Saturday, October 31, 2009

तो फलस्वाड़ी की भूमि में समाई थी माता 'सीता'

-मंडल मुख्यालय से सटे कोट ब्लाक में में हर साल आयोजित होता है मंस्यार मेला -फलस्वाड़ी की धरती से निकलता है सीता का प्रतीकात्मक दुर्लभ सफेद पत्थर पौड़ी यूं तो देवभूमि उत्तराखंड में कई धार्मिक मेले आयोजित होते हैं, लेकिन पौड़ी जनपद के कोट ब्लाक का मंस्यार मेला मां सीता के धरती में समाने की मान्यता पर आयोजित होता है। मेले की विशेषता यह है कि मेले के आयोजन में फलस्वाड़ी में प्रतीक के रूप में धरती से सीता माता का दुर्लभ सफेद पत्थर निकलता है। इसकी वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ पूजा अर्चना की जाती है। मंडल मुख्यालय से सटा कोट ब्लाक धार्मिक उत्सव के लिए ही जाना जाता है। इन्हीं उत्सवों में से एक मंस्यार मेला इस क्षेत्र को धार्मिक दृष्टिकोण से विशेष पहचान दिलाता है। कोट ब्लाक की सितनस्यूं पट्टी के कोटसाड़ा गांव में हर साल दीपावली के ठीक ग्यारह दिन बाद एकादश (इगास)के अवसर पर मंस्यार मेला आयोजित होता है। इस मेले को लेकर धार्मिक मान्यता है कि इसी कोटसाडा गांव के निकट फलस्वाड़ी गांव के खेतों में सीता माता धरती में समाई थीं। मान्यता है कि कोटसाडा में रामायण के लेखक बाल्मीकि का आश्रम था और पूर्व मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चंद्र भगवान ने सीता माता को त्याग दिया गया था। सीता इसी कोटसाड़ा स्थित बाल्मीकि के आश्रम पहुंचीं। इसी आश्रम में उन्होंने लव व कुश का पालन पोषण किया। बताते हैं कि राम चंद्र जी द्वारा अश्व मेघ के घोड़े को लव और कुश ने देवल नामक क्षेत्र में अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद इसी स्थान पर अयोध्या की सेना को लव और कुश ने पराजित किया था। इसके बाद भगवान राम सीता माता को लेने पहुंचे तो वह कोटसाड़ा के निकट फलस्वाड़ी के खेतों में धरती में समा गई। इसी मान्यता को लेकर इस क्षेत्र में वर्षों से मंस्यार का मेला आयोजित होता आ रहा है। इस मेले से ठीक एक दिन पहले क्षेत्र के देवल गांव में अनाज की दूंण-कंडी (उपहार की टोकरी) एवं निशांण (देवी-देवताओं के विशेष झांडे) बनाए जाते हैं, जबकि अगले दिन विधिवत पूजा-अर्चना के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु कोटसाड़ा पहुंचते हैं। इसके बाद यहीं से कुछ ही दूरी पर स्थित फलस्वाड़ी नामक जगह के खेतों में माता सीता का आह्वान किया जाता है। मान्यता है कि ठीक उसी रात कोटसाड़ा के किसी एक पंडित के स्वप्न में आकर सीता माता नियत जगह बताती हैं। फिर बताए गए स्थान पर चारों ओर पांच निशांण(देवी-देवताओं के झांडे ) को लेकर श्रद्धालु खड़े रहते हैं। इसके बाद इस स्थान पर खुदाई की जाती है। मान्यता है कि खुदाई के दौरान धरती से प्रतीकात्मक रूप में सीता माता दुर्लभ किस्म का सफेद पत्थर निकलता है। इसकी विधिवत पूजा की जाती है। कोटसाड़ा गांव में आज भी सीता माता मंदिर मौजूद है। इसके अलावा एक अन्य मान्यता यह भी है कि पहले इसी फलस्वाड़ी के खेतों में सीता माता के बालों के प्रतीकात्मक रूप में विशेष प्रकार की घास भी निकलती थी। प्रसिद्ध चित्रकार बी. मोहन नेगी बताते हैं कि यह मेला क्षेत्र को विशेष पहचान तो दिलाता ही है, साथ ही यहां के लोग भी इस पौराणिक महत्व की धरोहर को जीवित रखे हुए हैं।

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