Saturday, January 30, 2010

--अटूट आस्था का प्रतीक है 'मदन नेगी'

-यहां भगवान के रूप में मनुष्य की होती है पूजा -पूजा अर्चना व शुभ कार्य के समय मनदनेगी को चढ़ाते हैं शराब -देवता के मेले के समय प्रसाद के तौर पर वितरित होती है शराब , नई टिहरी यूं तो उत्तराखंड को देवभूमि के रूप में जाना जाता है। पौराणिक आख्यानों व धार्मिक मान्यताओं के तहत माना जाता है कि इस राज्य के कण- कण में देवों का वास है। यही वजह है कि यहां पग- पग पर स्थित शिवालय व सिद्धपीठों के जरिए श्रद्धालु धर्म- अध्यात्म से जुड़े रहते हैं। भगवान के विभिन्न रूपों की पूजा करने की तो यहां परंपरा है ही साथ ही सामाजिक उत्थान की दृष्टि से विशेष योगदान करने वाले मनुष्यों को भी यहां देवता स्वरूप पूजा जाता है। ऐसा ही एक मंदिर है टिहरी जिले में स्थित मदन नेगी। जिला मुख्यालय से करीब 62 किमी की दूरी पर स्थित जाखणीधार ब्लाक के रैका धारमंडल क्षेत्र के लोगों का प्रमुख देवता है मदन नेगी। मदन सिंह नेगी सदियों पूर्व क्षेत्र में पैदा हुए एक साधारण व्यक्ति थे। हालांकि, उनके बारे में किसी पौराणिक, ऐतिहासिक पुस्तक में वर्णन नहीं मिलता, लेकिन क्षेत्र के बुजुर्गो से जो जानकारी मिलती है, उसके मुताबिक सन् 1700 से लेकर 1740 के बीच नीति माणा से नेगी जाति के चार भाइयों में से दो महाराज नेगी व स्याल नेगी पटुड़ी गांव में, तीसरा भाई चंपूका नेगी कफलोग व चौथा बागा नेगी धारकोट गांव में बसे। इनमें से स्याल नेगी का एक पुत्र हुआ मदन नेगी। बताया जाता है कि मदन नेगी बहुत वीर थे। मदन नेगी की मृत्यु तीस वर्ष की अल्पायु में हुई थी, उस समय वह अविवाहित थे। बताया जाता है कि वह अपने मामा जीतू बगड़वाल के साथ धान रोपने को बैल लेने के लिए पटुड़ी से अठूड़ कोटी गांवआए थे। वापसी में रास्ते में टिहरी राजा के आदेश पर उन्हें रोक लिया गया, उन्हें टिहरी की सीमा के भीतर से होकर न जाने के निर्देश दिए गए। बताया जाता है कि मदन नेगी सुरापान के शौकीन थे और दिन का अधिकांश वक्त वह शराब पीने में गुजारते थे। राजा के आदेश पर वह आक्रोशित हो गए और जमकर शराब का सेवन किया। इसके बाद नेगी व उनके मामा ने टिहरी के बाहरी इलाके से सटे भुज्याड़ी के सेरा रास्ते से घर पहुंचने का निर्णय लिया। यह रास्ता काफी बीहड़ था, रास्ते में एक बैल को भागीरथी पार कराते वक्त नेगी कोटी की धार में नदी में डूब गए। इस घटना को लंबा वक्त गुजरने के बाद एक बार टिहरी राजा प्रतापशाह अपने रथ पर इस मार्ग से होकर गुजरे, तो उनका रथ कोटी की धार से आगे नहीं बढ़ पाया। दो-तीन बार यही घटना होने पर राजा ने अपने कुल पुरोहितों को बुलाया और चर्चा की। कुलपुरोहितों ने बताया कि उक्त स्थान पर किसी शक्ति का वास है, जिसका पता लगने पर ही निवारण किया जा सकेगा। जब कुल पुरोहितों ने उस शक्ति को अवतरित किया, तो उसने अपने को मदन नेगी बताया और उक्त स्थान पर मंदिर बनाने की इच्छा जाहिर की। नेगी ने मंदिर में प्रसाद रूप में शराब चढ़ाने को भी कहा, साथ ही मंदिर के पास पेड़ पर झूला लगाने को भी कहा। इसके बाद टिहरी राजा ने यहां मंदिर का निर्माण कराया, तब से इस स्थान का नाम मदन नेगी पड़ गया। सदियों से यहां रैका व धारमंडल क्षेत्र के ग्रामीण प्रतिवर्ष तीन-चार अप्रैल को मेला आयोजित करते हैं। स्थानीय निवासियों में मदन नेगी के प्रति विशेष श्रद्धा है। लोग मंदिर में मन्नतें मांगने के अलावा घर में शादी या अन्य कोई आयोजन होने पर सर्वप्रथम मदन नेगी को शराब चढ़ाते हैं। -

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