Saturday, October 31, 2009

जड़ी-बूटी उत्पादन की बारीकियां सीख मणिपुर और केरल निकले आगे

पिथौरागढ़: उत्तराखण्ड को हर्बल स्टेट बनाने की योजना फिलहाल सपना ही बनी हुई है। राज्य गठन के नौ साल बाद भी प्रदेश में जड़ी-बूटी उत्पादन का एक मॉडल गांव तक विकसित नहीं हो सका है। सरकार जड़ी-बूटी नीति भी नहीं बना सकी है। प्रदेश से जड़ी-बूटी उत्पादन की बारीकियां सीखने वाले मणिपुर और केरल जैसे राज्य इस क्षेत्र में कहीं आगे निकल गये हैं। उत्तराखण्ड जड़ी-बूटी उत्पादन के क्षेत्र में बेहद संभावनाओं वाला राज्य है। यहां तमाम प्रकार की औषधीय और सगंध जड़ी-बूटियां पायी जाती हैं। यह अधिकांश जंगलों में पैदा होती हंै, जबकि खेतों में पैदा हो सकने वाली इनकी संख्या दो से तीन दर्जन के आस-पास है। राज्य गठन के बाद सरकारों ने हर्बल प्रदेश का नारा दिया। जड़ी-बूटी उत्पादन से राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने और रोजगार के नये अवसर पैदा करने की घोषणायें कीं, लेकिन वे राज्य गठन से पूर्व की स्थिति से आगे नहीं बढ़ सकी हैं। प्रदेश ने अपना जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान गोपेश्वर में खोला है। इसका उद्देश्य उत्तराखण्ड को हर्बल राज्य के रूप में विकसित करने, किसानों को मूल्यवान औषधीय एवं सगंध जड़ी-बूटियोंके कृषिकरण में सहयोग प्रदान करने, हर्बल पर्यटन को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित करना आदि है। जड़ी बूटी शोध संस्थान के वैज्ञानिक डा.विजय भट्ट कहते हैं संस्थान अपने उद्देश्यों को पूरा करने में जुटा हुआ है। प्रदेश के कई स्थानों पर जड़ी-बूटी का कृषिकरण किया जा रहा है। शोध संस्थान किसानों से जड़ी बूटी पौध खरीदकर दूसरे क्षेत्र के किसानों को उपलब्ध करवा रहा है, लेकिन इस दावे की हकीकत इसी बात से खुल जाती है कि आज तक प्रदेश में जड़ी-बूटी उत्पादन का एक भी मॉडल गांव प्रदेश में विकसित नहीं हो पाया है। किसानों को जड़ी-बूटी उत्पादन की तकनीक हस्तांतरण का हाल यह है कि थोड़ा बहुत उत्पादन परम्परागत तौर तरीकों से ही हो रहा है। जंगलों में होने वाली बहुमूल्य जड़ी बूटियां जंगलों तक ही सीमित हैं, आज तक खेतों में इनका कृषिकरण नहीं हो सका है। वनों से जड़ी-बूटियों के उत्पादन की प्रक्रिया रोटेशन पद्धति के आधार पर होने के कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में जड़ी-बूटियां जंगलों में ही बर्बाद हो जाती हैं। हर्बल प्रदेश के सपने को साकार करने के लिए सरकार कितनी गंभीर है इसका पता इसी बात से लग जाता है कि राज्य गठन के बाद भी प्रदेश अपनी जड़ी-बूटी नीति तैयार नहीं कर सका है। खामियां इतनी है कि आजीविका के तौर पर जड़ी बूटी उत्पादन को अपनाने की इच्छा रखने वाले किसानों के पास भूमि ही नहीं है। उत्तराखण्ड में कृषि योग्य भूमि(नाप लैण्ड)सीमित मात्रा में हैं, पर्वतीय क्षेत्रों में दो से पांच नाली भूमि रखने वाले किसान अब इस भूमि में खेती करें, सब्जी उगायें या फिर जड़ी बूटी पैदा करें। टी-बोर्ड की तर्ज पर वन पंचायतों में जड़ी बूटी उत्पादन की पहल अब तक नहीं हो पायी है। कभी जड़ी बूटी शोध में धाक थी उत्तराखण्ड की पिथौरागढ़: जड़ी बूटी शोध के क्षेत्र में कभी उत्तराखण्ड की पूरे देश में धाक थी। देश की आजादी के बाद जड़ी बूटी शोध का बढ़ावा देने के लिए उत्तराखण्ड के रानीखेत में शोध संस्थान खोला गया। इस शोध संस्थान में देश भर के जड़ी बूटी उत्पादकों को प्रशिक्षण दिया जाता था। केरल और मणिपुर के तमाम किसानों ने यहां जड़ी बूटी उत्पादन का प्रशिक्षण लिया और इन दोनों प्रदेशों के किसान आज देश में जड़ी बूटी उत्पादन के मॉडल बने हुए हैं और इन किसानों को प्रशिक्षित करने वाला यह संस्थान वर्ष 2009 में बंद हो चुका है। शोध संस्थान और भेषज इकाई की हालत दयनीय पिथौरागढ़: वर्ष 1993 में शुरू हुए जड़ी बूटी शोध संस्थान और जड़ी बूटी का विपणन करने वाली भेषज इकाई की हालत भी दयनीय है। भेषज इकाई की स्थापना वर्ष 1949 में हुई। शुरूआत में इस इकाई में 158 पद थे। वर्तमान में इस इकाई में मात्र 70 कर्मचारी तैनात हैं। इकाई में नये कर्मचारियों की तैनाती पर रोक लगी हुई है। जड़ी बूटी शोध संस्थान में कुल स्वीकृत पदों की संख्या 250 के आस-पास है, वर्तमान में संस्थान में मात्र दस प्रतिशत पदों पर ही कर्मचारी तैनात हैं। संस्थान में वैज्ञानिकों के अधिकांश पद खाली हैं, यह स्थिति शोध की हकीकत खोलने के लिए काफी है। चीन से सीख लेने की जरूरत पिथौरागढ़: उत्तराखण्ड को हर्बल प्रदेश बनाना है तो चीन से सीख लेनी होगी। मोटे अनुमान के अनुसार प्रदेश में 35 हजार जड़ी बूटियां पायी जाती है। प्रदेश में किसी विशेष प्रकार की जड़ी बूटी उत्पादन को बढ़ावा देने पर फोकस नहीं है, जबकि चीन ने कुछ ही जड़ी बूटियों के उत्पादन पर फोकस कर आज विश्व मार्केट में बड़ी पहचान बना ली है। चीन में वर्तमान में कूट का बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है और भारतीय बाजारों में पहुंच रहा है। चीन से आने वाला कूट भारत में 25 रुपये किलो बिक रहा है, जबकि उत्तराखण्ड में होने वाले कूट की कीमत 50 रुपये किलो तक है। सस्ता होने के कारण चीनी कूट अब भारतीय आयुर्वेदिक दवाओं में उपयोग होने लगा है। इससे भारत में कूट का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। चीन जड़ी बूटी उत्पादन के लिए खेती वाली भूमि की जगह वेस्ट लैण्ड का उपयोग कर रहा है। उत्तराखण्ड में पैदा होने वाली प्रमुख जड़ी-बूटी पिथौरागढ़: अतीस, कुटकी, कूट, जटामांसी, चिरायता, बनककड़ी, फरण, कालाजीरा, पाइरेथ्रम, तगर, मंजीठ, बड़ी इलाचयी, पत्थर चूर, रोजमेरी, जिरेनियम, सर्पगन्धा, कलिहारी, सतावर, लेमनग्रास, कोमोमाइल, सिलीबम, स्टीविया, पिपली, ब्रहमी, अमीमेजस, तिलपुष्पी आदि

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