Friday, January 1, 2010

मोहना तेरि मुरलि बाजी ग्वाल-बालों का संग

देहरादून, प्रसिद्ध गढ़वाली लोकगायक प्रीतम भरतवाण के जागर व गीत और राजन-साजन मिश्रा के शास्त्रीय गायन से सजी विरासत-2009 की चौदहवीं शाम में चार चांद लगा दिए। यादगार बनी इस शाम में लोगों ने जागर व गढ़वाली गीतों का भरपूर लुत्फ उठाया तो संगीत की महफिल में विभिन्न रागों पर सुध-बुध बिसरा बैठे। राजधानी में अंबेडकर स्टेडियम स्थित डाडामंडल मंदिर परिसर में बुधवार को विरासत की सांस्कृतिक संध्या का आगाज प्रीतम भरतवाण ने मां सुरकुंडा देवी के जागर से किया। इसके बाद तो उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में जागर और गीतों की ऐसी झड़ी लगाई कि दर्शकों को मंत्रमुग्ध हो गए। क्या नहीं था उनके तरकश में। न सिर्फ जागर, बल्कि बद्दी शैली के गीत, पारंपरिक पंवाड़े, पंडवार, शिव शैली के गीत, सरैं गीत और न जाने क्या-क्या। प्रीतम ने जा बाडुली सुवा मा रैबार पौंछयो, त्वै बगैर भलु नि लगदु बतैयो सुनाकर फौजी की व्यथा को बयां किया तो मोहना तेरी मुरलि बाजी ग्वाल बालों का संग से दर्शकों को झूमने पर विवश कर दिया। फिर उन्होंने राजुला-मालुशाही की गाथा के अलावा पंडवार में महाभारत के द्यूत प्रसंग सुनाया। इसके पश्चात उन्होंने युवाओं की नब्ज को भांपते हुए जब सरुली मेरु जिया लगीगे सुनाया तो दर्शकों की थिरकन बढ़ गई। फिर तो प्रीतम ने बंग्लादेश कालौंडांड लड़ै लगी चा तेरि सूरत मेरि बिमुलु मन मा बसीं चा, सुंदरा छोरी कई गीत नॉन स्टाप सुनाए। इसके साथ ही उन्होंने मंच से विदा ली। जागर और गढ़वाली गीतों के बाद फिर महफिल सजी और राजन-साजन मिश्रा बंधुओं ने विभिन्न रागों की ऐसी तान छेड़ी कि दर्शक सुध-बुध ही खो बैठे। उन्होंने कार्यक्रम की शुरूआत राग मालकोंस पर आधारित भजन जिनके मन राम विराजे से की। फिर उन्होंने राग दुर्गा जै-जै मां दुर्गे भवानी सुनाया। इसके बाद राग जोग, दरबारी, कांगड़ा आदि की प्रस्तुतियां भी उन्होंने दी। देर रात तक रसिकजन उनके शास्त्रीय गायन में डूबे रहे।

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