Saturday, January 30, 2010

तो शहर में गुम नहीं होगा गांव का आदमी

आर्थिक सेवाओं की मजबूती पर टिकी नई आस -ग्रामीण आर्थिकी: न्याय पंचायतें बनेंगी गांवों की मंडियां -कर्ज से बढ़ी छटपटाहट, नई नीति में है समस्या से छुटकारे का खाका देहरादून: 'कौन कहता है कि आसमान में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों', दुष्यंत की ये पंक्तियां नए वर्ष 2010 के आगाज के साथ उत्तराखंड के दामन से जुड़ती नजर आ रही हैं। जी हां, 85 लाख का आंकड़ा पारकर एक करोड़ के नजदीक सूबे की आबादी की नई उम्मीदें आर्थिक सेवाओं की मजबूत बुनियाद पर टिकने जा रही हैं। सरकार की योजना परवान चढ़ी तो गांव का आदमी पलायन कर शहरों की गलियों में गुम नहीं होगा। यही नहीं, यह वर्ष भविष्य में 60 हजार से ज्यादा नए रोजगार सृजित करे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सूबे के संसाधन लंबे समय तक बहु आयामी विकास का सिर्फ भरोसा भर नहीं रहेंगे, बल्कि बेहतर और नियोजित जन संसाधन की बदौलत आम आदमी की चाहत को जमीन पर उतारते दिखेंगे। इसके लिए सरकार आर्थिक सेवाओं, सामान्य सेवाओं व सामाजिक सेवा की 'तिकड़ी' की पहली सीढ़ी को ज्यादा तवज्जो देने जा रही है। कर्ज के बढ़ते जाल से सूबे को बचाने के लिए भी यह कदम उठाना जरूरी हो गया है। उम्मीद की इस रोशनी को उद्योग, उद्यानिकी, वन, पर्यटन और ऊर्जा के क्षेत्रों ने जगाया है। ये क्षेत्र शहरी विकास के साथ ग्रामीण क्षेत्रों की कायापलट का जरिया बनेंगे। सरकार की नई नीति में गांव की पैदावार के लिए मंडी जिला या मंडल मुख्यालयों के बजाए न्याय पंचायतें होंगी। एक न्याय पंचायत तकरीबन आठ से दस गांवों को समेटे है। पर्वतीय और विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इलाकों में उपज के सही विपणन के लिए साझेदारी की इस व्यवस्था को कारगर बनाने की तैयारी है। सूबे में इस प्रयोग के लिए जमीन तैयार हो चुकी है। पर्वतीय व ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन की बड़ी वजह स्तरीय शिक्षा व रोजगार के अवसरों की कमी है। नान प्लान के बजट में बढ़ोत्तरी सूबे की चिंता बढ़ा रही है। राज्य का प्लान व नान प्लान का बजट ही करीब पंद्रह हजार करोड़ है। कोशिश प्लान के बजट को बढ़ाने की है, ताकि विकास रफ्तार पकड़ सके। सरकारी क्षेत्र पर बोझ कम करने को रोजगार की संभावनाओं वाले प्राइवेट सेक्टर में हरिद्वार, देहरादून व ऊधमसिंहनगर के तराई की करीब तीन हजार फैक्ट्रियों में 1.75 लाख लोगों को रोजगार मिला है। गांवों और एग्रो बेस्ड इंडस्ट्रीज को रोजगार के नजरिए से नई संभावना का क्षेत्र माना जा रहा है। कच्चे माल पर आधारित इंडस्ट्रीज को पहाड़ों में चढ़ाने की तैयारी है। पिछड़े गांवों प्रतिस्पर्धा को तत्पर हों, इसके लिए उन्हें सेंटर आफ एक्सीलेंस के तौर पर विकसित किया जाएगा। अटल आदर्श ग्राम योजना के रूप में शुरू किए गए प्रयोग का मकसद स्थानीय स्तर पर स्तरीय शिक्षा व रोजगार के संसाधन जुटाना है। उम्मीद है कि इससे गांव का व्यापारी व किसान नई दृष्टि के साथ आगे आएगा। पंचायतों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण के साथ खनन में उनकी भूमिका पर विचार किया जा रहा है। उत्तराखंड में नदियों से चुगान के साथ तांबा, मैग्नासाइड, व अस्कोट जैसे क्षेत्र सोने की खदान की संभावनायुक्त हैं। राज्य की नीति निर्माताओं की मानें तो खनन से ही एक हजार करोड़ की आय संभव है। आय के नए स्रोत 13वें वित्त आयोग की संस्तुतियों का लाभ लेने में सूबे की मदद करेंगे। ग्रामीण आर्थिकी को खंगालने, उसे विकसित करने से सूबे को शत-प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य भी नजदीक लग रहा है। अभी हरिद्वार, टिहरी, उत्तरकाशी, ऊधमसिंहनगर, बागेश्वर व चंपावत ऐसे जिले हैं, जिनकी साक्षरता का प्रतिशत सूबे के औसत से नीचे है। ग्रामीण पर्यटन रोजगार नए मौके लाया है। नए साल में ऐसे जिलों में आर्थिकी की नई कवायद को ढांचागत सुविधाओं की ठोस बुनियाद के रूप में देखा जा सकता है। प्रदेश के नियोजन मंत्री प्रकाश पंत भी मानते हैं कि ग्रामीण आर्थिकी की मजबूत जमीन तैयार करना जरूरी है। सरकार इसकी तैयारी में जुटी है। -

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