तार उनके दिल में झंकृत है। संगीत का तार। संगीत की भाषा तो दूसरी नहीं है। सुर दिल से निकलते हैं और दिल की जुबां दुनिया खूब समझती है। ये सोहन लाल हैं कौन? चलिए पहले परिचय हो जाए। टिहरी जिले के पुजार गांव के सोहन विवाह समारोह में ढोल बजाते हैं। अब अमेरिका की सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी ने दोनों भाइयों को विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में आमंत्रित किया है। इस दौरान वे करीब तीन माह तक वहां रहेंगे। यानि छोटे सुर की लंबी तान। बेशक पूरब में पश्चिमी हवाओं का असर है, लेकिन पश्चिम को हमेशा ही पूरब की लाली भाती है। सोहन लाल और सुकारु दास पूरब की इसी लाली के प्रतीक हैं। सालों से बारातों में ढोल बजा रहे दोनों भाइयों के हुनर के कद्रदान इलाके में बहुत हैं, लेकिन उन्हें वह पहचान नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे। गढ़वाल के प्रसिद्ध ग्रंथ ढोल सागर के ज्ञाता दोनों भाइयों को थोड़ी पहचान मिली वर्ष 2002 में। जब उन्होंने दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में अपने हुनर का प्रदर्शन किया। सोहन और सुकारू के लिए साल 2009 टर्निग प्वाइंट साबित हुआ। इस वर्ष सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्टीफान सिओल ढोल सागर पर शोध करने सोहनलाल के घर पहंुचे। जागर और ताल के संग्रह ढोलसागर 1932 में पौड़ी के ब्रह्मानंद थपलियाल ने तैयार किया था। स्टीफान ढोलसागर के विद्वान सोहनलाल के शिष्य बने। तीन माह इनके साथ बिताने के बाद वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना नाम बदलकर फ्योंलीदास रख लिया। अमेरिका लौटने के बाद उन्होंने विश्वविद्यालय में ढोल को पाठ्यक्रम में शामिल करने की पैरवी की। अंतत: उनका प्रयास रंग लाया और सूत्रधार बनाया सोहन और सुकारु को। छठवीं कक्षा तक पढ़े सोहन अपनी सफलता पर बिना इठलाए बस भगवान को धन्यवाद देते हैं। वह बताते हैं कि उनके लिए वीजा का प्रबंध गढ़वाल विवि कर रहा है। इस दौरान वे अमेरिका के विभिन्न शहरों में अपने हुनर का प्रदर्शन भी करेंगे। गढ़वाल विश्वविद्यालय में लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र के प्रो. दाताराम पुरोहित के अनुसार