Friday, January 1, 2010

कोदा-झंगोरा खाएंगे, उत्तराखंड बनाएंगे।

कोदा-झंगोरा खाएंगे, उत्तराखंड बनाएंगे। उत्तराखंड बना जरूर, लेकिन लोग कोदा-झंगोरा के नाम से ही ऐसे बिदकने लगे- जब मंडुवे की कोई कमी नहीं थी, घरों में भंडार भरे रहते थे, तब लोगों ने उसे हिकारतभरी नजरों से देखा और अब ढूंढकर भी नहीं मिलता तो मारे-मारे फिर रहे हैं। मंडुवे की रोटी का जिक्र आते ही ऐसे चहक उठते हैं, मानो जनम-जनम के भूखे हों और इस हाल में कहीं खाने को मिल जाए तो नजारा देखने लायक होता है। नेशनल हैंडलूम एक्सपो के त्रिवेणी परिसर में लगे गढ़भोज के स्टाल पर मंडुवे की रोटी और तिल की चटनी का जायका लेने के लिए उमड़ रही भीड़ तो यही कहानी बयां कर रही है। जिसने भूले-भटके भी कभी मंडुए का जायका लिया होगा, वह जानता है उसकी अहमियत और कहीं न कहीं से थोड़ा-बहुत जुगाड़ हर साल कर लेता है। लेकिन, जिसने उसे कम हैसियत वाले लोगों का आहार माना, वह आज उसका स्वाद चखने को बेकरार है तो इसके पीछे कहीं न कहीं जड़ों से छूट जाने का दर्द है। जरा एक दशक पूर्व सड़कों पर गूंजते उन नारों को स्मृति में लाने की कोशिश कीजिए, एक ही स्वर सुनाई देता था, कोदा-झंगोरा खाएंगे, उत्तराखंड बनाएंगे। उत्तराखंड बना जरूर, लेकिन लोग कोदा-झंगोरा के नाम से ही ऐसे बिदकने लगे, जैसे उसे देखने भर से ही अछूत हो जाएंगे। हुआ क्या, लोग खेती-बाड़ी छोड़कर स्टेटस मेंटेन करने को छानने लगे शहरों की खाक। पहले दिल्ली-मुंबई-चंडीगढ़ जैसे शहरों की ओर दौड़ते थे, अब देहरादून, हल्द्वानी जैसे शहरों में बसने की होड़ लग गई। जेंटलमैन जरूर बन गए, लेकिन जड़ें सूखने लगीं, भला सूखती जड़ें भी कभी पेड़ को हरा-भरा रख सकती हैं। जड़ों से कटकर कौन-सा समाज अपना अस्तित्व कायम रख पाया। यह बात देर ही सही, लेकिन लोगों की समझ में आने लगी है। तभी तो पहाड़ी उत्पादों का जिक्र होते ही निकल पड़ते हैं उनकी खोज में। परेड ग्राउंड में चल रहे नेशनल हैंडलूम एक्सपो में लगा गढ़भोज का स्टाल इसका गवाह है। 25 दिसंबर को जब चंबा (टिहरी) निवासी विक्रम सुयाल ने वहां मंडुवे की रोटी के साथ भांग का तड़का वाले आलू के गुटके बनाने शुरू किए तो शाम होते-होते करीब दो हजार की बिक्री हो चुकी थी। अगले दिन से विक्रम ने तिल की चटनी व झंगोरे की खीर बनानी भी शुरू कर दी। बकौल विक्रम, स्टाल में पहले आओ-पहले पाओ वाली स्थिति है। जो भी एक्सपो में पहुंच रहा है, मंडुवे की रोटी व तिल की चटनी का स्वाद जरूर चखता है। यहां तक कि लोग रोटी व आलू के गुटके पैक कराकर घर भी ले जा रहे हैं

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