Saturday, 26 September 2009

-जल स्रोत घटने से प्यासे जंगल-जमीन

-हिमालय व तराई की वन भूमि में तेजी से सूख रहे हैं स्रोत -पेयजल महकमे ने 221 के बाद 500 स्थानों की सूची थमाई -वेजीटेटिव चैकडेम व भू-कटाव रोकने को कैचमेंट एरिया बने मददगार हिमालयी और तराई क्षेत्रों की वन भूमि में जल स्रोत तेजी से घटने से आबादी के साथ जंगल ही नहीं जमीन भी प्यासी हो गई है। प्यास को बुझााने अब हरी-भरी घास के साथ ही झााडिय़ों से बने चैकडेम व भू-कटाव रोकने को कैचमेंट एरिया मदद ली जा रही है। मौसम चक्र गड़बड़ाने और जलवायु बदलने से हिमालय और उसके तराई के क्षेत्रों में जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं। इससे सैकड़ों गांवों के हजारों लोगों के हलक सूखने को मजबूर कर दिया है। वन भूमि के अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्रों में जल स्रोत घट रहे हैं या उनसे पानी रूठ गया है। बढ़ते खतरे का अंदाजा इससे लग सकता है कि वन भूमि के भीतर गाड-गदेरों, चाल-खालों व कुओं के रूप में 221 जल स्रोत सूख चुके हैं। इन स्रोतों को रिचार्ज करने की प्रक्रिया अभी जारी है पर पेयजल महकमे ने 500 ऐसे ही स्थानों की सूची वन महकमे को थमा दी है। पहली सूची में शामिल 221 सूखे जल स्रोतों में दो टिहरी बांध डूब क्षेत्र में आ चुके हैं। शेष 219 में 138 स्रोतों का ट्रीटमेंट हो चुका है। अभी 81 स्रोतों का ट्रीटमेंट बाकी है। टिहरी जिले में 49 में 34, पौड़ी में 34 में 29, अल्मोड़ा में 81 में 40 स्रोतों का ट्रीटमेंट किया जा चुका है। इन स्थानों पर वेजीटेटिव चैकडेम के जरिए पानी को रोका गया है ताकि भूजल स्तर में भी इजाफा हो। स्रोतों के कैचमेंट एरिया में घास व झााडिय़ों की प्रजातियां रोककर जल ठहराव के बंदोबस्त किए गए हैं। वन महकमे ने भू-कटाव रोकने को कई स्थानों पर ट्रीटमेंट तो किया, लेकिन स्रोतों को रिचार्ज करने में अब भी दिक्कतें आ रही हैं। इनमें कुछ दिक्कतें की वजह भूगर्भीय स्थिति में बदलाव को भी माना जा रहा है। यही नहीं, पेयजल महकमे ने वन महकमे को 500 ऐसे नए स्थानों की सूची पकड़ा दी है, जहां जल स्रोतों को रिचार्ज करना है। हालांकि वन महकमे ने सूख गए जल स्रोतों की सेटेलाइट लोकेशन मांगी है। गढ़वाल क्षेत्र के मुख्य वन संरक्षक डीवीएस खाती ने स्वीकार किया कि जल स्रोतों की सही लोकेशन के बाद ही ट्रीटमेंट शुरू किया जाएगा। महकमा नरेगा के माध्यम से इस काम में ग्रामीणों की सहायता लेने पर विचार कर रहा है। हालांकि, नरेगा में ग्रामीण रुचि लेने से कन्नी काट रहे हैं।

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