Sunday, November 22, 2009

बसंती देवी बनी उत्तरांचल ग्रामीण बैंक की ब्रांड एंबेस्डर

बसंती लोकगायकी की पहचान बनी ,तो उत्तरांचल ग्रामीण बैंक ने अपनी पहचान बनाने के लिए उनका सहारा लिया । बैंक की पहली महिला शाखा का न सिर्फ उनके हाथों उद्घाटन कराया गया ,बल्कि उन्हे अपना ब्रांड एबेंस्डर भी बनाया । बैंक के बाहर बसंती की पहाड़ के पारंपरिक गहनों से लकदक बसंती की बड़ी-बड़ी तस्वीर सभी को आकर्षित करती हैं उन्हें देवभूमि की तीजन कहा जा सकता है । सुर,ताल और लय के साथ उनका बहाव अद्भुत है । भले ही वे बड़े फलक पर चमकता सितारा न हों ,लेकिन वह उत्तराखंड लोकगायकी की पारंपरिक पहचान बन चुकी हैं। उन्होंने गायन के ऐसे क्षेत्र में पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती दे डाली ,जिसमें महिला स्वर के लिए कभी पहाड़ में कोई जगह नही रही। उत्तराखंड में बसंती किसी परिचय की मोहताज नही हैं। पारंपरिक जागर शैली को नए आयाम देकर न सिर्फ उन्होंने एक मुकाम तक पहुंचाया है,बल्कि एक दूरस्थ गांव में जन्मी बसंती आज एक बैक की ब्रंड एबेंसडर हैं और उन्होन अपने आप को गौरा देवी ,बेछेन्द्रीपाल और हिमानी शिवपुरी जैसी शख्सियतों के समकक्ष खड़ा कर दिया है। पारंपरिक गायक शैली का दूसरा नाम 56 वर्षीय बसंती बिष्ट का जन्म चमोली जिले के देवाल ब्लाक के ल्वाणी जैसे पिछड़े गांव में हुआ। यह क्षेत्र गढ़वाल और कुमाऊं को जोड़ता है , इसलिए बसंती को गढ़वाल और कुमाऊं दोनों भाषाओं का ज्ञान है और उन्होंने दोनों ही क्षेत्र की भाषा में पांरपरिक गीत बनाए और गाए हैं बसंती ने पहाड़ की दूसरी कलाओं की तरह जागर और गीत मांगल गान अपनी माता बिरमा देवी पिता आलम सिंह से सीखे । केवल पांचवी कक्षा तक पढी-लिखी बसंती का विवाह पंद्रह साल की उम्र में रणजीत सिंह बिष्ट के साथ हुआ। अस्सी के दशक में पहली बार पहाड़ से निकलकर पति के साथ जालंधर पहुंची । जालंधर में बसंती ने अपनी इस कला को सुर ,ताल ,और लय के साथ आगे बढ़ाने के लिए संगीत की शिक्षा ली,लेकिन पारिवारिक कारणों से संगीत की परीक्षा मे शामिल न हो सकी । इसके बाद उन्हे गांव लौटना पड़ा । नब्बे के दशक में उत्तराखंड आंदोलन उनके जीवन का महत्तवपूर्ण मोड़ था। वह कहती हैं कि आदोंलन के दौरान जनसभाओं ,रैली ,और नुक्कड़ सभाओं में उन्होंने लोगों को एक जुट करने के लिए कई गीत बनाए और गाना शुरु कर दिया । उनके सुर ,ताल और लय को प्रशंसा तो मिली ही तथा कुछ लोगों ने उन्हे आकाशवाणा की स्वर परीक्षा में शामिल होने की सलाह दी । वह कहती हैं कि वह 1996 में मैं स्वर परीक्षा में शामिल हुई और उसमें पास भी हुई आकाशवाणी से उन्हें पारंपरिक लोकगीत और जागर गाने का मौका मिला । इसके बाद गढवाल महासभा में 1998 में पहली बार गढ़वाल महोत्सव में जागर गाने का निमंत्रण दिया । उनकी जागर गायन की शैली से लोग इतने कायल हुए की दूसरे मंच पर भी उनकी मांग बढऩे लगी । इसके बाद तो बसंती ने पीछे मुड़ कर नही देखा ,और आज तो लोककलाओं पर आधारित कोई भी कार्यक्रम उनके बिना अधूरा ही माना जाता हैं । बसंती सिर्फ मंचों तक ही सिमटकर नही रह गई है ,वह गढवाल विश्वविद्यालय से लोककलाओं में डिप्लोमा लेने वाले छात्रों को लेक्चर भी देती हैं। हालांकि उनका कहना है कि जब उन्होंने मंच पर जागर गाना शुरु किया तो शुरु में उनका विरोध भी हुआ । बसंती जागर गायन की शैली को केवल पहाड़ और पहाड़ के लोगों के बीच ही नही रखना चाहती ।जागर को पहाड़ से नीचे उतारने के लिए उन्होंने प्रयोग भी शुरु कर दिए हैं । पहाड़ के देवी देवताओं के अलावा वह रामायण और महाभारत के प्रसंगों पर भी जागर बनाने लगी हैं । वह कहती है कि पहाड़ के लोगों के बीच जब वह जागर गाती हैं तो पहले रामायण और महाभारत के प्रंसगों की कहानी हिन्दी मे सुनाती हैं । फिर उन्हे जागर की शैली में गाती हैं । (पहाड़ की इस संघर्षशील महिला के इस हौसले पर आपके क्या विचार हैं लिखे .....)

Saturday, November 21, 2009

Uttarakhand Public Service Commission Examination Date November 22,

Uttarakhand Public Service Commission Uttarakhand Public Service Commission Secretariat by the Commission reviewing officer / assistant review officer (former designation senior class assistant / junior class assistant) Examination dated 28 February 2007 relating to advertising and Releases --- Publish Date November 22, 2009 to hold initial examination Purwahn 11.00 from 1.00 pm to 13 pm janapad of Uttarakhand has been fixed at 144 test centers.

-उत्तराखंड में बढ़ेगा टाटा की लखटकिया का उत्पादन

-नैनो का उत्पादन ढाई लाख कार प्रति वर्ष करने की योजना -दो माह में 800 से 1000 कार प्रति माह हो जाएगा उत्पादन : उत्तराखंड में बेहतर व्यवसायिक माहौल को देखते हुए टाटा मोटर्स पंतनगर स्थित अपने कारखाने में नैनो का उत्पादन बढ़ाने वाला है। टाटा मोटर्स की अभी पंतनगर से करीब आठ सौ नैनो प्रतिमाह का उत्पादन कर रहा है। उसकी योजना है कि अगले दो माह में इसे 1000 तक ला दिया जाए। इतना ही नहीं वह इसे बढ़ाकर ढाई लाख नैनो कार सालाना करने की जुगत में है। टाटा मोटर्स की इस योजना से प्रदेश सरकार को भी अपने राजस्व में कई गुना बढ़ोतरी की उम्मीद है। गौरतलब है कि सिंगुर विवाद के बाद पश्चिमी बंगाल से उखड़ी टाटा मोटर्स ने उत्तराखंड को कार उत्पादन के अस्थाई ठिकाने के रूप में चुना था क्योंकि उसके पंतनगर स्थित कारखाने में नैनो उत्पादन की क्षमता थी। इतना ही नहीं प्रदेश सरकार ने भी टाटा मोटर्स को नैनो उत्पादन में भरसक सहयोग दिया जिससे देश की पहली नैनो उत्तराखंड में ही बनीं। उत्तराखंड उद्योग निदेशालय के अपर निदेशक एससी नौटियाल ने बताया कि नैनो का उत्तराखंड में उत्पादन बढऩे से राज्य की टैक्स के मार्फत होने वाली आय में कई गुना की बढ़ोत्तरी होगी। एससी नौटियाल ने बताया कि पंतनगर धीरे धीरे ऑटोमोबाइल हब के रूप में प्रसिद्धी पा रहा है। टाटा मोटर्स ही नहीं बल्कि उत्तराखंड में स्थापित विभिन्न आटोमोबाइल कंपनियों ने महसूस किया है कि उत्तराखंड में उत्पादन के लिए अन्य प्रदेशों से बेहतर माहौल है। उन्होंने बताया कि नैनो को दिल्ली में चल रहे इंटरनेशनल इंडस्ट्री फेयर में उत्तराखंड के स्टाल में भी प्रदर्शित किया गया है।

पौड़ी में एडवेंचर टूरिज्म की असीम संभावनाएं

-पैराग्लाइडिंग के मामले में विश्वस्तरीय है कंडारा घाटी -सरकार के ध्यान न देने से नहीं हो पा रहा विकास पौड़ी गढ़वाल: दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियों में पंख लगाकर उडऩे की कल्पना में अक्सर बच्चे खोए रहते हैं, लेकिन पौड़ी में यह कहानी हकीकत में बदल चुकी है। यहां की कंडारा, गगवाड़स्यूं और कोट की प्राकृतिक सुंदरता से लबरेज घाटी में घंटों ग्लाइडर लगाकर आसमान चूमने वाले पर्यटक बार-बार इसी ओर दौड़ते हैं, लेकिन राज्य सरकार को यह नजर नहीं आता और यही वजह भी है कि यह खेल अभी चंद पर्यटकों को ही लुभा पा रहा है। 'पंख होते तो उड़ आती रे' इस गीत की पंक्तियां पौड़ी में साकार की जा सकती हैं। वर्ष 1994 में हिमालयन पैराग्लाइडिंग इंस्टीट्यूट के मनीष जोशी ने अपने निजी खर्चे पर पौड़ी का पहला सर्वे किया और खुलासा किया कि पौड़ी की कंडारा, कोट व गगवाड़स्यूं ऐसी घाटियां हैं, जो पौड़ी की बेरोजगारी और गरीबी को पैराग्लाइडिंग के जरिए मिटा सकती है। इसी साल उन्होंने ट्रायल के तौर पर कुछ उड़ानें भरीं, जिन्हें देखने को पौड़ी ही नहीं बल्कि आसपास के गांवों के सैकड़ों लोग भी पहुंचे। वर्ष 1997 में कंडारा वैली के 12 युवक-युवतियों को पैराग्लाइडिंग का प्रशिक्षण दिया गया। तब उत्तर प्रदेश सरकार में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री डा. रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने प्रशिक्षण का व्यय वहन किया। तत्कालीन आयुक्त सुभाष कुमार ने प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले छात्रों को पुरस्कार व प्रमाणपत्र वितरित किए। इसके बाद यूपी पुलिस के छह प्रशिक्षु, आईआईटी दिल्ली, आईआईटी रुड़की, दिल्ली कालेज आफ इंजीनियरिंग, आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस व विदेशी छात्रों के एक दल ने भी यहां पैराग्लाइडिंग का प्रशिक्षण लिया। तब ऐसा लगा कि अब पौड़ी पैराग्लाइडिंग के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर स्थापित हो जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं सका। वर्ष 1989 में पैराग्लाइडिंग की बदौलत लिम्का बुक आफ रिकाडर््स में नाम दर्ज करवा चुके मनीष जोशी पौड़ी में पैराग्लाइडिंग की जिम्मेदारी संभालने को तैयार हैं। उनका कहना है कि पौड़ी की घाटियों में हवा का दबाव पैराग्लाइडिंग के लिए सबसे उपयुक्त है। यहां चलने वाले मंद हवा के झाोंके पैराग्लाइडर को आसमान की ऊंचाईयों तक पहुंचा देते हैं और यही वजह भी है कि विदेशी भी पौड़ी की घाटियों में उड़ान भरने के लिए लालायित रहते हैं। जिला साहसिक खेल अधिकारी जसपाल चौहान बताते हैं कि अभी तक करीब 60 युवक-युवतियों को पैराग्लाइडिंग का प्रशिक्षण दिया गया है और भविष्य में भी प्रशिक्षण दिए जाते रहेंगे। उन्होंने कहा कि इसके लिए शासन से बजट मांगा जाता है, लेकिन कई बार बजट आवंटित न होने से खेल नहीं हो पाते।

उत्तराखण्ड लोक सेवा आयोग

उत्तराखण्ड लोक सेवा आयोग आयोग द्वारा उत्तराखंड सचिवालय लोक सेवा आयोग समीक्षा अधिकारी /सहायक समीक्षा अधिकारी (पूर्व पदनाम प्रवर वर्ग सहायक/ अवर वर्ग सहायक )परीक्षा 2007 से सम्बन्धित दिनांक 28 फरवरी को प्रकाशित विज्ञापन तथा विज्ञप्ति --- प्रारम्भिक परीक्षा का आयोजन दिनांक 22 नवम्बर 2009 को पूर्वाहन 11.00 बजे से 1.00 बजे तक उत्तराखंड के 13 जनपदों के 144 परीक्षा केन्द्रो पर नियत गया है । Uttarakhand Public Service Commission Uttarakhand Public Service Commission Secretariat by the Commission reviewing officer / assistant review officer (former designation senior class assistant / junior class assistant) Examination dated 28 February 2007 relating to advertising and Releases --- Publish Date November 22, 2009 to hold initial examination Purwahn 11.00 from 1.00 pm to 13 pm janapad of Uttarakhand has been fixed at 144 test centers.

Friday, November 20, 2009

-महाकुंभ: हादसे पर तुरंत मिलेगा इलाज

प्रवेश द्वार पर हादसों से निपटने के लिए मौजूद रहेगा सचल दल -श्रद्धालु की हालत ज्यादा खराब होने पर पैरामेडिकल स्टाफ ले जाएगा अस्पताल -चार आउट पोस्ट बैरियरों पर मेला स्वास्थ्य विभाग रहेगा मुस्तैद हरिद्वार: महाकुंभ के दौरान सड़क हादसों से निपटने के लिए मेला स्वास्थ्य विभाग ने कमर कस ली है। तीर्थनगरी में प्रवेश करने वाले श्रद्धालुओं के साथ दुर्घटना होने पर तत्काल इलाज मिल सकेगा। मेला स्वास्थ्य विभाग ने ऐसा इंतजाम किया है कि घटना के तुरंत बाद पीडि़त लोगों तक राहत पहुंच जाए। इसके लिए प्रत्येक प्रवेश द्वार पर सचल दल व पैरामेडिकल स्टाफ आपात सुविधा के साथ मुस्तैद रहेगा। हरिद्वार में जनवरी से महाकुंभ का आयोजन होने जा रहा है। कुंभ को लेकर सभी विभाग अपनी-अपनी तैयारियों में जुटे हुए हैं। देश भर से करोड़ों श्रद्धालु महाकुंभ के लिए तीर्थनगरी पहुंचेंगे। इसके चलते स्वास्थ्य विभाग की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। ऐसे में हरिद्वार के सभी प्रवेश द्वारों पर ऐसी व्यवस्था की जा रही कि कोई हादसा या दुर्घटना होने की स्थिति में श्रद्धालुओं को तत्काल राहत प्रदान की जा सके। महाकुंभ के लिए स्वास्थ्य विभाग ने हरिद्वार में रुड़की से प्रवेश करने वालों के लिए रानीपुर झााल, नजीबाबाद मार्ग से आने वालों के लिए श्यामपुर कांगड़ी, देहरादून मार्ग से आने वालों के लिए नेपाली फार्म और पर्वतीय मार्ग मसलन श्रीनगर, पौड़ी आदि से प्रवेश करने वाले श्रद्धालुओं के लिए नटराज चौराहा ऋषिकेश में आउट पोस्ट बैरियर स्थापित किया है। मेला स्वास्थ्य विभाग की ओर से सभी आउट पोस्ट बैरियर पर एक-एक एम्बुलेंस मौजूद रहेगी। यहां पर प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ भी मौजूद रहेगा जो आपात स्थिति में तुरंत श्रद्धालुओं को प्राथमिक उपचार के साथ राहत प्रदान करने की कोशिश करेगा। आउट पोस्ट बैरियर में किसी श्रद्धालु की स्थिति अधिक खराब होने पर उसे नजदीक के जिला, मेला अस्पताल तक यही टीम लेकर जाएगी। श्रद्धालु की स्थिति गंभीर होने पर चिकित्सा उपलब्ध कराने के बाद उसे हायर सेंटर को भी रेफर किया जा सकता है। मेलाधिकारी स्वास्थ्य डा. पी लाल ने बताया कि आउट पोस्ट बैरियर पर स्वास्थ्य विभाग हर पल चौकन्ना रहेगा। बैरियर पर मौजूद एम्बुलेंस को जरूरत की हर सुविधा से लैस किया जाएगा। अपने कार्य में दक्ष पैरामेडिकल स्टाफ को ही आउट पोस्ट बैरियर पर तैनात किया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसी भी हादसे में समय पर उचित प्राथमिक उपचार मिलने पर पीडि़त को राहत मिलती है और आगे के इलाज में सहूलियत हो जाती है।

उत्तराखंड में बुनियादी शिक्षा बीमार

उत्तराखंड में बुनियादी शिक्षा बीमार है। ऐसा नहीं है कि विद्यालय नहीं हैं। विद्यालय हैं, लेकिन सुदूरवर्ती स्कूलों में शिक्षा देने वाले अध्यापकों का अभाव है। यूं आंकड़े देखे जाएं तो प्राइमरी शिक्षा के क्षेत्र में अध्यापकों की कहीं कोई कमी नहीं है। सरकार ने इतने शिक्षक नियुक्त कर दिये हैं कि 27 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक का अनुपात पहुंच गया है, लेकिन विडंबना तो देखिये कि 1119 स्कूलों में मात्र एक ही शिक्षक है और 210 स्कूल तो मात्र शिक्षा मित्रों के भरोसे चल रहे हैं। सरकार चाहती है कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर निजी और पब्लिक स्कूलों के समकक्ष हो जाए। अगर हालात यही रहे तो शायद ही ऐसा संभव हो पाए। वर्तमान समय प्राइमरी स्कूलों में सरकारी शिक्षक का वेतन इतना हो गया है कि शायद ही निजी या पब्लिक स्कूलों के शिक्षकों का होता हो, लेकिन परिणाम के नाम पर स्थिति शून्य है। बीमारी साफ है, लेकिन इलाज करने वाला कोई नहीं है। न तीमारदार और न ही डाक्टर। बात-बात पर अपने अधिकारों की मांग करने वाला शिक्षक वर्ग ग्र्राम्य अंचल के स्कूलों में जाना नहीं चाहता, खासकर दूरस्थ अंचलों में स्थित स्कूलों में तो कतई नहीं। जब शिक्षक जाएंगे ही नहीं, तो वहां पढ़ायेगा कौन। नियुक्ति भले ही दूरस्थ स्कूलों के लिए हो, नियुक्त होने के बाद शिक्षक येन-केन प्रकारेण अपना स्थानांतरण शहरी या निकट के स्कूलों में कराने का प्रयास करते हैं। गांवों के स्कूलों में वे ही शिक्षक रह जाते हैं, जिनके पास महकमे के आला अफसरों के पास पहुंच के साधन नहीं होते। प्राथमिक शिक्षकों को यह बात अच्छी तरह समझा लेनी चाहिए कि उनके इन प्रयासों के चलते ही सरकारी शिक्षा की बुनियाद कमजोर हो रही है। इसके लिए उन्हें दोषमुक्त नहीं किया जा सकता। उन्हें अपने दायित्व का निर्वहन ईमानदारी के साथ करना चाहिए। जब वे अपने वेतन भत्तों के लिए बुलंद आवाज उठाते हैं तो अपने जेहन में दायित्वबोध की बात भी रखें। राज्य सरकार को भी इस मामले में सजगता का परिचय देना चाहिए। सुस्पष्ट नीति निर्धारित कर शिक्षकों के लिए सुदूरवर्ती अंचलों में सेवा अनिवार्य की जानी चाहिए। इससे बचने का प्रयास करने वाले शिक्षकों के विरुद्ध समुचित कार्यवाही होनी चाहिए। ऐसा नहीं किया गया तो बीमार हो रही बुनियादी शिक्षा लाइलाज हो जाएगी और विद्यार्थी सरकारी स्कूलों से नाता तोडऩे लगेंगे।

वक्त की अंधी सुरंग में गुम हो जाएगी 'राजी' बोली

-90 फीसदी राजी मानते हैं अपनी बोली बोलने से कोई फायदा नहीं -देश में महज 517 राजी,उनमें भी अपनी भाषा संस्कृति के प्रति हीनता बोध घर कर रहा देहरादून किसी भी भाषा बोली के बचे रहने की गारंटी क्या होती है, यह कि उसकी भावी पीढ़ी उसको बोले। मगर उत्तराखंड की सबसे अल्पसंख्यक जनजाति राजी की राजी बोली वक्त की अंधी सुरंग में गुम हो जाने वाली है। वजह साफ है उसके 20 प्रतिशत बच्चे अपनी बोली में बातचीत करना ही पसंद नहीं करते क्योंकि वे समझाते हैं कि अपने पूर्वजों की बोली की बजाय कुमाऊंनी बोलना ज्यादा फायदेमंद है। 60 प्रतिशत लोग अपनी बोली के प्रति बेपरवाह हैं, जबकि केवल 20 प्रतिशत को अपनी बोली में बात करना भाता है। 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत में राजी या वनरावतों की आबादी महज 517 है। यह छोटी-सी खानाबदोश जनजाति नेपाल की सीमा से सटे उत्तराखंड के पिथौरागढ़ और चंपावत जिलों में रहती है। इसके महज पांच फीसदी लोग ही साक्षर हैं। ऐसे में राजी बोली का केवल मौखिक रूप जीवित है। हाल में ही दून आईं लखनऊ विश्वविद्यालय की रीडर डा. कविता रस्तोगी का सर्वेक्षण इस बोली के अंधेरे भविष्य की ओर संकेत करता है। डा.रस्तोगी के सर्वे के अनुसार 90 प्रतिशत राजियों का मानना था कि राजी बोलने से कोई फायदा नहीं, जबकि 60 फीसदी को अपनी जबान से कोई मतलब ही नहीं था। 26 से 35 साल के 65 फीसदी तो 16 से 25 साल के 60 फीसदी युवाओं को अपनी भाषा में बोलना पसंद नहीं। 26 से 35 साल के 40 प्रतिशत लोगों को अपनी भाषा संस्कृति पर कोई गर्व नहीं तो, 16 से 35 साल के 80 फीसदी तो 36 से 45 साल के 70 फीसदी राजी नहींमानते कि राजी बोलना अच्छा है। डा. रस्तोगी के मुताबिक दरअसल राजी लोगों में धीरे-धीरे अपनी भाषा-संस्कृति के प्रति हीनताबोध घर कर रहा है। इसलिए वे धीरे-धीरे कुमाउंनी या हिंदी पर निर्भर होते जा रहे हैं। राजी लोग अपनी बोली का 84 फीसदी इस्तेमाल धार्मिक कर्मकांड के दौरान ही करते हैं। बोली का घरों में 75 फीसदी तो दूसरे स्थानों पर केवल 30 फीसदी ही इस्तेमाल होता है। राजी बोली पर देश में पहली पीएचडी करने वाले भाषा विज्ञानी डा. शोभाराम शर्मा का कहना है कि किसी भी भाषा बोली के जिंदा रहने के लिए उसके बोलने वाले समाज का उसके प्रति झाुकाव और उसकी भौतिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। उन्होंने बताया के पिछली कांग्रेस सरकार ने राजी जनजाति पर संकट भांपते हुए जनजाति के लोगों को ज्यादा संतान पैदा करने पर पुरस्कृत करने और सुविधाएं मुहैया कराने की घोषणा की थी लेकिन उसका क्या हुआ पता नहीं। जिन भाषाओं में जीविका का जुगाड़ नहीं होता वे मर जाती हैं। राजी बोली का खत्म होना देश ही नहीं दुनिया की अपूरणीय क्षति होगा। सरकार को चाहिए कि वह भाषाई विविधता की रक्षा के लिए राजी जनजाति और उनकी बोली के संरक्षण के लिए प्रयास करें।

-यह 'उपलब्धि' है तो खुदा खैर करे

-यह 'उपलब्धि' है तो खुदा खैर करे नौ साल में रोपे गए साढ़े तीन लाख पौधे, हाथ आए सिर्फ बयासी हजार - बचे हुए पौधों में से भी हजारों को 'अंकुरित हो रहे' बताया जा रहा - जानवरों के स्वच्छंद विचरण के बहाने सुरक्षा के भी कोई उपाय नहीं - वृक्षारोपण को मिली 4515092 की राशि में से 3393158 रुपये गर्त में डूबे दिनेश कुकरेती़ देहरादून: यह है राजाजी नेशनल पार्क की 'उपलब्धि'। नौ साल में पैंतालीस लाख से अधिक की धनराशि खर्च कर करीब साढ़े तीन लाख पौधे रोपे और हाथ आए सिर्फ बयासी हजार। यह तो विभागीय दावा है, जबकि हकीकत इससे कहीं अधिक निराशाजनक हो सकती है। पार्क के अधिकारियों का यह तर्क भी कम मजेदार नहीं है कि रोपे गए पौधों की सुरक्षा के लिए कारगर उपाय किया जाना जानवरों के स्वच्छंद विचरण को देखते हुए संभव नहीं है। ऐसे में लगता नहीं कि पार्क क्षेत्र में राज्य गठन के बाद वृक्षों का घनत्व बढ़ा होगा। हरिद्वार, देहरादून व गढ़वाल जनपद के 820.42 वर्ग किमी भूभाग को मिलाकर वर्ष 1983 में स्थापित राजाजी राष्ट्रीय उद्यान देश का यही एकमात्र पार्क है, जिसका भूगोल सबसे जटिल है। चारों ओर घनी आबादी है तो बीच से राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरता है। इसके अलावा बीसियों कच्चे मार्ग भी आबादी वाले इलाकों में खुलते हैं। उम्मीद की जा रही थी राज्य गठन के बाद पार्क की दशा सुधरेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पार्क क्षेत्र में वृक्षों का घनत्व बढ़ाने के लिए बीते नौ सालों में जो नए पौधे रोपे गए, उनकी सुरक्षा भी भगवान भरोसे है। सूचना का अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार राज्य गठन के बाद पार्क क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के 331530 पौधे रोपे गए, लेकिन इनमें से सुरक्षित होने का दावा सिर्फ 82374 पौधों का ही किया जा रहा है। इसमें भी हजारों पौधों को 'अंकुरित हो रहे' बताया जा रहा है। इन पौधों के रोपण में 4515092 की धनराशि व्यय हुई, जिसे मामूली राशि नहीं माना जा सकता। इस हिसाब से पार्क प्रशासन महज 1121933.88 रुपये के पौधों को ही बचा पाया। बाकी 3393158.12 की राशि गर्त में डूब गई। हैरत तो इस बात से होती है कि रोपी गई पौध को न बचा पाने के लिए पार्क प्रशासन सिर्फ प्राकृतिक कारणों को ही जिम्मेदार मानता है। उसका कहना है सेही, सांभर, चीतल, सुअर, हाथी आदि जानवरों द्वारा पौध नष्ट कर दिए जाने के अलावा अत्यधिक पाला व गर्मी से भी अधिकांश पौध मर गई। रही रोपित पौध की सुरक्षा की बात तो इसमें भी पार्क प्रशासन का तर्क है कि जानवरों के स्वच्छंद विचरण को देखते हुए इसके लिए कोई कारगर उपाय किया जाना संभव नहीं था। रेंज वाइज रोपित पौधे, जीवित पौधे और पौधरोपण पर हुआ व्यय रेंज रोपित जीवित व्यय धनराशि मोतीचूर 28100 4278 295897 हरिद्वार 15000 8750 613722 धौलखंड(पू.)36155 5500 629200 चिल्लावाली 93500 13205 842350 गौहरी 16500 8670 351400 धौलखंड(प.)36500 18600 707689 चीला 17500 1125 395000 कासरो 88275 22246 728244 -

दयारा बुग्याल: जंगल में मोर नाचा किसने देखा

-चालीस करोड़ की महायोजना नहीं उतर सकी धरातल पर -औली की तर्ज पर विकसित किये जाने के मिलते रहे हैं आश्वासन उत्तरकाशी कुदरत मेहरबान होने से दयारा बुग्याल में बर्फ की परत चढऩे लगी है। मौसम का यह मिजाज रहा तो कुछ ही दिनों में यह स्कीइंग के लिए फील्ड तैयार हो जाएगा। यहां से प्रकृति के मेहरबान होते हुए भी सरकार ने मुंह मोड़ा हुआ है। सब कुछ होते हुए भी सड़क न होने से रोपवे ही एक मात्र सहारा है। इसलिए दयारा पहुंचकर स्कीइंग करवाने की वर्षों पुरानी योजना सिर्फ कागजों में ही धूल फांक रही है। करीब 28 वर्ग किमी में फैला दयारा बुग्याल सर्दियों में पांच से छह फुट तक बर्फ से ढका रहता है जो लगातार चार महीनों तक जमी रहती है। यही बातें इसे स्कीइंग के लिये राज्य में सबसे आदर्श बुग्याल बनाती हैं। सबसे पहले अस्सी के दशक में कुछ स्थानीय लोगों ने इस बुग्याल से बाहरी दुनिया को रूबरू कराना शुरू किया। स्की के शौकीनों ने निजी तौर पर वहां पहुंच कर स्कीइंग भी शुरू कर दी, लेकिन सरकारी मदद के अभाव में अभी तक यह औली की तरह विश्व विख्यात नहीं हो पाया है। स्थानीय लोगों की लगातार मांग पर सूबे में रही सरकारों की ओर से रोपवे बनवाने के आश्वासन मिलते रहे, लेकिन,अभी तक अस्तित्व में नहीं आ सका है। लिहाजा दयारा की स्थिति 'जंगल में मोर नाचा, किसने देखा वाली बनी हुई है'। सूबे की पिछली सरकार ने चालीस करोड़ रुपये लागत की दयारा पर्यटन महायोजना बनाई थी। इसमें दयारा को विंटर गेम्स के लिए तैयार करने के लिये रोपवे सहित सभी बुनियादी सुविधाएं जुटाने की रुपरेखा तैयार की गई थी। इसके तहत टाटा कसंल्टेंसी से बुग्याल व आस पास के क्षेत्र का सर्वे भी कराया गया। कंपनी ने रिपोर्ट तैयार कर शासन को भी सौंप दी थी, लेकिन हैरतअंगेज तरीके से यह महायोजना गायब हो गई। इसके बाद पांच करोड़ रुपए की केंद्रीय पर्यटन निधि से दयारा बुग्याल के नजदीकी रैथल व बार्सू गांव से ट्रैक रूट निर्माण, कम्यूनिटी सेंटर, आवास गृह, सीवर लाइन, टूरिस्ट हट आदि बनवाए गये। स्थानीय लोगों की लगातार मांग व आवश्यकता को देखते हुए सरकार की ओर से रोपवे का काम पीपीपी मोड पर देने का विचार किया गया। बीते तीन वर्षों से धरातल पर इस दिशा में कोई भी कार्य नहीं हो पाया है, जबकि रैथल व बार्सू गांव दयारा के लिये बेस कैंप के रूप में लगभग तैयार हो चुके हैं। रैथल गांव के प्रधान मनोज राणा के मुताबिक दयारा बुग्याल के औली की तरह विकसित होने से पूरी गंगोत्री घाटी को नई पहचान मिलेगी, लेकिन लगातार की जा रही उपेक्षा से स्थानीय लोग हताश हैं। सरकार के प्रयास जारी : डीएम उत्तरकाशी : दयारा बुग्याल को स्की सेंटर के रूप में तैयार करने के संबंध में जिलाधिकारी डा.बीवीआरसी पुरुषोत्तम ने बताया कि सरकार की ओर से प्रयास जारी हैं। इसके लिये पहली जरूरत रोपवे की है। आईएलएफएस संस्था आगे आई है और यह प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है। इसके अलावा रैथल व बार्सू गांवों में भी सड़क सहित सभी जरूरी सुविधाएं विकसित कर ली गई हैं। आने वाले कुछ वर्षों में रोपवे के तैयार होने की पूरी संभावना है।

नंदा के बर्फीले मायके में हवा में नाचे विदेशी

नंदा का रहस्यमय बर्फीला मायका और उसमें हवा में झूलते हुए शानदार नृत्य। जी हां, जमा देने वाली हिमालयी ठंड के बीच प्रोजेक्ट बैंडालूप के दीवाने कलाकारों के ये नृत्य आपको दांतों तले अंगुलियां दबाने को मजबूर कर देते हैं। प्रोजेक्ट बैंडालूप खड़ी चट्टानों में रस्सियों के सहारे नृत्य करने वाले कलाकारों की जानी-मानी कंपनी है। वह दुनिया भर में ऊंचे चट्टानी क्षेत्रों में रस्सियों के जरिए अपने साहसपूर्ण और आकर्षक नृत्यों के लिए मशहूर है। वुडस्टॉक स्कूल में पढ़ीं बैंडालूप गु्रप की आर्टिस्टिक डायरेक्टर एमेलिया रुडोल्फ की देखरेख में पिछले हफ्ते बैंडालूप के कलाकार मसूरी के वुड स्टॉक स्कूल में नए जिम के उद्घाटन के लिए आए थे। वहां अपनी अनूठी नृत्य कला के प्रदर्शन के बाद वे नंदादेवी क्षेत्र की एक हफ्ते की यात्रा पर गए। वहां के ग्रामीणों की एडवेंचर ट्रैवल कंपनी माउंटेन शेफर्ड के श्रीगणेश बेस कैंप, नंदादेवी की विशाल शिलाओं और मनोरम हिमालयी दृश्यों के बीच उन्होंने दुरुह खड़ी चट्टानों में अपने अद्भुत नृत्यों को फिल्माया भी है। फिल्म निर्माता लोगन शीडर ने 16 एमएम के कैमरे से जहां फिल्म बनाई,

Thursday, November 19, 2009

=शीतकाल के लिए बदरीनाथ धाम के कपाट बंद

फूल मालाओं से सजाकर मंदिर को दिया गया था भव्य स्वरूप बदरीनाथ,: भू-बैकुंठ धाम श्री बदरीनाथ के कपाट शीतकाल के लिए पूजा अर्चना के बाद आज बंद कर दिए गए। इस मौके पर पांच हजार से अधिक श्रद्धालु मौजूद थे। कपाट बंद होने से पहले मंदिर समेत पूरे पंचशिला क्षेत्र को फूल-मालाओं से सजाया गया। मंगलवार को ब्रह्म मुहूर्त में ही रावल केशव प्रसाद ने बदरीविशाल की महाभिषेक एवं अभिषेक पूजाएं शुरू कर दी थीं। दिन भर धार्मिक परम्पराओं के अनुरूप भगवान को बाल व राज भोग चढ़ाया गया। इसके उपरान्त विशेष पूजा कर बदरीविशाल की मूर्ति का फूलों से श्रृंगार किया गया और उन्हें माणा की कुंवारी कन्याओं के निर्मित ऊन की चोली को घी का लेप लगाकर पहनाया गया। अपराक्ष करीब तीन बजे बद्रीश पंचायत में स्थापित उद्धव और कुबेर की मूर्ति को गर्भगृह से बाहर लाया गया। फिर रावल केशव नंबूदरी ने स्त्री का रूप धारण करके महालक्ष्मी की मूर्ति को गर्भगृह में भगवान नारायण के साथ छ: माह के लिए यथास्थान विराजित किया। ठीक तीन बजकर चालीस मिनट पर बदरीनाथ धाम के कपाट मंत्रोच्चारण के साथ बंद कर दिए गए। इस मौके पर गाजे-बाजे के साथ गढ़वाल स्काउट की भक्तिमय संगीत ने श्रद्धालुओं को भक्ति सागर में डुबो दिया। बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होने के अवसर पर परम्पराओं को निभाते हुए सेना की तरफ से ब्रिगेडियर एके बडोनी के निर्देशन में गांधी घाट पर श्रद्धालुओं के लिए नि:शुल्क भंडारे का आयोजन किया गया। इस अवसर पर चार धाम यात्रा विकास परिषद के अध्यक्ष सूरत राम नौटियाल, मंदिर समिति के अध्यक्ष अनुसूया प्रसाद भट््ट, धर्माधिकारी जेपी सती सहित हजारों श्रद्धालु उपस्थित थे।

जमींदोज हो गई वीरता की विरासत

-चमोली के बडग़ांव स्थित गोरखा ओबरा पूरी तरह क्षतिग्रस्त -सैकड़ों वर्ष पूर्व गढ़वाली वीरों ने यहीं दी थी गोरखाओं को मात -संरक्षण के अभाव में टूट गया ऐतिहासिक भवन , गोपेश्वर(चमोली): सैकड़ों वर्ष पूर्व गढ़वाली जनता पर गोर्खा सेना के आक्रमण, अत्याचार और भीषण नरसंहार के बाद गढ़वाली वीरों के साहस और शौर्य की याद दिलाने वाला ऐतिहासिक भवन 'गोरखा ओबरा' बीते दिनों की याद भर बनकर रह गया है। कभी गोरखा सैनिकों की शिकस्त का प्रतीक रहा यह भवन देखरेख व संरक्षण के अभाव में पूरी तरह जमींदोज हो गया है। इसके साथ ही गढ़वाल की ऐतिहासिक विरासत का भी एक स्तंभ टूटकर बिखर गया। चमोली जिले में जोशीमठ से करीब सात किमी दूर ऋषिकेश-जोशीमठ-सोमना मार्ग पर स्थित बडग़ांव के लोगों का सिर आज भी अपने पूर्वजों की वीरता की गाथाएं सुनाते हुए फख्र से ऊंचा उठ जाता है। हो भी क्यों नहीं, आखिर यही वह गांव है, जहां गढ़वाल भर में बर्बरता का पर्याय बन चुके गोरखाओं को मुंह की खानी पड़ी थी। गांव के 82 वर्षीय बुजुर्ग दरबान सिंह रावत बताते हैं कि सन् 1803 में गोरखाओं ने राज्य विस्तार के उद्देश्य से गढ़वाल पर हमला बोल दिया। गढ़वाली जनता को मारते- काटते उन्होंने अधिकांश क्षेत्र पर अपना आधिपत्य भी जमा लिया था। गोरखाओं के जोशीमठ से आगे घाटी की तरफ बढऩे की सूचना मिलते ही बडग़ांव के लोगों ने उन्हें सबक सिखाने की योजना बनाई। इसके तहत गांव की सबसे अशक्त व बुजुर्ग महिला को गांव में अकेले छोड़ दिया गया। गांव के सभी पुरुष, महिलाएं, बच्चे पास के ही जंगल में हथियार लेकर छिप गए। गांव में एक बड़ा भवन था, बूढ़ी महिला को कहा गया था कि जब गोरखा गांव में आएं, तो वह उनका स्वागत करे और किसी तरह भवन के भीतर ले जाकर बंद कर दे। गोरखा आए, तो बुजुर्ग महिला ने उनका सत्कार किया और भोजन कराने के नाम पर बड़े भवन के भीतर बिठा दिया। इसके बाद वह बाहर आई और जलती लकड़ी से जंगल की ओर संकेत किया। इशारा पाते ही गांव के लोग गोरखाओं पर टूट पड़े। भयंकर संघर्ष के बाद गोरखा सेनापति और कई सैनिक भवन में ही मारे गए। ग्रामीणों ने उनके शव भवन के ही तहखाने में बंद कर दिए। इसके बाद भवन बंद कर दिया गया और फिर कभी गांव का कोई बाशिंदा इस भवन में नहीं गया। इसके चलते देखरेख के अभाव में यह भवन क्षतिग्रस्त हो गया। आलम यह है कि आज भवन पूरी तरह जमींदोज हो चुका है। समाजसेवी व पत्रकार शशिभूषण बताते हैं कि वह कई बार पुरातत्व विभाग के देहरादून स्थित निदेशालय में भवन के संरक्षण के संबंध में वार्ता कर चुके हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। ग्राम प्रधान हरीश भंडारी कहते हैं किभडग़ांव से अपभ्रंश होकर आज गांव बडग़ांव हो गया है। 'भड़' का अर्थ वीर होता है, ऐसे में यह गांव उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत भी है। वह कहते हैं कि ओबरा क्षतिग्रस्त हो चुका है, लेकिन सरकार को इसके पुनर्निर्माण की दिशा में प्रयास करना चाहिए।

उत्तराखंड की किरन ने रचा इतिहास

देहरादून,: सूबे की खेल प्रतिभाएं समय-समय पर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फलक पर चमक बिखेरती रहीं है। फिर चाहे वह सुरेंद्र भंडारी हों प्रीतम बिंद हों या फिर पंकज डिमरी। इसी कड़ी में अब एक नाम किरन तिवारी का भी जुड़ गया है। हल्द्वानी निवासी किरन तिवारी ने हाल ही में ग्वांगजोंग(चाइना)में हुई 18वीं एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप की तीन हजार मीटर स्टेपलचैस में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। दैनिक जागरण से फोन पर हुई बातचीत में किरन ने बताया कि अभी तक भारत को स्टेपलचैस में कोई पदक नहीं मिला। उन्होंने पहली बार यह पदक जीता। स्टार एथलीट किरन का कहना है कि यह उनका पहला विदेशी टूर था, काफी मजा आया। काफी कुछ सीखने को मिला, जिसका भविष्य में होने वाली प्रतियोगिताओं में फायदा मिलेगा। भविष्य की योजनाओं के बारे में किरन का कहना है कि 2010 में होने वाले कॉमनवैल्थ गेम में भारत के लिए पदक जीतना उनकी प्राथमिकता में है। इसके लिए वह अभी पटियाला में कैंप कर रही हैं। इसके बाद चाइना में ही एशियन गेम होने हैं। रेलवे में कार्यरत किरन का अपनी जीत का श्रेय शुरुआती दौर में उनके कोच रहे विनोद पोखरियाल और ममता जोशी को देती हैं। उनका कहना है कि शुरुआती दौर में बेसिक पर ध्यान दिया। राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीत चुकीं किरन को बधाई देते हुए पूर्व अंतरराष्ट्रीय धावक विनोद पोखरियाल ने कहा कि यह देश व प्रदेश के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। उत्तराखंड एथलेटिक्स एसोसिएशन के सचिव संदीप शर्मा ने उम्मीद जताई है कि वह आगे भी पदक जीतेंगी।

Tuesday, November 17, 2009

-'बैल' नहीं अब 'झब्बू' खींचेगा हल

-याक और गाय की क्रास ब्रीड है झब्बू -बैल से चार गुना अधिक होती है ताकत -पशुपालन विभाग ने तैयार की योजना -स्थानीय पशुपालकों का रहेगा सहयोग गोपेश्वर आने वाले दिनों में पहाड़ के सीढ़ीनुमा खेतों में आपको बैल की बजाय कोई अजीबोगरीब जानवर हल खींचता दिखाई दे तो हैरत में मत पडि़एगा। 'झब्बू' नाम का यह जानवर बैल से चार गुना अधिक ताकतवर तो होता ही है, इसका स्टेमिना भी गजब का होता है। दरअसल, याक और गाय के क्रास ब्रीडिंग से पैदा होने वाली संतति को झब्बू कहा जाता है। पशुपालन विभाग ने स्थानीय काश्तकारों की मदद से झब्बू की वंशवृद्धि की योजना तैयार की है। झब्बू की उपयोगिता को पर्यटन से जोड़े जाने की योजना है। इस खबर को आगे बढ़ाने से पहले 'याक' का जिक्र करना जरूरी होगा। याक एक दुर्लभ गोवंशीय पशु है, जो बर्फीले इलाकों में पाया जाता है। ग्लोबल वार्मिग और लोकसंस्कृति में आए बदलाव के कारण यह जानवर अब दुर्लभ की श्रेणी में पहुंच गया है। एक समय था जब याक का उपयोग व्यापार और दूध उत्पादन में किया जाता था। सीमांत जनपद चमोली के नीती-माणा क्षेत्र से भारत-चीन व्यापार का सारा सामान याक के कंधों पर ही ढोया जाता था। इस सीमा पर व्यापार बंद होने, ग्लोबल वार्मिग के प्रभाव और लोक संस्कृति में आये बदलाव की वजह से न सिर्फ याक की तादात कम होती चली गई, बल्कि पशुपालक भी उससे किनारा करने लगे। वर्तमान में हालात ऐसे हैं कि नीती-माणा क्षेत्र जहां हजारों याक हुआ करते थे, वहां अब मात्र छह याक ही जीवित रह गए हैं, वे भी पशुपालन विभाग के लाता स्थित याक प्रजनन केन्द्र में। याक की विलुप्ति की चिंता के मद्देनजर पशुपालन विभाग ने एक नई योजना तैयार की है। इसके तहत याक और गाय का क्रास ब्रीडिंग करवाकर 'झब्बू' पैदा करवाए जाएंगे। दरअसल, झब्बू में प्रजनन क्षमता नहीं होती, लेकिन वह काफी शक्तिशाली होता है। उसकी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चार बैलों का काम सिर्फ एक झब्बू कर लेता है। इसके अलावा ऊंट की तर्ज पर झब्बू की सवारी भी की जा सकती है। खास बात यह कि झब्बू को याक की तरह बर्फीले या ऊंचाई वाले इलाके की जरूरत नहीं होती। वह निचले इलाकों में भी जीवित रह जाता है। ''पशुपालन विभाग झब्बू को याक के विकल्प के तौर पर देख रहा है। कुछ स्थानीय काश्तकारों के सहयोग से याक और गाय की संतति झब्बू की संख्या बढ़ाई जाएगी। इस योजना को सफल बनाने के लिए भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान मुक्तेश्वर नैनीताल से तीन याक सांड मंगवाए हैं। झब्बू का उपयोग बदरीनाथ धाम से माणा तक पर्यटकों की सवारी के रूप में भी किया जाएगा'' - डा. पीएस यादव मुख्य पशु चिकित्साधिकारी, चमोली

उन्नीसवें स्थान पर खिसका उत्तराखंड

बीस सूत्रीय कार्यक्रम: पहली तिमाही में सबसे खराब प्रदर्शन , देहरादून बीस सूत्रीय कार्यक्रम में उत्तराखंड साल दर साल नीचे फिसलता चला जा रहा है। चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में उत्तराखंड की उपलब्धि कतई संतोषजनक नहीं रही। तीस राज्यों में उत्तराखंड का स्थान उन्नीसवां है। केंद्रीय योजना आयोग ने तीस राज्यों का चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही का स्कोर कार्ड जारी किया है, जिसमें कर्नाटक 46 अंक लेकर 85 प्रतिशत उपलब्धि के साथ सबसे ऊपर है। आंध्र प्रदेश के 37 अंक हैं और 82 प्रतिशत उपलब्धि प्राप्त कर वह दूसरे स्थान पर है। 37 अंक और 82 प्रतिशत उपलब्धि हिमाचल प्रदेश की भी है, लेकिन उसके दो कार्यक्रम डी श्रेणी में हैं, इसलिए हिमाचल को तीसरे स्थान पर रखा गया है। उत्तराखंड के साथ गठित झारखंड राज्य 37 अंक और 77 प्रतिशत उपलब्धि के साथ चौथे स्थान पर है। महत्वपूर्ण बात यह है कि झारखंड का कोई भी कार्यक्रम डी श्रेणी का नहीं है। उत्तराखंड 32 अंक लेकर 59 प्रतिशत उपलब्धि के साथ उन्नीसवें स्थान पर है। उत्तराख्ंाड के तीन कार्यक्रम डी श्रेणी में, छह सी श्रेणी में और एक बी श्रेणी में हैं। उत्तराखंड के ए श्रेणी वाले कार्यक्रमों की संख्या आठ है। उत्तराखंड की खराब परफारमेंस एसजीआरवाई के अंतर्गत सहायता प्राप्त वैयक्तिक स्वरोजगार योजना, स्वयं सहायता गु्रपों को प्रदान किए गए आय अर्जन कार्यकलाप, निर्मित आवास-आईएवाई, सहायता प्राप्त अनुसूचित जाति परिवार, क्रियाशील आंगनबाडि़यां, सार्वजनिक एवं वन भूमि में रोपण, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत गांवों का विद्युतीकरण तथा पंपसेटों को बिजली के मामले में है। आयोग ने इसे खराब श्रेणी में रखा है। हालांकि, खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत सार्वजनिक वितरण प्रणाली एपीएल, बीपीएल तथा अंत्योदय, चालू एकीकृत बाल विकास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत सड़कों का निर्माण तथा प्रदान की गई बिजली के मामले में उत्तराखंड का प्रदर्शन बेहतर रहा है, जिसे योजना आयोग ने बहुत अच्छी श्रेणी में रखा है। उत्तराखंड लगातार तीन सालों तक बीस सूत्रीय कार्यक्रम में देश में पहले स्थान पर रह चुका है। पिछले तीन सालों से राज्य की परफार्मेस लगातार खराब हो रही है। चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में उत्तराखंड को अब तक सबसे खराब श्रेणी शुमार किया गया है।

माडल स्टेट

उत्तराखंड के लिए यह गर्व का विषय है कि देश की प्रथम नागरिक, राष्ट्रपति इसे भविष्य के माडल स्टेट के तौर पर देख रही हैं। राष्ट्रपति ने यह बात नई दिल्ली में भारत-अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले के उद्घाटन के मौके पर कही। इस मेले में उत्तराखंड फोकस स्टेट रखा गया है। इस छोटे व अधिकतर पर्वतीय भू-भाग वाले राज्य में जल विद्युत, पर्यटन, जड़ी-बूटी, औद्यानिकी व वन संपदा से जुड़े क्षेत्रों में विकास की अपार संभावनाएं हैं। अंतरिम सरकार और इसके बाद निर्वाचित सरकारों की ओर से भी कई मौकों पर उत्तराखंड की इन संभावनाओं को जाहिर तो किया गया ही, इनके बूते राज्य को अपने पैरों पर खड़ा कर माडल बनाने पर जोर दिया है। हालांकि, यह भी कड़वा सच है कि उत्तराखंड को अन्य प्रदेशों के साथ प्रतिस्पर्धा में सशक्त व माडल बनाने के लिए उक्त सभी संभावनाओं पर ठोस नीतियां सामने नहीं आ सकी हैं। इसके लिए मजबूत इच्छा शक्ति की जरूरत है। इन सभी क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर काम शुरू होने पर ही राज्यवासियों के भीतर भी उम्मीद जगेगी। उत्तराखंड राज्य के गठन के पीछे विकास को लेकर यही छटपटाहट मुख्य वजह रही है। यह भी सही है कि तमाम संभावनाओं के बावजूद उत्तराखंड के लिए अपने बलबूते पर ही मजबूत राज्य बनना आसान नहीं है। इसके लिए नियोजित तरीके से केंद्रीय मदद की दरकार है। मौजूदा सरकार विभिन्न मंचों पर इस मुद्दे को उठा भी चुकी है। पर्यावरण, पर्वतीय भू-भाग, वन अधिनियम और दो देशों की सीमा इस प्रदेश के बहुमुखी और सुचारू विकास की आकांक्षा पर अंकुश भी लगा रहे हैं। ये सभी मामले नीतिगत रूप से केंद्र से जुड़े हैं। लिहाजा, केंद्र को भी उत्तराखंड को लेकर अलग नजरिए से सोचने की जरूरत है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में राष्ट्रपति के संबोधन के साथ ही औद्योगिक पैकेज की सीमा बढ़ाने को विचार करने का केंद्रीय उद्योग व वाणिज्य मंत्री का आश्वासन भी राज्य को नई उम्मीद बंधाता है। आशा की जानी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में फोकस स्टेट उत्तराखंड की विकास की चाहत को केंद्र और राज्य की सरकारें शिद्दत से पूरी करेंगी। राज्य को भी केंद्र से मिलने वाले संसाधनों के समुचित उपयोग और दूरदराज तक उसका फायदा पहुंचाने को कटिबद्ध हो कार्य करना होगा।

ऐतिहासिक जौलजीवी मेला शुरू

-इलाके का होगा पूर्ण विकास, बनेगा प्रवेश द्वार: चुफाल -भारत-नेपाल की साझी संस्कृति का प्रतीक है मेला -पाल वंश के वंशज कुंवर भानुराज पाल सम्मानित जौलजीवी, (पिथौरागढ़): भारत-नेपाल की साझा संस्कृति का प्रतीक जौलजीवी मेला शनिवार को शुरू हो गया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विशन सिंह चुफाल ने मेले का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि मेले के विकास में सरकार कोई कसर नहीं छोड़ेगी। कैलाश मानसरोवर यात्रा के द्वार जौलजीवी में उन्होंने एक विशाल प्रवेश द्वार बनाने की घोषणा भी की। रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने फीता काटकर मेले का विधिवत उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा जौलजीवी मेला सीमांत जिले की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक रहा है। उन्होंने कहा मुनस्यारी आने वाले पर्यटकों का रुख जौलजीवी और धारचूला की ओर करने के लिए यहां सुविधाओं का विकास किया जायेगा। उन्होंने गोरी नदी में साहसिक खेलों को बढ़ावा देने की मंशा भी जाहिर की। जौलजीवी कैलाश मानसरोवर यात्रा का द्वार है। शीघ्र ही गोरी नदी पर एक विशाल प्रवेश द्वार बनाया जाएगा। इस अवसर पर उन्होंने मेले पर प्रकाशित पुस्तक संगम का विमोचन भी किया। क्षेत्रीय विधायक गगन रजवार ने कहा मेले ने जिले को विशेष पहचान दी है। मेला क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर है और इसके विकास के लिए वे अपने स्तर से हरसंभव प्रयास करेंगे। इस अवसर पर उन्होंने जौलजीबी में स्नान घाट बनाने और सांस्कृतिक कक्ष के लिए दो लाख रुपये देने की घोषणा भी की। महिला आयोग की उपाध्यक्ष गीता ठाकुर ने सांस्कृतिक दलों को 11 हजार रुपये दिये जाने की घोषणा की। उद्घाटन अवसर पर सांस्कृतिक दलों ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये। 1914 में मेला शुरू करने वाले पाल वंश के वंशज कुंवर भानुराज पाल को इस अवसर पर सम्मानित किया गया।
-दूधातोली में खुलेगा मोनाल कंजर्वेशन रिजर्व सेंटर -250 हेक्टेयर भूमि का हुआ चयन, मोहर लगनी बाकी -वन महकमे ने की राज्य पक्षी के लिए पहल शुरू -सूबे के केदारनाथ वन प्रभाग में मोनाल की संख्या सबसे ज्यादा , पौड़ी गढ़वाल सात रंगों की सलोनी काया के मालिक राज्य पक्षी मोनाल के संरक्षण की दिशा में वन महकमे ने पहल शुरू कर दी है। अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो राज्य पक्षी पौड़ी के आस-पास के क्षेत्रों में दिखेगा। वन महकमे ने थलीसैंण क्षेत्र के दूधातोली में मोनाल कंजर्वेशन सेंटर खोलने की कवायद शुरू कर दी है। पृथक राज्य गठन के बाद राज्य में 2005 में पहली बार राज्य पक्षी मोनाल की गणना शुरू हुई थी, गणना के आंकड़े चौंकाने वाले, लेकिन सुखद रहे। गणना के मुताबिक राज्य में राज्य पक्षी मोनाल की संख्या 919 दर्ज की गई। राज्य के कुल 31 वन प्रभागों में केदारनाथ वन प्रभाग में मोनाल की संख्या सबसे ज्यादा पाई गई। यहां अकेले 367 राज्य पक्षियों की संख्या दर्ज की गई। बर्ड आफ सेवन कलर के नाम से जाने वाले राज्य पक्षी मोनाल का वैज्ञानिक नाम लोफोफारस है और यह ठंडे इलाकों में वास करता है। अति सुंदर एवं सुकोमल काया के मालिक राज्य पक्षी मोनाल बरबस ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। राज्य पक्षी की कोकिली आवाज में संगीत की धुनों निकलती हैं, लेकिन गढ़वाल वन प्रभाग में राज्य पक्षी मोनाल की संख्या के आंकड़े चिंताजनक है। गढ़वाल वन प्रभाग में महज 7 मोनाल हैं। वन महकमे ने पौड़ी एवं आस-पास के क्षेत्रों में राज्य पक्षी की संख्या में इजाफा करने की पहल शुरू कर दी है। इतना यह है कि यदि यह पहल रंग लाई तो पौड़ी और आस-पास के क्षेत्रों में विचरण करते मोनाल यहां पर्यटकों को लुभाने लगेगा। असल में वन महकमे ने मंडल मुख्यालय के सटे प्रखंड थलीसैंण से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पीठसैंण के दूधातोली आरक्षित वन क्षेत्र के कंपार्टमेंट नं. 2 में मोनाल कंजर्वेशन सेंटर खोलने की योजना बनाई है। इसके लिए 250 हेक्टेयर भूमि का चयन भी कर लिया गया है, बाकायदा इसके लिए अपर वन संरक्षक को प्रस्ताव भी भेजा गया है, जिस पर अंतिम मोहर लगनी बाकी रह गई है। मुख्य वन संरक्षक गढ़वाल मंडल डीबीएस खाती का कहना है कि इस माह के अंत तक प्रस्ताव को स्वीकृति मिल जाएगी।

मारीशस के राष्ट्रीय समारोह में निशंक आमंत्रित

- देहरादून, मारीशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ ने मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक को फरवरी में होने वाले मारीशस के राष्ट्रीय समारोह में बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया है। राष्ट्रपति के सचिव रामबरन यादव ने आज बीजापुर गेस्ट हाउस में मुख्यमंत्री से मुलाकात की और अपने राष्ट्राध्यक्ष का आमंत्रण पत्र सौंपा। उन्होंने बताया कि समारोह का आयोजन मारीशस में बने गंगा तालाब के समीप होता है। सीएम डा. निशंक ने कहा कि संस्कृति, धर्म और परंपराओं में उत्तराखंड और मारीशस के बीच खासी समानता है। दोनों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान से दोनों की सभ्यता और संस्कृति का विकास होगा। -

Thursday, November 12, 2009

-भाई की शादी में 'खली' होंगे बाराती

छोटे भाई के विवाह समारोह में शिरकत करेंगे 'खली' पैतृक गांव हिमाचल प्रदेश के धिरायना से आज चंदौल गांव को प्रस्थान करेगी बारात गांव में 'दलबू उर्फ खली' के स्वागत को लेकर तैयारियां जोरों पर बारात में 'सिरमौरी नाटी' पर झाूमते नजर आंएगे खली त्यूणी (देहरादून) रेसलिंग (डब्ल्यूडब्ल्यूई) की दुनिया में भारत का नाम रोशन करने वाले दलीप सिंह राणा उर्फ 'दलबू' गुरुवार को छोटे भाई की शादी में बाराती होंगे। विवाह समारोह में शिरकत करने पैतृक गांव हिमाचल प्रदेश के धिरायना पहुंच रहे 'द ग्रेट खली' की एक झालक पाने को लोगों में खासा उत्साह है। गांव में खली के स्वागत को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। सात समुंदर पार वल्र्ड रेसलिंग एंटरटेनमेंट की दुनिया में अपनी ताकत से अंडरटेकर व बतिस्टा जैसे बलशालियों को धूल चटा चुके दलीप सिंह राणा उर्फ खली छोटे भाई भगत राणा की शादी में बाराती होंगे। गुरुवार को खली के पैतृक गांव हिमाचल प्रदेश के धिरायना से सुबह करीब ग्यारह बजे भगत राणा की बारात जिला सिरमौर की तहसील राजगढ़ के चंदौल गांव प्रस्थान करेगी। धिरायना गांव की उत्तराखंड के देहरादून जिले की तहसील त्यूणी से दूरी करीब 70 किमी है। लोक कलाकार बारात में 'ऊंडौं शाकिरो माटा खली गीतों दा गांणा' सिरमौरी नाटी पर खली को नचाने की तैयारी में हैं। विवाह समारोह की तैयारियों से ज्यादा लोगों में खली को देखने की उत्सुकता है। मां टंडी देवी बेटे दलबू उर्फ द ग्रेट खली के घर आने का समाचार पाकर उत्साहित हैं। गांव में विवाह समारोह से ज्यादा खली के स्वागत की तैयारियां की जा रही हैं। सूत्रों के मुताबिक, चंदौल गांव बारात पहुंचने से पूर्व खली का हरिपुरधार, नोराधार, चाडऩा व राजगढ़ आदि स्थानों पर जोरदार स्वागत किया जाएगा। खली के भाई भगत राणा का जालंधर में जिम है। खली को बाराती के रूप में देखने को लेकर चंदौल गांव के लोग भी खासा उत्साहित हैं। न्यूयार्क में आशियाना बना चुके खली रक्षाबंधन के दौरान गृह प्रवेश पर मां टंडी देवी व पिता ज्वाला राम को साथ लेकर न्यूयार्क गए थे। वाया पांवटा होते हुए तहसील शिलाई से 21 किमी दूर स्थित पैतृक गांव धिरायना में देर रात तक खली के पहुंचने की सूचना है। नातेदार, रिश्तेदार, दोस्त व ग्रामीण खली की एक झालक पाने को बेताब हैं।

सीमा की सुरक्षा को तैनात हुईं महिला जवान

- एसएसबी की महिला यूनिट लालकोठी पहुंची , खटीमा: भारत-नेपाल की खुली अंतर्राष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा का जिम्मा अब महिला जवान भी संभालेंगी। सशस्त्र सीमा बल की महिला यूनिट बुधवार को लालकोठी चेक पोस्ट पहुंच गई। माना जा रहा है कि इस कदम से सीमा क्षेत्र में संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त महिलाओं की गतिविधियों पर नजर रखने के साथ ही उन पर अंकुश लगाया जा सकेगा। सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील नेपाल सीमा पूरी तरह खुली हुई है। दोनों देशों के बीच नागरिकों की आवाजाही पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है। नेपाल सीमा के रास्ते भारत में नकली करेंसी, मादक पदार्थ, अवैध हथियार व प्रतिबंधित वस्तुओं की तस्करी की सूचनाएं बराबर मिलती रही हैं। कई बार इस तरह के मामले पकड़ में आ चुके हैं। इसके अलावा माओवादी गतिविधियों व घुसपैठ की दृष्टि से भी सीमा क्षेत्र संवेदनशील है। इधर तस्करी का नेटवर्क चलाने वाले लोगों ने अब इस धंधे में महिलाओं को बतौर कोरियर इस्तेमाल करना शुरू किया है। अब तक पकड़े गए तस्करी के कई मामलों में इसकी पुष्टि भी हुई है। यंू तो एसएसबी के जवान सीमा से आने-जाने वाले लोगों व सामान पर नजर रखते रहे हैं, लेकिन वहां से गुजरने वाली महिलाओं की व्यवहारिक दिक्कतों के कारण तलाशी नहीं ली जाती, जिसका फायदा अवांछित गतिविधियों में लिप्त लोग उठा रहे हैं। इन्हीं दिक्कतों को देखते हुए एसएसबी ने महिला बटालियन तैयार की है। जिसे खटीमा से लगी सत्रह किलोमीटर लंबी सीमा पर स्थित अलग-अलग चेक पोस्टों पर नियुक्त किया जाएगा। एसएसबी की महिला यूनिट की जवानों ने बुधवार को लालकोठी चेक पोस्ट पर आमद दर्ज कराई। विभागीय सूत्रों ने बताया कि यूनिट में दो दर्जन से अधिक महिला जवान हैं। भविष्य में इनकी संख्या बढ़ाई जा सकती है।

-जुड़ेंगी उत्तराखंड के बिखरे इतिहास की कडि़यां

-एएसआई करेगा पुरावशेषों का ब्यौरा संजोते हुए पुस्तिका प्रकाशित -जुड़ेंगी प्रागैतिहासिक काल से आधुनिक इतिहास की कडि़यां देहरादून- प्रदेश में पुरातात्विक अवशेषों के रूप में बिखरे उत्तराखंड के इतिहास की कडि़यां जल्द ही जुड़ जाएंगी। बिखरे इतिहास को एक सूत्र में पिरोने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई)ने पहल की है। एएसआई के देहरादून मंडल ने प्रदेश में अब तक हुए तमाम उत्खननों में पुरावशेषों के ब्योरे को संजोते हुए एक पुस्तिका के प्रकाशन करने की योजना बनाई है। इस पुस्तिका में पुरावशेषों के माध्यम से उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल से ब्रिटिश काल तक का इतिहास दर्ज होगा। यह पुस्तिका विश्व दाय सप्ताह (19 से 26 नवंबर व‌र्ल्ड हैरिटेज वीक)में लोकार्पित की जाएगी। देश के इतिहास में अक्सर उत्तराखंड का उल्लेख नहीं के बराबर ही होता है, जबकि एएसआई के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. देवकी नंदन डिमरी का कहना है कि अल्मोड़ा में सुयाल नदी के दायें तट पर लखु उड्यार में प्रागैतिहासिक गुफा चित्र मिलते हैं। ये मध्य हिमालय में मिले पहले गुफा चित्र हैं। गढ़वाल मंडल की अलकनंदा घाटी के ग्वरख्या उड्यार और पिंडरघाटी के किमनी गांव में मिले गुफाचित्र भी संकेत देते हैं कि यहां प्रागैतिहासिक मानव रहता था। चंपावत के देवीधुरा में महापाषाण कालीन संस्कृति के सबूतों के तौर पर विशाल पत्थरों पर ओखलियां(कप मा‌र्क्स) मिली हैं। द्वारहाट के शैलचित्र और चंद्रेश्वर मंदिर के पास, अल्मोड़ा के नौगांव, मुनिया की ढाई, जोयो गांव, गोपेश्वर के समीप पश्चिमी नयार घाटी में भी ऐसी ही ओखलियां मिली हैं। बहादराबाद में 1953 में उत्तर-प्रस्तरयुगीन या ताम्रयुग के अवशेष मिले हैं। जिनमें कई हड़प्पा से मिलते जुलते हैं। कालसी के पास भी आरंभिक पाषाणयुगीन अवशेष मिले हैं। चमोली गढ़वाल के मलारी गांव में और पश्चिमी रामगंगा घाटी महापाषाणकालीन शवाधान (समाधियां) मिले हैं। डॉ. डिमरी का कहना है कि सातवी सदी ईस्वी पूर्व और चौथी सदी ईस्वी के मध्य हिमालय के आद्य इतिहास का प्रमाण मुख्यत: प्राचीन साहित्य है लेकिन उत्तरकाशी के पुरोला और देहरादून के जगतग्राम में कुणिंद शासक राजा शील वर्मन के अश्वमेध यज्ञ केप्रमाण मिले हैं। पूरे गढ़वाल में जगह-जगह बड़ी संख्या में कुणिंद वंश के सिक्के मिलते हैं। इतना ही नहीं काशीपुर नैनीताल से कुषाण शासकों कनिष्क और वासुदेव की मुनि की रेती (ऋषिकेश) से हविष्क की स्वर्ण मुद्राएं मिली हैं। डॉ. डिमरी के मुताबिक कुषाणों के बाद यौधेय, परवर्ती कुणिंद, छागलेश राजवंश, सिंहपुर का यदुवंश, नागवंश और फिर हर्ष के बाद कत्यूरी राजवंश के प्रमाण भी उत्तराखंड में मिलते रहे हैं। गढ़वाल के पंवार व कुमाऊं के चंद वंश ने तो 18वीं सदी तक राज किया। डॉ. डिमरी का कहना है कि 2003 में स्थापित एएसआई देहरादून मंडल द्वारा इतिहास को श्रृंखलाबद्ध करने का यह पहला प्रयास है। पुस्तिका से इतिहास के विद्यार्थियों को उत्तराखंड के क्रमिक वैज्ञानिक इतिहास का तो पता चलेगा ही। इतिहास के शोधार्थियों के लिए भी यह पुस्तिका संदर्भ पुस्तिका के रूप में लाभप्रद होगी।

लोक कलाएं: प्रोत्साहन की मुहिम पकड़ेगी जोर

स्कृति महकमा बना रहा है योजना -कलाकारों की आर्थिक स्थिति में होगा सुधार देहरादून, देवभूमि उत्तराखंड की संस्कृति व लोक कलाओं को संरक्षित व विभिन्न मंचों पर प्रोत्साहित करने की मुहिम जोर पकड़ेगी। संस्कृति महकमे की नई योजना लोक कलाकारों की आर्थिक स्थिति सुधारने में मददगार होगी। महकमे ने यह तय किया है कि देवभूमि की संस्कृति को राज्य के भीतर और अन्य प्रदेशों में नियोजित तरीके से प्रोत्साहित किया जाएगा। इसके तहत अन्य राज्यों में विभिन्न अवसरों पर उत्तराखंड की संस्कृति की छटा बिखेरने को कलाकारों के दल जाएंगे। स्वायत्त सांस्कृतिक संस्थाओं को सांस्कृतिक कार्यक्रमों, नाट्य समारोहों व लोक विधाओं के अभिलेखीकरण व वीडियोग्राफी को आर्थिक मदद मुहैया कराई जाएगी। अब तक साठ साल से ज्यादा उम्र के 106 वृद्ध एवं गरीब कलाकारों को मासिक पेंशन मुहैया कराई जा चुकी है। प्रदेश व देश के महापुरुषों की स्मृतियों में मूर्ति स्थापना व स्मारकों का निर्माण होगा। इसकी सूची तैयार की जा रही है। इसी तर्ज पर प्राचीन संरक्षित स्मारकों व स्थलों के विकास की रूपरेखा बनाई जा रही है। प्राचीन व ऐतिहासिक महत्व के अग्रलेखों व पांडुलिपियों की माइक्रो फिल्मिंग का काम अत्याधुनिक मशीनों से किया जाएगा। संस्कृति निदेशक बीना भट्ट के मुताबिक संस्कृति, लोक कलाओं व धरोहरों को सहेजने को नीति नियोजन किया जा रहा है। महकमे ने राज्य के नौवें स्थापना दिवस के मौके पर लोक कलाकारों को अधिक महत्व दिया है। विलुप्त होने की कगार पर पहुंची लोक कलाओं, विभिन्न वाद्य यंत्रों व उनसे जुड़े कलाकारों के प्रोत्साहन के लिए महकमे ने कदम उठाए हैं। इन्हें सूचीबद्ध किया जाएगा। -

-सरू की प्रेम कहानी का गवाह है 'क्वीलीगढ़'

-घर से भागकर रचाया था सरू ने गढ़पति से विवाह -पति के संदेह करने पर ताल में कूदकर दे दी थी जान नई टिहरी, गढ़वाल के इतिहास में बावन गढ़ों का विशेष महत्व है। सदियों पुराने इन सभी गढ़ों से कोई न कोई ऐतिहासिक आख्यान भी जुड़ा हुआ है, जो इन गढ़ों की विशेषता को भी दर्शाते हैं। ऐसा ही एक गढ़ है, टिहरी जिले में स्थित क्वीलीगढ़। जिला मुख्यालय के करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित इस गढ़ की कहानी सरू का जिक्र किए बिना अधूरी है, बल्कि अगर यह कहा जाए कि सरू के कारण ही क्वीलीगढ़ जाना जाता है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। विभिन्न लोकगीतों में सरू की प्रेम कहानी का वर्णन मिलता है। बताया जाता है कि सोलहवीं सदी में दिल्ली में मुगलों का प्रभाव बढ़ गया था। तब जौरासीगढ़ के अधिपति भगत सिंह सजवाण थे। एक दिन उनके स्वप्न में भगवान घंटाकरण आए व उन्हें दिल्ली में स्थित अपनी शिला गढ़वाल में लाकर स्थापित करने का निर्देश दिया। भगत सिंह दिल्ली से शिला लेकर जौरासीगढ़ की ओर आए। रास्ते में रात होने पर उन्होंने हेंवल नदी के किनारे ठाईगला में विश्राम किया। यहां रघु चमोली का निवास था। भगत सिंह ने यहीं शिला को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया। रघु चमोली की भैंस हर रोज इस शिला के ऊपर स्वयं दूध की धार डालकर शिला को स्नान कराया करती थी। यह देख चमोली ने शिला को कुल्हाड़ी से खंड-खंड कर दिया। इसका एक खंड सुरकंडा में, दूसरा कुंजापुरी में व तीसरा चंद्रबदनी में गिरा, जबकि चौथा घंडियाल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में सजवाणों ने जौरासीगढ़ छोड़ दिया और कोट नामक स्थान में क्वीलीगढ़ की स्थापना की। यहीं से शुरू होती है सरू की कहानी। वह दोगी पट्टी की कुमारी थी और क्वीलीगढ़ के सजवाण शासक पर मोहित हो गई। उसके पिता ने कई जगह उसका विवाह कराने की कोशिश की, लेकिन सरू घर से भागकर क्वीलीगढ़ आ गई। गढ़ाधिपति ने उससे विवाह कर लिया। इसके बाद दोनों प्रेमपूर्वक रहने लगे। एक दिन सजवाण की अनुपस्थिति में सरू का जीजा उसके घर पहुंचा। सरू ने उसकी खूब आवभगत की। बाद में जब सजवाण वापस आया, तो वह सरू को लेकर शंकित हो गया व उसके साथ मारपीट की। क्षुब्ध सरू घर से रोते हुए निकल गई और गढ़ के पास ही बने ताल में कूदकर जान दे दी। यह ताल आज भी सरू के ताल नाम से जाना जाता है। सजवाण को गलती का अहसास होता है, तो वह सरू की तलाश में निकल जाता है। लोकगीतों में इसका वर्णन इस तरह मिलता है। सरू की मौत व अधिपति की मनोदशा खराब होने के बाद सजवाणों ने क्वीलीगढ़ को छोड़ दिया व अलग- अलग स्थानों पर जाकर बस गए।

आइए! प्रकृति के रंगों का दीदार करें

- 15 नवंबर से पर्यटकों के लिए खोल दिया जाएगा राजाजी नेशनल पार्क - वन्य जीवों के संरक्षण के लिए पर्यटकों को प्रेरित करेगा पार्क प्रशासन देहरादून हाथियों की चिंघाड़, बाघ-गुलदार की दहाड़, कुलाचें भरते हिरन, नीलगाय, रंग-बिरंगे पक्षियों का मन को हर्षाने वाला कलरव, तितलियों का खूबसूरत संसार। प्रकृति का ऐसा कौन सा रूप है, जो वहां मौजूद नहीं है। आपका मन भी इन नजारों के दीदार को मचल रहा हो तो थोड़ा इंतजार कीजिए, 15 नवंबर आने ही वाला है। इस दिन जैव विविधता के लिए मशहूर राजाजी नेशनल पार्क पर्यटकों के लिए खोल दिया जाएगा। देश-दुनिया में पहचान पा चुका उत्तराखंड का राजाजी नेशनल पार्क आज पर्यटकों के पसंदीदा स्थलों में शुमार है। शिवालिक रेंज के देहरादून पूर्वी वन प्रभाग से लगे क्षेत्र में वन्य जीवों की बहुलता को देखते हुए इसे पूर्व में देश के पहले गवर्नर जनरल सी.राजगोपालाचारी के सम्मान में राजाजी वाइल्ड लाइफ सेंचुरी नाम दिया गया। फिर राजाजी सेंचुरी, मोतीचूर व चीला के साथ ही पूर्वी-पश्चिमी देहरादून वन प्रभाग, शिवालिक व लैंसडौन वन प्रभाग के कुछ हिस्सों को मिलाकर वर्ष ृ1983 में इसे राजाजी नेशनल पार्क घोषित किया गया। 820.42 वर्ग किमी में फैले इस संरक्षित क्षेत्र की जैव विविधता का कोई सानी नहीं है। एशियाई हाथियों की तो यह प्रमुख सैरगाह है। वर्तमान में पार्क में हाथियों की संख्या चार से पांच सौ के बीच है। यही नहीं, बाघ, गुलदार, हिरन, सांभर, काकड़, जड़ाव, सूअर, नीलगाय, बंदर, लंगूर समेत वन्य जीवों की 49 प्रजातियां यहां मौजूद हैं। पक्षियों का तो यहां अद्भुत संसार बसता है और करीब 320 पक्षी प्रजातियां यहां मौजूद हैं। प्रवासी पक्षियों का भी आकर्षण कम नहीं है। किंग कोबरा समेत अन्य सरीसृप, तितलियों का रंगीन संसार भी देखा जा सकता है। पर्यटक सीजन के लिए पार्क प्रशासन ने विशेष तैयारियां की हैं। पार्क के निदेशक एसएस रसाइली बताते हैं कि इस मर्तबा चिल्लावाली क्षेत्र को पर्यटकों के लिए खोला जा रहा है और वहां टूरिंग हट लगाया जा रहा है। इसके अलावा एक नया रूट भी खोला जा रहा है। मुंडाल में वाच टावर की हाईट बढ़ाई जा रही है। चीला में पर्यटकों को पार्क के बारे में जानकारी देने के साथ ही वन्य जीवों के संरक्षण के लिए भी प्रेरित किया जाएगा। इस बार कमाई पर नहीं, क्वालिटी टूरिज्म पर भी विशेष जोर रहेगा।

चमोली में कई हैं 'फूलों की घाटियां'

-चमोली जनपद के पांच स्थानों में विद्यमान हैं सैकड़ों पुष्प और औषधीय प्रजातियां -प्रचार-प्रचार के अभाव के बीच अस्तित्व तलाश रही हैं प्राकृतिक धरोहरें , गोपेश्वर उत्तराखंड के जनपद चमोली में एक नहीं कई 'वैली आफ फ्लावर्स' हैं। शायद, आप चौंक गए होंगे, लेकिन ये हकीकत है। प्राकृतिक सौन्दर्य के लिहाज से बेहद खूबसूरत इस सीमांत जिले के एल्पाइन जोन (बुग्याल) में पांच ऐसी घाटियां हैं, जिनमें फूलों की सैकड़ों प्रजातियां विद्यमान हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि इन घाटियों को संरक्षित कर 'फूलों की घाटी' के रूप में विकसित किया जा सकता है। फिलहाल, प्रचार-प्रसार के अभाव में मखमली पहाडि़यों की ओट में छिपी से घाटियां गुमनामी में खोई हुई हैं। वर्ष 1931 में ब्रिटेन के वनस्पति वैज्ञानिक व पर्वतारोही फ्रैंक एस स्मिथ के कदम जब चमोली जिले के घांघरिया क्षेत्र में पड़े, तो वहां से कुछ ही दूरी पर स्थित एक अद्भुत घाटी को देखकर उन्हें स्वर्ग सा एहसास हुआ। उन्होंने इस घाटी को न सिर्फ 'फूलों की घाटी' का नाम दिया बल्कि, इसकी खूबसूरती पर एक किताब लिखकर पूरे विश्व में इसे पहचान भी दिलाई। दरअसल, चमोली जिले में ऐसी तमाम घाटियां हैं, जिनमें पौधों की पुष्प और हर्बल प्रजातियां प्रचुर मात्रा में हैं। इन घाटियों में रुद्रनाथ-पनार वैली, आली, वैदनी, सिला समुद्र व धूनी रामणी बुग्याल शामिल हैं। ये सच है कि इन घाटियों में वैली आफ फ्लावर्स में पाए जानी वाली सभी चार सौ पुष्प प्रजातियां नहीं हैं, लेकिन यहां भी पुष्पों की प्रजातियों की तादाद काफी है। एक बात और इन सभी घाटियों में पुष्प पादपों के अलावा सैकड़ों औषधीय पादप भी विद्यमान हैं, जो इनके महत्व को बढ़ा देते हैं। जड़ी बूटी शोध एवं विकास संस्थान गोपेश्वर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. विजय प्रसाद भट्ट का कहना है कि रुद्रनाथ-पनार वैली, आली, वैदनी, सिला समुद्र व धूनी रामणी बुग्यालों में दो सौ से ढाई सौ के बीच पुष्प पादपों की प्रजातियां हैं। इनमें प्रिमूला, हिमालयन पापी, मेरीगोल्ड, पोटेंटिला, जीरेनियम, एस्टर, ससूरिया ओवेलेटा, लिगूलेरिया आदि सैकड़ों पुष्प प्रजतियां पाई जाती हैं। इसके अलावा, औषधीय पापदों में अतीस, मीठा, जटामासी, वनककड़ी, ज्यूरेनिया, ज्यूनीपर, गैल्थीरिया, पालीगोनम, चोरू समेत कई औषधीय प्रजातियां भी हैं। उनका कहना है कि इन घाटियों को 'वैली आफ फ्लावर्स' के अलावा 'वैली आफ ह‌र्ब्स' के रूप में भी विकसित किया जा सकता है।

Saturday, November 7, 2009

-हरिद्वार में बना फोर व्हीलर इंजन

-स्पीड क्राफ्ट कंपनी ने तैयार किया देश का पहला फोर व्हीलर इलेक्ट्रिक इंजन -इलेक्ट्रिक लाइन और रेलवे ट्रैक की रिपेयरिंग में आएगा काम -सवा करोड़ की लागत से तैयार हुआ इंजन हरिद्वार सिडकुल (स्टेट इनफ्रास्टक्चर ऐंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कार्पोरेशन ऑफ उत्तराखंड लिमिटेड)स्थित एक कंपनी के इंजीनियरों की टीम ने इलेक्ट्रिक ट्रेन की पटरी और विद्युत लाइन की मरम्मत करने के लिए देश का पहला चार पहिया इलेक्ट्रिक इंजन तैयार करने में कामयाबी हासिल की है। अभी तक आठ पहिया वाले इंजन से ही काम लिया जाता रहा है। सवा करोड़ की लागत से डेढ़ वर्ष में इस इंजन को मूर्त रूप दिया गया है। इसे ओवर हेड इक्यूपमेंट (ओएचई) नाम दिया गया है। सिडकुल स्थित स्पीड क्राफ्ट कंपनी ने देश के इतिहास में पहली बार चार पहिया वाला इलेक्ट्रिक इंजन तैयार किया है। यह इंजन विद्युत रेलखंड पर गुजरने वाले रेलवे ट्रैक और विद्युत लाइनों में आई खराबी को को पल भर में पकड़ लेगा। इंजीनियरों को इसे तैयार करने में करीब डेढ़ साल का वक्त लगा। 24 टन से अधिक वजन वाला यह विशेष इंजन इलेक्ट्रिक लाइन और रेलवे ट्रैक में आई खराबी को ढूंढने में माहिर है। इंजन को दोनों ओर से आसानी से संचालित किया जा सकता है। अंदर कुछ आधुनिक मशीनें लगी हुई हैं, जो तुरंत कमियों को पकड़ लेती है। इंजन की खासियत यह है कि इसके ऊपर एक साथ दस इलेक्ट्रिक मैन चढ़कर लाइन में आई खराबी को दूर कर सकते हैं। इससे रास्ते में फंसा कोई विद्युत इंजन या विद्युत लाइन तुरंत ठीक हो सकती है। इसका लाभ यह कि रेलवे लाइन तकनीकी गड़बड़ी से ज्यादा देर तक जाम नहीं हो सकेगी। सिडकुल के स्पीड क्राफ्ट फैक्ट्री से इंजन को हरिद्वार रेलवे स्टेशन लेकर आ रहे कंपनी के प्रोडक्शन मैनेजर अनुज चौहान ने बताया कि चार पहियों वाला यह देश का पहला इंजन है। रात में भी यह पूरी रफ्तार से चलने में सक्षम है। लखनऊ से एक दस सदस्यीय टीम इसका परीक्षण करने सोमवार को हरिद्वार पहुंच रही है। फिर इसे रेलवे की जरूरत के मुताबिक आर्डर मिलने पर तैयार किया जाएगा।

-हरिद्वार में बना फोर व्हीलर इंजन

-स्पीड क्राफ्ट कंपनी ने तैयार किया देश का पहला फोर व्हीलर इलेक्ट्रिक इंजन -इलेक्ट्रिक लाइन और रेलवे ट्रैक की रिपेयरिंग में आएगा काम -सवा करोड़ की लागत से तैयार हुआ इंजन हरिद्वार सिडकुल (स्टेट इनफ्रास्टक्चर ऐंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कार्पोरेशन ऑफ उत्तराखंड लिमिटेड)स्थित एक कंपनी के इंजीनियरों की टीम ने इलेक्ट्रिक ट्रेन की पटरी और विद्युत लाइन की मरम्मत करने के लिए देश का पहला चार पहिया इलेक्ट्रिक इंजन तैयार करने में कामयाबी हासिल की है। अभी तक आठ पहिया वाले इंजन से ही काम लिया जाता रहा है। सवा करोड़ की लागत से डेढ़ वर्ष में इस इंजन को मूर्त रूप दिया गया है। इसे ओवर हेड इक्यूपमेंट (ओएचई) नाम दिया गया है। सिडकुल स्थित स्पीड क्राफ्ट कंपनी ने देश के इतिहास में पहली बार चार पहिया वाला इलेक्ट्रिक इंजन तैयार किया है। यह इंजन विद्युत रेलखंड पर गुजरने वाले रेलवे ट्रैक और विद्युत लाइनों में आई खराबी को को पल भर में पकड़ लेगा। इंजीनियरों को इसे तैयार करने में करीब डेढ़ साल का वक्त लगा। 24 टन से अधिक वजन वाला यह विशेष इंजन इलेक्ट्रिक लाइन और रेलवे ट्रैक में आई खराबी को ढूंढने में माहिर है। इंजन को दोनों ओर से आसानी से संचालित किया जा सकता है। अंदर कुछ आधुनिक मशीनें लगी हुई हैं, जो तुरंत कमियों को पकड़ लेती है। इंजन की खासियत यह है कि इसके ऊपर एक साथ दस इलेक्ट्रिक मैन चढ़कर लाइन में आई खराबी को दूर कर सकते हैं। इससे रास्ते में फंसा कोई विद्युत इंजन या विद्युत लाइन तुरंत ठीक हो सकती है। इसका लाभ यह कि रेलवे लाइन तकनीकी गड़बड़ी से ज्यादा देर तक जाम नहीं हो सकेगी। सिडकुल के स्पीड क्राफ्ट फैक्ट्री से इंजन को हरिद्वार रेलवे स्टेशन लेकर आ रहे कंपनी के प्रोडक्शन मैनेजर अनुज चौहान ने बताया कि चार पहियों वाला यह देश का पहला इंजन है। रात में भी यह पूरी रफ्तार से चलने में सक्षम है। लखनऊ से एक दस सदस्यीय टीम इसका परीक्षण करने सोमवार को हरिद्वार पहुंच रही है। फिर इसे रेलवे की जरूरत के मुताबिक आर्डर मिलने पर तैयार किया जाएगा।

राज्य में होम्योपैथिक मेडिकल कालेज जल्द

पचास फीसदी वित्तीय मदद को केंद्र सरकार तैयार सूबे के पहले सरकारी होम्योपैथिक मेडिकल कालेज खोले जाने की कवायद तेज हो गई है। इस मद में केंद्र से वित्तीय मदद की सहमति मिलने से स्वास्थ्य विभाग को और भी बल मिला है। हालांकि कालेज दून में ही स्थापित किये जाने की उम्मीद फिलहाल कम दिख रही है। सरकार का मानना है कि कालेज खुलने से लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं तो मुहैया होंगी ही, इस संबंध में तैयार की जा रही अन्य योजनाओं के लिए मार्ग भी प्रशस्त हो जाएगा। राज्य गठन के बाद से सरकारी होम्योपैथिक मेडिकल कालेज बनाये जाने के प्रयास तो हुए पर इसमे कोई ठोस सफलता नहीं मिली। मुख्यमंत्री बनने के बाद डा.रमेश पोखरियाल निशंक ने स्वास्थ्य विभाग को नये सिरे से कार्य करने के निर्देश दिये। खुद मुख्यमंत्री ने इस बाबत केंद्र से बात की, जिसका असर दिखने लगा है। स्वास्थ्य महानिदेशक सीपी आर्य के मुताबिक हाल ही में विभाग के इस प्रस्ताव पर केंद्र ने सूबे को हरी झांडी दिखाते हुए मेडिकल कालेज के लिए पचास फीसदी वित्तीय अनुदान देने पर सहमति जताई, जबकि पचास फीसदी धनराशि राज्य सरकार खर्च करेगी। नियमानुसार मेडिकल कालेज से पहले अस्पताल बनाया जाना जरूरी है। भारत सरकार के स्वास्थ्य संयुक्त सचिव (आयुष)संजय कुमार पांडा के साथ विभाग के उच्चाधिकारियों की एक महत्वपूर्ण बैठक में अस्पताल के शीघ्र शुरू किये जाने पर चर्चा हुई। सूत्रों के मुताबिक रुड़की के भगवानपुर स्थित कम्युनिटी हेल्थ सेंटर को तीस या पचास बेड के अस्पताल में बदलने पर विचार विमर्श हुआ। हालांकि पहले यह देहरादून में स्थापित किये जाने की योजना थी, लेकिन इसके लिए जरूरी संसाधन जुटाने में काफी समय लगेगा। इसे देखते हुए भगवानपुर ही बेहतर विकल्प माना जा रहा है। क्या है जरूरी कालेज से पूर्व जरूरी तीस या पचास बेड के अस्पताल के लिए कम से कम साढ़े सात एकड़ जमीन, राज्य सरकार और संबद्ध विवि की एनओसी लेकर केंद्रीय होम्योपैथी परिषद से आवेदन किया जाता है। परिषद की मंजूरी के बाद ही यह योजना मूर्तरूप ले सकेगी।

बूंखाल मेला: क्या इस बार रुक पाएगी पशुबलि

- -प्रतिवर्ष सैकड़ों बकरों व नर भैंसों की दी जाती है बलि -प्रशासन के लिए चुनौती है बलि पर अंकुश लगाना पैठाणी (गढ़वाल): गढ़वाल भर में आयोजित होने वाले अधिकांश मेले विभिन्न ऐतिहासिक आख्यानों-परंपराओं पर आधारित होते हैं। परंपरा के मुताबिक इन मेला आयोजनों के दौरान पशुओं की बलि देने का भी रिवाज रहा है। ऐसा ही एक मेला है बूंखाल मेला। प्रतिवर्ष इस मेले में सैकड़ों बकरों समेत नर भैंसों की जान शक्ति उपासना के नाम पर ले ली जाती है। हालांकि, मेले में बलि प्रथा रुकवाने को विभिन्न सामाजिक संगठन जागरूकता अभियान चलाते हैं। इसके अलावा प्रशासन की ओर से भी बलि न होने देने पर जोर दिया जाता है, लेकिन बूंखाल में प्रशासन के तमाम दावे हवा हो जाते हैं। भक्त इस वर्ष दिसंबर में प्रस्तावित मेले में पशुबलि को अभी से तैयारियों में जुट गए हैं। ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि क्या इस बार प्रशासन बलि रुकवा पाएगा। गढ़वाल में मेलों को अठवाड़े के नाम से भी जाना जाता है। गढ़वाल में बलि प्रथा की बात की जाए, तो साफ होता है कि यह अठवाड़े ही इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। हालांकि, अब अधिकांश मेलों में बलि प्रथा लगभग बंद हो चुकी है, लेकिन पौड़ी गढ़वाल जिले की थलीसैंण तहसील क्षेत्र बूंखाल में यह क्रूर प्रथा आज भी कायम है। पौड़ी मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित बूंखाल के मेले में पिछले वर्ष सामाजिक संगठनों व प्रशासन की लाख कोशिशों के बावजूद लगभग 90 नर भैसों व हजारों बकरों की बलि चढ़ाई गई थी। यह भी बता दें कि बूंखाल राज्य का सबसे बड़ी पशुबलि मेला है। हालांकि, प्रशासन एवं सामाजिक संगठनों के समन्वित प्रयासों से कठूड़, कांडा, सवदरखाल, खोला, वरकोट, मुण्डेश्वर में बलिप्रथा पूर्णत: समाप्त हो चुकी है, लेकिन बूंखाल आज भी प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। जानकारी के मुताबिक इस वर्ष दिसंबर माह के पहले सप्ताह में मेले का आयोजन होना सुनिश्चित है। इसके लिए राठ क्षेत्र में तैयारियां जोरों पर हैं। मेले में इस बार भी फिर सैकड़ों नर भैसों व हजारों बकरों की बलि चढऩे की प्रबल संभावना है। इसे देखते हुए प्रशासन व सामाजिक संगठनों के हलकों में भी हरकत शुरू हो गई हैं। क्षेत्र में तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं कि कि क्या चंद दिनों में इस राठ क्षेत्र की जनता में जागृति आ पाएगी। पशु कल्याण बोर्ड की कार्यकारी अध्यक्ष व बिजाल संस्था की अध्यक्ष सरिता नेगी कहती हैं कि जिस तरह कांडा मेले में पशुबलि रुकी, उसी तरह से बूुखाल मेले में बलि प्रथा पर अंकुश लगेगा। उन्होंने बताया कि क्षेत्र में अब तक जनजागरण अभियान के साथ ही लगभग आठ गांवों में समितियों का गठन भी किया गया है, जो बलि देने वालों को समझााएंगी। दूसरी ओर, एसडीएम थलीसैंण एनएस नबियाल कहते हैं कि बूंखाल में बलि प्रथा पर बलपूर्वक रोक नहीं लगाई जा सकती। उन्होंने बताया कि प्रशासन की ओर से जनजागरण को विशेष प्रयास किए जाएंगे।

-यहां दुल्हन ले जाती है दूल्हे के घर बारात

-जौनसार में अनूठी हैं शादी की रस्में -कुल देवता की अनुमति के बाद होता है रिश्ता -दुल्हन की बारात जाती है दूल्हे के घर -कन्या पक्ष के बारातियों के लिए काटे जाते हैं बकरे विकासनगर(देहरादून) विदेश ही नहीं, देश में भी आधुनिक तौर तरीकों व शानो-शौकत के साथ विवाह करने का प्रचलन बढ़ रहा है, लेकिन जनजाति क्षेत्र जौनसार-बावर के अधिकांश गांवों में सादगी के साथ शादी करने का रिवाज है। यहां दूल्हे के बजाए दुल्हन की बारात वर पक्ष के यहां ले जाने की परंपरा वर्तमान में भी कायम है। जौनसार-बावर क्षेत्र में वर पक्ष की ओर से कन्या पक्ष के घर रिश्ता ले जाने की पहल की जाती है। उसके बाद वर व कन्या पक्ष के परिजन अपने-अपने कुल पुराहितों और कुल देवता महासू देव की अनुमति लेने के बाद शादी का दिन तय करते हैं। इसके बाद वर और कन्या पक्ष के परिजन स्वयं अपने-अपने ईष्ट मित्रों व नातेदार रिश्तेदारों के घर जाकर उन्हें शादी में शामिल होने का न्योता देते हैं। क्षेत्र के कुछ दूरस्थ गांवों को छोड़ दें तो यह व्यवस्था अब लगभग बदल गई है। लोग अब निमंत्रण कार्ड के माध्यम से मेहमानों को आंमत्रित करते हैं। परंपरानुसार, विवाह की निश्चित तिथि से एक रोज पहले वर पक्ष की ओर से चाचा, मामा, भाई या पिता गांव के तीन प्रमुख व्यक्तियों को साथ लेकर कन्या पक्ष के घर जाते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में जोजोडिय़ा कहा जाता है। कन्या पक्ष के लिए वर पक्ष की ओर से शादी का जोड़ा, गहने, जूते व श्रंृगार आदि का सामान दिए जाने का रिवाज है। शादी के दिन दुल्हन की बारात गाजे-बाजे, ढोल-दमाऊं के साथ वर पक्ष के घर पहुंचती है। जहां पर वर पक्ष के लोग बारातियों (जोजोडिय़ों) का जोरदार स्वागत करते हैं। दूल्हे पक्ष की ओर से कन्या पक्ष के बारातियों के स्वागत में बकरे काटे जाते हैं। जोजोडिय़ों के लिए गांव में अलग से डेरा दिया जाता है। वर पक्ष की ओर से दुल्हन के साथ आए बारातियों के स्वागत में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जाती। बारातियों के लिए खासतौर से मीट, चावल, पूरी, हलवा, घी, दाल, साग-सब्जी, सलाद व चटनी आदि का इंतजाम किया जाता है। शादी के फेरे से लेकर विवाह की सारी रस्में दूल्हे के घर पर बने मंडप पर निभाई जाती हैं। शादी के दूसरे दिन जोजोडिय़ा विदाई गीत 'छांइयां' गाते हुए वापस घर लौट जाते हैं। शादी के तीसरे या पांचवे दिन नवदंपति दुणोजिया के रूप में वधू पक्ष के घर जाते हैं, जहां पर उनके स्वागत में बकरा काटा जाता है। क्षेत्र में जुलाई, अगस्त व सितंबर को छोड़ बाकी सभी माह में विवाह शुभ माना जाता है। चिल्हाड़ निवासी बुजुर्ग बर्फियानंद बिजल्वाण का कहना है कि इस प्रकार के विवाह से कन्या पक्ष पर कोई बोझा नहीं पड़ता। या यूं कहिए कि दहेजरहित शादी होती है। इसलिए यह परंपरा कायम रहनी चाहिए। वहीं, युवा खजान सिंह नेगी का कहना है कि बदलते जमाने के साथ क्षेत्र में विवाह के तौर-तरीके भी बदलने चाहिए। लड़की की बारात वर पक्ष के यहां जाना वर्तमान में सही नहीं लगता।

-शैली कर्नाटक, पूजन परंपरा गढ़वाली

-लैंसडौन स्थित गढ़वाल राइफल्स का रेजीमेंटल दुर्गा मंदिर राष्ट्रीय एकता की मिसाल -तत्कालीन सेंटर कमांडेंट कर्नल युनूस खान ने रखी थी मंदिर की आधारशिला -महाराजा मानवेंद्र शाह ने किया था मंदिर का उद्घाटन -बाद में ले.जन. आरवी कुलकर्णी के निर्देशों में दिया गया कर्नाटक शैली का स्वरूप भारतीय सेना की विभिन्न इकाइयों में गढ़वाल राइफल्स का नाम खास तौर पर लिया जाता है। अपने शौर्य, पराक्रम व बलिदानी परंपरा की बदौलत राइफल्स के वीर जवानों ने विभिन्न युद्धों में देश की आन, बान, शान की रक्षा भी की है। यही वजह है कि गढ़वाल राइफल्स का रुतबा इससे जुडऩे वाले सैनिकों के लिए भी सम्मान का विषय बन जाता है। कुछ ऐसा ही है गढ़वाल राइफल्स का रेजीमेंटल दुर्गा मंदिर भी। कहने को तो, यह आम मंदिरों की ही तरह है, जहां मां दुर्गा की पूजा की जाती है, लेकिन इस मायने में अपनी तरह का अनूठा कि यह भारत की धार्मिक, सांस्कृतिक एकता का परिचायक भी है। गढ़वाल राइफल्स का मुख्यालय लैंसडौन में स्थित है। यहीं स्थित है राइफल्स का रेजीमेंटल मंदिर भी। वर्ष 1961 तक यहां स्थित दुर्गा मंदिर अस्थायी रूप से क्वार्टर गार्ड के निकट ड्रिल शेड के आरमर शाप में स्थापित था। बाद में रेजीमेंट का विस्तार होने पर मंदिर का स्थान छोटा पडऩे लगा। इस पर तत्कालीन सेंटर कमांडेंट कर्नल युनूस खान के नेतृत्व में वर्तमान मंदिर के लिए उपयुक्त स्थान का चयन कर दुर्गा मंदिर की आधारशिला रखी गई। मंदिर के निर्माण के बाद इसका उद्घाटन तत्कालीन टिहरी सांसद महाराजा मानवेंद्र शाह ने किया था। यहां उल्लेखनीय है कि टिहरी रियासत के अंतिम महाराजा होने के कारण उन्हें गढ़वाल रेजीमेंट के आनरेरी कर्नल की उपाधि मिली थी। रेजीमेंट के शताब्दी वर्ष 1987 के मौके पर तत्कालीन सेंटर कमांडेंट बिग्रेडियर जीएस भुल्लर ने मंदिर को भव्य रूप देने की योजना बनाई, लेकिन उनका स्थानान्तरण होने से योजना परवान न चढ़ सकी। सन् 1992 में मंदिर निर्माण की योजना को अमलीजामा पहनाने का निर्णय लिया गया। वैधानिक स्वीकृति प्राप्त होने पर रक्षा मंत्रालय व सेना मुख्यालय से आवश्यक धनराशि खर्च करने की अनुमति ली गई। बिग्रेडियर जगमोहन रावत के कमान संभालने के बाद मार्च 1993 को नवसंवत्सर के शुभ अवसर पर नए नक्शे के आधार पर मंदिर के निर्माण का श्रीगणेश किया गया, लेकिन फिर ब्रिगेडियर भी स्थानांतरित हो गए। मौजूदा मंदिर के स्वरूप का श्रेय पूर्व कर्नल कमांडेंट ले. जनरल आरवी कुलकर्णी को जाता है। उनके निर्देशों पर मंदिर को उत्तर- दक्षिण की समन्वित संस्कृति के अनुरूप तैयार करने का निर्णय लिया गया। मंदिर को चार भागों में बांटा गया है। पहले भाग मुखमंडल में प्रवेशद्वार है। मध्य में मां राजराजेश्वरी व उनके दोनों ओर श्रीगणेश व कार्तिकेय की मूर्तियां हैं। द्वार के स्तम्भों पर सुंदर कलाकृतियां हैं। दूसरे भाग में प्राचीन मंदिर (पुराने मंदिर) के ढांचे को मनमोहक कलाकृतियों से सजाकर नवीन रूप दिया गया है। तीसरे भाग में प्रार्थना प्रकोष्ठ है, जिसकी दीवारें दोनों ओर नौ-नौ स्तंभों पर टिकी है। इन स्तम्भों पर भी कलाकृतियां उकेरी गई है। चौथे एवं अंतिम भाग को प्रधान मंदिर के रूप में बनाया गया है। मंदिर के बाहर विभिन्न देवी-देवताओं की बीस मूर्तियां है। खास बात यह है कि मंदिर कर्नाटक शैली में बनाया गया है, लेकिन यहां पूजा की परंपरा गढ़वाली रीति- रिवाजों पर आधारित है। सेना के सूबेदार मेजर आनरेरी लेफ्ट धर्मगुरू पंडित तोताराम मलेठा बताते है कि सेना का हर साहसिक दल मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद ही रवाना होता है। मंदिर में प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा अर्चना के अलावा रविवार को विशेष आयोजन किया जाता है।

मौडि़वी की पूजा बिन कैसे होगी राजजात

-नंदा राजजात यात्रा से छह माह पूर्व होती है मौडि़वी की पूजा -वर्ष 2000 के बाद अब तक यहां नहीं की गई पूजा -मौडि़वी नामक स्थान पर पत्थरों में खाना पड़ता है प्रसाद उत्तराखंड सदियों से धर्म- अध्यात्म की धरती रही है। देशभर के करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र बदरी- केदार धाम के अलावा यहां कई पौराणिक स्थल व मंदिर हैं, जो इस राज्य के कण- कण में भगवान का वास करने संबंधी उक्तियों को चरितार्थ करते हैं। इसके अलावा मेलों, धार्मिक यात्राओं व अन्य विशेष पूजा आयोजनों के जरिए यहां के लोक का प्रभु से जुड़ाव साफ उजागर होता है। ऐसा ही एक आयोजन है नंदा देवी की राजजात यात्रा। प्रति 12 वर्ष में आयोजित होने वाली इस यात्रा में हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। पूरे विधि- विधान व वैदिक रीतियों के साथ यात्रा का आयोजन किया जाता है और भक्त सुख, शांति की कामना करते हैं। अगली यात्रा वर्ष 2012 में प्रस्तावित है, लेकिन अब तक यात्रा शुरू करने के लिए अनिवार्य मौडि़वी पूजा नहीं की जा सकी है। इससे यह सवाल बहस का विषय बन गया है कि क्या इस बार मौडि़वी पूजा बिना ही यात्रा की जाएगी। उल्लेखनीय है कि 280 किमी की राजजात एशिया की सबसे लंबी पैदल यात्रा है। परंपरा के मुताबिक यात्रा के शुभारंभ से छह वर्ष पूर्व मौडि़वी पूजा किया जाना अनिवार्य है। लोकमान्यताओं के अनुसार नौटी व मैठाणा गांव में 12 वर्ष में दो बड़ी पूजाएं मौडि़वी व राजजात का आयोजन होता है। क्षेत्र की भूम्याल देवी के रूप में उफराईं (अपर्णा) देवी की पूजा की जाती है। ऐसे में अपर्णा देवी जन- जन की पूज्या मानी जाती है। देवी की यात्रा को ही मौडि़वी के नाम से जाना जाता है, जबकि नंदा देवी की यात्रा राजजात कहलाती है। मान्य रीति के मुताबिक मौडि़वी के बाद ही राजजात आयोजित की जा सकती है। उल्लेखनीय है कि नौटी सहित उफरांई देवी की पूजा छातोली, कल्याड़ी, बैनोली, देवल व चौण्डली आदि गांवों में भी होती है। यहां लोग नया अनाज तैयार होने पर उपयोग से पूर्व देवी को भोग चढ़ाते हैं। देवी का प्रिय भोग चौंसा-भात है। श्रद्धालु उफरांई ढांग केनीचे मौडि़वी नामक स्थान पर इसे पकाते हैं। खास बात यह है कि यह प्रसाद बर्तन में नहीं, बल्कि पत्थरों में खाने की परंपरा है। दूसरी ओर, नंदा देवी को क्षेत्रीय लोग अपनी ध्याण (विवाहित पुत्री) रूप में मानते हैं। राजजात यात्रा का तात्पर्य नंदा के कैलाश प्रस्थान यानी विदाई से है। यही वजह है कि विदाई से पूर्व ध्याणी की पूजा के रूप में मौडि़वी पूजा की जाती है। नंदा देवी राजजात का वर्ष 2000 में आयोजन हुआ था, तो छह वर्ष पूर्व 1994 में मौडिवी पूजा का भी आयोजन किया गया था। इससे पहले भी सभी यात्राओं से पूर्व यह पूजा अबाध रूप से की गई है, लेकिन वर्ष 2012 की यात्रा की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और इस बार अब तक मौडि़वी पूजा नहीं की जा सकी है, जबकि कायदे से यह पूजा वर्ष 2006 में ही हो जानी चाहिए थी। जिला पंचायत अध्यक्ष विजया रावत ने बताया कि वर्ष 2012 में राजजात होगी। ऐसे में मौडि़वी का निर्वाह न होना धर्मप्रेमियों को अखरने लगा है। उन्होंने राजजात यात्रा की तैयारियों से पूर्व मौडिवी की मान्य परंपराओं का निर्वहन न होने को लेकर धार्मिक बहस को छेड़ दिया है। मौडिवी के बिना लोग राजजात को आधा अधूरा मानने की बात कहने लगे हैं। इस बाबत, मंदिर के पुजारी मदन प्रसाद ने बताया कि भूम्याल की पूजा बिना गांव की कोई भी सामूहिक पूजा आयोजित करना धार्मिक परंपराओं के विपरीत होने के साथ ही शास्त्रसम्मत भी नहीं है।

यह कैसी तस्वीर

यह तस्वीर है उत्तराखंड की। गांव पलायन की मार से खाली हो रहे हैं तो शहरों में तिल रखनेभर को जगह नहीं बची। जरा, पीछे मुड़कर देखें, पहले सूबे के पहाड़ी क्षेत्रों से दिल्ली, चंडीगढ़ समेत देश के अन्य शहरों की ओर तेजी से पलायन हो रहा था, अब यह तेजी प्रदेश के शहरों पर अधिक केंद्रित हो गई है। जाहिर है चिंताएं तो बढ़ेंगी ही, गांव की भी और शहरों की भी। शहरों में सीमेंट-कंक्रीट का जैसा जंगल उग रहा है, उसने वहां की सूरत ही नहीं सीरत भी बिगाड़ कर रख दी है। पहचान का संकट है सो अलग। राजधानी देहरादून इसका ज्वलंत प्रतीक है। डेढ़ दशक पूर्व यह शहर क्या था, जहां नजर घुमाओ आम-लीची के बागीचे पसरे नजर आते थे, खेतों में बासमती की महका करती थी। आज क्या है, सिर्फ और सिर्फ कंक्रीट का जंगल। न वह रूमानी मौसम और न तन-मन में ताजगी भर देने वाली आबोहवा। सब विकास की भेंट चढ़ गए। आबादी के अनुपात में वाहनों की बढ़ती तादाद ने शहर की सांसों में जहर घोल दिया है। यही हाल राज्य के अन्य शहरों का भी है। शहरीकरण की अंधी दौड़ हरियाली को पूरी तरह लील चुकी है। यह ठीक है कि सुविधाओं के विस्तार और विकास के लिए कुछ तो कीमत चुकानी ही पड़ती है, लेकिन इसके यह मायने नहीं कि शहर की पहचान ही मिटा दी जाए। इस पर अंकुश लगना जरूरी है। इसके लिए कुछ तो कठोर कदम उठाने ही होंगे, जिससे शहरों पर आबादी का दबाव कम हो। गांवों पर भी ध्यान केंद्रित किए जाने की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि इसे लेकर चिंंता न जताई जाती हो। चिंता भी होती है और मंथन भी, लेकिन हमेशा सामने आ खड़ा होता है सुविधाओं का अकाल। यही असली चिंता भी है। मशीनरी को एक न एक दिन तो यह मानना ही पड़ेगा कि गांवों के विकास पर ध्यान केंद्रित किए बिना शहरों का दबाव कम नहीं किया जा सकता। अच्छा हो कि वक्त रहते इस पर ऐसी कोई ठोस नीति अमल में लाई जाए, जो गांवों के भी हित में हो और शहरें के भी। अन्यथा, वह दिन दूर नहीं, जब उत्तराखंड के शहरों में स्थिति विकट हो जाएगी।

लहसुन चाहिए, राजमा लाओ

-उत्तरकाशी के सीमांत क्षेत्र उपला टकनौर में अब भी कायम है वस्तु विनिमय की परंपरा -पाव किलो नहीं अब भी चलता है सेर, पाथा और मण उत्तरकाशी यह कहावत तो सभी ने सुनी है, अगर रुपये हों, तो जरूरत की हर चीज आसानी से खरीदी जा सकती है। दुनिया के बाकी हिस्सों में यह बात सटीक भी बैठती है, लेकिन उत्तरकाशी का सीमांत क्षेत्र उपला टकनौर में इसके कोई मायने नहीं। दरअसल, वैश्वीकरण के इस युग में भी यह क्षेत्र व्यापार- विनिमय के आधुनिक तौर- तरीकों से बिलकुल अनजान है। आज भी यहां वस्तुओं के परस्पर विनिमय के जरिए ही यहां व्यापार किया जाता है। बाकायदा बाजार लगाकर विभिन्न जड़ी- बूटियां, लहसुन, हींग, ऊनी कपड़े बेचे जाते हैं, लेकिन इनके बदले में रुपये नहीं, बल्कि राजमा, चौलाई, आलू या चावल लिए जाते हैं। उपला टकनौर की गिनती कभी उत्तरकाशी के समृद्ध क्षेत्रों में हुआ करती थी। भारत- तिब्बत व्यापार का मुख्य बाजार होने के चलते इसका खास स्थान था। उस समय यहां स्थानीय भारतीय व्यापारी तिब्बतियों से अनाज, कपड़ों आदि का व्यापार वस्तुओं के विनिमय के जरिए ही करते थे। अब लंबे समय से भारत- तिब्बत व्यापार बंद हो चुका है, लेकिन इलाके की व्यापारिक परंपराएं आज भी पहले जैसी ही कायम हैं। सर्दियों की शुरुआत होते ही टकनौर के जसपुर, सुक्की, झााला, पुराली, छोलमी आदि गांवों में बगोरी गांव से जाड़ भोटिया समुदाय के लोग सामान लेकर पहुंचते हैं। जिला मुख्यालय से करीब पचास किमी दूर रहने वाले ये लोग लादू, चूरा, बालछड़ी, आरछा जैसी जड़ी बूटियों सहित हींग, अदरक, लहसुन, काला नमक, गर्म ऊनी कपड़े आदि सामान ले जाते हैं। इनके बदले वे स्थानीय लोगों से राजमा, आलू, चौलाई, जौ आदि सामान ले जाते हैं। खास बात यह है कि खरीद फरोख्त में सेर, पाथा, कुंडी व मण जैसे परंपरागत तोल के मानक ही इस्तेमाल किये जाते हैं। फेरी वाले अंदाज में होने वाले इस व्यापार में अब तक रुपये- पैसे शामिल नहीं हो पाए हैं। हालांकि पहले की अपेक्षा अदला बदली की जाने वाली वस्तुओं की फेहरिस्त काफी छोटी हो चली है। इस काम में लगी सरोजनी देवी, रामा देवी व जगदेई ने बताया कि आठ- दस साल पहले तक उपला टकनौर से बाहर काफी दूर तक यह व्यापार होता था, लेकिन अब यह कुछ ही गांवों तक सिमट कर रह गया है और गिनी चुनी वस्तुओं की ही खरीद फरोख्त की जा रही है। अक्टूबर व नवंबर माह तक यह व्यापार करने के बाद ये लोग अपने गर्मियों के ठिकानों की ओर आ जाते हैं। करीब चालीस बरस पहले वस्तु विनिमय पर आधारित यह व्यापार भारत व तिब्बत के बीच बड़े पैमाने पर होता था। बाड़ाहाट निवासी 85 वर्षीय बलदेव सिंह पंवार बताते हैं कि दोरजी यानी तिब्बती व्यापारी चौंर गाय व याक पर सामान लेकर यहां पहुंचते थे। तब वे यहां से ऊनी शालें, चावल, चाय, जौ, गुड़, तंबाकू, चाय, चीनी और तेल जैसे सामान ले जाते थे। उन्होंने बताया कि पहले व्यापार ज्यादा था, लेकिन अब भी वस्तु- विनिमय की परंपरा यहां कायम है। इसकी वजह वह बताते हैं कि वस्तु विनिमय से जहां जाड़ भोटिया समुदाय को खाद्य पदार्थ मिल जाते हैं, वहीं स्थानीय लोगों को भी ऊनी कपड़ों की जरूरत होती है। इस तरह एक दूसरे की आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं, तो फिर रुपये की अनिवार्यता नहीं रहती। तो अगर, कभी आप टकनौर पहुंचें और एक किलो लहसुन लेने का दिल करे, तो एक किलो राजमा अपने साथ ले जाना न भूलें। इनसेट- इस तोल पर होता है मोल एक सेर- एक पाव एक पाथा- दो किलो एक कुंडी- आधा पाथा सोलह पाथा- एक दोण एक मण- चालीस किलो एक दोण, दो कुंडी- एक मण फोटो-4उत्तरकाशी-2