Thursday, November 19, 2009

जमींदोज हो गई वीरता की विरासत

-चमोली के बडग़ांव स्थित गोरखा ओबरा पूरी तरह क्षतिग्रस्त -सैकड़ों वर्ष पूर्व गढ़वाली वीरों ने यहीं दी थी गोरखाओं को मात -संरक्षण के अभाव में टूट गया ऐतिहासिक भवन , गोपेश्वर(चमोली): सैकड़ों वर्ष पूर्व गढ़वाली जनता पर गोर्खा सेना के आक्रमण, अत्याचार और भीषण नरसंहार के बाद गढ़वाली वीरों के साहस और शौर्य की याद दिलाने वाला ऐतिहासिक भवन 'गोरखा ओबरा' बीते दिनों की याद भर बनकर रह गया है। कभी गोरखा सैनिकों की शिकस्त का प्रतीक रहा यह भवन देखरेख व संरक्षण के अभाव में पूरी तरह जमींदोज हो गया है। इसके साथ ही गढ़वाल की ऐतिहासिक विरासत का भी एक स्तंभ टूटकर बिखर गया। चमोली जिले में जोशीमठ से करीब सात किमी दूर ऋषिकेश-जोशीमठ-सोमना मार्ग पर स्थित बडग़ांव के लोगों का सिर आज भी अपने पूर्वजों की वीरता की गाथाएं सुनाते हुए फख्र से ऊंचा उठ जाता है। हो भी क्यों नहीं, आखिर यही वह गांव है, जहां गढ़वाल भर में बर्बरता का पर्याय बन चुके गोरखाओं को मुंह की खानी पड़ी थी। गांव के 82 वर्षीय बुजुर्ग दरबान सिंह रावत बताते हैं कि सन् 1803 में गोरखाओं ने राज्य विस्तार के उद्देश्य से गढ़वाल पर हमला बोल दिया। गढ़वाली जनता को मारते- काटते उन्होंने अधिकांश क्षेत्र पर अपना आधिपत्य भी जमा लिया था। गोरखाओं के जोशीमठ से आगे घाटी की तरफ बढऩे की सूचना मिलते ही बडग़ांव के लोगों ने उन्हें सबक सिखाने की योजना बनाई। इसके तहत गांव की सबसे अशक्त व बुजुर्ग महिला को गांव में अकेले छोड़ दिया गया। गांव के सभी पुरुष, महिलाएं, बच्चे पास के ही जंगल में हथियार लेकर छिप गए। गांव में एक बड़ा भवन था, बूढ़ी महिला को कहा गया था कि जब गोरखा गांव में आएं, तो वह उनका स्वागत करे और किसी तरह भवन के भीतर ले जाकर बंद कर दे। गोरखा आए, तो बुजुर्ग महिला ने उनका सत्कार किया और भोजन कराने के नाम पर बड़े भवन के भीतर बिठा दिया। इसके बाद वह बाहर आई और जलती लकड़ी से जंगल की ओर संकेत किया। इशारा पाते ही गांव के लोग गोरखाओं पर टूट पड़े। भयंकर संघर्ष के बाद गोरखा सेनापति और कई सैनिक भवन में ही मारे गए। ग्रामीणों ने उनके शव भवन के ही तहखाने में बंद कर दिए। इसके बाद भवन बंद कर दिया गया और फिर कभी गांव का कोई बाशिंदा इस भवन में नहीं गया। इसके चलते देखरेख के अभाव में यह भवन क्षतिग्रस्त हो गया। आलम यह है कि आज भवन पूरी तरह जमींदोज हो चुका है। समाजसेवी व पत्रकार शशिभूषण बताते हैं कि वह कई बार पुरातत्व विभाग के देहरादून स्थित निदेशालय में भवन के संरक्षण के संबंध में वार्ता कर चुके हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। ग्राम प्रधान हरीश भंडारी कहते हैं किभडग़ांव से अपभ्रंश होकर आज गांव बडग़ांव हो गया है। 'भड़' का अर्थ वीर होता है, ऐसे में यह गांव उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत भी है। वह कहते हैं कि ओबरा क्षतिग्रस्त हो चुका है, लेकिन सरकार को इसके पुनर्निर्माण की दिशा में प्रयास करना चाहिए।

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