Saturday, October 31, 2009

जड़ी-बूटी उत्पादन की बारीकियां सीख मणिपुर और केरल निकले आगे

पिथौरागढ़: उत्तराखण्ड को हर्बल स्टेट बनाने की योजना फिलहाल सपना ही बनी हुई है। राज्य गठन के नौ साल बाद भी प्रदेश में जड़ी-बूटी उत्पादन का एक मॉडल गांव तक विकसित नहीं हो सका है। सरकार जड़ी-बूटी नीति भी नहीं बना सकी है। प्रदेश से जड़ी-बूटी उत्पादन की बारीकियां सीखने वाले मणिपुर और केरल जैसे राज्य इस क्षेत्र में कहीं आगे निकल गये हैं। उत्तराखण्ड जड़ी-बूटी उत्पादन के क्षेत्र में बेहद संभावनाओं वाला राज्य है। यहां तमाम प्रकार की औषधीय और सगंध जड़ी-बूटियां पायी जाती हैं। यह अधिकांश जंगलों में पैदा होती हंै, जबकि खेतों में पैदा हो सकने वाली इनकी संख्या दो से तीन दर्जन के आस-पास है। राज्य गठन के बाद सरकारों ने हर्बल प्रदेश का नारा दिया। जड़ी-बूटी उत्पादन से राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने और रोजगार के नये अवसर पैदा करने की घोषणायें कीं, लेकिन वे राज्य गठन से पूर्व की स्थिति से आगे नहीं बढ़ सकी हैं। प्रदेश ने अपना जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान गोपेश्वर में खोला है। इसका उद्देश्य उत्तराखण्ड को हर्बल राज्य के रूप में विकसित करने, किसानों को मूल्यवान औषधीय एवं सगंध जड़ी-बूटियोंके कृषिकरण में सहयोग प्रदान करने, हर्बल पर्यटन को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित करना आदि है। जड़ी बूटी शोध संस्थान के वैज्ञानिक डा.विजय भट्ट कहते हैं संस्थान अपने उद्देश्यों को पूरा करने में जुटा हुआ है। प्रदेश के कई स्थानों पर जड़ी-बूटी का कृषिकरण किया जा रहा है। शोध संस्थान किसानों से जड़ी बूटी पौध खरीदकर दूसरे क्षेत्र के किसानों को उपलब्ध करवा रहा है, लेकिन इस दावे की हकीकत इसी बात से खुल जाती है कि आज तक प्रदेश में जड़ी-बूटी उत्पादन का एक भी मॉडल गांव प्रदेश में विकसित नहीं हो पाया है। किसानों को जड़ी-बूटी उत्पादन की तकनीक हस्तांतरण का हाल यह है कि थोड़ा बहुत उत्पादन परम्परागत तौर तरीकों से ही हो रहा है। जंगलों में होने वाली बहुमूल्य जड़ी बूटियां जंगलों तक ही सीमित हैं, आज तक खेतों में इनका कृषिकरण नहीं हो सका है। वनों से जड़ी-बूटियों के उत्पादन की प्रक्रिया रोटेशन पद्धति के आधार पर होने के कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में जड़ी-बूटियां जंगलों में ही बर्बाद हो जाती हैं। हर्बल प्रदेश के सपने को साकार करने के लिए सरकार कितनी गंभीर है इसका पता इसी बात से लग जाता है कि राज्य गठन के बाद भी प्रदेश अपनी जड़ी-बूटी नीति तैयार नहीं कर सका है। खामियां इतनी है कि आजीविका के तौर पर जड़ी बूटी उत्पादन को अपनाने की इच्छा रखने वाले किसानों के पास भूमि ही नहीं है। उत्तराखण्ड में कृषि योग्य भूमि(नाप लैण्ड)सीमित मात्रा में हैं, पर्वतीय क्षेत्रों में दो से पांच नाली भूमि रखने वाले किसान अब इस भूमि में खेती करें, सब्जी उगायें या फिर जड़ी बूटी पैदा करें। टी-बोर्ड की तर्ज पर वन पंचायतों में जड़ी बूटी उत्पादन की पहल अब तक नहीं हो पायी है। कभी जड़ी बूटी शोध में धाक थी उत्तराखण्ड की पिथौरागढ़: जड़ी बूटी शोध के क्षेत्र में कभी उत्तराखण्ड की पूरे देश में धाक थी। देश की आजादी के बाद जड़ी बूटी शोध का बढ़ावा देने के लिए उत्तराखण्ड के रानीखेत में शोध संस्थान खोला गया। इस शोध संस्थान में देश भर के जड़ी बूटी उत्पादकों को प्रशिक्षण दिया जाता था। केरल और मणिपुर के तमाम किसानों ने यहां जड़ी बूटी उत्पादन का प्रशिक्षण लिया और इन दोनों प्रदेशों के किसान आज देश में जड़ी बूटी उत्पादन के मॉडल बने हुए हैं और इन किसानों को प्रशिक्षित करने वाला यह संस्थान वर्ष 2009 में बंद हो चुका है। शोध संस्थान और भेषज इकाई की हालत दयनीय पिथौरागढ़: वर्ष 1993 में शुरू हुए जड़ी बूटी शोध संस्थान और जड़ी बूटी का विपणन करने वाली भेषज इकाई की हालत भी दयनीय है। भेषज इकाई की स्थापना वर्ष 1949 में हुई। शुरूआत में इस इकाई में 158 पद थे। वर्तमान में इस इकाई में मात्र 70 कर्मचारी तैनात हैं। इकाई में नये कर्मचारियों की तैनाती पर रोक लगी हुई है। जड़ी बूटी शोध संस्थान में कुल स्वीकृत पदों की संख्या 250 के आस-पास है, वर्तमान में संस्थान में मात्र दस प्रतिशत पदों पर ही कर्मचारी तैनात हैं। संस्थान में वैज्ञानिकों के अधिकांश पद खाली हैं, यह स्थिति शोध की हकीकत खोलने के लिए काफी है। चीन से सीख लेने की जरूरत पिथौरागढ़: उत्तराखण्ड को हर्बल प्रदेश बनाना है तो चीन से सीख लेनी होगी। मोटे अनुमान के अनुसार प्रदेश में 35 हजार जड़ी बूटियां पायी जाती है। प्रदेश में किसी विशेष प्रकार की जड़ी बूटी उत्पादन को बढ़ावा देने पर फोकस नहीं है, जबकि चीन ने कुछ ही जड़ी बूटियों के उत्पादन पर फोकस कर आज विश्व मार्केट में बड़ी पहचान बना ली है। चीन में वर्तमान में कूट का बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है और भारतीय बाजारों में पहुंच रहा है। चीन से आने वाला कूट भारत में 25 रुपये किलो बिक रहा है, जबकि उत्तराखण्ड में होने वाले कूट की कीमत 50 रुपये किलो तक है। सस्ता होने के कारण चीनी कूट अब भारतीय आयुर्वेदिक दवाओं में उपयोग होने लगा है। इससे भारत में कूट का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। चीन जड़ी बूटी उत्पादन के लिए खेती वाली भूमि की जगह वेस्ट लैण्ड का उपयोग कर रहा है। उत्तराखण्ड में पैदा होने वाली प्रमुख जड़ी-बूटी पिथौरागढ़: अतीस, कुटकी, कूट, जटामांसी, चिरायता, बनककड़ी, फरण, कालाजीरा, पाइरेथ्रम, तगर, मंजीठ, बड़ी इलाचयी, पत्थर चूर, रोजमेरी, जिरेनियम, सर्पगन्धा, कलिहारी, सतावर, लेमनग्रास, कोमोमाइल, सिलीबम, स्टीविया, पिपली, ब्रहमी, अमीमेजस, तिलपुष्पी आदि

पृथक राज्य बना, पर नहीं थमा पलायन

-रोजगार और जनसुविधाओं का अभाव बरकरार -1991 से 2001 के बीच राज्य के 58 गांव जनशून्य -कृषि क्षेत्र में 35 हजार से अधिक की जोत हुई कम : पर्वतीय क्षेत्र से युवाओं का पलायन थमता नजर नहीं आ रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण रोजगार का अभाव रहा है, जो पृथक राज्य बनने के बाद भी दूर नहीं हो सका है। रोजगार के साधन विकसित न होने तथा जनसुविधाओं के अभाव में पलायन की गति पूर्ववत् बनी हुई है। रोजगार के लिए युवाओं के पलायन से पिछले दो दशकों में कृषि क्षेत्र की पैंतीस हजार से अधिक की जोत (नाली) कम हो चुकी है। गैर आबाद गांवों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। उत्तराखंड के पर्वतीय राज्य होने के कारण यहां रोजगार के सीमित साधन रहे हैं। यहां के युवकों को रोजगार के लिए पहाड़ों से मैदानी क्षेत्र में जाना पड़ता है। इसके चलते पलायन पहाड़ की सबसे बड़ी समस्या रही है। इसी समस्या को ध्यान में रखकर पृथक राज्य की मांग उठी थी। इसके अनुरूप अलग पर्वतीय राज्य तो बन गया, लेकिन पलायन की गति नहीं थमी। पिछले दो दशक में ही लाखों लोग पहाड़ से नीचे जा चुके हैं। अर्थ एवं संख्या विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2001 से पूर्व पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन करने वालों की संख्या 30,71,174 थी। जिसमें पुरुषों की संख्या 10,10,383 तथा महिलाओं की संख्या 20,60,981 है। इनमें से रोजगार के लिए 4 लाख 21 हजार 423 लोगों ने पलायन की राह पकड़ी। रोजगार के लिए पहड़ से उतरने वालों में पुरुष ज्यादा थे। पुरुषों की संख्या 382,988 और महिलाओं की संख्या 38,437 थी। जबकि व्यापार के लिये मात्र 13,383 लोगों ने ही पलायन किया था। इसमें 11,284 पुरुष और 2,099 महिलाएं शामिल थीं। शिक्षा के लिये 50,882 लोग यहां से बाहर गये। जिसमें 36,870 पुरुष और 14,012 महिलाएं शामिल थीं। जन्म के बाद पलायन करने वालों की संख्या भी 23189 रही, जिसमें 13725 पुरुष और 9484 महिलाएं रहीं। पूरे परिवार के साथ पलायन करने वालों की संख्या 658508 है, जिसमें 271356 पुरुष और 387152 महिलाएं शामिल हैं। विवाह होने के कारण क्षेत्र छोडऩे वालों की संख्या 1369658 है, जिसमें 7987 पुरुष 1361711 महिलाएं शामिल हैं। अन्य कारणों से पलायन करने वालों की संख्या 534291 है, जिसमें पुरुष 288175 और महिलाएं 248118 रही है। कमोवेश यही स्थिति राज्य बनने के बाद भी बरकरार है। राज्य से पलायन की गति तीव्र रहने के कारण वर्ष 1991 से लेकर वर्ष 2001 के बीच 58 गांव जनशून्य हो गये थे। गैर आबाद हुए गांवों में उत्तरकाशी के अड़ासू, विंगघेरा तल्ला, चमोली के चमोली, सेजीलगामैकोट, सेमलगा सरतोली, बोलासेरा, कड़ाकोट, सूदा और कुणदेवगढ़ हैं। टिहरी गढ़वाल के नौलीचक, अदगलचक, बनोली, मेगवालगांव तल्ला, सिलौली सेरा, मोरखाली चक, खासखुदौलगा, गजनामाधे और जलेधी हैं। पौड़ी के सजगांव, धामरतल्ला, रतूडा, किमगड़ी, पंथ, भनदारू, जुबीवल्ली, रत्नागुली, अल्मोड़ी, गतौला, उजणां, चैनकियालगांव, निंदखोलू, गणकोट, भंदरसेरा, कुंद, दंगीजामीन, पाथेलसार हैं। रुद्रप्रयाग के सरनातोक व गढख़ून बाघतंथी, पिथौरागढ़ के खिमलिंग, नानेत, दुधरियालगाजखा, किरौली, कपतर, हटलगा पंथखेती, हटवाल बोमेल, अल्मोड़ा के रूमा, नरोला बगढ़, बिनसर, बिनसरमाधेमिस, गैजोले, बजैनियामाफी, मुराद, धूरालमतना, जाख हैं। बागेश्वर के तल्ला सरना और चम्पावत के चमोला गांव भी जनशून्य हो गये हैं। राज्य बनने के बाद भी स्थिति यथावत रहने से गैर आबाद गांवों की संख्या बढ़ती जा रही है। वर्ष 2011 की गणना के बाद ही वास्तविकता का पता चल सकेगा।

तो फलस्वाड़ी की भूमि में समाई थी माता 'सीता'

-मंडल मुख्यालय से सटे कोट ब्लाक में में हर साल आयोजित होता है मंस्यार मेला -फलस्वाड़ी की धरती से निकलता है सीता का प्रतीकात्मक दुर्लभ सफेद पत्थर पौड़ी यूं तो देवभूमि उत्तराखंड में कई धार्मिक मेले आयोजित होते हैं, लेकिन पौड़ी जनपद के कोट ब्लाक का मंस्यार मेला मां सीता के धरती में समाने की मान्यता पर आयोजित होता है। मेले की विशेषता यह है कि मेले के आयोजन में फलस्वाड़ी में प्रतीक के रूप में धरती से सीता माता का दुर्लभ सफेद पत्थर निकलता है। इसकी वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ पूजा अर्चना की जाती है। मंडल मुख्यालय से सटा कोट ब्लाक धार्मिक उत्सव के लिए ही जाना जाता है। इन्हीं उत्सवों में से एक मंस्यार मेला इस क्षेत्र को धार्मिक दृष्टिकोण से विशेष पहचान दिलाता है। कोट ब्लाक की सितनस्यूं पट्टी के कोटसाड़ा गांव में हर साल दीपावली के ठीक ग्यारह दिन बाद एकादश (इगास)के अवसर पर मंस्यार मेला आयोजित होता है। इस मेले को लेकर धार्मिक मान्यता है कि इसी कोटसाडा गांव के निकट फलस्वाड़ी गांव के खेतों में सीता माता धरती में समाई थीं। मान्यता है कि कोटसाडा में रामायण के लेखक बाल्मीकि का आश्रम था और पूर्व मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चंद्र भगवान ने सीता माता को त्याग दिया गया था। सीता इसी कोटसाड़ा स्थित बाल्मीकि के आश्रम पहुंचीं। इसी आश्रम में उन्होंने लव व कुश का पालन पोषण किया। बताते हैं कि राम चंद्र जी द्वारा अश्व मेघ के घोड़े को लव और कुश ने देवल नामक क्षेत्र में अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद इसी स्थान पर अयोध्या की सेना को लव और कुश ने पराजित किया था। इसके बाद भगवान राम सीता माता को लेने पहुंचे तो वह कोटसाड़ा के निकट फलस्वाड़ी के खेतों में धरती में समा गई। इसी मान्यता को लेकर इस क्षेत्र में वर्षों से मंस्यार का मेला आयोजित होता आ रहा है। इस मेले से ठीक एक दिन पहले क्षेत्र के देवल गांव में अनाज की दूंण-कंडी (उपहार की टोकरी) एवं निशांण (देवी-देवताओं के विशेष झांडे) बनाए जाते हैं, जबकि अगले दिन विधिवत पूजा-अर्चना के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु कोटसाड़ा पहुंचते हैं। इसके बाद यहीं से कुछ ही दूरी पर स्थित फलस्वाड़ी नामक जगह के खेतों में माता सीता का आह्वान किया जाता है। मान्यता है कि ठीक उसी रात कोटसाड़ा के किसी एक पंडित के स्वप्न में आकर सीता माता नियत जगह बताती हैं। फिर बताए गए स्थान पर चारों ओर पांच निशांण(देवी-देवताओं के झांडे ) को लेकर श्रद्धालु खड़े रहते हैं। इसके बाद इस स्थान पर खुदाई की जाती है। मान्यता है कि खुदाई के दौरान धरती से प्रतीकात्मक रूप में सीता माता दुर्लभ किस्म का सफेद पत्थर निकलता है। इसकी विधिवत पूजा की जाती है। कोटसाड़ा गांव में आज भी सीता माता मंदिर मौजूद है। इसके अलावा एक अन्य मान्यता यह भी है कि पहले इसी फलस्वाड़ी के खेतों में सीता माता के बालों के प्रतीकात्मक रूप में विशेष प्रकार की घास भी निकलती थी। प्रसिद्ध चित्रकार बी. मोहन नेगी बताते हैं कि यह मेला क्षेत्र को विशेष पहचान तो दिलाता ही है, साथ ही यहां के लोग भी इस पौराणिक महत्व की धरोहर को जीवित रखे हुए हैं।

उत्तराखंड की प्रो.आशा पांडे को 'लिजन दि ऑनर'

-फ्रांसिसी सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मान है 'लिजन दि ऑनर' -भारत-फ्रांस रिश्तों को प्रगाढ़ करने व फ्रैंच भाषा के प्रसार के लिए होंगी सम्मनित -उत्तराखंड के अल्मोड़ा के पाटिया गांव की मूल निवासी हैं डॉ. पांडे देहरादून, जागरण संवाददाता: उत्तराखंड की प्रो. आशा पांडे को फ्रांस सरकार ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'लिजन दि ऑनर' से सम्मानित करने का फैसला किया है। प्रो. पांडे को यह सम्मान भारत-फ्रांस रिश्तों को प्रगाढ़ करने तथा राजस्थान में फ्रैंच भाषा के प्रसार के लिए प्रदान किया जाएगा। फ्रांस सरकार इससे पहले इस सम्मान से भारतीय फिल्म निर्देशक सत्यजित रे, सितार वादक पंडित रविशंकर, अभिनेता अमिताभ बच्चन और पर्यावरणविद आरके पचौरी जैसे लोगों को भी नवाज चुकी है। मूल रूप से कुमाऊं के अल्मोड़ा जनपद के पाटिया गांव की निवासी प्रो. आशा पांडे का जन्म देहरादून के क्लेमनटाउन में हुआ। प्रो. पांडे वर्तमान में राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर में ड्रामाटिक्स विभाग की अध्यक्ष व यूरोपियन स्टडीज विभाग में प्रोफेसर हैं। प्रो. पांडे के पति अशोक पांडे 1973 बैच के आईएएस अफसर है तथा इन दिनों राजस्थान के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। प्रो.आशा पांडे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में फ्रैंच भाषा के पहले बैच की पोस्ट ग्रेजुएट हैं। उन्होंने जेएनयू से ही पीएचडी की उपाधि भी प्राप्त की है। प्रो. आशा पांडे 1977 में विवाह के बाद से ही राजस्थान में रह रहीं हैं। उस वक्त उनके पति अशोक पांडे, टोंक जनपद के डीएम थे। 1982 में डॉ.पांडे ने इंडो-फ्रैैंच कल्चरल सोसायटी का गठन किया और फ्रैैंच भाषा को पढ़ाना शुरू कर दिया। बाद में फ्रैंच भाषा में डिप्लोमा व सर्टिफिकेट कोर्स भी शुरू किए गए। डा. पांडे के प्रयास से आज राजस्थान में सैकड़ों संस्थान फ्रांसीसी भाषा के पाठ्यक्रम चला रहे हैं। सर्वोच्च फ्रांसीसी सम्मान पाने से प्रसन्न डा.आशा पांडे ने बताया कि उन्हें इस बात की खुशी है कि उन्हें वह सम्मान दिया जा रहा है जो इसके पहले भारत के अति विशिष्ट लोगों को प्रदान किया गया है। उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले फ्रांसीसी दूतावास के अधिकारी उनका बायोडाटा ले गए थे, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उन्हें 'लिजन दि ऑनर' दिया जाने वाला है। डॉ. आशा पांडे ने बताया कि उनके पिता रेवती बल्लभ पांडे देहरादून के क्लेमनटाउन में भारतीय सेना की नेशनल डिफेंस अकादमी में थे। जब यह अकादमी पुणे खडग़वासला स्थानांतरित हो गई तो उनका परिवार भी खडग़वासला चला गया। डॉ. आशा पांडे की प्राथमिक शिक्षा वहीं के केंद्रीय विद्यालय में हुई। उनके भाई रिटायर्ड विंग कमांडर पीसी पांडे अब भी उत्तराखंड के अल्मोड़ा के पांडेखोला में रहते हैं। --

औली के स्लोप को वल्र्ड क्लास का दर्जा

विंटर सैफ गेम्स के लिहाज से बड़ी उपलब्धि भारतीय ओलंपिक संघ की बैठक 27 को --विंटर सैफ गेम्स की मेजबानी कर रहे सूबे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और उपलब्धि हासिल हुई है। गेम्स के लिए औली (चमोली जिले) में बनाए गए स्लोप को फेडरेशन आफ आइस स्कीइंग (एफआईएस) ने वल्र्ड क्लास स्लोप का सर्टिफिकेट दिया है। इधर, 27 अक्टूबर को भारतीय ओलंपिक संघ की बैठक में विंटर सैफ गेम्स की तारीख सुनिश्चित होने की उम्मीद है। अपर सचिव (खेल) एनके झाा ने बताया कि गेम्स की मेजबानी से खेलों की दुनिया में उत्तराखंड की एक पहचान बनेगी। औली में बने स्लोप को एफआईएस एक्सपर्ट वाल्टर टे्रलिंग ने वल्र्ड क्लास स्लोप का प्रमाणपत्र दिया है। यह राज्य ही नहीं, देश के लिए भी गर्व की बात है। इधर, सोमवार को दिल्ली में आईओए (भारतीय ओलंपिक संघ) की दिल्ली में प्रस्तावित बैठक में विंटर सैफ गेम्स की तारीख तय होने की उम्मीद है। बैठक में आईओए महासचिव रणधीर सिंह, खेल सचिव उत्पल कुमार,अपर खेल सचिव एनके झाा, राज्य ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव मेहता और सैफ गेम्स आयोजन समिति के पदाधिकारी भाग लेंगे। इस दौरान गेम्स में किस देश की टीम भाग लेगी और कौन से इवेंट होने हैं इस पर भी अंतिम निर्णय लिया जाएगा। बैठक में 2010 में उत्तराखंड में प्रस्तावित क्लब गेम्स की तैयारियों पर भी चर्चा की उम्मीद है। हालांकि सरकार ने आईओए को भरोसा दिलाया है कि 30 नवंबर तक सभी तैयारियां पूर्ण कर ली जाएंगी। --

उडऩखटोलों को नहीं लग पा रहे पंख

उत्तराखंड की मनोरम वादियों में उडऩखटोले की सवारी अभी दूर की कौड़ी पहाड़ी राज्य में 12 रोप वे प्रोजेक्टों का कछुआ गति से चल रहा काम कुछ प्रोजेक्टों की डीपीआर तैयार नहीं, तो कुछ भू-अधिग्रहण के फेर में लटके पहाड़ी राज्य उत्तराखंड को पर्यटन प्रदेश बनाने की राज्य सरकार की मंशा समय रहते परवान नहीं चढ़ पा रही है। कारण कि पर्यटन प्रदेश का सपना सच करने के लिए कागजों पर तो कई योजनाएं तैयार हैं, मगर उन्हें धरातल पर उतारने की कसरत बेहद ही सुस्त है। राज्य के विभिन्न जनपदों में स्वीकृत 12 रोप वे परियोजनाओं का भी कुछ यही हाल है। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड में बनने वाली इन अधिकतर परियोजनाओं का निर्माण कार्य 3-4 वर्ष बीतने के बाद भी शुरू नहीं हो पाया है। नैसर्गिक सौंदर्य व गंगा-यमुना जैसी मनोरम नदी घाटियों वाले इस प्रदेश में पर्यटन व्यवसाय को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2005-06 व 2006-07 में 12 बड़े रोपवे प्रोजेक्टों के निर्माण को मंजूरी दी थी। करीब 1200 करोड़ रुपये की लागत की इन परियोजनाओं का निर्माण पीपीपी मोड में किया जाना है, जो पर्यटन के मुख्य आकर्षण के अलावा राजस्व जुटाने का भी जरिया बनेंगी। इसके लिए यूआईपीसी व यूडेक को कंसल्टेंट बनाया गया है, लेकिन कार्यादेश के तीन-चार वर्ष गुजरने के बाद भी ज्यादातर प्रोजेक्टों का निर्माण कार्य भी प्रारंभ नहीं हो सका है। किसी प्रोजेक्ट की अभी तक डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तक नहीं बन पाई तो कोई भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के कारण अधर में है। उत्तरकाशी जिले में स्वीकृत 3.83 किमी लंबे जानकीचट्टी-यमुनोत्री रोपवे प्रोजेक्ट की डीपीआर बनाने व भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है। इनमें से सबसे बड़े व 800 करोड़ की लागत वाले देहरादून-मसूरी रोपवे प्रोजेक्ट (10 किमी) के लिए भी भूमि-अधिग्रहण की कार्रवाई जारी है। श्रीनगर-पौड़ी रोपवे (40 करोड़) का सर्वे पूरा नहीं हो सका है तो रानीखेत-चौबटिया रोपवे की डीपीआर भी तैयार नहीं है। विशेषज्ञ मानते हैं कि प्राजेक्टों के निर्माण में हो रही यह लेटलतीफी उनकी लागत में वृद्धि का कारण बन सकती हैं। यदि ऐसा हुआ तो परियोजनाओं के अधर में लटकने से पर्यटन विकास की उम्मीदों को करारा झाटका लगेगा। हालांकि उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद के अधिकारियों का कहना है कि भू-अधिग्रहण की लंबी प्रक्रिया के कारण कुछ विलंब हो रहा है, लेकिन प्रोजेक्टों की भौतिक प्रगति की निरंतर समीक्षा के बाद अब काम तेज करने के निर्देश जारी किए गए हैं। प्रदेश में स्वीकृत 12 बड़े रोपवे-प्रोजेक्ट रोपवे-प्रोजेक्ट-लागत जानकीचट्टी-यमुनोत्री-30 करोड़ देहरादून-मसूरी-800 करोड़ श्रीनगर-पौड़ी-40 करोड़ रानीखेत-चौबटिया-75 करोड़ . मुनस्यारी-खालियाटाप- --- ठुलीगाड-पूर्णागिरी-17 करोड़ सुरकंडा देवी-3.35 करोड़ रामबाड़ा-केदारनाथ-70 करोड़ ऋषिकेश-नीलकंठ-33 करोड़ मुनिकीरेती-कुंजापुरी-49 करोड़ स्नोब्यू-चिडिय़ाघर, नैनीताल-20 करोड़ कसारदेवी-अल्मोड़ा-1.70 करोड़

-उत्तराखंड के देवदार वृक्षों की एशिया में बादशाहत

-टौंस वन प्रभाग में 8.25 मीटर मोटा देवदार एशिया में अव्वल -6.35 मीटर मोटाई के कारण चकराता वन प्रभाग का देवदार एशिया में दूसरे नंबर पर विकासनगर (देहरादून) अगर आप एशिया का सबसे मोटा देवदार वृक्ष देखने की इच्छा रखते हैं, तो टौंस वन प्रभाग के कोठिगाड़ रेंज में आइए। एशिया में मोटाई में दूसरे नंबर का देवदार वृक्ष भी चकराता वन प्रभाग की कनासर रेंज में ही है। इसके कारण उत्तराखंड को भारत में एक गौरव हासिल हुआ है। एशिया में चीड़ एवं देवदार प्रजाति के वृक्षों में उत्तराखंड के जंगलों का दबदबा रहा है। एशिया का सबसे मोटा देवदार वृक्ष जनपद उत्तरकाशी के टौंस वन प्रभाग अंतर्गत कोठिगाड़ रेंज के बालचा वन खंड में स्थित है। यह वन क्षेत्र जनपद देहरादून की सीमांत तहसील त्यूणी से सटा हुआ है। देवदार के इस महावृक्ष की मोटाई (गोलाई) 8.25 मीटर और ऊंचाई 48 मीटर है। इस वृक्ष की आयु 400 साल से अधिक बताई जाती है। वर्ष 1994 में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा इसे महावृक्ष के रूप में पुरस्कृत किया गया था। भारतीय वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के म्यूजियम में देवदार वृक्ष की जो सबसे अधिक गोलाई की अनुप्रस्थ काट प्रदर्शित की गई है, वह वृत भी इसी खंड में स्थित थी, जिसके अवशेष अभी भी मौजूद हैं। देहरादून जिले के चकराता वन प्रभाग अंतर्गत कनासर रेंज में स्थित देवदार का एक और वृक्ष महावृक्ष बनने की होड़ में अपना आकार फैलाए जा रहा है। चकराता-त्यूणी मोटर मार्ग पर कोटी-कनासर वन खंड में स्थित इस देवदार वृक्ष की मोटाई (गोलाई) 6.35 मीटर है। इस वृक्ष की अनुमानित आयु 600 साल से अधिक बताई जाती है। देवदार एवं चीड़ प्रजाति के वृक्षों की चाहे ऊंचाई की बात रही हो या मोटाई की, महावृक्ष का खिताब पाने में पूरे एशिया में उत्तराखंड के जंगलों का ही दबदबा रहा है। एशिया के सबसे ऊंचे चीड़ महावृक्ष में भी उत्तराखंड राज्य के टौंस वन प्रभाग ने अपनी पहचान बनाई। 8 मई 2008 को क्षेत्र में आए भीषण आंधी-तूफान से यह महावृक्ष धराशायी हो गया था। मोटे वृक्ष की रोचक है कहानी एशिया के सबसे मोटे वृक्ष की कहानी रोचक है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कनासर रेंज के ठेकेदार ने मोटे देवदार के वृक्षों को काटने में हाथ खड़े कर दिए थे। बताया जाता है कि तब विभाग ने डायनामाइट की व्यवस्था कराई थी। पुराने वृक्ष कटने से पहले ही सरकार चेत गई और उसने वनों का विनाश रोकने के उद्देश्य से अनेक कारगर कदम उठाए। उस समय कनासर में मात्र 36 पेड़ ही बचे रह गए। उन्हीं में से एक वृक्ष आठ मीटर से ज्यादा मोटाई वाला है, जिसकी सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक पूरी तरह से मुस्तैद हैं। ----------------- ''वन विभाग द्वारा देवदार व चीड़ के वृक्षों के संरक्षण के लिए समय-समय पर आवश्यक कदम उठाए जाते रहे हैं। ये वृक्ष प्रदेश ही नहीं, बल्कि एशिया की भी धरोहर हैं। इन वृक्षों को देखने के लिए हर वर्ष देश-विदेश से काफी संख्या में सैलानी उत्तराखंड आते हैं।'' बीपी गुप्ता वन संरक्षक यमुना वृत्त

मौत से जन्मी एक लाइफलाइन

जज्बे को सलाम: छह युवाओं ने अपनी दम पर तैयार की सूबे की पहली रक्तदान संबंधी वेबसाइट सूबे के सभी ब्लड बैंकों को जोडऩे की योजना देहरादून सूबे के युवा रक्तदान कार्यक्रम को मुकाम पर पहुंचाने को तैयार हैं। बस इंतजार है तो सरकार से थोड़ी सी मदद का। मंजिल मिली तो सूबे में न तो कभी रक्तदाताओं की कमी होगी और न ही रक्त मिलने में देरी किसी मरीज की असमय मौत। जी हां, हम बात कर रहे हैं सूबे के छह होनहार युवाओं की टीम द्वारा तैयार रक्तदान संबंधी पहली वेबसाइट बीएलओओडी 24&7डाट इन की। इस पर क्लिक करते ही रक्तदाताओं की लंबी फेहरिस्त तो आपके सामने होगी ही नजदीक के ब्लड बैंक का लोकेशन भी फौरन पता चल जाएगा। ऐसे में किसी जरूरतमंद को ब्लड बैंक तक जल्द पहुंचाया जा सकेगा ताकि समय रहते मरीज की जान बचाई जा सके। रक्तदान संबंधी सूबे की इस पहली वेबसाइट को अंतिम रूप दिया जा रहा है। संभावना है नवंबर में इसे लांच कर दिया जाएगा। टीम के एक सदस्य श्रीशचंद जोशी के मुताबिक दो माह पूर्व एक सड़क हादसे में घायल तीन लोगों की मौत की खबर के बाद इस दिशा में में काम करने का बीड़ा उठाया। टीम के चार सदस्य पेशे से इंजीनियर और आईटी से जुड़े हुए है। ऐसे में वेबसाइट तैयार करने में ज्यादा दिक्कत भी नहीं आई। टीम ने रिसर्च में भी पाया कि सूबे में अब तक हुए सड़क हादसों में ज्यादातर लोगों की मौत रक्त की कमी और सही समय से ब्लड बैंक तक नहीं पहुंचने से हुई है। श्री जोशी के अनुसार सूबे के सभी मान्यताप्राप्त 22 ब्लड बैंक को वेबसाइट से जोडऩे की योजना है। इस सिलसिले में टीम स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों से भी मिल चुकी है। टीम के हौंसले का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रोजेक्ट को तैयार करने में हुए अब तक के खर्च का तो वहन उन्होंने किया ही है वे आगे भी इसके लिए तैयार हैं। इस टीम में श्रीशचंद जोशी, अमित कुलश्रेेष्ठ, कपिल अग्रवाल, कमलेश चंद्र पांडेेय, हिमांशु नौटियाल और अतुल तिवारी शामिल हैैं। -- सूबे की स्वैच्छिक रक्तदान सलाहकार विनीता श्रीवास्तव ने बताया कि जब तक सभी ब्लड बैंक कंप्यूटरीकृत होकर सीधे वेबसाइट से सीधे नहीं जुड़ जाते, तब तक रक्त संबंधी आंकड़े विभाग के माध्यम से टीम को उपलब्ध कराए जाएंगें। वेबसाइट बीएलओओडी 24&7डाटइन पर क्लिक करते ही कंप्यूटर स्क्रीन पर ब्लड बैंकों की सूची और उक्त बैंक में खून की उपलब्धता का पता चल जाएगा। यदि किसी को रक्तदान करना है तो उसे वेबसाइट के जरिए नजदीक के ब्लड बैंक से संपर्क की सलाह दी जाएगी।

=दून में जुटेंगे हिमालयी राज्यों के सीएम

हिमालयन नीति पर एकराय बनाने की कवायद में डा. निशंक देहरादून,मुख्यमंत्री डा.रमेश पोखरियाल निशंक हिमालयन नीति समेत अन्य मसलों पर एकराय बनाने की कवायद में जुटे हैैं। उनकी कोशिश है कि सभी हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ ही इस मुहिम को आगे बढ़ाया जाए। इसके लिए मुख्यमंत्रियों को देहरादून में एकत्र करने की दिशा में काम चल रहा है। मुख्यमंत्री डा. निशंक ने दिल्ली में प्रधानमंत्री समेत अन्य मंत्रियों के सामने हिमालयन नीति की पुरजोर वकालत की है। कहा जा रहा है कि हिमालयी राज्य देश ही नहीं पूरे विश्व के लिए जल एवं पर्यावरण संरक्षण का काम कर रहे हैैं। इन राज्यों में रहने वाले लोग जल, जंगल और जमीन के साथ ही अन्य संपदाओं को उपयोग न के बराबर करते हैैं। जंगलों की वजह से यहां तमाम जरूरी विकास कार्य अधर में हैैं। परियोजनाओं की लागत अन्य मैदानी राज्यों की तुलना में खासी ज्यादा रहती है। इसके बाद भी इन राज्यों के लिए आर्थिक मदद के मानक अन्य राज्यों के समान हैैं। इससे इन हिमालयी राज्यों का विकास तेजी से नहीं हो पा रहा है। मुख्यमंत्री डा. निशंक ने केंद्र सरकार से मांग की है कि इन हिमालयी राज्यों को केंद्रीय मदद के मानक अन्य राज्यों के समान सूबे की जनसंख्या या फिर राज्य में सांसदों की संख्या से न तय किए जाए। इन राज्यों के लिए एक अलग हिमालयन नीति तैयार की जाए। इसमें देखा जाए कि किस राज्य का देश के लिए क्या योगदान है। इसी मानक के आधार पर इन हिमालयी राज्यों की मदद की जाए। सूत्रों ने बताया कि मुख्यमंत्री डा. निशंक इस मामले में सभी हिमालयी राज्यों को एकजुट करने की कोशिश में हैैं। पिछले दिनों शिमला में एक बैठक में शामिल होने गए डा. निशंक ने इस मुद्दे पर हिमाचल के मुख्यमंत्री से गुफ्तगू भी की है। अब कोशिश जा रही है कि हिमालयी राज्यों मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश के साथ ही जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्रियों का एक सम्मेलन देहरादून में आयोजित किया जाए। इसमें मंथन के बाद हिमालयन नीति का एक मसौदा तैयार करके केंद्र सरकार को दिया जाए। सूत्रों का कहना है कि अगर सभी राज्य एकजुट होकर हिमालयन नीति की बात करेंगे तो केंद्र सरकार भी इसकी अहमियत आसानी से समझा सकेगी। सरकार के स्तर से हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से संपर्क तेज कर दिया गया है।

कपाट बंद तो नहीं होती खेती

-बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने- बंद होने पर निर्भर हैं दर्जनों गांवों के लोग -शीतकाल में बदरीनाथ के आसपास नहीं हो पाती है खेती -यात्रा के चार- पांच माह में ही करनी पड़ती है साल भर की व्यवस्था गोपेश्वर यूं तो भगवान बदरीनाथ करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र हैं और इन्हीं के भरोसे श्रद्धालु अपनी जीवन नैया पार लगाने में जुटे रहते हैं, लेकिन बदरीनाथ धाम के समीपवर्ती दर्जनों गांव ऐसे हैं, जिनकी आजीविका ही भगवान के नाम पर चलती है। धाम के कपाट खुलने के साथ ही इन गांवों के सैकड़ों लोगों के लिए रोजी- रोटी के जुगाड़ का रास्ता भी खुल जाता है। दरअसल, शीतकाल में बदरीनाथ व आसपास का इलाका बर्फ की चादर में ढक जाता है। ऐसे में, इन लोगों के खेती कार्य ठप हो जाते हैं, इसलिए चार- पांच महीने के यात्राकाल के दौरान ही ये लोग अपने लिए सालभर के अनाज की व्यवस्था कर लेते हैं। बदरीनाथ धाम व इसके आसपास के क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों की कृषि व अन्य व्यवसायों के बीच प्राचीन काल से ही अनोखा तालमेल है। धाम के कपाट खुलने व बंद होने पर ग्रामीणों की खेतीबाड़ी व रोजमर्रा का जीवन भी इस पर पूरी तरह से निर्भर करता है। दरअसल, बदरीनाथ मंदिर के कपाट बंद होने के साथ ही शीतकाल भी शुरू हो जाता है और इस दौरान पांच-छह माह तक धाम व इसके आसपास का इलाका बेहद सर्द रहता है। इसके चलते यहां कृषि कार्य करना संभव नहीं होता। यही वजह है कि इलाके के लोग कपाट बंद होते ही यहां से अपने अस्थायी निवासों का रुख कर लेते हैं। मंदिर से लगे बामणी गांव के लोग पांडुकेश्वर, देश के अंतिम गांव माणा के लोग घिंघराण, छिनका, नैगवाड़, नरौं, सैटुणा, मंदिर से जुड़े डिमरी पंचायत के लोग कपाट बंद होने पर रविग्राम, पाखी व डिम्मर कर्णप्रयाग और देवप्रयाग पंडा समाज के लोग देवप्रयाग व अन्य जगहों पर आ जाते हैं। इसके अलावा धाम में होटल, लाज व अन्य व्यवसाय से जुड़े लोग भी कपाट बंद होने पर वापस अपने स्थानों को लौट जाते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि धाम के प्रमुख गांव बामणी व अंतिम गांव माणा के लोगों के दो स्थानों पर घर व खेती का काम छह-छह माह के लिए चलता है। ग्रीष्मकाल में कपाट खुलने के साथ ही ग्रामीण धाम की ओर चले जाते हैं और वहां गांव में आलू, राजमा आदि नगदी फसलों की खेती करते हैं। साथ ही धाम क्षेत्र में कई ग्र्रामीण व्यवसाय भी करते हैैं। कपाट बंद होने से पहले वे खेतों में विभिन्न फसलों के बीज बो देते हैं और अगली गर्मियों में वापस लौटने पर इनकी बुआई, निराई- गुड़ाई आदि की जाती है। दरअसल, शीतकाल में बदरीनाथ क्षेत्र में सर्दी इस कदर बढ़ जाती है कि वहां इस समय बीज अंकुरित नहीं हो पाते। माणा के पूर्व प्रधान पीताबंर मोलफा ने बताया कि कपाट बंद होने से पूर्व ग्रामीण कृषि का अधिकांश काम पूरा कर लेते हैं। उन्होंने बताया कि माणा में पैदा होने वाली नगदी फसलों के जरिए ही ग्रामीणों को सालभर के लिए रोजी- रोटी का जुगाड़ करना पड़ता है। बामणी के बलदेव मेहता ने बताया कि अब अधिकांश ग्रामीण खेती को छोड़ रहे हैं, क्योंकि इससे अधिक लाभ नहीं हो पाता। इसके स्थान पर अब उन्होंने धाम में लाज व होटल व्यवसाय शुरू कर दिया है। इससे पर्यटक सीजन में अच्छी- खासी कमाई हो जाती है।

केआरसी में तीन नवम्बर से होगी भर्ती रैली

सैनिक परिवारों के युवक होंगे शामिल रानीखेत: कुमाऊं रेजीमेंट सेंटर रानीखेत में सैनिक परिवारों के युवकों के लिए 3 नवम्बर से भर्ती रैली आयोजित होगी। जीडी सोल्जर व टे्रडमैन के लिए होने वाली यह भर्ती रेजीमेंट के सोमनाथ प्रशिक्षण प्रांगण में होगी। केआरसी के जीएसओ-प्रथम (ट्रेनिंग) लेफ्टिनेंट कर्नल राजू मल्लिक भर्ती रैली कार्यक्रम की जानकारी देते हुए बताया है कि तीन नवम्बर को उत्तराखण्ड व उत्तर प्रदेश के कुुमाऊंनी युवकों, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, गुडग़ांव, फरीदाबाद, राजस्थान के अहीर युवकों, राजस्थान व उत्तर प्रदेश के राजपूत युवकों की सैनिक जीडी की भर्ती होगी। इसी तिथि को हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड के युवकों की सैनिक टे्रडमैन की भर्ती होगी। इसके बाद 4 नवम्बर को कागज पत्रों की जांच होगी जबकि 5 व 6 नवम्बर को भर्ती में आए युवकों की डाक्टरी जांच होगी। ट्रेड्समैन की कौशल परीक्षा के लिए 21 नवम्बर की तिथि निर्धारित की गई है जबकि 29 नवम्बर को लिखित परीक्षा होगी। कुमाऊं रेजीमेंट सेंटर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार यह भर्ती केवल सैनिक परिवारों के युवकों के लिए होगी। सैनिक जीडी के लिए उम्र साढ़े 17 साल से 21 साल तथा सैनिक ट्रेड्समैन साढ़े 17 साल से 23 साल निर्धारित की गई है। सैनिक जीडी (कुमाऊंनी) की भर्ती के लिए बेरीनाग, डीडीहाट, धारचूला, मुनस्यारी तहसीलों के युवकों के लिए आठवीं पास तथा बटवारी, ओखीमठ व जोशीमठ तहसीलों के लिए 10वीं पास की शैक्षिक योग्यता रखी गई है। सैनिक जीडी (साधारण) के लिए अभ्यर्थी को 45 प्रतिशत अंकों के साथ 10वीं उत्तीर्ण होना चाहिए। सैनिक ट्रेड्समैन के तहत कुक के अभ्यर्थी को 10वीं पास व मशालची व इक्यूपमेंट रिपेयरर को 8वीं पास होना चाहिए। अभ्यर्थियों से निर्धारित तिथि को प्रात: 6 बजे रैली स्थल पर पहुंचने को कहा गया है।

-महाभारत की अनछुई कथा है गैंडी उत्सव

-बसंत पंचमी पर आयोजित होता है च्वींचा गांव में गैंडी उत्सव -पांडवों को पिता के श्राद्ध के लिए चाहिए था विशेष गैंडी का सिर -च्वींचा में गैंडी के स्वामी नागमल से किया था पांडवों ने एक माह तक युद्ध पौड़ी: देशभर में रामलीला का मंचन किया जाता है। उत्तराखंड में भी यह परंपरा है, लेकिन यहां सिर्फ रामलीला ही नहीं, बल्कि महाभारत की प्रमुख कथाओं का भी मंचन किया जाता है। दरअसल, पांडव पितृहत्या दोष से मुक्ति पाने को हिमालय की ओर आए थे, इसीलिए गढ़वाल भर में पांडवों की कथाओं के प्रति खासा जुड़ाव देखा जाता है। ऐसा ही एक आयोजन होता है पौड़ी स्थित च्वींचा गांव में, जहां महाभारत की एक ऐसी कथा का मंचन किया जाता है, जो अधिक प्रचलित नहीं है। प्रतिवर्ष बसंत पंचमी के मौके पर होने वाला यह आयोजन गैंडी उत्सव के नाम से जाना जाता है। च्वींचा गांव में हर साल आयोजित होने वाले गैंडी उत्सव व इससे जुड़ी महाभारत की ऐतिहासिक कहानी की जानकारी बहुत कम लोगों को ही है। असल में यहां एक ऐसी घटना का तीन दिन का जीवंत मंचन किया जाता है, जो महाभारत के जुड़े तमाम लेखों से अछूती है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक, पांडवों को पिता पांडु के श्राद्ध के लिए एक विशेष प्रकार की गैंडी (मादा गैैंडा) के सिर की जरूरत थी। उन्होंने खोजबीन की तो पता चला कि च्वींचा गांव के नागमल व उसकी बहन नागमली के पास सीता व राम नामक गैंडी व गैंडा मौजूद थे। बताया जाता है कि पांडवों ने जब नागमल से सीता गैंडी देने के कहा तो नागमल ने इसके लिए युद्ध करने की शर्त रखी। पांडवों व नागमल के बीच एक माह तक लगातार रात-दिन का घोर युद्ध चला। युद्ध के दौरान नागमली ने भाई की परोक्ष रूप से सहायता की, लेकिन आखिरकार पांडवों ने नागमल को पराजित कर दिया। इसके बाद पांडवों ने गैंडी का वध कर गैंडी के सिर से पिता पांडु का श्राद्ध किया। इसी मान्यता के आधार पर गांव में प्रतिवर्ष बसंत पंचमी के दिन तीन दिवसीय गैंडी उत्सव को आयोजित किया जाता है। पंचमी के दिन गांव में स्थित मंदिर में विधिवत पूजा अर्चना की जाती है। कथा के मंचन के दौरान गांव के पांच युवक पांडवों व दो लोग नागमल व नागमली की भूमिका निभाते हैं। प्रतीक रूप में गैंडी बनाई जाती है। आखिरी दिन पांडवों व नागमल के बीच युद्ध होता है, मंचन में आखिरकार नागमल को पांच पांडव पराजित कर देते हैं। युद्ध का मंचन ढोल दमाऊ के साथ किया जाता है। इसके बाद च्वींचा गांव में भी विधि विधान ने पांच पांडव अपने पिता पांडु का पितृविसर्जन करते हैं। संस्कृतिकर्मी अरविंद मुदगिल व गैंडी उत्सव मंचन से जुड़े मनोज रावत, अंजुल बताते हैं कि इस परंपरा को आगे भी जारी रखा जाएगा।

-खतरों के खिलाड़ी का 'खतरनाक' खेल

देहरादून-मसूरी के बीच सर्पीली सड़क पर हैंडिल को हाथ लगाए बगैर दौड़ाई बाइक लोहाघाट निवासी नवीन कार्की के इस कारनामे ने दांतों तले उंगली दबाने को किया मजबूर गिनीज बुक आफ वल्र्ड रिकाडर््स में नाम दर्ज कराने की तैयारी में है नवीन देहरादून, आप ऐसा कतई न करें। ऐसा करने के लिए कठोर साधना के साथ ही गहन एकाग्रता जरूरी है। जरा सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है। हालांकि, ऐसे जांबाजों की कमी नहीं है, जिनके लिए खतरों से खेलना चुटकी बजाने जैसा है। ऐसे ही करिश्माई युवक का नाम है नवीन सिंह कार्की। लोहाघाट (चंपावत) के इस युवक ने सोमवार की सुबह जब देहरादून-मसूरी के बीच सर्पीली चढ़ाई पर हैंडिल को छुए बिना बाइक दौड़ाई तो देखने वाले आंखों पर भी यकीन करने को तैयार नहीं थे। अब नवीन की तैयारी गिनीज बुक आफ वल्र्ड रिकाड््र्स में नाम दर्ज कराने की है। नवीन ने सोमवार सुबह जब देहरादून के किशनपुर डाइवर्जन से अपने इस 'खतरनाक' सफर की शुरुआत की तो कई लोग उसका कारनामा देखने वहां जमा हो गए। नवीन ने एक बार एक्सीलेटर और गेयर फिक्स किया और फिर बाइक दौड़ा दी, बिना हैंडिल पर हाथ लगाए मसूरी के लिए। वह अपने शरीर के संतुलन से ही बाइक को नियंत्रित करते रहे, कभी बैठकर तो कभी खड़े होकर। नवीन ने इसी अंदाज में नॉन स्टाप पहले देहरादून से मसूरी और फिर वापसी में मसूरी से देहरादून तक कुल 70 किमी का सफर तय किया। इस पहाड़ी मार्ग की सर्पीली सड़क पर वह ऐसे बाइक दौड़ा रहे थे, जैसे कोई मंझाा हुआ बाइकर्स स्टंट दिखा रहा हो। इससे उनके पीछे -पीछे चल रहे मीडियाकर्मी दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो गए। वजह यह कि मैदान में तो हैंडिल को हाथ लगाए बिना बाइक कंट्रोल की भी जा सकती है, लेकिन पहाड़ी मार्गों पर ऐसा करना दुश्कर है। जरा सी चूक मौत का सबब बन सकती है। अपने इस कारनामे को अंजाम देने के बाद नवीन ने 'दैनिक जागरण' को बताया कि डेढ़-दो साल के अभ्यास के बाद उन्हें इसमें सफलता मिली है। हैंडिल को हाथ लगाए बिना पहाड़ी मार्गों पर बाइक चलाना कठिन है, इसीलिए उन्होंने ऐसा करने की ठानी। वह पहले भी चंपावत से लोहाघाट और लोहाघाट से पिथौरागढ़ की डेढ़ सौ किमी की दूरी तय कर चुके हैं। तीस वर्षीय नवीन ने बताया कि आगे भी वह मैदानी इलाकों के हाइवे को छोड़कर दुर्गम पहाड़ी रास्तों की लंबी दूरी नान स्टॉप तय करेंगे। उनका अगला लक्ष्य मसूरी से चंबा और चंबा से टिहरी के बीच बाइक दौड़ाने का है। नवीन अपने इस कारनामे को गिनीज बुक आफ वल्र्ड रिकार्डस में दर्ज कराने की तैयारी में हैं। इस सिलसिले में सोमवार को उनके देहरादून से मसूरी तक के सफर का वीडियो बिगफ्रेम्स फिल्मस एंड इवेंट्स ने शूट किया। बिगफ्रेम्स के निदेशक संदीप ठाकुर एवं आकाश नेगी ने बताया कि नवीन के इस इवेंट के लिए गिनीज में एप्लीकेशन दी जा चुकी है। टेक्निकल हेड गगन अग्रवाल ने उम्मीद जताई कि जल्द ही नवीन का नाम गिनीज में शामिल कर लिया जाएगा।

Friday, October 16, 2009

ब्लॉग पर पहाड़, पहाड़ पर ब्लॉग

अऱविद शेखऱ देहरादून-: ब्लॉग की दुनिया से पहाड़ अछूते नहीं रहे, बल्कि अब बहुत से ऐसे हिंदी ब्लॉग सामने आ रहे हैं, जो अपने-अपने अंदाज में पहाड़ की कहानी कह रहे हैं। जितेंद्र भट्ट का अपना पहाड़ हो, विनीता यशस्वी का यशस्वी हो या राकेश जुयाल का पहाड़वन डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम। बुरांस, बुग्याल, पहाड़ीबोली, म्यर पहाड़, घुघुती-बसुती, जय उत्तराखंड, नैनीताली, नई सोच जैसे सैकड़ों ब्लॉग आज पहाड़ खासकर उत्तराखंड से जुड़े समाचार, लेख, समाज और संस्कृति की जानकारी इंटरनेट की दुनिया में उड़ेल रहे हैं। लिखोयहांवहां डॉट ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम और कबाड़खाना जैसे ब्लॉग भी यूं तो साहित्य संस्कृति पर वैश्विक दृष्टिकोण रखते हैं लेकिन इनमें उपलब्ध साहित्यिक विधाओं की कृतियों में अक्सर व्यापक पहाड़ी समाज नजर आ जाता है। समाजविज्ञानी देवेंद्र बुड़ाकोटी कहते हैं ब्लॉग की दुनिया में पहाड़ खासकर उत्तराखंड से जुड़े ब्लॉगों के विस्फोट के पीछे उत्तराखंड राज्य आंदोलन से उपजी राजनीतिक चेतना है, जिसने पहाड़वासियों में अपनी अलग पहचान स्थापित करने की छटपटाहट को जन्म दिया। दरअसल उत्तराखंड राज्य आंदोलन का समय भी वह समय है जब सूचनाक्रांति आम जन तक पहुंच रही थी। इसी दौर में उत्तराखंड ने क्षेत्रीय पहचान को स्थापित करती ढेरों पत्र-पत्रिकाओं को बाजार में अपनी जगह की तलाश करते देखा। मगर उत्तराखंड के लोगों की पहचान स्थापित करने और खुद को दोबारा से खोजने की प्यास इससे पूरी नहीं हो सकती थी। ऐसे में पहले पहाड़ से जुड़ी वेबसाइट सामने आईं, लेकिन वेबसाइट शुरू करना खर्चीला था। जैसे ही ब्लॉगिंग की शुरुआत हुई तो देहरादून, नैनीताल, अल्मोड़ा या देश के महानगरों में बसे उत्तराखंडी लोगों की अपनी बात कहने छटपटाहट बाहर आने लगी। ब्लॉग बनाने में न तो कोई अतिरिक्त खर्च है न किसी की रोकटोक आप अपने मन की बात जब चाहे जैसे कह सकते हैं। इस सबका यह परिणाम यह हुआ कि ए-नए ब्लॉग सामने आने लगे। कई ब्लॉगरों ने तो अपने नाम से ही ब्लॉग शुरू किए हैं। लिखोयहांवहां डॉट ब्लॉग स्पॉट डॉय कॉम संचालित करने वाले युवा कवि व लेखक विजयगौड़ कहते हैं कि ब्लॉग दरअसल माइक्रो स्तर पर सामयिक इतिहास को दर्ज कर रहा है। ब्लॉग पर लोगों के निजी विचार हों या डायरी या अन्य रचनाएं वह बड़े रचनात्मक तरीके से अपने आसपास के समाज का चित्र रचती हैं। यह सूचना संसार भविष्य में इतिहासवेत्ताओं के लिए पहाड़ का इतिहास जानने का अहम औजार साबित होगा।

झिलमिल दिवा जगी गैनी फिर

पौड़ी गढ़वाल ..झिलमिल-झिलमिल दिवा जगी गैनी फिर बौड़ी ऐगे बग्वाल.. गढ़वाली गीत की ये पंक्तियां बग्वाल यानी दीपावली के शुभागमन का रैबार (संदेश) देती हैं। गढ़वाल में दीवाली मनाने के तरीके बेहद खास हैं। इस मौके पर लक्ष्मी पूजा के अलावा पांडव नृत्य व भैलो मुख्य आकर्षण रहते हैं। गढ़वाल के लोक में दीपावली के त्योहार के दो दिन छोटी व बड़ी दीपावली के रूप में मनाए जाते हैं। छोटी दीवाली के दिन गढ़वाल के हर घर में पूरी-पकोडि़यां बनती हैं। साथ ही गायों के लिए पींडू यानी पौष्टिक आहार भी बनाया जाता है और गांव भर के गौवंश को खिलाया जाता है। आज भी सुदूर गांवों में यह प्रथा चली आ रही है। छोटी व बड़ी दीवाली पर रात को घर के प्रत्येक ताखे (आले) पर दीपक जलाकर मां लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है। इसके बाद शुरू होती है गढ़वाल की अनोखी दीवाली। रात्रि भोजन के बाद गांव के एक बड़े आंगन में भाड़ झोंक दिया जाता है। लोकवाद्य ढोल-दमाऊ के सबद (लोक वाद्य की एक ताल) के बाद देवी का आह्वान किया जाता है। इसके बाद पांडव की वार्ताएं (कथाएं) शुरू होती हैं। एक के बाद एक कथाएं चलती हैं और लोक ढोल की थाप पर वार्ता को सुनते हुए उसी अंदाज में पांडव नृत्य करते हैं। इसके बाद भैलो फूंके जाते हैं। भैलो भांग के डंडों पर तिल के दाने बांधकर बनाया जाता है। गांव के सभी लोग अपने साथ भैलो लेकर आते हैं और इन्हें जलाकर खेतों की ओर जाते हैं। आगे-आगे ढोल बाधक व पीछे-पीछे जलते हुए भैलो लेकर लोग नृत्य करते हुए चलते हैं। इसके बाद फिर उसी आंगन में पहुंचकर पांडव कथाएं रातभर चलती रहती हैं और लोग नृत्य में मस्त रहते हैं।

झिलमिल दिवा जगी गैनी फिर

पौड़ी गढ़वाल ..झिलमिल-झिलमिल दिवा जगी गैनी फिर बौड़ी ऐगे बग्वाल.. गढ़वाली गीत की ये पंक्तियां बग्वाल यानी दीपावली के शुभागमन का रैबार (संदेश) देती हैं। गढ़वाल में दीवाली मनाने के तरीके बेहद खास हैं। इस मौके पर लक्ष्मी पूजा के अलावा पांडव नृत्य व भैलो मुख्य आकर्षण रहते हैं। गढ़वाल के लोक में दीपावली के त्योहार के दो दिन छोटी व बड़ी दीपावली के रूप में मनाए जाते हैं। छोटी दीवाली के दिन गढ़वाल के हर घर में पूरी-पकोडि़यां बनती हैं। साथ ही गायों के लिए पींडू यानी पौष्टिक आहार भी बनाया जाता है और गांव भर के गौवंश को खिलाया जाता है। आज भी सुदूर गांवों में यह प्रथा चली आ रही है। छोटी व बड़ी दीवाली पर रात को घर के प्रत्येक ताखे (आले) पर दीपक जलाकर मां लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है। इसके बाद शुरू होती है गढ़वाल की अनोखी दीवाली। रात्रि भोजन के बाद गांव के एक बड़े आंगन में भाड़ झोंक दिया जाता है। लोकवाद्य ढोल-दमाऊ के सबद (लोक वाद्य की एक ताल) के बाद देवी का आह्वान किया जाता है। इसके बाद पांडव की वार्ताएं (कथाएं) शुरू होती हैं। एक के बाद एक कथाएं चलती हैं और लोक ढोल की थाप पर वार्ता को सुनते हुए उसी अंदाज में पांडव नृत्य करते हैं। इसके बाद भैलो फूंके जाते हैं। भैलो भांग के डंडों पर तिल के दाने बांधकर बनाया जाता है। गांव के सभी लोग अपने साथ भैलो लेकर आते हैं और इन्हें जलाकर खेतों की ओर जाते हैं। आगे-आगे ढोल बाधक व पीछे-पीछे जलते हुए भैलो लेकर लोग नृत्य करते हुए चलते हैं। इसके बाद फिर उसी आंगन में पहुंचकर पांडव कथाएं रातभर चलती रहती हैं और लोग नृत्य में मस्त रहते हैं।

-अब गढ़वाली पॉप पर थिरकेगी दुनिया

बदलने लगा टे्रंड, नई पीढ़ी ने गढ़वाली गीत-संगीत में शुरू किए नए प्रयोग पॉप म्यूजिक में गाए जाने लगे हैं पहाड़ के गीत तेज रफ्तार जिंदगी में लकीर का फकीर बने रहना ठीक नहीं थोड़े से प्रयासों से पहाड़ी लोकधुनों पर भी थिरकायी जा सकती है पूरी दुनिया , देहरादून याद कीजिए उस आईटी प्रोफेशनल के करिश्मे को, जिसने लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के गीत 'जा-जा बेटी नागणी बजार' की रिदम पर शकीरा के नृत्य को कुछ इस अंदाज में जोड़ा कि नेगी भी अवाक रह गए, लेकिन इसने यह तो साबित कर ही दिया कि थोड़े से प्रयासों से पहाड़ी लोकधुनों पर पूरी दुनिया को थिरकाया जा सकता है। सच यह है कि व्यस्तताओं और जिम्मेदारियों से भरे वर्तमान में हमारे पास अपनी परंपराओं व संस्कृति से देश-दुनिया को परिचित कराने का और कोई विकल्प भी नहीं बचा है। यही वजह है कि नई पीढ़ी ने गीत-संगीत में नए प्रयोग शुरू कर दिए हैं। नई पीढ़ी इस दौर में ऐसा प्रयोग करना चाहती है, जिसमें परंपराओं के सम्मान के साथ ही नयापन भी हो। नवोदित गायक रजनीकांत सेमवाल की हाल में रिलीज वीडियो एलबम 'टिकुलिया मामा' इसी बानगी को पेश करती है। एक खास बात यह है कि लोक संगीत को नए अंदाज में पेश करने के अब तक जो भी प्रयास हुए, वे बचकाने ही अधिक रहे हैं, जिससे गंभीरता के बजाय इसमें लंपटपना अधिक आ गया। इस ऊहापोह के बीच अगर कुछ युवा पहाड़ी गीत-संगीत को नया अंदाज दे रहे हैं तो इसे भविष्य के लिए अच्छा संकेत ही माना जाना चाहिए। प्रीतम भरतवाण, मंगलेश डंगवाल, रजनीकांत सेमवाल सरीखे युवा गायकों ने जिस नई परंपरा का सूत्रपात किया है, वह निश्चित रूप से उत्तराखंडी गीत-संगीत को ऊंचाइयों तक ले जाएगी। पॉप और लाउंज मिक्स का दौर बदलते दौर में फॉस्ट म्यूजिक और गैरपारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग गढ़वाली-कुमाऊंनी गीतों में भी तेजी से बढ़ा है। धीरे-धीरे वायलिन, गिटार, माउथ ऑर्गन व ड्रम जैसे आधुनिक साज लोक संगीत की जरूरत बन गए हैं। 'टिकुलिया मामा' की सफलता इस बात का प्रमाण है कि यहां का लोक संगीत वेस्टर्न म्यूजिक का बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। इस एलबम में प्र्रोग्राम्ड म्यूजिक की मदद से जिस तरह पॉप और लाउंज मिक्स गाने प्रस्तुत किए गए हैं, वह भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन करने वाले साबित होंगे। ताकि लोकप्रियता मिले गीत-संगीत में नए प्रयोगों के पीछे यह धारणा भी काम कर रही है कि लोक संगीत को उसी तरह देश-दुनिया में लोकप्रिय बनाया जाए, जैसे पंजाबी, राजस्थानी आदि प्रांतों के लोक संगीत को हासिल है। मूल को ठेस पहुंचाए बिना यदि युवा संगीतज्ञ ऐसे प्रयोग कर रहे हैं तो इसका स्वागत ही किया जाना चाहिए। ''अगर नई पीढ़ी को सिरफिरा कहकर उपेक्षित किया जाता रहा तो हमारी बोली, भाषा, गीत-संगीत को आगे कौन ले जाएगा। यह पीढ़ी तो कमोबेश एक ही रंग में रंगी है, फिर चाहे वह चमोली में हो या चंडीगढ़ में।'' - मुकेश नौटियाल, साहित्यकार ''अपनी बोली में अगर वही संगीत उपलब्ध हो, जिस पर देश-दुनिया थिरक रही है, तो यकीनन देश-दुनिया में छितर चुके प्रवासी इसी बहाने अपनी जड़ों की ओर देख सकते हैं।'' - रजनीकांत सेमवाल, युवा गढ़वाली गायक ''गीत-संगीत में नया प्रयोग वर्तमान की जरूरत है। नए प्रयासों से लोग यदि अपनी संस्कृति, परंपराओं और बोली-भाषा को अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं तो इससे नए संगीतज्ञों को आगे बढऩे की प्रेरणा मिलेगी'' - मंगलेश डंगवाल, गढ़वाली लोकगायक

लंदन के म्यूजिम में सजा है उत्तराखंड का हुनर

-लंदन के विक्टोरिया एंड एल्बर्ट म्यूजियम की शोभा बढ़ा रहे गढ़वाल के चित्र - सन् 1775 से 1860 तक की काल अवधि के हैैं सात मिनिएचर अरविंद शेखर, देहरादून भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों से जुड़ी गढ़वाली चित्रकला शैली की जो सात चित्रकृतियां लंदन के विक्टोरिया एंड एल्बर्ट म्यूजियम में अपनी आभा बिखेर रही हैं, वह कहींगढ़वाल के मशहूर चित्रकार मोला राम की तो नहीं, इस पर संशय बरकरार है, लेकिन चित्रों की शैली से लगता है कि ये मोलाराम की कृतियां हो सकती हैं। वे कब और कैसे ब्रिटेन के इस म्यूजियम में पहुंची, यह एक रहस्य ही है। रानी विक्टोरिया और राजकुमार एल्बर्ट के नाम से बना यह म्यूजियम सजावटी कला और अन्य चीजों का दुनिया का सबसे बड़ा म्यूजियम है। सन 1775 से 1870 तक की अवधि की ये चित्रकृतियां संभवत: गढ़वाली चित्रकला शैली का विकास करने वाले महान चित्रकार मोलाराम की हो सकती हैं। 'अर्ली वालपेंटिंग्स ऑफ गढ़वाल' के लेखक व वरिष्ठ चित्रकार शोधकर्ता प्रो.बीपी कांबोज का कहना है कि गढ़वाल रियासत के राजकीय चित्रकार मोलाराम तोमर (1743-1833) मुगल दरबार के दो चित्रकारों शामदास और हरदास या केहरदास के वंशज थे। शामदास व हरदास 1658 में दाराशिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह के साथ औरंगजेब के कहर से बचने के लिए गढ़वाल के राजा पृथ्वीशाह की शरण में श्रीनगर गढ़वाल पहुंचे थे। राजा के दरबार में वे शाही तसबीरकार बन गए। मोलाराम के बाद उनके पुत्र ज्वालाराम व पौत्र आत्माराम ने चित्रकारी जारी रखी, लेकिन बाद में तुलसी राम के बाद उनके वंशजों ने चित्रकला छोड़ दी। लंदन के म्यूजियम में जो लघुचित्र (मिनिएचर)हैं वे जल रंगों से बने हैं। इनमें सबसे पुराना चित्र रुक्मणी-हरण (1775 से 1785)का है। चित्र में झारोखे में बैठी रुक्मणी, कृष्ण के संदेशवाहक से संदेश सुन रही है। म्यूजियम में 1820 में बना यमुना में नहाती गोपियों द्वारा पेड़ पर चढ़े श्रीकृष्ण से उनके वस्त्र लौटाने की प्रार्थना का दुर्लभ चित्र भी है। अन्य तीन चित्रों में विष्णु के मत्स्य और कूर्मावतार और विष्णु के छठे अवतार परशुराम को दर्शाया गया है। एक अन्य चित्र में श्रीकृष्ण और राधा को एक पलंग पर दर्शाया गया है। म्यूजियम की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक इनमें से ज्यादातर चित्र म्यूजियम ने विभिन्न निजी संग्रह कर्ताओं से नीलामी में खरीदे हैैं। मोलाराम के वंशज डा. द्वारिका प्रसाद तोमर का कहना है कि बहुत संभव है कि ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेज इन कृतियों को अपने साथ ले गए हों या गढ़वाल के राजवंश के मार्फत ही ये विदेशियों के हाथ लग गई हों। प्रो. कांबोज का कहना है कि यह गहन शोध से ही पता चल सकता है कि लंदन म्यजियम की कृतियां मोलाराम की है या गढ़वाली शैली के किसी अन्य चित्रकार की।

Monday, October 12, 2009

=उत्तराखंड में निवेश को तैयार अंबानी

उर्थिंग-सोबला जल विद्युत परियोजना पर केंद्र से बात करेगी सरकार -ऊर्जा, पर्यटन, सीएनजी के साथ चार धाम के विकास में दिलचस्पी -सीएम से शिष्टाचार मुलाकात की देहरादून, दुनिया के जाने-माने उद्योगपति अनिल अंबानी ने उत्तराखंड में ऊर्जा, पर्यटन, सीएनजी आधारित उद्योग, रज्जू मार्ग आदि में निवेश की इच्छा जताई है। बीजापुर गेस्ट हाउस में शिष्टाचार भेंट के दौरान मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक तथा श्री अंबानी के बीच विभिन्न मसलों पर वार्ता हुई। रिलायंस इंफोकाम के चेयरमैन अनिल अंबानी से पहले मुख्यमंत्री की दूरभाष पर वार्ता हुई और उसके बाद बीजापुर गेस्ट हाउस में श्री अंबानी ने मुख्यमंत्री से शिष्टाचार मुलाकात की। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार धौलीगंगा नदी पर बनने वाले 280 मेगावाट क्षमता के उर्थिंग-सोबला जल विद्युत परियोजना को शुरू कराने के लिए केंद्र सरकार से बात करेगी। उन्होंने कहा कि सूबे में 25 हजार मेगावाट उर्जा उत्पादन की क्षमता है और सरकार यहां निवेश करने वाली कंपनियों को हरसंभव सहयोग करेगी। यह परियोजना से सूबे के विकास में गति और भी तेज होगी। श्री अंबानी ने कहा कि रिलायंस समूह उत्तराखंड में उर्जा पर्यटन और सीएनजी आधारित उद्योगों में निवेश करने को तैयार है। रिलायंस चारधाम के सर्वांगीण विकास के लिए सरकार द्वारा बनाई जा रही योजनाओं में सहयोग करेगी। चारधाम में यात्री सुविधाओं के लिए कार्य करना उनके लिए गर्व की बात होगी। श्री अंबानी ने उर्थिंग-सबोला जल विद्युत परियोजना के लंबित होने के कारणों पर सीएम से चर्चा की। उन्होंने कहा कि कंपनी परियोजना पर काम करने का तैयार है बशर्ते भारत सरकार का वन एवं पर्यावरण मंत्रालय इस बावत हरी झांडी दे। मुख्यमंत्री ने कहा कि परियोजना को शुरू कराने के लिए रिलायंस एनर्जी लिमिटेड को सरकार पूूरा सहयोग करेगी। श्री निशंक ने कहा कि पर्यटन की असीम संभावनाओं को देखते हुए सरकार सूबे में इसे बढ़ावा देने के लिए एक दीर्घकालीन योजना बना रही है। जिसके तहत पर्यटन स्थलों को चिंहित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि चारधाम के सर्वांगीण विकास के लिए योजना बनाई जा रही है।

-योग के अंकुर स्फुटित करती है ऋषिकेश की माटी

पाठ्यक्रम में शामिल होने के बाद योग स्वरोजगार से जुड़ा सात समुंदर पार से साधकों को खींच लाता है योग ऋषिकेश, आज के भौतिकवादी युग में विश्वभर के लोग शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए योग को अपना रहे हैं, वहीं लोगों की बढ़ती रुचि को देखते हुए योग स्वरोजगार के रूप में उभर कर सामने आया है। योग की विभिन्न विधाओं में पारंगत विश्व ख्याति प्राप्त शख्सियत के रूप में स्वामी शिवानंद, महर्षि महेश योगी, डा. स्वामी राम, शिवानंद आश्रम के ब्रह्मलीन स्वामी चिदानंद सरस्वती का नाम इसी क्षेत्र से जुड़ा है। उत्तराखंड राज्य गठन से पूर्व उत्तर प्रदेश सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय योग सप्ताह मनाने का निर्णय लिया तो इसके लिए ऋषिकेश क्षेत्र को ही चुना। डेढ़ दशक से यहीं योग सप्ताह मनाया जाता है। पिछले कई वर्षों से स्वर्गाश्रम स्थित परमार्थ निकेतन में होने वाले अंतर्राष्ट्रीय योग सप्ताह में देश-विदेश से सैकड़ों साधक जुटते हैं और भारतीय संस्कृति के मूल में स्थित योग को जानकर इसका प्रचार-प्रसार कई देशों में करते हैं। यह बात भी सत्य है कि विदेश से जितने भी पर्यटक यहां आते हैं, उनमें से नब्बे फीसदी योग को जानने के लिए आते हैं। पर्यटक बनकर आने वाला विदेशी यहां से साधक बनकर जाता है। योग गुरु स्वामी रामदेव ने वर्तमान दौर में योग को नई पहचान ही नहीं दी, बल्कि इसे घर-घर तक पहुंचाया। आज भी ऋषिकेश, स्वर्गाश्रम, लक्ष्मण झाूला, तपोवन, स्वामीराम साधक ग्राम आदि क्षेत्रों में विदेशी पर्यटक योग सीखने आ रहे हैं। हकीकत यह है कि यहां स्थित आश्रम हों या अन्य धार्मिक संस्थाएं, बिना योग केंद्र के अधूरी हैं। अब तो सरकारी स्तर पर भी योग को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा चुका है। गढ़वाल विश्वविद्यालय ने छह वर्ष पूर्व महाविद्यालयों में योग विषय पर डिप्लोमा व डिग्री कोर्स प्रारंभ किया था। इस विषय में पारंगत छात्र आज देश के विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार पा रहे हैं। श्री जयराम संस्कृत महाविद्यालय के योग विज्ञान विभाग में संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा योग पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। जयराम आश्रम योग साधना आरोग्य एवं शोध संस्थान में विदेशी साधकों के लिए विशेष योग शिक्षक प्रशिक्षण कोर्स संचालित किए जा रहे हैं। भारतीय ऋषि-मुनियों की आध्यात्मिक खोज और वर्षों के तप व अनुसंधान के परिणाम स्वरूप दुनिया के सामने आया योग आज युवाओं के लिए रोजगार के सुनहरे अवसर लेकर आया है। उक्त संस्थान छात्रों को शानदार प्लेसमेंट भी उपलब्ध करा रहे हैं। जयराम आश्रम योग साधना आरोग्य एवं शोध संस्थान के निदेशक डा. लक्ष्मी नारायण जोशी का कहना है कि योग निरोग जीवन का मूल मंत्र है। योग विषय पाठ्यक्रम में शामिल होने के बाद व्यावहारिक तौर पर इसमें पारंगत होना भी जरूरी है। बाजारवाद के इस दौर में योग व्यवसाय के रूप में अपनाया जा रहा है। ऐसे में योग का आधा-अधूरा ज्ञान सीखने वालों के लिए यह घातक सिद्ध हो सकता है।

-न्याय के देवता को संरक्षण की दरकार

-न्याय के देवता के रूप में विख्यात है पौड़ी स्थित कंडोलिया मंदिर -ऐतिहासिक मंदिर के सौंदर्यीकरण के प्रति सरकार व पर्यटन विभाग का रवैया उदासीन पौड़ी: पर्यटन नगरी पौड़ी की सुरम्य वादियों में स्थित कंडोलिया देवता का मंदिर खास पहचान रखता है। स्थानीय लोगों समेत श्रद्धालुओं में न्याय के मंदिर के रूप में विख्यात इस ऐतिहासिक मंदिर पर अब तक पर्यटन विभाग की नजरें इनायत नहीं हो पाई हैं। नतीजतन मंदिर वर्षों से जीर्णाेद्धार की बाट जोह रहा है। खास बात यह है कि प्रतिवर्ष यहां करीब एक लाख श्रद्धालु मनौतियां मांगने के लिए पहुंचते हैं। इसके बावजूद सरकार इसके संरक्षण व सौंदर्यीकरण की ओर ध्यान नहीं दे रही है। पौड़ी मुख्यालय में समुद्रतल से करीब 1800 मीटर की ऊंचाई पर सघन देवदार, सुराई, बांज बुरांश समेत विभिन्न वृक्षों से आच्छादित कंडोलिया देवता मंदिर न्यायप्रियता के विख्यात है। धार्मिक मान्यता है कि कई वर्ष पूर्व कुमाऊं की एक युवती का विवाह पौड़ी गांव में डुंगरियाल नेगी जाति में हुआ था। विवाह के बाद वह युवती अपने इष्ट देवता को कंडी (छोटी टोकरी) में रखकर लाई थी। इसके बाद से कुमाऊं के इन देवता को कंडोलिया देवता के नाम जाना जाने लगा और उनकी पूजा पौड़ी गांव में भी शुरू कर दी गई। मान्यता है कि बाद में देवता गांव के ही एक व्यक्ति के स्वप्न में आए और आदेशित किया कि मेरा स्थान किसी उच्च स्थान पर बनाया जाए। इसके बाद कंडोलिया देवता को पौड़ी शहर से ऊपर स्थित पहाड़ी पर प्रतिष्ठित किया गया। स्थापना के बाद से ही कंडोलिया मंदिर न्याय देवता के रूप में प्रसिद्ध हो गया। वर्ष 1989 में पौड़ी गांव निवासी पद्मेंद्र सिंह नेगी, पृथ्वी पाल सिंह चौहान एवं सुरेंद्र नैथानी ने कंडोलिया देवता के मंदिर में विधिवत रूप से पूजा अर्चना करने की परंपरा शुरू की, तब से हर साल यहां तीन दिवसीय पूजा-अर्चना होती है। इस तीन दिवसीय आयोजन में यहां सैकड़ों श्रद्धालु मनौतियां मांगने आते हैं, तो कई मनौतियां पूर्ण होने पर घंटा, छत्र आदि चढ़ाते हैं। आयोजन के पहले दिन रिंगाल के ध्वज को वैदिक मंत्रोचारण के साथ शहर की परिक्रमा करने के उपरांत कंडोलिया मंदिर में चढ़ाया जाता है। इसी दिन मंदिर में रामायण पाठ का भी आयोजन किया जाता है। दूसरे दिन रामायण पाठ का समापन होने के साथ ही विभिन्न कीर्तन एवं महिला मंगलों की ओर से मंदिर में कंडोलिया देवता की स्तुति की जाती है, और पूरी रात जागरण किया जाता है। अंतिम दिन मंदिर के पुजारी वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ भूमि पूजन करने के बाद यज्ञ करते हैं और विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है। ऐतिहासिक महत्व के इस मंदिर को कई मायनों में कई प्रकार की पहचान है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कंडोलिया मंदिर का हर साल आयोजित होने वाला तीन दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान पर बलि प्रथा से जैसी कुप्रथा की काली छाया नहीं पड़ी है। बेहद सौहार्दपूर्ण एवं शांतिपूर्ण माहौल में आयोजित होने वाले इस तीन दिवसीय आयोजन में करीब 30-35 हजार श्रद्धालुगण पहुंचते हैं। इसके अलावा यहां हर साल करीब एक लाख से अधिक श्रद्धालुगण मनौतियां मांगने के लिए इस मंदिर में माथा टेकने के लिए पहुंचते हैं। इस सबके बावजूद इस मंदिर की ओर पर्यटन विभाग की नजरें इनायत नहीं हो पाई हैं। ऐसे में मंदिर सौंदर्यीकरण व जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा है। इस बाबत प्रभारी क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी हीरा लाल टम्टा का कहना है कि विभाग की ओर से करीब चार माह पूर्व मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए पांच लाख रुपये का प्रस्ताव भेजा गया है। शासन से स्वीकृत मिलने एवं धनराशि अवमुक्त होने के बाद ही मंदिर का सौंदर्यीकरण किया जाएगा।

किमोठा: यहां बच्चा- बच्चा जानता है ग्रहों की चाल

--चमोली जिले के किमोठा गांव ने दिए हैं कई विख्यात ज्योतिष -ग्रामीणों की संस्कृत के प्रति निष्ठा से घोषित हुआ 'संस्कृत ग्राम' -टिहरी राजदरबार ने गांव को किया था नवरत्नों में शामिल गोपेश्वर (चमोली) ग्रहों की चाल देखकर भविष्य बांचना, नक्षत्रों की स्थिति देख अच्छे-बुरे की जानकारी देना, चांद और सूरज का प्रभाव आंकना और अंकों के आधार पर जीवन के अनसुलझो सवालों का जवाब देना। हमारे, आपके लिए भले ही ये सब कार्य करिश्माई हों, लेकिन चमोली जिले का एक गांव ऐसा है, जहां कोई बच्चा भी भूत, वर्तमान और भविष्य के तार जोड़ता दिख जाएगा। चमोली जिले की पोखरी तहसील में स्थित किमोठा गांव में वर्तमान में 422 परिवार निवास कर रहे हैं। इनमें ब्राह्मण व अनुसूचित जाति के लोग शामिल हैं और 80 फीसदी लोग साक्षर हैं। गांव अपनी ज्योतिष परंपरा के लिए न सिर्फ उत्तराखंड, बल्कि देशभर में विख्यात है। संस्कृत भाषा में 'जीवनादर्शन' कृति के रचयिता व बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व व्याकरणाचार्य पं. ब्रह्मानंद किमोठी, ज्योतिष शास्त्र के प्रामाणिक ग्रंथ 'ज्योतिष भाष्कर' की रचना करने वाले पं. मुकंदराम किमोठी शामिल हैं। पं. देवीदत्त किमोठी की कर्मकांड व ज्योतिष पर हस्तलिखित पुस्तकें आज भी गांव में सुरक्षित हैं। इस गांव के केशवानंद किमोठी को ज्योतिष गणित में महारथ हासिल थी। वह हाथ से लिखकर ही पंचांग बना लेते थे। वहीं मुकुंदराम किमोठी ने भी आंचलिक बोली गढ़वाली में ज्योतिष पर आधारित किताबें लिखी थी। वर्तमान में इस गांव के विजय प्रसाद किमोठी यमुनानगर दिल्ली में ज्योतिष के लिए खासा प्रसिद्ध नाम हैं। जगदंबा प्रसाद किमोठी व दिल्ली में राजेन्द्र प्रसाद किमोठी भी इस क्षेत्र में खासे चर्चित लोगों में शुमार हैं। इनके अलावा गणित व आयुर्वेद के क्षेत्र में गांव के राम प्रसाद किमोठी, केशवानंद किमोठी, श्रीकृष्ण किमोठी, भाष्करानंद किमोठी, घनश्याम किमोठी, गोपाल भवानी दत्त किमोठी, तुलसीराम किमोठी, मित्रानंद किमोठी, उमादत्त किमोठी, नागदत्त किमोठी, मौजराम किमोठी, उर्वीदत्त किमोठी, जयकृष्ण किमोठी, अनुसूया प्रसाद किमोठी, रतिराम किमोठी, गिरिजा प्रसाद किमोठी, राधाकृष्ण किमोठी व रघुवर दत्त किमोठी के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं। खास बात यह है कि नई पीढ़ी भी पूर्वजों के कार्य को भूली नहीं है। आज भी गांव के अधिकांश लोग ज्योतिष कार्य से ही जुड़कर अपनी परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। यही वजह है कि विभिन्न विषयों में उच्च शिक्षा की उपाधियां हासिल करने वाले युवा भी यहां संस्कृत में पंचांगों की गणना करते और जन्मपत्रियां बांचते नजर आते हैं। हों भी क्यों नहीं, आखिर इसी कार्य की वजह से तो यह गांव टिहरी राज दरबार के नवरत्नों में शामिल था। वर्ष 1802 में जब गोर्खाओं ने गढ़वाल पर आक्रमण किया, तो गोर्खा राजा भी किमोठियों की विद्वता से बेहद प्रभावित हुआ और गांव को ताम्रपत्र दिया,जो आज भी सुरक्षित है। ब्रिटिश काल में गढ़वाल रेजीमेंट सेंटर के सिविल गुरुकी उपाधि भी हासिल थी। आज की बात करें, तो सरकार ने संस्कृत के प्रति गांववालों का लगाव देखते हुए इसे संस्कृत ग्राम घोषित किया है। 1880 में स्थापित किया था संस्कृत विद्यालय गोपेश्वर: किमोठा गांव में वर्ष 1880 में विद्यानंद सरस्वती ने संस्कृत विद्यालय की स्थापना की थी। तब से यह विद्यालय संचालित हो रहा है। विद्यालय उत्तर मध्यमा(कक्षा बारहवीं)तक का है। राज्य सरकार ने पिछले वर्ष इसे संस्कृत ग्राम बनाए जाने को 24 जनवरी 2008 को गजट नोटिफिकेशन जारी किया।

-...तो पहाड़ पर भी दौड़ेगी रेल!

-ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेलवे लाइन बिछाने को हुआ था सर्वे -वैज्ञानिकों का दावा चीन की सीमा तक पहुंचने में कारगर साबित होगा -वैज्ञानिकों के साथ जल्द होगी रेलवे बोर्ड की बैठक रुड़की आईआईटी वैज्ञानिकों की कोशिशें रंग लाई तो उत्तराखंड के पहाड़ों पर रेल दौड़ सकेगी। वैज्ञानिकों का दावा है कि ऋषिकेश से कर्णप्रयाग (चमोली) तक सौ किमी प्रति घंटे की रफ्तार से ट्रेन चलाई जा सकती है। सामरिक दृष्टि से भी यह योजना महत्वपूर्ण साबित होगी। इसके माध्यम से उत्तराखंड से लगती चीन सीमा पर आसानी से पहुंचा जा सकेगा। इस रेलवे लाइन के लिए आईआईटी वैज्ञानिकों ने एक सर्वे किया था। इस सर्वे को लेकर रेलवे बोर्ड आईआईटी वैज्ञानिकों के साथ जल्द एक बैठक करने जा रहा है। आईआईटी वैज्ञानिकों के 1998 में किए गए सर्वे की रिपोर्ट 'रीकोनाइसेंस सर्वे आफ न्यू रेलवे लाइन फ्राम ऋषिकेश टू कर्णप्रयाग' के अनुसार उत्तराखंड के पहाड़ों पर सौ किमी प्रति घंटे की रफ्तार से ट्रेन दौड़ सकती है। इस परियोजना पर करीब 2500 करोड़ का खर्च आएगा। सर्वे के तहत ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक कुल आठ स्टेशन निर्धारित किए गये हैं। इसमें मुनि की रेती, शिवपुरी, मंजिल गांव, गुरसाली, रुद्रप्रयाग, कीर्तिनगर, श्रीनगर व गौचर शामिल हैं। ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक की रेलवे लाइन की दूरी 129 किमी निर्धारित है। इसमें टनल की लंबाई 43 किमी रखी गई है। इसके साथ ही इस रूट पर छह बड़े पुल सहित कुल 126 पुल बनाए जाने प्रस्तावित हैं। सबसे बड़े पुल की लंबाई 831 मीटर होगी। कर्णप्रयाग से चीन सीमा की दूरी केवल सौ किमी है। चीन से भारत के रिश्तों को देखते हुए भविष्य में यह योजना सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। यह रेलवे लाइन पठानकोट से जोगिन्दर नगर के बीच नैरोगेज रेलवे लाइन की तरह पूरे उत्तराखंड के एक बड़े भूभाग को जोडऩे में सहायक होगी। आईआईटी के सिविल विभाग के वैज्ञानिक डा. कमल जैन ने बताया कि पहाड़ पर रेल संचालित करने की संभावनाओं को लेकर 1998 में एक सर्वे रिपोर्ट तैयार की थी। इस पर अभी भी स्थलीय अध्ययन जारी है। सर्वे में कर्णप्रयाग तक रेल लाइन का ऐसा अलाइनमेंट किया है, जहां से चीन सीमा तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। इसके लिए रेलवे लाइन से लगते तमाम क्षेत्रों से संपर्क सड़कें भी निकाली जा सकती हैं। डा. जैन ने बताया कि सर्वे के बारे में केंद्रीय रेलवे बोर्ड से कई बार बातचीत हो चुकी है। पूर्व में भारी भरकम खर्च के चलते इस परियोजना को मंजूरी नहीं मिल पाई थी। उन्होंने बताया कि जल्द ही इस संबंध में एक बार फिर उनकी रेलवे बोर्ड के अधिकारियों के साथ बैठक होनी है। बेहतर सल्यूशन लेते तो नहीं रुकती योजना रुड़की: आईआईटी ने देश की सबसे महत्वपूर्ण व महंगी जम्मू-श्रीनगर रेल लाइन के लिए भी अलाइनमेंट किया है। 290 किमी लंबी यह योजना दुनिया के सबसे ऊंचे पुल न बन पाने से पिछले वर्ष रोक दी गई थी। वैज्ञानिक डा. कमल जैन ने उस समय इस योजना में चिनाव नदी के ऊपर बनने वाले 359 मीटर ऊंचे पुल की योजना को सीस्मोलॉजी के लिहाज से असंगत बताया था। इसके विकल्प के रूप में ऊधमपुर जाने को सलाल डैम के पास महज 80 मीटर ऊंचाई वाले पुल से रेल लाइन का सुझााव दिया था। इसमें पुल की लंबाई भी 950 से घटकर 500 मीटर रह गई। इसके लिए 200 करोड़ के निर्धारित बजट के स्थान पर मात्र 25 करोड़ का खर्चा होता। उन्होंने बताया कि योजना के समय बेस्ट सल्यूशन नहीं लिया। इससे यह योजना नान रिटर्निंग फेस में आ गई है। श्रीनगर तक बेहतर रेलवे लाइन के अलाइनमेंट पर काम किया जा रहा है और इसका अध्ययन कार्य जल्द पूरा हो जाएगा।

Thursday, October 8, 2009

रोजगार की आस में नौजवानों के सपने दरकने लगे हैं

नामी गिरामी कंपनियों में युवा झोल रहे ठेकेदारी प्रथा का दंश रुद्रपुर:सिडकुल में उद्योगों की स्थापना ने भले ही ऊधम सिंह नगर जिले का नाम देश के औद्योगिक नक्शे पर ला दिया हो लेकिन रोजगार की आस में बैठे हजारों नौजवानों के सपने दरकने लगे हैं। नामी गिरामी कंपनियों तक में काम करने वाले युवक-युवतियां ठेकेदारों के उत्पीडऩ का दंश झोल रहे हैं। वर्ष 2005 में उत्तराखंड को केंद्रीय औद्योगिक पैकेज का तोहफा मिलने पर रुद्रपुर, सितारगंज तथा हरिद्वार में सिडकुल के तहत औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना हुई थी। तीनों जगहों पर सैकड़ों उद्योग लगे। रुद्रपुर में 316 तथा सितारगंज में 50 के करीब उद्योग लग चुके हैं। रुद्रपुर में लगभग 150 तथा सितारगंज में 60 उद्योग निर्माणाधीन हैं। पैकेज के मुताबिक वर्ष 2010 तक लगने वाले उद्योगों के एक्साइज, अन्य करों की अगले 10 वर्षों तक सहूलियत मिलेगी। पैकेज से आकर्षित होकर देश के विभिन्न हिस्सों में छोटे बड़े औद्योगिक घराने यहां आये हैं। इनमें टाटा, बजाज, पारले, नेस्ले, ब्रिटानिया, एक्मे, एचपी, एचसीएल, भास्कर, डाबर समेत अन्य उद्योग तथा उनकी वेंडर इकाइयां शामिल हैं। इधर सिडकुल की स्थापना तथा लगने वाले उद्योगों में राज्य के युवाओं ने रोजगार पाने तथा बेहतर भविष्य के जो सपने देखे थे या सरकारों ने दिखाये थे। वे उद्योगों की शुरूआत में ही दरकने लगे थे। अब तो सपने बिखरने भी लगे हैं। इसकी वजह है कि सिडकुल की प्रत्येक फैक्ट्री ने अपने यहां जो स्टाफ रखा है, वह अधिकांश संविदा पर ठेेकेदारी प्रथा पर हंै। शुरूआत से चली आ रही प्रथा आज भी कायम है। राज्य के बेरोजगार यहां रोजगार की तलाश में आये तो अधिकांश उद्योगों के गेट पर 'नो वैकेंसी' के बोर्ड मिले अथवा उनके आवेदन पत्र तक रिसीव करने से इनकार कर दिये गये। इससे उन्हें निराशा का सामना करना पड़ा और मजबूरन ठेकेदारों की शरण लेनी पड़ी। सिडकुल कार्यालय से मिले आंकड़ों के मुताबिक रुद्रपुर के उद्योगों में 35000 तथा सितारगंज में 2000 व्यक्ति कार्यरत हैं। इन लोगों को रोजगार अवश्य मिला हुआ है पर अधिकांश ठेकेदारी प्रथा पर चल रहे हैं। ऐसे में वे तीन से पांच हजार रुपया महीने की पगार पा रहे हंै जबकि 12-12 घंटे की ड्यूटी ली जा रही है। उनकी हालत तो और भी दयनीय है जो लोग दिहाड़ी पर हैं। ऐसे लोग रोजाना ठेकेदारों के कार्यालय या संबंधित उद्योग के गेट पर शिफ्टों के शुरू होते समय खड़े हो जाते हैं। काम हुआ तो अंदर बुला लिये जाते हैं वरना उन्हें अगले दिन आने को कहा जाता है। ऐसे श्रमिक मात्रा दो से ढाई हजार रुपया महीना ही कमा पाते हैं। खाद्यान्न की बढ़ती कीमतों तथा भारी भरकम वाले किराये के कारण सिडकुल में लगे युवक-युवतियों का जीना दुश्वार हो रहा है। एक तो कम पगार ऊपर से 12 घंटे की ड्यूटी ने इनके जीवन को लगभग नरक सा बना रखा है। काम के समय जब लोग दुर्घटना का शिकार होते हैं तो और भी दुर्दशा हो जाती है। ऐसे लोग ठेकेदारों के आदमी होते हैं, इसलिए फैक्ट्रियां इन्हें इलाज की सुविधा भी नहीं देती।

Wednesday, October 7, 2009

-त्रेतायुग से प्रज्ज्वलित है यहां अग्नि

-त्रियुगीनारायण में इसी अग्नि को साक्षी मान किया था शिव व पार्वती ने विवाह -भगवान विष्णु ने यहां लिया था वामन रूप में अवतार -वर्षभर यहां विवाह करने वालों का लगा रहता है जमावड़ा रुद्रप्रयाग हिमालय को भगवान शंकर का वास माना गया है। यही कारण है कि यहां के कण-कण में श्रद्धालु भगवान शंकर का रूप देखते है और उनकी पूजा करते हैं। हिमालय क्षेत्र में शंकर के मंदिरों की गिनती करना कठिन कार्य है। यहां भगवान शंकर से जुड़ी अनेकों कथाएं आज भी प्रचलित हंै। मान्यता है कि भगवान शंकर ने हिमालय के मंदाकिनी क्षेत्र के त्रियुगीनारायण में पार्वती से विवाह किया था। खास बात यह है कि मंदिर में जल रही अखंड अग्निज्योत को भगवान शिव व पार्वती के विवाह वेदी की अग्नि ही माना जाता है। बताया जाता है कि यह अग्नि त्रेतायुग से जल रही है। यही वजह है कि हर वर्ष यहां सैकड़ों जोड़े विवाह बंधन में बंधते हैं। त्रेतायुग में संपन्न हुए शिव व पार्वती के विवाह का स्थल जिले का सीमांत गांव त्रियुगीनारायण मंदिर आज भी श्रद्धा व भक्ति के अटूट आस्था का केंद्र है। रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राष्ट्रीय राजमार्ग पर सोनप्र्रयाग से 12 किमी मोटरमार्ग का सफर तय कर यहां पहुंचा जाता है। मंदिर क्षेत्र के चप्पे-चप्पे पर शिव और पार्वती की शादी के साक्ष्य स्पष्ट नजर आते है। यहां पर आज भी अग्नि कुंड के साथ अखण्ड ज्योति, धर्म शिला मौजूद है। शादी के दौरान देवताओं ने विभिन्न शक्तियों से वेदी में विवाह अग्नि पैदा की थी, जिसे धंनजय नाम दिया गया। यह अग्नि आज भी निरंतर जल रही है। इस अग्नि की राख को आज भी लोग अपने घरों में ले जाते हैं, जिसे शुभ माना जाता है। वेद पुराणों के उल्लेख के अनुसार यह मंदिर त्रेतायुग से स्थापित है, जबकि केदारनाथ व बदरीनाथ द्वापरयुग में स्थापित हुए। यह भी मान्यता है कि इस स्थान पर विष्णु भगवान ने वामन देवता का अवतार लिया था। पौराणिक उल्लेख के अनुसार बलि को इन्द्रासन पाने के लिए सौ यज्ञ करने थे, इनमें 99 यज्ञ वह पूरे कर चुका था, लेकिन सौवें यज्ञ से पूर्व विष्णु भगवान ने वामन अवतार लेकर उसे रोक दिया और बलि का यज्ञ संकल्प भंग हो गया। इस दिन से यहां भगवान विष्णु की वामन के रूप में पूजा होती है। मंदिर के प्रबंधक परशुराम गैरोला बताते हैं कि आज भी इस मंदिर के प्रति लोगों में भारी श्रद्धा है। वर्ष भर बड़ी संख्या में भक्त आकर मंदिर के दर्शन करते हैं। भगवान शिव व पार्वती का विवाह स्थल होने के कारण त्रियुगीनारायण का विवाह कामना रखने वाले युगलों के लिए महत्वपूर्ण स्थान है। हर साल यहां सैकड़ों की संख्या में जोड़े विवाह करते हैं। ऐसा ही एक जोड़ा है ललित मोहन रयाल व रुचि का। ये दोनों पीसीएस अधिकारी हैं। ललित मोहन रयाल वर्तमान में अल्मोड़ा जिले में एसडीएम के पद पर तैनात हैं। श्री रयाल बताते हैं कि वह इस स्थान से इतना प्रभावित हुए कि वैवाहिक जीवन यहीं से शुरू करने का फैसला किया।

Tuesday, October 6, 2009

-अब रात को भी उतर व उड़ सकेंगे हवाई जहाज

जौलीग्रांट हवाई अड्डे पर एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर भवन का उद्घाटन डोईवाला, प्रमुख सचिव नागरिक उड्डयन पीसी शर्मा ने सोमवार को जौलीग्रांट हवाई अड्डे पर सात करोड़ की लागत से तैयार एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर भवन का उद्घाटन किया। अब शीघ्र ही इस हवाई अड्डे पर रात में भी जहाज उतर व उड़ सकेंगे। टावर भवन का उद्घाटन करते हुए श्री शर्मा ने कहा कि यहां जर्मनी से मंगाए गए इंस्ट्रूमेंटल लैंडिंग सिस्टम लगाए गए हैं। इस सिस्टम के चालू होने से विमान किसी भी समय बिना किसी बाधा के आ व जा सकेंगे। एयर अथॉरिटी ऑफ इंडिया उत्तरी क्षेत्र नई दिल्ली के कार्यालय निदेशक यूएन सिंह ने कहा कि एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर के निर्माण में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल हुआ है। यह पूर्ण रूप से वृत्ताकार है। इसकी ऊंचाई 21 मीटर है। नए एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर से वायु यातायात का नियंत्रण चारों दिशाओं में बिना किसी अवरोध के हो सकेगा। इस टावर भवन में संचार के नए उपकरण, मौसम विभाग की आधुनिक सुविधाएं, नए अग्निशमन संयंत्र एवं आपातकालीन स्वास्थ्य केंद्र की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। कार्मिक वरिष्ठ प्रबंधक बी. सिंह और प्रबंधक एटीसी सुरेंद्र कुमार कैंतुरा ने बताया कि जौलीग्रांट में लगी यह तकनीक दिल्ली से उड़ान भरते ही पायलट को दिशा-निर्देश देना शुरू कर देगी, जिससे खराब मौसम और रात में भी विमान हवाई अड्डे पर उतर सकेंगे।

-अलग पहचान के लिए प्रसिद्ध सुमाड़ी गांव

कई आईएएस, सैन्य अधिकारी, डाक्टर व शिक्षक निकले हैं इस गांव से गांव से जुड़ा पंथ्या दादा का ऐतिहासिक तथ्य मध्य हिमालय की पर्वत शंृखलाओं के बीच स्थित पौड़ी जनपद का सुमाड़ी गांव कई मायनों में अपनी अलग पहचान रखता है। इस गांव कई आईएएस अफसर, सैन्य अधिकारी, डाक्टर व शिक्षक निकले हैं, जिन्होंने गांव का नाम राष्ट्रीय स्तर पर ऊंचा किया है। इसके साथ ही इस गांव से कई ऐसे ऐतिहासिक तथ्य जुड़े हैं, जो इसे भिन्नता प्रदान करते हंै। पौड़ी से करीब 30 किमी दूर स्थित खिर्सू ब्लाक की कठूलस्यंू पट्टी का सुमाड़ी गांव कई मायनों में देश भर के उन गांवों की सूची में शामिल है, जो अपनी राष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान रखते हैं। इस गांव से अंग्रेजों के समय गढ़वाल में पहले आईएएस अधिकारी गोविंद राम काला बने थे। इसके साथ शुरू हुई पहल बेमिसाल रही, जिससे अब तक गांव से 22 आईएएस अफसर बन चुके हैं। इतना ही नहीं, गांव ने चिकित्सा के क्षेत्र में भी झांडे गाड़े हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में पदार्पण की शुरुआत भी अंगे्रजों के शासनकाल में ही हो गई थी। सुमाड़ी गांव निवासी डा. भोलादत्त काला गांव के पहले चिकित्सक बने, जिसके बाद गांव से अब तक करीब 50 एमबीबीएस बन चुके हैं। इस गांव की नई पीढ़ी अब इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपने झांडे गाड़ रही है। इतना ही नहीं गांव की प्रतिभाओं ने अन्य क्षेत्रों में भी परचम लहराया है। एयर मार्शल के पद से तीन साल पूर्व सेवानिवृत्त हुए वेद प्रकाश काला भी इसी गांव के निवासी हैं। इस गांव से अब तक सौ लोग विभिन्न क्षेत्रों में पीएचडी की उपाधि हासिल कर चुके हैं। गांव से 15 प्रधानाचार्य सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इस गांव से अब तक 500 शिक्षक बने हैं। वर्ष 1978-79 में डा. सतीश चंद्र काला को पदमश्री पुरस्कार मिल चुका है। गांव से जुड़ा एक अन्य ऐतिहासिक तथ्य है, जो गांव को अलग ही पहचान प्रदान करते हैं। वह है पंथ्या दादा। माना जाता है कि टिहरी के राजा मेदनी शाह ने जब पूरे गढ़वाल में बेगार प्रथा लागू की और कई प्रकार के कर लगाए, तो सुमाड़ी गांव निवासी 14 वर्षीय पंथ्या राम काला ने इसका जमकर विरोध किया। इस पर आग बबूला हुए राजा ने कहा कि आदेश की अवहेलना होने पर गांव के आदमियों को अग्निकुंड में जलाया जाए। इसके साथ ही आदेश दिया कि इसकी शुरुआत गांव के सबसे बड़े परिवार से की जाए। संयोग से पंथ्या दादा का परिवार ही सबसे बड़ा निकला। बताते हैं करीब 350 साल पूर्व पंथ्या राम काला ने राजा के अधिकारियों को गांव में ही खूब-खरी खोटी सुनाई। उन्होंने अग्निकुंड में कूदकर अपनी जान दे दी। इससे आहत गांव के अन्य आठ लोगों ने उसी वक्त अग्निकुंड में अपने प्राणों की आहुति दे दी। इससे भयभीत होकर राजा ने अपना आदेश वापस ले लिया। साथ ही गांव में बेगार प्रथा व अन्य प्रकार के करों को भी समाप्त कर दिया। तब से हर साल इस गांव में पंथ्या राम काला की याद में धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किया जाता है। गांव के वयोवृद्ध नित्यानंद कगडियाल एवं विमल काला बताते हैं कि तरक्की के साथ ही गांव से पलायन का ग्राफ भी बढ़ा है, लेकिन गांव आज भी हर क्षेत्र में विकास कर रहा है।

क्या बोलेगा खामोश पौड़ी ?

-8 अगस्त 1994 को पौड़ी से जली थी पृथक राज्य की ज्वाला -इसके बाद आंदोलन ने लिया था क्रांतिकारी स्वरूप पौड़ी ले मशाले चल पड़े हैं, लोग मेरे गांव के, अब अंधेरा जीत लेंगे, लोग मेरे गांव के... जनवादी कवि बल्ली सिंह चीमा की इन पक्तियों को आत्मसात करने वाला पौड़ी राज्य बनने के बाद से खामोशी की चादर ओढ़े है। विकास के मोर्चे पर खुद को ठगा सा महसूस करने वाले इस शहर ने गैरसैंण जैसे मुद्दे पर चुप्पी साधी हुई है। हालांकि पौड़ी के ही एक छोर से लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी इस सन्नाटे को चीर रहे हैं, पर सवाल है कि गांधी जयंती पर प्रदेश बंद की गूंज में इस आवाज को पौड़ी का जनमानस धार देगा भी या नहीं। 2 अगस्त 1994 को इंद्रमणि बडोनी कलेक्ट्रेट परिसर में राज्य की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठ गए थे। इसके बाद प्रशासन के रवैये ने आग मेंं घी डालने का काम किया और 7 अगस्त 1994 की मध्यरात्रि प्रशासन ने जबरन बडोनी को उठाया दिया था। इसके विरोध में 8 अगस्त 1994 को पौड़ी में व्यापारी वर्ग, छात्र और च्वींचा गांव की सैकड़ों महिलाओं ने आंदोलन को धार देने का काम किया। यहीं से आंदोलन तेजी के साथ आगे बढ़ा। पौड़ी की समूची जनता सड़कों पर उतर गई और इसी दिन पौड़ी में ऐतिहासिक प्रदर्शन भी हुआ। आखिरकार नौ नवंबर 2000 को तमाम शहादतों के बाद पृथक राज्य अस्तित्व में आया। अब एक दशक की यात्रा पूरी करने जा रहे उत्तराखंड में राज्य की अवधारणा के धूमिल होने को लेकर बहस-मुहासिबों का दौर चल रहा है, लेकिन पौड़ी की खामोशी सबको कचोट रही है। यह कचोटता का अहसास इसलिए भी है कि पौड़ी के स्वर में जो गर्मी है, वह ही मौजूदा सवालों से टकराने में सहायक हो सकती है। उसके बगैर कोई भी कोशिश अधूरी ही कही जाएगी। इस खामोशी के सवाल पर लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी कहते हैं कि पहाड़ में राजधानी बनने से होने वाले पहाड़ के विकास की सोच पर पौड़ीवासी ज्यादा गंभीर नहीं हैं। पौड़ी की उपेक्षा के चलते भी यहां के लोग स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राजधानी को महज भौगोलिक दृष्टि से नजदीक देखना ठीक नहीं है। एक प्रकार की मानसिकता यह भी पनप गई है कि गैरसैंण से पौड़ी की दूरी बढ़ेगी। श्री नेगी के मुताबिक विकास के लिए पहाड़ में ही राजधानी होना बेहद जरूरी है। राज्य आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली पौड़ी गांव निवासी सावित्री देवी, रामी देवी, बसंती देवी सवाल करतीं हैं कि आखिर राज्य आंदोलन के बाद क्या हासिल हुआ है? राज्य प्राप्ति के बाद भी पौड़ी की लगातार उपेक्षा ही हो रही है। इससे पौड़ीवासी अब राजधानी समेत अन्य मसलों पर खामोश रहना ही बेहतर समझा रहे हैं। राज्य आंदोलन से जुड़े बाबा मथुरा प्रसाद बमराड़ा कहते हैं, राज्य में अब तक की सरकारों ने शहीदों के सपनों के साथ मजाक किया है। जिन उद्देश्यों के लिए पृथक राज्य की लड़ाई लड़ी गई, उनको हाशिये पर धकेल दिया गया है। राज्य निर्माण आंदोलनकारी कल्याण परिषद के सदस्य नंदन सिंह रावत कहते हैं कि राज्य प्राप्ति के बाद पौड़ी तमाम मुद्दों पर खामोश हो गया है। पौड़ी अपने आप को भी ठगा सा महसूस कर रहा है।

एक नदी, जिसे माना जाता है अछूत

-उत्तरकाशी जनपद में बहती है टौंस नदी, तमसा भी कहा जाता है -पौराणिक मान्यताओं के अनुसार किरमिरी राक्षस का रक्त गिरा था नदी में -मान्यताओं के मुताबिक दस वर्ष लगातार पानी पीने से हो जाता है कुष्ठ पुरोला: यूं तो उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से जाना जाता है और मान्यता है कि यहां के पर्वत, वन, नदियां आदि में देवता वास करते हैं। गंगा, यमुना जैसी सतत प्रवाहिनी व पवित्र नदियां भी यहीं से निकलती हैं। इसके अलावा क्षेत्र में अन्य नदियों को भी पूज्य माना गया है और सामान्यत: सभी प्रमुख नदियों के साथ गंगा प्रत्यय जोडऩे की परंपरा रही है, लेकिन इसी देवभूमि में एक नदी ऐसी भी है, जिसे अछूत माना गया है और इसका पानी पीना तो दूर, छूना भी निषेध किया गया है। टौंस नाम की इस नदी के बारे में मान्यता है कि पौराणिक काल में एक राक्षस का वध किए जाने पर उसका रक्त इस नदी में गिर गया था, जिससे यह दूषित हो गई। यही वजह है कि इस नदी को तमसा भी कहा जाता है। उत्तरकाशी जनपद में दो नदियां रूपीन और सुपीन देवक्यारा के भराड़सर नामक स्थान से निकलती हुई अलग- अलग दिशाओं में प्रवाहित होती हैं। रूपीन फते पट्टी के 14 गांवों से होते हुए गुजरती है, जबकि पंचगाई, अडोर व भडासू पट्टियों के 28 गांवों से जाती है, लेकिन इन गांवों के लोग न तो इन नदियों का पानी पीते हैं और ना ही इससे सिंचाई की जाती है। नैटवाड़ में इन नदियों का संगम होता है और यहीं से इसे टौंस नाम से पुकारी जाती है और यहीं से यह नदी दूषित भी मानी जाती है। लोकमान्यताओं के अनुसार रूपीन, सुपीन व टौंस नदियों का पानी पीना तो दूर छूने तक के लिए प्रतिबंधित किया गया है। वजह, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग में में दरथ हनोल के समीप किरमिरी नामक राक्षस एक ताल में रहता था। उसके आतंक से स्थानीय जन बहुत परेशान थे। लोगों के आह्वान पर कश्मीर से महासू देवता व उनके गण सिड़कुडिय़ा महासू यहां पहुंचे और किरमिरी को युद्ध के लिए ललकारा। भयंकर युद्ध के बाद महासू देव ने आराकोट के समीप सनेल नामक स्थान पर किरमिरी का वध कर दिया। उसका सिर नैटवाड़ के समीप स्थित स्थानीय न्याय के देवता शिव के गण पोखू महाराज के मंदिर के समीप गिरा, जबकि धड़ नदी के किनारे। इससे पूरी टौंस नदी का पानी में राक्षस का रक्त मिल गया। तभी से नदी को अपवित्र व तामसी गुण युक्त माना गया है। दूसरी मान्यता के मुताबिक द्वापरयुग में नैटवाड़ के समीप देवरा गांव में कौरवों व पांडवों के बीच हुए युद्घ के दौरान कौरवों ने भीम के पुत्र घटोत्कच का सिर काटकर इस नदी में फेंक दिया था। इसके चलते भी इस नदी को अछूत माना गया है। राक्षसों का रक्त मिलने के कारण इसमें तम गुण की अधिकता मानी जाती है, इसीलिए इसे तमसा नाम से भी पुकारा जाता है। मान्यता है कि इस नदी का पानी शरीर में कई विकार उत्पन्न कर देता है। इतना ही नहीं, लगातार दस साल तक टौंस का पानी पीने से कुष्ठ रोग भी हो जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता मोहन रावत, सीवी बिजल्वाण, टीकाराम उनियाल, सूरत राणा आदि कहते हैं कि नदी के बारे में उक्त मान्यता सदियों पुरानी है और पौराणिक आख्यानों पर आधारित है। वे कहते हैं कि हालांकि, नदी के पानी के संबंध में किसी तरह का वैज्ञानिक शोध नहीं है, लेकिन स्थानीय जनता की लोकपरंपराओं में यह मान्यता इस कदर रची बसी हुई है कि कोई भूलकर भी इसका उल्लंघन नहीं करता।

-उत्तराखंड की सबसे बड़ी ताकत पेंशन के भरोसे

-सरहदों की सुरक्षा कर लौटे फौजियों का न पुनर्वास न स्वरोजगार -राज्य के 50 हजार पूर्व सैनिकों में से मात्र 250 का ही पुनर्वास पिथौरागढ़: सरहदों की सुरक्षा में अपनी जवानी लगा देने वाले पूर्व सैनिकों के पुनर्वास की कोशिशें उत्तराखंड में परवान नहीं चढ़ पा रही हैं। कुल जनसंख्या का दस प्रतिशत होने के बावजूद पूर्व सैनिक नाममात्र की पेंशन के भरोसे जीवन की गाड़ी घसीट रहे हैं। उत्तराखण्ड सैनिक बाहुल्य राज्यों में शामिल है। लाखों सैनिक देश की सरहदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं, तो लाखों सरहदों की सुरक्षा के लिए अपनी जवानी देकर घर लौट आये हैं। अधिकांश सैनिक 40-45 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त हो जाते हैं, फिर इनके सामने खड़ी होती है जीवन की गाड़ी चलाने की समस्या। कहने को सरकार ने पूर्व सैनिकों के पुनर्वास और स्वरोजगार के लिए तमाम योजनाएं चला रखी हैं, लेकिन योजनाएं कैसी हैं, इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि सीमांत जिले के 50 हजार पूर्व सैनिकों में से मात्र 250 का ही पुनर्वास दो वर्ष के भीतर हो पाया है। पुनर्वास भी सुरक्षा कर्मी या संविदा कर्मचारी के रूप में हुआ है। पूर्व सैनिकों को स्वरोजगार के लिए जिला सैनिक कल्याण विभाग के माध्यम से पांच लाख रुपये तक का ऋण दिये जाने का प्राविधान है, लेकिन पूरे ब्याज पर दिये जाने वाले इस ऋण में मात्र .1 प्रतिशत अनुदान की व्यवस्था है, जबकि सरकार अन्य वर्गों के लिए मोटे-मोटे अनुदान वाली योजनायें चला रही है। इस योजना के प्रति पूर्व सैनिकों में कोई रुचि नहीं है। पुनर्वास और स्वरोजगार योजनाओं की खामियों के चलते ही अधिकांश पूर्व सैनिक नाममात्र पेंशन पर ही अपने जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं। बेहतर योजनाओं की दरकार:पूर्व सैनिकों के संगठन राष्ट्रीय मोर्चा के प्रदेश प्रभारी कर्नल सत्यपाल सिंह गुलेरिया का कहना है कि पूर्व सैनिकों का पुनर्वास करना है, तो बेहतर योजनायें बनानी होंगी। सरकारी नौकरियों में उनके लिए आरक्षण बढ़ाना होगा। स्वरोजगार के लिए संचालित योजनाओं में कम ब्याज और अनुदान का प्रतिशत बढ़ाना होगा। उन्होंने किसानों को स्वरोजगार के लिए तकनीकी रूप से भी सक्षम बनाने वाली योजनाएं भी चलाने पर बल दिया। राज्य के विकास में समुचित उपयोग के लिए पूर्व सैनिकों को केन्द्र में रखकर योजनायें बनाने पर बल दिया। बंटी हुई है ताकत: उत्तराखण्ड में पूर्व सैनिकों की तादात लाखों में है, लेकिन यह ताकत बंटी हुई है। दर्जनों पूर्व सैनिक संगठन यहां काम कर रहे हैं। सेवानिवृत्त कर्नल रामदत्त जोशी का कहना है कि राज्य की राजनैतिक दिशा तय करने की ताकत पूर्व सैनिकों में हैं। पूर्व सैनिक एकजुट हों तो सरकार उनके पुनर्वास और स्वरोजगार के लिए बेहतर योजनाएं बनाने को मजबूर होगी।

second visal ma bhagwati uttrakhandi jageran (jagar)program event profile

Date: saturday, 10october, 2009, 7:00PM Hello groups member we are organize a garhwali dusara visal ma bhagwati uttrakhandi jagran(jagar) program on 10 October 2009 at D D A park desbandhu apparment mother diary ke peche sadbhawana appaerment ke samene I P EXTENCTION DELHI 110092 MANDAWALI since 7 to 8 pm. I am sending our profile for JAGARAN program. please find the attachment. Thanks for more details call : 9911044344,9015883436,9711905059,9899159727,9891458803 or kuldeep_rana100@yahoo.co.in+91 9891458803 yoginder rana devender pasbhola arjun bhandari kuldeep singh rana raju kaptiyal devender sajwan KALAKAR sh Nerender singh negi, Pritam bhartwan ,Gajender rana ,Mena rana ,Hira singh rana ,Bisan singh ,Hriyala Gitika aswal, SPECIAL: Radha krishna nirtya Kali tandav Krisan sudama milan uttamdas dool damo vadak etc BHANDARA sunday 11 october 2009 durga mandir sankar marg gali no 4 mandawali delhi 110092 welcom to all uttrakhand youwa manch mandawali vistar delhi 110092 _t_._KKKKt,thanks_.___ KULDEEP SINGH RANA