Thursday, March 18, 2010

'छोटी चूक का झटका 'बड़ा

उत्तराखंड को अब तक लग चुका है अरबों रुपये का चूना नहीं मिल रहा 'विशेष श्रेणी दर्जे का पूरा लाभ नौ सालों तक किसी अफसर का नहीं गया खामी पर ध्यान Pahar1- अब इसे केंद्र सरकार की मनमानी कहें या फिर सूबे के अफसरों की लापरवाही। वजह चाहें जो भी हो पर उत्तराखंड को विशेष श्रेणी का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। नतीजा इस नए राज्य को इससे अरबों की चपत के रूप में सामने आ रहा है। अब चेते सूबे के नियोजन विभाग ने यह मामला केंद्रीय योजना आयोग के समक्ष उठाया है। नौ नवंबर-2000 को जन्मे इस राज्य को एक सितंबर, 2001 में विशेष राज्य का दर्जा मिल दिया गया। केंद्र सरकार की व्यवस्था के तहत इस स्टेटस वाले राज्यों को केंद्र पोषित योजनाओं में केंद्रीय सहायता 90:10 के अनुपात में मिलती है। यानि कुल मिलने वाली राशि में से 90 प्रतिशत केंद्रीय अनुदान और 10 प्रतिशत ऋण के रूप में होता है। इस राज्य की वास्तविकता इसके एकदम उलट है। राज्य के करीब एक दर्जन से अधिक विभागों की विभिन्न योजनाओं में 50:50 या फिर 75:25 के अनुपात में केंद्रीय सहायता और ऋण मिल रहा है। इस वजह से चालू वित्तीय वर्ष में राज्य को 120 करोड़ का चूना लग चुका है। वित्तीय वर्ष 10-11 में उत्तराखंड को केंद्रांश में 307 करोड़ का नुकसान होने जा रहा है। अब सालों बाद यह मामला प्रमुख सचिव (नियोजन) विजेंद्र पाल ने पकड़ा है। उन्होंने वित्त विभाग के प्रमुख सचिव को एक पत्र भेजा है। इसमें कहा गया है किकेंद्र पोषित योजनाओं में राज्य को 50:50, 75:25 और 80:20 के अनुपात में केंद्रीय सहायता मिल रही है। उत्तराखंड को एक सितंबर 2001 से विशेष श्रेणी दर्जा हासिल है। योजना आयोग के वरिष्ठ सलाहकार श्री कल्ला को इस संबंध में सूचित किया जा चुका है। प्रमुख सचिव (वित्त) ने सभी प्रमुख सचिवों तथा सचिवों को अपने विभाग की केंद्र पोषित परियोजनाओं को 90:10 के अनुपात में स्वीकृत कराने के लिए केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों से संपर्क करने को कहा है। गौरतलब है कि केंद्र पोषित परियोजनाओं में विभागों की विभिन्न योजनाओं में कास्ट शेयरिंग पैटर्न भी अलग-अलग है। कोल्ड वाटर फिशरीज में केंद्रीय अनुदान और ऋण का अनुपात 75:25 के अनुपात में है। जबकि नेशनल फिशरमैन वेलफेयर में केंद्रीय सहायता और ऋण 50:50 है। यही हालत दूसरे विभागों में भी है। मौजूदा स्थिति विभाग कास्ट शेयरिंग कृषि 50:50 एनिमल हस्बेंड्री 50:50 फिसरीज 75:25 फारेस्ट वेल्फियर 80:20 रूरल डेवलपमेंट 75:25 रोड एंड ब्रिज 50:50 आईटी 60:40 शिक्षा 55:45 हेल्थ 75:25 (केंद्रीय मानकों के तहत यह अनुपात 90:10 का होना चाहिए)

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