Wednesday, December 16, 2009

-जौनसार बावर: यहां मेहमान है भगवान

जौनसार-बावर में आज भी कायम है 'अतिथि देवो भव:' की पंरपरा एक परिवार का अतिथि होता है पूरे गांव का मेहमान हंसी-खुशी का एक पल भी गंवाना नहीं चाहते क्षेत्र के लोग आधुनिक दौर में भी जनजाति क्षेत्र में अतिथि देवो भव: की परंपरा कायम है। जौनसार-बावर का जिक्र होते ही जेहन में एक ऐसे सांस्कृतिक परिवेश वाले पर्वतीय क्षेत्र की तस्वीर कौंधती है जो बाकी दुनिया से बिल्कुल अलग है। खान-पान, रहन-सहन व वेशभूषा ही नहीं, बल्कि यहां के लोगों के जीने का अंदाज भी जुदा है। मेहमानों को सिर माथे पर बिठाना क्षेत्र की संस्कृति है। तीज त्योहार से लेकर खुशी का एक पल भी यहां के लोग गंवाना नहीं चाहते। तेजी से बदलते सामाजिक परिदृश्य में भी क्षेत्र की संस्कृति कायम है। साढ़े तीन सौ से अधिक संख्या वाले गांवों का यह जनजाति क्षेत्र अनूठी सांस्कृतिक पहचान की वजह से देश-दुनिया के लिए जिज्ञासा का विषय है। प्राकृतिक खूबसूरती, सुंदर पहाडिय़ां और संस्कृति व धार्मिक परिवेश जिज्ञासुओं को बरबस अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां की संस्कृति का एक बड़ा अध्याय अनछुआ रहा है। जमीनी हकीकत देखने से क्षेत्र को लेकर बाहरी दुनिया में व्याप्त भ्रांतियां शीशे पर जमीं गर्द की तरह साफ हो जाती हैं और तस्वीर उभरती है, उन सीधे-सादे लोगों की जो आज के दौर में भी मेहमान को भगवान का रूप मानते हैं। गांव में एक परिवार का अतिथि पूरे गांव का अतिथि होता है। मेहमाननवाजी तो कोई जौनसार-बावर के लोगों से सीखे। परंपरानुसार घर की महिलाओं द्वारा मेहमानों को घर में आदर पूर्वक बैठाकर हाथ व पैर धुलाए जाते हैं। घर आए मेहमान के लिए तरह-तरह के पारंपरिक व्यजंन व लजीज पकवान बनाए जाते हैं। मेहमानों की खातिरदारी में क्षेत्र के लोग कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ते। हर स्थिति में हंसते-गाते रहना यहां के लोगों की विशेषता है। प्रसिद्ध समाजसेवी मूरतराम शर्मा का कहना है कि आज के दौर में कहीं पर भी ऐसी संस्कृति देखने को नहीं मिलती है। उनका कहना है कि मौजूदा समय में लोग मेहमानों को छोडि़ए, परिजनों तक से दूरी बनाने लगे हैं। इसके अलावा होली, रक्षाबंधन, जातर व नुणाई आदि त्योहार भी धूमधाम से मनाए जाते हैं। हालांकि शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बाद क्षेत्र में काफी बदलाव आया है, पर लोगों का आज भी अपनी माटी-संस्कृति से जुड़ाव बरकरार है। मेहमानों के लिए व्यंजन त्यूणी: मेहमानों के लिए पारंपरिक व्यंजनों में चावल, मंडुवे व गेंहू के आटे के सीढ़े, अस्के, पूरी, उल्वे व पिन्नवे आदि खासतौर से बनाए जाते हैं। इसके अलावा मांसाहारी मेहमानों के लिए मीट, चावल व रोटी आदि बनाया जाता है।

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