Thursday, March 18, 2010

कोई लौटा दे वो बीते हुए दिन...

-देश-विदेश में तूती थी लैंसडौन वनप्रभाग के 'खैरÓ से बने कत्था -आज प्रभाग में गिनती के ही रह गए हैं 'खैरÓ के पेड़ लैंसडौन pahar1- एक समय था जब लैंसडौन वन प्रभाग के जंगल 'बांसÓ व 'खैरÓ से अटे पड़े थे। प्रभाग में होने वाले 'खैरÓ से बने कत्था की देश ही नहीं, विदेशों में भी तूती थी, लेकिन, आज स्थितियां पूरी तरह जुदा हैं। हालात यह है कि आज लैंसडौन वन प्रभाग में 'खैरÓ सिर्फ नाम के लिए रह गया है, उस पर भी तस्करों की नजरें लगी हुई हैं। लैंसडौन वनप्रभाग का 'बांसÓ जहां देश-विदेश में ख्याति प्राप्त था, वहीं प्रभाग के जंगलों में होने वाले 'खैरÓ की भी खास पहचान थी। दरअसल, प्रभाग के जंगलों में होने वाले 'खैरÓ से बने 'कत्थाÓ की हिंदुस्तान ही नहीं, तमाम मुस्लिम देशों में भारी मांग थी। स्थिति यह थी के 'खैरÓ के पेड़ों की बोली लगती थी व ठेकेदार पेड़ों को काटकर जंगलों में ही कत्था बनाने के लिए बड़ी-बड़ी भट्ठियां लगा देते थे, जहां मजदूर पेड़ों का चिरान कर उससे कत्था निकालते थे। चालीस के दशक के बाद लैंसडौन वन प्रभाग के 'खैरÓ पर तस्करों की नजर लग गई। दरअसल, इस दौरान नजीबाबाद व आसपास के क्षेत्रों में कत्था फैक्ट्रियां लगनी शुरू हुई व कुछ ही समय में दर्जनों कत्था फैक्ट्रियां वजूद में आ गईं। बड़ी संख्या में फैक्ट्रियां लगने से कत्थे की मांग बढ़ी, तो 'खैरÓ की तस्करी होने लगी। वर्ष 1976 में वन विकास निगम का गठन होते ही 'खैरÓ के कटान व विपणन की जिम्मेदारी निगम पर आ गई। इसके बाद इसकी कीमतें आसमान छूने लगी। इसके साथ ही 'खैरÓ का अवैध पातन भी यकायक बढ़ गया। उस दौर में 'कत्था सरदारÓ के नाम से क्षेत्र में सक्रिय रहा 'खैरÓ तस्कर आज भी कोटद्वार व आसपास के क्षेत्र में लोगों के जुबां पर बसा है। हालांकि, 'खैरÓ की बढ़ती तस्करी को देखते हुए शासन ने कड़े नियम बनाए, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी और अधिकांश जंगल खैरविहीन होते चले गए। आज स्थिति यह है कि लैंसडौन वन प्रभाग के जो जंगल 'खैरÓ से भरे पड़े थे, आज वहां गिनती के पेड़ रह गए हैं व उन पर भी वन तस्करों की निगाहें लगी हुई हैं। पूर्व वनाधिकारी बीबीएस रावत भी मानते हैं कि प्रभाग में 'खैरÓ कम होने की मुख्य वजह अवैध पातन रही। उन्होंने बताया कि इस अवैध पातन में कहीं न कहीं विभागीय कर्मचारियों की कथित मिलीभगत भी होती थी। श्री रावत की मानें, तो अब खैर के दाम अधिक होने के कारण कत्था फैक्ट्री स्वामी अब कत्था बनाने के लिए 'गैविनÓ नामक कैमिकल का प्रयोग करने लगे है, जिससे खैर की तस्करी कम हो गई है। लैंसडौन वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी नरेंद्र सिंह चौधरी ने भी स्वीकारा कि पूर्व में लैंसडौन वन प्रभाग में 'खैरÓ के जंगलों में भारी अवैध पातन हुआ। नतीजतन, आज 'खैरÓ सीमित क्षेत्र में सिमट कर रह गया है। उन्होंने बताया कि प्रभाग में प्राथमिकता के आधार पर बंजर भूमि में खैर का रोपण किया जा रहा है, ताकि खैर के जंगल वापस लौट सकें।

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