Thursday, February 25, 2010

- दार्जिलिंग में उत्तराखंड के हीरे की चमक

-कोटद्वार निवासी वैज्ञानिक उमेश द्विवेदी ने बदली प. बंगाल व सिक्किम के किसानों की तकदीर -घातक वनस्पति यूपेटोरियम एडीनोफोरम को बहु उपयोगी बनाया कोटद्वार====== उमेश द्विवेदी, एक ऐसा नाम जो शायद उत्तराखंड के लिए बड़ा नहीं है, लेकिन पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग के अलावा यह शख्स सिक्किम के किसानों के बीच खासा लोकप्रिय है। हो भी क्यों नहीं, आखिर यही वह शख्स है, जिसने इन राज्यों के किसानों को न सिर्फ घातक वनस्पति यूपेटोरियम एडीनोफोरम (उत्तराखंड में काला खैड़ व काला बांस के नाम से प्रसिद्ध) से निजात दिलाकर उनकी कृषि भूमि को बचाया, बल्कि इस वनस्पति से जैविक खाद तैयार कर हजारों ग्रामीणों को रोजगार से भी जोड़ा। नेपाल, भूटान व पूर्वोत्तर राज्यों के हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती बना यूपेटोरियम एडीनोफोरम उत्तराखंड में भी जड़े फैलाने लगा है। मेक्सिको मूल के इस जंगली हानिकारक पौधे के बीज अमेरिका से आयतित गेहूं के साथ भारत पहुंचे थे। साठ के दशक में पूर्वोत्तर राज्यों के साथ ही पूर्वी नेपाल में इस खरपतवार ने वन भूमि, चारागाहों, खेतों व चाय बागानों पर अपना आधिपत्य कर दिया। माना जाता है कि पूर्वोत्तर राज्यों में 'वनमाराÓ के नाम से कुख्यात यह खरपतवार एक्सीडेंटल ट्रांसपोर्ट के जरिए उत्तराखंड पहुंचा व अपनी प्रकृति के मुताबिक, यहां भी वन व काश्त भूमि पर फैलना शुरू हो गया। उत्तराखंड में इसे काला खैड़, काला बांस, उग्ल्या घास जैसे नामों से जाना जाता है। हरा व कोमल होने के बावजूद जानवर इस पौधे को खाना पसंद नहीं करते, इसे जलाया भी नहीं जा सकता। अलबत्ता, गांवों में किसी व्यक्ति को चोट लगने पर इसकी टहनियों को पीस कर घाव पर लगाया जाता है क्योंकि इससे खून बहना बंद हो जाता है। पर्यावरण व आर्थिक दृष्टि से अनुपयोगी होने के बावजूद 'वनमाराÓ के इसी गुण ने पर्यावरणविद् व वैज्ञानिक उमेश द्विवेदी को अपनी ओर आकर्षित किया। मूल रूप से कोटद्वार निवासी उमेश द्विवेदी वर्तमान में दार्जिलिंग में निवास करते हैं व इनवायरनमेंट प्रोटेक्शन सोसायटी (ईपीएस) के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कार्य कर रहे हैं। श्री द्विवेदी के मुताबिक 'वनमाराÓ में एंटीसेप्टिक गुण तो है, लेकिन यह अन्य वनस्पतियों के लिए घातक है। उन्होंने बताया कि इस वनस्पति ने प्रसार के मामले में लैंटाना को भी पीछे छोड़ दिया है। हिमालय पर्यावरण के मुख्य सचिव सपन सेन के साथ कई वर्ष तक इस वनस्पति पर कार्य करने के बाद अंतत: श्री द्विवेदी ने 'वनमाराÓ से जैविक खाद तैयार की, जिसका आज पश्चिम बंगाल में बृहद स्तर पर उपयोग हो रहा है। इसके अलावा 'वनमाराÓ से एंटीसेप्टिक व कागज भी बनाया जा रहा है। श्री द्विवेदी बताते हैं कि सिक्किम व दार्जिलिंग में 'वनमाराÓ लघु उद्योग का रूप ले चुका है। ग्रामीण 'वनमाराÓ को एकत्र कर स्वयं जैविक खाद सहित अन्य उत्पाद तैयार कर उसका विपणन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनका सपना उत्तराखंड में भी 'वनमाराÓ से लोगों की आर्थिक मजबूत करना चाहते हैं। इसके लिए उनकी ओर से कई मर्तबा उत्तराखंड शासन को प्रस्ताव भी दिए गए, लेकिन शासन इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। मुख्य वन संरक्षक (गढ़वाल) डीवीएस खाती ने भी स्वीकारा कि यूपेटोरियम एडीनोफोरम पर्यावरण के लिए बेहद घायत साबित हो रही है। उन्होंने कहा कि यदि श्री द्विवेदी उत्तराखंड में भी यूपेटोरियम एडीनोफोरम पर कार्य करना चाहते हैं, तो यह प्रदेश के लिए सौभाग्य की बात होगी।

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