Friday, March 26, 2010

उत्तराखंड समाज प्रताप नगर जयपुर द्वारा प्रथम युवक युवति परिचय सम्मेलन

पूरी जानकारी के लिए आगे देखे..... उत्तराखंड समाज प्रताप नगर जयपुर द्वारा प्रथम युवक युवति परिचय सम्मेलन का जयपुर के प्रताप नगर में 25 अप्रैल को आयोजन किया जा रहा है. रमेश चन्द्र शर्मा (भट्ट)

Wednesday, March 24, 2010

अमीरात (यूएई) मां भी उत्तरान्चली भै बन्दो दगडी अपणुपन कु अह्सास:-

उत्तरान्चली एशोसियेसन आफ़ ईमिरात परिवार क सभी सदस्यो कु अपणि संस्क्रति कु प्रति प्रेम/अपणि बोली-भाषा सी लबाव/अपणा उत्तरान्चली भै बन्दो दगडी अपणुपन कु अह्सास:- . उत्तरान्चली एशोसियेसन आफ़ ईमिरात परिवार क सभी सदस्यो कु अपणि संस्क्रति कु प्रति प्रेम/अपणि बोली-भाषा सी लबाव/अपणा उत्तरान्चली भै बन्दो दगडी अपणुपन कु अह्सास:- ये परिवार कु सदा प्रयास रायी कि कै प्रकार सि हम अपणु संस्क्रति तै रास्ट्रिय और अन्तरास्ट्रिय स्तर पर विकसित करा...हमारु खाणू (पकवानॊ) कि, हमारु पहनाओ कि, हमारु स्वर्ग समान उत्तरान्चल मा प्रयटन कु, हमारि बोली भाषा कि रास्ट्रिय और अन्तरास्ट्रिय स्तर पर पहचान होऊ....पर सबसी पहली अपणो बटी शुरुवात करण होलि...येही प्रयास क दगडी अपण तौहारों तै अपणु तरिका सि मानाण कि पुरी कोशिस रैन्दी....दिपावली तै "बग्वाल" क रुप मा, नयु ईयर तै "कौथिक" जै मा कि प्रितम भरतवाण जी, मीना राणा जी, सन्गीता ढौन्डीयाल जी व शिव दत्त पन्त जी न अपणि मधुर स्वरो सि दुबई मा रौनक बिखेरि दे छ फिर होली तै "छरोली" और फिर होलि मिलन "छरोली टोली" दुबई बटी अबु धाबी.....छरोली टोली कि बिशेष मकसद व आक्रषण छ उत्तरान्चली पहनाव.......! १९ मार्च २०१० होली/सांस्क्रतिक मिलन (छरोली टोली) कु प्रोग्राम बहुत हि सुन्दर सफ़ल व सुखद रायी... सुबेर बस अजमान बटी निकली और शारजहां, दुबई होईखन अबु धाबी कि तरफ़ चली.. बस मा ढोल-दमो कि दगडी गढवाली/कुमावनी गानो कि धुन पर ज्वान-जमान, दाना-सयाण सभी लोगो न खुब आन्नद लिनी...अबु धाबी पहुंची खन बडु हि सुन्दर प्यारु तरिका सि पठाई जुन्दाल लगै कि अबू धाबी मा बस्या उत्तरान्चली भै-बन्दॊ/दिदी-भुलीयो न मिलीखन स्वागत सतकार करि..वाकु बाद उडद कि दाल कि बलुणि वाह क्या बुन तब और दिन कु खाणू आलु गोभी कि भुजी राजमा कि दाल सभी लोग अन्गुली चटदी रै गेन.. बहुत बहुत धन्यबाद अबु धाबी परिवार कु जुन ईतका सुन्दर तरिका सि स्वागत सतकार क दगडी स्वादिस्ट खाणु और अच्छी ब्यवस्था करि.....! ग्रुप कु मकसद उत्तरान्चली सन्सक्रति कु विकास क साथ-साथ अपणी उत्तराखन्डी भै-बन्दॊ कि कै भि प्रकार सि सहायता करण भी छ - मदद बहुत सि प्रकार सि हवे सकदिन जन कि कैतै नौकरी लगाण मा, कैतै बिजनीस बढाण मा, कैतै शादी समबन्धीत ता कैतै कै प्रकार सी अभी कुछ महिना पहली श्री जसपाल राणा कि आकसमिक मिर्त्यू हवे गे छ ता ग्रुप क सभी सदस्यो न थोडा-थोडा पैसा जमा करि तै उन्कु परिवार तै आर्थिक सहायता क रुप मा देढ लाख (१५००००/-) रुपये भेजी छ.. "एकता मा बहुत बडी ताकत होन्दी यदी यी ताकत कु प्रयोग हम अच्छा कामॊ मा करा ता हमारी कामयाबी आसमान कि बुलन्दिया छ्वी सकदी"....हमार दगड मा बहुत सि उत्तराखन्डी बिजनिसमैन भी छन जुकी उपकरण व सेवा तै हम प्रयोग करि सकदिन और वाकु बदलू हम तै छुट मिललू ये मा दवीयो तै लाभ होलू उ तै उन्कु बिजने़स बढाण मा और हम तै सस्ती किमतो पर सामान लेण मा....! हम सभी लोग यख बिदेश अया छन ता अपणु परिवार कु भरण पोषण ठिक प्रकार सि करि ही सकदिन....हमारु उत्तराखन्ड मा बहुत सि परिवार ईन छ्न जुन्कू चुल पर ब्याखुन्दी दां आग नी जगदी किलै कि उन्कु घर मा कुछ नी छ पकाणु तै... बहुत सि बच्चा (नौन बाल) ईन छ्न कि जुन स्कुल कु मुक नी देखि किलै कि स्कुल मा फिस देण कु पैसा नी छ और कै भी प्रकार सि अगर ८-१० पास हवे गेन ता वासी अगने पढी नी सकदन किलै कि परिवार कि जिमेदारि ये जान्दी...बुढी-बुढ्या (बोडा-बोडी/दादा-दादी) तै बाझा कुडा जेल लगणू छ किलै कि कैक दगडी बचेण...लडीक ब्वारियों कि आण कि आ़स मा आंखो कु पाणि सुखी गे...यु.ए.ई ग्रुप फ़ाउन्डेसन शुरुवात ग्रुप क दगडि मिलि तै काम करलु और एक छोटू सि कोसिस व शुरुवात का रुप मा हमन फ़ाउन्डॆशन शुरुवात कु माध्यम सि उ बच्चो तै १ लाख रुपये (१०००००/-) भेजी.....और अगने भि कोशिश राली उ रैबासियों खातिर कुछ करण कि जुन अपणि सन्स्क्रति कि बुझदी दयो (दिया) तै हाथो न ढकी कि जगै कि रखियु छ......! जै कुल देवता नागराजा-जय देवभुमी उत्तराखन्ड... धन्यबाद व सुभकामनायें...! विनोद सिंह जेठुडी टीम यु.ए.ई ग्रुप

Tuesday, March 23, 2010

अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार की फोटो हमारे पहाड़ की

यह फोटो नगाधिराज हिमालय की पंचाचूली चोटी की है, जो इस पर सुबह के समय सूर्य की पहली किरनें पड़ने के दौरान ली गयी है, इस कारण इस फोटो मैं हिमालय सोने की तरह दमकता नजर आ रहा है. यह पुरस्कार मुझे पेनोरोमियो वेबसाइट की और से जनवरी २०१० की ''जियोटैग्ड फोटो कांटेस्ट" में दिया है. यह वेबसाइट गूगल अर्थ पर दुनियां के विभिन्न स्थानों की फोटो उपलब्ध कराती है. इस वेबसाइट पर मेरी २०० से अधिक फोटो बीते एक वर्ष से हैं. यह वेबसाइट दुनियां भर के अपने लाखों फोटोग्राफरों से हर माह प्रतियोगिता के लिए अपनी अधिकतम ५ फोटो नोमिनेट करने को कहती है. फिर पूरे माह इन फोटो पर दुनियां से वोटिंग होती है. कोई भी वेबसाइट पर लोग-इन कर वोटिंग कर सकता है. इस वेबसाइट पर चूँकि भारत के कम ही लोग जुड़े हैं, इसलिए किसी भारतीय का पुरस्कार जीतना काफी कठिन होता है. मेरी जानकारी में मुझसे पूर्व केवल उन्नीपिल्लई नाम के एक फोटोग्राफर के रूस में खींचे गए चित्र को यह पुरस्कार मिला था. मैं नैनीताल में मार्च २००८ से ब्यूरो प्रभारी के रूप में कार्यरत हूँ. इससे पूर्व दैनिक जागरण, उत्तर उजाला व बद्री विशाल आदि समाचार पत्रों से बीते एक दशक से पत्रकारिता से जुड़ा हूँ. पत्रकारिता के साथ फोटोग्राफी मेरा शौक है. नैनीताल और कुमाऊँ व उत्तराखंड की खूबसूरती इस कार्य में स्वयं मेरी मदद करती है. कुमाउनी लोक भाषा में काफी कुछ भी लिखता रहता हूँ. इस फोटो को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिला है Navin Joshi Reporter : Rashtriya Sahara, Nainital. Mobile-9412037779

पहाड़ों ने ही मुझे पहाड़ पर चढ़ा दिया: लव

-लव और रीना से गौरवान्वित है उत्तराखंड -दुनिया ने दिया सम्मान पर उत्तराखंड से बधाई न मिलने की टीस भी झलकी -तीन बार एवरेस्ट विजेता लवराज धर्मसत्तू ने बताया कि कैसे पैदा हुआ साहस -एवरेस्ट विजेता लव धर्मसत्तू और दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला उनकी पत्नी रीना कौशल धर्मसत्तू के साक्षात्कार -पर्वतारोहण में प्रतिभा विकास के लिए इंस्टीट्यूट खोलने की बताई जरूरत हल्द्वानी: दृढ़ इच्छा शक्ति और जुनून किसी भी व्यक्ति की मंजिल आसान कर देता है। इसका जीता-जागता उदाहरण है पिथौरागढ़ में जन्में लवराज सिंह धर्मसत्तू, जिन्हें आज देश-प्रदेश नहीं बल्कि दुनिया इतिहास रचयिता के रूप में पढ़ती है। रविवार को एक समारोह में यहां आए श्री धर्मसत्तू से रूबरू होने का मौका मिला। बातचीत में उन्होंने कहा कि पहाड़ों ने ही पहाड़ पर चढ़ा दिया। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर एक-दो बार नहीं बल्कि तीन बार चढऩे का इतिहास रचने वाले लव ने कहा कि पिथौरागढ़ जिले के तहसील मुनस्यारी क्षेत्र के गांव बोना में उनका जन्म हुआ। पहाड़ के दुर्गम क्षेत्र में बचपन बीता, कुछ समझ आई तो सोचने लगा कि उतार-चढ़ाव में जिंदगी कट जाएगी। क्यों न कुछ खास किया जाएगा। बस में मन में यही ठान लिया कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ुंगा। उसी संकल्प ने एवरेस्ट को फतह करा दिया। 19 मई 1998, 20 मई 2006 और 21 मई 2009 तिथियों को तीन बार एवरेस्ट पर चढऩे वाले लव ने बताया कि दो बार नेपाल से और एक बार चीन से उन्होंने चढ़ाई की। दोनों ओर से चढऩे पर डेढ़ महीना लगा। हालांकि लव बार्डर सिक्योरिटी फोर्स दिल्ली में इंस्पेक्टर हैैं, लेकिन प्रतिभाओं को उचित प्रोत्साहन की व्यवस्था न होने से व्यथित दिखे। कहने लगे कि प्रतिभा का विकास किया जाता है। अगर पर्वतारोहण के लिए जगह-जगह इंस्टीट्यूट खुल जाएं तो इससे सरकार को भी बड़ा राजस्व प्राप्त होगा और इस क्षेत्र में प्रतिभाएं भी विकसित होंगी। बोले-मनाली और उत्तरकाशी में उच्च स्तर इंस्टीट्यूट हैैं, मनाली के इंस्टीट्यूट से सरकार को प्रतिवर्ष छह करोड़ रुपये मिलते हैैं मगर वहां इसका बहुत अच्छा क्रेज है। बातचीत में भले ही उनकी जुवां पर बात नहीं आई लेकिन चेहरे के भाव ने साफ एहसास करा दिया कि दिल्ली सरकार ने तो उनको सम्मानित किया मगर उत्तराखंड के निवासी इस सपूत को यहीं की सरकार ने आज तक बधाई भी नहीं दी है।-- हर महिला पहुंच सकती है दक्षिणी ध्रुव पर: रीना हल्द्वानी: दुनिया जहां लवराज धर्मसत्तू को पलकों पर रखती है, तो उनकी पत्नी रीना कौशल धर्मसत्तू के साहस को भी इतिहास का सलाम है। यहां सम्मान समारोह में भाग लेने आईं रीना ने यात्रा के अनुभव बांटे। बोलीं- कॉमनवेल्थ की साठवीं सालगिरह पर आयोजित महिला स्कीइंग अभियान में सात देशों के प्रतिभागियों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। शून्य से नीचे तापमान और बर्फीले तूफानों में आठ से नौ घंटे प्रतिदिन स्कीइंग करके 40 दिन में 29 दिसंबर 2009 को छह अन्य प्रतिभागियों के साथ दक्षिणी ध्रुव पहुंचने की उपलब्धि हासिल करके प्रथम भारतीय महिला होने का गौरव प्राप्त किया। एक सवाल के जबाव में उनका यही कहना था कि अन्य खेल और कार्यक्रमों का प्रचार होता है उनको सुलभ कराया जाता है। इसलिए युवा वर्ग का रुझान भी उसी ओर बढ़ रहा है। ऐसे में स्कीइंग के क्षेत्र में भी प्रतिभा तरासने का काम करना होगा। महिला होने के बावजूद इतना बड़ा साहस जुटाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि कौन सा काम ऐसा है कि जो महिला नहीं कर सकती। आत्मविश्वास से लबरेज रीना कहती हैैं कि जब मैैं दक्षिणी ध्रुव पर पहुंच सकती हूं। तो हर महिला पहुंच सकती है। बस, इच्छाशक्ति जगाने की जरूरत है। साहस तो खुद व खुद आ जाता है। ---

परम्पराएं तोड़ शवयात्रा में शामिल हुई तीन महिलायें

जिले में पहला मामला , पिथौरागढ़: पर्वतीय क्षेत्र की महिलायें भी अब परम्पराएं तोडऩे के लिए आगे आ रही हैं। मैदानी क्षेत्रों में परिवार के मुखिया को मुखाग्नि देने महिलायें आगे आ चुकी हैं अब उत्तराखण्ड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ में पहली बार शव यात्रा में शामिल होकर महिलाओं के शव यात्रा में शामिल न होने की परम्परा को तोड़ डाला है। सामाजिक कार्यकत्री रीता गहतोड़ी के चचेरे भाई का बीसी गहतोड़ी निवासी वड्डा का दो रोज पूर्व आकस्मिक निधन हो गया था। अपने भाई से गहरा लगाव रखने वाली रीता उनकी बहन करुणा और मां हरिप्रिया इस घटना से खासी आहत हुई। भाई की शव यात्रा शुरु हुई तो बहनें भी अपने आप को रोक नहीं पायी और शव यात्रा में शामिल हो गयी। बेटियों को परम्परा तोड़ती देख मां को भी साहस आया और वह भी शवयात्रा में शामिल हो गयी। मां और दोनों बेटियां शव यात्रा में रामेश्वर घाट तक पहुंची और शवदाह की प्रक्रिया में शामिल हुई। महिलाओं के पहली बार शवयात्रा में शामिल होने का कई महिला संगठनों ने स्वागत किया है। ऑल इण्डिया प्रोग्रेसिव महिला एक्टेविस्ट की महिला नेत्री पुष्पा मर्तोलिया महिलाओं के इस कदम की सराहना करते हुए बताया कि रुढ़ परम्परायें टूटनी चाहिए। उन्होंने कहा इससे अन्य महिलाओं को भी बल मिलेगा। शव यात्रा में शामिल हुयी रीता का कहना है कि उन्हें अपने इस कदम से आत्मिक शांति मिली है।

पिछड़े गांव की भावना बनी टेलीविजन सेलीब्रिटी

- जमुनिया में मुख्य भूमिका निभा रही भावना खत्री है पिथौरागढ़ की बेटी - बचपन से अभिनय की दुनिया में नाम कमाना चाहती थी PAHAR1-: उत्तराखंड के सीमान्त जिले पिथौरागढ़ के सुदूरवर्ती अस्कोट से तीन किमी की पैदल दूरी पर स्थित दयाकोट नाम का छोटा सा गांव। गांव के दक्षिणी छोर पर अलग-थलग पुराना सा एक पहाड़ी मकान, जिसे देखकर कोई नहीं कह सकता कि यहां पर बेहद गरीब परिवार में जन्मा एक व्यक्ति भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर आसीन होगा। और अब उसकी बेटी टेलीविजन जगत की मशहूर सेलिब्रिटी बन गई है। आजकल इमेजिन चैनल पर प्रसारित हो रहे 'जमुनियाÓ धारावाहिक में जमुनिया की मुख्य भूमिका निभा रही भावना खत्री इसी गांव और इसी मकान की वंशज है। आजादी के छह दशक बाद भी लगभग समस्त सुविधाओं से महरूम दयाकोट गांव के स्व.खुशाल सिंह के बड़े पुत्र रुद्र सिंह खत्री 7 आसाम रेजीमेंट में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर कार्यरत हैं। उनकी दो पुत्रियां हैं- बड़ी भावना उर्फ मोना और छोटी मेघा। पिता भावना को गे्रजुएशन के बाद एयर होस्टेस बनाना चाहते थे, जिसके लिये उन्होंने उसे एयर होस्टेस का कोर्स भी कराया। वहींभावना अभिनय की दुनिया में नाम कमाना चाहती थी। मां शकुंतला ने भी बेटी की रुचि को देखते हुए उसे अभिनय के क्षेत्र में आगे बढऩे के लिये प्रोत्साहित किया। कहते हैं कि जहां चाह वहां राह। भावना की मेहनत और लगन का ही नतीजा रहा कि उसे पहले बालाजी टेलीविजन के बैनर तले 'ख्वाहिशेंÓ सीरियल और बाद में 'किस देश में है मेरा दिलÓ और अब इमेजिन चैनल के प्रसिद्ध धारावाहिक 'जमुनियाÓ में अपने अभिनय का जादू बिखरने का मौका मिला है। भावना की इस उपलब्धि से उसके माता-पिता एवं बहन के अलावा गांव के पैतृक मकान में निवास कर रहे उसके चाचा नेत्र सिंह, चाची सावित्री और चचेरी बहन बेहद खुश हैं। इसी के साथ पूरा अस्कोट क्षेत्र भी अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। सफलता को कर्मों का फल मानती है भावना अस्कोट: जमुनिया यानि भावना खत्री का कहना है कि प्रतिभा सभी के पास होती है, परन्तु उसे दिखाने का अवसर बिरलों को ही मिलता है। अपने को मिले अवसर को वह अपने मां-बाप के अच्छे कर्मों का फल बताती है। दूरभाष पर भावना ने बताया कि उत्तराखंड का पर्यावरण बेहद शुद्ध है। अपने गृह क्षेत्र में नहीं आ पाने का खासा मलाल रहता है। उसने बताया कि वह नवम्बर-दिसम्बर माह में अपने गृह क्षेत्र अस्कोट आएगी।

Sunday, March 21, 2010

जिनसे खेला करते थे भीम

-आकृति में छोटे पर उठाने में छूटते हैं पसीने -महासू मंदिर हनोल प्रांगण की शोभा बढ़ा रहे पाण्डु पुत्र भीम की बालक्रीड़ा के प्रतीक सीसे के दो गोले लोक मान्यता: ताकत का घमंड दिखाने पर नहीं उठाए जाते स्थानीय मेलों के दौरान क्षेत्र के लोग गोलों पर आजमाते हैं ताकत PAHAR1-आकृति गोल और दिखने में छोटे। देहरादून जिले के हनोल स्थित महासू मंदिर परिसर में रखे सीसे के दो गोले पाण्डु पुत्र भीम की ताकत का एहसास कराते हैं। लोक मान्यता है कि भीम बालकपन में इन गोलों को कंचे (गिटिया) के रूप में इस्तेमाल किया करते थे। गोलों को देखकर कोई भी कह देगा कि इन्हें आसानी से उठाया जा सकता है, पर उठाने में अच्छे से अच्छे बलशालियों के पसीने छूट जाते हैं। समय बदला और लोगों का नजरिया भी। ऐतिहासिक महत्व की यह धरोहर आज ताकत परखने का जरिया भर रह गई है। देहरादून जनपद के जौनसार-बावर क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक स्थल महासू मंदिर के प्रांगण में रखे सीसे के दोनों गोलों का धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व है। किवंदति है कि द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडव हनोल, चकराता व लाखामंडल आदि स्थलों पर ठहरे। लोक मान्यता है कि हनोल स्थित महासू मंदिर परिसर में रखे सीसे के दोनों गोलों से बचपन में पाण्डु पुत्र भीम खेला करते थे। आकृति में छोटे दिखने वाले इन गोलों का वजन छह और नौ मण है यानि ढाई से साढ़े तीन कुंतल। देखकर ऐसा ही लगता है मानों हर कोई इन्हें आसानी से उठा लेगा, लेकिन इन्हें उठाने में अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। सैलानियों के आकर्षण का केंद्र इन गोलों पर क्षेत्र के लोग स्थानीय मेलों के दौरान ताकत आजमाते हैं। सैलानी क्या, श्रद्धालु क्या, मंदिर में आने वाला हर शख्स इन गोलों को कंधों पर उठाने का भरसक प्रयास करता है। कुछ कामयाब होते हैं तो कुछ निराश। गोलों के वजन का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कंधें पर उठाने के बाद फेंकने पर जमीन में चार से पांच इंच तक गहरा गड्ढा हो जाता है। लोक मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति ताकत के घमंड में गोलों को कंधों पर उठाने का दावा करता है तो उसकी ताकत गोलों को छूते ही काफूर हो जाती है, पर श्रद्धापूर्वक उठाने पर गोलों को आसानी से उठाया जा सकता है। मंदिर में बिस्सू व जागड़ा पर्व के दौरान सैकड़ों लोग गोलों को कंधे पर उठाने का प्रयास करते हैं। मंदिर प्रांगण में रखे इन गोलों को देख ऐसा लगता है, मानों भारतीय पुरातत्व विभाग के लिए इनका कोई खास महत्व नहीं है। मंदिर में कई पीढिय़ों से देवता की सेवा कर रहे कारसेवकों व श्रद्धालुओं के लिए इन गोलों को विशेष महत्व देते हैं। शायद यही वजह है कि वर्षों से प्रांगण में रखी ये प्राचीन धरोहर आज तक सुरक्षित है।

अर्थ आवर डे पर जगमगाएंगे पहाड़

27 की रात हिमाचल और उत्तराखंड के सीमांत जिलों के हजारों गांवो में जलेंगी मशालें भैलो (पहाड़ी इलाकों में दीवाली मनाने का स्थानीय तरीका) खेला जाएगा। -गांवों के हजारों लोग लेंगे वनो को आग से बचाने का संकल्प PAHAR1-सत्ताइस मार्च का दिन पहाड़ों के लिए कुछ खास होगा। इस दिन जहां द़निया के शहर एक घंटे के लिए अपने घर, दफ्तर अथवा संस्थान में बत्तियां बंद रखेंगे, वहीं पहाड़ रोशनी से जगमगा रहे होंगे। हिमाचल और उत्तराखंड के गांवों में अर्थ आवर डे पर दीये रोशन किए जाएंगे और भैलो (पहाड़ी इलाकों में दीवाली मनाने का स्थानीय तरीका) खेला जाएगा। यह अनूठी पहल की है पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रहे मैती आंदोलन के संस्थापक व उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के वैज्ञानिक कल्याण सिंह रावत ने। इस विशेष आयोजन का उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रो को पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक करना तो है ही, साथ ही दुनिया का ध्यान हिमालय के पारिस्थितिकीय तंत्र की ओर आकर्षित करना भी है। इसीलिए अर्थ आवर डे को स्थानीय पुट देकर आयोजित किया जा रहा है। बता दें कि दीवाली के वक्त एकादशी को समूचे उत्तराखंड व नेपाल में भैलो त्योहार मनाया जाता है। इसमें रात को लोग मशालें लेकर भैलो, भैलो करते हुए लोकगीतों के साथ नृत्य करते हैैं। श्री रावत ने बताया कि इस मौके पर गांवों के लोग वनो को आग से बचाने का संकल्प भी लेंगे। उन्होंने बताया कि इस आयोजन में उत्तराखंड के दो हजार से ज्यादा गांव भाग लेंगे। पिथौरागढ़ के गुंजी व अस्कोट से लेकर उत्तरकाशी के सरनोल-बडियार व आराकोट तक के गांवों को प्रकाशोत्सव से जोड़ा गया है। हिमाचल प्रदेश में शिमला विश्वविद्याल.य के इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटेड हिमालयन स्टडीज के डॉ. रान्टा व आकाश दीप संस्था ने भी इस कार्यक्रम को लाहौल स्पीति व किन्नौर जिले के सीमांत गांवों में प्रकाशोत्सव मनाने का फैसला लिया। रैणी गांव में चिपको उत्सव देहरादून: मैती आंदोलन चिपको आंदोलन की सूत्रधार गौरादेवी की याद में 26 मार्च को चमोली के रैणी गांव में चिपको उत्सव आयोजित करेगा। पर्यावरण संरक्षण को समर्पित मैती आंदोलन के संस्थापक कल्याण सिंह रावत ने बताया कि 26 मार्च 1974 को गौरादेवी ने रैणी से चिपको आंदोलन की शुरुआत की थी। इसमें सीमांत क्षेत्रों के गांवों के मैती संगठन हिस्सा लेंगे

Saturday, March 20, 2010

पहाड़ की तकदीर बदल सकता है कम्युनिटी बेस्ट टूरिज्म

-जीबी पंत संस्थान ने भी गढ़वाल क्षेत्र के त्रिजुगीनारायण एवं सिरसी गांवों में इस सेवा को शुरु करने की पहल पहाड़1- पलायन के चलते एक-एक कर खाली हो रहे प्रदेश के पर्वतीय गांवों लिए कम्युनिटी बेस्ट टूरिज्म एक नई उम्मीद लेकर आया है । इसके जरिये स्थानीय लोग अपने घरों की ओर लौट रहे हैैं बल्कि देश विदेश के पर्यटकों को होम स्टे एकमोडेशन उपलब्ध करा कर आर्थिकी का जरिया भी बना रहे हैैं । कुमाऊं के विसर क्षेत्र में विलेज वे द्वारा शुरु की गई होम स्टे एकमोडेशन स्कीम के बाद अब जीबी पंत संस्थान ने भी गढ़वाल क्षेत्र के त्रिजुगीनारायण एवं सिरसी गांवों में इस सेवा को शुरु करने की पहल की हैैं । इसके तहत स्थानीय स्थानीय लोग देश-विदेश से आये पर्यटकों को उचित दरों अपने घरों में ठहरने की व्यवस्था करते हैैं और वर्षो से खाली पड़े ये पारंपरिक घर उनकी आर्थिकी का जरिया बनते हैैं। गोविंद वल्लभ पंत पर्यावरण विकास संस्थान की गढ़वाल इकाई के अभय ने बताया कि विलेज वे के द्वारा कुमाऊं में चलाई गई इस स्कीम की सफलता के बाद उनके संस्थान ने भी गढवाल में यह सेवा शुरु करने की पहल की है । इस स्कीम के तहत पहले चरण में त्रिजुगीनारायण एवं सिरसी गांवों में इस सेवा को शुरु करने की पहल की हैैं। तथा इन घरों के लोगों को प्रशिक्षित किया जा रहा हैैं। खूब हो रही है कमाई- कुमाऊ के विसर क्षेत्र में जिन गावों में विलेज के द्वारा होम स्टे स्कीम चलाई गई हैैं वहां पर ग्र्रामीण टूरिस्ट से एक रात स्टे के एक हजार से पंद्रह सौ रुपये तक लेते है । विसर क्षेत्र के ग्र्रामीणों ने विदेशों से भी सीधी बुकिंग शुरु कर दी है ।

उत्तराखंड लोक सेवा आयोग द्वारा 22 नवम्बर २००९- के परिणाम १३ मार्च २०१० को जारी

उत्तराखंड लोक सेवा आयोग द्वारा 22 नवम्बर 2009 को आयोजित उत्तराखंड सचिवालय लोक सेवा आयोग समीक्षा अधिकारी ,सहायक समीक्षा अधिकारी (प्रा.) परीक्षा 2007 के परिणाम के आधार पर 3507 अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा के लिए चयनित किया गया है । परिणाम को आयोग की वेबसाइट पर देख सकते है । -www. gov.ua.nic.in/ukpsc/

अब आकाश मार्ग से कीजिए महाकुंभ के शहर के दर्शन

उत्तराखंड हेली सर्विस ने शुरू की हरिद्वार से सेवा -कुंभ दर्शन को खर्च करने होंगे 2999 रुपये -अखाड़ा परिषद अध्यक्ष ने उड़ान भर की शुरुआत -पवन हंस हेलीकॉप्टर की सात सेवाएं होंगी संचालित pahar1- अब आकाश मार्ग से महाकुंभ के शहर के दर्शन हो सकेंगे। तीर्थनगरी से आज सस्ती दरों पर हेलीकॉप्टर सेवा की शुरुआत हुई। कुंभ दर्शन के लिए केवल 2999 रुपये प्रति यात्री खर्च करने होंगे। अभी एक हेलीकॉप्टर से शुरू हुई सेवा सात हेलीकाप्टर तक पहुंचेगी। विशेष बात यह है कि हेलीकाप्टर के सभी यात्रियों का बीमा होगा। इस सेवा के लिए उत्तराखंड हेली सर्विस ने पवन हंस के साथ अनुबंध किया है। पवन हंस के हेलीकाप्टर ने पहली उड़ान वैरागी कैंप से तकरीबन दोपहर 12.25 बजे भरी। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्री महंत ज्ञानदास ने विधिवत इसका उद्घाटन किया और पहली उड़ान में आकाश मार्ग से कुंभनगरी के दर्शन किये। उन्होंने सर्विस के चेयरमैन अजय मगन को इस शुभ अवसर पर बधाई देते हुए कहा कि यह सेवा महीने भर पहले ही शुरू हो जानी चाहिए थी। चलिए देर से ही सही, एक अच्छी सेवा का श्रीगणेश हुआ है। उन्होंने बताया कि आकाश मार्ग से कुंभ के मनोरम और बेहतरीन दृश्य को निहारने का इतने कम धन में अवसर देना सराहनीय है। उत्तराखंड हेली सर्विस के चेयरमैन डा. अजय मगन ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि पवन हंस के सात हेलीकाप्टर उड़ान भरेंगे। शुरुआत एक हेलीकाप्टर से कर दी गई है। उन्होंने बताया कि हेलीकाप्टर वेल 407 अत्याधुनिक और सुरक्षित है। वेबसाइट पर इस संबंध में पूरी जानकारी उपलब्ध है। टिकट बिक्री के लिए हरिद्वार में कई केन्द्र बनाए गए हैं। उन्होंने बताया कि कुंभ दर्शन के लिए एक यात्री को सिर्फ 2999 रुपये खर्च करने होंगे। कुंभ दर्शन, हरिद्वार और गंगा दर्शन के लिए 4975, कुंभ परिक्रमा (कुंभ, गंगा दर्शन, हरिद्वार, ऋषिकेश से लक्ष्मण झूला) 8490, गंगा अवतरण यानि देवप्रयाग जहां से गंगा निकलती है का दृश्य देखने के लिए 12850 रुपये खर्च करने होंगे। इस अवसर पर आह्वïान अखाड़े के श्री महंत शिव शंकर गिरी ने भी उड़ान भरकर अपनी शुभकामनाएं दीं। केवल एक घंटे में पहुंचेंगे दिल्ली हरिद्वार: यदि आप चार्टर हेलीकाप्टर से हवाई यात्रा करना चाहते हैं तो वह भी अब हरिद्वार से उपलब्ध होगा। फिलहाल यह सेवा हरिद्वार से दिल्ली के लिए शुरू की गई है। चार्टर हेलीकाप्टर केवल एक घंटे में आपको दिल्ली पहुंचा देगा।

Thursday, March 18, 2010

ये जिंदगी के मेले...

जिंदगी भी क्या है, बचपन से लेकर बुढ़ापे तक भाग-भागम, पहले अपने पैरों पर चलने की जल्दी में घुटने छिलवाए. किसी तरह चलना शुरू किया तो घर की चौखट लांघने की जल्दी. थोड़ा आगे बढ़े तो स्कूल में एडमिशन की भाग-दौड शुरू. ले देकर मम्मी डैडी ने एडमिशन करा दिया तो क्लास में आगे निकलने की होड़. हाय जिंदगी की मारमारी छुटपन से ही शुरू. आगे निकलो, आगे निकलो, कहां से आगे निकलो, हर तरफ तो जाम ही जाम है. क्लास में जाम. घर पर जाम, सड़क पर जाम. खेल के मैदान में जाम. कोई आगे ही नहीं बढ़ रहा है तो हम कैसे आगे बढ़े. बस भाग रहे चक्कर घिन्नी बने. जिनसे आगे निकलना है, उनका तो पता ही नहीं वह कहां तक पहुंच चुके है. किसी तरह घिसटते हुए स्कूल से बाहर निकले तो पता चला, अभी तो वही पर है, जहां से चले थे. एक बार फिर दौड़ शुरू हुई कॉलेज, इंस्टीट्यूट में एडमिशन कराने की, शायद यहां पर जिंदगी में ठहराव आ जाए, शायद यहां से सबसे आगे निकलने का रास्ता मिल जाए. पर किस्मत यहां भी दगा दे गई. मां-बाप के पैसों की पॉवर से चार-पांच साल और मिल गए, अपनी जिंदगी की फिनिशिंग के लिए. लगा अब तो ऐश के दिन ही आ गए समझो. कुछ समय बाद पता चला कि बेटा अभी आराम कहां है. असली भाग-दौड़ के दिन शुरू भी नहीं हुए. जब एक अदद नौकरी के लिए एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस, एक शहर से दूसरे शहर, इस स्टेट से उस स्टेट. इतनी भाग दौड़ में अपने कब कहां छूट गए, पता ही नहीं चला. नौकरी की लाइन में खड़े होने की जगह भी नहीं मिल पाई. अपने तो कब के पराए हो गए पता ही नहीं चला. फिर बेहताशा, कभी इधर, कभी उधर बस भागे चले जा रहे है. जाना कहां है, यह तो अभी तक तय नहीं हो पाया है. किसी तरह दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हुआ तो वह भी सुकून से नहीं खा पाते. सुबह घर से निकल कर काम पर जाने की जल्दी, शाम को घर पहुंचने की जल्दी के बीच पता ही नहीं चलता, हम किससे पीछे है और किससे आगे. ऐसे में अपडेट क्या खाक होगे. वक्त मिले तो कुछ करें भी, आजकल की बात ही है जिस देखो, वह कह रहा है हॉकी में तो नाक ही कट गई. वहां भी क्या कम भाग-दौड़ थी, इंडियन प्लेयर्स को भगा-भगा कर ऐसा पीटा कि वह भी जल्दी से हॉकी का नाम नहीं लेगे, हमें तो क्या याद रहेगा, थोड़ा बहुत याद आता तो उधर आईपीएल आ धमका. उसमें भी वही भाग-दौड़ पहले पांच दिन से 100 ओवर तक और अब सिर्फ 40 ओवर में ही पूरा मैच. पैसा कमाने की होड़ में जेंटलमैन गेम्स का नाश. क्या क्या याद करें, ठीक से याद भी रहा. सब कुछ भूल सा गए है. अपना बचपन, अपना घर, अपना मौहल्ला, अपना शहर, चाय की दुकान, अपनी रोज शाम की दोस्तों के साथ महफिले (भले ही लोकल लेबल की थी). मेहनत करके अपने शरीर को क्यों खराब करें. पहले कम से कम पढ़ तो लेते ही थे, पर तो हमारी सरकार ने पढ़वाने के नाम पर ही कह दिया किसी को फेल ही नहीं किया जाएगा. अब पास-फेल से क्या डरना, जब फेल ही नहीं होना. अब आने वाले कुछ समय में हमे भागदौड़ से मुक्ति मिल जाएगी, क्योंकि जिस स्पीड से दुनिया आगे बढ़ रही है और हर काम टच करते ही हो जाता है. तो भला फिर क्यों भागना. चलो अब लिखना खत्म करता हूं, अभी बहुत काम बचा है और फिर मुझे भी घर भागना है. 'लेखक हरीश भट्टï, यूं तो आई-नेक्स्ट देहरादून में ले-आउट आर्टिस्ट है. लेकिन लिखने-पढऩे का शौक भी कही दिल में रखते है. क्वार्क, कोरल, फोटोशॉप की दुनिया से जब भी फुरसत मिलती है, हरीश के अंदर का लेखक मौका देखकर चौका मार जाता है. ये चौका कुछ ऐसे ही फुरसत के लम्हों में लगा है.

-542 इकाइयों पर मंडराया खतरा

-औद्योगिक पैकेज पर 'ब्रेकÓ से बढ़ा खतरा -31 मार्च तक उत्पादन शुरू करने वाली इकाइयों को ही मिलेगी करों में छूट -लक्ष्य से काफी पीछे है राज्य के पांचोंं औद्योगिक आस्थान Pahar1-31 मार्च का दिन सरकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के लिए भले ही राज्य के लिए शुभ रहे, लेकिन औद्योगिक दृष्टि से यह दिन बुरा ही रहेगा। औद्योगिक पैकेज पर केन्द्र का रहमोकरम न होने पर राज्य से करोड़ों का निवेश हाथ से चला जायेगा, साथ ही 542 इकाइयां भी अपना दूसरा ठिकाना खोज सकती हंै, क्योंकि राज्य के पांचों औद्योगिक आस्थान लक्ष्य से काफी पीछे चल रहे हैैं। वर्ष 2000 में जन्मे उत्तराखंड राज्य के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विशेष राज्य का दर्जा दिया था। इसके तहत वर्ष 2013 तक औद्योगिक पैकेज घोषित किया गया था। पैकेज में निर्धारित अवधि में स्थापित होने वाली औद्योगिक इकाइयों के लिए करों में छूट मिलने का प्रावधान है लेकिन केन्द्र में सत्तासीन यूपीए सरकार ने पैकेज की अवधि 2013 से घटाकर 2010 कर दी है। यानि पैकेज की अवधि 14 दिनों बाद 31 मार्च 2010 को खत्म हो रही है। औद्योगिक पैकेज का लाभ लेने के लिए राज्य सरकार ने अपने स्तर से उत्तराखंड के पंतनगर, हरिद्वार, फार्मा सिटी (देहरादून) कोटद्वार, आईटी पार्क देहरादून व सितारगंज में औद्योगिक आस्थान स्थापित किये। इनमें 1465 औद्योगिक इकाइयों स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। राज्य के लिए इसके सकारात्मक परिणाम भी मिले। टाटा, बजाज, ब्रिटानिया, अशोक लेलैैंड, डाबर सहित देश के नामी औद्योगिक घरानों ने उत्तराखंड की ओर रुझान बढ़ाया और अपनी इकाइयां स्थापित की। इससे राज्य की बेरोजगारी के जख्म को भी काफी मरहम लगा। औद्योगिक इकाइयों के बारे में शासन स्तर पर एकत्र 15 फरवरी की रिपोर्ट के मुताबिक पांचों आस्थानों में 294 एकड़ भूमि रिक्त पड़ी है। 1465 औद्योगिक इकाइयों में 733 इकाइयां लग चुकी हैैं जबकि 542 इकाइयां निर्माणाधीन हैं। सूत्रों के मुताबिक 15631 करोड़ निवेश हो चुका है और करीब एक लाख 56 हजार बेरोजगारों को नौकरी मिल चुकी है जबकि प्रस्तावित इकाइयों में उत्पादन शुरू होने के बाद यह संख्या दो गुनी होने की संभावना है। जानकारों का मानना है कि 31 मार्च तक चंद इकाइयां ही उत्पादन शुरू करने में कामयाब हो सकेंगी। लिहाजा बाकी के लिए छूट का लाभ नहीं मिल सकेगा। ऐसे में उद्योगपति यहां उत्पादन शुरू करने का निर्णय बदल भी सकते हैैं। --- औद्योगिक पैकेज की अवधि बढ़ाने के लिए बृहद स्तर पर प्रयास किये जा रहे हैैं। खुद मुख्यमंत्री कांग्रेस के राज्य से निर्वाचित पांचों सांसदों के साथ प्रधानमंत्री से मिल चुके हैैं। इसके अलावा भी सरकार पैकेज की अवधि बढ़ाने अन्य स्तर से कोशिश कर रही है। बंशीधर भगत, परिवहन मंत्री, उत्तराखंड

ऐतिहासिक चैती मेला शुरू

मां बाल सुंदरी मंदिर में पूजा-अर्चना व ध्वजारोहण के साथ हुआ शुभारंभ - प्रथम नवरात्र में पूजा को उमड़े श्रद्धालु काशीपुर में ऐतिहासिक चैती मेले के शुभारंभ पर मां बाल सुंदरी देवी मंदिर में पूजा अर्चना करते व ध्वजा फहराते अतिथि राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष सुखदेव सिंह नामधारी। , काशीपुर pahar1-मां बाल सुंदरी देवी मंदिर (उज्जैनी शक्तिपीठ) में विधिवत पूजा अर्चना व ध्वजा फहराने के साथ ही मंगलवार को चैत्र नवरात्र के पहले दिन ऐतिहासिक चैती मेला शुरू हो गया। श्रद्धालु सुबह से ही मंदिर में पूजा अर्चना को उमडऩे लगे। मंगलवार को चैती मेला परिसर में मां बाल सुंदरी देवी मंदिर में पुरोहित दयाशंकर जोशी ने विधिवत पूजा-अर्चना करायी। इसके उपरांत अतिथि राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष सुखदेव सिंह नामधारी, प्रधान पंडा वंश गोपाल अग्निहोत्री आदि ने ध्वजा फहरा कर मेले का शुभारंभ किया। मंगलवार सुबह से ही मां बालसुंदरी मंदिर में श्रद्धालु पूजा अर्चना को पहुंचने शुरू हो गए। मेला परिसर में भी खासी गहमा-गहमी शुरू हो गई। उधर 23 मार्च की तड़के नगर मंदिर से मां बालसुंदरी का डोला आने के साथ ही मेले में रौनक बढ़ जाएगी। वहीं व्यापारियों तेजी से दुकानें लगानी शुरू कर दी हैं।

नदियां कहेंगी, आजा मेरे पास

-गुजरात की साबरमती नदी की तर्ज पर उत्तराखंड की नदियों की सूरत संवारेगा सिंचाई विभाग -सर्वे कर गुजरात से लौटे अधिकारी -गौला, कोसी व ढेला समेत छह नदियां चिह्नित हल्द्वानी: pahar1- जी हां, जो नदियां अब तक कहर ढाती रही हैैं, वे अब आपको आकर्षित करेंगी। सिंचाई विभाग रिवर फ्रंट डवलेपमेंट प्रोजेक्ट के तहत उत्तराखंड की प्रमुख नदियों की सूरत संवारने की तैयारी कर रहा है। इनकी साज-सज्जा गुजरात की साबरमती नदी की तर्ज पर की जाएगी। इसके लिए विभागीय अधिकारियों का एक दल गुजरात का दौरा भी कर आया है। नदी-नहरों का प्रदेश कहलाने वाले उत्तराखंड में नदियां और नहरें लोगों की जान-माल के लिए खतरा बनती जा रही हैैं। बरसात के मौसम में इनमें आने वाली बाढ़ भारी तबाही मचाती। इस स्थिति से निपटने के लिए सिंचाई विभाग ने रिवर फ्रंट डवलेपमेंट प्रोजेक्ट तैयार किया है। इसके तहत सिंचाई विभाग नदियों को सुंदर और सुरक्षित बनाने जा रहा है। इसके लिए सिंचाई विभागाध्यक्ष एबी पाठक ने छह अधिकारियों का एक दल साबरमती नदी के निरीक्षण और उसको आकर्षक बनाने के लिए किए गये जतन की जानकारी लेने गुजरात भेजा था, जो वापस लौट आया है। श्री पाठक ने बताया कि साबरमती नदी की तर्ज पर ही राज्य की नदियों का सौैंदर्यीकरण किया जाएगा। इसके लिए फिलहाल छह नदियों का चयन किया गया है। कुमाऊं में गौलानदी का काठगोदाम से लेकर किच्छा तक (35 किलोमीटर), कोसी नदी का रामनगर से बाजपुर तक (12 किमी) तथा ढेला नदी का काशीपुर से मुरादाबाद सीमा तक सौैंदर्यीकरण किया जाएगा। इसी तरह गढ़वाल में देहरादून शहर के बीच से होकर गुजरने वाली बिंदाल नदी (13 किमी) तथा सौैंग और रिस्पना नदियों का करीब 20 किलोमीटर तक सौंदर्यीकरण किया जाएगा। श्री पाठक ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के तहत नदियों के दोनों तटों को पक्का बनाने के साथ ही दोनों ओर टू-लेन मार्ग बनाया जायेगा। इससे जहां नदियों में आने वाली बाढ़ से होने वाली भूमि कटाव की समस्या खत्म होगी, वहीं आबादी भी सुरक्षित रहेगी। इसके अलावा नदियों के किनारे बनने वाली टू-लेन सड़कों के किनारे-किनारे विभिन्न किस्मों के पेड़-पौधे व फूल लगाए जाएंगे ताकि लोग प्राकृतिक सुंदरता का आनंद उठा सकें। इसके लिए विभागीय इंजीनियर प्रोजेक्ट तैयार कर रहे हैैं।

-संघर्ष ने भरी सफलता की 'उड़ान

महिलाओं को सेना में स्थान दिलाने में दून की विंग कमांडर अनुपमा जोशी रही हैं संघर्ष की सूत्रधार सबसे पहले विंग कमांडर जोशी ने उठायी थी सेना में महिलाओं के अधिकार की आवाज Pahar1- वायुसेना में शुरुआती पांच साल के कैरियर में उनके प्रदर्शन को सभी ने सराहा। अधिकारियों ने उनकी खूब तारीफ की। मेडल दिए गए और सर्टिफिकेट भी। साथ ही एक झटका भी। उन्हें कहा गया कि वह अब आगे काम नहीं कर सकती। मन ही मन सोचा जब मैं पुरुषों से बेहतर कर सकती हूं तो फिर आगे बढऩे से क्यों रोका जा रहा है। आला अधिकारियों से लेकर चीफ तक से इस पर प्रश्न पूछा, लेकिन जवाब किसी ने नहीं दिया। अंत में हाईकोर्ट के शरण ली। रिटायरमेंट के बाद थकी नहीं, अपने संघर्ष को जारी रखा। नतीजा आज सेना में काम करने वाली महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन देने के रूप में सामने आया। इस नतीजे से वह बहुत खुश हैं। वे इसे महिला अधिकारों की जीत मानती हैं। उन्हें उम्मीद है कि महिलाओं को अब कांबेट ट्रेनिंग में भी लिया जा सकेगा। बात हो रही है देहरादून में रहने वाली विंग कमांडर अनुपमा जोशी की। जिन्होंने सेना में रहते हुए महिला अधिकारियों के अधिकार की आवाज बुलंद की और अपने संघर्ष को अंजाम तक पहुंचाया। अनुपमा जोशी का 1992 में एयर फोर्स में पहली महिला अधिकारी के रूप में चयन हुआ। इसके बाद वह अपनी मेहनत और जज्बे के बल पर आगे बढ़ती रही। पहले पांच साल की सर्विस के बाद उन्होंने आवाज उठाई तो उन्हें तीन साल और फिर तीन साल का एक्सटेंशन मिला। हर बार टुकड़ों में मिल रहे एक्सटेंशन से वह खिन्न आ गई। उन्होंने 2002 में इसके लिए अपने सीनियर अधिकारियों से लिखित में जवाब मांगा। यहां से कोई जवाब न मिलने पर चीफ को पत्र लिखकर जवाब मांगा। कहीं से कोई जवाब नहीं आया तो फिर उन्होंने इसके लिए कोर्ट में मुकदमा करने की ठान ली। 2006 में उन्होंने अन्य महिला अधिकारी के साथ कोर्ट में याचिका दर्ज की। ऐसा करने वाली वह पहली महिला अधिकारी थी। कोर्ट ने इस केस की सुनवाई में नई भर्तियों को स्थायी कमीशन देने का फैसला दिया, लेकिन सर्विंग महिला अधिकारियों का फैसला नहीं हो पाया। 2008 में वह रिटायर हो गई लेकिन उनका संघर्ष जारी रहा। इस बीच कुछ अन्य अधिकारियों ने भी सेना में तैनात महिलाओं को स्थायी कमीशन देने को मुकदमा दायर किया। इस पर हाईकोर्ट ने एक संयुक्त सुनवाई ने महिला अधिकारियों के पक्ष में अपना निर्णय सुनाया है। विंग कमांडर जोशी कहती हैं कि इस फैसले से वह बहुत खुश हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि महिलाओं को अब कांबेट ट्रेनिंग में भी भर्ती किया जाएगा। दोबारा कर सकती हैं सेवा विंग कमांडर जोशी दुबारा वायुसेना को अपनी सेवाएं दे सकती हैं। विंग कमांडर अनुपमा जोशी कहती हैं कि कोर्ट ने याचिका में शामिल महिला अधिकारियों की सर्विस कंटीन्यू करने की बात कही हैं। ऐसे में उन्हें उम्मीद है कि दुबारा अपनी सेवाएं देने का मौका मिल सकता है।

कोई लौटा दे वो बीते हुए दिन...

-देश-विदेश में तूती थी लैंसडौन वनप्रभाग के 'खैरÓ से बने कत्था -आज प्रभाग में गिनती के ही रह गए हैं 'खैरÓ के पेड़ लैंसडौन pahar1- एक समय था जब लैंसडौन वन प्रभाग के जंगल 'बांसÓ व 'खैरÓ से अटे पड़े थे। प्रभाग में होने वाले 'खैरÓ से बने कत्था की देश ही नहीं, विदेशों में भी तूती थी, लेकिन, आज स्थितियां पूरी तरह जुदा हैं। हालात यह है कि आज लैंसडौन वन प्रभाग में 'खैरÓ सिर्फ नाम के लिए रह गया है, उस पर भी तस्करों की नजरें लगी हुई हैं। लैंसडौन वनप्रभाग का 'बांसÓ जहां देश-विदेश में ख्याति प्राप्त था, वहीं प्रभाग के जंगलों में होने वाले 'खैरÓ की भी खास पहचान थी। दरअसल, प्रभाग के जंगलों में होने वाले 'खैरÓ से बने 'कत्थाÓ की हिंदुस्तान ही नहीं, तमाम मुस्लिम देशों में भारी मांग थी। स्थिति यह थी के 'खैरÓ के पेड़ों की बोली लगती थी व ठेकेदार पेड़ों को काटकर जंगलों में ही कत्था बनाने के लिए बड़ी-बड़ी भट्ठियां लगा देते थे, जहां मजदूर पेड़ों का चिरान कर उससे कत्था निकालते थे। चालीस के दशक के बाद लैंसडौन वन प्रभाग के 'खैरÓ पर तस्करों की नजर लग गई। दरअसल, इस दौरान नजीबाबाद व आसपास के क्षेत्रों में कत्था फैक्ट्रियां लगनी शुरू हुई व कुछ ही समय में दर्जनों कत्था फैक्ट्रियां वजूद में आ गईं। बड़ी संख्या में फैक्ट्रियां लगने से कत्थे की मांग बढ़ी, तो 'खैरÓ की तस्करी होने लगी। वर्ष 1976 में वन विकास निगम का गठन होते ही 'खैरÓ के कटान व विपणन की जिम्मेदारी निगम पर आ गई। इसके बाद इसकी कीमतें आसमान छूने लगी। इसके साथ ही 'खैरÓ का अवैध पातन भी यकायक बढ़ गया। उस दौर में 'कत्था सरदारÓ के नाम से क्षेत्र में सक्रिय रहा 'खैरÓ तस्कर आज भी कोटद्वार व आसपास के क्षेत्र में लोगों के जुबां पर बसा है। हालांकि, 'खैरÓ की बढ़ती तस्करी को देखते हुए शासन ने कड़े नियम बनाए, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी और अधिकांश जंगल खैरविहीन होते चले गए। आज स्थिति यह है कि लैंसडौन वन प्रभाग के जो जंगल 'खैरÓ से भरे पड़े थे, आज वहां गिनती के पेड़ रह गए हैं व उन पर भी वन तस्करों की निगाहें लगी हुई हैं। पूर्व वनाधिकारी बीबीएस रावत भी मानते हैं कि प्रभाग में 'खैरÓ कम होने की मुख्य वजह अवैध पातन रही। उन्होंने बताया कि इस अवैध पातन में कहीं न कहीं विभागीय कर्मचारियों की कथित मिलीभगत भी होती थी। श्री रावत की मानें, तो अब खैर के दाम अधिक होने के कारण कत्था फैक्ट्री स्वामी अब कत्था बनाने के लिए 'गैविनÓ नामक कैमिकल का प्रयोग करने लगे है, जिससे खैर की तस्करी कम हो गई है। लैंसडौन वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी नरेंद्र सिंह चौधरी ने भी स्वीकारा कि पूर्व में लैंसडौन वन प्रभाग में 'खैरÓ के जंगलों में भारी अवैध पातन हुआ। नतीजतन, आज 'खैरÓ सीमित क्षेत्र में सिमट कर रह गया है। उन्होंने बताया कि प्रभाग में प्राथमिकता के आधार पर बंजर भूमि में खैर का रोपण किया जा रहा है, ताकि खैर के जंगल वापस लौट सकें।

बर्फीला बियाबान ले रहा शौकीनों की जान

-कालिंदी पास बदरीनाथ ट्रैक पर हर साल साहसिक पर्यटन को पहुंचते हैं पर्यटक -ट्रैक पर संचार माध्यमों का अभाव व सुरक्षा के नहीं रहते पर्याप्त इंतजाम -निजी ट्रैकिंग कंपनियां रख देती हैं जरूरी नियमों को ताक पर -प्रतिवर्ष ट्रैकर्स खराब मौसम में गंवा बैठते हैं जान Pahar1- उत्तरकाशी रोमांच और साहसिक पर्यटन के शौकीनों को उत्तराखंड के जोखिमभरे उच्च हिमालयी ट्रैक आकर्षित करते आए हैं। राज्य के प्रमुख ट्रैकरूट में शामिल उत्तरकाशी का कालिंदी पास बदरीनाथ ट्रैक पथारोहियों के बीच काफी लोकप्रिय है। हर साल सैकड़ों ट्रैकर इस रूट पर एडवेंचर टूरिज्म को पहुंचते हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं की कमी और राहत- बचाव के लचर इंतजामों के चलते यह बर्फीला बियाबान हर साल कई पर्यटकों की जान लील जाता है। पथारोहियों की खास पसंद बनता जा रहा कालिंदी पास बदरीनाथ ट्रैक करीब 106 किमी लंबा है, जिसमें ट्रैकिंग दल गंगोत्री से भोजवासा, गोमुख, नंदनवन, वासुकिताल, खड़ा पत्थर आदि पड़ावों के बाद कालिंदी बेस तक पहुंचते हैं। वहां से आठ किमी की कठिन चढ़ाई के बाद समुद्रतल से 5950 ऊंचे बर्फीले कालिंदी दर्रे को पार कर राजपड़ाव, अर्वाताल, सीमावर्ती चेकपोस्ट घस्तोली से होते हुए माणा व बदरीनाथ पहुंचते हैं। औसतन बारह दिन में पूरे होने वाले इस ट्रैक के लिये जिला प्रशासन ने वर्ष 2006 में चौबीस और 2008 में करीब 44 परमिट जारी किये गये, जबकि एक दर्जन से अधिक ट्रैकिंग दल बिना परमिट के इस जोखिम भरे ट्रैक पर निकल गये थे। इनमें रास्ता भटके दो रूसी दलों को बचाने में उत्तरकाशी व चमोली जिला प्रशासन को खासी मशक्कत करनी पड़ी थी। इस दौरान अलग अलग दुर्घटनाओं में दो लोगों की मौत भी हो गई थी। इससे पूर्व भी कई दल इस रूट पर दुर्घटनाओं का शिकार हो चुके हैं। इसे देखते हुए वर्ष 2009 में जिला प्रशासन ने कुछ समय बाद ही कालिंदी ट्रैक में जाने पर पाबंदी लगा दी थी। इसके बावजूद निजी ट्रैकिंग कंपनियों के जरिए ट्रैक पर पर्यटकों का जाना बदस्तूर जारी है, लेकिन कुशल गाइड व पोर्टरों की कमी और बिना अनुमति के जाने की यह प्रवृत्ति नुकसानदेह साबित हो रही है। दरअसल, इन दलों के पास राहत एवं बचाव के लिये जरूरी इंतजाम नहीं रहते। ट्रैकिंग कंपनियां भी अधिक मुनाफा कमाने के फेर में नियमों व जरूरी सुरक्षा उपायों को ताक पर रखकर ट्रैक करवा देती हैं। ऐसे में हर साल इस बर्फीले बियाबान में पर्यटकों को जान गंवानी पड़ती है। इस संबंध में उपजिलाधिकारी एसएल सेमवाल ने बताया कि बीते वर्ष मौसम को देखते हुए जिला प्रशासन ने इस ट्रैक की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन इस बार यदि मौसम ठीक रहा, तो कालिंदी ट्रैक खुला रहेगा। उन्होंने कहा कि ट्रैक पर जाने से पूर्व निजी ट्रैकिंग कंपनियों के सुरक्षा इंतजामों की पूरी जांच की जाएगी।

16 मई को खुलेंगे गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के कपाट

उत्तरकाशी pahar1-: गंगोत्री व यमुनात्री धामों के कपाट अक्षय तृतीया पर 16 मई को खुलेंगे। गंगोत्री की मूर्ति परंपरानुसार ढोल बाजों व भव्य जुलूस के साथ 15 मई को मुखवा गांव से गंगोत्री के लिए रवाना होगी। गंगोत्री मंदिर समिति की बैठक के बाद अध्यक्ष संजीव सेमवाल ने बताया कि इस बार कपाट एक माह की देरी से खुल रहे हैं। इस वर्ष अधिमास पडऩे के कारण यह स्थिति बनी है। कपाट बंद होने की तिथि भी एक माह आगे बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि इस बार मुखवा गांव में बड़ी तादाद में श्रद्धालुओं के जुटने की उम्मीद है, जो गंगा की भव्य शोभायात्रा के साथ 15 मई को गंगोत्री की ओर चलेंगे। रात्रि विश्राम भैरों घाटी में करने के बाद 16 मई को मुहूर्त के अनुसार दोपहर एक बजे गंगा की भोगमूर्ति गंगोत्री मंदिर में स्थापित की जाएगी। दूसरी ओर, यमुनोत्री मंदिर के सचिव मनोहर प्रसाद उनियाल ने बताया कि यमुनोत्री के कपाट भी अक्षय तृतीया को ही खुलेंगे। इसी दिन सुबह तीर्थ पुरोहित व श्रद्धालु खरसाली गांव से यमुना व समेश्वर देवता की डोली के साथ यमुनोत्री के लिये रवाना होंगे।

पानी के प्रदेश में इंसान प्यासा

नदियों से 40 हजार मेगावाट से ज्यादा बिजली उत्पादन की संभावना, पैदा हो रही दो हजार मेगावाट से भी कम हर साल 2.10 बिलियन घन मीटर पानी से भूजलाशय होते हैं रिचार्ज झीलों, चश्मों के बावजूद गर्मी में कई इलाके झेलते हैं जल संकट पानी के बावजूद 95 में 71 ब्लाक यानी पहाड़ का 89 फीसदी क्षेत्र बरसात के भरोसे देहरादून, pahar1- उत्तराखंड नदियों, झीलों, चश्मों का प्रदेश हैै। मैदानी क्षेत्र में भूजल की कोई कमी नहीं। इसे सरकारों की दूरदर्शिता की कमी कहें या योजनाओं का अभाव कि प्रदेश का पानी बेकार जा रहा है। हालात ये हैं कि छोटी बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं के जरिए यहां की नदियों से करीब 40 हजार मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है, मगर 20 हजार मेगावाट की निर्माणाधीन परियोजनाओं की तमाम कवायद के बाद अब तक करीब 2000 मेगावाट बिजली ही पैदा का जा सकी है। भरपूर जलस्रोतों के बावजूद पहाड़ के खेत प्यासे हैैं। प्रदेश के कुल 95 ब्लाकों में से 71 ब्लाक यानी पहाड़ का 89 फीसदी क्षेत्र बरसात के भरोसे खेती के लिए मजबूर है। पानी इफरात में होने के बावजूद पर्वतीय गांवों में महिलाओं को मीलों दूर से पानी ढोना पड़ता है। गर्मी आते ही कई गांव और कस्बे पानी की किल्लत से जूझते दिखाई देते हैं। राज्य बनने के 10 साल के बावजूद घर-घर साफ पानी पहुंचाने की मुहिम का हाल यह है कि पेयजल विभाग ने इस बार प्रदेश में 606 क्षेत्रों को संकटग्रस्त घोषित किया है। गंगा, यमुना, काली और उनकी सहायक नदियां मसलन टोंस, भागीरथी, अलकनंदा, भिलंगना, मंदाकिनी, रामगंगा, शारदा, पिंडर, सरयू, गोरी ,धौली जैसी सदानीरा नदियों के घर उत्तराखंड में यह स्थिति वास्तव में चिंताजनक है। पर्यावरणविद डॉ. अनिल जोशी कहते हैैं कि ये बात और है कि गंगोत्री, पिंडारी जैसे ग्लेशियरों से निकलने वाली ये नदियां गंगा यमुना के मैदानी इलाके के दुनिया के बसे बड़े सिंचाई की नहरों के नेटवर्क को पानी मुहैया कराती हैं मगर अफसोस की बात यह है कि इस पानी का पर्वतवासी उतना लाभ नहींले पा रहे जितना कि उन्हें मिलना चाहिए। हालांकि उत्तराखंड में पानी के प्रबंधन उपयोग और संरक्षण के लिए उत्तराखंड जल संस्थान, उत्तराखंड पेयजल संसाधन एवं निर्माण निगम जलागम, सिंचाई, लघु सिंचाई, जलागम, उत्तराखंड जल विद्युत निगम आदि कई विभाग है मगर उत्तराखंड अब तक अपने इफरात पानी का उतना बेहतर उपयोग करने में कामयाब नहींहुआ है। नदियों के अलावा जल संरक्षण और प्रबंधन के क्षेत्र में वन विभाग, जलागम प्रबंधन निदेशालय, स्वजल भी कार्यरत हैं लेकिन भूजल की बात करें तो हिमालय की तलहटी के जिलों देहरादून, ऊधमसिंहनगर और हरिद्वार जिलों की जमीन के नीचे भूगर्भीय जल का समुंदर है मगर इसका भी बेहतर उपयोग नहीं हो पा रहा। राज्य बनने के बाद प्रदेश में औद्योगिकीकरण इन्हीं मैदानी जिलों में हुआ है। जिससे पानी की मांग बढ़ी है। शिवालिक रेंज में ट्यूबवेल 50.4 घन मीटर प्रति घंटा और 79.2घन मीटर प्रति घंटा तो भाभर क्षेत्र में 332.4 घन मीटर प्रति घंटा और तराई में 36 से 144 घन मीटर प्रति घंटा की रफ्तार से पानी उगल सकते हैं। गंगा जमुना के दोआब में तो ट्यूबवेल 90 से 198 घन मीटर प्रति घंटा की दर से साफ पीने का पानी दे सकते हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक एके भाटिया का कहना है प्रदेश में हर साल औसतन 1523 मिलीमीटर के करीब बारिश होती है। बारिश और नदियों, चश्मों व अन्य जलस्रोतों के पानी से हर साल कम गहराई वाले भूजलाशय 2.27 बिलियन घनमीटर (बीसीएम) रिचार्ज हो जाते हैंै। इन छिछले भूगर्भीय जलाशयों में 2.10 बीसीएम पानी हमेशा उपयोग के लिए मौजूद रहता है यानी 0.17 बीसीएम पानी अनछुआ रह जाता है। प्रदेश में अभी 1.39 बिलियन घन मीटर भूजल यानी 66 फीसदी का ही दोहन हो रहा हैै। यानी 34 फीसदी भूजल भंडार अभी यूं ही मौजूद है। प्रदेश सरकार को भूजल के बेहतर उपयोग की नीति तैयार करनी चाहिए। सेंटर फॉर साइंस पॉलिसी के निदेशक प्रो. धीरेंद्र शर्मा का कहना है प्रदेश सरकार को वैज्ञानिक शोधो व नई तकनीकों का उपयोग कर पानी का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए।

'छोटी चूक का झटका 'बड़ा

उत्तराखंड को अब तक लग चुका है अरबों रुपये का चूना नहीं मिल रहा 'विशेष श्रेणी दर्जे का पूरा लाभ नौ सालों तक किसी अफसर का नहीं गया खामी पर ध्यान Pahar1- अब इसे केंद्र सरकार की मनमानी कहें या फिर सूबे के अफसरों की लापरवाही। वजह चाहें जो भी हो पर उत्तराखंड को विशेष श्रेणी का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। नतीजा इस नए राज्य को इससे अरबों की चपत के रूप में सामने आ रहा है। अब चेते सूबे के नियोजन विभाग ने यह मामला केंद्रीय योजना आयोग के समक्ष उठाया है। नौ नवंबर-2000 को जन्मे इस राज्य को एक सितंबर, 2001 में विशेष राज्य का दर्जा मिल दिया गया। केंद्र सरकार की व्यवस्था के तहत इस स्टेटस वाले राज्यों को केंद्र पोषित योजनाओं में केंद्रीय सहायता 90:10 के अनुपात में मिलती है। यानि कुल मिलने वाली राशि में से 90 प्रतिशत केंद्रीय अनुदान और 10 प्रतिशत ऋण के रूप में होता है। इस राज्य की वास्तविकता इसके एकदम उलट है। राज्य के करीब एक दर्जन से अधिक विभागों की विभिन्न योजनाओं में 50:50 या फिर 75:25 के अनुपात में केंद्रीय सहायता और ऋण मिल रहा है। इस वजह से चालू वित्तीय वर्ष में राज्य को 120 करोड़ का चूना लग चुका है। वित्तीय वर्ष 10-11 में उत्तराखंड को केंद्रांश में 307 करोड़ का नुकसान होने जा रहा है। अब सालों बाद यह मामला प्रमुख सचिव (नियोजन) विजेंद्र पाल ने पकड़ा है। उन्होंने वित्त विभाग के प्रमुख सचिव को एक पत्र भेजा है। इसमें कहा गया है किकेंद्र पोषित योजनाओं में राज्य को 50:50, 75:25 और 80:20 के अनुपात में केंद्रीय सहायता मिल रही है। उत्तराखंड को एक सितंबर 2001 से विशेष श्रेणी दर्जा हासिल है। योजना आयोग के वरिष्ठ सलाहकार श्री कल्ला को इस संबंध में सूचित किया जा चुका है। प्रमुख सचिव (वित्त) ने सभी प्रमुख सचिवों तथा सचिवों को अपने विभाग की केंद्र पोषित परियोजनाओं को 90:10 के अनुपात में स्वीकृत कराने के लिए केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों से संपर्क करने को कहा है। गौरतलब है कि केंद्र पोषित परियोजनाओं में विभागों की विभिन्न योजनाओं में कास्ट शेयरिंग पैटर्न भी अलग-अलग है। कोल्ड वाटर फिशरीज में केंद्रीय अनुदान और ऋण का अनुपात 75:25 के अनुपात में है। जबकि नेशनल फिशरमैन वेलफेयर में केंद्रीय सहायता और ऋण 50:50 है। यही हालत दूसरे विभागों में भी है। मौजूदा स्थिति विभाग कास्ट शेयरिंग कृषि 50:50 एनिमल हस्बेंड्री 50:50 फिसरीज 75:25 फारेस्ट वेल्फियर 80:20 रूरल डेवलपमेंट 75:25 रोड एंड ब्रिज 50:50 आईटी 60:40 शिक्षा 55:45 हेल्थ 75:25 (केंद्रीय मानकों के तहत यह अनुपात 90:10 का होना चाहिए)

Friday, March 12, 2010

उत्तराखंड के व्यंजनों का स्वाद चखेंगे मानसरोवर यात्री

- परोसी जाएगी चुड़कानी, भटिया व मडुवे की रोटी - केएमवीएन हर पड़ाव पर करेगा व्यवस्था पिथौरागढ़: कैलास मानसरोवर यात्रियों को इस वर्ष यात्रा के दौरान उत्तराखंड के व्यंजनों का स्वाद भी चखने को मिलेगा। कुमाऊं मंडल विकास निगम पर हर पड़ाव पर इन व्यंजनों की व्यवस्था करेगा। इसके लिए निगम ने मीनू तैयार कर लिया है। उल्लेखनीय है जून में कैलास मानसरोवर यात्रा 2010 शुरु हो जायेगी। यहां यात्रियों के लिए आवास व भोजन आदि की व्यवस्था कुमाऊं मंडल विकास निगम करता है। यात्री निगम के पर्यटक आवास गृहों में रुकते हैं और यहीं उनके लिए भोजन की व्यवस्था रहती है। इस वर्ष निगम ने कैलास मानसरोवर यात्रा पर आने वाले यात्रियों को उत्तराखंड के विशिष्टï व्यंजन परोसने का निर्णय लिया है। पिथौरागढ़ आवास गृह के प्रबंधक दिनेश गुुरुरानी ने बताया कि इस वर्ष यात्रा पर आने वाले यात्रियों को निगम चुड़कानी, भटिया व मंडुवे की रोटी आदि परोसेगा। उन्होंने कहा इससे न सिर्फ उत्तराखंडी व्यंजनों का प्रचार-प्रसार होगा, बल्कि यात्रियों को नया स्वाद भी चखने को मिलेगा। उन्होंने बताया कि निगम ने इसके लिए तैयारियां भी शुरु कर दी हैं। यात्रा की तैयारियों के लिए नौ मार्च को पिथौरागढ़ में बैठक होनी हैं। इस बैठक में कई अन्य निर्णय भी लिये जायेंगे।

सृजन के संघर्ष में उत्तराखंड की मातृशक्ति

-सूबे की पंचायतों में पचास फीसदी से अधिक भागीदारी -आज राज्य में करीब 60 फीसदी से ज्यादा महिलाएं साक्षर -जीवन के हर क्षेत्र में कामयाबी की कहानी गढ़ रहीं उत्तराखंड की महिलाएं देहरादून,-'आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दोÓ 'फूल नहीं चिंगारी है उत्तराखंड की नारी हैÓ। जरा याद कीजिए उत्तराखंड आंदोलन के दौर को, जब गांव, शहर, घाटियां ऐसे ही नारों से गूंज रहे थे और इन्हें स्वर दे रही थी उत्तराखंड की स्त्री शक्ति। यह किसी से छिपा नहीं है कि मातृशक्ति के संघर्ष के बूते ही उत्तराखंड का सपना साकार हो सका। राज्य प्राप्ति के बाद भी महिलाएं चुप नहीं बैठी हैं। उन्होंने उत्तराखंड को सरसब्ज बनाने का बीड़ा उठा लिया है। आज सूबे की पंचायतों में पचास फीसदी से अधिक भागीदारी कर वे अहसास करा रही हैं कि उन्हें अपने उत्तराखंड गांवों के विकास की अब भी उतनी ही चिंता है, जितनी की राज्य निर्माण से पहले थी। न सिर्फ पंचायत में बल्कि हर क्षेत्र में वह सकारात्मक पहल के लिए आगे बढ़ रही हैं। यह अलग बात है कि शहरी क्षेत्रों में यह रफ्तार ज्यादा है, मगर पहाड़ी इलाकों में भी धीरे-धीरे जागरूकता बढऩे लगी है। चार दशक पहले के परिदृश्य को देखें तो उत्तराखंड में महिलाएं घर-परिवार और कृषि के दायित्वों तक ही सिमटी हुई थीं। मगर तब भी उनकी चिंता में समाज और पर्यावरण शामिल था। विश्वभर में ख्याति प्राप्त चिपको आंदोलन हो या नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन इनकी कमान गौरादेवी, टिंचरी माई जैसी साधारण ग्रामीण महिलाओं ने ही संभाली। यह बात और है कि आंदोलन के क्षेत्र के अलावा उद्यमिता, नौकरियों और राजनीति में तब तक उनकी खास मौजूदगी नहीं थी। धीरे-धीरे हालात बदले और यहां की महिलाओं ने समय के साथ चलने की ओर कदम बढ़ाए। शिक्षा के लिए जगह-जगह स्कूल कालेज खुले तो महिलाओं को भी इसका फायदा मिला। साक्षरता अभियान ने भी उन महिलाओं को साक्षर बनाने में बड़ी मदद की, जो स्कूल का मुंह नहीं देख पाई थीं। आज राज्य में करीब 60 फीसदी सेे ज्यादा महिलाएं साक्षर हैं। महिलाएं शिक्षित हुई तो उनके सपनों को भी पंख लगे। किसी ने पंचायत में सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई तो किसी ने सरकारी सेवाओं में। कहीं स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाओं ने कामयाबी की दास्तान लिखनी शुरू की तो कहीं वे हवा में उड़ान भरने से पीछे नहीं रहीं। सेना, अद्र्धसैनिक बल समेत अन्य सेवाओं के साथ ही वे खेल, कला संस्कृति, प्रशासन यानी हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। वर्ष 2008 में सूबे में महिलाओं के लिए पंचायतों में पचास फीसदी आरक्षण की व्यवस्था के बाद तो उन्होंने इससे कहीं आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारी बखूबी संभाली है। वे अब गांवों के विकास पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। कई जगह उन्होंने मिसाल भी कायम की है। जागरूकता की बात करें तो महिलाओं में यह शहरी क्षेत्रों मेें अभी अधिक हैै। वजह यह कि वहां सुविधाओं की कमी नहीं है। इसके उलट पहाड़ी क्षेत्रों में अभी जागरूकता ने वैसी रफ्तार नहीं पकड़ी है, जैसी शहरी इलाकों में हैं। ऐसा नहीं है कि पर्वतीय क्षेत्रों से महिलाएं आगे न आ रही हों, आ रही हैं, मगर रफ्तार कम है। लेकिन, जैसे-जैसे सुविधाओं का विस्तार हो रहा है, वैसे-वैसे इसमें और तेजी आएगी।

विक्टोरिया क्रास विजेता के गांव को विकास की दरकार

-कफारतीर गांव को नहीं जोड़ा जा सकता है मोटरमार्ग से -स्वीकृत पांच मोटरमार्गों को निर्माण कार्य अधर में -आरपार की लड़ाई लडऩे को ग्रामीणों ने गठित की समिति गोपेश्वर (चमोली) जिसके पराक्रम और शौर्य को ब्रितानी हुकूमत ने भी सलाम ठोका, ऐसे भारतीय वीर की जन्मस्थली आजाद भारत में सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रही है। उपेक्षा का आलम यह है कि इस वीर सपूत के परिजनों व वंशजों को अब मोटरमार्ग के निर्माण की मांग को लेकर आगामी एक अप्रैल से हाइवे जाम करने का निर्णय लेना पड़ा। बात हो रही है विक्टोरिया क्रास पदक से सम्मानित सूबेदार स्वर्गीय दरबान सिंह की जन्मस्थली कफारतीर (पटटी कड़ाकोट विकासखंड नारायणबगड़) की। दरबान सिंह का जन्म नवंबर 1887 में कफारतीर गांव में हुआ था। मात्र सोलह वर्ष की आयु में ही वह वर्ष 1903 में लैंसडौन जाकर फौज में भर्ती हो गए थे। प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ होने से पूर्व उन्हें नायक पद पर पदोन्नति मिली और वे वर्ष 1914 में 1/39वीं गढ़वाल राइफल बटालियन के साथ फ्रांस की रणभूमि में भेजे गए। विश्व युद्ध में अद्वितीय पराक्रम का परिचय देकर उन्होंने अपनी टोली के सहयोग से न सिर्फ कई जर्मन सैनिकों को मौत के घाट उतारा, बल्कि जर्मनी के कब्जे से एक महत्वपूर्ण टोली को भी मुक्त कराया। इस असाधारण शौर्य प्रदर्शन पर अंग्रेजी सरकार ने उन्हें विक्टोरिया क्रास पदक से सम्मानित किया था। आश्चर्य की बात है कि जिस वीर सपूत दरबान सिंह के असाधारण पराक्रम का लोहा अंग्रेजों ने भी माना, स्वतंत्र भारत में उनकी जन्मस्थली कफारतीर के विकास को तवज्जो नहीं दी जा रही है। उपेक्षा इस कदर है कि आज तक कफारतीर को मोटर मार्ग की सुविधा से नहीं जोड़ा गया है। लंबे समय से मोटरमार्ग की मांग कर रहे ग्रामीणों के सामने अब आंदोलन के सिवाय कोई चारा शेष नहीं रह गया है। आंदोलन के लिए गठित भारत स्वाभिमान उपसमिति के सचिव बलवंत सिंह नेगी 'बेचैनÓ का कहना है कि कफारतीर को सड़क सुविधा से जोडऩे के लिए वर्ष 1958 से अब तक चारों दिशाओं से पांच मोटरमार्ग स्वीकृत हो चुके हैं, लेकिन इन सबका निर्माण कार्य अधूरा पड़ा हुआ है, जिससे अब तक विक्टोरिया क्रास दरबान सिंह का गांव यातायात सुविधा से वंचित है। उन्होंने कहा कि मोटरमार्ग की मांग को लेकर क्षेत्र के लोगों ने एक समिति गठित की है, जिसके निर्देशन में आरपार की लड़ाई लड़ी जाएगी। आन्दोलन के तहत आगामी एक अप्रैल से सोनला के पास ऋषिकेश- श्रीबदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर अनिश्चितकालीन जाम लगाया जाएगा।

विवाह होने के 90 दिन के भीतर होगा पंजीकरण

- सदन में विवाह पंजीकरण व प्रवेश कर विधेयक पेश देहरादून, राज्य में विवाह पंजीकरण अनिवार्य होगा और इसके लिए पति उत्तरदायी रहेगा। पंजीकरण के लिए नवविवाहित को 90 दिन का समय मिलेगा। सरकार ने आज सदन में विवाह पंजीकरण तथा प्रवेश कर विधेयक पेश किए हैैं। विवाह पंजीकरण विधेयक से बाल विवाह पर प्रतिबंध, द्विविवाह अथवा बहुपत्नीत्व पर अंकुश ही नहीं लगेगा, बल्कि पति से भरण-पोषण, संतान की सुरक्षा, विधवाओं के विरासत के दावे, पत्नियों का परित्याग आदि के मसले भी हल हो सकेंगे। विवाह रजिस्ट्रेशन के लिए पति उत्तरदायी रहेगा। इसके लिए स्थानीय निबंधक की नियुक्ति होगी। विवाह पंजीकरण रजिस्टर जनसाधारण के निरीक्षण के लिए खुला रहेगा। अरजिस्ट्रीकृत विवाह को कानूनी मान्यता नहीं होगी। यदि कोई मिथ्या कथन करता है तो दोष सिद्ध होने पर उस पर जुर्माना लगाया जाएगा। विवाह पंजीकरण की सूचना मिलने पर रजिस्टर में विवरण भरा जाएगा और जिला निबंधक विवाह प्रमाण पत्र जारी करेगा। प्रवेश कर विधेयक के जरिए अब किसी करदाता द्वारा स्थानीय क्षेत्र में प्रवेश कर का भुगतान करने के बाद दोबारा प्रवेश कर की देयता नहीं होगी। प्रवेश कर की राशि में ऐसे मामलों में छूट दी जाएगी, जहां वैट की देयता हो।

धारावाहिक 'जमुनिया में अवध ठाकुर बने मनमोहन

राखी के स्वयंवर से 'जमुनिया सीरियल तक पहुंचे मनमोहन जमुनिया बनी भावना खत्री अल्मोड़ा की रहने वाली ऋषिकेश,: राखी के स्वयंवर में टॉप फाइव में पहुंच कर अभिनय की छाप छोडऩे वाले मनमोहन तिवारी अब एनडीटीवी इमेजिन के नए धारावाहिक 'जमुनियाÓ में अवध ठाकुर की मुख्य भूमिका में नजर आएंगे। धारावाहिक के आठवें एपीसोड में मनमोहन की छोटे पर्दे पर एंट्री होगी। मूलतया ऋषिकेश के रहने वाले मनमोहन तिवारी अभिनय की दुनिया में अब परिचय के मोहताज नहीं हैं। 'राखी के स्वयंवर में दमदार प्रस्तुति देने वाले मनमोहन को एनडीटीवी इमेजिन ने हाथोहाथ लिया है। मनमोहन राखी के स्वयंवर में काम करने वाले एकमात्र ऐसे कलाकार रहे हैं, जो राहुल के स्वयंवर में सेलिब्रेटी गेस्ट के रूप में नजर आए। अब इमेजिन पर नए धारावाहिक 'जमुनिया में मनमोहन का नया रूप नजर आएगा। बियांड ड्रीम्स प्रोडक्शन हाउस के बैनर तले निर्माता यश पटनायक द्वारा बनाए गए इस धारावाहिक में मनमोहन तिवारी गजराज ठाकुर (मोहन जोशी) के भतीजे अवध ठाकुर के रूप में नजर आएंगे। धारावाहिक में बिगड़ैल हंसाने वाला अवध ठाकुर राजा बाबू में गोविंदा और राम लखन में अनिल कपूर की तर्ज पर नजर आएगा। सोमवार से शुक्रवार तक चलने वाले इस धारावाहिक में आठवें एपीसोड में अवध ठाकुर यानी मनमोहन तिवारी की एंट्री ढोल-नगाड़ों के बीच रंग-गुलाल उड़ाते हुए होगी। उत्तराखंड के लिए एक अच्छी बात यह है कि इस सीरियल में अवध ठाकुर का मेन किरदार उत्तराखंड के मनमोहन निभा रहे हैं तो जमुनिया की भूमिका में अल्मोड़ा की भावना खत्री नजर आएंगी। भावना ने इससे पूर्व देश में निकला होगा चांद सीरियल में भी काम किया है। इस सीरियल में जमुनिया का विवाह अवध ठाकुर के छोटे भाई से होता है। एनडीटीवी इमेजिन पर दुबारा चांस मिलने से काफी खुश मनमोहन तिवारी का कहना है कि वह जल्द ही मई में एक नए रियलिटी शो में नजर आएंगे। उन्होंने इस उपलब्धि को उत्तराखंड की भूमि और मां गंगा का सम्मान बताया।