Saturday, February 27, 2010

सहकारिता गढ़ रही महिलाओं की कामयाबी की कहानी

-'रवाईंज नेचर प्योरÓ और 'स्विच आनÓ ब्रांड के जैविक उत्पाद विभिन्न प्रदेशों में चमक बिखेर रहे -सरकार महिलाओं को मदद दे तो सफल उद्यमी साबित हो सकती है, पहाड़ की महिलाएं- pahar1- उत्तरकाशी की रवाईं घाटी के सुदूरवर्ती कालेश्वर गांव की 45 वर्षीय दमयंती देवी जैसी उत्तराखंड में सैकड़ों महिलाएं हैं, जो सहकारिता के जरिए लहसुन, अदरक, मिर्च और मिक्स अचार, जैम, चटनी, बडिय़ां बनाकर उद्यमिता की ंिमसाल बन चुकी हैं। दमयंती देवी भले ही अनपढ़ हों, मगर आज प्रसंस्करण केेंद्र में मशीन चलाने और बैंक से जुड़े काम भी बखूबी कर लेती हैं। सहकारिता ने उनमें गजब का आत्मविश्वास पैदा किया है। बैंक का हर कर्मचारी उन्हें पहचानता है। आज उत्तरकाशी जिले में करीब 22 स्वयं सहायता समूहों की 250 महिलाएं कोआपरेटिव के जरिए अचार,जैम, जैली, फलों की टॉफी उत्पादन के व्यवसाय से जुड़ी हैं। दमयंती देवी एक सीजन में 14,000 रुपये तक कमा लेती हैं। उनसे प्रेरित होकर लोगों ने सब्जियां उगानी शुरू कर दी हैं। फलोत्पादन पर भी ध्यान दिया जाने लगा है। आज दमयंती देवी खुद गांव की महिलाओं बच्चियों को लहसुन, अदरक उगाने के गुर सिखाती हैं। 'रवाईंज नेचर प्योरÓ और 'स्विच आनÓ ब्रांड नाम से कोआपरेटिव के जैविक उत्पाद उत्तराखंड समेत दिल्ली, गुजरात, हिमाचल प्रदेश आदि में न सिर्फ चमक बिखेर रहे, बल्कि इन्हें खूब पसंद किया जा रहा है। हिमालयन एक्शन रिसर्च सेंटर (हार्क) के सचिव महेंद्र सिंह कुंवर का कहना है कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की अहम भूमिका तो है, लेकिन निर्णय लेने में उनकी भागीदारी कम है। इसी को ध्यान में रखते हुए हार्क ने 2002 में महिलाओं को संगठित करने, उनमें क्षमता विकास करने, समूह प्रबंधन, विवाद निपटारे, निर्णय लेने वित्तीय प्रबंधन, सूक्ष्म उद्यम शुरू करने और विपणन दक्षता पैदा करने की योजना शुरू की। गांव के लोगों को उद्यमिता के लिए पे्ररित किया गया। शुरुआत में एक अकेले समूह ने अचार बनाना शुरू किया। जब हर सदस्य को 500-500 रु. का मुनाफा हुआ तो उन्हें स्थानीय फसलों के उत्पादन और अतिरिक्त उत्पाद से नए उत्पाद बनाने को प्रेरित किया गया। अब समस्या थी मार्केटिंग की। वहां उन दिनों पुरुषों का ही एक सहकारी संघ था, जो फल-सब्जी उत्पादन व वितरण का काम करता था। अब महिलाओं का अलग समूह बनाने की योजना बनाई गई। नवंबर 2003 में 13 स्वयं सहायता समूहों की 160 महिलाओं ने 500-500 रुपये का योगदान कर हार्क माउंटेन वीमन मल्टीपरपज ऑटोनोमस कोऑपरेटिव गठित किया। कोआपरेटिव के सामने उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने की चुनौती थी, जिसमें हार्क ने मदद की। श्री कुंवर का कहना है कि अगर सरकार महिलाओं को मदद दे तो पहाड़ की महिलाएं सफल उद्यमी साबित हो सकती है, क्योंकि उनमें जोखिम उठाने की हिम्मत पुरुषों से ज्यादा है। कोआपरेटिव की नजीर तो सामने है ही। उत्तराखंड राज्य सहकारी संघ के अध्यक्ष उमेश त्रिपाठी का कहना है कि प्रदेश में करीब 800 सहकारी संघ व समितियां है। उत्तरकाशी की महिलाओं का उदाहरण सहकारिता की कामयाबी की मिसाल है। -

न्यायमूर्ति निर्मल यादव बनीं उत्तराखण्ड हाईकोर्ट की जज

-मुख्य न्यायमूर्ति खेहर ने दिलायी पद व गोपनीयता की शपथ नैनीताल: पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट से स्थानांतरित न्यायमूर्ति निर्मल यादव ने गुरुवार को उत्तराखण्ड हाईकोर्ट में नवें जज के रूप में शपथ ग्रहण की। हाईकोर्ट में दोपहर बाद आयोजित सादे समारोह में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने जस्टिस निर्मल यादव को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस अवसर पर न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल, न्यायमूर्ति पीसी पंत, न्यायमूर्ति धर्मवीर, न्यायमूर्ति वीके बिष्टï, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया समेत महाविधवक्ता एसएन बाबुलकर, रजिस्ट्रार जनरल रवीन्द्र मैठाणी, रजिस्ट्रार प्रशांत जोशी, हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष बीडी कांडपाल समेत बार एसोसिएशन के अन्य पदाधिकारी व अधिवक्ता मौजूद थे। शपथ ग्रहण समारोह के पश्चात चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने अन्य न्यायाधीशों एवं अधिवक्ताओं से उनका परिचय कराया। न्यायमूर्ति निर्मल यादव ने वर्ष 1975 में पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट में वकालत प्रारम्भ की। बाद में उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय में अतिथि प्रवक्ता के रूप में अध्यापन कार्य किया। 1986 में उनका चयन अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर हुआ। उन्होंने पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट में रजिस्ट्रार के रूप में मार्च 2000 से जनवरी 2002 तक कार्य किया। 5 नवम्बर 04 को उनकी नियुक्ति पंजाब हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में हुई।

- देश की श्रेष्ठ मेडिकल लाइब्रेरी गढ़वाल में

-श्रीनगर मेडिकल कालेज की लाइब्रेरी में नौ हजार से अधिक अपडेट किताबें -देश-विदेश करीब दो सौ जर्नल्स भी उपलब्ध श्रीनगर गढ़वाल, (पौड़ी) : प्रदेश का पहला राजकीय मेडिकल कालेज अपनी स्थापना के तीन साल के भीतर देश की श्रेष्ठ मेडिकल लाइब्रेरी बनकर उभरा है। लाइब्रेरी में लगभग दो सौ देशी- विदेशी जर्नल्स उपलब्ध हैं। इसके अलावा नौ हजार किताबों के भंडार के साथ यह लाइब्रेरी देश के बड़े मेडिकल कालेजों को टक्कर देने को तैयार हैं। श्रीनगर स्थित मेडिकल कालेज की स्थापना तीन वर्ष पूर्व हुई थी। कालेज के प्राचार्य डा. विपेंद्र सिंह चोपड़ा ने बताया कि लाइब्रेरी में 142 विदेशी जर्नल्स के साथ 18 भारतीय व 41 अन्य प्रतिष्ठित जर्नल्स भी लाइब्रेरी में उपलब्ध हैं। विश्व प्रतिष्ठित नेचर, ब्रिटिश मेडिकल जर्नल्स लेनसेट सहित अन्य कई उच्चतम रेटिंग के लेटेस्ट जर्नल भी लाइब्रेरी में मौजूद हैं। खास बात यह है कि इन सभी जर्नल्स के दस साल पुराने वाल्यूम्स भी उपलब्ध हैं। प्राचार्य डा. चोपड़ा ने बताया कि 21 महत्वपूर्ण रिसर्च जर्नल्स तो उन्होंने खुद अपनी ओर से लाइब्रेरी को डोनेट किए हैं। इसके अलावा मेडिकल छात्रों के लिए लगभग नौ हजार अपडेट मेडिकल किताबें भी लाइब्रेरी में हैं, जिनमें से कई किताबों का मूल्य प्रति पुस्तक 19 हजार रुपये से भी अधिक है। प्राचार्य डा. चोपड़ा ने बताया कि मेडिकल कालेज के सीनियर फैकल्टी सदस्यों ने भी कालेज को पचास पुस्तकें दी हैं। डा. चोपड़ा ने बताया कि छात्रों को अपडेट जानकारियां देने को विशेष थेरेपेटिक बुलेटिन भी शुरू किया गया है। इसके अलावा फैकल्टी के लिए रेफरेंस मेडिकल बुक्स को भी लाइब्रेरी में रखा गया है। अन्य मेडिकल कालेजों में एमडी, एमएस जैसे पीजी पाठ्यक्रमों के साथ ही सुपरस्पेशलिटी पाठ्यक्रम भी पिछले कई सालों से संचालित हो रहे हैं। जबकि श्रीनगर मेडिकल कालेज में अभी एमबीबीएस द्वितीय वर्ष का पहला बैच ही चल रहा है। इतनी अल्प अवधि में मेडिकल लाइब्रेरी को अपडेट करने के लिए प्राचार्य डा. विपेन्द्र चोपड़ा की प्राथमिकता भी रंग लायी। प्राचार्य डा. चोपड़ा लगभग प्रतिदिन लाइब्रेरी के कार्यों का अवलोकन भी करते हैं।

सुप्रसिद्ध पूर्णागिरि मेला दो मार्च से

-मांस, मंदिरा व पालीथिन पर पूर्ण प्रतिबंध, ढाई माह तक चलेगा मला चम्पावत:उत्तर भारत का सुप्रसिद्घ मां पूर्णागिरि मेला इस बार दो मार्च से 15 मई तक चलेगा। मेले में मांस, मंदिरा व पालीथिन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। सुरक्षा बंदोबस्तों केे तहत ठूलीगाड़, भैरवमंदिर और कालीमंदिर में पुलिस चैकपोस्टें होंगी। पटवारियों को भी मेला क्षेत्र में तैनात किया जाएगा। शारदा नदी के तट पर गोताखोर पुलिस तैनात होगी। जिला पंचायत सभागार में जिपं अध्यक्ष प्रेमा पांडेय की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया। दो मार्च से 15 मई तक चलने वाले इस मेले में बूम से पूर्णागिरि मंदिर तक मेला क्षेत्र घोषित है। अपर मुख्य अधिकारी राजेश कुमार मेला अधिकारी व टनकपुर के एसडीएम जेएस नगन्याल मेला मजिस्ट्रेट होंगे। जल महकमा मेला स्थल में पेयजल, स्नानागार व शौचालयों की व्यवस्था करेगा। रोडवेज यात्रियों के लिए हर आधे घंटे में नियमित सेवा देगा। निजी टैक्सियों और केमू का संचालन भी होगा। भीड़ पर नियंत्रण को बैरियर लगेंगे और चिकित्सा व्यवस्था के लिए डाक्टर, फार्मेसिस्ट व एंबुलेंस तैनात होंगी। सीडीओ टीएस बृजवाल ने मेले की व्यवस्थाओं को चाक चौबंद रखने वाले विभागों से कहा कि वह जिम्मेदारी के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करें। बैठक में डीएफओ एके गुप्ता, पर्यटन अधिकारी जेसी उपाध्याय, जिला युवा कल्याण अधिकारी दिनेश पांडेय, जल संस्थान के ईई संजीव मिश्रा, विद्युत नवीन मिश्रा, डिप्टी सीएमओ डा. आरके जोशी, जिला आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी सुरेश उपे्रती, एआरएम खुशी राम, आबकारी निरीक्षक दुर्गेश्वर प्रसाद त्रिपाठी आदि अधिकारी मौजूद थे।

Thursday, February 25, 2010

महाकुंभ: बसने लगी औघड़ों की दुनिया

- -श्मशान को ही बना लिया है अपना घर -आदमियों को देख हो जाते हैं लुप्त, वीरान क्षेत्र है पसंद -करीब चार सौ साल से चली आ रही है परंपरा हरिद्वार: उन्होंने श्मशान को ही अपना घर बना डाला। यहीं साधना भी होती है। आदमियों से जैसे चिढ़ हो, हां मृत आत्माओं से साक्षात्कार करने की अनोखी लगन है। इसका दावा भी करते हैं। यूं कहें कि किसी अजूबे से कम नहीं है औघड़ समुदाय। इनका मूड हो तो खूब बतियाएं अन्यथा सिर पटक लो, मुंह से एक शब्द भी नहीं निकलेगा। फिलहाल महाकुंभ में औघड़ों की उपस्थिति भी दर्ज हो गई है। औघड़ समुदाय की दुनिया ही अलग है, लेकिन पवित्र उद्देश्य समाज कल्याण ही है। सांसारिक जीवन से दूर हैं। तपस्या को ही जीवन का लक्ष्य बनाया है इस समुदाय ने। इनकी तपस्या मठ, मंदिरों में नहीं बल्कि श्मशान पर होती है। कुंभ की आस्था औघड़ समुदाय के राष्ट्रीय सरबरा छिन्नमस्तिका पीठाधीश्वर औघड़ महामदलेश्वर बाबा हरे राम ब्रह्मïचारी जी महाराज उर्फ बोरिया बाबा को खींच ले आई। इनकी दुनिया ही ऐसी कि किसी से मिलना ही नहीं चाहते हैं, जरा सा आभास हुआ तो वीरान क्षेत्र में पहुंच जाएंगे। बस श्मशान पर कहीं दिख जाएंगे। हमें देखकर भी मानों लुप्त हो गए। कई दिन चक्कर काटे, लेकिन न अता ना पता। उम्र पूरी सौ साल हो चुकी है। आखिर एक दिन बोरिया बाबा से मुलाकात हो ही गई। काफी देर तक बोलने को राजी ही नहीं थे, लेकिन अचानक आंखों से आंसू छलके और कहने लगे कि बड़ा दुखी हूं इस दुनिया के दस्तूर से। किसी को किसी से मतलब ही नहीं है, हर जगह बस वैमनस्य ही छा रखा है। बोरिया बाबा बताते हैं कि झारखंड के हजारीबाग क्षेत्र में महज 10 साल की उम्र में काले लिबास में एक आदमी आया था और मुझे उठा ले गया। उसने मुझे दीक्षा दी और मैने उसे गुरु माना। गुरु बाबा वैताली राम से करीब बारह साल तक दीक्षा ग्रहण की। गुरु जी के सानिध्य में ही करीब 35-40 साल पहले पूरे देश की पदयात्रा की। फिलहाल औघड़ समुदाय के बारे में बोरिया बाबा बताते हैं कि करीब चार सौ साल पहले से यह परंपरा चली आ रही है। ठीक से याद नहीं है, लेकिन बताते हैं कि बीस साल पहले गुरु जी के साथ नागपुर में एक अस्पताल में रक्तदान भी किया था। जीवन के बारे में बताते हैं कि हर रोज श्मशान पर जाकर साधना की जाती है। वहां विशेष मंत्र के जरिए मृत आत्माओं को बुलाया जाता है और उनसे साक्षात्कार भी किया जाता है। मंत्र के बारे में नहीं बताएंगे। मंत्र से श्मशान थामने में सप्ताह भर भी लग जाता है। फिर क्या होता है, बिल्कुल नहीं बताऊंगा। फिर बोले कि यहां कुंभ की आस्था खींच लाई है, लेकिन यहां भी दूर वीरान जंगलों व श्मशान में ही रहते हैं। इस बात का भी पता नहीं होता है कि कब कहां जाना है, लेकिन महादेव शिवशंकर की आराधना में ही लीन रहते हैं।

- महाकुंभ- हरिद्वार सरीखा कुंभ कहीं नहीं

-वर्ष 1915 में कुंभपर्व के दौरान कस्तूरबा के साथ हरिद्वार आए थे बापू -आध्यात्मिक उन्नयन के साथ ही राष्ट्रीय एकता के तार भी जोड़ता है कुंभ -आचार्य शंकर, स्वामी रामानंदाचार्य के अनुयायियों ने प्रदान किया कुंभपर्व को व्यावहारिक रूप हरिद्वार यूं तो कुंभपर्व प्रयाग, उज्जैन व नासिक में भी आयोजित होता है, लेकिन हरिद्वार कुंभ का अपना महत्व और इतिहास है। 5 अप्रैल 1915 को जब महात्मा गांधी बा (कस्तूरबा) के साथ हरिद्वार आए तो कुंभ के आयोजन को देखकर भाव-विभोर हो गए। उन्होंने अपने एक लेख में जिक्र किया कि 'मेरे लिए वह घड़ी धन्य थी, परंतु मैं तीर्थयात्रा की भावना से हरिद्वार नहीं गया था। पवित्रता आदि के लिए तीर्थ क्षेत्र में जाने का मोह मुझे कभी नहीं रहा। फिर भी मेरा ख्याल था कि सत्रह लाख यात्रियों में सभी पाखंडी नहीं हो सकते। यह कहा जाता था कि मेले में सत्रह लाख आदमी इक_े हुए थे। मुझे इस विषय में कोई संदेह नहीं था कि इनमें असंख्य लोग पुण्य कमाने के लिए और अपने को शुद्ध करने के लिए आए थेÓ। इसमें कोई संदेह नहीं कि कुंभ अनेकता में एकता के दर्शन कराता है। देश के विभिन्न प्रांतों से विविध भाषा-भाषी आध्यात्मिक उन्नयन के लिए इक_े होते हैं तो राष्ट्रीय एकता के तार जुड़ते हैं। यह ठीक है कि नासिक, उज्जैन, प्रयाग व हरिद्वार भले ही भारत की भौगोलिक एकता का परिचय न दे पाते हों, लेकिन इन स्थानों पर कुंभपर्व के दौरान एकत्र होने वाले श्रद्धालु अपने साथ अपनी-अपनी भूमि, तीर्थ, समाज व्यवस्था और सांस्कृतिक चेतना के माध्यम से विराट समानता के दर्शन अवश्य करा देते हैं। आचार्य शंकर और स्वामी रामानंदाचार्य ने संगठन और सामाजिक रूपांतरण के क्षेत्र में मध्यकाल में जो विराट कार्यक्रम बनाया, उनके अनुयायियों ने कुंभपर्व पर अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ उसे व्यावहारिक रूप प्रदान किया। शाही स्नान की शोभायात्राओं में उन्होंने भौतिक एवं आध्यात्मिक वैभव का प्रदर्शन कर आक्रांता शासकों से भयभीत हिंदू समाज को नैतिक एवं शारीरिक सुरक्षा प्रदान की। 1796 में पटियाला के राजा साहेब सिंह ने दस हजार घुड़सवारों के साथ शस्त्रबल पर सिख साधुओं को कुंभ स्नान का अधिकार दिलाया। दूसरी ओर पेशवाओं ने नागा संन्यासियों को उनके शस्त्र एवं शास्त्र पर समान अधिकार के कारण भरपूर सम्मान दिया। देखा जाए तो दुनिया के किसी भी मेले में इतने लोग एकत्र नहीं होते, जितने कि कुंभ में। मध्यकाल में संचार साधनों की व्यापक उपलब्धता न होने पर भी साधु-संतों की प्रेरणा से अपार जनसमूह एकत्र होता रहा और यहीं से समूचे राष्ट्र को उपयोगी संदेश दिए जाते रहे। भारत आने वाले विदेशी यात्रियों ह्वेनसांग (634 ईस्वी), शर्फुरुद्दीन (1398 ईस्वी), थॉमस कायरट (1608 ईस्वी), थॉमस डेनियल व विलियम डेनियल (1789 ईस्वी), थॉमस हार्डविक व डा.हंटर (1796 ईस्वी), विन्सेंट रेपर (1808 ईस्वी) व कैप्टन थॉमस स्किनर (1830 ईस्वी) आदि ने अपने संस्मरणों में हरिद्वार आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ का उल्लेख किया है। राजा रामदत्त लिखते हैं- 'भारतीय संस्कृति के मूल में जो परम सत्य निहित है, कुंभ मेला के मूल में भी उसी सत्य के दर्शन होते हैं। इसी कारण कुंभ इतने स्थिर और निश्चित रूप से चला आ रहा है। यह सच है कि कुंभ के लिए भीड़ जुटाने का कोई उद्यम नहीं होता, विज्ञापन की जरूरत नहीं पड़ती, निमंत्रण नहीं फिर भी धनी-निर्धन, छोटे-बड़े विरक्त और गृहस्थ लाखों की संख्या में 'हर-हर गंगेÓ का जयघोष करते हुए पर्व पर इक_े हो जाते हैंÓ।

- दार्जिलिंग में उत्तराखंड के हीरे की चमक

-कोटद्वार निवासी वैज्ञानिक उमेश द्विवेदी ने बदली प. बंगाल व सिक्किम के किसानों की तकदीर -घातक वनस्पति यूपेटोरियम एडीनोफोरम को बहु उपयोगी बनाया कोटद्वार====== उमेश द्विवेदी, एक ऐसा नाम जो शायद उत्तराखंड के लिए बड़ा नहीं है, लेकिन पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग के अलावा यह शख्स सिक्किम के किसानों के बीच खासा लोकप्रिय है। हो भी क्यों नहीं, आखिर यही वह शख्स है, जिसने इन राज्यों के किसानों को न सिर्फ घातक वनस्पति यूपेटोरियम एडीनोफोरम (उत्तराखंड में काला खैड़ व काला बांस के नाम से प्रसिद्ध) से निजात दिलाकर उनकी कृषि भूमि को बचाया, बल्कि इस वनस्पति से जैविक खाद तैयार कर हजारों ग्रामीणों को रोजगार से भी जोड़ा। नेपाल, भूटान व पूर्वोत्तर राज्यों के हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती बना यूपेटोरियम एडीनोफोरम उत्तराखंड में भी जड़े फैलाने लगा है। मेक्सिको मूल के इस जंगली हानिकारक पौधे के बीज अमेरिका से आयतित गेहूं के साथ भारत पहुंचे थे। साठ के दशक में पूर्वोत्तर राज्यों के साथ ही पूर्वी नेपाल में इस खरपतवार ने वन भूमि, चारागाहों, खेतों व चाय बागानों पर अपना आधिपत्य कर दिया। माना जाता है कि पूर्वोत्तर राज्यों में 'वनमाराÓ के नाम से कुख्यात यह खरपतवार एक्सीडेंटल ट्रांसपोर्ट के जरिए उत्तराखंड पहुंचा व अपनी प्रकृति के मुताबिक, यहां भी वन व काश्त भूमि पर फैलना शुरू हो गया। उत्तराखंड में इसे काला खैड़, काला बांस, उग्ल्या घास जैसे नामों से जाना जाता है। हरा व कोमल होने के बावजूद जानवर इस पौधे को खाना पसंद नहीं करते, इसे जलाया भी नहीं जा सकता। अलबत्ता, गांवों में किसी व्यक्ति को चोट लगने पर इसकी टहनियों को पीस कर घाव पर लगाया जाता है क्योंकि इससे खून बहना बंद हो जाता है। पर्यावरण व आर्थिक दृष्टि से अनुपयोगी होने के बावजूद 'वनमाराÓ के इसी गुण ने पर्यावरणविद् व वैज्ञानिक उमेश द्विवेदी को अपनी ओर आकर्षित किया। मूल रूप से कोटद्वार निवासी उमेश द्विवेदी वर्तमान में दार्जिलिंग में निवास करते हैं व इनवायरनमेंट प्रोटेक्शन सोसायटी (ईपीएस) के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कार्य कर रहे हैं। श्री द्विवेदी के मुताबिक 'वनमाराÓ में एंटीसेप्टिक गुण तो है, लेकिन यह अन्य वनस्पतियों के लिए घातक है। उन्होंने बताया कि इस वनस्पति ने प्रसार के मामले में लैंटाना को भी पीछे छोड़ दिया है। हिमालय पर्यावरण के मुख्य सचिव सपन सेन के साथ कई वर्ष तक इस वनस्पति पर कार्य करने के बाद अंतत: श्री द्विवेदी ने 'वनमाराÓ से जैविक खाद तैयार की, जिसका आज पश्चिम बंगाल में बृहद स्तर पर उपयोग हो रहा है। इसके अलावा 'वनमाराÓ से एंटीसेप्टिक व कागज भी बनाया जा रहा है। श्री द्विवेदी बताते हैं कि सिक्किम व दार्जिलिंग में 'वनमाराÓ लघु उद्योग का रूप ले चुका है। ग्रामीण 'वनमाराÓ को एकत्र कर स्वयं जैविक खाद सहित अन्य उत्पाद तैयार कर उसका विपणन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनका सपना उत्तराखंड में भी 'वनमाराÓ से लोगों की आर्थिक मजबूत करना चाहते हैं। इसके लिए उनकी ओर से कई मर्तबा उत्तराखंड शासन को प्रस्ताव भी दिए गए, लेकिन शासन इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। मुख्य वन संरक्षक (गढ़वाल) डीवीएस खाती ने भी स्वीकारा कि यूपेटोरियम एडीनोफोरम पर्यावरण के लिए बेहद घायत साबित हो रही है। उन्होंने कहा कि यदि श्री द्विवेदी उत्तराखंड में भी यूपेटोरियम एडीनोफोरम पर कार्य करना चाहते हैं, तो यह प्रदेश के लिए सौभाग्य की बात होगी।

-अग्नि नहीं भगवान बदरीनाथ के फेरों से होता है विवाह

-रुद्रप्रयाग जिले के निरवाली गांव में विवाह की अनोखी परंपरा -भगवान बदरीनाथ को आदिदेव मानते हैं ग्रामीण -बदरीनाथ जाते हुए आद्यगुरु शंकराचार्य ने इस गांव में किया था विश्राम रुद्रप्रयाग हिंदू विवाह संस्कार की परंपरा लगभग पूरे देश में एक सी हैं, जिसके तहत वर- वधु के अग्निवेदी के फेरे लेने के बाद विवाह संपन्न माना जाता है, लेकिन रुद्रप्रयाग जिले का एक गांव ऐसा है, जहां वेदी के फेरे नहीं लिए जाते। मान्यता है कि निरवाली नामक इस गांव बदरीनाथ जाते हुए आद्यगुरु शंकराचार्य ने विश्राम किया था। तब से गांव में विवाह के दौरान वर- वधु भगवान बदरीनाथ की मूर्ति के फेरे लेते हैं। रुद्रप्रयाग जनपद के अगस्त्यमुनि विकासखंड की ग्रामसभा धारकोट के निरवाली गांव में शादी की परंपरा अनोखी है। यहां पर सती ब्राह्मण निवास करते हैं। जहां देशभर में बिना वेदी के विवाह संपन्न होने की कल्पना तक नहीं की जा सकती, वहीं इस गांव में वेदी के स्थान पर भगवान बदरीनाथ की मूर्ति रखी जाती है, जिसे साक्षी मानकर वर- वधु फेरे लेते हैं। सदियों पुरानी यह परंपरा कब शुरू हुई इसका स्पष्ट पता तो नहीं चलता, लेकिन मान्यता है कि बदरीनाथ की ओर जाते हुए आद्यगुरु शंकराचार्य इस गांव में रुके थे। उन्हीं के निर्देशों के मुताबिक यह गांव भगवान बदरीनाथ की परंपराओं से जुड़ा हुआ है। गांव में आज भी भगवान बदरीनाथ का पौराणिक निशान मौजूद है। ग्रामीण टीकाप्रसाद सती बताते हैं कि विवाह समेत अन्य सभी समारोहों में इस निशान को भगवान बदरीनाथ के प्रतीक रूप में शामिल किया जाता है। उन्होंने बताया कि निशान की यात्रा भी आयोजित की जाती है, लेकिन इसे ले जाने वाले व्यक्ति को निशान के साथ रहने के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है। इतना ही नहीं, पूजा संपन्न होने तक वह अन्न ग्रहण भी नहीं कर सकता। श्री सती ने बताया कि गांव में स्थित भगवान बदरीनाथ की मूर्ति को कोई नहीं छू सकता। मूर्ति ले जाने वाले व्यक्ति को भी नहीं छुआ जाता। गांव के निवासी विजय प्रसाद सती, बलीराम सती, पारेश्वर दत्त सती बताते हैं कि ऋषिकेश से बदरीनाथ की ओर चले आद्यगुरु शंकराचार्य ने एक ही स्थान पर विश्राम किया था, वह है निरवाली गांव। यही वजह है कि इस गांव के लोग भगवान बदरीनाथ को अपना आदिदेव मानते हैं। वे बताते हैं कि आज भी गांव में शंकराचार्य के आगमन के निशान मौजूद हैं। उनके द्वारा स्थापित किया गया सूरजकुंड मंदिर भी गांव में है। -

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महर्षि लक्ष्मीबाइ

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महर्षि लक्ष्मीबाई व्यायाम मंदिर झांसी द्वारा दी जाने वाली व्यायाम रत्न की उपाधि को डीपीएड के समकक्ष मान्य ठहराते हुए उत्तराखंड सरकार को ऐसे डिग्रीधारी अभ्यर्थियों को सहायक अध्यापक (शारीरिक शिक्षा) के पद पर नियुक्ति देने हेतु विचार करने के निर्देश दिए हैं। याची संजय सिंह समेत अनेक व्यायाम रत्न डिग्री धारकों द्वारा हाईकोर्ट मेें एक याचिका दायर करते हुए कहा गया था कि उनके द्वारा वर्ष 2002 में सहायक अध्यापक (शारीरिक शिक्षा) हेतु आवेदन किया गया था, परन्तु सरकार द्वारा उनके आवेदन पर विचार नहीं किया गया और कहा गया कि व्यायाम रत्न की डिग्री डीपीएड के समकक्ष नहीं होती। याचिका कर्ताओं के अधिवक्ता द्वारा कोर्ट को बताया गया कि उक्त डिग्री डीपीएड के समकक्ष है, जिस पर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने याचिका को स्वीकार करते हुए सरकार को निर्देश दिया था कि वह याचिका कर्ताओं को सहायक अध्यापक शारीरिक शिक्षा के रूप में नियुक्त करने पर विचार करे। इधर उक्त आदेश के विरुद्ध सरकार द्वारा विशेष अपील दायर की गई। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने विशेष अपील की सुनवाई के बाद एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखते हुए विशेष अपील खारिज कर सरकार को निर्देश दिए कि वह याचिका कर्ताओं की नियुक्ति पर विचार करे। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर व न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की खंडपीठ में हुई।

वायु सेना में एयरमैनों की भर्ती रुद्रपुर में होगी

-एयर फोर्स के विंग कमांडर ने डीएम के साथ स्पोट्र्स स्टेडियम का लिया जायजा -कुमाऊं के युवाओं के लिए जून के तीसरे सप्ताह में होगी भर्ती रैली रुद्रपुर: भारतीय वायु सेना में एयरमैन के पदों पर भर्ती के लिए प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां तेज हो गई हैं। जून के तीसरे सप्ताह में आहूत भर्ती रैली के मद्देनजर विंग कमांडर ने जिलाधिकारी के साथ पीएसी, पुलिस लाइन व स्पोट्र्स स्टेडियम का दौरा भी किया। इसमें स्टेडियम को उपयुक्त मानते हुए व्यवस्थाएं दुरुस्त करने के निर्देश दिये गये। वायु सेना में एयरमैनों की भर्ती रैली को लेकर गुरुवार को कलेक्ट्रेट में अहम बैठक हुई। विंग कमांडर वीपी सिंह ने बताया कि पांच दिवसीय रैली में कुमाऊं क्षेत्र के 17 से 23 आयु वर्ग के प्रतिभागी भाग ले सकेंगे। इसके लिए शैक्षिक योग्यता विज्ञान वर्ग से इंटरमीडिएट उत्तीर्ण निर्धारित है। इधर विंग कमांडर ने जिलाधिकारी मोहन चंद्र उप्रेती के साथ पीएसी मैदान, पुलिस लाइन व स्पोर्ट्स स्टेडियम का भी दौरा किया। सर्वे बाद स्टेडियम को भर्ती रैली के लिए उपयुक्त पाया गया। जिलाधिकारी ने रैली के सफल आयोजन को प्रभारी अधिकारी कलेक्ट्रेट हेमंत वर्मा को समन्वयक नामित किया है। साथ ही रैली के लिए व्यवस्थाएं जुटाने तथा संबंधित अफसरों को समन्वय के निर्देश दिये गये हैं। उन्होंने कहा कि रैली के लिए प्रशासन सभी सुविधायें मुहैया करायेगा। इसके अलावा अपर पुलिस अधीक्षक अशोक भट्टï, एसडीएम सदर पीसी दुम्का, जिला क्रीड़ा अधिकारी वीके वर्मा तथा युवा कल्याण अधिकारी जीसी परगाईं को व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

हर जगह मिलेगी झंगोरे की खीर

पर्वतीय क्षेत्रों के व्यंजनों और जैविक फसलों को देश-दुनिया में मशहूर करने की पहल Pahar1- जल्द ही आपको अगर राजधानी देहरादून में देशी-विदेशी पर्यटक झंगोरे की खीर, फाणू, कफली, बाड़ी, गंजड़ू, धबड़ी, मंडुए की रोटी, रैम्वडि़, चुरक्याणी, ठठ्वाणी, भट्वाणी, भट का जौला जैसे स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेते दिखाई दिए तो अचरज न करें। सब कुछ ठीकठाक रहा तो प्रदेश में पहली बार ऐसे ग्रीन रेस्टोरेंट खुलेंगे। जहां पर्यटक मंडुआ, झंगोरा, कौणी, मक्का, कुट्टू, गहत, चौलाई, मास, रंयास और अन्य जैविक फसलों के स्थानीय व्यंजनों का लुत्फ उठा सकेंगे। उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद ने प्रदेश के कम मशहूर स्थानीय व्यंजनों को पर्यटकों के बीच लोकप्रिय करने का बीड़ा उठाया है। इस शुभ कार्य की शुरुआत के लिए परिषद ने पहले देहरादून को ही चुना है। ग्रीन रेस्टोरेंट स्थापित करने, और चलाने के लिए परिषद ने एक्सप्रेशन आफ इंटरेस्ट आमंत्रित की हैं। परिषद की वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी बिनीता शाह के मुताबिक अब तक ग्रीन रेस्टोरेंट के लिए चार आवेदन भी आ चुके हैं। उनका कहना है कि ग्रीन रेस्टोरेंट की अवधारणा उत्तराखंड के लिए कुछ नई है। परिषद की इन ग्रीन रेस्टोरेंट में लोगों को पूरी तौैर पर जैविक तरीके से उत्पादित फसलों से बने व्यंजन परोसने की योजना है। इन रेस्टोरेंट को स्थापित कराने का एक बड़ा उद्देश्य उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के व्यंजनों को मशहूर करना भी है। बिनीता शाह का कहना है कि पर्यटक जब भी किसी प्रदेश में जाते हैं तो जब वे लौटते हैं तो उनकी जुबान पर वहां के किसी न किसी व्यजंन का स्वाद और नाम होता है। उत्तराखंड के व्यंजन अभी इतने मकबूल नहींहो पाए हैं। ऐसे में ग्रीन रेस्टोरेंट इस उद्देश्य को पूरा कर पाएंगे। उनका कहना है कि दरअसल आज दुनिया भर में खासकर यूरोप और अमेरिका आदि में लोग जैविक उत्पादों की ओर लौट रहे हैं। ऐसे में ग्रीन रेस्टोरेंट में अगर जैविक तरीके से उगाई गई फसलों से बने स्थानीय व्यंजन परोसे जाएंगे तो एक ओर विदेशी पर्यटक उनकी ओर आकर्षित होंगे और दूसरी ओर उत्तराखंड के व्यंजन अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पा सकेंगे। उनका कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में वैसे भी अभी रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बगैर ही फसलें उगाई जाती हैं। ऐसे में प्रदेश भर में ग्रीन रेस्टोरेंट खुलेंगे तो पर्वतीय किसानों को सीधा लाभ होगा क्योंकि ग्रीन रेस्टोरेंट में केवल जैविक फसल उत्पादों

-निर्मल को सालता रहा पहाड़ की महिलाओं का दर्द

-कठिन संघर्षों के साथ किया बालीवुड का सफर तय -उपलब्धियों पर समूचा ग्रामीण भारत गौरवान्वित नैनीताल: प्रसिद्ध अभिनेता निर्मल पांडे ने साधारण परिवार में जन्म लेने के बावजूद बालीवुड में जिस तरह अपनी असाधारण अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया उससे उत्तराखंड ही नहीं पूरा ग्रामीण भारत गर्व महसूस कर रहा है। उनके साथियों के अनुसार पहाड़ में ग्रामीण महिलाओं की बेहद जटिल जीवन चर्या का दर्द निर्मल को हमेशा सालता रहा। जागरण ने शुक्रवार को अभिनेता निर्मल पांडे के साथियों व रंगकर्मियों के अलावा सिने कलाकार हेमंत पांडे से बातचीत की तो सभी ने उनकी अभिनय क्षमता को अद्वितीय बताया। नाट्य संस्था युगमंच के जरिए नाटकों में अमिट छाप छोड़ चुके निर्मल के बारे में संस्था के अध्यक्ष जहूर आलम का कहना था कि निर्मल पांडे ने साधारण परिवार में जन्म लेकर मेहनत व अपनी निष्ठा से जो मुकाम फिल्म इंडस्ट्री व रंगमंच के क्षेत्र में हासिल किया, उसकी भरपाई होना निकट समय में मुश्किल है। जहूर आलम के शब्दों में निर्मल बेहद कर्मठ व उदयीमान कलाकार थे। उनके जाने से रंगमंच मेें शून्य पैदा हो गया है। उन्होंने बताया अंग्रेजी का ज्ञान कम होने पर भी निर्मल ने अंग्रेजी नाटकों के डॉयलाग याद कर अभिनय के झंडे गाड़े। उन्होंने बताया नाटक के रिहर्सल में जरा सी देरी होने पर वह साथी कलाकारों पर बिगड़ जाते थे। उन्होंने कहा निर्मल पांडे ने काम व प्रतिभा के दम पर वह मुकाम हासिल किया, जिसकी कल्पना सभी कलाकार करते हैं। राष्टï्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली में अध्ययन के दौरान निर्मल पांडे के रूम पार्टनर रहे रंगकर्मी एम दिलावर बताते हैं कि सीआरएसटी के सिल्वर जुबली समारोह में निर्मल ने नाटक 'एक कफन औरÓ में अभिनय कर तत्कालीन सीएम एनडी तिवारी को खासा प्रभावित किया था। वह बताते हैं कि निर्मल रंगमंच का निपुण कलाकार थे और साथी कलाकारों को भी प्रेरित करता थे। निर्मल पांडे ने वर्ष 1992 में श्रीराम सेवक सभा द्वारा आयोजित होली महोत्सव में बढ़ चढ़कर भागीदारी निभाई। निर्मल के सीनियर रहे व पूर्व विधायक डा. नारायण सिंह जंतवाल बताते हैं कि अभिनेता होने के बावजूद निर्मल पाण्डे पहाड़ के विकास के प्रति हमेशा चिंतित रहे। वर्ष 2002 में हुए राज्य के पहले विस चुनाव में पहली फरवरी को निर्मल पांडे ने कालाढूंगी, भीमताल व भवाली में उक्रांद के पक्ष में जनसभा को संबोधित करते हुए क्षेत्रीय ताकतों को मजबूत बनाने का आह्वान किया। इनसेट ग्रामीण भारत ने खोया उभरता सितारा: हेमंत नैनीताल: सिने अभिनेता निर्मल पांडे के अचानक संसार से विदा होने पर टीवी कलाकार हेमंत पांडे भी बेहद दु:खी हैं। दूरभाष पर हुई बातचीत में उनका कहना था-'छोटे से शहर से इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करना बहुत मायने रखता है। भारत के गांवों से सैकड़ों कलाकार मुंबई आते हैं, लेकिन कम ही लोगों को मुकाम हासिल हो पाता है, निर्मल पाण्डे सभी में भाग्यशाली रहेÓ। निर्माता-निर्देशक शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन में निर्मल के साथ काम कर चुके हेमंत का कहना था निर्मल ने उन्हें हमेशा सम्मान दिया। निर्मल का अचानक इस संसार से विदा होने से उत्तराखंड ही नहीं समूचे ग्रामीण भारत के कलाकारों को झटका लगा है। हेमंत की निर्मल से आखिरी मुलाकात करीब डेढ़ वर्ष पूर्व मुंबई में प्रवासी उत्तराखण्ड के लोगों द्वारा आयोजित संगीत संध्या में हुई थी। निर्मल की घड़ी बनी अनमोल निशानी नैनीताल: अभिनेता निर्मल पांडे द्वारा रंगकर्मी जहूर आलम को भेंट की गई जापानी घड़ी अब उनकी अनमोल निशानी बन गई है। जहूर बताते हैं कि जापान में शूटिंग से लौटकर जब निर्मल घर आया तो उन्हें भेंट स्वरूप घड़ी प्रदान की। जहूर मानते हैं कि यही घड़ी हमेशा उन्हें निर्मल की याद ताजा कराती रहेगी।

विदेशों में भी फैलेगा वेद व पुराण का ज्ञान

-जगद्गुरु आश्रम चला रहा है विशेष मुहिम - वेद पाठियों को किया जा रहा तैयार -पहले चरण में 25 वेदपाठी होंगे पारंगत Pahar1- हरिद्वार भारतीय जीवन दर्शन के प्राण वेद व पुराण में समाहित हैं। धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजनों की परिपाटी भी वेद व पुराणों पर ही चलती आ रही है। अगर सबकुछ ठीक रहा, तो विदेशों में भी वेद व पुराण का महात्म्य प्रचारित किया जाएगा। मजेदार बात यह कि संबंधित देश की भाषा में ही वेद व पुराण की महत्ता बताई जाएगी। जगद्गुरु आश्रम ने इस दिशा में पहल शुरू की है। वेदपाठियों को इसके लिए तैयार किया जा रहा है। एक साल पूर्व हरिद्वार के जगद्गुरु आश्रम के स्वामी श्री राजराजेश्वराश्रम ने इस दिशा में पहल शुरू की थी। मंशा यह थी कि वेद व पुराण का आध्यात्मिक महत्व देश की सीमाओं से बाहर पहुंचाने के लिए वेदपाठी तैयार किए जाएं। इसे एक अभियान के तौर पर लिया जाए। इसके तहत उक्त आश्रम में दस से बीस वर्ष तक के कुल 25 वेदपाठियों को वेद व पुराणों की शिक्षा देनी शुरू की गई। उनको वेद, पुराणों में पारंगत बनाने का जिम्मा आचार्याें को सौंपा गया। वेदपाठियों के रहने-ठहरने के साथ ही अन्य समस्त सुविधाएं आश्रम की ओर से मुहैया कराई गई। आश्रम में हर रोज उन्हें सुबह व शाम वेद, पुराणों की शिक्षा दी जा रही है। समय-समय पर उनके ज्ञान का मूल्यांकन भी आचार्य करते हैं। यह शिक्षा पूरी तरह हाइटेक पद्धति से दी जा रही है। कहने का मतलब है कि कंप्यूटर के जरिये वेदपाठियों को वेद व पुराणों में दक्ष किया जा रहा है। एक साल की अवधि के मूल्यांकन में ही अध्ययनरत वेदपाठियों में दक्षता पायी गई है। वेद, पुराणों में निपुणता हासिल करने के बाद वेदपाठियों को किसी एक देश विशेष की भाषा का भी ज्ञान कराया जाएगा। जब वे विदेशी भाषा में पारंगत हो जाएंगे, तो उन्हें संबंधित देश में भेजा जाएगा। वहां वे वेद, पुराणों का प्रचार-प्रसार करेंगे। इसके बाद फिर अगले सत्र में भी उनको इसी ढंग से तैयार करने की योजना है। फिलहाल, अध्ययनरत वेदपाठियों को वेद, पुराणों में दक्ष बनाने में अभी एक से डेढ़ साल और लगेगा। इस बाबत जगदगुरु आश्रम के स्वामी श्री राजराजेश्वराश्रम ने बताया कि इन वेदपाठियों को धर्म प्रचार के लिए तैयार किया जा रहा है। इनके जरिये भारतीय जीवन दर्शन के प्राण तत्व वेद, पुराणों के आध्यात्मिक महात्म्य को विदेशों में भी प्रचारित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि वर्तमान में वेद, पुराणों के प्रति विदेशों में भी खासा उत्साह बढ़ने लगा है, जिसकी बानगी महाकुंभ में भी देखने को मिल रही है। उन्होंने कहा कि महाकुंभ में इस बार विदेशियों की संख्या में इजाफा हुआ है। उन्होंने कहा कि आश्रम की यह कोशिश आगे भी जारी रहेगी।

-राज्य पशु व पक्षी का अस्तित्व खतरे में

-तेजी से गिर रही है कस्तूरी मृग और मोनाल की संख्या -राज्य प्रतीकों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दे रही है सरकार, वंश वृद्धि के लिए नहीं बनी कोई योजना -कस्तूरी मृगों की संख्या महज पंद्रह हजार, मोनाल का संख्या घनत्व भी हुआ 20 प्रति वर्ग किलोमीटर Pahar1- गोपेश्वर (चमोली) उत्तराखंड में राज्य प्रतीकों का अस्तित्व ही खतरे में है। राज्य पशु 'कस्तूरी मृग' और राज्य पक्षी 'मोनाल' की संख्या लगातार कम होती जा रही है। राज्य प्रतीकों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देना सरकार का दायित्व है, लेकिन सरकारी लापरवाही का आलम यह है कि अब तक सूबे में कस्तूरी मृग और मोनाल के संरक्षण व वंशवृद्धि के लिए कोई योजना तैयार नहीं की गई है। नतीजतन, सरकारी उपेक्षा के बीच बेहद खूबसूरत ये पशु-पक्षी अपने वजूद की लड़ाई लड़ने को मजबूर हो गए हैं। भारत गणराज्य में प्रत्येक राज्य अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति, वन तथा वन्यजीव संपदा के परिप्रेक्ष्य में अपने-अपने राज्य प्रतीकों का निर्धारण करता है। इसके तहत उत्तराखंड पृथक राज्य गठन के बाद वर्ष 2001 में कस्तूरी मृग को राज्य पशु व मोनाल को राज्य पक्षी घोषित किया गया। संविधान के मुताबिक ये प्रतीक राज्य की संपदा माने जाते हैं और इनका संरक्षण एवं प्रजाति संवर्धन करना राज्य सरकार का दायित्व है, लेकिन राज्य सरकार इस दायित्व पर खरी नहीं उतर रही है। राज्य गठन के नौ वर्ष बाद भी कस्तूरी मृग व मोनाल पक्षी के संरक्षण व वंशवृद्धि के लिए कोई ठोस योजना तैयार नहीं की गई। स्पष्ट रूप से यह कहा जा सकता है कि सरकार ने अभी तक इस ओर ध्यान दिया ही नहीं। हालात ऐसे हैं कि मखमली बुग्यालों में पाए जाने वाले कस्तूरी मृग (मस्क डियर) की संख्या पूरे उत्तराखंड में सिमटकर मात्र पंद्रह हजार के आसपास रह गई है, जबकि दस वर्ष पूर्व इनकी संख्या करीब तीस हजार थी। इसी तरह मोनाल (हिमालयन मोर) पक्षी का संख्या घनत्व भी दस वर्ष पूर्व 30 प्रति वर्ग किमी से घटकर 20 प्रति वर्ग किलोमीटर पर जा पहुंच है। अस्तित्व के लिहाज से ये आंकड़े बेहद चिंताजनक माने जा रहे हैं। दरअसल, इन दोनों पशु-पक्षियों की विशेषता ही इनके लिए खतरनाक बनी हुई है। कस्तुरी मृग के शरीर में मिलने वाला पदार्थ 'कस्तूरी' दमा, मिरगी, निमोनिया, टाइफायड व हृदय रोग की औषधि बनाने में प्रयुक्त होता है, जबकि मोनाल का उसके बेहद स्वादिष्ट मीट व अन्य उपयोगों की वजह से बड़े पैमाने पर शिकार हो रहा है। इसके अलावा, ग्लोबल वार्मिग के चलते प्रतिकूल हुआ मौसम भी इनकी संख्या में तेजी से आ रही गिरावट का कारण माना जा रहा है। केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग के डीएफओ धीरज पाण्डे ने भी स्वीकार किया कि लगातार कम हो रही संख्या के आधार पर ही कस्तूरी मृग व मोनाल पक्षी को दुर्लभ श्रेणी में रखा गया है। उन्होंने कहा कि इनके सरंक्षण की योजना तैयार करने पर विचार किया जा रहा है।

पानी: खुद से ही जंग की तैयारी में पहाड़

- चोटियों व मध्य ऊंचाई के लोगों की प्यास बुझाने में विफल घाटियों की नदियां शासन और विभाग ने किया पुख्ता तैयारियों को दावा Pahar1-चोटियों तथा मध्य ऊंचाई पर बसे गांवों की प्यास बुझाने में पहाड़ की घाटियों में बहती नदियां विफल रही हैं। इस बार कम बफबारी-वर्षा की वजह से पहाड़ों पर आने वाले पेयजल संकट की आहट पहले से ही सुनी जा सकती है। यह संकट आभास दे रहा है कि इस बार पानी के लिए पहाड़ को खुद से ही बड़ा युद्ध लड़ना होगा। बर्फबारी और बारिश पहाड़ के पेयजल स्रोतों को जीवन देते हैं। पिछले कई सालों से कम बर्फबारी और कम बारिश के साथ ही पर्यावरण हानि की वजह से सूख रहे स्रोतों के सामने नया संकट उठ खड़ा हुआ है। शासन स्तर पर इस संकट से बचने के लिए प्रयास करने के दावे किए जा रहे हैं पर इन पर बहुत विश्वास करने को कोई तैयार नहीं है। पेयजल सचिव एमएच खान बताते हैं कि गरमी में पेयजल संकट की आहट अभी से सुनी जा सकती है। कोशिश है कि योजनाएं पूर्ण होने के करीब हैं, उन्हें तेजी से मुकाम तक पहुंचाया जाए। श्री खान स्वीकार करते हैं कि अधिकांश जल स्रोतों पर पानी की मात्रा कम हो रही है। इस बात का पता लगाया जा रहा है कि कहां पानी की उपलब्धता सबसे कम होगी, ताकि वहां के लिए कंटिजेंसी प्लान अभी से तैयार किए जा सकें। पिथौरागढ़ समेत उन तमाम शहरों में मिनी ट्यूबवेल लगाए जा रहे हैं, जहां पानी की समस्या अधिक है। सूत्रों ने बताया कि पौड़ी को पानी देने वाली श्रीनगर पंपिंग योजना की पुरानी मशीनों को बदला जा रहा है। कोशिश की जा रही है कि जल्द ही यह काम हो जाए, ताकि पूरी क्षमता से पौड़ी को पानी मिलता रहे। पौड़ी में दो ट्यूबवैल बनाए हैं पर ग्रामीणों के विरोध से उन्हें संचालित नहंी किया जा सका है। विरोध करने वालों का मानना है कि यदि ये ट्यूबवेल चलेंगे तो उनके प्राकृतिक जल स्रोत सूख जाएंगे। जिला पंचायत अध्यक्ष के सहयोग से ग्रामीणों को सही जानकारी दी जा रही है, साथ ही इन ट्यूबवेलों से उन्हें पानी देने की योजना भी बनाई जा रही है। विभागीय सचिव की मानें तो पहाड़ों में दूसरे स्थानों पर और हैंडपंप लगाए जा रहे हैं। एससी-एसटी क्षेत्रों के लिए प्राथमिकता से पेयजल योजनाएं बनाई जा रही हैं। कोशिश की जा रही है कि पानी की कमी को वितरण में निपुणता लाकर पूरा किया जा रहा है। पेयजल योजनाओं के आड़े धन की कमी नहीं आने दी जाएगी।

अमानउल्ला खां की देन है बैठकी होली

1850 में रामपुर से अल्मोड़ा आए थे महान कलाकार कुमाऊंनी बैठकी होली के वरिष्ठ गायक शिवचरण पांडे से बातचीत अल्मोड़ा: कुमाऊं की बैठकी होली की समृद्ध व वैभवशाली शुरूआत अल्मोड़ा से हुई है। इस नगरी को यदि बैठकी होली की गंगोत्री कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यह कहना है परंपरागत होली गायकी के 76 वर्षीय वरिष्ठ कलाकार शिवचरण पांडे का। पूछने पर उन्होंने बताया कि अल्मोड़ा में 1850-60 के दशक में रामपुर के महान संगीतज्ञ उस्ताद अमानउल्ला खां की ही देन है कि यहां अपनी विशिष्ट पहचान व चलन के साथ बैठकी होली की शुरूआत हुई है। श्री पांडे बताते हैं कि बैठकी होली में जो चांचर ताल का चलन है यह भी उस्ताद अमानउल्ला खां का ही प्रसाद है। उन्होंने बताया कि जिस दौर में अमानउल्ला खां ने बैठकी होली का बीजारोपण किया तब गाने-बजाने को बहुत महत्व नहीं दिया जाता था। पांडे जी बताते हैं कि उस दौर में रामप्यारी नामक गणिका थी, जिन्होंने इस परंपरा को बढ़ने में सहायता की। अल्मोड़ा के जाने-माने होली गायक शिव लाल वर्मा ने रामप्यारी से ही बैठकी का अंदाज सीखा। मौजूदा दौर में होली गायकी में आए बदलाव पर पूछने पर उनका कहना था कि अमानउल्ला खां से चली यह परंपरा यूं तो आज तक अपने स्वरूप को बरकरार रखे हुए है। लेकिन कुछ लोग नकल करने वाले ऐसे हैं जिन्होंने इसको भटका दिया है। हालांकि उनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। हाल के दौर के होली गायकी में अपना ऊंचा मुकाम बनाने वाले तारा प्रसाद पांडे तारी मास्साब का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वह तो अपने फन के पुरोधा थे, लेकिन कुछ लोग उनकी नकल कर वैसा तो नहीं कर पाते बिगाड़ जरूर देते हैं। शिवचरण पांडे होली गायक ही नहीं एक अच्छे होली के गीतों के रचयिता भी हैं। उनके लिखे चार गीत हर होली गायक की जुबान पर हैं। पूछने पर वह बताते हैं कि बैठकी होली में तुलसी, कबीर, मीरा, सूर के पद तो गाए ही जाते हैं, इसके अतिरिक्त भी चारु चन्द्र पांडे, महेशानंद गौड़ की रचनाएं भी शामिल हैं। पुराने होली गायकों का जिक्र करते हुए बताते हैं कि पिछले दौर में गांगीथोक, चन्द्र सिंह नयाल, भगवान सिंह नयाल, मोहन सिंह, गुलाम उस्ताद, ललि उस्ताद, मोहन रईस, पूरन चन्द्र पांडे, जवाहर लाल साह, मोती राम उस्ताद, उदय लाल साह नेता, रामलीला कलाकार उदय लाल साह जैसे होली गायक थे। जिनका अपना अलग अंदाज, अलग ठाट था। नई पीढ़ी को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि वह बैठकी होली के पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखें, तभी हमारी पहचान कायम रहेगी। यदि हम इसको बिगाड़ेंगे तो होली के स्वरूप को नहीं बल्कि अपनी पहचान को बिगाड़ रहे होंगे।

Thursday, February 18, 2010

नैनीताल में तिब्बती नववर्ष 'लोसर'

नैनीताल में तिब्बती नववर्ष 'लोसर' की तैयारियां जोरों पर - बौद्ध मठ में विशेष पूजा 18 को, तीन दिन तक मनेगा त्यौहार नैनीताल: तिब्बती समुदाय के नववर्ष 'लोसर' की तैयारियां सरोवरनगरी में जोरशोर से चल रही हैं। तीन दिनों तक होने वाले आयोजन को लेकर तिब्बती समुदाय में विशेष उत्साह है। इस मौके पर तिब्बती बाजार बंद रहेगा। इधर लोसर को देखते हुए विशेष पूजा के लिए बौद्ध मठ को आकर्षक ढंग से सजाया जा रहा है। तिब्बती समुदाय हिंदुओं की दीपावली की तर्ज पर नववर्ष का उत्सव मनाता है। लगातार तीन दिनों तक घरों में भगवान बुद्ध की पूजा अर्चना कर विश्व शांति की कामना की जाती है। इस अवसर पर समुदाय द्वारा विशेष पकवान बनाए जाते हैं और भवनों को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। तिब्बती फ्रीडम मूवमेंट के सचिव तेंजिन ने बताया कि लोसर के कार्यक्रम 14 फरवरी को शुरू होंगे। 15 व 16 फरवरी तक समुदाय के लोग अपने घरों में भगवान बुद्ध की पूजा अर्चना कर विश्व शांति की कामना करेंगे। 18 फरवरी को बौद्ध मठ में विशेष पूजा अर्चना की जाएगी। बौद्ध मठ में पूजा अर्चना व सामूहिक भोज के लिए तैयारियां जोरशोर से चल रही हैं। तिब्बती यूथ कांग्रेस, तिब्बती रिफ्यूजी फाउंडेशन तथा तिब्बती महिला कांग्रेस समेत कई संगठनों के कार्यकर्ता व धर्म प्रचारक आयोजन को सफल बनाने में जुटे हैं।

घिंगरी गांव के डा. सजवान अमेरिका में सम्मानित

पुरस्कृत 22 लोगों में डा. सजवान अकेले भारतीय रानीखेत: रानीखेत के निकटवर्ती देवलीखेत इलाके के गांव घिंगरी निवासी डा. केएस सजवान को पर्यावरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए अमेरिका में सम्मानित किया गया है। पुरस्कृत होने वाले शिक्षा जगत के 22 शिक्षकों की सूची में शामिल डा. सजवान एक मात्र भारतीय हैं। डा. सजवान अमेरिका के जार्जिया की सवाना स्टेट यूनिवर्सिटी में प्राकृतिक विज्ञान एवं गणित विभाग के प्रोफेसर हैं। पर्यावरण के विद्वान शोधकर्ताओं में माने जाने वाले डा. सजवान के अब तक 100 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। इस क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए अमेरिका में विश्व शिक्षा जगत से 22 शिक्षकों को चयनित किया गया। जिनमें डा. सजवान अकेले भारतीय हैं। उन्हें यह पुरस्कार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दिया। जिसमें पुरस्कार स्वरूप 10 हजार डालर की राशि प्रदान की गई है। डा. सजवान ग्राम घिंगरी देवलीखेत के स्व. धन सिंह सजवान के ज्येष्ठ पुत्र हैं, और उनके छोटे भाई जीएस सजवान वर्तमान में एसएसबी में कार्यरत हैं। डा. सजवान के परम मित्रों में शामिल शोध एवं प्रसार केन्द्र चौबटिया के प्रशासनिक अधिकारी बीएस रौतेला ने बताया कि डा. सजवान की प्रारंभिक शिक्षा देवलीखेत इंटर कालेज में हुई, और रानीखेत मिशन इंटर कालेज से इंटर की शिक्षा पाने के बाद उन्होंने पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय से बीएससी (एजी) व जेएन कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर मध्यप्रदेश से एमएससी (एजी)की उच्च शिक्षा पाई। इसके उपरांत उनकी नियुक्ति केन्द्रीय धान अनुसंधान केन्द्र कटक उड़ीसा में वैज्ञानिक के पद पर हुई। उन्होंने अमेरिका से पीएचडी की मानद उपाधि ली और अमेरिका में ही सेवा शुरू कर दी। जहां उन्होंने कई उच्च पदों पर कार्य किया है। श्री रौतेला ने बताया कि डा. सजवान विश्व बैंक में सलाहकार के पद पर कार्य करने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय वैज्ञानिक रहे हैं। उन्होंने बताया कि डा. सजवान को अपने मातृ भूमि से लगाव है तथा समय-समय पर पारिवारिक कार्यक्रमों में आते रहते हैं।

-प्रेरणादायी परंपरा है 'पानी पंचायत'

-खेतों की सिंचाई को जड़धार गांव के ग्रामीणों ने बनाई यह परंपरा -बदले में पैसा नहीं, लिया जाता है अनाज चम्बा (टिहरी): विकास योजनाओं के अलावा सामूहिक भागीदारी के कामों को संपन्न कराने में अकसर ग्रामीण आपस में भिड़ जाते हैं। खासकर सिंचाई के पानी का सार्वजनिक बंटवारा ऐसा काम है, जिसका विवादों से चोली-दामन का साथ रहता है, लेकिन जड़धार गांव की सदियों पुरानी परंपरा 'पानी पंचायत' दूसरे गांवों के लिए मिसाल बनकर उभरी है। दरअसल, सिंचाई के लिए पानी का बंटवारा इसी पंचायत की देखरेख में किया जाता है। किसी विवाद की स्थिति में ग्रामीण आपस में लड़ने की बजाय पंचायत का निर्णय ही मानते हैं। टिहरी जनपद के चम्बा प्रखंड की ग्राम पंचायत जड़धार गांव में सदियों पुरानी पानी पंचायत आज भी कार्य कर रही है। पंचायत का कार्य है किसानों की जरूरत के अनुसार खेतों तक पानी पहुंचाना और समय-समय फसलों की सिंचाई करना। जड़धार गांव लगभग चार सौ परिवारों वाला हेंवलघाटी का सबसे बड़ा गांव है। यहां के लोगों के नागणी में बड़े भू-भाग पर सिंचित खेत हैं। खेतों की सिंचाई के लिए सदियों पुरानी व्यवस्था है, जो पानी पंचायत या जल समिति द्वारा तय की जाती है। सिंचित खेतों में मुख्य रूप से धान और गेहूं की फसल ली जाती है। गांव के बड़े-बुर्जुगों ने बडी सूझबूझ से ऐसी व्यवस्था बनाई की सभी को पानी मिल सके और किसी तरह का विवाद न हो। हालांकि, पानी पंचायत का गठन कब हुआ, किसी को पता नहीं, लेकिन गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि यह सदियों पुरानी परंपरा है। गांव के समाजसेवी विजय जड़धारी का कहना है, कि पानी पंचायत न होती, तो पानी के बंटवारे को लेकर लोग आपस में झगड़ते, सभी को एक साथ पानी चाहिए तो यह संभव न होता। ऐसे में आज भी पंचायत के लोग बारी-बारी से जरूरत के अनुसार गूल के जरिए खेतों तक पानी पहुँचाते हैं। इसमें सभी समुदायों की भागीदारी होती है और किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता। सिंचाई के बदले पंचायत के लोगों को धन नहीं, बल्कि अनाज दिया जाता है, वह भी उपज के अनुसार। पंचायत का चुनाव हर वर्ष होता है। खास बात यह है कि जिन नियम- कायदों के आधार पर विवादों के निर्णय लिये जाते है, वे लिखित नहीं बल्कि मुंहजबानी हैं। काम का बंटवारा, कब, कौन, कहां, किसके खेतों में पानी देगा, कब बैठक होगी, काम के बदले लिये अनाज का बंटवारा आदि कार्य भी सिर्फ आपसी विश्वास के आधार पर मुंहजबानी ही किए जाते हैं। खास बात यह है कि पंचायत में लिए निर्णय पर कोई सदस्य मुकर नहीं सकता। समय के साथ पानी पंचायत की भूमिका में और अधिक व्यापकता आई है और आज इसके सदस्य सिंचाई करने के साथ खेतों की जंगली जानवरों से सुरक्षा भी करते है। इतना ही नहीं, पंचायत की देखरेख में खेतों के निकट सामुदायिक घास भी उगाई गई है। पंचायत को मिलने वाले अनाज को सिंचाई व अन्य कार्य करने वाले करीब एक दर्जन लोगों को बांट दिया जाता है, यानी यह पंचायत इन ग्रामीणों की रोजी का जरिया भी है। पानी पंचायत के वर्तमान मुखिया मंगल सिंह का कहना है कि यह सामूहिक भागीदारी का कार्य है। खेतों को कब पानी देना है, यह जिम्मेदारी पानी पंचायत की है। खेत स्वामी को महज अनाज बोने व काटने का कार्य करना होता है, शेष चिंता पंचायत करती है। वह बताते हैं कि पंचायत में अच्छा काम करने वाले सदस्य फिर चुन लिए जाते हैं। -

धान के धनी 'इंद्रासन' गुमनाम

-चावल की महक तो देशभर में फैलाई, पर खुद हैं अनजान -तराई के कृषक इंद्रासन सिंह ने ही विकसित की थी प्रजाति , रुद्रपुर: गरीबों का बासमती कहलाने वाले इंद्रासन धान की महक लगभग पूरे देश में फैली हुई है, लेकिन विडंबना देखिए,इस धान को खोजने व विकसित करने वाले कृषक इंद्रासन सिंह गुमनाम हैं। इंद्रासन प्रजाति का धान पूरे देश में उगाया तथा बड़े चाव से खाया जाता है। अखबारों में मंडी के भावों में इसका प्रमुख स्थान होता है, लेकिन इस सबसे दूर इस प्रजाति को विकसित करने वाला कृषक आज भी सरकारी सम्मान का मोहताज है। सरकार ने तो नहीं, नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन अहमदाबाद ने जरूर वर्ष 2005 में मेधा की पहचान कर उसे तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों सम्मान दिलाया। उत्तराखंड के तराई में स्थित ऊधम सिंह नगर जिला खेती के मामले में काफी समृद्ध है। दूर तक फैले खेत तथा हरियाली यहां की विशेषता है। जिला मुख्यालय रुद्रपुर से करीब 14 किलोमीटर दूर इंद्रपुर गांव है। इसी गांव में रहते हैं इंद्रासन सिंह। वह आजादी के बाद 1952 में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से यहां आकर बसे थे। स्वतंत्रता आंदोलन में 1942 के दौरान जेल जाने के एवज में सरकार की ओर से आवंटित 15 एकड़ भूमि पर खेती करने लगे। बाद में वह 25 वर्षाे तक इंद्रपुर गांव के ग्राम प्रधान भी रहे। 1972 की बात है, एक दिन वह अपने खेत में टहल रहे थे तो रत्ना नामक धान के खेत में उन्हें कुछ ऐसे पौधे दिखाई दिये जो अन्य की अपेक्षा लंबे व स्वस्थ तो थे ही, उनकी बालियां भी चमकदार व हृष्टपुष्ट थीं। इंद्रासन इन पौधों की बढ़वार से आकर्षित होकर उनकी खास देखभाल करने लगे। जब यह धान तैयार हुआ तो उन्होंने कौतूहलवश उसकी बालियां तोड़कर अलग रख दीं। अगले वर्ष उनसे निकला बीज अलग खेत में बोया। पहले वर्ष इसका बीज एक खेत के लायक ही हुआ। बाद में वह साल दर साल इसके बीज को बोते चले गये। इस धान के पौध की लंबाई व बाली देखकर आसपास के किसान भी इससे आकर्षित हुए बिना नहीं रह सके। धीरे-धीरे यह धान समूचे इलाके में बोया जाने लगा। इसके धान का छिलका पतला व चावल चमकदार होने के कारण लोग इसमें खूब दिलचस्पी लेने लगे। यह धान इलाके में बोया तो जा रहा था, लेकिन तब तक इसका कोई नाम नहीं था। इस पर 1978 में गांव के कृषक डॉ.हरवंश ने एक बैठक बुलाई। चूंकि यह प्रजाति इंद्रासन सिंह के प्रयास से ही विकसित हुई थी, इसलिए उन्होंने इसका नामकरण इंद्रासन कर दिया। तब से यह धान इंद्रासन नाम से ही जाने जाना लगा। इसी दौरान इंद्रासन धान के बारे में पंतनगर विश्वविद्यालय की मासिक पत्रिका किसान भारती में एक लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख को पढ़कर बिहार, उड़ीसा, पंजाब, महाराष्ट्र समेत अन्य प्रदेशों के प्रगतिशील कृषकों ने इंद्रासन सिंह को पत्र भेजकर धान का बीज मंगवाया। धीरे-धीरे इस धान का पूरे देश में उत्पादन किया जाने लगा। चूंकि यह बासमती से मिलता-जुलता था, लिहाजा इसे गरीबों का बासमती भी कहलाया जाने लगा। विडंबना यह है कि जिस धान को आज समूचे देश में बोया अथवा खाया जाता है, उसी धान को विकसित करने वाला कृषक गुमनामी में जीने को विवश है। सरकार ने उसे कोई पुरस्कार देना तो दूर सम्मानित करना तक उचित नहीं समझा। यह कृषक सरकारी उपेक्षा के कारण अपने गांव में परिवार के साथ रह रहा है। पंतनगर विवि के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक के अनुसार इंद्रासन सिंह ने भले ही विज्ञान के दृष्टिकोण से कोई नई खोज नहीं की हो, लेकिन धान की एक प्रजाति तो विकसित की ही है। इस लिहाज से वह सम्मान व पुरस्कार के हकदार हैं।

अब गांवों में नहीं रहना चाहते लोग

-राज्य गठन के बाद तेजी से बढ़ा शहरीकरण -नगरों में बढ़ीं समस्याएं, गांव हो रहे हैं खाली पिथौरागढ़: प्रदेश से हो रहे पलायन के साथ ही बढ़ता शहरीकरण भी गंभीर समस्या बनता जा रहा है। शहरों से नाममात्र की दूरी पर रहने वाले ग्रामीण भी अब गांव छोड़ रहे हैं, बढ़ते शहरीकरण से जहां शहरों में तमाम समस्याएं बढ़ रही हैं, वहीं ग्रामीण विकास योजनाओं पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। उत्तराखण्ड गांवों का ही प्रदेश है, पूरे प्रदेश में 16826 गांव हैं। नगरों की संख्या 70 के आस-पास है। राज्य गठन की अवधारणा के पीछे गांवों का विकास तेज करना था, लेकिन धरातल पर हुआ उल्टा है। इसकी पुष्टि खुद सरकारी आंकड़े करते हैं। प्रदेश के सीमांत जिले पिथौरागढ़ को उदाहरण के रुप में देखे तो वर्ष 2001 में जिले की कुल जनसंख्या का 80 प्रतिशत गांवों में रह रहा था। पिछले नौ वर्षो में इस आंकड़ें में भारी बदलाव आया है। पिथौरागढ़ नगर की जनसंख्या 2001 में 59000 थी आज यह संख्या 80 हजार से ऊपर पहुंच चुकी हैं। दूरदराज के गांवों के साथ ही छोटे-छोटे कस्बों से भी लोगों शहर में आ रहे हैं। इससे नगरों में तमाम समस्यायें पैदा हो रही हैं। नगर के आस-पास के गांव आज नगर के वार्डो में बदल गये हैं। बढ़ते शहरीकरण से तमाम समस्यायें खड़ी हुई हैं। नगर और उसके आस-पास के गांवों में जमीन के दाम पिछले दस वर्षो में दस गुने से भी ऊपर चले गये हैं। इन गांवों में रहने वाले लोग आज भूमिहीन होने की स्थिति में हैं। नगर में सफाई, सड़क, रास्ते, पानी, बिजली जैसी तमाम दिक्कतें जन दबाव के चलते खड़ी हुई हैं। नये विकसित मोहल्लों में आवागमन के लिए न रास्ते हैं और पानी की व्यवस्था। सीवर निस्तारण बड़ी समस्या बना हुआ है। तमाम समस्याओं के बावजूद गंावों से नगरों में हो रहा पलायन जारी है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद एवं समाजसेवी प्रो.प्रभात उप्रेती कहते हैं यह अनियोजित विकास का परिणाम है। गांवों में शिक्षा, चिकित्सा, संचार, यातायात जैसी सुविधाओं की कमी लोगों को शहरों में आने के लिए मजबूर करती हैं। उनका कहना है गांवों को छोड़ कस्बों तक में भी शिक्षा की सुविधायें नहीं हैं। आम आदमी अन्य समस्यायें झेल भी ले लेकिन बच्चों की पढ़ाई से वह समझौता नहीं चाहता है, इसी के चलते आर्थिक रुप से थोड़ी सी सम्पन्नता होने पर ही गांव के लोग शहरों की और रुख कर लेते हैं। बढ़ते शहरीकरण से नगरों में तो समस्यायें पैदा हो ही रही हैं गांव भी लगातार खाली हो रहे हैं। गांवों में आज आर्थिक रुप से कमजोर परिवार या फिर बुजुर्ग ही शेष रह गये हैं। सर्वोदयी मोहन सिंह रावत का कहना है इस समस्या का समाधान महात्मा गांधी के विचारों से ही संभव है। गांवों को शिक्षा, चिकित्सा, यातायात जैसी मजबूत बुनियादी सुविधायें देकर ही बढ़ते शहरीकरण पर रोक लगायी जा सकती है। आंकड़ों की नजर में शहरीकरण गांव कुल परिवार शहरों में ---- -------- बसे परिवार बीसाबजेड़ 431 111 टोटानौला 317 120 खर्कदौली 21 14 सटगल 480 80 बुंगाछीना 392 76 देवलथल 427 119 बिसौनाखान 485 113 मोडी 120 90

-'खूनी' नाम की छांव तले मासूमों का गांव

केंद्र को प्रस्ताव भेजा, गांव का नाम बदलने का अनुरोध -लोगों के लिए अभिशाप साबित हो रहा अपने ही गांव का नाम -गांव का नया नाम 'पनियालीछीना' करने का आग्रह 'झिक् ह्वेगी आब नाति यां रूंन' (बस बहुत हो गया अब नहीं रहना यहां).. 'ह्वेगी अब और न सुणी जानू' (बस अब और नहीं सुना जाता)। अल्मोड़ा के 'खूनी' गांव में रहने वाले खिन्न गोविंद के मुंह से अब ऐसी बाते सुनने को नहीं मिलेगी। दरअसल लंबे अरसे से गांव वालों के लिए 'अभिशाप' बने गांव का नाम बदलने की फरियाद कर रहे लोगों की राज्य सरकार ने सुन ली है अब बारी केंद्र की है। सरकार ने गृह मंत्रालय को इस आशय का एक प्रस्ताव भेज गांव का नाम बदलने का अनुरोध किया है। जागेश्वर विधान सभा क्षेत्र के अंतर्गत अल्मोड़ा जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर जैंती तहसील के लमगड़ा ब्लाक के इस गांव का नाम खूनी कैसे पड़ा, पूर्व प्रधान नयन सिंह बताते हैं करीब तीन सौ साल पूर्व चंपावत जिले के 'खूना' गांव के करीब दो दर्जन राजपूत परिवारों (वोरा)ने यहां डेरा डाला और सर्व सहमति से अपने नये आसरे का नाम खूनी रखा। चूंकि लोग बड़े ही सीधे-सादे स्वभाव के थे इसलिए किसी ने सोचा भी नहीं था कि भविष्य में गांव का नाम उनके लिए अभिशाप भी बन सकता है। बकौल नयन सिंह, जैसे-जैसे लोग शिक्षित होकर रोजगार की तलाश में बाहर गये उन्हें गांव का नाम अखरने लगा। दोस्तों और रिश्तेदारों के मुंह से गांव के नाम पर मजाक उड़ाने से वे और भी परेशान हो उठते, नौबत यहां तक आ पहुंची कि गांव के नाम की काली छाया शादी ब्याह पर भी पड़ने लगी, रिश्तेदारी में दिक्कतें आने लगी। देखते ही देखते अरसा बीत गया। पर पिछले कुछ सालों से गांव का नाम बदलने की मांग जोर पकड़ने लगी और करीब ढाई सौ आबादी वाली ग्राम पंचायत ने जिला प्रशासन को अपनी व्यथा सुनाई, तब प्रशासन ने लोगों की भावनाओं की कद्र करते हुए शासन को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। इस पर शासन स्तर से कार्यवाही शुरू हुई। सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेज गांव का नाम 'पनियालीछीना' करने का आग्रह किया है। गांव का नया नाम ग्राम पंचायत और जिला प्रशासन की ओर से सुझाया गया है। स्थानीय विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल के मुताबिक खूनी नाम से लोग उकता चुके हैं, नाम बदले जाने पर वे राहत की सांस लेंगे। बकौल विधायक मंत्रालय की ओर से शीघ्र हरी झंडी मिलने की उम्मीद है। :एक और गांव का नाम बदलेगा सरकार ने इसी आशय का एक और प्रस्ताव गृह मंत्रालय को भेज अल्मोड़ा के सल्ट तहसील के 'मल्ली महरौली' गांव का नाम 'स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गांव' रखने का आग्रह किया है। प्रस्ताव के मुताबिक आजादी की लड़ाई में वर्ष 1942 में गांव वालों ने अंग्रेजों का डटकर सामना किया था और उन्हें अंग्रेजी हुकूमत का शिकार होना पड़ा था। इस दौरान यहां के दो लोग शहीद हुए कई लोगों को जेल भी जाना पड़ा था।

Friday, February 12, 2010

बीते दिनों की बात हुए 'तिबारी और 'जंगला

-विलुप्ति की कगार पर पहुंची पहाड़ की परंपरागत भवन निर्माण शैली -नगरों से लेकर गांवों तक में कंक्रीट के ढांचों का बढ़ रहा दायरा उत्तराखंड-सदियों पहले पर्वतीय परिवेश की जरूरतों के मुताबिक विकसित हुई भवन निर्माण शैली विलुप्ति की कगार पर है। नगरीय इलाकों के साथ अब गांवों में भी कंक्रीट के ढांचे आकार लेने लगे हैं, जिनमें पुरानी शैली का बिलकुल इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसके चलते कभी पर्वतीय घरों की पहचान रहे तिबारी और जंगला भी बीते दिनों की बात बनते जा रहे हैं। कभी पहाड़ की पहचान के तौर पर जाने जाने वाले परंपरागत निर्माण शैली से बने मकान अपना सदियों पुराना स्वरूप खोते जा रहे हैं। कभी पहाड़ी पूर्वजों ने पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों के मुताबिक लकड़ी, पत्थर, मिट्टी से बने इन मकानों का निर्माण शुरू किया था। इन घरों में बनने वाली तिबारी, देहरी, जंगला, खोली आदि बेहद कलात्मक होते थे। खास बात यह है कि पत्थरों की मोटी दीवार और उसके बाहर खास तरह की मिट्टी (कमेड़ा) की परत इन मकानों को वातानुकूलित बनाए रखती थी, जिससे ये घर सर्दियों में गर्म व गर्मियों में ठंडे रहते थे। इतना ही नहीं, मकान की बनावट में देवदार, तुन, शीशम व चीड़ का इस्तेमाल इस तरह किया जाता था कि ये भूकंपरोधी होते थे। मकान का डिजाइन इस तरह बनाया जाता था कि दो से तीन मंजिला मकानों में लकड़ी की सीढिय़ां अंदर ही बनी होती थीं, जिससे दूसरी मंजिल पर जाने को बाहर आने की जरूरत नहीं रहती। इन भवनों का वास्तु शिल्प भी पुराने कारीगरों की मेहनत को बयां करता है। तिबार में लगे लकड़ी के खंबों समेत दरवाजे, खिड़कियों व जंगलों पर की गई नक्काशी काबिले तारीफ थी। हालांकि, उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में भौगोलिक स्थितियों के अनुरूप भवन शैलियों में अंतर भी पाया जाता है, लेकिन छत के लिये पठाल व दीवारों की मजबूती के लिये लकड़ी के मोटे खंबों का इस्तेमाल सभी जगह समान रूप से होता था। हर तरह से पहाड़ के लिए उपयोगी होने के बावजूद नगरीकरण की होड़ में पहाड़वासी खुद अपनी पहचान को छोड़ते जा रहे हैं। गत दो दशक में पर्वतीय नगरों, कस्बों सहित सड़क से सटे गांवों में ऐसे परंपरागत मकानों का अस्तित्व काफी सिमट गया है। जिन गांवों में सड़कें नहीं पहुंच सकी हैं, वहां भी घोड़ों- खच्चरों के जरिए सीमेंट, सरिया आदि निर्माण सामग्री पहुंचाकर आधुनिक मकान तैयार किए जाने लगे हैं। उधर, परंपरागत भवन निर्माण शैली के हाशिये पर जाने से इसके कारीगरों का रोजगार छिन गया है। ये लोग मजदूरी से जुडऩे लगे हैं। मुस्टिकसौड़ निवासी बलवीर, जमनालाल व विमला ने बताया कि दस साल पहले तक उन्हें ऐसे मकान बनाने का काम मिल जाता था, लेकिन अब कोई इसके लिए तैयार नहीं है। आर्किटेक्ट केसी कुडिय़ाल के मुताबिक परंपरागत भवन शैली पहाड़ों में अनुभव के आधार पर तैयार हुई थी। वह कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के दौर में ऐसे मकानों की जरूरत भी बढ़ गई है। इनमें लखवाड़ में महासू देवता मंदिर व धराली में परंपरागत व आधुनिक शैली के मिश्रण से तैयार हो रही एक इमारत शामिल हैं।

संस्कृत को प्रोत्साहन

सूबे में संस्कृत को दूसरी राजभाषा का दर्जा देने के बाद सरकार ने इस भाषा के प्रचार- प्रसार के लिए बहु आयामी कदम उठाने के संकेत दिए हैं। देवभूमि उत्तराखंड में देववाणी समझी जाने वाली संस्कृत के उत्थान के लिए माहौल उपयुक्त है, ऐसा सरकार का मानना है। दो साल की अवधि में संस्कृत के लिए अलग महकमा, निदेशालय का गठन तो किया ही गया, दूसरी राजभाषा का दर्जा देकर सरकार ने रोजगार के नए अवसर मुहैया कराने के संकेत भी दिए हैं। संस्कृत भाषा को प्रोत्साहन सिर्फ नई योजनाएं बनाने से ही नहीं मिल सकता। योजनाओं को जमीन पर उतारने के साथ ही इस क्षेत्र में रोजगार के नए मौके पैदा करने की जरूरत है। संस्कृत भाषा फिलवक्त पूजा-अर्चना व कर्मकांड तक सीमित है। वेद अध्ययन, शोध व आयुर्वेद के ज्ञान के लिए संस्कृत भाषा में दीक्षित होना जरूरी है। आमतौर पर संस्कृत महाविद्यालयों में अध्ययन करने वालों को पंडिताई या शिक्षक के तौर पर रोजगार उपलब्ध हो रहा है। उच्च रोजगार के मौके बेहद सीमित हैं। इस वजह से आम अभिभावक अपने बच्चों को संस्कृत में अध्ययन के लिए प्रोत्साहित करने से बचता ही है। राज्य सरकार ने संस्कृतपाठियों को आईएएस व पीसीएस की परीक्षा की तैयारी के लिए प्रोत्साहित करने का बीड़ा उठाया है, उससे इस भाषा में अध्ययन करने वालों को पिछड़ेपन की मनोभावना से निजात मिलेगी। इस नजरिए से उत्तराखंड देश का पहला राज्य होगा, जहां संस्कृत पर इसतरह फोकस किया गया है। एक प्राचीनतम भाषा के रूप में संस्कृत के विकास उसके प्रचार-प्रसार के लिए उठाए जा रहे कदमों से संस्कृत के गर्भ में छिपे ज्ञान के भंडार के साथ भाषा व संस्कृति की जड़ों को टटोलने का मौका नई पीढ़ी को मिल सकता है। वैश्वीकरण व बाजारीकरण के इस दौर में नई पीढ़ी ने हौसलों से नई उड़ानें तो भरी हैं, लेकिन सांस्कृतिक क्षरण व नैतिकता के बोध का ह्रास तेजी से हुआ है। उम्मीद की जानी चाहिए कि संस्कृत में सामाजिकता व नैतिकता के बोध से ओतप्रोत शिक्षा देश के भावी कर्णधारों में सांस्कृतिक चेतना का विकास करेगी। -

Tuesday, February 2, 2010

यहां सरकंडा की कलम से होता है लेखन

होल्डर, पेन व पेंसिल का नहीं किया जाता है प्रयोग 1974 में खुला था प्राथमिक विद्यालय अपर छरबा विकासनगर(देहरादून):पछवादून में एक ऐसा भी विद्यालय है, जहां न होल्डर, न पेन और न ही पेंसिल का प्रयोग होता है। यहां केवल लकड़ी (सरकंडा) की कलम से लेखन होता है। जब से यह विद्यालय खुला है, तब से यहां यही परिपाटी चलती आ रही है। लकड़ी की कलम के प्रयोग से विद्यार्थियों का लेख सुंदर बनता है, वहीं अभिभावकों को पैसे भी खर्च नहीं करने पड़ते। सहसपुर विकासखंड अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय अपर छरबा में लकड़ी की कलम के सिवा लेखन में और किसी चीज का प्रयोग नहीं किया जाता है। विद्यालय की स्थापना वर्ष 1974 में हुई थी। स्कूल के पहले हेडमास्टर ने यहां छात्रों से लकड़ी की कलम से लेखन शुरू कराया था, उसके बाद से लगातार यही परंपरा चलती आ रही है। कक्षा एक से लेकर पांच तक हर बच्चा लेखन में लकड़ी की ही कलम का प्रयोग करता है। अन्य विद्यालयों में छात्र लेखन में होल्डर, पेन व पेंसिल का प्रयोग करते हैं, लेकिन यहां ऐसा नहीं है। यहां अध्ययनरत विद्यार्थियों का लेखन भी काफी साफ-सुथरा है। इस विद्यालय में विभिन्न कक्षाओं में 105 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। बच्चों को लेखन में कोई दिक्कत न आए, इसके लिए विद्यालय में हर विद्यार्थी के लिए डेस्क की व्यवस्था है। छात्र टाट-पल्ली पर बैठकर डेस्क पर कॉपी रखकर लिखते हैं। स्कूल में कक्षा पांच में अध्ययनरत अनुजा व तनुजा का कहना है कि उन्होंने विद्यालय में तीसरी कक्षा में दाखिला लिया था। इससे पूर्व, उन्होंने जौनसार में एक राजकीय प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई की। जब वे यहां आई तो उनका लेखन साफ नहीं था, लेकिन जब से उन्होंने लकड़ी की कलम से लिखना शुरू किया, उनकी राइटिंग काफी सुंदर हो गई है। विद्यालय की अध्यापिका सावित्री भटनागर का कहना है कि लकड़ी की कलम से अक्षर साफ-साफ और बढि़या ढंग से लिखे जाते हैं। कक्षा पांच तक लेखन में जितना सुधार हो गया, वही आगे चलता है। इसके बाद लेखन में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हो पाता। उनका कहना है कि विद्यालय में साफ-सुथरे लेखन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। अन्य विद्यालयों से जो छात्र आते हैं, लकड़ी की कलम से लेखन करने से उनकी राइटिंग भी सुधर जाती है। छात्रों द्वारा लेखन में प्रयुक्त की जाने वाली कलम सरकंडा की लकड़ी से बनाई जाती है, जो गांव में काफी अधिक मात्रा में पाई जाती है। एक लकड़ी की कलम एक साल से अधिक चल जाती है। इससे अभिभावकों को पेन व पेंसिल पर पैसे खर्च नहीं करने पड़ते हैं। -

पंचायतीराज में भी 'शक्ति' बनेगी नारी

पहाड़ी सूबे में पंचायतीराज व्यवस्था की रीढ़ बन चुकी है मातृशक्ति -नारी सशक्तीकरण के चौतरफा प्रयासों से मजबूत होंगी पहाड़ी सूबे की पंचायतें -महिला बाल विकास, समाज कल्याण व शिक्षा विभाग से बंधी उम्मीदें - लंबे संघर्ष के बूते पहाड़ी राज्य का सपना साकार करने वाली मातृशक्ति अब उत्तराखंड में पंचायतीराज व्यवस्था की रीढ़ बन चुकी हैं। सितंबर 2008 में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में पहली दफा सूबे की नारीशक्ति को 50 फीसदी प्रतिनिधित्व मिला। वर्ष 2009 'आधी-आबादी' को मिले इस सम्मान की खुमारी में गुजरा, तो अब नूतन वर्ष 2010 में नारी-सशक्तीकरण की मुहिम को सही मायने में अमलीजामा पहनाने के लिए सरकारी महकमे नए जोश के साथ जुट गये हैं। सितंबर 2008 में हरिद्वार को छोड़कर बाकी सभी 12 जनपदों में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में कुल 61011 में से 30473 सीटों पर महिला प्रत्याशी निर्वाचित हुई। इनमें 3817 ग्राम प्रधान, 24831 ग्राम पंचायत सदस्य, 1622 क्षेत्र पंचायत सदस्य व 203 जिला पंचायत सदस्य शामिल हैं। साफ है कि राज्य सरकार द्वारा लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे में 'आधी-आबादी' को 50 फीसदी आरक्षण दिए जाने के बाद पहाड़ी सूबे की पंचायतों की कमान मातृशक्ति के हाथों में आ गई है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि 59.6 प्रतिशत महिला साक्षरता (जनगणना 2001) वाले राज्य की यह पंचायतें वास्तव में कितनी शिक्षित, जागरूक व सक्षम होंगी। सचाई यह भी है कि 2008 पंचायत चुनावों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों में 17 फीसदी अशिक्षित व तकरीबन 17 फीसदी ही कहने भर को साक्षर हैं। यही कारण है, कि लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे से शुरू हुई नारी-सशक्तीकरण की इस मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए अभी लंबा सफर तय करना होगा। खासतौर पर दूर-दराज व ग्रामीण अंचलों में निरक्षरता इसमें बड़ी बाधा बनकर सामने आ रही है, लेकिन सरकार ने महिलाओं को साक्षर बनाकर विकास की नई इबारत लिखने की जो योजनाएं गढ़ी हैं, उससे नववर्ष की नई उमंगों व उम्मीदों को पंख लगते दिख रहे हैं। कन्याओं को सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक रूप से बराबरी का दर्जा दिलाने में महिला एवं बाल विकास विभाग की नंदादेवी कन्या योजना उम्मीद की किरण जगाती है। इसके तहत बीपीएल परिवार में जन्म लेने वाली दो बालिकाओं को 5000 रुपये दीर्घावधि जमा योजना के रूप में दी जाएगी। इसे कन्या के 18 वर्ष पूर्ण होने व हाईस्कूल उत्तीर्ण करने के बाद ही भुनाया जा सकेगा। समाज कल्याण विभाग की गौरादेवी कन्या धन योजना के तहत वित्त वर्ष 209-10 में इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण करने वाली बीपीएल परिवार की कन्याओं को 25000 रु. की वित्तीय सहायता दी जाएगी। पिछड़ी जाति के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति, आश्रम पद्वति विद्यालयों के जरिए भी महिला शिक्षा को प्रोत्साहित किया जा रहा है। शिक्षा विभाग ने भी इस दिशा में कई उम्मीदें जगाई हैं। सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा गारंटी केंद्र, वैकल्पिक शिक्षा केंद्र, निशुल्क पाठ्य पुस्तक, मध्याह््न भोजन, बालिकाओं की प्रारंभिक शिक्षा के राष्ट्रीय कार्यक्रम के साथ-साथ कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय भी इस दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे। निदेशक, विद्यालयी शिक्षा पुष्पा मानस बताती हैं कि इस वर्ष शासकीय विद्यालयों में छात्राओं की सुविधा के लिए कॉमन-रूम, शौचालय निर्माण के साथ ही बालिकाओं को छात्रवृत्ति भी दी जानी हैं। इंटरमीडिएट तक निशुल्क बालिका शिक्षा के अलावा कक्षा 8 में की शत-प्रतिशत छात्राओं को कक्षा 9 में प्रवेश दिलाने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। जाहिर है, अलग-अलग मोर्चे पर होने वाले इन प्रयासों के बूते नारी-सशक्तीकरण की उम्मीदें धरातल पर नजर आएंगी। जिसके फलस्वरूप त्रिस्तरीय पंचायतों की कमान शिक्षित, जागरूक व समक्ष नारीशक्ति के हाथों में होगी। -

'एमटीएम' बनने की राह पर पहाड़ की नारी

सरकार के होमवर्क से प्रतिभा निखारने को तैयार 'आधी आबादी' बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार होगा मुख्य फोकस 'पहाड़ की नारी, सब पर भारी' का जुमला इस साल चरितार्थ होने की दहलीज पर है। सरकार महिलाओं को सशक्त बनाने का होमवर्क पूरा कर चुकी है तो देहात से लेकर शहर तक की नारी मल्टी टास्क मैनेजर (एमटीएम) की भूमिका निभाने को तैयार है। खेत-खलिहान से लेकर आफिस और घर-परिवार से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों तक महिलाएं अपनी प्रतिभा से किसी को भी हतप्रभ कर सकती हैं। उन्हें केवल प्रोत्साहन की दरकार है और इसका ताना-बाना बुना जा चुका है। देवभूमि की जुझारू और संघर्षशील नारी को अगर जरूरत है तो केवल उचित अवसर की। उनके पास काबलियत भी है और कुछ करने का जज्बा भी। नववर्ष में एक नई सोच और आत्मविश्वास के साथ तरक्की के रथ पर सवार जल, जंगल व चारे के ताने-बाने के बीच देवभूमि में महिलाएं मल्टी टास्क मैनेजर के रूप में नजर आएंगी। और हो भी क्यों नहीं, जब लक्ष्य तय है और निशाना बेहतर है। प्रयासों में कोई कंजूसी नहीं। पहाड़ हो या फिर तराई का अंतिम छोर। आगाज ठीक है, तैयारी चुस्त है, काम दुरुस्त है तो नये साल में अंजाम भी बेहतर होने की उम्मीद है। नए साल में योजनाओं का लाभ सही और सुनिश्चित कराने को सरकारी प्रयास तेज होंगे तो इसके सही मायने समझने को महिलाओं की भी तैयारी पूरी है चाहें गांव की हो या शहर की। हम कह सकते हैं कि सरकारी प्रयास में बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार मुख्य फोकस रहेगा। सभी गांवों में आंगनबाड़ी केंद्र खोले जाएंगे मौजूदा केंद्रों व मिनी केंद्रों के लिए प्री-स्कूल किट और मेडिसील किट उपलब्ध कराई जाएगी। लैंगिक असमानता दूर करने,भ्रूण हत्या रोकने, बाल विवाह को कम करने के साथ ही कन्या शिशु को आर्थिक सुरक्षा प्रदान की योजना पर तेजी से काम होगा। राज्य महिला समेकित विकास योजना के तहत महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से महिला समूहों के माध्यम से रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएंगे। चारधाम के प्रसाद वितरण व्यवस्था का जिम्मा महिलाओं को दिया जाना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसी तरह की कुछ योजनाएं और भी है जो आने वाले दिनों में दिखाई देगा। उरेडा के सहयोग से माता समितियों को सोलर कुकर वितरण के काम में तेजी लाने के प्रयास किए जाएंगे। कामकाजी महिलाओं की बढ़ती तादाद को देखते हुए उनके आवास की व्यवस्था अब हर जिले में कराने की तैयार की जा रही है। इसके लिए सभी जिलों में हास्टल निर्माण पर काम शुरू होगा। मोनाल परियोजना के अंतर्गत 11 से 18 वर्ष के बीच की करीब एक हजार किशोरियों को आत्मरक्षा के गुर सिखाने के लिए उत्तराखंड प्रशासन अकादमी नैनीताल के सहयोग से मास्टर ट्रेनर बनाया जाएगा। ये ही मास्टर ट्रेनर सूबे के सभी विकास खंडों की किशोरियों को आत्मरक्षा के गुर सिखाएंगी। संयुक्त राष्ट्र संघ की मदद से सूचना शिक्षा और संचार रणनीति का मसौदा तैयार करने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाएगी। बीपीएल श्रेणी से नीचे के परिवारों की कन्याओं को शिक्षा उपलब्ध कराने की योजनाओं का और विस्तार होगा। घरेलू हिंसा रोकने को बने कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर दिए जाने के साथ राज्य महिला आयोग के अंतर्गत जनपद स्तर पर महिला अधिकार उत्पीड़न मामलों की सुनवाई एवं निस्तारण की प्रक्रिया सुनिश्चित करने की तैयारी है। -