Thursday, February 25, 2010

अमानउल्ला खां की देन है बैठकी होली

1850 में रामपुर से अल्मोड़ा आए थे महान कलाकार कुमाऊंनी बैठकी होली के वरिष्ठ गायक शिवचरण पांडे से बातचीत अल्मोड़ा: कुमाऊं की बैठकी होली की समृद्ध व वैभवशाली शुरूआत अल्मोड़ा से हुई है। इस नगरी को यदि बैठकी होली की गंगोत्री कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यह कहना है परंपरागत होली गायकी के 76 वर्षीय वरिष्ठ कलाकार शिवचरण पांडे का। पूछने पर उन्होंने बताया कि अल्मोड़ा में 1850-60 के दशक में रामपुर के महान संगीतज्ञ उस्ताद अमानउल्ला खां की ही देन है कि यहां अपनी विशिष्ट पहचान व चलन के साथ बैठकी होली की शुरूआत हुई है। श्री पांडे बताते हैं कि बैठकी होली में जो चांचर ताल का चलन है यह भी उस्ताद अमानउल्ला खां का ही प्रसाद है। उन्होंने बताया कि जिस दौर में अमानउल्ला खां ने बैठकी होली का बीजारोपण किया तब गाने-बजाने को बहुत महत्व नहीं दिया जाता था। पांडे जी बताते हैं कि उस दौर में रामप्यारी नामक गणिका थी, जिन्होंने इस परंपरा को बढ़ने में सहायता की। अल्मोड़ा के जाने-माने होली गायक शिव लाल वर्मा ने रामप्यारी से ही बैठकी का अंदाज सीखा। मौजूदा दौर में होली गायकी में आए बदलाव पर पूछने पर उनका कहना था कि अमानउल्ला खां से चली यह परंपरा यूं तो आज तक अपने स्वरूप को बरकरार रखे हुए है। लेकिन कुछ लोग नकल करने वाले ऐसे हैं जिन्होंने इसको भटका दिया है। हालांकि उनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। हाल के दौर के होली गायकी में अपना ऊंचा मुकाम बनाने वाले तारा प्रसाद पांडे तारी मास्साब का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वह तो अपने फन के पुरोधा थे, लेकिन कुछ लोग उनकी नकल कर वैसा तो नहीं कर पाते बिगाड़ जरूर देते हैं। शिवचरण पांडे होली गायक ही नहीं एक अच्छे होली के गीतों के रचयिता भी हैं। उनके लिखे चार गीत हर होली गायक की जुबान पर हैं। पूछने पर वह बताते हैं कि बैठकी होली में तुलसी, कबीर, मीरा, सूर के पद तो गाए ही जाते हैं, इसके अतिरिक्त भी चारु चन्द्र पांडे, महेशानंद गौड़ की रचनाएं भी शामिल हैं। पुराने होली गायकों का जिक्र करते हुए बताते हैं कि पिछले दौर में गांगीथोक, चन्द्र सिंह नयाल, भगवान सिंह नयाल, मोहन सिंह, गुलाम उस्ताद, ललि उस्ताद, मोहन रईस, पूरन चन्द्र पांडे, जवाहर लाल साह, मोती राम उस्ताद, उदय लाल साह नेता, रामलीला कलाकार उदय लाल साह जैसे होली गायक थे। जिनका अपना अलग अंदाज, अलग ठाट था। नई पीढ़ी को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि वह बैठकी होली के पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखें, तभी हमारी पहचान कायम रहेगी। यदि हम इसको बिगाड़ेंगे तो होली के स्वरूप को नहीं बल्कि अपनी पहचान को बिगाड़ रहे होंगे।

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